30 अगस्त 2010

बूंदी का कडाली तीज मेला ( Teej of Bundi Kadally Fair )


राजस्थान रंग-बिरंगी तीज त्यौहारी संस्कृति लिये अपनी विशेष पहचान रखता है यदि दिन सावन-भादों वाली वर्षा के हों तो त्यौहारी आनंद लोगों के दिलों में स्वतः ही दस्तक देने लगता है।

ऐसे में हरी-भरी अरावली की श्रृंखला में बहते कल-कल झरनों का मौसम घर-घर में त्यौहारी मुस्कान के रंग बिखेर देता है। त्यौहारों पर लगने वाले मेलों में सामाजिक समरसता और भाई-चारे की परम्परा को बनाए रखने की विशेषता होती है।

राजस्थान में त्यौहारी सरगम मेघ-मल्हार गाते सावन माह की तीज से प्रारंभ होकर गणगौर के रस-रसीले त्यौहार तक चलती है।

महिलाओं के मांगलिक सुहाग से जुड़े तीज-गणगौर त्यौहारों की बात ही कुछ और है। महिलाएं अपने सुहाग की मंगल कामना के लिये जहाँ इन त्यौहारों पर पूजा-अर्चना करती हैं। वहीं कई स्थानों पर लोक-लुभावन झांकियां भी निकाली जाती हैं।

राजस्थान में तीज-त्यौहार पर भी ऐसी ही भव्य सवारी निकाली जाती है। इसमें श्रावण शुक्ल तृतीया  को जयपुर में तीज की सवारी निकलती है। यह परम्परा आजादी से पूर्व राजाओं के समय से चली आ रही है।

इसी के साथ भाद्रपद की तृतीया पर बूंदी छोटी काशी में भी तीज की भव्य सवारी निकाली जाती है। वर्षा-रितु में हरी-भरी व शीतल धरती और नदी नालों की कल-कल के चलते इस तीज के त्यौहार का उत्साह व उमंग देखते ही बनता है। तीज महिलाओं के लिये सज-धज वाला मांगलिक त्यौहार है। विवाहित महिलाएं अमर सुहाग हेतु माँ पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं।

बूंदी में लगभग 186 वर्षों से तीज मेला लगता है। मेले सामाजिक मेल-मिलाप बढाने और सांस्कृतिक जीवन बनाए रखने में बड़े मददगार होते हैं। इस मेले में बूंदी शहर के आस-पास के ग्रामीण अंचल के लोग बड़ी संख्या में तीज माता के दर्शन करते और मेले की झाकियां देखने के लिये आते हैं। ग्रामीणों की अपनी दिलीमस्ती होती है। यह ढोल-मंजीरों अलगोजे की धुनों पर नाचते गाते और हाथ में छाता घुमाते नजर आते हैं। तभी लगता है की मेले हमारे जीवन में नई उमंग भरने में सक्षम हैं।

बूंदी में तीज मेला प्रारम्भ होने की भी एक रोचक घटना है। बूंदी रियासत में गोठडा के ठाकुर बलवंत सिंह पक्के इरादे वाले जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत व्यक्ति थे। एक बार अपने किसी मित्र के कहने पर की जयपुर में तीज भव्य सवारी निकलती है, यदि अपने यहाँ भी निकले तो शान की बात रहे। कहने वाले साथी ने तो यह बात सहज में कह दी पर ठाकुर बलवंत सिंह के दिल में टीस-सी लग गई। उन्होंने जयपुर की उसी तीज को जीत कर लाने का मन बना लिया। ठाकुर अपने ग्यारह विश्वनीय जांबाज सैनिक को लेकर सावन की तीज पर जयपुर सवारी स्थल पहुँच गए।

निश्चित कार्यक्रम के अनुसार जयपुर के चहल-पहल वाले बाजारों से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीके से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए और तभी से तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी।

ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और तभी से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिये शाही सवारी भी निकलती थी। इसमें बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया जाता था।

सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झेल के सुन्दरघात से तीज सवारी प्रमुख बाजार से होती हुई रानी जी की बावडी तक जाती थी। वहां पर सांस्कृतिक तक जाती थी। वहां पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएं अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानिक किया जाता था और अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी।

दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिनमें दो मदमस्त हाथियों का युद्ध होता था, जिसे देखने लोगों की भीड़ उमड़ती थी।

स्वतन्त्रता के बाद भी तीज की सवारी निकालने की परम्परा बनी हुई है। अब दो दिवसीय तीज सवारी निकालने का दायित्व नगर पालिका उठा रही है। राजघराने द्वारा तीज की प्रतिमा को नगरपालिका को नहीं दिए जाने से तीज की दूसरी निर्मित करा कर प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की तृतीय को तीज सवारी निकालने की स्वस्थ सान्क्रतिक परम्परा बनी हुई है।

यघपि कुछ समय तक राजघराने की तीज भी राजमहलों के अन्दर ही निकलती रही है। लेकिन कालांतर में सीमित दायरे में तीज की सवारी का निकलना बंद हो गया है। केवल नगरपालिका द्वारा निकाली जा रही तीज माता की सवारी ही आम जनता के दर्शनार्थ निकली जा रही है। पिछले दो वर्षों से जिला प्रशासन के विशेष अनुरोध और आश्वासन के बाद राजघराने की तीज भी अब तीज सवारी में निकाली जा रही है।

अब तीज का त्यौहार यहाँ लोकोत्सव के रूप में मनाया जाता है। राज्य सरकार बूंदी के पंद्रह दिवसीय तीज मेले के लिये विशेष बजट का प्रावधान करती है। कुंभा स्टेडियम में आयोजित तीज मेले में चलने वाले कार्यक्रमों में  विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इसमें कवी सम्मलेन, कव्वाली, अलगोजे एवं स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं। दर्शकों के लिये ये मनोरंजन के ख़ास आकर्षण होते हैं। मेले में विभिन्न सामानों की दुकाओं, बच्चों के झूले, सर्कस व अजीबों-गरीब कारनामों का भी अपना आकर्षण होता है। महिलाओं का मीना बाजार अपनी लकदक सुर्ख़ियों में रहता है।

यह सच है की आज टी.वी. संस्कृतिक  ने लोकानुरंजन के इन परम्परागत कार्यक्रमों के आकर्षण को काफी कम कर दिया है, फिर भी वर्षा रितु के मौसम की इस कजली तीज मेले के प्रति यहाँ के श्रद्धालुओं में आज भी उत्साह बना हुआ है। तीज माता की सवारी देखने दूर-दूर के शहरों और आसपास के गावों से बड़ी संख्या में  लोग आते हैं। आखिर वह जिले का लोकप्रिय वार्षिक मेला जो ठहरा!

                                                                                                                                                              - दिनेश विजयवर्गीय, बूंदी

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