27 सितंबर 2011

ठूँठ

जा मुन्नी, बुढऊ को चाय दे, आ हाथ में चाय का प्याला थमाती घृणा से मुँह फेरती बहू सुशीला ने कहा तो सुनकर पचासी वर्षीय वृद्ध मनीराम को कुछ पल के लिए हँसी आ गयी- आज एक राहगीर ने भी पूछा था- ऐ बुड्ढे, भीखू महाजन का घर किधर है? मनीराम सोचने लगा- तन कई वर्ष पुराना है तो सम्बोधन ही बदल गया, वह संज्ञा से विशेषण हो गया। आज उसे अपनी स्थिति एक जानवर से भी गई बीती लग रही थी। जिसका सम्बोधन आयु के साथ तो नहीं बदलता। मुन्नी के हाथ से चाय लेकर वह फिर वहीं बैठ गया। बीच आँगन में शेष ठूँठ के नीचे, यह उसके आँगन में था, अभी से नहीं बचपन से, बीच आँगन में नीम का एक विशाल पेड था। इसी के नीचे वह बैठकर पढता था, कुछ बडा हुआ तो खेत से थका-हारा लौटकर इसी के नीचे बैठ जाता और पत्तियों से छन-छनकर आती तृणमणि बनाती सूर्य-किरणों की अठखेलियों में खो जाता और विवाहोपरान्त, यहीं बैठकर रसोई में खाना बनाती, हाथ भर का घूँघट काढे पत्नी सुखिया को देखा करता था जो कभी-कभी घूँघट की आड में उसे देखकर मुस्करा देती थी, तो कभी शरमा जाती थी। मनीराम अतीत को सोचकर मुस्कराता रहता था। किन्तु भूतकाल के ही कुछ लम्हे उसे डराते थे। वह उन्हें याद करना न चाहता था। फिर भी वह सभी क्षण आँखों के सामने आ ही जाते और वह काँप जाता। वह उन लम्हों को इधर-उधर देख, ध्यान से हटाना चाहता था कि घर में बहू की सखी श्यामा की तेज-कर्कश आवाज सुनाई दी, बहू ने चटाई पर उसे बैठा लिया। श्यामा ने मुडकर सिर का पल्लू ठीक करते हुए, माथे को ढाकते हुए, खा जाने वाली नजर से मनीराम को घूरा फिर सुशीला से बोली- ये तुम्हारे बुढऊ ठीक हैं जो चुपचाप बैठे रहते हैं और हमारे बुड्ढे.. राम-राम, सुबह तीन बजे से उठकर बड-बड करते हैं, तो रात के दो बजे तक बडबडाते ही रहते हैं। चाहे कितना भी बुरा, भला कहो, दूसरे की सुनते ही नहीं। बस, अपनी ही कहते हैं पता नहीं- क्या सूझा मेरे बेटे को जो शहर से मशीन लाकर देने वाला है अपने दादा को सुनने के लिए। अब तुम्ही बताओ सुशीला, जब कुछ नहीं सुनते तो इतना बोलते हैं यदि सुनने लगे तो.. अब मुझे भी जबान दबाकर बोलना होगा- यदि बुढऊ ने सुन लिया और... मेरे बेटे से.. खैर.. इसकी भी मुझे कोई परवाह नहीं। आजकल की औलाद कौन अपनी है अच्छा... छोड ये सब, ये बता तेरे ये श्वसुर... नहीं श्वसुर को तो तूने देखा ही नहीं, ये दादा सौ तो पार कर गये होंगे। क्या मालुम.... कब तक यूँ ही ठूँठ से बैठे रहेंगे। बहू ने मुँह फुलाकर कहा। जाडा अपना प्रकोप पूरी तरह फैला चुका था। कई दिन तक हुई बारिश ने उसका सहयोग और कर दिया था। 

आज बारिश न थी फिर भी लगता था कि हड्डियाँ गली जा रही हैं। सामने वाले चबूतरे पर अलाव जल रहा था, हँसी ठहाके की आवाजें आ रही थीं। कभी वह भी, जब तक अलाव में कुछ गर्मी शेष रहती वह वहीं बैठा रहता था। न जाने कितनी, खेत खलिहान से लेकर समाज की अच्छी-बुरी बातें कहता व सुनता था। पास से पंडिताइन भावज निकलकर आतीं, तो मैं भौजी राम-राम कहता। बदले में वे ठिठोली करतीं, न जाने कितनी मजाकें करती हुई निकल जातीं। बस उनके गुलाबी हाथ पैर ही दिखते थे, चेहरा तो वह कभी दिखाती ही न थीं। होली पर रंग खेलने जाते तब भी नहीं। रंग डालने के बाद होली के ढेर से पकवान सामने रखकर चली जातीं। बिना आशीर्वाद दिये तो जाने ही न देतीं। यदि कोई भूल जाता तो कहतीं.. क्यों देवर जी, बिना आशीष लिये ही चले जाओगे। सब उनका सम्मान भी करते थे। जब दुनिया से गयीं तो अन्त में सभी ने उन्हेंश्रद्धांजलि दी थी उस निर्जीव काया को। अभी पंडिताइन भौजी याद आ ही रहीं थी कि अलाव में बैठे रामकिशोर ने आल्हा गाना शुरू कर दिया। मनीराम सुनकर बडबडाया ये रामकिशोरा लय तो ठीक ठाक ले जाता है किन्तु गाता गलत-सलत है। कल इससे कहूँगा जब इधर से निकलेगा कि पहले आल्हा ठीक से कंठस्थ करे, फिर सुर निकाले। मनीराम को एक झुरझुरी फिर आयी। फटा कम्बल उसने और कसकर लपेट लिया, क्या अच्छा होता अगर वह भी अलाव के पास गरम ताप ले रहा होता। किन्तु कैसे? अलाव तो तापना तभी से भयभीत लगने लगा था जब से बेटा नारायण को भरी जवानी में इस बूढे बाप ने आग दी। अलाव तापता तो नारायण के निर्जीव शरीर को भस्म करती आग की लपटें याद आ जातीं। कैसा रोग लगा नारायण बेटा को? उसे क्यों नहीं कोई रोग घेरने आया। रोग लगा तो बेटे को, वह भी क्षय रोग। अस्पताल का डाक्टर कहता ही रहा कि अब ये रोग लाइलाज नहीं, बस नियमित दवा व अच्छी खुराक देते रहना। जमीन एक मुकदमें में गिरवी चली गयी थी। उन्हीं गिरवी रखे अपने खेतों पर ही मजदूरी करके परिवार का पेट मुश्किल से भरता था। फिर दवा और अच्छी खुराक कहाँ से लाये। जब लाख प्रयत्न करता तब चार दिन की दवा का इन्तजाम हो पाता। छ: दिन बिना दवा के ही निकल जाते। जिसने किसी के सामने हाथ न पसारे हों उसे बेटे की दवा के लिए सभी के सामने हाथ पसारने पडते। सब मना ही कर देते सिवाय चौधरी के। फिर कितना क्षोभ होता मन को कि मैंने उधार माँगा ही क्यों? एक वर्ष का इलाज दो वर्ष चला, फिर भी नारायण न बच सका। अपने हाथों जवान बेटा सीने में ठूँठ सा धँसा लिया जो हर पल करकता रहता। नारायण की माँ व पत्नी गम न सह सकी। साल भर में दोनों चली गयीं और नारायण का ही दो साल का नन्हा बच्चा सीने से लगा कर पालता रहा। थोडा बडा हुआ कुछ जमात पढा फिर उसे करतार ड्राइवर ले गया अपने साथ ड्राइवरी सिखाने, अब वह ड्राइवर है। ट्रक चलाता है शहर में। जब कभी एक दो दिन को घर आ जाता है तब बेटे को उसमें ही देख आँखें ठंडी हो जाती हैं।

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