27 सितंबर 2011

तोड़ना

बडे भाई के रोएं खडे हो गए थे। चेहरे पर डर, असमंजस और अनिर्णय के ऐसे मिले-जुले भाव थे, जैसे उसके सामने ही किसी की हत्या कर दी गई हो। कुछ मिनटो तक वह वैसे ही सन्न खडा रहा, जैसे निर्णय नही कर पा रहा हो कि क्या किया जाए। फिर उसके चेहरे की भंगिमा बदलती गई। अब वहां जो कुछ हुआ, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा की चाहना थी। उसकी आंखो मे लाल डोरे उभर आए थे। होठ फडक रहे थे। मै समझ गया कि क्या होगा। हुआ वही। उसने अपने दाएं हाथ से मेरे केशो को पकडा और उसका बायां हाथ तडातड मेरे गालो पर पडने लगा। फिर उसने ढकेल कर मुझे जमीन पर गिरा दिया। मैने भी एक-दो हाथ चलाए थे, लेकिन भाई ने उसे अपने मजबूत हाथो के ढाल से बेअसर कर दिया था। अंतत: मै जमीन पर पडा-पडा गालियां बकने लगा। उसने मेरी गालियो को अनसुना कर दिया और पास ही जमीन पर पडी उस मूर्ति को उठाकर देखने लगा। उसके चेहरे पर असीम पीडा का भाव छा गया। जैसे अपने बच्चे की लाश देख रहा हो। उस कछुए की गर्दन टूट कर एक किनारे शांत पडी हुई थी। काली स्याही से रंगी पीठ भी जगह-जगह से फट गई थी और अब पीली मिट्टी साफ दिख रही थी। जैसे रेगिस्तान मे खडे आदमी का भ्रम टूटा हो, जादूगर का जादू खत्म हो गया हो। मुझे लगा भाई रो पडेगा, लेकिन वह रोया नही। बस सुन्न-सा उस टूटी मूर्ति को कुछ देर निहारने के बाद धीरे से वही पटक दिया। आखिर मैने इसे बनाया ही क्यो था..? उसके मुंह से एक आह फूटी थी। वह तेज कदमो से चलता हुआ गैरेज से निकला और घर की ओर बढ गया। धीरे-धीरे अपने हाथ-पैर और कपडो मे लगी धूल झाडता हुआ मै उठ खडा हुआ। इस पंद्रह मिनट के अंतराल मे जो कुछ हुआ था तीन दिन पहले तक हम उसकी कल्पना भी नही कर सकते थे। सब कुछ कितना अप्रत्याशित था। भाई का मुझे डांटना, उसका दुखी होना..। 

अब मुझे दुख हो रहा था। भाई की आह मेरे आसपास चक्कर काट रही थी। उस आह को मै अपने अगल-बगल ढूंढने लगा, लेकिन वह नही मिली। कुछ क्षण के बाद मैने अपने से तीन चार फर्लाग दूर उस टूटी हुई मूर्ति पर नजर दौडाई, तो देखा- वह आह वहां जा चिपकी थी। मै समझ नही पा रहा था कि अचानक मेरे भीतर वह कौन-सा तूफान उठ खडा हुआ था। एक ऐसा आवेग, जिसे रोक पाना किसी भी हालत मे संभव न था। शायद वह आत्मीयता की शक्ति थी, अपने बेकाम होने की कुंठा थी। मैने रचने की कोशिश की थी, लेकिन रच नही पाया था इसलिए दूसरे की रचना नष्ट कर उसे अपने समानांतर खडा करने की दुष्ट कोशिश की थी।

पास के बाजार मे सडक किनारे फुटपाथ पर दशहरा और दीपावली मे ढेर सारे रंग-बिरंगे खिलौने बिकने के लिए आते थे। न जाने क्यो इन मूर्तियो को देखकर मेरा मन सतयुग की अतल-असीम गहराइयो मे डूबने उतराने- लगता है। मां और दादी से सुनी रामायण की अनंत कहानियों से अहिल्या का कल्पित चेहरा झांकने लगता है, जो रामजी के पांवो से ठोकर खाकर जीती-जागती स्त्री बन गई थी। निर्जीव से सजीव हो उठी थी। उन दिनो हमे सचमुच यह विश्वास नही हो पाता कि बेरूप की मिट्टी से भी इतने सुंदर रूपाकार गढे जा सकते है। गांव मे मैने कुम्हारो को देखा था और यहां बसंत-पंचमी के पहले ज्ञान और विद्या की आराध्यदेवी मां सरस्वती की मूर्तियां बनाने वाले कारीगरो को भी। यह देखकर हैरानी होती है कि उनके चेहरे, वेशभूषा आदि एक ही जैसे होते है। कडी, धनी, धनुषाकार मूछे, सांवला चेहरा, चौकन्नी आंखे, चेहरे पर चेचक के दाग और पुरानी धोती-कुरते मे लिपटी नाटी काया। मै अक्सर सोचता, भले ये कुरूप होते है, लेकिन इनके अंतर मे जरूर कोई ऐसी सुंदरता या दैवी शक्ति होती है, जिस कारण यह मिट्टी से इतने सुंदर और सजीव रूपाकार गढ लेते है। हमारे घर से तीस-चालीस फर्लाग की दूरी पर पीली चिकनी मिट्टी का एक ढेर था, जिसे हम मिट्टी की पहाडी कहते थे। दीवाली के घरौदे बनाने के लिए हम कई बार यही से मिट्टी खोद कर ले गए थे। 


गर्मियो के दिन थे। दोपहर को चारो ओर उमस और एक अजीब-सी मनहूसियत छायी रहती। हम घरो मे दुबके होते और बाहर सायं-सायं करती लू चलती रहती। एक दिन दोपहर जब गर्मी और उमस उतनी ही थी, वैसी ही धूल उडाती लू चल रही थी, हम दोनो भाई एक पुराना थैला लिए उस मिट्टी की पहाडी की ओर जा रहे थे। हमने मिट्टी खोदी और थैला भरकर गैरेज मे आ गए। बडे भाई की सक्रियता बढी। वह कही से ढूंढकर टीन का एक डब्बा ले आया और थैले की सारी मिट्टी उसमे उलट दी। फिर उसने मुझे एक पुराना प्लास्टिक का मग देकर उसमे पानी भर लाने को कहा। जब मै मग मे पानी भरकर लाया तो टीन मे मिट्टी के अनुपात मे पानी डालकर वह उसे तन्मयता से आटा जैसा गूंधने लगा। जब मिट्टी और पानी पूरी तरह एक-दूसरे मे मिल गए, तो मै दंग रह गया। मिट्टी पानी से ज्यादा चिपचिपा न होकर गुंधे हुए आटे की तरह ठोस हो गया था। इतना सही अंदाजा। मै सोच भी नही सकता था। मैने भाई के चेहरे को देखा। भाई का रंग सांवला था। माथे के ऊपर केशो से पसीने की मोटी-मोटी बूंदे कान और गालो पर टपक रही थीं। मुझे उसका चेहरा उन्ही कुम्हारो और कारीगरो जैसा लगा, जो मेरे लिए हमेशा रहस्य और जुगुप्सा का विषय रहे है। मै कभी उसका चेहरा, कभी मिट्टी पर घूमते उनके हाथो को देखता रहा। उसने मिट्टी का एक बडा-सा गोला बनाया और उसके अगले भाग पर दाएं हाथ की उंगलियो से हल्का-हल्का जोर देकर डंडा जैसे आकार निकालने लगा। फिर उस गोले को धीरे-धीरे दबाकर बहुत बारीकी से फैलाने लगा। अब वह गोला एक स्पष्ट आकृति ग्रहण करने लगा था। थोडी देर और लगे रहने के बाद भाई ने उस गोले को कछुए की देह और उस डंडे को उसकी गर्दन का आकार दे दिया। आंखो की जगह उसने दोनो तरफ दो गोल-छोटे चमचमाते हुए शीशे लाग दिए और गर्दन के नीचे और पीछे वैसे ही खीचकर चार टांगे बना दीं।

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