17 जुलाई 2011

सुख-दुःख से निवृत्ति

आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सत्रीकर्षात् प्रवर्तत। सुख दुःख मनाराम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे।।
निवर्तते तदु भयं वाशित्वं चोप जायते।           सशरीरस्य योग ज्ञास्तं योगमृषयो विदुः।।

सुख-दुःख ये दोनों आत्मा, इन्द्रिय, मन और इन्द्रियों के अर्थों तथा मन के अर्थों के संयोग से उत्पन्न होते है। जब मन आत्मा में स्थिर हो जाता है तब किसी प्रकार का कर्म न होने से सुख और दुःख दोनों निवृत्ति हो जाते हैं और शरीर के साथ आत्मा वशी हो जाता है अर्थात मनुष्य मन और इन्द्रियों को वश में कर लेने और अलौकिक कार्य करने में समर्थ हो जाता है। योग शास्त्र को जानने वाले ऋषियों ने मन के इस वशीकरण को 'योग' के रूप में जाना है।
 
टिप्पणी - महर्षि पतंजलि ने समाधिपाद के दूसरे सूत्र में चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग बतलाया है -
योगश्चित्त वृत्ति निरोध:' अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध (रूक जाना) 'योग' अर्थात 'समाधि' है। जब तक चित्त वृत्तियों का निरोध नहीं हो पाता तब तक आत्मा अपने चित्त की वृत्तियों के अनुरूप ही अपना स्वरुप समझता है। महर्षि पतञ्जलि आगे कहते हैं - वृत्तयः पातय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः। प्रमाण विपर्याय विकल्प निद्रा स्मृतयः ।।' अर्थात वृत्तियाँ पांच प्रकार की होती है। ये दुखों (क्लेशों) को उत्पन्न करने वाली भी हो सकती हैं और दुखों को नष्ट (अक्लेश्कारी) करने वाली भी हो सकती हैं। ज्ञान की दृष्टि से वृत्तियाँ पांच प्रकार की हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप में दो-दो भेद करने पर दस भेद होते हैं। प्रमाण यानी सम्यकज्ञान या सत्य ज्ञान होना, विपर्यय यानी मिथ्या या असम्यक ज्ञान होना, विकल्प यानी कल्पना शक्ति, निद्रा और स्मृति यानी अनुभवों का पुनः स्मरण। ये वृत्तियाँ क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों प्रकार की होती हैं। उदहारण के लिए एक व्यक्ति रस्सी ढूंढ रहा हो और अँधेरे में सांप को रस्सी मान कर सुख का अनुभव करे तो वे 'अक्लिष्ट विपर्यय वृत्ति' हुई और एक व्यक्ति हलके प्रकाश में रस्सी को सांप समझ कर भयभीत  और दुखी हो जाए तो यह 'क्लिष्ट विपर्यय वृत्ति' हुई। इसी तरह पूर्व में प्राप्त हुए सन्मान को याद कर सुख अनुभव होना 'अक्लिष्ट स्म्रत्ति वृत्ति' और अपमान को याद कर दुःख अनुभव करने को 'क्लिष्ट स्मृति वृत्ति' कहा जाता है। पहले अक्लिष्ट वृत्तियों से क्लिष्ट वृत्तियों को हटाएं, फिर अक्लिष्ट वृत्तियों का निरोध (रोकना) कर योग सिद्ध करें। योग की सिद्धि हो जाने पर आत्मा वशी यानी स्वाधीन हो जाता है और शरीर में रहते हुए भी वे मायाजाल के चंगुल में नहीं फंसता। इसी अभिप्राय सेम इस सूत्र में कहा गया है की मन के आत्मस्थ हो जाने पर सुख-दुःख निवृत्त हो जाते हैं।

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