28 जनवरी 2011

समझें सेहत की अहमियत

हमारे देश अमेरिका में वर्ष 1990 से लेकर अब तक प्रति व्यक्ति चिकित्सकीय खर्च तीन गुना तक बढ़ गया है. अमेरिकन के नेशनल हेल्थ सर्विसेज का तो यही कहना है. भारत में 50 से 60 वर्ष की उम्र के बीच के लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे कि हमारे यहाँ भी चिकित्सा बिल में पहले के मुकाबले जबरदस्त इजाफा हो चुका है.

दूसरी ओर यह भी देखा गया है कि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकियों में बाहर खाने की आदतों के साथ मोटापे की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है. इसे देखते हुए वहां कई जगहों पर स्थानीय सरकारों ने लोगों को पौष्टिक खाना खाने के प्रति प्रोत्साहित करके की कोशिश की.

उन्होंने यह सोचते हुए अपने यहाँ के हर खाघ उत्पाद के पैकेट पर कैलोरी व वसा की मात्रा लिखनी शुरू कर दी इससे लोग कुछ भी उलटा-सीधा खाने से डरेंगे और हल्का, सुपाच्य व पौष्टिक खाना खाने के लिए प्रोत्साहित होंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जिस तरह हम जैसे कई लोग सिगरेट के पैकेट पर लिखी कैंसर संबंधी चेतावनी को नजरंदाज कर देती हैं, उसी तरह अमेरिकी भी कैलोरी संबंधी सूक्ष्म जानकारी को अनदेखी कर रहे हैं.

वाशिंगटन में टेको टाइम नामक एक फास्ट-फ़ूड श्रृंखला से जुड़े शोधार्थियों ने पाया कि खान-पान की आदतें बहुत मुश्किल से छूटती है.  वहां मेन्यू में कैलोरी संबंधी जानकारी देने से पिज्जा जैसे किसी भोज्य पदार्थ की खपत पर कोई असर नहीं पडा.

भारत में बाहर खाने की प्रवृत्ति बढी है, जिसका प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से सीधा संबंध जोड़ा जा सकता है.

दूसरी ओर सिंगापुर में प्राथमिक स्कूलों के 3000 से ज्यादा बच्चों पर दो वर्ष तक किये गए एक अध्ययन ने बच्चों और गेमिंग के बीच जुड़ाव पर रोशनी डाली. कम्प्युटर या मोबाइल फोन लगातार दीवानों की तरह वीडियो गेम खेलते रहना किसी भी किशोरवय बच्चे के लिये दोपहर गुजारने का कोई सेहतमंद तरीका तो नहीं है. यह नई रिसर्च कहती है कि लगातार वीडियो गेम से चिपके रहने वाले इन 'लती' गेमर्स के अभिभावकों को इनकी मानसिक बीमारी से जुडी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है.

फंडा यह है कि...
आगे चलकर हेल्थ का मसला काफी अहम होगा. डाँक्टरों के लिये भले ही यह कारोबारी अवसर हो, लेकिन आम इंसानों के लिये यह चिंता का विषय है.

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