08 मार्च 2012

सफ़ेद पोशाक

आज भी मुझे वह दिन अच्छी तरह से याद है जब हम पहली बार सेक्टर 31 के बस स्टाप पर मिले थे।
"क्या आप बताएंगी की कौन सी बस सैक्टर 17 जाएगी?"
"10 नंबर."
चूंकि मुझे भी उसी बस में जाना था, इसलिए मैं भी उसी बस में चढ़ कर आगे निकल गई। न चाहते हुए भी मैं ने पीछे मुड कर देखा तो वह पीछे आ रहा था। सैक्टर 17 पहुँचाने तक बस काफी खाली हो चुकी थी और वह मेरी आगे वाली सीट पर आ कर बैठ गया था। सैक्टर 17 आने पर भी वह नीचे नहीं उतारा था। शायद उसे पता हे न था की सैक्टर 17 यही है। मेडिकल इंस्टीट्यूट आने पर मैं बस से उतरी। बस भी वहीं ख़त्म होती थी। अब वह कुछ परेशान सा दिख रहा था। बहरहाल, मैं अस्पताल के अन्दर चली गई।
    दूसरी सुबह मैं ने उसे फिर उसी स्टाप पर खडा पाया। मेरे नजदीक आते उस ने शिकायत सी की, "कल तो आप ने सैक्टर 17 आने पर बताया ही नहीं।"
    मैं ने भी करारा सा जवाब देते हुए कहा, "जनाब, आप ने बस नंबर पूछा था, यह नहीं पूछा था की सैक्टर 17 कहाँ है? उस ने महसूस किया की उस की शिकायत उचित नहीं थी। वह मुसकराने लगा।
    फिर उस ने बताया की वह फ़्लाइंग अफसर है, उस का कलकत्ता से चंडीगढ़ तबादला हुआ है। उस ने अपना नाम भी बताया, आशुतोष। मैं ने भी औपचारिकता निभाई और अपना परिचय दिया की मैं मेडिकल इंस्टीट्यूट में एम.एस. कर रही हूँ, यहाँ वायु सेना की बस्ती में अपने चाचा के पास रहती हूँ।
   कुल मिलाकर आशुतोष काफी अच्छा लगा था मुझे। आकर्षक व्यक्तित्व, सांवला रंग और बंगालियों के नैननक्श तो  वैसे भी जादू सा कर देते हैं। इस के अलावा वायु सेना के लोग मुझे हमेशा ही अच्छे लगे थे। झट जहाज से जहां से वहां। कितना अच्छा लगता होगा हवा से बातें करना, आकाश को छु सा लेना। बस आ गई और हम दोनों इकट्ठे ही बस में चढ़े और इकट्ठे बैठे भी।
   बातों ही बातों में उस ने बताया की वह चंडीगढ़ का दौरा करना चाहता है। कलकत्ता के भीडभरे शहर से चंडीगढ़ कहीं ज्यादा साफसुथरा और शांत शहर है। यहाँ के लोग भी उसे सभी और अच्छे लगे थे। यह भी बताया की वह 6-02 पर हफ्ते में तीन बार दिल्ली उड़ान पर जाता है। बाकी दिन वैसे ही अभ्यास करता है या फिर हवाई अड्डे पर काम करता है। इसी बीच सैक्टर 17 आ गया। मैं ने कहा "लो आ गया तुम्हारा सेक्टर 17। फिर न कहना बताया नहीं।"
"फिर मिलेंगे" यह कह कर वह नीचे उतर गया। सारे रास्ते मैं उस के बारे में सोचती रही। वह कितना अच्छा और चुस्त था तथा डीलडौल में लंबातगड़ा। जल्दी ही हम ने एकदूसरे का परिचय प्राप्त कर लिया था। उस की गहरी काली आँखें, उस का हंसने का मोहक अंदाज। सब कुछ अच्छा लगा था।
  उस के बाद हमारा मिलना आम बात हो गयी। या तो मुझे बस स्टाप पर मिल जाता या शाम को वायु सेना की बस्ती के बाजार में टहलता हुआ।
  एक दिन मैं ने उसे मेडिकल इंस्टीट्यूट आने का निमंत्रण दिया। करीब दो बजे वह आया। हम ने इकट्ठे कैंटीन में चाय पी। उस दिन आशु ने बताया की वह कलकत्ता में ही पढ़ा था। फिर एन.डी.ए. में चुन लिया गया। उस के पिता की मृत्यु हो चुकी थी। उस की मां उस के दादाजी के पास कलकत्ता में ही रह रही थी।
  "कनु, चलो कल 'कोमा' फिल्म देखें। वैसे भी यह तुम्हारे विषय के अनुरूप है।
फिर देखें कैसे तुम लोग मरीजों को 'कोमा' में रख कर उन के अंगों की तस्करी करते हो?"
  "आशु, मेरे व्यवसाय के खिलाफ ऐसी बात न करना। डाक्टर का पेशा ही सब से अधिक विश्वसनीय होता है।"
  "ठीक है। पर कल का कार्यक्रम पक्का रहा।"
  अगले दिन हम ने फिल्म देखी। फिर बाहर ही खाना खाया। अब मुझे लगने लगा था की न सिर्फ मैं ही उस के तरफ आकर्षित हूँ, बलिक आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी, रोज सुबह किसी न किसी बहाने बस स्टाप पर पहुंचना इस बात का प्रमाण था। एक दिन मैं ऐसे ही बस स्टाप पर आई तो एक मोटर साइकिल आ कर रूकी।
  "हैलो, कनु।"
  "अरे आशु, तुम। यह मोटरसाइकिल किस की है?"
  "अपन की, भई। मैं ने नई खरीदी है। मैं ने सोचा, रोजरोज अब हम से डाक्टर साहर के साथ बसों में धक्के नहीं खाए जाते। हम तो पहले ही घायल हैं। और अधिक घाया हो गए तो एंबुलेंस मंगवानी पड़ेगी। पडल भी नहीं चल पाएंगे।" उस की ऐसी बातें बहुत दिलचस्प होती थी। उस दिन हम मोटरसाइकिल पर खूब घूमें।
  "आशु, तुम मोटरसाइकिल बहुत धीरे चलाते हो।" मैं ने कहा।
  "अरे भी, आकाश में बहुत रोमांच है, इसलिए सड़क पर सावधान रहना चाहता हूँ। खासकर जब तुम मेरे साथ हो।"
  उस दिन हम ने मेडिकल इंस्टीट्यूट की कैंटीन में ही दोपहर का खाना खाया। इधरउधर कैंटीन में डाक्टरों को घूमते देख, आशु ने पूछा, "कनु, यह तेरे डाक्टर तो आजकर मुझ से खूब जलाते होंगे। इन में तेरा कोइ ख़ास प्रेमी तो नहीं है?"
  "मुझे तो इन डाक्टरों का सवभाव ही अच्छा नहीं लगता। पहले तो दोस्ती कर लेते हैं। फिर जब चाहे तोड़ देते हैं। जहां दाल न गले, वहां बहनभाई बन जाते हैं। जो सम्बन्ध होना चाहिय, वही बताना चाहिये। इसीलिए, ऐसे लोगों के साथ मैं होस्टल में न रह कर चाचा के पास रहती हूँ।"
  "डाक्टर साहब, तभी तो हम आप के दीवाने हैं।"
  "ओह, आशु। मुझे डाक्टर साहब कह कर मत बुलाया करो। मुझे अच्छा नहीं लगता।"
  "अच्छा भी," और अक्सर ऐसे मौकोंपर वह अपना फौजियों वाला सैल्यूट मार देता।
  "कनु, कल हमारे नए विंग कमांडर आने की खुशी में बहुत बड़ी पार्टी हो रही है, क्या आ सकोगी मेरे साथ?
   "चचा भी तो रात की ड्यूटी लगवा देते हैं। फिर चाची आएंगी ही नहीं। और तुम जगदीश की लडकी के साथ आने का बहाना कर लेना।"
  "हाँ, ऐसा ठीक रहेगा।"
  अगले दिन सुबह ही मैं ने अपना सफ़ेद सूट प्रेस किया। फेशियल किया, थ्रेडिंग की। नेल पालिश लगाई। एक सफ़ेद फूल की तलाश में मैं इस घर से उस घर, एक गली से दूसरी गली तक भटकती रही, पर अंत में सफल हो गयी। शाम को तैयार होते मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मैं आज आशु के लिए ही तैयार हो रही हूँ। बारबार इधरउधर जाते आइना देखती।
  निश्चित समय पर मैं वहां पहुँच गयी। आशु पहले से ही बाजार में खडा मेरा इंतज़ार कर रहा था।
  "कनु, जल्दी उठो, इतनी देर लगा दी। तुम्हे पता है मुझे वहां ठीक समय पर पहुंचना है। और तुम लडकियां बेकार में इतना वक्त खराब कर देती हो।"
  मुझे इतना गुस्सा आया। मैं ने सारी छुट्टी बननेसंवरने में लगा दी। और यह इतना खुदगर्ज है की इस से दो बोल तारीफ़ के भी नहीं कहे गए। जैसेतैसे गुस्सा पी गयी। आखिर हम मिस पहुँच गए।
  मिस का भी एक अपना ही माहौल होता है। हर तरफ खूबसूरत चुस्तदुरूस्त औरतें दिख रही थीं। कईयों के बाल कटे हुए थे। कईयों ने जुड़े बनाए हुए थे। सब फ़्लाइंग अफसर इधर से उधर मंडराते नजर आ रहे थे। मेरा हाथ पकड़ कर आशु मुझे अपने स्कवाडरन लीडर मानवेन सिंह की बीवी के पास ले जा कर बोला, "मालतीजी, मेरी दोस्त से मिलें। यह है कनु।"
  "हैलो, कैसी हो? तुम्हें बहुत अच्छा दोस्त मिला है। यह हमारे यहाँ का सब से बहादुर सैनिक है। आओ, मैं तुम्हारा परिचय कुछ और दोस्तों से करवाऊं।"
  वह मुझे ले कर जा रही थीं कि स्कवाडरन लीडर मानवें सिंह मिल गए।
  "अरे, मैडम, यह खूबसूरत लडकी कौन है?"
  "यह आशु की दोस्त है," मालती बोलीं।
  "बहुत खुशी हुई आप से मिल कर।"
  तभी विंग कमांडर और उन की बीवी आ गए। सब उधर व्यस्त हो गए। नाच का कार्यक्रम शुरू हो गया। मानवें सिंह मेरे पास आ कर बोला, "क्या मैं आप के साथ नाच कर सकता हूँ?" इस से पहले कि मैं कुछ कहती, वह मुझे लगभग खींचता हुआ नृत्य के क्षेत्र (डांस फ्लोर) पर ले गया। नाच के दौरान मुझ से कहने लगा, "तुम बहुत अच्छा नाच करती हो। मुझे आशु से ईर्ष्या हो रही है।"
  परन्तु इन सब बातों का मुझ पर कोई आर नहीं हो रहा था। मेरी आँखें तो इधरउधर आशु की खोज में भटक रही थीं। वैसे तो मैं मेडिकल कालिज की कई पार्टियों में शामिल हुई थी। वहां बड़ा अनौपचारिक माहौल होता था। परन्तु यहाँ के वातावरण में कुछ घुटन महसूस हो रही थी। हो सकता है कि यह शायद आशु की अनुपस्थिति के कारण हो या उस के रूखे रवैये के कारण।
  उसी वक्त मैं ने आशु को अपनी और आते देखा। शायद वह मुझे मानवें सिंह के साथ नाच करते सहन नहीं कर पा रहा था। वह मुझे खींच कर कोने में ले कर बोला, "कनु, तुम अपने आप को क्या समझती हो? तुन ने मानवें सिंह के साथ नाच करना स्वीकार क्यों किया? तुम्हें नहीं पता कि इन लड़कों पर विशवास नहीं किया जा सकता। इन से अपनी बीवियां तो संभालतीं नहीं, पर ये दूसरों की लड़कियों पर नजर रखते हैं। चलो, बाहर खाना खाएंगे यहाँ नहीं। वहीं चलते हैं जहां हम अकसर खाना खाते हैं।"
  मेरे आसुओं की धारा बहे जा रही थी। वह इधर ध्यान दिए बिना उस ने हेलमेट पहन ली। मोटरसाइकिल चालू कर के उस ने मुझे बैठने के लिए कहा। मैं पीछे बैठ गयी। आज पता चल रहा था कि वायु सेना वाले कितने कठोर होते हैं।
  रेस्तोरां पहुँचने पर मैं ने आसूं पोंछ लिए। आशु ने जल्दिजल्दी चीनी भोजन का आदेश दे दिया, जो कि मुझे बहुत पसंद था। फिर बोला, "कनु, नाराज हो?"
  अब तो जैसे सब का पैमाना छलक चुका था। मैं ने बहुत गुस्से में कहा, "आशु, मुझे पुराने विचारों वाले मर्द बहुत बुरे लगते हैं। मुझे तो खुले विचारों वाले मर्द बहुत पसंद है जो लोग इन चोतीचोती बातों से ग्रस्त नहीं होते। मुहे तुम से यह उम्मीद नहीं थी।"
  "मैं समझता हूँ, कनु। लेकिन पता नहीं क्यों आज जब तुम तैयार हो कर आईं और मुझ से मिलीं, तो इतनी अच्च्ची लग रही थीं कि मैं ने सोचा वहां ले कर न जाऊं। वे लोग कहीं तुम्हें मुझ से चीन न लें। मेरा मूड कहीं खराब न कर दें। मुझे तुम पर पूरा विशवास है। मगर मैं क्या करून, कनु? मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। मैं तुम से शादी करना चाहता हूँ। अब तो तुम्हारे बगैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मैं नहीं चाहता कि कोई और तुम्हारे साथ नाच करे। बताओ, मुझ से शादी करोगी?" वह यह सब एक सांस में कह गया। मैं स्तंभित सी उसी की और देख रही थी। कुछ भी बोला नहीं जा रहा था, जुबान खुल ही नहीं रही थी। अजीब स्थिति थी।
  "ठीक है। सोच लो कुछ दिन। ऐसे फैसले जल्दी नहीं करने चाहिये। पर इस बात का ख़याल करना की मैं तुम्हें जितना प्यार करता हूँ उतना तुम्हें चाहता भी हूँ। तुम्हें तो बताया ही है कि मैं छोटा सा था तो पिता चल बसे। मेरी मान ने ही मुझे इस योग्य बनाया है। तुम नहीं जानतीं कि मेरी माँ तुम्हें पा कर कितनी खुश होंगी। अरे बोलो न। मानवेन सिंह के नृत्य की याद आ रही है क्या?"
  "आशु, मजाक न करो।"
  "ठीक है, नूडल्स खाओ फिर।"
  "अच्छा यह बताओ कि यह सफ़ेद सूट कभी पहले क्यों नहीं पहना? तुम इस में बहुत अच्छी लग रही हो, पता है, बंगाली में ऐसी स्थिति में क्या कहते हैं, 'एई पोशाके तोमाके सुन्दर लागछे,' समझ आए क्या? और यह नन्हा सा फूल तो तुम्हारी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा है। यह सफ़ेद रंग तो तुम पर खूब फबता है। वैसे तो डाक्टरों का सफ़ेद रंग के कोट वगैरह से काफी सम्बन्ध होता है, परन्तु यह सफ़ेद पोशाक तो तुम पर कहीं ज्यादा अच्छी लग रहीए है। तुम्हें पता है सफ़ेद रंग पवित्रता की निशानी है। मैं आज की माँ को लिखूंगा कि तुम्हारे लिए ढेरों सफ़ेद सूत व सफ़ेद फूल और बाडर वाली साड़ियाँ खरीद लें।"
  उस के बाद मैं ने आशु को चाचाजी, माँ और पिता से मिलवा दिया। मेरे मातापिता सोलन रहते थे। जल्दी ही आशु ने घर में अपना स्थान बला लिया। चाचा के साथ घंटो राजनीति पर बहस करता था। चाची के साथ रसोई में चाय बनवाता, सलाद काट देता। सब कुछ अच्छा लगाने लग गया था। अब तो चाचा की रात की ड्यूटी भी करवाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। सब कुछ खुलेआम हो रहा था।
   अब मैं और आशु ख्यालों में ही घर के लिए तिनके इकट्ठे करने लग गए थे। ख्यालों में ही कभी कुछ खरीदते तो कभी कुछ बनवाते। आज मुझे सुबह सात बजे अस्पताल जाना था। मैं जल्दी ही बस स्टाप पर पौंच गयी। तभी आशु वहां आ कर बोला, "आज माँ 10 बजे की गाडी से आ रही हैं। मैं ने अभ्यास के लिए जाना है। तुम साढे नौ तैयार रहना। मैं मेडिकल इंस्टीट्यूट आ जाउंगा। फिर इकट्ठे ही स्टेशन चलेंगे। आज तो जनाब के लिए ढेरों सफ़ेद सूट और साड़ियाँ आ रही हैं। रोज घायल हुआ करेंगे। अच्छा, साढे नौ बजे मिलेंगे।"
  बस मैं यही सोचती रही कि कहीं आशु की माँ इनकार न कर दे। वह बंगाली और मैं पंजाबी। पता नहीं क्या होगा? मेरा दिल धकधक कर रहा था। पर फिर सोचा आशु के रहते हुए मुझे किस का दर।
  अस्पताल पहुँचने पर मैं ने वरिष्ठ सर्जन डा. सुखदेव के साथ वार्डों में मरीजों को देखने जाना था। डा. सुखदेव मरीजों में बहुत लोकप्रिय थे। हर मरीज से बात करना, उन्हें हंसना, उन का स्वभाव था। मुझे तो वह एक बेटी की तरह मानते थे। अभी वार्ड नं. तीन के पास पहुंचे ही थे कि डा. सुखदेव के लिए बुलावा आ गया कि एक विमान चालाक और उस के एक साहायक चालाक हवाई दुर्घटना में बहुत बुरी तरह घायल हुए हैं। मामला गंभीर है। डा. सुखदेव ने मुझे साथ चलने के लिए कहा। मेरे पैर अनायास किसी बही के कारण कांपने से लगे थे।
  कहीं यह आशु न हो। नहीं, नहीं, वह तो एक अच्छा विमानचालक है। धड़कते दिल से मैं आपरेशन थिएटर में पहुँची। यह क्या, आशु अचेत अवस्था में पडा था। साथ में सहायक विमान चालाक था। अन्य डाक्टर भी आ गए थे। आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगा था। डाक्टर सुखदेव के संभालने पर मैं ने उन्हें आशु और अपने संबंधों के बारे में बताया।
  उन के घायल, उपचार, एंबुलेंस आदि शब्द मेरे कानों पर हथोड़े चला रहे थे। मैं असमंजंस में पड़ी नसों आदि को इकट्ठे कर रही थी। पागलों की तरह हरेक को आपरेशन थिएटर की चीजें तैयार करने को कहती।
  परन्तु डाक्टर सुख्दें ने मुझे बुला कर कहा, "देखो, कनु, मामला बहुत गंभीर है। केवल चमत्कार ही उसे बचा सकता है। तुम एक डाक्टर हो। इसीलिये मैं तुम्हें सच्चाई से अवगत करा रहा हूँ। मुझे बहुत दुःख होगा अगर मैं उसे बचा न सका। आशा रखो। अब तो दुआ ही काम करेगी।"
  वायु सेना के कुछ लोग पहुँच चुके थे। आशु की नब्ज धीरेधीरे चल रही थी। खून काफी बह चुका था। दिमाग पर काफी गहरी चोट थी। मैं परेशान थी। परन्तु मैं ने फैअला किया कि माँ को मैं स्टेशन पर अकेले ही लेने जाउंगी। आशु की माँ को पहचानना इतना मुश्किल काम नहीं लग रहा था।
  पौने दस बजे मैं स्टेशन पहुँच गई। आज हर वास्तु नीरस लग रही थी। इदह्र उधर हँसते हुए लोगों को देख कर अच्छा नहीं लग रहा था।तकदीर ने कितना पलता खाया था। कहाँ इकट्ठे आने वाले थे। और अब तो शायद कुछ भी इकठ्ठा न हो पाए। ठीक 10 बजे गाडी रूकी। मेरी आँखें आशु की माँ को तलाश करने लगीं। तभी मैं ने एक बंगाली औरत को देखा। वह भी मेरी तरफ हे देख रही थी।
  "आप आशु की माँ?"
  "और तुम कनु?"
  "जी।"
अरे, जैसा लिखा था वैसी ही हो। कितनी सुन्दर। आशु क्यों नहीं आया? वह तो शुरू से लापरवाह है। कही वक्त पर नहें पहुंचता। पता नहीं जहाज कैसे वक्त पर पहुंचा देता है।"
  "माँ, आप पहले मेरे अस्पताल चलिए।" मेरे डाक्टर होने के नाते किसी बात के शक की कोई गुंजाइश नहीं थी।
  सारे रास्ते में कुछ बोल न पा रही थी यह बताने का साहस नहीं जुटा पा रही थी कि आशु क्यों नहीं आया। वह तो मौत और जिन्दगी के बीच झूल रहा था। यूं तो मैं ने हजारों मरीजों को घायल अवस्था में देखा था। परन्तु आशा। ओह, नहीं, मैं ने आखिर क्या किया था? जो मुझे यह दिन देखना पड़ रहा है।
  टैक्सी मेडिकल इंस्टीट्यूट पहुँचने पर मैं माँ को अपने कमरे में ही ले गई। वहां चाय पिलाई, कितने धैर्य से बैठी थीं। और तभी वहीं अपना सूटकेस खोलने लग गई और बोली, "लो कनु, मैं तुम्हारे लिय काफी सफ़ेद सूट व साड़ियाँ लाई हूँ। मैं ने तो आशु को समझाया था कि कोई सफ़ेद कपडे पहनने के दिन थोड़े ही हैं। फिर मैं ने सोचा कि यह जिद्दी है, लाडला है। न ले कर गई तो कहीं नाराज न हो जाए। तुम्हें तो बताया ही होगा कि इस के पिता के बाद अब यही एक सहारा है। इसलिए इस की हर बात माँ लेती हूँ। है भी तो कितना प्यारा और कितनी प्यारी बहू ढूंढी है उस ने?"
  वह अपनी धुन में मस्त, साड़ियाँ, सूट निकाले जा रही थीं, और बोले जा रही थीं। मेरा आसूं का बाँध टूट चुका था। जब उन्होंने मेरी हिचकियाँ सुनीं तो बोलीं, "अरे कनु, बेटी क्या हुआ? इतना क्यों रो रही है? वह अभी आ जाएगा, वह तो ऐसे हे करता है। आने दो आज कान खीचून्गी उस के।" कितना आत्मविश्वास था माँ को।
  और तभी डाक्टर सुखदेव ने आ कर वहीं खबर सुनाई जिस से साफ़ जाहिर था कि अब मेरी दुनियां में कभी बहार न आएगी। बहार का मौसम होने पर भी पतझड़ नजर आ रहा था। हर तरफ अँधेरा ही अन्धेरा लग रहा था।
  और माँ। माँ का जितना बड़ा दिल था उस से कहीं बड़ा सदमा। फिर भी मुझे धीरज बांधते हुए बोलीं, "मत रोओ, कनु। मैं ने तो आशा को पहले ही कहा था कि ये सफ़ेद सूट, ये सफ़ेद साड़ियाँ, क्या मैं अपनी बहू को मुंहदिखाई में दूंगी? मैं ने तो बेटी तुम्हें बिन ब्याही विधवा बना दिया।" वह मुझ से लिपट कर रो रही थीं और मैं एक बच्चे की तरह उन के कंधे पर सिर रखे हुए थी।
  शायद अब, हम दोनों का दुःख एक हो गया था।
   
                                                                                                                                                                              -अनुजा भाम्बी

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