16 सितंबर 2011

साउथ अफ्रीका के 'गांधी' डेसमंड टुटु

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नोबेल प्राइज विजेता डेसमंड टुटु को इस बार गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। डेसमंड टुटु का जन्म 1931 में सोने की खदानों के लिए प्रसिद्ध ट्रांसवाल में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनका परिवार जोहान्सबर्ग शिफ्ट हो गया था। उनके पिता एक शिक्षक थे। डेसमंड एक फिजिशियन (चिकित्सक) बनना चाहते थे, लेकिन उनका परिवार इसकी शिक्षा का व्यय उठाने में असमर्थ था। टुटु ने प्रिटोरिया बंटु नॉर्मल कॉलेज में 1951 से 1953 तक पढ़ाई की, फिर जोहान्सबर्ग बंटु हाईस्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। 1957 में उन्होंने बंटु एजुकेशन ऐक्ट का विरोध करते हुए नौकरी से इस्तीफा दे दिया। यह ऐक्ट काले (ब्लैक) साउथ अफ्रीकियों की उत्तम शिक्षा के खिलाफ था। टुटु ने पादरियों से प्रभावित होकर चर्च जॉइन करने की सोची। उन्होंने थियोलॉजी में शिक्षा ली और 1960 में वह पादरी बन गए। 1962 से 66 तक वह लंदन में ही रहे और वहीं से थियोलॉजी में बैचलर और मास्टर डिग्री हासिल की। 1967 में वह साउथ अफ्रीका लौट आए और 1972 तक उन्होंने अश्वेत लोगों की स्थितियों को हाईलाइट किया। 1972 में ही वह फिर ब्रिटेन आए, जहां उन्हें थियोलॉजिकल एजुकेशन फंड ऑफ द वर्ल्ड काउंसिल ऍाफ चर्चेस का वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया। कुछ समय तक वह लंदन के थियोलॉजिकल इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में भी कार्यरत रहे। 1975 में वह पहले ऐसे अश्वेत व्यक्ति बने, जिसे जोहान्सबर्ग का डीन बनाया गया। 1976 से पहले टुटु विद्रोही अश्वेतों के मध्य काफी लोकप्रिय थे, लेकिन सोवेटो हिंसा से कुछ दिन पहले वह श्वेत (गोरे) साउथ अफ्रीकियों के सुधार के प्रचारक बन गए। साउथ अफ्रीका में न्याय और नस्लवाद जैसे मुद्दों पर कार्य करते हुए टुटु को अपरिहार्य कारणों से राजनीति में आना पड़ा। वह स्वयं कहते हैं कि उनकी रुचि धर्म में है, न कि राजनीति में। वह अपनी सरकारों को सदैव नस्लवाद के खिलाफ सचेत करते रहे। 1986 में टुटु केपटाउन के आर्कबिशप

निर्वाचित हुए। उन्हें अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 2000 में उन्हें बेट्‌स कॉलेज से एलएचडी की उपाधि मिली, 2005 में यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ फ्लोरिडा ने उन्हें सम्मानित किया। टुटु ने 1989 में प्रेसीडेंट एफडब्लू डी क्लार्क की उदारवादी नीति का समर्थन किया, इसी नीति के तहत नेल्सन मंडेला की रिहाई और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पर से प्रतिबंध हटाया गया। टुटु लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाते भी हैं। डेसमंड टुटु की काबिलियत और ईमानदारी से प्रभावित होकर साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने उन्हें साउथ अफ्रीका ट्रुथ ऐंड रिकंसिलिएशन कमीशन का कार्यप्रभार प्रदान किया। इस कमीशन का काम रंगभेद की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करना होता है। वास्तव में, साउथ अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें दुनिया का हीरो बना दिया है। जब उनके नेता नेल्सन मंडेला को जेल में डाला गया, तो रंगभेद के खिलाफ उनकी अलख को टुटु ने जलाए रखा। 1984 में नोबेल प्राइज से सम्मानित होने वाले टुटु ने हमेशा हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद रखा। 2006 में उन्हें वर्जीनिया के कॉलेज ऑफ विलियम ऐंड मैरी ने डॉक्टर ऑफ पब्लिक सर्विस की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें दलाई लामा द्वारा लाइट ऑफ ट्रुथ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। राजनीतिक जीवन से अब संन्यास ले चुके आर्कबिशप टुटु अपने अदम्य साहस और प्रभाव के कारण विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखते हैं।

चर्चित बयान

-  राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे के अधीन जिम्बाब्वे तानाशाही की ओर जा रहा है।
-  इराक पर अमेरिकी और ब्रिटिश हमला अनैतिक था।
-  2002 में इस्त्राइल पर फलस्तीन के खिलाफ नस्लवादी होने का आरोप लगाया।
-  मैं भारत का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे इस प्रतिष्ठा के काबिल समझा। लेकिन मैं भारत सरकार से पुरजोर सिफारिश करता हूं कि आप तिब्बत की आजादी में अपनी मदद दें।


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