16 सितंबर 2011

दो प्रेरक प्रसंग

होटल की एक मेज पर एक वृद्ध व एक वृद्धा दोनों बैठे थे। दोनों ने चाय पी और एक-दूसरे से परिचय प्राप्त किया। वृद्ध ने मेज छोड़ने से पहले वृद्धा से पूछा की क्या वह उसके साथ रह सकता है?
वृद्धा ने पूछा-क्यों?
वृद्ध ने उत्तर किया-क्योंकि हम दोनों अकेले हैं। मैं विधुर हूँ और आप विधवा।
बात को बढाते-बढाते दोनों साथ रहने को राजी हो गए. लेकिन वृद्धा ने अपनी संतुष्टि को संतोष देने के लिए वृधा से पूछा, तुम मेरे साथ क्यों रहना चाहते हो?
वृद्ध बोला-तुम्हारे बाल बहुत सुन्दर हैं।
वृद्ध से उत्तर पाकर वृद्धा बोली, तुम्हारी उम्र इतनी ज्यादा हो गयी है, फिर भी, तुम्हारी दांत बहुत सुन्दर हैं। तुमने इन्हें इतना सुन्दर बनाकर कैसे रखा है?
वृद्ध अपने प्रशंसा सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने दाँतों का जबड़ा निकालकर मेज पर रख दिया।
वृद्धा ने अपने बालों का जुदा निकालकर मेज पर रख दिया।
~ यही माया है। माया सत्य का दर्शन नहीं करने देती। असार को सार बताना माया है।
~ चिंतन: स्वयं का खाना खाना - प्रकृति।
               दूसरे का खाना छीनकर खाना - विकृति।
               दूसरे को खिलाकर खाना - संस्कृति। 

(2)
एक रात राजा जनक ने स्वप्न देखा की वे एक भिक्षुक बन गए हैं। उनके हाथ में मिट्टी का एक पात्र है। वह अपनों से, अपने राज्य के लोगों से भीख मांग रहे हैं और उन्हें कोइ भीख नहीं दे रहा है। उनकी भूख बढ़ती जा रहे है। 

उन्होंने देखा की एक भिखारी बासी रोटी व दाल को फेंकने जा रहा है। राजा जनक उसकी और दौड़े और बासी रोटी व दाल माँगी। वे खाने ही वाले थे की एक कुत्ता आया और बासी रोटी व दाल छीनकर ले गया। उन्होंने हताश में अपने मस्तक पर हाथ मारा और वह हाथ सोने के पलंग पर लगा। राजा जनक की नींद खुल गई।

राजा जनक एक विक्षिप्त की भाँती अपने शयन-कक्ष से बाहर आए और दौड़-दौड़ कर कहने अलगे, क्या मैं राजा हूँ? क्या मैं ही राजा हूँ?

सब दरबारी हंसाने लगे की आज राजा को क्या हो गया? वह क्यों विनोद कर रहा है?
राजा जनक ने अपने गुरू अष्टावक्र से पूछा, सत्य क्या है, वह सत्य था या यह सत्य है?
गुरू अष्टावक्र बोले, 'दोनों ही असत्य हैं। स्वप्न झूठ है और तू राजा है यह भी झूठ है। देह राजा है तू राजा नहीं। तू देही है। तेरा आवरण देह राजा है। इस स्वप्न में जो सत्य है उसे जानना ही अध्यात्म है।
~ चिंतन: शरीर जब शरीर मांगता है - वासना।
               मन जब मन से बंधता है - प्रेम।
               आत्मा जब परमात्मा की और बढ़ता है - भक्ति।

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