24 सितंबर 2010

त्रिदेव बने स्त्रियाँ


क बार की बात है, सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्माजी को अनुभव हुआ की विघा, वैभवता और भय के बिना; सृष्टि सौन्दर्यविहीन होती है। विघा के अभाव में प्राणियों को अपने जीवन के उद्देश्य का ज्ञान नहीं होता। वैभवता के अभाव में सृष्टि की सुन्दरता समाप्त हो जाती है। भय न होने से प्राणी पाप-कर्म करने से नहीं डरते। अतः इन समस्याओं का समाधान आवश्यक है। इन समस्याओं के उपाय के लिये ब्रह्माजी विष्णु-लोक गए।

लेकिन विष्णुजी भी इनका कोई समाधान नहीं निकाल सके। तभी वहां भगवान शिवजी प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्माजी और विष्णुजी को संबोधित करते हुए कहा- "हे विष्णु! हे ब्रह्मा! इस समस्या का समाधान न आप कर सकते हैं और न ही मैं। केवल माता भगवती इसका उपयुक्त उपाय बता सकती हैं। इसलिए हमें माता भगवती की शरण में चलना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए। देवी भगवती अत्यंत दयालु हैं, वे हमारी प्रार्थना अवश्य सुनेंगी।"

ब्रह्मा और विष्णु को शिवजी का परामर्श उचित लगा। वे देवी भगवती की कृपा-दृष्टि प्राप्त करने के लिये उनके महल के द्वार पर पहुंचे। प्रवेश द्वार बंद था। त्रिदेव किसी भी प्रकार से उसमें प्रवेश न पा सके। तब उन्होंने देवी भगवती का स्मरण करना आरम्भ कर दिया। तभी देवी भगवती की माया से त्रिदेव तीन सुन्दर स्त्रियों में परिवर्तित हो गए। उनके शरीर पर सुन्दर वस्त्र और आभूषण अलंकृत हो गए। अपनी यह दशा देख त्रिदेव अत्यंत विस्मित हुए। त्रिदेवों के स्त्रीरूप में परिवर्तित होते ही महल का द्वार अपने आप खुल गया।

महल में प्रवेश करने पर उनकी दृष्टि भगवती माता पर पडी। अनेक सखियों और सेविकाओं से घिरी हुईं भगवती माता कमल के एक सुन्दर आसन पर विराजमान थीं। उन्होंने दिव्य पीत वस्त्र और आभूषण धारण कर रखे थे। उनका चेहरा करोड़ों सूर्य के समान तेजपूर्ण था।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने भगवती माता की स्तुति की और उनसे अपने इस रूप-परिवर्तन का कारण पूछा। तब भगवती माता बोलीं-- "हे त्रिदेवों! आप जिस समस्या को लेकर मेरे पास आए हैं, ये रूप परिवर्तन उसी समस्या का समाधान है। समस्त प्राणियों को ज्ञान, वैभवता और भय मिश्रित फल आपके इन्हीं रूपों से प्राप्त होगा। आपके ये तीनों रूप वास्तव में मेरे ही अंश हैं जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली के नाम से विख्यात होंगे। सरस्वती ब्रह्माजी की सहचरी बनकर प्राणियों में ज्ञान की ज्योति जलाएँगी, लक्ष्मी विष्णुजी का वरण करके सद-प्राणियों को वैभवता प्रदान करेंगी और काली शिवजी की अर्धांगिनी बनकर दुष्ट-कर्मों और पापों के प्रति प्राणियों में भय उत्पन्न करेंगी।"

तत्पश्चात त्रिदेव अपने वास्तविक रूप में आ गए। उनके समक्ष माता भगवती के शक्ति-अंश से बनी तीन देवियाँ- सरस्वती, लक्ष्मी और काली प्रकट हो गईं। देवी भगवती की आज्ञा से तीनों देवियों ने त्रिदेवों का वरण किया और उनके साथ सृष्टि-रचना का कार्य करने लगीं।

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