24 सितंबर 2010

देवी-देवताओं की चमत्कारिक कथाएँ

त्रिदेवों की उत्पत्ति

ष्टि के आरम्भ से पूर्व ब्रह्माण्ड जल में डूबा हुआ था। चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, प्राणी किसी की भी उत्पत्ति नहीं हुई थी। केवल भगवती जगदम्बिका परब्रह्म के रूप में विघमान थीं।
 
एक बार देवी भगवती के मन में सृष्टि-रचना का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने सबसे पहले एक पत्ते पर विष्णुजी की उत्पत्ति की। जन्म लेने के बाद विष्णुजी के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे। तब देवी भगवती ने प्रकट होकर उन्हें दिव्य-ज्ञान प्रदान करते हुए तपस्या के लिये प्रेरित किया। देवी के अंतर्ध्यान होने के बाद विष्णुजी तपस्या में लीन हो गए।

भगवान विष्णु को तपस्या करते हुए अनेक वर्ष बीत गए। तपस्या के तेज से उनकी नाभि से एक कमल-पुष्प उत्पन्न हो गया। धीरे-धीरे यह पुष्प विकसित होने लगा। पूर्ण विकसित होने के बाद जब इसकी पंखुड़ियां खुलीं तो उसमें से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई।

ब्रह्माजी ने अपने चारों ओर जल-ही-जल देखा। विष्णुजी के समान ही उनके मन में भी अनेक प्रश्न उठने लगे-- 'मैं कौन हूँ? मैं किस प्रकार उत्पन्न हुआ? ये दिव्य पुरूष कौन हैं जो इस समय घोर तपस्या में लीन हैं?'

तभी एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। इस तेज को देखकर ब्रह्माजी भयभीत हो गए। तब उस तेज में से आकाशवाणी हुई-- "हे पुत्र! भयभीत मत हो। ये तेज देवी भगवती के निराकार रूप का प्रतीक है। तुम्हारी उत्पत्ति देवी भगवती की कृपा से हुई है। इस ब्रह्माण्ड में देवी भगवती ही निराकार और साकार-- दोनों अवस्थाओं में व्याप्त हैं। उन्हीं की इच्छा से प्रलय; और सृष्टि में जन्म और मृत्यु का चक्र चलता है। अतः हे पुत्र! देवी भगवती की तपस्या करो।"

ब्रह्माजी ने तपस्या आरम्भ कर दी। तत्पश्चात देवी भगवती ने शिव की उत्पत्ति की। तीनों देवों ने देवी भगवती की तपस्या करनी शुरू कर दी।

हजारों वर्षों तक तपस्या करने के बाद, अंत में देवी भगवती साक्षात प्रकट हुईं और तीनों देवों से बोलीं-- "हे त्रिदेवों! तुम्हारे अंदर मेरी ही शक्ति साकार रूप में समाहित है। मेरे द्वारा ही तुम्हारी रचना हुई है। तुम्हारी उत्पत्ति का उद्देश्य सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से चलाना है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करेंगे, विष्णु सृष्टि का पालन करेंगे और शिवजी सृष्टि का संहार करेंगे। इस प्रकार यह चक्र सदैव चलता रहेगा।"

इतना कहने के बाद भगवती ने त्रिदेवों के लिये तीन विभिन्न लोकों-- ब्रह्म-लोक, विष्णु-लोक और शिव-लोक का निर्माण किया। देवी भगवती की आज्ञा से त्रिदेवों ने अपने-अपने आसन ग्रहण कर सृष्टि-रचना का कार्य आरभ कर दिया।

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1 टिप्पणी:

  1. Achha hota beech me Pauranik prastuti se poorv mool aadhar ke roop me ise Rigvediya "Naasdiya Soolt" se joda hota to baat aur bhi spasht hoti.
    Fir bhi achhi prastuti thodi rahasmayi hai lekin yah khalta nahi kyoki wahan tak wahi talaash karega jo ise gahraaii se jaanta hoga. Saaadhuwaad ...........

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