14 अगस्त 2010

ज़रा याद करो कुर्बानी ( Just remember the sacrifices )



15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। सम्पूर्ण भारत में जश्न-ए-आजादी का पर्व मनाया गया। देश का अपना संविधान बना, हर नागरिक को स्वतन्त्रता व समानता का अधिकार मिला। देश में लोकतंत्र का उदय हुआ। आज हम आजादी की 63वीं वर्षगाँठ के अवसर पर आजाद भारत के आईने में उन वीर सपूतों और वीरांगनाओं के सपनों को ढूंढते हैं, जिन्होंने देश की राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक आजादी के लिये सन 1857-1947 तक स्वतन्त्रता आन्दोलन में अपने तन-मन और जीवन को हमेशा के लिये अर्पित कर दिया, जिनका अदम्य साहस, अटूट राष्ट्रप्रेम और गौरवमयी बलिदान भारतीय इतिहास की एक जीवंत दासता बना है। आइए जानते हैं, देश की आजादी के हमसफ़र में उन वीरान्नाओं के बारे में, जिन्होंने देश के लिये अपना सब-कुछ न्योछावर कर दिया....

कर्नाटक (कित्तूर) की रानी चेनम्मा ने 1824 में अंग्रेजों को देश से भगाने के लिये 'फिरंगियों भारत छोड़ो' की ध्वनि गुंजित की। इतिहास के पन्नों में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली प्रथम वीरांगना रानी चेनम्मा को ही माना जाता है।
1857 की क्रांती में झांसी का नेतृत्व करने वाली रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और शौर्य के किस्से आज भी जन-जन में सुने जाते हैं। घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में अँग्रेजी  सेना को कड़ी टक्कर दी और बाद में तात्या टोपे की मदद से ग्वालियर पर भी कब्जा किया। उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा था की- 'यहाँ वह महिला सोई हुई है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।'
कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई, रानी लक्ष्मीबाई के महिला दल 'दुर्गा दल' की मुखिया थी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। झलकारीबाई के साथ 'दुर्गादल' की सैनिक मोतीबाई, काशीबाई, दुर्गाबाई और जूही आदि ने अँग्रेजी सैनिकों से डटकर सामना किया और वीरगति को प्राप्त हुईं।
लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। उन्होंने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को लखनऊ की गद्दी पर बिठाकर अँग्रेजी सेना का मुकाबला किया। अवध के जमींदार, किसान और सैनिकों के साथ मिलकर बेगम हजरत महल ने अपने अभूतपूर्व क्षमता व साहस से अंग्रेजों के खिलाफ कई युद्ध किये।
मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र की बेगम जीनत महल ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में अपने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित कर देशप्रेम का परिचय दिया। 1857 की क्रांती का नेतृत्व करने के लिये बहादुर शाह जफ़र को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा था की 'यह समय गजलें कहकर दिल बहलाने का नहीं है। बिठूर से नाना साहब का पैगान लेकर देशभक्त सैनिक आए हैं। आज सारे हिन्दुस्तान की आँखें दिल्ली की ओर लगी हैं। खानदान-ए-मुगलिया का खून हिंद को गुलाम होने देगा तो इतिहास उसे कभी माफ़ नहीं करेगा।'
दिल्ली के शहजादे फिरोज शाह की बेगम तुकलाई सुलतान जमानी को जब दिल्ली में क्रांती की सूचना मिली तो उन्होंने ऐशोआराम का जीवन जीने की बजाए, युद्ध शिविरों में रहना पसंद किया और वहीँ से अपने सैनिकों को रसद पहुंचाने तथा तथा घायलों की सेवा करने का जिम्मा अपने हाथों में लिया। इस पर अंग्रेजों ने भयभीत होकर उन्हें मुम्बई में नजरबन्द कर दिया और दिल्ली आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
सिकंदराबाग़ के किले पर अंग्रेजों के हमले के दौरान उदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर करीब 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। उदा देवी के साहस भरे कार्य का वर्णन अमृतलाल नागर ने अपनी करती 'ग़दर के फूल' में किया है।
8 मई 1857 को अँग्रेजी सेना का सामना करते हुए आशा देवी को शहादत मिली थी। आशा देवी के साथ कई वीरांगनाओं ने अंग्रेजों से युद्ध किया था, जिनमें रंवीरी बाल्मीकी, शोभा देवी, बाल्मीकि महावीरी देवी, सहेजा बाल्मीकी नाम्कौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इन्द्रकौर, कुशल देवी और रहीमे गुज़री आदि शामिल थीं, ये सभी वीरांगनाएं अँग्रेजी सेना के साथ लड़ते हुए शहीद हो गईं।
कानपुर में पेशे से तवायफ अजीजन्बाई ने 1857 की क्रांती में काफी बढ़-चढ़कर हिसा लिया। जब कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में तात्या टोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदार टीका सिंह व शमसुद्दीन खान क्रांति की योजना बना रहे थे तो उनके साथ उस बैठक में अजीजनबाई भी थीं। उन्हों 400 वेश्याओं की एक मस्तानी टोली बनाकर अंग्रेजों की खिलाफ लड़ाई लड़ी। इतिहास में दर्ज है- 'बगावत की सजा हंस कर सह ली अजीजन ने, लहू देकर वतन को।'
अवध की बेगम आलिया ने भी अपने अदम्य साहस से अँग्रेजी हुकूमत को खुली चुनैती दी थी। वे 1857 क्रांति शुरू होने से पहले ही पानी सेना में शामिल महिलाओं को शास्त्रकला का प्रशिक्षण देकर संभावित क्रांति की योजनाओं को मूर्तरूप देने में शामिल हो गईं थीं। अपने महिला गुप्तचर के जरिये बेगम आलिया ने अवध से कई बार अंग्रेजों से युद्ध कर उन्हें खदेड़ा था।
मुजफ्फरनगर के मुन्द्भर की महावीरी देवी ने 1857 के संग्राम में 22 महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों पर हमला किया। इतिहास गवाह है कि 1857 की क्रांति के दैरान दिल्ली के आस-पास के गावों की करीब 255 महिलाओं को मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था।
गोंडा से 40 किलोमीटर दूर स्थित तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी ने अवध के मुक्ति संग्राम के दौरान होपग्रांट के सैनिकों से जमकर मुकाबला लिया था।
बाराबंकी के मिर्जापुर रियासत की रानी और अवध के सालों के तालुकदार बसंत सिंह बीस की पत्नी तलमुन्द  कोइर ने भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी अवंतीबाई ने 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों का प्रतिकार किया और घिरे जाने पर आत्मसमर्पण करने की बजाए खुद को ख़त्म कर लिया।
स्वामी श्रद्धानंद की पुत्री वेद कुमारी और अज्ञावती ने 1905 के बंग-भंग आन्दोलन के दौरान महिलाओं को संगठित किया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई।
1928 में सत्यवती (वेद कुमारी की पुत्री) ने साइमन कमीशन के दिल्ली आगमन पर काले झंडों से उसका विरोध किया था।
1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान अरूणा आसफ अली ने विरोध करते हुए अकेले दिल्ली में 1600 महिलाओं के साथ गिरफ्तारी दी।
1912-1914 में बिहार में जात्रा भगत ने जनजातियों को लेकर ताना आन्दोलन चलाया। उनकी गिरफ्तारी के बाद उसी गाँव की महिला देवमनियाँ उरांइन ने इस आन्दोलन की बागडौर संभाली।
1931-32 के कोल आन्दोलन में भी आदिवासी महिला बिरसा मुंडा के सेनापति गया मुंडाक की पत्नी 'माकी' ने बच्चे को गोद में लेकर फरसा-बलुआ से, अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी।
1930-32 में मणिपुर में अंग्रेजों के खिलाफ नागा रानी गुइंदाल्यू ने शास्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया।
1930 में बंगाल में सूर्यसेन के नेतृत्व में हुए चटगाँव विद्रोह में युवा महिलाओं ने पहली बार क्रांतिकारी आन्दोलन में स्वयं भाग लिया। क्रांतिकारी महिलाओं में एक प्रीतिलता वादेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमला किया और कैद से बचने हेतु आत्महत्या कर ली।
दिसंबर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूली छात्रा शांति घोष और सुनीति चौधरी ने जिला अंग्रेज अधिकारी को दिनदहाड़े गोली मार दी।
6 फरवरी 1932 को बीना दास ने कलकत्ता विश्वविधालय के दीक्षांत समारोह में उपाधि ग्रहण समारोह के दौरान गवर्नर पर गोली चलाकर अँग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी।
क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी 'दुर्गा भाभी' नाम से मशहूर दुर्गा देवी बोहरा ने अंग्रेजों के खिलाफ कई सफल योजनाएं बनाईं। बंबई के गवर्नर हेली को मारने की योजना में एक अंग्रेज अफसर घायल हो जाने के केस के मामले में 12 सितम्बर 1931 को उन्हें लाहौर में गिरफ्तार कर लिया गया।
काकोरी काण्ड के कैदियों के मुक़दमे की पैरवी के लिये सुशीला दीदी ने 10 तोला सोना और 'मेवाद्पति' नामक नाटक खेलकर चंदा इकट्ठा किया था। 1930 के सविनय अविज्ञा आन्दोलन में 'इंदुमती' के छद्य नाम से सुशील दीदी ने हिस्सा लिया था।
1925 में कानपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर 'भारत कोकिला' के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू को कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्याख्स बनने का गौरव प्राप्त हुआ। सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
1921 में असहयोग आन्दोलन में कमला देवी चटोपाध्याय ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और बर्लिन में अन्तराष्ट्रीय महिला सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व कर तिरंगा झंडा फहराया।
1921 के दौर में अली बंधुओं की माँ बाई अमन ने लाहौर से निकल तमाम महत्वपूर्ण नगरों का दौरा किया और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम एकता का सन्देश फैलाया।
सितम्बर 1922 में बाई अमन ने शिमला दौरे के समय वहां की फैशनपरस्त महिलाओं को खादी पहनने की प्रेरणा दी और 1942 के 'भारत छोड़ो आन्दोलन' में भी महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभाई।
अरूणा आसफ अली व सुचेता कृपलानी ने आन्दोलनकारियों के साथ भूमिगत होकर आन्दोलन को आगे बढाया और ऊषा मेहता ने इस दौर में भूमिगत रहकर कांग्रेस-रेडियो से प्रसारण किया।
अरूणा आसफ अली को तो 1942 में उनकी सक्रीय भूमिका के कारण मीडिया में '1942 की रानी झांसी' नाम दिया। उन्होंने 'नमक क़ानून तोड़ो आन्दोलन' में हिस्सा लिया।
स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का साथ दिया. उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों व राष्ट्र की खातिर तिलांजलि दे दी। 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान महात्मा गांधी के साथ कस्तूरबा गांधी जेल भी गयीं।
1942-44 तक डाँ. सुशील नैयर 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान महात्मा गांधी के साथ जेल में रहीं।
6 अप्रैल 1930 को इंदिरा गाँधी ने बच्चों को लेकर 'वानर सेना' का गठन किया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महत्वपूर्ण योगदान दिया।
विजयलक्ष्मी पंडित, जिन्होंने गाँधी जी के साथ जंग-ए-आजादी के आन्दोलन में  बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सैन फ्रांसिस्को सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।
सुभाषचंद्र बोस की 'आरजी हुकूमते आजाद हिंद सरकार' में आजाद हिंद फ़ौज की रानी झांसी रेजीमेंट की कमांडिंग आफिसर रहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल और लेफ्टिनेंट मानवती आर्य ने आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लन्दन में जन्मीं एनीबेसेंट ने 'न्यू इंडिया' और 'कामन वील' पत्रों का सम्पादन करते हुए सितम्बर 1916 में भारतीय स्वराज्य लीग की स्थापना कर स्वशासन के लिये लोगों को प्रेरित किया। आज एनीबेसेंट को कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव भी प्राप्त है।
भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा ने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर, भारत की स्वतन्त्रता के पक्ष में माहौल बनाया उनके द्वारा पेरिस से प्रकाशित 'वन्देमातरम' पत्र प्रवासी भारतीयों में कई लोकप्रिय हुआ। उन्होंने लोगों से भारत को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोग की अपील की और भारतवासियों का आह्वान किया की 'आगे बढ़ो, हम हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।'
आयरलैंड की मूल निवासी और स्वामी विवेकानंद की शिष्या मारग्रेट नोबुल (भगिनी निवेदिता) ने भी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई।
इंग्लैण्ड की ब्रिटिश नौसेना के एडमिरल की पुत्री मैडेलिन ने भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। 'मीरा बहन' के नाम से मशहूर मैडेलिन 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान महात्मा गाँधी के साथ आगा खान महल में कैदी रहीं। उन्होंने अमेरिका व ब्रिटेन में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया।

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