23 फ़रवरी 2011

अनुष्ठान-अंगार की चतुर्थी व्रत

भगवान गणेश चतुर्थी तिथि के दिन प्रकट हुए थे। अतएव यह तिथि मंगलमूर्ती  गणपति को सर्वाधिक प्रिय है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में श्रीगणेश को चतुर्थी का स्वामी (अधिपति) बताया गया है। गणेशभक्त बडी श्रद्धा के साथ चतुर्थी के दिन व्रत रखते हैं। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेकर, गणेश-पूजन करने के बाद फलाहार ग्रहण किया जाता है। कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसके व्रत से सभी संकट-विघ्न दूर होते हैं। मंगलवार के दिन चतुर्थी का संयोग गणेश जी की उपासना में अत्यन्त शुभ एवं सिद्धिदायक होता है। मंगलवार की चतुर्थी अंगारकी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। धर्मग्रन्थों में यह लिखा है कि अंगारकी चतुर्थी का इतना अधिक माहात्म्य है कि इस दिन विधिवत् व्रत करने से मंगलमूर्ती  श्रीगणेश तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। अंगार की चतुर्थी का व्रत विधिवत् करने से सालभरकी चतुर्थियों के व्रत का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में अंगार की चतुर्थी की कथा विस्तार से वर्णित है। पृथ्वीनन्दन मंगल अपनी तेजस्विता एवं रक्तवर्ण के कारण अंगारक भी कहे जाते हैं, जिसका मतलब है अंगारे के समान लाल। मंगल ने कठोर तप करके आदिदेव गजानन को जब संतुष्ट कर दिया, तब उन्होंने मंगल को यह वरदान किया कि मंगलवार के दिन चतुर्थी तिथि अंगारकी चतुर्थी के नाम प्रख्यात होगी। इस दिन सविधि व्रत करने वाले को एक वर्ष पर्यन्त चतुर्थी-व्रत करने का फल प्राप्त होगा। अंगार की चतुर्थी के प्रताप से व्रती के किसी भी कार्य में कभी विघ्न नहीं होगा। उसे संसार के सारे सुख प्राप्त होंगे तथा मंगलमूर्ती  गणेश उस पर सदैव कृपा करेंगे।

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