21 सितंबर 2011

रहमान की म्यूजिकल राह...

अल्लाह रखा रहमान एक ऐसी शख्सीयत, जिसने संगीत की दुनिया की राह में अपने कदमों को इस तरह बढ़ाया कि आज विश्वस्तर पर उसने एक अमिट पहचान कायम की है।
5 जनवरी 1966 को मद्रास में जन्मे रहमान का पहले नाम ए. एस. दिलीप कुमार था, लेकिन 1988 में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया। इसके पीछे का रहस्य यह माना जाता है कि एक बार रहमान की बहन गंभीर रूप से बीमार पड़ीं, तब वह एक पीर बाबा की मजार पर गए और उनकी दुआ का इतना असर पड़ा कि उनकी बहन को एक नया जीवन मिल गया, इसी से प्रभावित होकर रहमान के पूरे परिवार ने इस्लाम कबूल कर लिया। 'मोजार्ट ऑफ मद्रास' के नाम से पहचाने जाने वाले रहमान ने संगीत प्रेमी परिवार में जन्म लिया, उनके पिता आर. के. शेखर मलयालम सिनेमा के जाने-माने म्यूजिक कंपोजर थे। रहमान ने सिर्फ 4 वर्ष की आयु में पियानो बजाने का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। बचपन से ही मुसीबतों ने रहमान की राह का रोड़ा बनना चाहा, पर करना है, तो करना है... के मार्ग पर चलने वाले रहमान हमेशा आगे बढ़ते रहे।

उनके कठिन समय की कहानी तो उस वक्त ही शुरू हो गई थी, जब नौ साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया था। इस विषम परिस्थिति में परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मासूम रहमान के नाजुक कंधों पर आ गई। रहमान ने म्यूजिक की ओर अपना रुझान किया और इलयाराजा के ट्रच्प को जॉइन किया। रहमान को इसके चलते अपनी स्कूली एजुकेशन छोड़नी पड़ी। अतीत के उन दिनों के बारेे में रहमान बताते हैं कि वह मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था, मैंने हमेशा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने का सपना देखा था, पर उस स्थिति में मां ने कहा कि मुझे म्यूजिक को कैरियर ऑप्शन के रूप में अपनाना चाहिए। स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं किसी विकल्प के बारे में सोचता, मैने वैसा ही किया, जैसा मां चाहती थीं। रहमान कहते हैं कि शुक्र है डैड का, जिन्होंने म्यूजिक इंस्ट्रुमेंट्स का बेहतरीन कलेक्शन किया था, जो मेरे बहुत काम आया।

जब रहमान सोलह साल के थे, तभी से वह काम में इतने व्यस्त हो गए कि वह मात्र तीन घंटे ही सोते थे। अपने उन दिनों के शेड्यूल के बारे में रहमान बताते हैं कि मेरी लाइफ उसी समय से काफी सीरियस हो गई थी। मैं सुबह ९ से रात दस बजे तक जिंगल, सॉन्ग रिकॉर्डिंग आदि में व्यस्त रहता था, एक स्टूडियो से दूसरे, फिर तीसरे। फिर रात को घर आता था और जैसा कि कहावत है कि रात अपनी होती है, बस उसी तर्ज पर रात ग्यारह बजे नई धुनों की कंपोजिंग करना शुरू करता था और बस कब सुबह हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था। फिर सुबह 6 से 9 बजे तक सोता था।

एजुकेशन के विषय पर रहमान कहते हैं कि मुझे अफसोस होता है कि मुझे कॉलेज छोड़ना पड़ा था और तभी से किताबें और क्लासेज मुझसे दूर हो गई थीं। अपनी इसी इच्छा के चलते मैंने ट्रिनिटी कॉलेज, ऑक्सफोर्ड से वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक में डिग्री लेने की ठानी और फिर डिग्री हासिल की। मैंने यह कोर्स लंदन न जाकर पत्राचार से चेन्नई से ही किया है।

रोजा से अपनी एक सशक्त पहचान बनाने वाले रहमान इस फिल्म से कैसे जुड़े, इसका जवाब देते हुए बताते हैं कि एक एडवरटाइजिंग अवॉर्ड समारोह के दौरान उनकी मुलाकात डायरेक्टर मणिरत्नम से हुई, रहमान ने उन्हें अपने बनाए कुछ म्यूजिकल सैंपल सुनाए, जिससे वे इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने रहमान को अपनी आने वाली फिल्म रोजा के लिए म्यूजिक कंपोज करने की जिम्मेदारी दे दी। रहमान अपनी पत्नी सारया के बारे में कहते हैं कि वह म्यूजिक के बारे में मेरी मां की तरह ज्यादा नहीं जानती हैं, पर कंपोजिंग के वक्त यह जरूर बता देती हैं कि सुनने में वह कर्णप्रिय है या नहीं, पर तीनो बच्चों खतीजा, राहिमा और अमीन का संगीत में काफी इंटरेस्ट है। आजकल रहमान अपनी आगामी फिल्मों एलिजाबेथ- द गोल्डन एज (हॉलीवुड), गुरु, अकबर-जोधा, चमकी, रॉकस्टार आदि पर कार्य कर रहे हैं।


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