26 जुलाई 2010

सोनिया गाँधी ( Sonia Gandhi )





श्व की ताकतवर महिलाओं में शुमार सोनिया गाँधी आजकल वे महिला आरक्षण विधेयक को हर कीमत पर पारिक कराने के लिये दृढतापूर्वक जुटी है। भाजपा जैसी विरोधी पार्टी को अपने जाल में फंसाने और महिला आरक्षण के विरोधी तथा सरकार में सहयोगी रहे लालू यादव जैसे दिग्गज की सोनिया गाँधी ने मजाकमजाक में बोलती बंद कर दी।

न...न... करते हुए राजनीति में आए सोनिया गाँधी का शुरूआती रूप गूंगी गुडिया जैसा लग रहा था। कहा जाता था की वे औरों की सलाह पर फैसले लेते हैं। उन्हें खुद को राजनीति की समझ नहीं है। इस तरह की अनेक बातें कही जाती थीं पर जैसे-जैसे दिन बीतते गए, सोनिया गाँधी की काबिलीयत, उन की राजनीतिक परिपक्वता जनता के सामने आने लगी और उन विरोधियों की जबान बंद हो गई, जो उन के बारे में गलतफहमी में थे।

सोनिया गाँधी मई, 2005 में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनी। वे नेहरू परिवार की 5वीं सदय हैं, जो कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी भी महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर रह रहे हैं।

व्यक्तिगत परिचय
6 दिसंबर, 1946 को इटली के तुरीन से 80 किलोमीटर दूर ओवास्सान्जो नामक स्थान पर एक परम्परावादी रोमन कैथोलिक परिवार में जन्मी एड्विग एंटोनिया एल्बिना मैनो यानी सोनिया गाँधी की शुरूआती पढ़ाई कैथोलिक स्कूल में हुई। उन के पिता भवन ठेकेदार थे। 1964 में वे कैम्ब्रिज आ गईं। यहाँ राजीव गाँधी से उन की मुलाक़ात हुई। पढाए के दौरान ही दोनों के बीच प्यार हुआ और 1986 में देश के प्रतिष्ठित नेहरुगांधी परिवार में वे ब्याही गईं।

1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद वे पूरी तरह भारतीय नागरिक बन गईं। उस से पहले राजीव गाँधी पर राजनीति में आने का दबाव बढ़ रहा था, पर सोनिया गाँधी उन्हें मना करती थी। आखिरकार 1980  में संजय गाँधी की मौत के बाद राजीव गाँधी ने इंडियन एयरलाइंस के पायलट पद से इस्तीफा दे कर राजनीति जौइन कर ली।

21 मई, 1991 में पति राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद करीब 6 साल तक वे खामोश बैठी रहीं। पर 1997 में उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्य ग्रहण कर ली। 2004 के आम चुनावों में सोनिया गाँधी ने तूफानी दौरे किये। जनता से रूबरू हुई तो भीड़ उमड़ पडी और मतदाताओं ने उन्हें सिराखों पर बैठा लिया।

राजीव गाँधी की मौत के बाद गर्त में पहुँच चुकी पार्टी को सोनिया गाँधी ने उबार लिया। पुराने कांग्रेसी, जो आपस में कलह के कारण इधरउधर चले गए थे, पार्टी में लौट आए। उस समय विपक्षी दलों ने सोनिया गाँधी के विदेशी मुद्दे को खूब परवान रखा था। बावजूद इस के लोगों ने सोनिया गाँधी के महत्वा को समझा भाजपा की अगुआई वाली एनडीए सरकार को इस मुद्दे पर करारी शिकस्त मिली।

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