15 जून 2010

चाहिए पूरब को विज्ञान पश्चिम को धर्म

पूरब ने कोशिश की एक पंख से उडऩे की, और बुरी तरह गिरा। पश्चिम ने भी कोशिश की एक पंख से उडऩे की, बुरी तरह गिरा। दोनों वैसे तो बड़े विपरीत दिखाई पड़ते हैं, मगर एक बात में राजी हैं कि एक ही पंख से उडऩा है। उनकी अपनी-अपनी जिद है। इस जिद ने सारी मनुष्यता को दुख से भर दिया है। दोनों ही पंख प्यारे हैं। पदार्थ में कुछ बुरा नहीं है। पदार्थ भी परमात्मा की अभिव्यक्ति है। पदार्थ असत्य नहीं है और परमात्मा भी असत्य नहीं है। परमात्मा पदार्थ में ही छुपा है। जैसे बीज में फूल छिपे होते हैं। बीज तोड़ो, तो फूलों को न पा सकोगे। यह कोई ढंग न हुआ फूलों को पाने का। बीज को जमीन दो, भूमि दो, जल दो, तब ठीक समय पर, ठीक मौसम में आएगा वसंत और फूल खिलेंगे, झर झर झरेंगे। आपको आनंद मिलेगा। बीज को काट के फूल नहीं पाए जाते। बीज को उगाना होता है।

मेरे हिसाब से, ध्यान की पूरी कला, तुम्हारे भीतर जो छिपी हुई संभावना है, उसको वास्तविक बनाने की कला है। तुम्हारी संभावनाओं को यथार्थ बनाने की कला है। तुम्हारे बीज को फूल तक ले जाने की कला है। मैं दरिद्रता का पक्षपाती नहीं हूं। दरिद्रता किसी भी रूप में अच्छी नहीं। मैं चाहता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति समृद्ध होना चाहिए। आज विज्ञान प्रत्येक व्यक्ति को समृद्ध करने में कुशल है। उसमें अथाह शक्ति है। उसका उपयोग करना चाहिए। इसलिए कोई जरूरत नहीं कि हम चरखा लिए बैठे रहे। यह मूढ़ता की हद है। यह जड़ता की आखिरी सीमा है कि लोग चरखे चला रहे हैं। जैसे दरिद्र होने की हमने कसम खा ली है। जैसे द्ररिद्रता से छुटकारा नहीं चाहते।

किसी को अब दरिद्र होने की जरूरत नहीं है। दरिद्रता इस पृथ्वी से यूं ही मिट सकती है कि जैसे कभी थी ही नहीं। आज इस बात की संभावना है, पहले इस बात की संभावना नहीं थी। इसलिए थोड़े प्रयासों से इस दरिद्रता को मिटाया जा सकता है। पर न मालूम कैसे-कैसे झूठे सिद्धांत लोगों ने गढ़े हैं। आखिर कुछ तो समझाना पड़ेगा। सवाल सामने था कि लोग गरीब क्यों हैं। हमने सिद्धांत गढ़े कि पिछले जन्मों के पापों के कारण गरीब हैं। या सिद्धांत गढ़ा कि भारत के भाग्य में ही गरीबी लिखी है। परमात्मा ने पहले ही हमें गरीबी दे दी है।

पिछले जन्म का सिद्धांत और भी जहरीला है। उसका जाल लंबा है। अनंत जन्म! स्वभावत: न मालूम कितने पाप किए होंगे। अब न मालूम कितने अनंत जन्मोंं तक पापों का फल भोगना पड़ेगा। मुश्किल यह है कि अब अनंत जन्मों तक तुम पुराने पापों का फल ही थोड़े भोगते रहोगे। कुछ और भी तो करोगे। या बस पापों का फल ही भोगते रहोगे। पापों का फल भोगने में फिर पाप हो जाएंगे, तो समझ लो कि छुटकारे का कोई उपाय नहीं रहेगा।

एक ऐसा दुष्टचक्र पैदा कर दिया है कि उसमें गरीब ही रहना पड़ेगा। और इसमें अमीर को भी एक तरह की सुरक्षा दे दी। यह मान लिया गया कि उन्होंने पुण्य कर्म किए थे, इसलिए वे अमीर हुए हैं। इससे अमीरों को एक कवच मिल गया। गरीब आवाज नहीं उठा सकता कि उन्हें चूसा गया है, या उन्हें चूसा जा रहा है। इसका दर्शन यही है कि चूसने का सवाल ही नहीं, वे अपने पुण्यों का और तुम अपने पापों का फल भोग रहे हो। फिर अपने साथ हुए शोषण की बात कहां कहोगे।

इन थोथी धारणाओं की कोई जरूरत नहीं है। न तो भाग्य में कुछ लिखा है, न कोई विधाता है जो कुछ लिख रहा है। न तुम्हारे पिछले जन्मों के कर्मों का कोई सवाल है। असल मेंं जब तुम कर्म करते हो, तब उसका फल भोग लेते हो। इतनी देर लगेगी क्या? पिछले जन्म में आग में हाथ डाला इस जन्म में जलोगे? जरा मूढ़ता भी तो देखो। कुछ हिसाब भी तो सोचो। पिछले जन्म में आग में हाथ डाला तभी जल गए होंगे। तभी जल गए होंगे। इतनी देर की जरूरत क्या है? कार्य- कारण इतनी देर तक नहीं ठहरते। अगर पिछले जन्म में क्रोध किया होगा तो क्रोध करने में ही तो आदमी जल भुनता है। खूब भोगता है। किसी की हत्या की होगी तो अपराध की पीड़ा, ग्लानि, महसूस हुई होगी।

अब और क्या चाहिए। उतनी लपटें काफी हैं, बहुत हैं। हर जन्म का निपटारा उसी जन्म में हो जाता है। तुम जब भी पैदा होते हो, कोरी स्लेट लेकर पैदा होते हो। आज इस तरह की बातों की जरूरत नहीं। विज्ञान इस पूरी पृथ्वी को समृद्ध कर सकता है। मगर चरखों को तो जलाना पड़ेगा। कुछ मूढ़ तो और आगे बढ़ गए हैं। वे तकलियां चला रहे हैं। उन्होंने तय कर लिया है कि बाबा आदम के आगे नहीं जाना है। गरीबी का मैं पक्षपाती नहीं हू। न बाहरी गरीबी का न भीतरी गरीबी का । इसलिए पूरब को विज्ञान चाहिए पश्चिम को धर्म। पश्चिम भी बावला है। समृद्धि को ही संतोष मान बैठा है। दोनों को पंख मिल जाएं तो मनुष्य आनंद के आकाश में उड़ानें भरने लगता है।

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