21 फ़रवरी 2012

अहंकार ईश्वर की उपासना में बाधक: गोविंदराम

बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित गोविंदराम ने कहा कि आकार का आधार तो निराकार ही है पर निराकार की अनुभूति के लिए आकार का आधार अपेक्षित है। लेकिन निराकार की अनुभूति उन्हें नहीं हो सकती जिन्हें देह का अभिमान होता है। इसका तात्पर्य है कि आकार ही अस्तित्व का बोध कराता है और अहम यानी मैं का परिचायक होने के कारण निराकार ब्रह्मा की उपासना में बाधक भी बनता है। इसलिए परम योगियों के लिए भी असाध्य निराकार साधना को सामान्य गृहस्थ जप तप के आधार पर अपनाता है तो उसे वह सुखानुभूति नहीं होती जो सगुण साकार के उपासक को साधना काल में प्राप्त होती है। निराकार में रमना या शून्य में स्थिर होने की साधना करना श्रेय तो है पर प्रेय नहीं। मैं का विसर्जन सगुण साकार में सुगम होता है। इसमें चंचल मन को विश्राम पाने के अनेक आलम्ब प्राप्त होते हैं।

पण्डित जी ने कहा कि निर्गुण निराकार में रमने के लिए कबीर को भी राम के नाम का आश्रय लेना पडा था। आश्रय अंतस चेतना की अरूप आस्था का कल्पित या मान्य भाव ही है। इसे परमतत्व, परब्रह्मा या कोई भी नाम दिया जा सकता है। अनाम को नाम देना नामधारी जीव की विवशता है। निराकार भी आकार हीन के लिए नाम हीन संबोधन ही है। उन्होंने कहा कि साधना का अर्थ ही है अपनेपन को कहीं विसर्जित कर देना, कोलाहल के सागर में शांति की तरंगों में खो जाना, सांसारिक साधनों को नकार देने का उपक्रम। साधना की जाती है आकार की अभीप्साओं को निराकार कर देने के लिए। धार्मिकता की स्थूलता के स्थान पर ध्यान साधना पद्घति का प्रचार विश्वव्यापी हो रहा है। अन्य साधना पथ का संबंध धार्मिक अधिक है पर ध्यान पथ में सभी का समावेश है। यहां न भाषा आडे आती है और न शास्त्र। यह मौन के अनुनाद का मार्ग है। यहां अवलोकन ही कर्मकाण्ड कहलाता है। यह मौन से मौन का संवाद है। यह आकार के विसर्जन और निराकार के सर्जन का संधिस्थल है।

उन्होंने कहा कि यहां सगुण भी तपते हैं और निर्गुण भी पनपते हैं। यह धार्मिकता विहीन आध्यात्मिकता का पथ है। योगी इसमें जीतता है और वियोगी इसमें रमण करता है। लेकिन जो न जप करता है और न कर्मकाण्ड पर अनन्य भाव से अपने आराध्य का चिंतन करता है,वह आकार से निराकार, सगुण से निर्गुण के भेद-विभेदों को अपने में आत्मसात् कर ध्यान की उस विराटता का आचरण करता है जो जीवन मुक्ति का सहचर होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म के फलों के प्रति उदासीन तो होता है पर कर्म को सहज भाव से करता हुआ उस भक्त का आचरण करता है जिसके सामने ज्ञान की पारदर्शी दीवार अस्तित्व हीन होती है। प्रारब्ध का भोग वह ऐसे ही भोगता है जिस तरह समुद्र अपनी जल राशि पर उठने वाली तरंगों का आघात भोगता है। आज के आपाधापी जीवन में ईष्र्या-द्वेष से रहित जीवन यापन अनन्य चिंतन के साधना पथ का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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