21 दिसंबर 2010

वाणी ही व्यक्तित्व की सही पहचान है

रघुनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित माधवानन्दने कहा कि वाणी के सही इस्तेमाल करने पर ही व्यक्ति के व्यक्तित्व की सही पहचान होती है। इसी के माध्यम से कोई संत-महात्मा बन जाता है और कोई डाकू-लुटेरा। उन्होंने कहा कि मनुष्य को मन, वचन व कर्म से नि:स्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं रखना चाहिए तथा अपनी वाणी से किसी को कठोर शब्द नहीं कहने चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य के बोलचाल के ढंग के माध्यम से ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण भी होता है।

इसी के माध्यम से कोई संत-महात्मा बन जाता है और कोई डाकू-लुटेरा बन जाता है। यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने भाषाई स्वर का किस प्रकार इस्तेमाल करता है। उन्होंने कहा कि एकता के अभाव में अधिकतर लोग अपनी शक्ति का उपयोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए करते हैं जबकि उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग आपस में लडने की बजाय अन्याय व दूसरी बुराईयों से लडने के लिए करना चाहिए। मनुष्य में भक्ति भावना व संस्कार ग्रहण करने की प्रवृति गायब होती जा रही है, जिसके चलते हमारे समाज में निरन्तर बुराइयों को अपनाने की प्रवृति को बढावा मिल रहा है।

बुराइयों पर विजय प्राप्त करने पर ही मनुष्य का सर्वागीण विकास संभव है। उन्होंने कहा कि मानव सेवा ही सबसे बडा धर्म है इसलिए मनुष्य को अपनी शक्ति का उपयोग मानव सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मानव सेवा में लीन रहते हैं वे मनुष्य सदैव बुराईयों से दूर रहते हैं। जिसके कारण उन्हें मानव सेवा करने पर अत्यन्त खुशी महसूस होती है। उन्होंने कर्म के संदर्भ में कहा कि मनुष्य द्वारा किया गया कर्म ही उसका भाग्य विधाता होता है अच्छे कर्मो से ही अच्छे भविष्य का निर्माण होता है।

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