30 जून 2011

समूल विनाश की जड़ है क्रोध

इस संसार की नदी में बहुत कम लोगों के पाँव टिके हैं। अधिकाँश तो यूं ही बह गए, लेकिन इस नदी में सुबह-सुबह पार निकलना आसान होता है, क्योंकि उस समय बर्फ बहकर नहीं आती। उसी तरह इस संसार रूपी नदी से होने के लिये भी सुबह का समय या ब्रह्ममुहूर्त का समय श्रेष्ट होता है। यदि इस समय आप पाँव टिकाएंगे, तो बहुत जल्दी पार चले जाएंगे, लेकिन इस समय भी कुछ पत्थर तो इस नदी में अवश्य होते हैं। कुछ नुकीले हैं, कुछ चपटे हैं और कुछ आपके पाँव को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जीवन की नदी में यह पांच पत्थर हैं: काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। यदि नदी को सुरक्षित पार करना है, तो ध्यान रखना कि इन पर आपका पांव नहीं पड़े। ये देखने में बहुत छोटे लगते हैं, लेकिन एक बार जब अंदर पाँव पड़ता है, तो संतुलन गड़बड़ा सकता है और आप बह भी सकते हैं।

कौन चाहता है कि मैं क्रोध करूं, लेकिन फिर भी क्रोधित होता है। कौन चाहता कि मैं लालची कहलाऊँ, लेकिन फिर भी लालच करता है। इन सभी में सबसे हानिकारक है क्रोध। जब यह आता है, तो बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है। इंसान को होश नहीं रहता और वह पागल के समान हो जाता है। उसका परिणाम यह होता है कि जोश में आकर वह क्या बोल जाता है, उसे पता नहीं होता, पर जो उसे सुनता है, उसे सब कुछ याद रहता है और उसे वह कभी नहीं भूलता। सामने वाला, फिर भले ही उससे शत्रुता मौल ले, लेकिन क्रोध में वहां कुछ याद रहता है। बात अगर क्रोध तक ही हो, तो फिर भी चल जाए, लेकिन क्रोध की पत्नी 'हिंसा' भी तो उसका पूरा साथ निभाती है। इस क्रोध का परिवार बहुत बड़ा है। उसकी दो बेटियाँ है, 'निंदा' और 'चुगली', एक बहिन है 'जिद', इसका एक बड़ा भाई भी है, वह है 'अभिमान'। एक बेटा है 'द्वेष' और बहू है 'ईर्ष्या'। क्रोध जब आता है, तो कभी अकेले नहीं आता। अपने इस पूरे परिवार को लेकर साथ आता है और जब यह पूरा परिवार एक साथ आता है, तब फिर व्यक्ति का सारा व्यक्तित्व ही बदल जाता है। फिर उसे नाश की ओर जाने से कोई रोक नहीं सकता। इसलिए यदि इस संसार रूपी नदी से पार होना है, तो इस पूरे परिवार से बचकर रहना होगा और इस परिवार से बचने का आसान उपाय है, कि इस परिवार के मुखिया क्रोध से ही नाता हटा लिया जाए।

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