04 अगस्त 2011

काश! जवानी सोच सकती; बुढापा कर सकता?

कैसी विधि की विडम्बना है कि यौवन होता है तो अकल नहीं होती और अकल आती है तो यौवन चला जाता है। जब तक माला गूंथी जाती है, फूल कुम्हला जाते हैं।

काश! जवानी सोच पाती; और बुढापा कर पाता?

जवानी के साथ जोश आता है, होश नहीं और जब होश आता है तो जोश ठंडा पड़ जाता है। 

यौवन एक नशा है जिसमें चूर होने के बाद मनुष्य को कुछ नहीं सूझता। जवानी दीवानी है और दीवानापन मनुष्य को अंधा बना देता है।

बुढापा समझदारी का पर्याय है, लेकिन शक्ति के अभाव में समझदारी केवल पश्चाताप ही कर पाती है।

जवानी जिन्दगी का ज्वालामुखी है जिसमें असीम शक्ति भरी है। यौवन में एक उत्तेजना है, अग्नि है जो चिंगारी पाते ही दहक उठती है।

यौवन में कल्पना है और बुढ़ापे में चिन्तन। जवानी में जीवनी शक्ति है और बुढ़ापे में संजीवनी बूटी।

जवानी जिन्दगी का बसंत है और बसन्त में बहार है। बुढापा जीवन का शरद है और शरद में समझदारी ठंडी पड़ जाती है।

यौवन एक प्रवाह है और मात्र प्रवाह में दिशा-बोध का अभाव रहता है।

बुढापे में दिशा बोध है और प्रवाह का अभाव है। यौवन में गति है, बुढापे में ज्ञान। ज्ञान गति का दिशा दर्शन करता है तभी यौवन प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है। यौवन में आवेश है बुढापे में अनुभव, जवानी में संवेग है, बुढापे में विवेक।

काश! जवानी के स्पेयर पार्ट्स मिल पाते ताकि उन्हें बुढापे की मशीन में फिट किया जा सकता और बुढापे के अनुभव प्राप्य होते ताकि वे जवानी को दिशा बोध कर पाते।

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