17 अगस्त 2010

आपका प्यार प्यार है या कुछ और ? ( Your Love is love or something? )


सी के लिये प्रेम धड़कते दिल की सदा है तो किसी के लिये किसी का इंतज़ार। किसी के लिये पहली नजर का प्यार है तो किसी के लिये मर मिटने का जूनून। किसी के लिये प्रेम किसी का दिल जीतना है तो किसी के लिये दो जिस्मों का मिलन। किसी के लिये आदत जैसा है तो किसी के लिये जरूरत जैसा। प्रेम किसी के लिये जिम्मेदारी है तो किसी के लिये वफादारी किसी का प्रेम लालसा है तो किसी का वासना। कोई स्वयं की सुविधा को देखकर प्रेम करता है तो कोई आपसी योग्यता को देखकर। किसी का प्रेम मोह है तो किसी का स्वार्थ। अर्चन यही है की किसी का प्रेम, प्रेम जैसा नहीं है।

सच तो यह है की हम सब कुछ करते हैं बस प्रेम नहीं करते। यही कारण है हमने प्रेम को इतने नाम दिए हैं और असफल हुए हैं। क्या है हमारा प्रेम ? ज़रा सोचने और तय करें की यह प्रेम है या कुछ और ?

प्रेम और आदत
आपको सोच के हैरानी होगी की जिसे हम आमतौर पर प्यार करते हैं वह हमारी आदत है। अधिकतर लोग आदत को ही अपना प्यार समझ लेते हैं। लेकिन प्यार आदत नहीं। यही आदत है जो आपको इतना उलझाए हुए हैं। क्योंकि आदत जितनी गहरी और पुरानी होती है उतनी और मज्बोत हो जाती है और इस मजबूती को हम अपना गहरा प्यार समझ लेते हैं।

हमें किसी का हंसना, बोलना, उसके साथ घूमना-फिरना इतना अच्छा लगने लगता है की हम उसे अपनी रोज की आदत में, दिनचर्या में शामिल कर लेते हैं। फिर उसकी छोटी-छोटी चीज व हरकतें हमारे ऊपर असर करने लगी हैं। उसके उपहार, उसकी छुअन- आलिंगन उसके फोन उसके पत्र व उससे सुख-दुःख बांटने की आदत आदि  इतनी घनी हो जाती है की हम उससे स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते फिर उस बंधन में हमें सुकून मिलने लगता है और इस सुकून को, एक दूजे की देखभाल को इस बंधी हुई आदत को हम प्यार का दर्जा दे देते हैं। किसी दूसरे की इतनी लत, किसी के लिये उसकी तन्हाई का समाधान हो सकती है, लेकिन प्यार नहीं।

प्रेम और दर्द
दर्द का प्रेम से गहरा नाता है क्योंकि जहाँ प्रेम है वहां दर्द भी है। बिना दर्द के प्रेम कभे हासिल नहीं होता। लेकिन प्रेम में दर्द मिलना तथा दर्द को प्रेम में परिवर्तित करना दो अलग-अलग बातें हैं।

अक्सर लोगों का प्रेम दर्द की नींव पर खडा होता है। अर्थात जिन्दगी के गम, वक्त के थपेड़े व तन्हाई एवं संघर्षों से चूर जब कोई इंसान टूट जाता है तब उसकी एक ही ख्वाहिश होती है की कोई उसकी तन्हाई को, उसके दर्द को सुने, समझे और बांटे। फिर उम्र के जिस मोड़ पर हमें वह शख्श मिलता है जो हमें समझता है हमारे गम बाँट लेता है तो वह हमें प्रिय लगने लगता है। यही नहीं जब तक हम उससे दिल की बात नहीं कह लेते दिल को चैन नहीं मिलता। इस आस और उस इंसान के साथ को हम सबसे अच्छे व करीबी दोस्त का दर्जा दे देते हैं। दोस्ती गहरी होकर हमसफ़र की इच्छा तब्दील होने लगी है और  इसी गहरी इच्छा और आपसी जरूरत को हम प्रेम कह देते हैं।
दर्द बांटने वाला, आपको समझने वाला आपका अच्छा दोस्त हो सकता है, सलाहकार या हम सफ़र हो सकता है परन्तु वह आपका प्रेमी ही होगा या आपको उससे प्रेम ही होगा यह कहना गलत है, तभी तो दोस्ती दुश्मनी में बदल जाती है, विवाह तलाक में बदल जाते हैं। दर्द बांटने वाला, दर्द का जिम्मेदार हो जाता है। परन्तु वास्तविक प्रेम शाश्वत है, स्थिर है।

प्रेम और जिम्मेदारी
कई लोगों के लिये प्रेम जिम्मेदारी जैसा है जिसे निभा कर उन्हें लगता है की वह प्रेम करते हैं खासतौर पर जब वह रिश्ता माँ-बाप तथा पति-पत्नी के रूप में हो तो। माता-पिता वह हर कार्य करते हैं जो उन्हें अपने बच्चे के लिये करने चाहिए। जी जान से इतना प्यार करने के बाद भी बच्चे उनके अनुसार नहीं निकलते और आपसी मतभेद किनारे हो जाते हैं ओर हम उन्हें जनरेशन गैप कहकर किनारे कर देते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि रिश्तों में सिर्फ जिम्मेदारियां होती हैं प्रेम नहीं। क्योंकि प्रेम का तो अर्थ है जहाँ कोई गैप न हो।

पति सदियों से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं पत्नियां सदियों से अपने फर्ज अदा कर रही हैं। दोनों अपनी जिम्मेदारियों को पूरा-पूरा निभा रहे हैं फिर भी असंतुष्ट हैं, अतृप हैं। पति को कोई और प्यार करने वाला चाहिए तो पत्नी चाहती है की उसे कोई और उसके तल पर समझे, जानें और स्वीकार करे। जिम्मेदारियां आपसी मुठभेड़ की शक्ल ले लेती हैं। क्योंकि जिम्मेदारियां बोझ से जन्म लेती हैं या मजबूरी से, प्रेम से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता।

कोई एक चूका नहीं, की गैर जिम्मेदार होने की, बेवफा होने की, ना प्यार करने की शिकायतें शुरू हो जाती हैं। किसके जिम्मे क्या था किसने क्या नहीं निभाया आदि शुरू हो जाता है। सारा का सारा प्यार हक़ और हिस्से में बदल जाता है। प्रेम बांटता नहीं है जोड़ता है। प्रेम दोष दूसरे में नहीं खुद में ढूंढता है। प्रेम दूसरे को बदलने का नाम नहीं स्वयं को ढालने का नाम है। जिम्मेदारियों का अर्थ ही है दो, अर्थात करने वाला, लेने वाला। लेकिन वास्तविक एवं सच्चे प्रेम में कोई जिम्मेदारियां, हक़, शर्त और हिस्से जैसी चीजें नहीं होती।

प्रेम और जूनून
जूनून एक ऐसी स्थिति है जब कोई किसी की चाहत में हदों से भी पार हो जाता है। न उसे खुद की खबर होती हैं न जमाने की बस प्रेमी का ही नाम जहाँ में बचता है। दिलों दिमाग में उसी प्रेमी का भूत व प्यार की धुन सवार होती है। बस एक जिद होती है उसे अपने प्रेमी को ही पाना है। यदि उसे उसका प्रेमी नहीं मिला तो वह अकेला मर जायेगा। जूनून की इस अवस्था को देखकर लगता है की यह सच्चे एवं वास्तविक प्रेम के लक्षण हैं। कुछ हद तक यह स्थिति या अवस्था सच्चे प्रेम की ओर इशारा करती है लेकिन प्रेम, जूनून नहीं। प्रेम में प्रेमी की भी किसी हद तक यही हालत होती है परन्तु प्रेमी से मिलना ही एक मात्रा उसका उद्देश्य या लालसा नहीं होती। प्रेमी अपना किसी पर अधिकार नहीं चलाता। लेकिन जुनूनी अपने प्रेमी पर अपना आधिपत्य समझता है। वह नहीं चाहता की उसका प्रेम किसी और की तरफ नजर उठाकर भी देखे। जूनून को प्रेम की नकारात्मक दशा भी कहा जा सकता है क्योंकि यदि जुनूनी को उसका प्यार मिलता नजर नहीं आता तो वह अपना धैर्य खो बैठता है। विद्रोह पर उतर जाता है। प्रेमी को प्राप्त न कर पाने का दुःख उसे हर हद पार करना सिखा देता है यहाँ तक की उसे यदि आत्महत्या भी करनी पड़े तो वह हिचकिचाता नहीं है। परन्तु वास्तविक या सच्चे प्रेमी में यह लक्षण नहीं पाए जाते। उसके लिये प्रेमी को प्राप्त करना ही के लक्ष्य नहीं होता। विद्रोह, बदला, आत्महत्या आदि जैसे कुविचार या अवस्था प्रेमी के लक्षण नहीं। प्रेमी अपने प्रेम को हर हाल में खुश देखना चाहता है। खुद भी जीता है दूसरे को भी जीने देता है।

प्रेम और सुविधा एवं योग्यता
कई लोगों के लिए प्रेम सुविधा जैसा है अर्थात जहां वह जिसके साथ वह स्वयं को कम्फ़र्टेबल महसूस करते हैं, जिसके साथ स्वयं को जोड पाने में सहूलियत महसूस करते हैं, जहां हमें ज्यादा जद्दोजहद करने की आवश्यकता न पडे बस सरलता से हम दूसरे को और दूसरा हमको स्वीकार कर ले। फ़िर वह स्कूल-कांलेज हो या दफ़्तर, घर-बाहर हो या रिश्तेदारी जिसके साथ हम सुविधा महसूस करते हैं उसके साथ संबंध को गहरा बनाने में जुट जाते हैं और उसी गहरे रिश्ते को हम अपना प्यार समझते हैं।

कितने लोग तो ऐसे हैं जो कम्फ़र्टेबलिटी के साथ-साथ काम्पैटिबलिटी भी देखते हैं। अर्थात योग्यता भी। वह जब किसी को अपने योग्य समझते हैं तभी उसको अपने दिल में जगह देते हैं क्योंकि वहां दिल के तार बैठाना उन्हें सरल लगता है। वहां कोई बडी परीक्षा नहीं करनी पडती और ना ही कोई परीक्षा देनी पडती है। योग्य साथी के साथ उन्हें समझोते कम पडते हैं। सहने और बर्दाश्त करने की अधिक गुंजाइश नहीं होती। इसलिए लोग अपना कम्पैटेबल यानी अपने योग्य साथी की तलाश करते हैं और जब संबंध-गहराई पर पहुंचता है तो वह उसे प्यार का नाम दे देते हैं। व्यवहारिक तौर पर देखा जाए तो यह ठीक लगता है, परंतु यह भी प्रेम नहीं। इतना सोच-समझकर, इतना देख परखकर अपनी सुविधा और योगयता अनुसार लोग अपना साथी चुनते हैं, प्यार करते हैं पर कितने दिन चलता है यह प्यार? कब तक और कैसे टिकते हैं ऐसे संबंध? कुछ भी छिपा नहीं है। सब जग जाहिर है।

सुविधा और योगयता को देखकर जो रिशते बनते हैं वह कभी प्रेम नहीं हो सकते। प्रेमी को हम सभी-बुराइयों और कमियों के साथ स्वीकार करते हैं, उसकी काबिलियत या योगयता का प्रेमी के प्यार पर कोई प्रभाव नहीं पडता। सच्चा प्रेमी कभी किसी परीक्षा या प्रतीक्षा से नहीं डरता। सहने और बर्दाश्त करने के भय से कभी भी प्रेम करना नहीं छोडता। प्रेमी, अपने प्रेम को सुविधा देता है सुविधा लेता नहीं है। प्रेमी स्वंम को योग्य बनाने में जुटा रहता है ना कि अपने लिए किसी को योग्य बनाता है या कोई योग्य तलाश्ता है।

प्रेम और अवधि
कितने ही लोग ऐसे हैं जो अपने प्रेम का संबंधों को अवधि से तौलते हैं। उनका मानना है संबंध जितना पुराना होगा प्रेम उतना ही गहरा होता है। तभी तो लोग अपने प्रेम में इस बात का दावा करते हैं कि मैं फ़ंला को पांच साल से चाहता हूं, मै फ़ंला को दस साल से चाहता हूं आदि। प्रेमी सोचता है जिसके साथ वह अब तक सबसे लंबे समय तक साथ रहा है उसके पीछे उसका वास्तविक प्रेम है या दूसरा भी उसे उतना ही प्यार करता है तभी उसका प्रेम फ़ंला वर्षो पुराना है। परंतु होता कुछ और है पुराने रिशतों के पीछे प्यार कम उम्मीदें, कोशिशे, इंतजार, स्वार्थ आदि ज्यादा होते हैं जिसकी आकांक्षाओं में, इंतजार में प्रेमी एक दूसरे के संबंध निभाते रहते हैं।

जैसे प्यार का पुराना होना इस बात को प्रमाणित करता है कि यह प्यार सच्चा है। यदि ऐसा होता तो लोगों को प्यार में अपना वक्त जाया करने का गम कभी नहीं होता। असफ़ल प्रेम के बाद या लंबे समय के बाद अधिकतर प्रेमियों को यह मलाल रहता है कि किसी को इतना कीमती वक्त देने के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगा।

यही कारण है कि विवाह के बाद तीस-चालीस वर्ष बिता देने के बाद भी पति-पत्नी से यदि वास्तविक सच्चे प्रेम के बारे में पूछा जाए तो दोनों चुप्पी साध लेते हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि जिसके साथ इतने वर्षो से हों वह प्यार की ही निशानी हो।

प्रेम और शरीर एवं काम
प्रेम और शरीर का, जिस्म के स्पर्श का अपना ही विशेष स्थान है। तभी तो कहने वालों ने प्रेम को आंखे चार करना कहा है। आखिर हम पहले किसी को उसके शरीर से, बाहरी भावभंगीमाओं से, अदाओं आदि से ही पसंद करते हैं। शरीर पर किसी की आत्मा या उसका दिल नहीं दिखता कि सामने वाले की सीरत कैसी है। हम केवल सरत देखकर ही फ़िदा हो जाते हैं।

कहते हैं पहला प्यार कभी भुलाए नहीं भुलता क्यों? क्योंकि पहले प्यार में जो सबसे पहले घटित होता है वह शरीर के माध्यम से ही अनुभव में आता है।

जिससे हमारे शारीरिक संबंध हों वह जरूरी नहीं वह हमारा प्रेम हो यह मात्र आकर्षण है। संभोग शरीर की भूख है, प्रेम आत्मा की। शरीर की मांग परिवर्तनशील व क्षणभंगुर है परंतु प्रेम शाश्वत है वह स्थिर है। संभोग प्रेम का एक भाग हो सकता है, एक हिस्सा हो सकता है परंतु संपूर्ण प्रेम नहीं होता। जहां काम है वहां दूसरा है, जहां दूसरा है वहां निर्भरता है और जहां निर्भरता है वहां स्वतंत्रता नहीं हो सकती, आनंद नहीं हो सकता। वास्तविक प्रेम महाआनंद है, स्वतंत्र है। इसलिए शरीर से शरीर का रिश्ता वासना पैदा करता है, जरूरत पैदा करता है। जिनके साथ हम शरीर से जुडते हैं उनके साथ हमें ऐसी भ्रांती पैदा होती है कि यह सबसे गहरा नाता है क्योंकि शरीर हमें दिखता है उसे ही हम अपनी पहचान व बहुमूल्य वस्तु मानते हैं और जब हम अपना शरीर किसी को दे देते तो हमें ऐसा लगता है कि हमने सबसे बडी चीज कर दी। जितना अत्याधिक स्व्यं को सौंपा जा सकता था हमने स्वयं को सौंप दिया। इसलिए वह हमारा प्रेम है। परंतु वास्तविक प्रेम शरीर का नहीं आत्मा का है सच्चा प्रेम शरीर के माध्यम से तो संभव है पर इस शरीर से नही।

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