17 दिसंबर 2009

संकष्ट चतुर्थी

संकष्ट चतुर्थी मनोकामना पूर्ण करने वाली, चतुरार्थ - धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करने वाली तिथि के रूप में विख्यात है। भगवान श्री गणोश को प्रिय संकष्ट चतुर्थी का व्रत न केवल विघ्नों एवं बन्धनों से मुक्ति प्रदान करता है अपितु समस्त कार्यो को सिद्ध करता है।
मनुष्य को धन-धान्य, सन्तान, सुख, वैभव एवं समृद्धि की प्राप्ति कराता है। देवी गिरिजा द्वारा साक्षात् परब्रrा परमेश्वर की पुत्र रूप में प्राप्ति की कामना से बारह वर्षो तक की गई कठोर तपस्या, व्रत एवं साधना तथा ú गं गणपतये नम: महामंत्र के सतत एवं अनवरत जप के फलस्वरूप चतुर्थी के दिन मध्यान्ह में स्वर्ण कांति से युक्त गणोशजी का प्रादुर्भाव हुआ था। इसी कारण ब्रrा ने भी चतुर्थी व्रत को अतिश्रेष्ठ व्रत निरूपित किया है।

विभिन्न पुराणों में उल्लेखित कथाओं के आधार पर वरदमूर्ति भगवान श्री गणोश की आराधना से ही सृष्टि पिता ब्रrाजी के शरीर से चतुभरुज एवं चतुर्पाद युक्त सुंदर एवं तेजस्वी चतुर्थी का जन्म हुआ जिसका वाम भाग कृष्ण तथा दक्षिण भाग शुक्ल होने से दोनों पक्षों की रचना हुई।

चतुर्थी माता के शरीर के विभिन्न भागों से प्रतिपदा से पूर्णिमा एवं अमावस्या आदि तिथियों की उत्पत्ति हुई। अत: चतुर्थी को तिथियों की माता भी कहा गया है। चतुर्थी सहित समस्त तिथियों ने भगवान गणपति की आराधना की। इस कारण चतुर्थी ने वरद मूर्ति में वासस्थान प्राप्त कर वरदा (वैनायकी) को मध्याह्न् में एवं संकष्टी चतुर्थी को रात्रि में गणपति उपासना करने पर धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति के साथ वरदमूर्ति की भक्ति प्राप्ति का वरदान दिया।

व्रत करने वालों के लिए वरदा चतुर्थी में मध्याह्न् पूर्व से एवं संकष्टी चतुर्थी में सांयकाल में स्नानादि से निवृत्त होकर शुचिता धारण कर गणोशजी का पूजन करने का विधान है। फिर वैदिक व पौराणिक मंत्रों से पूजा करनी चाहिए। इसमें पुष्प, अक्षत से आह्वान एवं आसन, जल से पाद्य-जल अघ्र्य, आचमन, शुद्ध जल, पंचामृत, गंधोदक तथा पुन: शुद्ध जल एवं गंगा जल से स्नान कराना चाहिए।

यज्ञोपवीत एवं वस्त्र, गंध एवं चंदन से तिलक, अक्षत, रक्त पुष्प एवं पुष्पमाला, दूर्वा, सिंदूर, अबीर-गुलाल, हरिद्रादि, सौभाग्य द्रव्य, सुगंधित द्रव्य, धूप, दीप एवं मोदक का नैवेद्य, आचमन, ऋतुफल, पान एवं दक्षिणा अर्पण करके, आरती तथा पुष्पाञ्जलि, प्रदक्षिणा एवं प्रार्थना के विधान से पूजा करनी चाहिए।

चतुर्थी को चंद्रोदय होने पर भगवान चंद्र का भी जल अघ्र्य एवं धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन कर चंद्रदर्शन करना चाहिए। ú गं गणपतये नम: के महामंत्र का जप करना चाहिए। उक्त चतुर्थी को निराहार व्रत रखकर दूसरे दिन अथवा चंद्रोदय के पश्चात पारणा करने का विधान है। चतुर्थी व्रत एवं भगवान श्री गणोश की आराधना से भक्ति, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के अतिरिक्त, धन, सम्पत्ति, वैभव, संतान, स्वास्थ्य व दीर्घायु प्राप्ति के अतिरिक्त बंधनों एवं संकटों से मुक्ति प्राप्त होती है।

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