27 अक्तूबर 2009

अपने व्यक्तित्व का विकास कैसे करे

किसी भी मनुष्य की पहचान उसके व्यक्तित्व से ही होती है। प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी को कभी भी असफलता का मुख नहीं देखना पड़ता, वे आसानी के साथ दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं तथा उन्हें अपना मित्र बना लेते हैं।
नीचे कुछ बातें दी जा रही हैं जिनकी सहायता से हम अपने व्यक्तित्व का विकास करके स्वयं को प्रभावशाली कैसे बना सकते हैं:
दूसरों के प्रति स्वयं का व्यवहार
दूसरों को अपमानित न करें और न ही कभी दूसरों की शिकायत करें। याद रखें कि अपमान के बदले में अपमान ही मिलता है।
दूसरों में जो भी अच्छे गुण हैं उनकी ईमानदारी के साथ दिल खोल कर प्रशंसा करें। झूठी प्रशंसा कदापि न करें। यदि आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों की निन्दा कभी भी न करें। किसी की निन्दा करके आपको कभी भी किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल सकता उल्ट आप उसकी नजरों गिर सकते हैं।
अपने सद्भाव से सदैव दूसरों के मन में अपने प्रति तीव्र आकर्षण का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करें।
सभी को पसंद आने वाला व्यक्तित्व
दूसरों में वास्विक रुचि लें। यदि आप दूसरों में रुचि लेंगे तो दूसरे भी अवश्य ही आप में रुचि लेंगे।
दूसरों को सच्ची मुस्कान प्रदान करें।
प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसका नाम सर्वाधिक मधुर, प्रिय और महत्वपूर्ण होता है। यदि आप दूसरों का नाम बढ़ायेंगे तो वे भी आपका नाम अवश्य ही बढ़ायेंगे। व्यर्थ किसी को बदनाम करने का प्रयास कदापि न करें।
अच्छे श्रोता बनें और दूसरों को उनके विषय में बताने के लिये प्रोत्साहित करें।
दूसरों की रुचि को महत्व दें तथा उनकी रुचि की बातें करें। सिर्फ अपनी रुचि की बातें करने का स्वभाव त्याग दें।
दूसरों के महत्व को स्वीकारें तथा उनकी भावनाओं का आदर करें।
अपने सद्विचारों से दूसरों को जीतें
1. तर्क का अंत नहीं होता। बहस करने की अपेक्षा बहस से बचना अधिक उपयुक्त है।
2. दूसरों की राय को सम्मान दें। ‘आप गलत हैं’ कभी भी न कहें।
3. यदि आप गलत हैं तो अपनी गलती को स्वीकारें।
4. सदैव मित्रतापूर्ण तरीके से पेश आयें।
5. दूसरों को अपनी बात रखने का पूर्ण अवसर दें।
6. दूसरों को अनुभव करने दें कि आपकी नजर में उनकी बातों का पूरा पूरा महत्व है।
7. घटनाक्रम को दूसरों की दृष्टि से देखने का ईमानदारी से प्रयास करें।
8. दूसरों की इच्छाओं तथा विचारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें।
9. दूसरों को चुनौती देने का प्रयास न करें।
10.अग्रणी बनें: बिना किसी नाराजगी के दूसरों में परिवर्तन लायें
11.दूसरों का सच्चा मूल्यांकन करें तथा उन्हें सच्ची प्रशंसा दें।
12.दूसरों की गलती को अप्रत्यक्ष रूप से बतायें।
13.आपकी निन्दा करने वाले के समक्ष अपनी गलतियों के विषय में बातें करें।
14.किसी को सीधे आदेश देने के बदले प्रश्नोत्तर तथा सुझाव वाले रास्ते का सहारा लें।
15.दूसरों के किये छोटे से छोटे काम की भी प्रशंसा करें।
16.आपके अनुसार कार्य करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करें।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा प्रयास । बधाई ।
    साहित्य के मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।

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