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11 अप्रैल 2010

शेखचिल्ली के कारनामे

शेखचिल्ली ससुराल में

शेखचिल्ली नाम का एक लड़का रहता था। उसकी माँ बहुत गरीब थी। शेखचिल्ली का पिता मर चूका था। उसकी माँ बेचारी किसी तरह शेखचिल्ली को पालती-पोसती थी।

शेखचिल्ली स्वभाव से नटखट तो था ही, साथ ही वह बेवक़ूफ़ भी था। उसकी बेवकूफी के कारण उसकी माँ को बहुत से उलाहने सुनने पड़ते थे।

अंत में एक दिन ऊबकर उसने शेखचिल्ली को घर से निकाल दिया। शेखचिल्ली घर से निकल कर पड़ोस के एक दूसरे गाँव में चला गया। वहां उसने एक झोंपड़ी बनायी और रहने लगा। उसका स्वभाव बहुत ही खुशदिल था इसलिये गाँव के लोग उसके मित्र हो गए। उन्होंने उसकी बड़ी मदद दी और उसका रोटी-पानी का खर्च चलने लगा।

उसकी जिन्दादिली गाँव के मुखिया की लड़की रजिया उस पर आशिक हो गई। गाँव के कुछ नौजवान भी शेखचिल्ली के हिमायती थे। उन्होंने एक दिन दवाव डालकर मुखिया क़ी लड़की रजिया से उसकी शादी करा दी। शेखचिल्ली को शादी में दान-दहेज़ में बहुत कुछ रूपये तथा जेवरात भी मिले। शेखचिल्ली अपनी औरत तथा शादी में मिले हुए रूपये और जेवरात लेकर अपने गाँव वापिस लौट आया।

गाँव में लौटकर शेखचिल्ली अपनी माँ से मिला तथा बोला-माँ देख। मैंने मुखिया की लड़की से शादी कर ली है।

शेखचिल्ली की माँ ने देखा क़ी बेटा बगल के गाँव बाले मुखिया की लड़की से शादी कर लाया है। उसकी माँ ने यः भी देखा क़ी शेखचिल्ली दहेज़ में बहुत-सी दौलत तथा समान इत्यादि ले आया है, तो वह मन ही मन बहुत खुश हो गई।

परन्तु वह जानती थी कि शेखचिल्ली एक बिलकुल बेकार लड़का है। इस्कू पैसा कमाने का कोई भी हुनर मालुम नहीं। इसलिये वह कहने लगी-बेटा तू महालानतो आदमी है। तेरे किये कुछ भी होने का नहीं।

यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा-"माँ! मैंने इतना बड़ा काम किया है। क्या यह कम है?"

उसकी माँ ने कहा-बेटा ! यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया है। तू अगर अपने मन से जान-बूझकर कोई काम करे और उसमें कोई तरक्की करके चार पैसे कमाकर ला सके तो मैं जानू। तू मुझे बुढापे में सुख नहीं दे सकता।

यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा-माँ तू ऐसा मत बोल मैं वक़्त आने पर तेरे लिये कुछ कर सकता हूं।

इसी तरह कुछ और वक़्त बीत गया। उसकी औरत नैहर चली गयी और एक साल बीत गया। एक दिन उसने ससुराल जाने की ठान ली। मान से पुचा-अम्मीजान मेरी ससुराल कहाँ है? मुझे उसका पता बताओ, ताकि मैं वहां एक बार हो आऊं मैं भूल गया हूँ।

इस पर उसकी माँ ने कहा-बेटा तुझमे अक्ल तो है ही नहीं। इसलिये अगर मैंने पता बताया तो तू भूल जाएगा। इसलिये मेरी बात का ख़याल रखे तो सीता अपने ससुराल पहुँच जाएगा। यह कहकर उसने कहा-बेटा तू सीधा अपनी नाक की सीध में चले जाना, कहीं से इधर-उधर मुड़ना नहीं, बस सीधे अपनी ससुराल पहुँच जाएगा।

यह सुनकर शेखचिल्ली सीधन ससुराल को चल दिया। चलते चलते उसकी माँ ने कहा बेटा! जो साग सत्तू घर में था मैंने बाँध दिया है। यह पोटली लेता जा और बूख लगने पर यही साग-सत्तू खा लेना।

शेखचिल्ली अपने घर से चलकर सीधा अपने नाक की सीध में रवाना हुआ। वह जब अपने घर से सीधा मैदान में दो तीन कोस निकल आया, तो सामने एक दरख्त पडा। उसने सोचा-माँ ने नाक की सीध में चलने को कहा था। यह सोचकर वह पेड़ पर चढ़ गया और फिर दूसरी तरफ से उतर फिर नाक की सीच में रवाना हुआ।

आगे चलने पर उसे एक नदी मिली। उसने उस नदी को बड़ी मुश्किल से पार किया और आगे चल पड़ा। इसी प्रकार चलता हुआ वह आखिरकार अपनी ससुराल आ पहुंचा।

ससुराल पहुँचने पर उसकी भली-भाँती खातिरदारी की जाने लगी। परन्तु उसने साग-सत्तू छोड़कर कुछ भी खाना स्वीकार न किया, क्योंकि उसकी माँ ने ऐसा ही कहा था।

रात को बचा-खुचा साग-सत्तू खाकर सो रहा। रात्रि को उसे भूक सताने लगी। अब वह क्या करे? आखिर भूक से ऊबकर वह बहार निकल आया और मैदान में एक दरख्त के नीचे लेट गया।

उस पेड़ पर मधुमखियों का एक बहुत बड़ा छत्ता था। छत्ता मधु से इतना ज्यादा भरा हुआ था क़ी उसमें से रात को मधु टपकता था। शेखचिल्ली जब उस वृक्ष के नीचे लेटा। तो ऊपर से उसके बदन पर मधु टपकने लगा। मधु की कुछ बूंदे उसके मूंह में टपकीं तो बह उसे चाटने लगा और बड़ा खुश हुआ। कुछ बूंदे उसके बदन पर भी टपकती रहीं और वह परेशान होकर इधर-उधर करवटें बदलता रहा।

शेखचिल्ली बेवक़ूफ़ तो था ही। उसे इस बात का पता नहीं लग सका क़ी आधिर पेड़ पर से क्या चीज उसके बदन पर टपकती है। निदान लाचार होकर वह वहां से उठा और घर के भीतर घुसकर एक कोठरी में जाकर सो रहा। उस कोठरी के अंदर घुनी हुई रूई राखी हुई थी। शेखचिल्ली को नर्म-नर्म रूई मिली तो उसी में आराम के साथ जाकर सो रहा। उसके बदन के चारों और शहद तो लिप्त हुआ था ही, अब धुनी हुए रुई उसी के साथ बदन भर में चारों और चिपक गयी और उसका बदन और उसकी शक्ल अजीब किस्म की हो गयी।

सुबह हुई तो शेखचिल्ली की औरत कुछ रुई निकालने उस कोठरी में घुशी। तब तक शेखचिल्ली जाग उठा था। उसको ऐसे रूप में देखकर उसकी औरत चीख उठी उसने हिम्मत बांधकर पुछा तुम कौन हो? शेखचिल्ली ने जोर से डांट कर कहा-'चुप'

वह बहार भागी और अपनी माँ से जाकर कहा-अम्मा! उस रूई वाली कोठरी में 'चुप' घुस आया है। उसकी शक्ल बहुत भयानक है।

यह सुनकर उसकी माँ ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। कई लोग उस कोठरी में घुसे। शेखचिल्ली को देखकर सबने पुछा- तुम कौन हो?

'शेखचिल्ली ने फिर चिल्लाकर कहा-चुप'
अब तो उसका ऐसा रूप देखकर सबकी सिट्टी-पिट्टी गम हो गयी। सब समझे चुप नाम क़ी कोई भयानक बला घर में घुस आई है। उसे निकालने के लिये किसी सयाने को बुलाना चाहिए।

कई एक ओझा मौलवी बुलाए गए। सबने कितने ही मंत्र-जंत्र किए मगर वह चुप नाम की बला नहीं मिकली। आखिर हार कर मौलवियों ने सलाह दी कि आप लोग यह मकान खाली करके किसी दूसरे में चले जाइए, वरना वह बला आप लोगों का सत्यानाश कर देगी।

शेखचिल्ली के ससुराल वालों ने यह मकान खाली कर दिया और दूसरे मकान में चले गए। शेखचिल्ली को अवसर मिल गया और वह रात्री के समय उस कोठरी से निकल कर बाहर की ओर भागा।

रास्ते में कुछ चोर दिखाई पड़े। आगे एक किसान के बहुत से भेड़ वगैरह बंधे थे। शेखचिल्ली चोरों के दर के मरे उन्हीं भेड़ बकरियों के बीच जा घुसकर बैठ गया। उधर वे चोर भी उसी तरफ आ पहुंचे।

चोरों ने केई एक भेड़ों को चुरा लिया। उन्हीं में शेखचिल्ली ने को भी रूई से लिपटा हुआ देख कोई दुम्बा भेड़ समझकर साथ लेकर भाग चले। भागते-भागते वे नदी के किनारे आ पहुंचे। इतने में सुबह होने लगी। उन्होंने सब भेड़ों को जमीन पर पटक दिया। यह देखकर शेखचिल्ली ने कहा- मुझे थोड़ा धीरे से पटकना।

उसकी आवाज सुनकर चोरों की नानी मर गई। उन्होंने समझा कि यह कोई भेड़ के रूप में भयानक बला है जो कि इस तरह बोलती है। उन्होंने शेखचिल्ली को पानी में फ़ेंक दिया और भाग चले।

उधर पानी में शहद घुल जाने के कारण शेखचिल्ली के बदन पर चिपकी हुई रूई साफ़ हो गई उसने बदन मल मल कर स्नान किया और सुबह होते ही ससुराल आया। दूसरे मकान में जाकर अपने ससुर को मिला और पूछा- आपने मकान क्यों छोड़ दिया।

ससुर ने कहा- मेरे मकान में कोई 'चुप' नाम की बला घुस गई है।

शेखचिल्ली ने झूठ-मूठ जाकर कोई मंत्र पढ़ दिया और फिर कहा-वह बाला चली गई।

आखिर सब लोग उसी मकान में चले आए।

शेखचिल्ली की बड़ी खातिरदारी हुई। वह सस्रुआल में ही रहने लगा।

एक दिन उसने ससुर से कहा- मैं कोई कारोबार करना चाहता हूँ। मुझे एक गाडी बनवा दीजिये। दिन में लकडियाँ काटूंगा और गाडी में लाद कर बाजार में बेचूंगा। ससुर ने एक बैलगाड़ी बनवा दी। शेक्चिल्ली ने जंगल से लकडियाँ लाने के लिये बैलगाड़ी जोती, बैलगाड़ी लेकर वह चला तो कुछ आगे जाकर गाडी जंगल में चर्र चूं चर्र चूं की आवाज करने लगी। शेख्चिली ने सोचा-यह मेरे कारोबार का पहला दिन है और यह गाडी साली अपशकुन कर रही है। आरे की मदद से गाडी को काटकर टुकडे-टुकडे कर दिया तथा उसे वहीं फैंक-फांक कर आगे लकड़ी काटने चल दिया।

शेखचिल्ली एक मोटा पेड़ देखकर उसी पर चढ़ गया। एक बहुए ही मोती डाल पर जा बैठा और कुल्हाड़ी से काटकर जब थक गया तो आरा हाथ में उठाकर उसी से उसने उस डाल को काटना शुरू किया।

इतने में एक आदमी नीचे गुजरा। उसने जब शेखचिल्ली को डाल काटते देखा तो ठहर गया। गौर से देखने पर उसको मालूम हुआ कि शेख्चिल्ले उसी डाल को डाट रहा था जिस पर कि वह बैठा हुआ है।

उसने कहा-अरे मूर्ख! तू जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है। इस तरह तू डाल के साथ-साथ खुद भी नीचे गिर जाएगा।

शेखचिल्ली ने कहा-अरे जा जा! मैं भला जमीन पर कैसे गिर सकता हूँ।

वह आदमी वहीं तहर गया। थोड़ी देर में डाल कट गई और डाल के साथ-साथ शेखचिल्ली भी नीचे आ गिरा।

तब शेखचिल्ली उसको कहने लगा-आप तो बहुत बड़े आदमी मालूम होते हैं। मुझे यह तो बताइये कि मैं कब मरूँगा?

इस पर उस आदमी ने कहा-मैं यह सब नहीं जानता मगर शेखचिल्ली कहाँ छोड़ने वाला था। उसने उसका पीछा पकड़ लिया तो उसने छुड़ाने के लिये कहा-तू आज शाम को मर जाएगा।

यह कहकर वह आदमी तो चला गया। अब शेखचिल्ली ने सोचा कि मुझे आज शाम को मर ही जाना है तो अच्छा है कि पहले से ही कब्र के अंदर लेट जाऊं ताकि मेरे मरने के बाद मेरे रिश्तेदारों को कब्र खोदनी न पड़े।

ऐसा सोचकर वह उसी जंगल में एक गड्ढा खोदकर उसमें लेट रहा।

उसी तरफ से एक आदमी जा रहा था। उसके पास एक मटका था। वह आवाज लगाता जा रहा था कि अगर कोई इस मटके को मेरे घर तक पहुंचा दे तो मैं उसे दो पैसे दूंगा।

यह सुनकर शेखचिल्ली झटपट कब्र के अंदर से उठकर खडा हुआ और कहने लगा-लाओ! मैं तुम्हारा मटका ले चलता हूँ।

यह सुनकर उस आदमी ने वह मटका शेखचिल्ली के हवाले किया। शेखचिल्ली उसे लेकर चल पडा। रास्ते में यह सोचता जा रहा था कि मुझे उसकी मजदूरी के दो पैसे मिलेंगे। दो पैसे का एक अंडा खरीदूंगा उसे अंडे से मुर्गी पैदा होगी। उस एक मुर्गी से बहुत सी मुर्गियां पैदा होंगी। उन मुर्गियों को बेचकर एक बकरी खरीद लूंगा। बकरी से बहुत सी बकरियां होंगी उन बकरियों को बेचकर एक गाय खरीदूंगा। उस गाय से बहुत सी गायें पैदा होंगी। उन्हें बेचकर घोडी से बहुत सी घोड़ियाँ पैदा होंगी। उन सबको बेचकर बहुत से रूपये मिलेंगे। तब मैं अपना मकान बनाऊंगा। फिर एक घोड़े पर बैठकर बाजार में सैर करने निकालूँगा। फिर कारोबार करके बहुत सी दौलत पैदा करूंगा। फिर घर में ठाठ से शाम को बैठक में हुक्का गुद्गुदौंगा, औरत बच्चों को मेरे पास खाना खाने के लिये भेजेगी।

उस वक्त मैं हुक्का गुडगुडाते हुए जोरों से सिर हिलाकर कहूंगा-अभी खाना नहीं खाउंगा।

शेखचिल्ली ने ज्योंही अपने ख्यालों में जोरों से सिर हिलाया कि वह मटका सिर पर से गिरकर फूट गया और अंदर का सारा सामान मिट्टी में गिरकर खराब हो गया।

इस अपर उस आदमी ने शेखचिल्ली की अच्छी खासी मरम्मत की। शेखचिल्ली का सपना टूट गया।


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25 मार्च 2010

विक्रम/वेताल - गुणगान की आकांक्षा



धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा और अपने कंधे पर डाल लिया। फिर यथावत्‌ श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, "राजन्‌, मेरी समझ में नहीं आया कि किन अद्‌भुत शक्तियों को पाने के लिए आधी रात को यों कठोर परिश्रम किये जा रहे हो। परंतु हाँ, कुछ ऐसे व्यक्ति विशेष हैं, जो साहस से भरे अद्‌भुत कार्य करते हैं और अद्‌भुत शक्तियॉं प्राप्त करते हैं। पर सही समय पर वे अपनी शक्तियाँ खो बैठते हैं। प्राण भीति के वश में आकर अस्तव्यस्त विचारों के कारण भी कुछ लोगों में ऐसे परिवर्तन होते रहते हैं। वितंग नामक एक साहसी युवक भी ऐसे अस्तव्यस्त विचारों के वशीभूत हो गया और अकस्मात्‌ उसमें परिवर्तन आ गया। उसकी कहानी थकावट दूर करते हुए मुझसे सुनो।'' फिर वेताल यों कहने लगाः

विक्रम, विलोप देश का राजा था। उसके शासन काल में एक बार राक्षस उसके राज्य पर टूट पड़े। राक्षस पाताल से अकस्मात्‌ भूमि पर आकर मानवों को खाने लगे। विक्रम की समझ में नहीं आ रहा था कि राक्षसों से प्रजा को कैसे बचाया जाए। तब उस समय उससे मिलने विरुपाक्ष नामक एक मुनि आये। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और अपनी समस्या बतायी।

तपोसंप विरुपाक्ष के पास एक महिमावान दर्पण था। वे पाताल लोक के राक्षस राजा महाबलि को उसमें ले आये और विक्रम की समस्या उससे बतायी।

महाबलि ने सविनय कहा, "मुनिवर, बाघ का आहार हिरण है तो राक्षस का आहार है, मानव। इसे दैव निर्णय न मानिये और आप ही इस समस्या का न्यायपूर्ण परिष्कार मार्ग सुझाइये।''

विरुपाक्ष ने कहा, "आगे से राक्षस पापी मनुष्यों को ही खाएँ और पुण्यवानों को छोड़ दें। जो राक्षस इस नियम का भंग करेंगे, वे दांतों के असहनीय दर्द के शिकार होंगे। यही उनका दंड होगा। साहसी मानव उस राक्षस के मुँह में प्रवेश करेगा और अभायरण्य की जड़ी-बूटियों से दंत धावन करेगा, तभी दांतों का दर्द कम होगा।''

महाबलि ने इस शर्त को मान लिया और दर्पण से ग़ायब हो गया। फिर मुनि ने वह महिमावान दर्पण राजा विक्रम को दे दिया और कहा, "तुम्हें किसी तक़लीफ़ का सामना करना पड़े तो मुझे याद करो। मैं इस दर्पण में तुम्हें दिखायी दूँगा और परिष्कार का मार्ग सुझाऊँगा।'' यों कहकर वे चले गये।

इसके बाद राक्षसों द्वारा खाये जानेवाले मानवों की संख्या में कमी होती गयी। विक्रम और महाबलि के बीच में जो समझौता हुआ, उसका प्रचार देश भर में हुआ, जिस वजह से सब विश्वास करने लगे कि जो मानव राक्षसों से मारे जा रहे हैं, वे सब पापी हैं। यों देश के नागरिकों में पाप भीति भी बढ़ती गयी।

उस काल में अभयारण्य के निकट ही स्थित विकासपुर नामक गवाँ में श्री तंग नामक एक भूस्वामी रहा करता था। वह हर किसी की सहायता करता था। लोग उसे बहुत मानते भी थे। वितंग उस भूस्वामी का एकलौता बेटा था। बड़े ही लाड़-प्यार से उसकी परवरिश हुई। शायद इसी वजह से वह बड़ा ही स्वार्थी बन गया। घर में सबके सब उसकी तारीफ़ करते थे। वह चाहता था कि बाहर के सबके सब बालक भी उसकी तारीफ़ करते रहें। जो उसकी तारीफ़ नहीं करते थे, उन्हें वह गालियाँ देता था । इस वजह से बच्चे उससे दूर रहते थे। इस विषय को लेकर उसने दादा से शिकायत की तो उन्होंने कहा, "यदि तुम चाहते हो कि सब तुम्हारी प्रशंसा करें तो उनके साथ तुम्हारा व्यवहार अच्छा होना चाहिये। इसके सिवा कोई दूसरा मार्ग नहीं है।''

"जो काम मुझे पसंद हैं, वे ही करूँगा। उन्हें जो पसंद हैं, वे काम मैं किसी भी हालत में नहीं करूँगा। जो भी हो, उन्हें मेरी तारीफ़ करनी ही होगी।'' वितंग ने दृढ़ स्वर में कहा।

दादा समझ गये कि अब भी वितंग की बुद्धि का विकास नहीं हुआ। उन्होंने उसे उस गाँव के महापंडित विद्यानाथ के पास विद्याभ्यास के लिए भेजा। सबकी प्रशंसा पाने के उद्देश्य से वितंग ने बड़ी मेहनत करके पढ़ाई की। एक ही साल के अंदर उसने अपने को सबसे श्रेष्ठ साबित कर दिया। पर, उन विद्यार्थियों से इस बात पर हमेशा झगड़ा करता रहता था, जो उसकी प्रशंसा नहीं करते थे। वे तंग आ गये और उन्होंने गुरु से इसकी शिकायत की। गुरु ने उससे कैफ़ियत माँगी।

"मैं आपके सब शिष्यों में से श्रेष्ठ शिष्य हूँ। आपको तो मेरी अक्लमंदी की तारीफ़ करनी चाहिये, परंतु आप तो उनकी तरफ़दारी करते हुए मुझसे कैफ़ियत माँग रहे हैं। यह तो बड़ी अजीब बात है,'' वितंग ने कहा। "मानता हूँ कि तुम सबसे अधिक अ़क्लमंद हो। पर साथी शिष्य तुम्हें पसंद नहीं करते, इसलिए तुम्हारी अक्लमंदी तुम्हारे ही उपयोग में नहीं आ रही है। धन हो या अक्लमंदी, उपयोग में आने पर ही उसका मूल्य है। अगर वह उनके काम नहीं आया तो बड़ों की भी कोई तारीफ़ नहीं करता। तुम चाहते हो कि सब, तुम्हारी प्रशंसा करें तो ऐसे काम भी करो, जो सबके लिए लाभदायक हों,'' विद्यानाथ ने उसे समझाया।

वितंग को आचार्य की बात पसंद नहीं आयी और अपने को उसने नहीं बदला। यों कुछ साल गुज़र गये। विद्यानाथ ने एक दिन सवेरे अपने शिष्यों को अभयारण्य जाकर जड़ी-बूटियाँ ले आने को कहा। सबके सब गये, पर वितंग विद्यालय में ही रह गया।

विद्यानाथ के शिष्यों ने जब अभयारण्य में प्रवेश किया तब महासुर नामक राक्षस ने भी वहाँ क़दम रखा। कुछ दिन पहले उसने एक पुण्यवान को खा लिया था। इस वजह से वह दांतों के असहनीय दर्द से पीड़ित रहने लगा। वह एक साहसी मानव की खोज में अभयारण्य आया। विद्यानाथ के शिष्यों को देखकर उसने उनसे कहा, "मेरे मुंह में प्रवेश करो और इन जड़ी-बूटियों से मेरा दंत धावन करो।'' उसे देखते ही शिष्य भयभीत हो गये और उसकी बातें सुनकर बेहोश हो गये।

जब शिष्य बहुत समय तक नहीं लौटे तब विद्यानाथ ने उन्हें ढूँढ़ने के लिए वितंग को भेजा। उसने जंगल में महासुर को देखा। महासुर ने तुरंत उसे अपनी हथेली में लिया और अपनी इच्छा प्रकट की। वितंग ने बिना भय के कहा, "तुम्हारे मुंह में प्रवेश करके जड़ी-बूटियों से तुम्हारा दंत धावन करूँगा तो तुम्हारा दर्द कम हो जायेगा, पर इससे मुझे क्या लाभ होगा?''

"तुम अगर मेरे दर्द को दूर करोगे तो मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा।'' महासुर ने कहा।

"जो काम मुझे पसंद हैं, वे ही काम मैं करता हूँ। फिर भी, सबको मेरी प्रशंसा करनी होगी। यही मेरी इच्छा है। क्या यह काम तुम कर सकते हो?'' वितंग ने पूछा।

"मेरे पास स्तुतींद्र नामक अद्‌भुत शक्ति है। मेरे दांत का दर्द दूर करोगे तो मैं तुम्हें वह दे दूँगा। तब सभी तुम्हारी प्रशंसा करेंगे।'' कहते हुए महासुर ने उसे अपनी गोद में डाला।

राक्षस की गोद में बेहोश पड़े साथी शिष्यों से उसने जड़ी-बूटियाँ लीं। महासुर ने उसे अपने मुँह में डाल लिया तो उसने निधड़क उसके सब दांतों का धावन किया, जिससे उसका दर्द दूर हो गया। महासुर ने उसे मुंह से बाहर निकाला और कहा, "अब स्तुतींद्र तुम्हारे वश में हो गया। जब तक तुम चाहोगे, वह शक्ति तुम्हारे पास रहेगी।

तुम बुरा करो या अच्छा, सब तुम्हारी प्रशंसा करेंगे और तुम नाम कमाओगे।'' यों कहकर महासुर वहाँ से चला गया। तब से सब शिष्य उसकी तारीफ़ के पुल बांधने लगे। उसके धैर्य की तारीफ़ करने लगे। गुरु ने भी कह दिया, "अब तुम सब विद्याओं में पारंगत हो गये।'' एक दिन ग्रामाधिकारी ने उससे मिलकर कहा, "मैं अब से तुम्हारा अनुचर बनकर रहूँगा और तुम्हारी हर बात को मानूँगा।''

विकासपुर में वितंग की बात का विरोध करनेवाला कोई नहीं रहा। स्तुतींद्र की महिमा के कारण सब उसकी भरपूर प्रशंसा करने लगे। इसलिए वह खुल्लमखुल्ला अन्याय करने लगा। गाँव में कोई अच्छा काम हुआ तो लोग कहने लगे कि यह सब वितंग के कारण ही हो रहा है। कष्ट झेलने पड़े तो वे समझने लगे कि यह सब विधि लीला है। स्तुतींद्र की महिमा के कारण वितंग की ख्याति देश भर में फैल गयी। सब ग्रामाधिकारी वितंग के अनुयायी और दुराचारी बन गये। क्रमशः राजा को भी उसके बारे में मालूम हुआ। राजा विक्रम ने गुप्तचरों को भेजकर विषय की जानकारी पायी। अब राजा को लगने लगा कि वितंग का प्रभाव जारी रहा तो सर्वनाश होकर रहेगा। वह घबरा गया और उसने महिमामयी दर्पण का आश्रय लिया।

विरुपाक्ष उस दर्पण में प्रत्यक्ष हुए और संपूर्ण विषय की जानकारी पाने के बाद उन्होंने कहा, "मैं शीघ्र ही महाबलि से मिलूँगा और एक साल के बाद तुम्हारे देश में जो-जो दुराचारी और अनैतिक लोग हैं, उन्हें एकसाथ निगल डालने के लिए राक्षसों को भेजने का प्रबंध करूँगा। जब लोगों को यह मालूम हो जायेगा, तब एक ही साल के अंदर तुम्हारे देश के सभी अनैतिक लोगों में परिवर्तन आ जायेगा। जिनमें परिवर्तन नहीं आयेगा, वे राक्षसों का आहार बनेंगे।''

"आपका बताया उपाय सही है, परंतु समस्या तो वितंग से जुड़ी है। वह लोगों को सता रहा है, उनके साथ अन्याय कर रहा है, पर स्तुतींद्र की शक्ति के प्रभाव से सब उसकी प्रशंसा में लगे हुए हैं। समस्या तो यह है कि उसे कैसे नियंत्रण में रखें,'' विक्रम ने दुख-भरे स्वर में कहा।


"दुखी मत होना। वितंग की प्रशंसा करते हुए शिला-लेख लिखवाना। साथ ही घोषणा करवा देना कि दुराचारी व अनैतिक मानवों का किस-किस प्रकार की यातनाएँ सहनी होंगी। तुम्हारी समस्या का हल हो जायेगा।'' विरुपाक्ष यों कहकर ग़ायब हो गये।

विरुपाक्ष के कहे अनुसार, विक्रम ने किया। साल ही के अंदर बहुत लोगों के साथ-साथ वितंग में भी परिवर्तन हुआ। अब उसने स्तुतींद्र का उपयोग छोड़ दिया और अच्छे काम करने लगा। विलोम देश धर्मात्माओं के स्थल में बदल गया।

वेताल ने यह कहानी सुनायी और फिर विक्रम से कहा, "राजन्‌, वितंग बुरे काम करता रहा, पर चाहता रहा कि लोग उसकी प्रशंसा करें। पर अकस्मात ही उसमें परिवर्तन आया। इसका क्या कारण है? प्राण भीति के कारण मनुष्यों के विचारों में आमूल परिवर्तन होते हैं। वितंग में आये परिवर्तन की वजह क्या यह नहीं है? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रहोगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''

विक्रमार्क ने उसके संदेहों को दूर करते हुए कहा, "मानता हूँ कि निस्संदेह भीतियों में से सबसे भयंकर भीति है, प्राण भीति।

"परंतु, वितंग में जो परिवर्तन हुआ, इसका यह कारण नहीं है। कुछ लोगों में प्राण भीति से बढ़कर गुणगान की इच्छा प्रबल होती है। वितंग में यह स्वभाव था कि लोग उसकी प्रशंसा करें।

"अंत तक उसका यह स्वभाव बना रहा। परंतु तदनंतर वह समझ गया कि प्रजा यह विश्वास करेगी कि राक्षस का आहार जो बनेंगे वे बुरे लोग हैं। अगर ऐसा नहीं होना हो तो एक ही मार्ग है, अच्छा बनकर रहना। गुणगान की आकांक्षा रखनेवाले अच्छे काम ही नहीं करते, बल्कि बुरे काम करना भी छोड़ देते हैं। वितंग ने यही काम किया। स्तुतींद्र की वजह से जो प्रशंसाएँ प्राप्त हुईं, उनसे बढ़कर राजा के शिला लेखों से उसे संतृप्ति प्राप्त हुई, इसीलिए उसने स्तुतींद्र को त्याग दिया। यह स्पष्ट है कि वितंग में जो परिवर्तन हुआ उसका कारण था प्राण भीति नहीं, बल्कि उसके गुणगान की आकांक्षा।'' राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और पेड़ पर पुनः चढ़ बैठा।

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यक्ष पर्वत - 1



लगभग सौ वर्ष पूर्व नर्मदा नदी तट के पास के जंगलों में आदिवासी लोग रहा करते थे। इन्ही जंगली जातियों में से गण्डक मृग जातिवाले भी थे। उन्होंने जंगल में अपना अलग गाँव बसाया, जिसका नाम रखा गया अरण्यपुर। वे गण्डक मृगों को पालते थे और उन्हीं से खेती का भी काम करवाते थे। उन्हीं पर बैठकर यात्राऐं भी करते थे।

इसी कारण उनकी जाति गण्डक मृग जाति कहलायी गयी। इस जाति का नया राजा बना अरण्यमल। इसी जाति का गणचारी नामक व्यक्ति उसे अधिकारच्युत करने की कोशिश में लगा हुआ था। दो क्षत्रिय युवकों की सहायता से अरण्यमल ने गणाचारी के षडयंत्र का राज़ खोल दिया और उसे मरवा डाला। उसका मृत शरीर बाघ का आहार बना।

अरण्यमल के सिंहासन पर आसीन हुए एक साल गुज़र गया। गण्डक जातिवालों ने उस दिन वार्षिकोत्सव मनाने की ठानी और इसके लिए आवश्यक प्रबंध किया गया। एक टीले पर सुसज्जित सिंहासन पर उसे बिठाया और वे उत्सव मनाने लगे। अरण्यमल की खुशी का ठिकाना न रहा। इतना आदर पाकर वह मन-ही-मन गर्व महसूस करने लगा।

ऐसे समय पर गण्डकमृग जाति के दो युवक मृगों पर बैठकर तेज़ी से वहाँ आये। उतरकर वे सीधे अरण्यमल की ओर बढ़ने लगे। अरण्यमल का शिलामुखी नामक एक मंत्री था। उसने उन युवकों को रोका और उनसे कहा,"क्या भूल गये कि यहाँ मंत्री बैठा हुआ है। मेरी अनुमति के बिना ही राजा से मिलना चाहते हो? कदापि संभव नहीं।"

युवकों में से एक ने कहा, "महोदय, पहाड़ के पास के हमारे ज्वार के खेतों में कुछ नये लोग घुस आये और भुट्टों को तोड़कर ले जा रहे हैं। हमने आज तक उन नये जंतुओं को नहीं देखा, जिनपर वे सवार होकर आये।" मंत्री शिलामुखी ने पूछा, "उन नये जंतुओं की खासियत क्या है? असल में वे होते कैसे हैं ?" "वे हाथी जैसे ऊँचे हैं। बाघ की तरह के उनके पैर हैं। बगुलों की तरह उनके भी गले टेढ़े हैं और लंबे भी।"

आगतों ने आश्चर्य भरे स्वर में उनका वर्णन किया। शिलामुखी उन दोनों को राजा के पास ले गया और उसे उन नये जंतुओं के बारे में पूरा विवरण सुनाया। "हमारे लोगों ने बहुत मेहनत की और फ़सल उगायी। उन लुटेरों की इतनी हिम्मत कि वे हमारी फ़सल लूटकर ले जाएँ। तुम लोगों को उनपर तुरंत धावा बोलना था, उल्टे उन विचित्र जंतुओं को लेकर आश्चर्य प्रकट कर रहे हो?" अरण्यमल ने नाराज़ होकर कहा।

अरण्यमल के ऐसा कहने पर जनता को संबोधित करते हुए मंत्री ने ऊँचे स्वर में कहा, "सुनो, सुनो, अब हम यह उत्सव रोक दें। लुटेरे हमारी फ़सल लूटकर ले जा रहे हैं। उनका नाश करके हमें अपनी फसल को बचाना है। यह हमारा प्रथम कर्तव्य है।" मंत्री से ये बातें सुनते ही गण्डक मृग जाति के लोग उत्तेजित हो उठे। वे भाले, तलवारें और धनुष-बाण लेकर गण्डकमृगों पर बैठकर निकल पड़े।

मंत्री शिलामुखी भी उनके साथ-साथ गया। वे सब जब अपने खेतों के पास पहुँचे तब वहाँ का दृश्य देखकर घबरा गये। वे ड़र के मारे रुक गये। कुल लुटेरों की संख्या होगी लगभग पच्चीस से लेकर तीस तक। वे भुट्टों को तोड़कर उन विचित्र जंतुओं की पीठों पर लदी थैलियों में भर रहे थे। लुटेरों ने भी देखा कि गण्डकमृग जाति के लोग भाले, तलवारें और धनुष-बाण लिये आ रहे हैं और किसी भी क्षण उनपर आक्रमण करनेवाले हैं तो वे भी भयभीत हो गये। अब दोनों मन ही मन एक-दूसरे से डरने लगे।

लुटेरों में से एक ने भाला उठाकर शत्रुओं की ओर दिखाते हुए अपने लोगों से कहा, "देखो, उधर देखो! निर्भय होकर जब ये लोग गण्डक जैसे खूंख्वार जानवरों को ही अपनी सवारी बनाकर निधड़क आ-जा सकते हैं तब हम अनुमान लगा सकते हैं कि वे कितने साहसी हैं ! हम उनके सामने कैसे टिक सकते हैं ?"

लुटेरों के सरदार ने गण्डकमृग जाति के लागों को ग़ौर से देखा। उसे लगा कि वे उनपर हमला करने के लिए आनाकानी कर रहे हैं; उधेड़बुन में हैं; शायद साहस नहीं कर पा रहे हैं। उनकी इस असमंजसता का लाभ उठाने के उद्देश्य से लुटेरों के सरदार ने अपने अनुचरों से कहा, "ओ उष्ट्वीरो, गण्डकमृग जातिवाले हमें देखकर डर रहे हैं। हमपर हमला करने से झिझक रहे हैं। खुद देख लो। एक भी आगे बढ़ने का साहस नहीं कर रहा है। यही अच्छा मौ़क़ा है। घेर लो और उन्हें तितर-बितर कर दो।"

शिलामुखी आगे ब़ढ़ते हुए उन शत्रुओं को देखकर थर-थर कांपने लगा। उसने अपने लोगों से कहा । "इतने ऊँचे जंतुओं पर सवार ये लोग आसानी से हमें खत्म कर देंगे। लौटो और दूर के उन पेड़ो के पीछे छिप जाओ!" शिलामुखी अपने गण्डकमृग को घुमाये, इसके पहले ही लुटेरे तेज़ी से वहाँ पहुँच गये और उन्हें घेर लिया।

शिलामुखी साहसपूर्वक उनका मुक़ाबला करता रहा और जय अरण्यमाता कहकर चिल्लाता हुआ अपने अनुचरों से बोला, "इन लुटेरों का सामना करना हमारे बस की बात नहीं है। भागो अरण्यपुर की ओर!" तब पास ही के पेड़ की डालियों में से एक आवाज़ सुनायी पड़ी,"महामंत्री शिलामुखी, डरो मत ! भागो मत! लुटेरे जिसपर सवार होकर आये हैं, उन्हें ऊँट कहते हैं। इनके बारे में मैं पहले ही सुन चुका हूँ ।

वे कोई भयानक जंतु नहीं हैं। अपने गण्डक को पीछे घुमाओ और तुम्हारे पीछे-पीछे आते हुए ऊँट से भिड़ा दो। गण्डक अपनी सींगों से उसे घायल कर देगा। उसकी सींग वज्रायुध की तरह कठोर है।" शिलामुखी को यह जानने में देर नहीं लगी कि वह आवाज़ क्षत्रियों के पास ही के कुटीर में रहनेवाले स्वर्णाचारी की आवाज़ है। किन्तु लुटेरों से लड़ने का साहस उसमें नहीं रहा।

वह अपने अनुचरों के साथ-साथ अरण्यपुर की ओर भागने लगा। स्वर्णाचारी की चेतावनी को लुटेरों के सरदार ने सुन लिया था। वह उस पेड़ के पास गया, जहाँ स्वर्णाचारी छिपा हुआ था। वह चिल्लाकर बोला "कौन हो तुम? हमारे ही शत्रुओं को उपाय सुझा रहे हो? आहा, तुम तो बड़ी अक़लमंदी से भरी बातें कर रहे हो"। कहता हुआ वह ऊँट पर चढ़ गया और भाला ऊपर उठाया।

स्वर्णाचारी भय से काँपने लगा। पेड़ पर से उतरते हुए वह कहने लगा, "भाई, मुझे मारकर पाप न कीजियेगा। सभी शास्त्र कहते हैं कि वास्तुविद् को मारने से नरक मिलेगा।" सरदार ज़ोर से हँस पड़ा और कहा, इतने बड़े वास्तुविद् हो तो तुम्हें शहरों में रहना था। इस अरण्य में, इन चट्टानों के बीच में तुम्हें घूमने-फिरने की क्या आवश्यकता है? "देखिये श्रीमान !

गृह-निर्माण कार्य से मेरा और मेरे परिवार का पेट भर नहीं रहा है। इस पेशे से मैं कुछ खास कमा नहीं पा रहा हूँ। यंत्र निर्माण के रहस्यों की भी मुझे जानकारी है। विघ्नेश्वर पुजारी की सहायता से मैने एक मायावी हाथी की सृष्टि की है। किन्तु दो क्षत्रिय युवकों ने मेरे इस प्रयत्न को भी विफल कर दिया।

मेरे पेश को उनके कारण बड़ी हानि पहुँची। इसीलिए मैंने पद्मपुरी छोड़ दिया और इस अरण्य में आ गया। पास ही के एक कुटीर में वे दोनों क्षत्रिय युवक रह रहे हैं। उनसे थोड़ी दूरी पर मैंने और विघ्नेश्वर पुजारी ने वास्तु सम्मत एक गृह का निर्माण किया और उसी में हम दोनों रह रहे हैं" स्वर्णाचारी ने बताया। "वे क्षत्रिय युवक यहाँ रहकर क्या कर रहे हैं? वे कहीं तपस्या तो नहीं कर रहे हैं ?"

सरदार ने पूछा। "भला उन्हें तपस्या करने की क्या आवश्यकता है। वे दोनों क्षत्रियोचित विद्याओं में सिद्धहस्त हैं। शिष्टों की रक्षा करना उनकी दैनिक वृत्ति है", स्वर्णाचिरी ने कहा। सरदार ने व्यंग्यपूरित वाणी में पूछा, "गण्डकमृग की जाति के लोगों की फ़सल को लूटना क्या दुष्टकार्य माना जाता है ?"

उसका जवाब देने में स्वर्णाचारी थोड़ी देर तक सकपकाया और फिर बोला, "आपने बड़ा ही जटिल सवाल पूछा यह अर्थभरित मर्म भरा प्रश्न है। मेरी समझ में नहीं आता कि इसका क्या उत्तर दूँ ?" "अच्छा, मुझे उन क्षत्रियों के निवास स्थल पर ले जाओ !", सरदार ने उसे आज्ञा दी। स्वर्णाचारी ताड़ गया कि सरदार उन दोनों क्षत्रिय युवकों को मार डालना चाहता है, किन्तु विवश होकर उनके कुटीर की ओर ब़ढ़ा।

उस कुटीर के पास पहुँचने के पहले स्वर्णाचारी चाहता था कि उन युवकों को सावधान दूँ,जिससे वे सतर्क हो जाएँ और अपनी रक्षा कर सकें। इसलिए उसने सरदार से कहा, "साहब, आप यहीं ठहर जाइये। मैं देख आता हूँ कि वे दोनों कुटीर में हैं या नहीं!" लुटेरों के सरदार ने मुस्कुराकर कहा "ओहो, बड़े ही चालाक हो। तुम्हारीं चालें मेरे पास नहीं चलेंगी।

सिंधु के रेगिस्तान से निकलकर मैं इन पर्वतीय प्रांतो में आया हूँ। अपने इस सफर के दौरान में, तुम जैसे बहुत-से लोगों को देख चुकाहूँ । तुम्हारी बातों पर विश्वास कर बैठनेवाला कोई मूर्ख नहीं हूँ मैं।" दोनों मिलकर कुटीर के पास गये। बाँस की फट्टी से बना दरवा़ज़ा बंद था।

लुटेरों का सरदार और उसका एक अनुचार दरवाज़ा खोलकर अंदर गये। वहाँ उन्होने देखा कि बाघ, रीछ जैसे जानवरों के चमड़े दीवारों पर लटक रहे हैं। उन्हें वहाँ एक कोने में रखे धनुष-बाण भी दिखायी पड़े। सरदार ने अपने अनुचार को आज्ञा दी कि वह सारा सामान अपने साथ ले आये। बाहर आकर उसने स्वर्णाचारी को ऊँट पर बैठने का आदेश दिया। स्वर्णाचारी जान गया कि उसकी जान खतरे में है।

सरदार ने जबरदस्ती उसे ऊँट पर चढ़ा दिया। तब स्वर्णाचारी ज़ोर ज़ोर से "मुझे बचाओ, मुझे बचाओ" कहकर चिल्लाने लगा। विघ्नेश्वर पुजारी को यह चिल्लाहट सुनकर संदेह हुआ कि स्वर्णाचारी जैसा बुद्धिमान अपनी रक्षा के लिए चिल्ला पड़े? अवश्य ही वह किसी भारी संकट में फंस गया होगा। मुझे जाकर अवश्य ही उसे बचाना होगा। यों सोचता हुआ वह क्षत्रिय युवकों के कुटीर की ओर बढ़ा।


उसने वहाँ पहुँचने पर देखा कि स्वर्णाचारी ऊँट पर बैठा हुआ है और लुटेरों का सरदार भार्ता दिखाते हुए उसे ड़रा-धमका रहा है। विघ्नेश्वरपुजारी के दिमाग में बिजली की तरह एक उपाय कौध उठा। कुटीर में बसे क्षत्रिय युवक सिंह को उसके वचन में ही ले आये थे और प्यार से उसे पाल रहे थे।

उन्होंने उसका नाम रखा परशुराम। क्षत्रिय युवकों के साथ-साथ स्वर्णाचारी और विघ्नेश्वर पुजारी के साथ वह खूब हिल-मिल गया। जब क्षत्रिय युवक कुटीर में हों तो वह स्वच्छंदतापूर्वक इर्द-गिर्द निर्भय होकर घूमता रहता था। जब वे कुटीर में नहीं होते थे तब वे उसे कुटीर के पीछे के लकडियों से बने पिंजडे में बंद करके जाते थे। अब विघ्नेश्वर पुजारी को लगा कि उस सिंह को छोड दूँ तो स्वर्णाचारी को बचा सकता हूँ और लुटेरों को भगा सकता हूँ।

स्वर्णाचारी की चिल्लाहटें सिंह को क्रोधित करेंगी और वह लुटेरों पर झपट पड़ेगा। चूँकि वह हम दोनों से भी हिल-मिल गया है, अतः अवश्य ही स्वर्णाचारी की रक्षा के लिए कूद पड़ेगा। विघ्नेश्वर पुजारी दौड़ा गया और उसने पिंजडा खोल दिया। सिंह गुर्राता हुआ बाहर आया। बाहर आते ही उसने सिर उठाया और ऊँट को देखा। फिर वह गरजता हुआ विघ्नेश्वर पुजारी की ओर मुडकर देखता रहा।

विघ्नेश्वर पुजारी ने इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहा। उसने थोड़ी भी देरी न करते हुए चुटकी बजाकर सिंह को उकसाया। जिससे वह लुटेरों पर हमला कर बैठे। स्वर्णाचारी ने यह दृश्य देख लिया और जान-बूझकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, "परशुराम...! परशुराम...!! मेरी रक्षा करो।" सिंह ने स्वर्णाचारी को पहचान लिया। वह अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो गया और केसर को एक बार झुलाया।

भयंकर रूप से गरजता हुआ ऊँटों की तरफ़ बड़ी ही तेज़ी से लपका । सिंह को देखते ही ऊँट घबराकर तितर-बितर हो गये। मुड़े बिना वे तेज़ी से भागने लगे। एक लुटेरा धडाम् से नीचे गिरा। सिंह उस पर लपका और उसके गले को पकड़ लिया।

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बीरबल की कथाएँ - मुँहतोड़ जवाब

बीरबल बादशाह अकबर ने दरबार के दरबारियों में सबसे चतुर था। वह अक्लमन्द, हाजिरजवाब और तेज था। इसलिए वह बादशाह का प्रिय पात्र बन गया।

कुछ दरबारी बीरबल से जलते थे जिनमें शाही हकीम जालिम खान भी शामिल था। वे ऐसे हालात पैदा करने की ताक में थे जो बीरबल को शाही दरबार से निकलने के लिए मजबूर कर दे। यह मौका उन्हें तुरन्त ही मिल गया।

बादशाह बीमार पड़ गये। हक़ीम जालिम खान को बुलाया गया। वह महल में जाने को तैयार हो ही रहा था कि कुछ दरबारी उसके घर पर आ गये।

‘‘मैं जल्दी में हूँ’’, हकीम बोला, ‘‘बादशाह सलामत बीमार हैं।’’

‘‘हम जानते हैं, इसीलिए हम आप से मिलने जल्दी चले आये।’’ एक दरबारी बोला।

‘‘हमलोगों का समय आ गया है। हम जो कहते हैं, वैसा कीजिये। फिर देखिये, बीरबल कैसे जान बचाता फिरेगा!’’ दूसरा दरबारी बोला।

‘‘मैं बीरबल को गड्ढे में गिराने के लिए दुनिया के आखिरी छोर तक जा सकता हूँ।’’ हकीम खीसें निकालता बोला।

सबसे बूढ़ा दरबारी हकीम के पास आकर उसके कान में कुछ बोला। हकीम की आँखें खुशी से चमक उठीं।

दरबारी विदा लेकर चले गये। हकीम महल की ओर दौड़ा। बादशाह पलंग पर लेटे हुए थे। एक मोटी कसीदाकारी की हुई रज़ाई से एड़ी से ठुड्डी तक शरीर ठका हुआ था। उनके चेहरे पर बेचैनी साफ दिखाई पड़ रही थी।

हकीम ने शहनशाह की नाड़ी की जाचँ-परख की और मन में यह निष्कर्ष निकाला कि शहनशाह की तबीयत कोई खास खराब नहीं है। काफी देर तक काम करने से थकान भर है और केवल कुछ दिनों के लिए विश्राम की जरूरत है। पर उसने बादशाह को यह सब नहीं बताया।

उसने बादशाह से कुछ और कहा, ‘‘यह गम्भीर रोग है, आलमपनाह। मेरे पास इसकी सही दवा है। फिर भी....’’ यह कह कर हकीम रुक गया। फिर बोला, ‘‘इस दवा का असर बहुत जल्दी होगा यदि इसे सॉंढ़ के दूध के साथ मिला कर लिया जाये।’’

‘‘सॉंढ़ का दूध?’’ बादशाह को यकीन नहीं हुआ।

‘‘हॉं, आलमपनाह! कुछ सॉंढ़ दूध देते हैं, हालांकि इन्हें खोज पाना कठिन है।’’ हकीम ने बताया।

‘‘लेकिन दूध देनेवाले सॉंढ़ का पता कौन लगायेगा?’’ बादशाह ने पूछा।

‘‘मैं समझता हूँ, आलमपनाह, कि इस कार्य के लिए सही व्यक्ति बीरबल है। वह अक्लमन्द है, चतुर है और बादशाह को उसने कभी निराश नहीं किया है।’’ हकीम ने सलाह दी।

‘‘बीरबल? क्या वह यह काम कर सकता है?’’ बादशाह ने नाराज होते हुए पूछा।

‘‘यदि कोई दूध देने वाले सॉंढ़ का पता लगा सकता है तो वह केवल बीरबल है, आलमपनाह!’’ हकीम ने जोर देकर कहा। उसने बादशाह को एक सप्ताह तक पूरी तरह विश्राम करने की सलाह दी। ‘‘यदि सम्भव हो सके तो इस चूर्ण को सॉंढ़ के दूध के साथ दिन में चार बार लेते रहिये। अन्यथा गाय के दूध के साथ ले सकते हैं हालांकि रोग देर से जायेगा।’’ हकीम ने एक नौकर को चूर्ण का डिब्बा दिया और बादशाह को सलाम करके बाहर आ गया।

बीरबल को बुलाया गया। तुरन्त बीरबल बादशाह के कमरे में हाज़िर होकर, ‘‘अब आपकी तबीयत कैसी है, शहनशाह?’’ बीरबल ने बादशाह को सलाम करके पूछा।

‘‘मैं ठीक नहीं हूँ बीरबल! हकीम कहता है कि मैं तभी जल्दी चंगा हो सकता हूँ यदि उसकी दवा को मैं सॉंढ़ के दूध के साथ खाऊँ।’’

‘‘सॉंढ़ का दूध? मैंने दूध देनेवाले सॉंढ़ के बारे में कभी नहीं सुना!’’ बीरबल भौचक रह गया।

‘‘हकीम कहता है कि दूध देने वाले सॉंढ़ दुर्लभ होते हैं। उसे विश्‍वास है कि ऐसे कुछ सॉंढ़ अवश्य हैं पर वे कहॉं मिल सकते हैं, उसे नहीं मालूम है। वह समझता है कि तुम इस काम को कर सकते हो और उसका पता लगा कर सॉंढ़ का दूध ला सकते हो।’’ बादशाह ने बीरबल की ओर देखते हुए कहा।

‘‘क्या हकीम ऐसा समझता है कि मैं सॉंढ़ का दूध ला सकता हूँ?’’ बीरबल को उसके विरुद्ध साजिश का सन्देह हुआ। वह अपने सन्देह की पुष्टि कर लेना चाहता था।

‘‘निस्सन्देह! क्या तुम मेरे लिए इतना नहीं कर सकते बीरबल?’’

‘‘हुजूर, मैं आप के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।’’ बीरबल ने तुरन्त अपनी अक्ल का घोड़ा दौड़ाया और कहा, ‘‘मैं वही करने जा रहा हूँ इसलिए समय नष्ट करना नहीं चाहता।’’ इतना कह कर बीरबल ने झुक कर सलाम किया और बाहर निकल गया।

अब उसे पूरा विश्‍वास हो गया कि हकीम ने उसे फँसाने के लिए फन्दा डाला है। वह घर पहुँचने तक मार्ग में इसी पर विचार करता रहा और इससे बचने की एक योजना भी बना ली। घर पहुँचते ही उसने बेटी को बुलाया जो बहुत अक्लमन्द लड़की थी और उसे अपनी समस्या के बारे में बताया।

‘‘क्या किसीने सॉंढ़ के दूध के बारे में सुना है?’’ उसे आश्‍चर्य हुआ।

‘‘हकीम ने इसके बारे में सुना है। लेकिन वह इसे नहीं ला सकता; वह चाहता है कि मैं जल्दी से इसे ले आऊँ ।’’ बीरबल बिल्कुल ठण्ढे और स्थिर मन से बोला।

‘‘क्या हकीम आप से नफरत करता है? क्या वह आप का दुश्मन है?’’ बेटी ने पूछा।

बीरबल ने सिर हिलाया। ‘‘मैं तुम्हें बताता हूँ क्या करना है।’’ उसने उसके कान में अपनी योजना समझा दी।

‘‘ओह अप्पाजी, काश! मैं आप के समान बुद्धिमती होती?’’ वह मुस्कुरा कर बोली।

‘‘तुम एक तेज लड़की हो। आज रात में इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए तैयार हो जाओ।’’ बीरबल ने अपनी बेटी को प्यार से थपथपाया।

आधी रात जैसे ही होनेवाली थी कि बीरबल की बेटी एक विश्‍वासी सेविका को लेकर नदी की ओर चल पड़ी। उन दोनों ने कपड़ों की एक गठरी और कपड़ों से, पीट-पीट कर, गन्दगी निकालने के लिए एक मोटा-सा डण्डा ले लिया। वे एक ऐसे घाट पर गये जो महल के पास था। उन्होंने गठरी को पत्थर की सीढ़ियों पर रख दिया। फिर लड़की ने एक-एक कर कपड़े को पानी में डुबोया, उसे पत्थर पर फैलाया और उसे डण्डे से पीटना शुरू किया। इससे जोर-जोर से धब-धब की आवाज आने लगी। साथ ही, लड़की अपनी सेविका से ऊँची आवाज में बातचीत भी करती रही।

धब-धब और दोनों की बातचीत की आवाज से बादशाह की नींद में खलल पड़ गई। बादशाह का शयन कक्ष नदी के घाट से लगा हुआ था।

उन्होंने नाराज होकर नौकर को बुलाया। एक रक्षक तुरन्त अन्दर आया। ‘‘देखो, यह कैसी जोर-जोर से आवाज आ रही है?’’ बादशाह ने गुस्से में कहा।

रक्षक ने धब-धब की और जोर-जोर से हँसने की आवाज सुनी। उसने सिर हिलाया।

‘‘जाओ, पता करो कौन इस समय कपड़े धो रहा है? वे क्यों इतना शोर मचा रहे हैं? मैं एक झपकी भी न ले सका। उन्हें जल्दी भगाओ।’’ बादशाह ने आग बबूला होकर हुक्म दिया।

रक्षक बादशाह को सलाम कर घाट पर गया। एक युवती कपड़े धो रही थी। पास में घुटने भर जल में खड़ी उसकी सेविका कपड़ों को खंगाल रही थी।

‘‘अरी लड़कियो! क्या यह कपड़े धोने का समय है? दन में क्यों नहीं धोती?’’ रक्षक ने भाले को हवा में उछालते हुए उन्हें डॉंटा।

‘‘क्या नदी केवल दिन में बहती है?’’ लड़की उस पर हँसती हुई बोली।

‘‘बहस नहीं करो। परेशानी में पड़ जाओगी।’’ रक्षक ने चेतावनी दी।

‘‘परेशानी? कपड़ों को धोने में मैं कभी परेशानी में नहीं पडूँगी, शहनशाह के राज्य में तो कभी नहीं। वे इतने निष्पक्ष और इन्साफ पसन्द हैं!’’ उसने दलील दी।
‘‘तुम इतना हल्ला कर रही हो कि बादशाह की नींद में खलल पड़ गई।’’ रक्षक ऊँची आवाज में बोला।

‘‘क्या तुम बिना शोर किये कपड़े धो सकते हो?’’ लड़की मुस्कुराई।

‘‘तुम कौन हो?’’ रक्षक ने क्रोध में आकर पूछा। ‘‘एक लड़की।’’

‘‘मुझे तुम्हारे बाप को यहॉं बुला कर लाना पड़ेगा ताके तुम्हारी खोपड़ी में कुछ अक्ल डाल सके । बताओ किस की बेटी हो?’’

‘‘अपने बाप की।’’ पट जवाब आया।

‘‘चुप रहो। मेरे साथ आओ। बादशाह ही तुम्हें ठीक करेंगे। जेल के तहखाने में सड़ने के लिए तैयार रहना।’’ उसने उसे साथ चलने का संकेत दिया।

लड़की के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था। वह रक्षक के साथ चल पड़ी। शीघ्र ही वे बादशाह के शयन कक्ष में थे। लड़की बादशाह को झुक कर सलाम करने के बाद मुस्कुराती हुई खड़ी हो गई।

रक्षक ने बादशाह से कहा कि यह लड़की अपनी सेविका के साथ कपड़े धोती हुई पाई गई।

‘‘रात में कपड़े क्यों धो रही हो?’’ बादशाह ने तीखी आवाज में पूछा।

‘‘शहनशाह, आज शाम को मेरे पिता ने एक शिशु को जन्म दिया।’’ उसने कहा।

‘‘बकवास!’’ बादशाह ने डॉंटा।

‘‘शहनशाह, मैं शिशु की सफाई में लगी हुई थी और अपने पिता की सेवा...’’

वह बादशाह का गर्जन सुन कर रुक गई। ‘‘अपने पिता की सेवा में लगी थी जिसने बच्चे को जन्म दिया! ठीक है न?’’ बादशाह कड़क कर बोले।

‘‘जी हॉं शहनशाह!’’

‘‘और तुम चाहते हो कि मैं विश्‍वास कर लूँ कि तुम्हारे पिता ने एक बच्चे को जन्म दिया या...’’ उनकी आवाज कॉंपने लगी, ‘‘तुम बोलने में भूल कर गई? तुम्हारी मॉं ने शिशु को जन्म दिया?’’

‘‘नहीं शहनशाह, मेरे पिता ने ही शिशु को जन्म दिया।’’ लड़की के होठों पर मुस्कुराहट आ गई।

‘‘नहीं शहनशाह, मैं आपसे सचाई बयान कर रही हूँ, मैं आपसे सचाई के सिवा और कुछ नहींकह रही हूँ ।’’ वह अपनी बात पर अडिग रही।

‘‘क्या हमलोग एक विचित्र समय में नहीं जी रहे हैं?’’ वह फिर बोली, ‘‘मैंने सुना है कि इस देश में सॉंढ़ के दूध से कुछ रोग जल्दी ठीक हो जाते हैं।’’ लड़की ने बादशाह की तरफ देखा।

बादशाह ने संकेत समझ लिया। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या तुम बीरबल की बेटी हो?’’ उनकी आवाज धीमी और शान्त थी।

‘‘हॉं, शहनशाह, मुझे खेद है, मैंने आप की नींद में खलल डाल दी। परन्तु, जब सॉंढ़ दूध देने लगते हैं और मर्द बच्चे पैदा करने लगते हैं तब रातों को दिन में परिवर्तित करना पड़ता है,’’ वह झुक कर बोली।

‘‘तुम बहुत अक्लमन्द, तेज और होशियार लड़की हो। अपने पिता को बोल दो कि तुमने पहले ही मुझे सॉंढ़ का दूध दे दिया है।’’ बादशाह ने सोने के मोहरों का एक थैला निकाला और उसके हाथ में पकड़ा दिया।

वह झुक कर सलाम करके बाहर आ गई। बादशाह अपने आप से बड़बड़ाने लगे, ‘‘सॉंढ़ का दूध, बकवास! जालिम खॉं को यह बात कहॉं से सूझी? अथवा क्या वह बीरबल को परेशानी में डालने की कोशिश कर रहा था? कल मैं इसका पता लगाऊँगा।’’

अगला दिन हकीम के लिए बड़ा अशुभ दिन बन गया।


कुएँ में हीरे की अंगूठी
न्यायपूर्ण फैसला
उल्लुओं की भाषा
सत्य की शिनाख़्त
उलटे, मुँह के बल गिरा
धूप-छाँव
बच्ची की रुलाई
उत्तम आयुध
बीरबल-राजा का पानवाला
भेंट में हिस्सा
आप ही ने तो कहा था
अपराध योग्य न्याय

22 मार्च 2010

झब्बे की टोपी का मांत्रिक



वनमाली एक वैद्य था। प्रताप नामक एक युवक उसके यहॉं काम करता था। दवाओं को पीसना, जड़ी-बूटियों से कषाय निकालना आदि कामों में वह दिन भर व्यस्त रहता था।

उसी गॉंव में मांत्रिक नामक एक वृद्ध था। उसने ग्रम देवी की उपासना करके चंद अद्भुत शक्तियॉं पायीं। वनमाली की पहुँच के बाहर की बीमारियों का इलाज करने में वह सिद्धहस्त था। इसका यह मतलब नहीं कि दोनों में प्रतिस्पर्धा थी। दोनों गॉंव के लोगों की सेवा करते थे।

मांत्रिक के यहॉं काम करने की प्रताप की तीव्र इच्छा थी। मंत्र-तंत्रों को सीखने की उसकी अदम्य इच्छा थी। जब इस इच्छा को लेकर वह मांत्रिक के पास गया तब उसने प्रताप से कहा ‘‘मेरे सीखे मंत्र-तंत्र वैद्य शास्त्र को लेकर हैं। इसलिए वैद्य विद्या सीखने के बाद ही तुम्हें ये मंत्र-तंत्र सिखाऊँगा।’’

जब एक बार मांत्रिक बीमार पड़ गया, तब वह वनमाली से मिलने आया। उसकी बीमारी की जांच करने के बाद वनमाली ने उससे कहा, ‘‘बहुत बूढ़े हो गये हो। अब तुम्हें अधिकाधिक विश्राम चाहिये। आज के लिए तुम्हें दवा दे रहा हूँ। कल फिर से जांच के बाद दवा दूँगा।’’

‘‘घर से निकलने में भी मुझे तक़लीफ़ होती है। कल की दवा किसी के ज़रिये घर भेज सकोगे?’’ मांत्रिक ने कहा। वनमाली ने दूसरे दिन प्रताप के द्वारा दवा भेजी। मांत्रिक ने उसे देखते ही कहा, ‘‘कल रात को ग्रम देवी सपने में प्रत्यक्ष हुईं। उसने साफ़-साफ़ बता दिया कि मेरी मौत का समय निकट आ गया है और कोई भी दवा काम नहीं करेगी। मेरी मंत्र विद्याएँ मेरे ही साथ ख़त्म हो जायेंगी तो मुझे आत्म शांति नहीं मिलेगी।’’

प्रताप ने फ़ौरन कहा, ‘‘अब तक थोड़ी-बहुत वैद्य विद्या सीख चुका हूँ। मुझे मंत्र सिखाओगे तो तुम्हारी आत्मा को शांति मिलेगी।’’ उसके स्वर में आशा भरी हुई थी।

मांत्रिक ने उसे एक बार ग़ौर से देखा और बग़ल की मेज़ पर ही रखी हुई एक सुंदर झब्बेवाली टोपी उसे देते हुए कहा, ‘‘इसे अपने सिर पर रख लो। मर जाने के बाद कुछ समय तक मैं इसपर हावी रहूँगा। इसे तुम जिसके लिए सिर रखोगे, उसे उस दिन क्या और कैसा लाभ होगा, वह तुम्हें तुम्हारे कान में बताऊँगा। दिन में एक ही बार तुम इसे उपयोग में ला सकोगे।’’

प्रताप खुशी से फूल उठा। उसने सिर पर टोपी रख ली और वनमाली से मिलकर कहा कि मांत्रिक की मौत का समय निकट आ गया। टोपी का राज़ उसने छिपा रखा।

उसी रात को मांत्रिक मर गया। गॉंव भर के लोगों ने मिलकर उसका दहन-संस्कार किया। इसके बाद प्रताप के सिर पर की टोपी में कोई संचलन हुआ। उसके कान में सुनायी पड़ा, ‘‘मैं तुम्हारी टोपी पर हावी हूँ। अब तुम इसका उपयोग कर सकते हो।’’

प्रताप ने वनमाली के पास काम करना छोड़ दिया और किसी दूसरे गॉंव में चला गया। वहॉं एक गली से गुज़रते व़क्त उसे कान में सुनायी पड़ा। ‘‘सामने से नीले रंग का कुरता पहने हुए जो आदमी आ रहा है, उसका नाम नक्षत्र है। उसे उसकी भविष्यवाणी सुनाना।’’

इतने में नीले रंग का कुरता पहना हुआ वह आदमी पास आया। प्रताप ने उससे कहा, ‘‘मेरी टोपी बताती है कि तुम्हारा नाम नक्षत्र है। एक अप्रत्याशित लाभ तुम्हें होनेवाला है। मेरी टोपी पहने लोगों से वह बतायेगी कि वह लाभ क्या है। इसके प्रतिफल के रूप में तुम्हें मुझे दो सौ अशर्फ़ियॉं देनी होंगी।’’

प्रताप ने उसका सही नाम बताया, इसलिए नक्षत्र ने उसकी बातों का विश्वास किया और उसने उसकी शर्त मान ली। प्रताप ने जैसे ही उसके सिर पर टोपी रखी, प्रताप के कान में आवाज़ आयी, ‘‘भूषण नामक एक व्यक्ति ने इससे दो हज़ार अशर्फ़ियॉं कर्ज़ में लीं। आज वह कर्ज वसूल होनेवाला है, जिसकी वसूली की कोई उम्मीद ही नहीं थी।’’

प्रताप ने, नक्षत्र से यह बात बतायी और अपनी टोपी ले ली। दोनों भूषण के घर गये। दरवाज़े पर ही भूषण ने नक्षत्र का स्वागत किया और प्यार-भरे स्वर में कहा, ‘‘आइये, आइये, मैं आप ही के घर आने निकल रहा था। लीजिये अपनी रक़म और अतिरिक्त दो सौ अशर्फ़ियॉं।’’ यों कहते हुए उसने रक़म नक्षत्र के सुपुर्द कर दी।
नक्षत्र ने प्रताप की शर्त के अनुसार रक़म दे दी और एक बड़ा भोज भी दिया। यह ख़बर गॉंव में आग की तरह फैल गयी और बड़ी संख्या में लोग उसके पास आने लगे। प्रताप दिन में एक ही बार झब्बे की टोपी पहनाता था। उसकी भविष्यवाणी के कारण ही कुछ लोगों को संपत्ति मिली तो कुछ लोगों को निधियॉं। बहुत-से लोगों को उनके व्यापारों में इज़ाफ़ा हुआ।

थोड़े ही समय में प्रताप धनवान हो गया। यों एक साल गुज़र गया। एक दिन उसे कान में सुनायी पड़ा, ‘‘मेरी वजह से कितने ही लोगों की भलाई हुई। अब मेरी आत्मा को शांति मिली। अब मैं इस झब्बे की टोपी छोड़कर जा रहा हूँ।’’

 दूसरे दिन झब्बे की टोपी से आवाज़ का निकलना बंद हो गया। लोगों से साफ़-साफ़ यह बताकर उन्हें वह वापस भेजने लगा कि अब उसका ज्योतिष फलीभूत होनेवाला नहीं है।

 परंतु उसके ज्योतिष से लाभ उठाने की इच्छा रखनेवाले कुछ स्वार्थियों ने, उसके बारे में दुष्प्रचार शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि प्रताप में अब भी मंत्र शक्ति मौजूद है, पर ईर्ष्या के मारे वह यह काम नहीं कर रहा है।

यह अफवाह राजा तक पहुँची। उन्होंने प्रताप को बुलवाया और वास्तविकता बताने पर ज़ोर दिया। प्रताप ने मांत्रिक का विषय छिपाते हुए कहा, ‘‘प्रभू, मुझे झब्बे की एक टोपी मिली थी। उसकी महिमा के बल पर ही मैं बहुत समय तक ज्योतिष बताता रहा। अब उसकी महिमा ग़ायब हो गयी है।’’


राजा को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने क्रोध-भरे स्वर में कहा, ‘‘तुम यह नहीं बता रहे हो कि तुम्हारी टोपी को यह महिमा कैसे प्राप्त हुई और अचानक कैसे गायब हो गयी। तुम यह राज़ जान-बूझकर छिपा रहे हो।’’ फिर राजा ने मंत्रियों आदि को सभा-स्थल से भेज दिया और प्रताप के कान में धीमे स्वर में कहा, ‘‘मैंने सम्राट की इकलौती पुत्री विद्युतलता से विवाह रचाने का निश्र्चय कर लिया है। परंतु मंत्रियों का कहना है कि दूतों के द्वारा सम्राट को यह समाचार भिजवाने से बात बिगड़ जायेगी। हो सकता है, खतरा भी मोल लेना पड़े । क्योंकि वे बड़े सम्राट हैं न। मैंने अभी एक नवीनतम निर्णय लिया है कि सम्राट पर आक्रमण करूँ और विजयी होकर विद्युतलता का हाथ अपने हाथ में लूँ। इसके लिए क्या यह खड्ग इतना शक्तिशाली है?’’

राजा की बातों ने प्रताप के शरीर में कंपन पैदा कर दिया। उसने कांपते हुए हाथों से राजा के सिर पर टोपी रखी। दूसरे ही क्षण राजा का हाथ कांप उठा और खड्ग नीचे गिर गया। राजा सिंहासन से गिरते हुए गरज उठे, ‘‘अरे ओ मांत्रिक, तुमने क्या कर दिया?’’

प्रताप भय के मारे थरथर कांप ही रहा था कि इतने में उसके कान में आवाज़ हुई, ‘‘ड़रो मत। मुझे मालूम है कि असमर्थ को शक्तियॉं देने पर ऐसे ही अनर्थ होते हैं, इसीलिए मैं अब भी तुम्हारी टोपी पर हावी हूँ। घमंड में चूर राजा ने टोपी को हुक्म देना चाहा, पर उसे ज्ञात नहीं कि टोपी वही बताती है, जो बीतने वाला है। अपनी इस हरक़त से वह शापग्रस्त हो गया। उससे पूछो कि अब भी वह सम्राट की बेटी से विवाह रचाने का हवाई किला बना रहा है या उस हाथ को शक्ति दिलाना चाहता है, जो बेकार हो गया। वह चाहे तो टोपी की महिमा से उसका हाथ यथावत् हो जायेगा।’’ मांत्रिक ने कहा।

प्रताप ने, राजा को मांत्रिक की बतायी बातें कहीं। तब राजा ने कहा, ‘‘मुझे न ही विद्युतलता चाहिये, न ही चंपकलता। मुझे खड्ग पकड सकनेवाला यह हाथ ही चाहिये।’’

देखते-देखते राजा के हाथ में शक्ति आ गयी। नीचे गिरे खड्ग को अपने हाथ में लेते हुए उन्होंने प्रताप से कहा, ‘‘झब्बे की टोपी के ऐ मांत्रिक, तुम्हारे कारण मैंने एक अच्छा सबक सीखा। और उचित-अनुचित का विचार नहीं करता। मैं शक्ति-सामर्थ्य रखनेवाला लोभी नहीं होता। इन गुणों से हीन व्यक्ति ही दिवा-स्वप्न देखने का दुस्साहस करता है।’’ फिर उसने प्रताप को भेंट देकर उसका उचित सम्मान किया।

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