केस 1- गायिका आकांक्षा जाचक ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर अपने रिकॉर्ड, गाने के उद्देश्य, उपलब्धियों सहित कुछ गीत भी डाउनलोड कर रखे हैं। इतना ही नहीं, किसी खास अवसर पर वे अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोगों को स्क्रेप में भी अपने द्वारा गाया गीत ही भेजती हैं।
केस 2- सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनुराग ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर सभी प्रोजेक्ट्स की डिटेल दे रखी है। पुरानी कंपनी में जहाँ वे काम कर चुके हैं, उसके साथ ही वर्तमान कंपनी की डिटेल सहित खुद के पद, जॉब प्रोफाइल आदि के बारे में भी दर्शा रखा है।
केस 3- मीडिया प्रोफेशनल अभिनव ने भी अपनी ऑरकुट प्रोफाइल में अपने कार्यक्षेत्र और बीट्स के बारे में निर्धारित तरीके से बताया है। इसी के साथ उन्होंने अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरी फोटो के साथ यहाँ लोड कर रखी है।
एचआर हेड कहते हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स से अच्छे उम्मीदवारों की हाइरिंग करना काफी पुराना फंडा है। यह बात अलग है कि यह लाइमलाइट में अब आया है। वे बताते हैं हेड हंटर्स फेसबुक, ऑरकुट या लिंक्डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स अचानक से विजिट करते हैं।
यहाँ वे प्रोफाइल में दी गई जानकारियों के जरिए जॉब सीकर्स (जॉब लेने वाले) को तलाशते हैं। उनकी प्रोफाइल को आधार बनाकर वे कम्युनिटी के ऑनर से कॉन्टेक्ट करते हैं और निर्धारित व्यक्ति के बारे में जानकारियाँ लेते हैं। उन्होंने कहा, इसलिए कोई फ्रेशर हो या अनुभवी व्यक्ति अपनी प्रोफाइल में जानकारियों को अच्छे से सजाकर जॉब प्रोफाइडर को आकर्षित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मीडिया संबंधित कोर्स कर चुके फ्रेशर हाल ही में स्वयं द्वारा पूरा किया गया प्रोजेक्ट अपलोड कर सकते हैं। वे अपनी प्रोफाइल पर लिंक भी क्रिएट कर सकते हैं।
एक अन्य एचआर मैनेजर कहती हैं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए किसी व्यक्ति की स्कील्स के बारे में पता चलता है और कंपनी की कॉस्ट में कट भी हो जाता है। वे कहती हैं हाँ लेकिन यह ध्यान रखने योग्य बात है कि ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट से शॉर्टलिस्ट होने के बाद अपने रिज्यूम को अच्छे-से तैयार करें।
जब भी इंटरव्यू के लिए जाएँ, अपने सीवी में किसी भी झूठी बात का समावेश न करें, क्योंकि आपके सीवी को आपकी ऑरकुट प्रोफाइल से वेरीफाई भी किया जा सकता है। इसके अलावा स्क्रेपबुक को चेक करके ब्रेकग्राउंड चेकिंग भी की जा सकती है।इंदौर। इन तीन केसेस के जरिए हम बताना चाह रहे हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइट केवल चैटिंग, दोस्तों से कनेक्ट रहने और एंटरटेनमेंट के लिए ही नहीं है, बल्कि इसके जरिए अब कंपनियाँ व जॉब प्रोफाइडर अपने-अपने श्रेत्र के बेहतर कर्मचारियों को भी ढूँढ़ रहे हैं यानी अब क्लासीफाइड्स को भूल जाइए...।
अब अदद उम्मीदवार ढूँढने वाले लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सही उम्मीदवार का चयन करने लगे हैं। ऐसे में हो सकता है आपकी ऑरकुट या लिंक्डइन प्रोफाइल इनका अगला डेस्टिनेशन हो।
31 दिसंबर 2010
यहाँ भी मिल सकती है नौकरी
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Posted by Udit bhargava at 12/31/2010 08:30:00 pm 1 comments
09 दिसंबर 2010
होम्योपैथी क्षेत्र में अपार संभावनाएँ

आज की आपाधापी वाली जिंदगी में बीमारियों ने मनुष्य के शरीर में अपनी पैठ बना ली है, तो लोग भी उनका जड़ से इलाज चाहते हैं। इसके लिए वह होम्योपैथी का सहारा लेते हैं। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें उपचार में तो समय लगता है लेकिन यह बीमारी को जड़ से मिटाती है। यही कारण है जिसके कारण यह पद्धति तेजी से लोकप्रिय हो रही है। अगर आप चाहें तो इस क्षेत्र में अपना भविष्य देख सकते हैं।
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Posted by Udit bhargava at 12/09/2010 05:30:00 pm 0 comments
13 मार्च 2010
होम साइंस में रोजगार के अवसर
होम साइंस एक विस्तृत और रोजगार संभावनाओं से युक्त अध्ययन क्षेत्र है। होम साइंस विषय से स्नातक एवं स्नातकोत्तर करने के उपरांत न केवल सरकारी व प्राइवेट नौकरियाँ हासिल की जा सकती हैं बल्कि कई प्रकार के स्वरोजगार भी प्रारंभ किए जा सकते हैं। राज्य लोक सेवा आयोगों द्वारा समय-समय पर कई तरह की रिक्तियाँ प्रकाशित की जाती हैं जिनमें सिर्फ होम साइंस की छात्राएँ ही आवेदन कर सकती हैं।
इसी प्रकार संघ लोक सेवा आयोग भी रिक्तियाँ प्रकाशित करता है जिसमें आवेदन के लिए होम साइंस की किसी भी शाखा में स्नातक व स्नातकोत्तर डिग्री होनी चाहिए। होम साइंस की पढ़ाई के बाद बहुत-सी युवतियाँ गृह विज्ञान पर आधारित लघु उद्योग की शुरुआत करके अच्छी आय अर्जित कर रही हैं।
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Posted by Udit bhargava at 3/13/2010 07:39:00 pm 0 comments
11 मार्च 2010
पब्लिक रिलेशंस में संभावनाएँ
पब्लिक रिलेशन अधिकारी के लिए कॉरपोरेट जगत में बहुत सी संभावनाएँ मौजूद हैं। चूँकि आज हर छोटी बड़ी कंपनी अपनी इमेज को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित रहती है। मार्केट में कंपनी की इमेज और विश्वसनीयता ही उसके बिजनेस का मूल आधार है।
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Posted by Udit bhargava at 3/11/2010 06:10:00 am 1 comments
01 मार्च 2010
क्रिमिनोलॉजी में करियर

आज के दौर में अपराध दिनोदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसे में अपराधों की छानबीन के क्षेत्र में करियर की प्रबल संभावनाएँ भी बढ़ रही हैं। अगर आप अपराध की जांच-पड़ताल में रुचि रखते हैं तो आपके लिए क्रिमिनोलॉजी बेहतर करियर ऑप्शन हो सकता है।
कार्यक्षेत्र :
क्रिमिनोलॉजिस्ट का प्रमुख काम है घटनास्थल से अपराधी के खिलाफ सबूत जुटाने में जाँच दल की मदद करना। साथ ही, अपराध से संबंधित परिस्थितियों का अध्ययन करना, अपराध करने का कारण तथा समाज पर इसका प्रभाव जानना इनके कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह एक ऐसा करियर विकल्प हैं जो तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। क्रिमिनोलॉजिस्ट समाज को अपराध से बचाने में मदद भी करता है।
कोर्स :
इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए बीए या बीएससी इन क्रिमिनोलॉजी में दाखिला ले जा सकते हैं जिसकी अवधि 3 वर्ष है। इसके लिए आर्ट या साइंस में बारहवीं पास होना अनिवार्य है। इसके अलावा पोस्ट ग्रेजुएट, डिग्री या डिप्लोमा इन क्रिमिनोलॉजी भी कर सकते हैं जिसके लिए आर्ट या साइंस विषय में स्नातक डिग्री आवश्यक है।
व्यक्तिगत गुण :
कानून व्यवस्था पर आस्था और जिज्ञासा।
तर्क एवं व्यावहारिक सोच।
टीम भावना के साथ काम करना।
हर तरह के चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहना।
दूरदर्शी होना।
कहाँ हैं अवसर :
क्रिमिनोलॉजिस्ट सरकारी व निजी कंपनियों, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट, एनजीओ, रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन, प्राइवेट सिक्योरिटी तथा डिटेक्टिव एजेंसियों में रोजगार प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा, क्रिमिनोलॉजिस्ट काउंसलर तथा फ्रीलांसर के तौर पर भी कार्य कर सकते हैं। क्रिमिनोलॉजिस्ट से संबंधित कोर्स करने के बाद क्राइम इंटेलिजेंस, लॉ रिफार्म रिसर्चर, कम्युनिटी करेक्शन कोऑर्डिनेटर, ड्रग पॉलिसी एडवाइजर, कंज्यूमर एडवोकेट, इनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एनालिस्ट के पद पर कार्य कर सकते हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ :
आज जिस तरह टेक्नोलॉजी में तेजी से प्रगति हो रही है उसी तेजी से क्राइम भी बढ़ रहा है। दिनोदिन बढ़ते हुए क्राइम को देखकर विशेषज्ञों का मानना है कि 2014 तक इस क्षेत्र में ऐसे प्रोफेशनल्स की बहुत जरूरत पड़ेगी।
कमाई :
प्रारंभिक दौर में एक क्रिमिनोलॉजिस्ट प्रतिमाह 10 से 15 हजार रुपए प्रतिमाह कमा सकता है। अनुभव प्राप्त करने के बाद 20 से 25 हजार रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं। इसके अलावा, फ्रीलांसर के तौर पर वह केस के अनुसार अपनी फीस तय करता है। अगर आप विदेशों में नौकरी तलाश करें तो वहाँ आपको बेहतर वेतन मिल सकता है।
प्रमुख संस्थान :
आंध्र यूनिवर्सिटी, विशाखापत्तनम
पटना यूनिवर्सिटी, बिहार
पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़
यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास, चेन्नई
यूनिवर्सिटी ऑफ लखनऊ
यूनिवसिर्टी ऑफ जम्मू, जम्मू एंड कश्मीर
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फारेसिंक साइंस, दिल्ली
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Posted by Udit bhargava at 3/01/2010 06:20:00 am 0 comments
25 फ़रवरी 2010
विवाह को नया रूप देते हैं वेडिंग प्लानर
भारतीय संस्कृति में यह कहावत है कि जोड़ियाँ ऊपर ही बनती हैं। हो सकता है यह बात सच भी हो, लेकिन इन दिनों जोड़ियों को सजाने और बिना किसी झंझट और बेहतर ढंग से शादी कराने का काम वेडिंग प्लानर बखूबी कर रहे हैं। शादी समारोह जैसे प्रमुख आयोजन में शादी का हॉल बुक करने से लेकर बारात आने तक की तैयारी करना कोई आसान काम नहीं, यही कारण है कि इसके बहुत ही प्रोफेशनल वेडिंग प्लानर की जरूरत लगातार बढ़ रही है। Labels: मनपसंद करियर
Posted by Udit bhargava at 2/25/2010 06:42:00 am 0 comments
23 फ़रवरी 2010
यहाँ सच होते हैं, हैल्दी कैरियर के सपने
Hospital Industry बदलाव के युग से गुजर रही है। समूची चिकित्सा प्रणाली आधुनिक होती जा रही है। प्रतिस्पर्धा के युग में सभी अस्पताल अच्छी सुविधायें देना चाहते हैं, यही वजह है कि चिकित्सा व्यवस्ता की देख - रेख का काम अब Management Professionals को दिया जाने लगा है। गुलाबी शहर के नाम से मशहूर जयपुर में Industry of Health Management Research इसी दिशा में स्टुडेंट्स को ट्रेनिंग देने का काम कर रहा है। इसकी स्थापना 1984 में हुई थी। इसे Department of Science and Technology aur Finance Ministry से मान्यता प्राप्त है। यहाँ Health Managment के क्षेत्र में एजुकेशन, रिसर्च और ट्रेनिंग एक साथ दी जाती है। इस प्रोग्राम का उद्देश मेडिकल से जुडी सारी गतिविधियों के लिये ऐसे प्रोफेशनल्स तैयार करना है, जो प्लानिंग और मैनेजमेंट तकनीक को अच्छी तरह से हैंडल कर सकें। यह संस्था रिसर्च, ट्रेनिंग और कंसल्टेंसी से जुडी अग्रणी के कंपनियों जैसे यूनेप, यूनिसेफ, दब्लुएचौओ, केयर, वर्ल्ड बैंक और Ministry of Health and Welfare, Planning Commission, Indian Councelling of Medical Research और विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करती है।
कोर्स: IIHRM में Hospital Management, Health Management aur Pharmaceuticals Management में दो साल पीजी प्रोग्राम करवाया जाता है, जो कि AICTE और Ministry of Human Resource Development से भी मान्यता प्राप्त डिग्री MBA के समतुल्य है। CNN-IBN और Out-Look के द्वारा किये गए 2008-09 सर्वे में इसे Health Management के क्षेत्र में पहला स्थान प्राप्त हुआ है।
प्रवेश प्रक्रिया
यहाँ 120 सीट हैं, जिसमें Hospital Management Stream के लिये 60 सीट है, Health Management के लिये 35 सीट और Pharmaceuticals Management के लिये 25 सीट होते हैं। इस संस्थान में प्रवेश पाने के लिये अभ्यर्थी को किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से स्नातक होना चाहिए। Working Executive भी इसके लिये आवेदन कर सकते हैं। हांलाकि दोनों के प्रवेश पक्रिया में अंतर होता है। परेश ग्रादुअते को कसी भी स्ट्रें में 50% अंक के साथ MAT Qualify करना जरुरी होता है। फाइनल इयर स्टुडेंटस भी प्रवेश परीक्षा दे सकते हैं। Working Executive के लिये 50% नम्बर के साथ सम्बंधित फील्ड में दो साल का अनुभव होना चाहिए। इनके लिये MAT Qualify करना जरुरी नहीं होता। चयन मृत के आधार पर होता है। MAT के स्कोर के अलावा चयन Group Discussion और Personal Interview में पर्वार्मेंस के आधार पर होता है।
प्लेसमेंट
IIHMR के Passouts के लिये Rainbexy, Health Care, Sipla, Infosys aur Medical Research Centre और बहुत सारे मालती फैसिलिटी हास्पिटल के द्वार खुले हैं। इन संस्थानों के यहाँ के स्टुडेंट्स के लिये रिसर्च सुविधा होने के साथ अंतिम वर्ष तक प्लेसमेंट भी हो जाती है। यहाँ से कोर्स करने के बाद छात्र विभिन्न Corporate Hospital, Pharmaceuticals Companies और अंतरास्ट्रीय व रास्ट्रीय स्टार पर कार्यरत स्वास्थ संस्थानों से भी जुड़ सकते हैं।
आवेदन की तिथि
आवेदन फ़ार्म भरने की अंतिम तिथि 31 मई होती है और Qualify करने के बाद जून के पहले सप्ताह में Interview होता है। नया सेशन जुलाई से शुरू होता है। आवेदन के लिये 500 रूपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ Institute of Health Management, Jaipur से संपर्क किया जा सकता है। आप चाहें तो संस्थान कि साईट से भी फ़ार्म Download कर उसे 500 रूपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ भेज सकते हैं।
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Posted by Udit bhargava at 2/23/2010 11:39:00 pm 0 comments
21 फ़रवरी 2010
फोरेंसिक साइंस में रोजगार के अवसर
क्रिमिनोलॉजी एवं फोरेंसिक साइंस पाठ्यक्रम करने के बाद रोजगार के क्या अवसर हैं?
फोरेंसिक साइंस की सभी शाखाओं में इसके विशेषज्ञों की हमेशा माँग रहती है। केंद्रीय व राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे 24 फोरेंसिक लैब में विशेषज्ञों की भर्ती संघ लोक सेवा आयोग द्वारा की जाती है। इसके अलावा सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों में आपके लिए उजली संभावनाएँ हैं। फोरेंसिक मेडिसीन के विशेषज्ञों को सभी मेडिकल कॉलेजों, शोध संस्थानों में मौका दिया जाता है। अपराध अनुसंधान से संबंधित सभी लैबों में फोरेंसिक विज्ञान की शाखाओं के लिए अलग-अलग विभाग होते हैं, जिनमें विशेषज्ञों की माँग हमेशा बनी रहती है। क्रिमिनोलॉजी विशेषज्ञों के लिए सीबीआई, आईबी के साथ-साथ समाजसेवा से जुड़े संस्थानों, जेलों में भी नौकरी के पर्याप्त अवसर हैं।
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Posted by Udit bhargava at 2/21/2010 06:32:00 am 0 comments
14 फ़रवरी 2010
कैसे बनाएँ रोबोटिक्स में करियर?
मैं रोबोटिक्स के क्षेत्र में करियर बनाना चाहता हूँ। कृपया मार्गदर्शन दें।
- रोबोटिक्स कम्प्यूटर विज्ञान की वह शाखा है जिसमें यह सीखा जाता है कि कम्प्यूटर में आदमी जैसी बुद्धि कैसे आए। रोबोटिक्स का उद्देश्य ऐसे रोबोट्स बनाना है, जो समस्याओं को हल कर सके। रोबोट तकनीक के अध्ययन के लिए इंजीनियरी डिग्री आवश्यक है। यदि आप रोबोटिक्स में डिजाइनिंग तथा कंट्रोल में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करना होगी।
कंट्रोल तथा हार्डवेयर में डिजाइनिंग के लिए इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की बी-टेक डिग्री जरूरी है। रोबोटिक्स में दिलचस्पी रखने वाले छात्र गणित में अच्छे होने चाहिए। उनमें सृजनात्मक योग्यता की भी आवश्यकता होती है। रोबोटिक्स से संबंधित पाठ्यक्रम इन संस्थानों में उपलब्ध हैं- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बंगलुरु/ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली/ कानपुर/मुंबई/ चेन्नई/ खड़गपुर/ गुवाहाटी तथा रुड़की। यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद/ बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, पिलानी।
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Posted by Udit bhargava at 2/14/2010 07:46:00 am 0 comments
12 फ़रवरी 2010
विघ्नहर्ता गणपति और प्रबंधन
यह करियर और कॉम्पिटिशन का दौर है। तेजी और चतुराई का समय है। हर कोई होड़ जीतना चाहता है। भूमंडलीकरण के दौर में युवाओं हेतु संभावनाओं के नए दरवाजे खुले हैं। उनके सामने अपार लक्ष्य हैं। जाहिर है वह अपनी मेहनत और लगन से अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि बिना किसी तैयारी या मैनेजमेंट के वह इसमें कामयाब नहीं हो पाता है। कहने की जरूरत नहीं कि आज कामयाबी हासिल करने के लिए हर स्तर पर मैनेजमेंट की जरूरत है।
जीवन को नई दिशा देने में आज प्रबंधन ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय समाज में एक श्रेष्ठ प्रबंधक के गुण हमारे देवताओं में भी मौजूद हैं। उन्हीं में एक शुभारंभ के प्रतीक हैं श्री गणेश, जो प्रथम वंदनीय और विघ्नहर्ता तथा बुद्धि के देवता हैं। उनमें और उनकी जीवनलीला में प्रबंधन के कई ऐसे गुर मौजूद हैं जिसकी सहायता से और उनसे सीखकर शीर्ष पर पहुँचा जा सकता है। गणेशजी के समान ही समय के साथ सही प्रबंधन का गठजोड़ कर वह हर कठिन कार्य को उन्हीं के समान तेजी से, चतुराई से और धैर्य के साथ आसानी से पूरा कर सकता है।
आईआईपीएस के मार्केटिंग विषय के प्रो. रजनीश जैन कहते हैं कि श्री गणेश को ज्ञान का देवता कहा गया है और आज के समय में 'ज्ञान ही शक्ति' है। वे कहते हैं कि श्री गणेश का बड़ा सिर इस बात का प्रतीक है कि हमेशा बड़े विचार रखें, बड़ा सोच रखें और साथ ही यह भी कि बड़े लाभ के बारे में सोचना है। उनके बड़े कान का अर्थ है दूसरी की बातों और उनके सुझाव या आइडियाज को ध्यान से सुनना। उनकी छोटी आँखें हमें यह संदेश देती हैं कि हमें किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बहुत फोकस रहना है।
एकाग्रता रखकर अपने लक्ष्य हासिल करना है। उनका छोटा मुख हमें सिखाता है कि हमें जितना हो सके कम बोलना है और जब भी बोलना है हमेशा अर्थवान बोलना है। और यह भी कि ज्यादा से ज्यादा सुनना है। कई बार स्टूडेंट्स अति उत्साह में ऐसा कुछ बोल जाते हैं, जो उनके बस में नही होता या अनर्थ हो जाता है।
श्री गणेश जब अंकुश का प्रतीक धारण करते हैं तो संकेत देते हैं कि हमें बुद्धि संपन्न होने के साथ ही खुद पर नियत्रंण करना आना चाहिए। वरदान देने की मुद्रा का आशय अपनी सकारात्मकता का सतत प्रसार करना है और अभयमुद्रा का आशय सकारात्मकता का संरक्षण करना सिखाता है।
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Posted by Udit bhargava at 2/12/2010 06:10:00 am 0 comments
10 फ़रवरी 2010
विकास को पंख देगा शिक्षा का अधिकार
हमारे यहाँ अभी तक जो 100 बच्चे बेसिक शिक्षा में एडमिशन लेते हैं उनमें सिर्फ 12 बच्चे ही ग्रेजुएशन तक पहुँच पाते हैं जबकि योरप में 100 में से 50-70 बच्चे तक कॉलेज पहुँचते हैं। सरकार का आकलन है कि इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद भारत में कॉलेज पहुँचने वाले छात्रों की संख्या 2020 तक 30 से 35 फीसदी की सीमा पार कर जाएगी।
स्कूलों को इस कानून पर खरा उतरने के लिए तीन सालों के अंदर तमाम ढाँचागत सुविधाएँ हासिल करनी होंगी। स्कूलों को कम से कम 50 प्रतिशत महिला शिक्षकों को भर्ती करना होगा। जहाँ तक सामुदायिक स्कूलों का सवाल है, तो वे अपने विशेष समुदाय को 50 फीसदी सीटें दे सकते हैं। उच्च आय वाले देशों में जहाँ फिलहाल पढ़ने की उम्र समूह वाले (5 से 24 साल) 92 फीसदी लोग शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, वहीं भारत में यह आँकड़ा अभी तक सिर्फ 63 फीसदी है।
भारत के मुकाबले विकास दर में काफी पीछे चलने वाले ब्राजील और रूस में 89 फीसदी स्कूल जाने की उम्र के बच्चे पढ़ रहे हैं। चीन में भी लगभग 70 फीसदी स्कूल जाने की उम्र वाले बच्चे स्कूल जा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन अनुमानों के मुताबिक 100 फीसदी शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने में भारत को 15 से 20 साल लग जाएँगे जबकि हर साल शिक्षा के बजट में पिछले साल के मुकाबले 15 से 20 फीसदी की बढ़ोतरी होती रही। गौरतलब है कि शिक्षा के लिए हम अपनी तमाम सामूहिक प्रतिबद्धता जताने के बावजूद अभी तक अपने कुल बजट का 5 फीसदी भी खर्च करने के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पाए हैं।
एक तरफ शिक्षा के प्रति हमारी शासकीय दरिद्रता जगजाहिर है, दूसरी तरफ शिक्षा के प्रति भारतीय जनमानस की लगन और बढ़-चढ़कर शिक्षित होने की प्रक्रिया में भारतीयों का उत्साह देखने लायक है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले आठ वर्षों में बाकी क्षेत्रों के खर्चों में जहाँ बढोतरी 30 से 40 फीसदी तक हुई है वहीं शिक्षा के खर्च का आँकड़ा 200 फीसद को पार कर गया है।
एसोचेम (औद्योगिक संगठन) के एक अध्ययन के मुताबिक हाल के वर्षों में पढ़ाई के खर्च में सबसे ज्यादा तीव्रता से बढ़ातरी हुई है और यह बढ़ोतरी सिर्फ तथाकथित ब्लू चिप वर्ग में ही नहीं हुई बल्कि दूसरे क्षेत्रों में यह बढ़ोतरी देखने लायक है।
एसोचेम के अध्ययन के मुताबिक औसत मध्यमवर्गीय परिवार में जहाँ सन् 2000 में एक बच्चे की समूची पढ़ाई का खर्चा 25, 000 रु. वार्षिक था, वहीं 2008 में यह बढ़कर 65,000 से 80,000 रु. वार्षिक हो चुका है। यह लगभग 160 से 200 फीसदी की बढ़ोतरी दर्शाता है जबकि इस दौरान औसत माँ-बाप की आय में अधिकतम 30 से 35 फीसदी तक का ही इजाफा हुआ है। अब चूँकि शिक्षा को मूलभूत अधिकार के दायरे में लाया गया है इससे उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही शिक्षा भारत के लिए संपूर्ण क्रांति का जरिया साबित होगी।
हाल के वर्षों में अगर दुनिया में एक मजबूत, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारी छवि पुख्ता हुई है तो इसमें कहीं न कहीं हमारे मजबूत शैक्षिक आधार का भी हाथ है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि अब जबकि देश के हर नौनिहाल को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का हक हासिल हो गया है, तो भारत और तेजी से आगे बढ़ेगा और दुनिया का सिरमौर बनेगा।
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Posted by Udit bhargava at 2/10/2010 07:40:00 am 0 comments
08 फ़रवरी 2010
विवादों का विश्वविद्यालय
रवींद्र नाथ टैगोर के सपनों की विश्वभारती की परंपरा में भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और गुटबाजी का पलीता लगा हुआ है। विश्वविद्यालय का गुरुकुल जैसा परिसर इन दिनों राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। इस संस्थान की स्थापना के समय पुरातन गुरुकुल परंपरा के आदर्श को ध्यान में रखा गया था। इस संस्थान के संस्थापक के शब्दों में यहाँ विश्व भर की शिक्षा की प्यास बुझेगी। आज की तारीख में यह संस्थान विवादों के केंद्र में है। भ्रष्टाचार से लेकर खस्ताहाल प्रबंधन तक के आरोपों का अंबार लगा हुआ है। आखिर कैसे बिगड़े हालात?
यहाँ बात बंगाल के शांतिनिकेतन स्थित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय विश्वभारती की हो रही है। संस्थापक गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का जमाना देख चुके लोग आज इसके मौजूदा हालात पर खून के आंसू रो रहे हैं। यहाँ के कुलपति रजत कांत राय के खिलाफ धन लेकर मनमर्जी से नियुक्तियां करने, फर्जी मेडिकल बिल जमा कर 10 लाख से अधिक रुपए का री-इंबर्शमेंट लेने, यहाँ के प्राथमिक स्कूल में अपने रिश्तेदारों को नौकरियाँ देने और गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की कुछ पेंटिंग्स को अवैध तरीके से एक निजी कंपनी को बेच देने से आरोप लग रहे हैं। विश्वविद्यालय परिसर में पिछले 15 सितंबर से धरना-प्रदर्शन पर बैठे विश्वभारती के शिक्षकों-कर्मचारियों के संगठनकर्मी सभा के अध्यक्ष देवव्रत सरकार का दावा है कि 12वीं पास लोगों तक को शिक्षक पद पर नियुक्त कर लिया गया है।
हालात यह हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कर्मी सभा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई। मामला आगे बढ़ा और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सीबीआई जांच की मांग पर 24 अक्टूबर से विश्वविद्यालय में हड़ताल करा दी गई। उसी दिन बेहद नाटकीय अंदाज में कर्मी सभा के खिलाफ विश्वविद्यालय के वीसी भी धरने पर बैठ गए। वीसी ने राज्यपाल से मिलकर अपना पक्ष रखा है लेकिन हालात बिगड़ते जा रहे हैं। विश्वविद्यालय में गुटबाजी चरम पर है। अब ताजा घटनाक्रमों के संदर्भ में विश्वविद्यालय के काले अतीत की खूब चर्चा है।
गुटबाजी की स्थिति तब से ही चली आ रही है, जब 1951 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने महान वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस को यहाँ का वीसी बनाया था। उनके जमाने में चित्रकार रामकिंकर बैज और अंग्रेजी के एक वरिष्ठ प्राध्यापक के बीच गुटबाजी चरम पर थी। कैंपस दो गुटों में बंट गया था। विवाद बढ़ा तो नेहरूजी ने मशहूर कृषि वैज्ञानिक लियोनार्द एमहर्स्ट की अगुवाई में जांच आयोग बिठाया, जिसने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि वीसी बोस प्रतिष्ठित वैज्ञानिक हैं लेकिन अच्छे प्रशासक नहीं।
उस जमाने में हालात गुटबाजी और अन्य प्रशासनिक दायित्वों को लेकर सीमित रहे लेकिन रवींद्र के सपनों के इस मंडप पर 2004 से भ्रष्टाचार की छाया मंडराने लगी। तब के वीसी दिलीप सिन्हा पर आरोप लगा कि उन्होंने फर्जी अंकपत्र के आधार पर अपने एक रिश्तेदार को गणित का प्राध्यापक बना दिया। उन्होंने देशभर में कई कॉलेजों को अवैध रूप से मान्यता पत्र जारी कर दिया। दोनों ही मामलों में केंद्रीय जाँच टीम ने सिन्हा के खिलाफ आरोपों को सही पाया और उन्हें जेल भी हुई। उनके बाद आए वीसी सुजीत बासु के जमाने में टैगोर को मिले नोबेल पुरस्कार के मेडल और अन्य बहुमूल्य पेंटिंग आदि चोरी चले गए और अब वीसी रजत कांत राय के खिलाफ आरोपों का पुलिंदा! आश्रम से जुड़े रहे कुछ ऐसे लोगों की मानें तो अगर 1951 में विश्वभारती को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के अंतर्गत लाए जाने के बजाय इसके मूल स्वरूप को बचाए रखते हुए कोई अलग दर्जा दिया जाता तो शायद यहाँ के परिवेश में राजनीति, गुटबाजी, चूहादौड़ और अन्य गंदगियों का प्रवेश नहीं होता।
यह भारत का अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ केजी से लेकर डॉक्टरेट तक की पढ़ाई की व्यवस्था है। गुरुदेव ने ऐसे शैक्षणिक केंद्र का सपना देखा था जहाँ किसी प्रकार की कोई दीवार न हो। यहाँ के बांग्ला विभाग और विद्या भावना (कला) के 41 साल तक प्रमुख रह चुके बुजुर्ग अमृतसूदन भट्टाचार्य का मानना है कि यहाँ ऐसे वीसी की जरूरत है जो टैगोर की फिलॉसफी को समझता हो। यहाँ केंद्र ने भारत के बेस्ट स्कॉलर्स को वीसी बनाया लेकिन यह देखने की कोशिश नहीं की कि वे टैगोर के विचारों को कितना समझ पाते हैं।
शायद अपने आखिरी दिनों में गुरुदेव भी आज के हालात को ताड़ चुके थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई दफा विश्वभारती के तेजी से विस्तार पर नाखुशी जताते हुए टिप्पणी की थी कि इसे किसी आम विश्वविद्यालय की तरह नहीं बनना चाहिए। ऐसा होने पर विश्वभारती अपना मूल स्वरूप खो बैठेगा। 1941 में टैगोर के निधन के बाद विश्वभारती को सरकारी फंड मिलना शुरू हुआ। 1951 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। यहाँ पढ़ा चुके 92 साल के पेंटर दिनकर कौशिक के अनुसार, शायद वहीं से गड़बड़ियों का पौधारोपण हो गया। कौशिक यहाँ 1940 में नंदलाल बोस और रामकिंकर बैज से चित्रकारी सिखने आए थे। शांतिनिकेतन में ही रह रहे टैगोर खानदान के वंशज सुप्रिय टैगोर यहाँ के पाठ भवन के प्रिंसिपल की हैसियत से चार दशक पहले रिटायर हुए। उनके अनुसार, "केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने पर यहाँ फंड अफरात आने लगा। गुरुदेव के जमाने में धन की कमी महसूस की जा रही थी जो दूर हो गई थी लेकिन नियुक्तियों और कामकाज में जिस तरह से सरकारी नियमों की पैठ बढ़ी गड़बड़ियाँ बढ़ती चली गईं।
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Posted by Udit bhargava at 2/08/2010 07:36:00 am 0 comments
याद करो और उगल दो!
जरा गौर कीजिए एक "टिपिकल" भारतीय स्कूल की क्लास पर: "पढ़ाते" टीचर और "पढ़ते" बच्चे। यानी टीचर बोलेंगे और बच्चे सुनेंगे व जो सुना उसे याद रखने की कोशिश करेंगे। यानी टीचर ब्लैकबोर्ड पर लिखेंगे और बच्चे अपनी कॉपी में उसे जस का तस उतारेंगे व जो उतारा उसे याद रखने की कोशिश करेंगे।
बच्चों को फिक्र कि सब कुछ याद करना है और टीचर को फिक्र कि इतने समय में सारा कोर्स पूरा करना है। आज यह पाठ निपटा दिया, कल वह और शनिवार तक उसके बाद वाला चैप्टर भी कम्पलीट करवा देना है।
इस झटपट, टारगेट ओरिएंटेड शिक्षण में वे बच्चे रोड़ा होते हैं, जो सवाल करते हैं। टाइम वेस्ट करते हैं वे बच्चे! तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार कोर्स "निपटाने" में बाधा खड़ी करते हैं। अच्छे स्टूडेंट वे होते हैं जो कुछ पूछते नहीं, सिर्फ सुनते हैं। जो सोचते नहीं, सिर्फ रटते हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि यह प्रक्रिया न बच्चों के लिए आनंददायी है और न ही शिक्षकों के लिए। तेजी से भागती दुनिया में आज जो पढ़ाया, वह कल, परसों, नरसों कब तक उपयोगी रहेगा, कहा नहीं जा सकता।
ऐसे में निर्धारित पाठ बेवजह रटाने के बजाए होना यह चाहिए कि बच्चों में सीखने की ललक पैदा की जाए, तर्क करने का कौशल विकसित किया जाए। उनकी जिज्ञासा को खाद-पानी दिया जाए, उसमें मट्ठा न डाला जाए। तभी तो बेजान रोबोट के बजाए तैयार होंगे चीजों को जानने-समझने वाले युवा। नई खोज करने वाले युवा, नए शिखर छूने वाले युवा।
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Posted by Udit bhargava at 2/08/2010 07:34:00 am 0 comments
06 फ़रवरी 2010
यहाँ भी मिल सकती है नौकरी
केस 1- गायिका आकांक्षा जाचक ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर अपने रिकॉर्ड, गाने के उद्देश्य, उपलब्धियों सहित कुछ गीत भी डाउनलोड कर रखे हैं। इतना ही नहीं, किसी खास अवसर पर वे अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोगों को स्क्रेप में भी अपने द्वारा गाया गीत ही भेजती हैं।
केस 2- सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनुराग ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर सभी प्रोजेक्ट्स की डिटेल दे रखी है। पुरानी कंपनी में जहाँ वे काम कर चुके हैं, उसके साथ ही वर्तमान कंपनी की डिटेल सहित खुद के पद, जॉब प्रोफाइल आदि के बारे में भी दर्शा रखा है।
केस 3- मीडिया प्रोफेशनल अभिनव ने भी अपनी ऑरकुट प्रोफाइल में अपने कार्यक्षेत्र और बीट्स के बारे में निर्धारित तरीके से बताया है। इसी के साथ उन्होंने अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरी फोटो के साथ यहाँ लोड कर रखी है।
एचआर हेड कहते हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स से अच्छे उम्मीदवारों की हाइरिंग करना काफी पुराना फंडा है। यह बात अलग है कि यह लाइमलाइट में अब आया है। वे बताते हैं हेड हंटर्स फेसबुक, ऑरकुट या लिंक्डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स अचानक से विजिट करते हैं।
यहाँ वे प्रोफाइल में दी गई जानकारियों के जरिए जॉब सीकर्स (जॉब लेने वाले) को तलाशते हैं। उनकी प्रोफाइल को आधार बनाकर वे कम्युनिटी के ऑनर से कॉन्टेक्ट करते हैं और निर्धारित व्यक्ति के बारे में जानकारियाँ लेते हैं। उन्होंने कहा, इसलिए कोई फ्रेशर हो या अनुभवी व्यक्ति अपनी प्रोफाइल में जानकारियों को अच्छे से सजाकर जॉब प्रोफाइडर को आकर्षित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मीडिया संबंधित कोर्स कर चुके फ्रेशर हाल ही में स्वयं द्वारा पूरा किया गया प्रोजेक्ट अपलोड कर सकते हैं। वे अपनी प्रोफाइल पर लिंक भी क्रिएट कर सकते हैं।
एक अन्य एचआर मैनेजर कहती हैं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए किसी व्यक्ति की स्कील्स के बारे में पता चलता है और कंपनी की कॉस्ट में कट भी हो जाता है। वे कहती हैं हाँ लेकिन यह ध्यान रखने योग्य बात है कि ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट से शॉर्टलिस्ट होने के बाद अपने रिज्यूम को अच्छे-से तैयार करें।
जब भी इंटरव्यू के लिए जाएँ, अपने सीवी में किसी भी झूठी बात का समावेश न करें, क्योंकि आपके सीवी को आपकी ऑरकुट प्रोफाइल से वेरीफाई भी किया जा सकता है। इसके अलावा स्क्रेपबुक को चेक करके ब्रेकग्राउंड चेकिंग भी की जा सकती है।इंदौर। इन तीन केसेस के जरिए हम बताना चाह रहे हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइट केवल चैटिंग, दोस्तों से कनेक्ट रहने और एंटरटेनमेंट के लिए ही नहीं है, बल्कि इसके जरिए अब कंपनियाँ व जॉब प्रोफाइडर अपने-अपने श्रेत्र के बेहतर कर्मचारियों को भी ढूँढ़ रहे हैं यानी अब क्लासीफाइड्स को भूल जाइए...।
अब अदद उम्मीदवार ढूँढने वाले लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सही उम्मीदवार का चयन करने लगे हैं। ऐसे में हो सकता है आपकी ऑरकुट या लिंक्डइन प्रोफाइल इनका अगला डेस्टिनेशन हो।
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Posted by Udit bhargava at 2/06/2010 07:01:00 am 0 comments
04 फ़रवरी 2010
माइक्रोबायलॉजी में शोध के अवसर
माइक्रोबायलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद रोजगार के क्या अवसर हैं?
माइक्रोबायलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने पर शोध आधारित मेडिसिन जॉब जैसे हॉस्पिटल और पैथोलॉजिकल लैब, डायग्नोसिस सेंटर और डिसीज ट्रीटमेंट के क्षेत्र में काफी अवसर हैं। साथ ही फार्मास्युटिकल, फूड बेवरेज, वॉटर प्रोसेसिंग, बॉटलिंग इंडस्ट्री और होटल में माइक्रोबायोलॉजिस्ट के रूप में भी अवसर हैं।
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Posted by Udit bhargava at 2/04/2010 07:40:00 am 0 comments
02 फ़रवरी 2010
पेड़-पौधों की रक्षा में करियर
प्लांट प्रोटेक्टर क्या होता है? इससे संबंधित कोर्स कहाँ उपलब्ध है?
- फसलों तथा पेड़-पौधों की कीट-पंतगों, जानवरों, पक्षियों के अलावा खरपतवार और बीमारियों से बचाने की जिम्मेदारी प्लांट प्रोटेक्टर निभाता है। पेड़-पौधों में होने वाली बीमारियों या फिर किसी परजीवी या कीट-पतंगे से होने वाले नुकसान की जानकारी देना और उसका इलाज बताना ही प्लांट प्रोटेक्टर का कार्य होता है।
बारहवीं जीव विज्ञान समूह या कृषि विज्ञान समूह से उत्तीर्ण छात्र प्लांट प्रोटेक्शन में डिग्री कर सकते हैं। डिग्री पाठ्यक्रम इन संस्थानों में उपलब्ध हैं- जवाहरलाल नेहरू कृषि विवि, जबलपुर/ कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी हिसार (हरियाणा)/ बिरला एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, राँची।
प्रोटीन मेपिंग क्या है? इससे संबंधित कोर्स कहाँ उपलब्ध हैं?
- प्रोटीन मैपिंग बायोकेमिस्ट्री की ही एक शाखा है। इसके स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु बायोलॉजी समूह से स्नातक उपाधि आवश्यक है। यह कोर्स टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई/भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली/सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट लखनऊ में उपलब्ध है।
ऑक्यूपेशनल थैरेपी का कोर्स कौन कर सकता है?
ऑक्यूपेशनल थैरेपी में किसी व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का उपचार किया जाता है। यह कोर्स जीव विज्ञान समूह से बारहवीं उत्तीर्ण छात्र कर सकते हैं। विस्तृत जानकारी के लिए वेबसाइट www.dmer.org देखें।
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Posted by Udit bhargava at 2/02/2010 08:55:00 am 0 comments
12 जनवरी 2010
इस करियर में सुकून व बेहतर भविष्य है
मेडिकल फील्ड में डॉक्टरों के बाद सबसे अहम भूमिका पैरा मेडिकल एक्सपर्ट अदा करते हैं। लैब टेक्नीशियन, एक्स-रे टेक्नोलॉजिस्ट, फूड सर्विस वर्कर, डेंटल मेकैनिक्स, फार्मासिस्ट, इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन, फिजियोथेरेपिस्ट आदि। ऐसे एक्सपर्ट रोगी के उपयुक्त और प्रभावी उपचार के लिए रोग की पहचान करने में डॉक्टर को सहयोग करते हैं। ऑप्टोमिट्रिस्ट भी ऐसे ही एक्सपर्ट होते हैं। ये आंखों से संबंधित समस्या की पहचान और उपचार का काम करते हैं।
क्या है इस क्षेत्र में
ऑप्टोमिट्री विज्ञान आंखों से जुडा हुआ है। इसके अंतर्गत मानव आंख की प्रकृति और क्रियाकलाप के बारे में अध्ययन किया जाता है। ऑप्टोमिट्रिस्ट आंखों का परीक्षण, डायग्नोसिस और उपचार करते हैं। ऐसे प्रोफेशनल्स लेंस और दूसरे ऑप्टिकल उपकरणों के द्वारा दृष्टि संबंधी समस्याओं का उपचार करते हैं। ऑप्टोमिट्रिस्ट विशेषकर प्रत्यावर्तन संबंधी त्रुटि को भी ठीक करते हैं। ऑप्टोमिट्रिस्ट ऑप्टोमिट्री का डॉक्टर होता है। ऐसे प्रोफेशनल आंख से संबंधित समस्याओं का निदान करने के लिए विभिन्न तरह के विजन थेरेपी का सहारा लेते हैं। नेत्र रोगी को आंख से संबंधित पूरी जानकारी के लिए ऑप्टोमिट्रिस्ट के पास भेज देते हैं। ऐसे प्रोफेशनल्स आंखों की सर्जरी का काम नहीं करते हैं। ऑप्टोमिट्रिस्ट एक तरह से आंखों का प्राथमिक उपचार करते हैं।
इंडस्ट्री की स्थिति
दिल्ली के अपोलो अस्पताल की आप्टोमिट्रिस्ट श्रद्धा का कहना है कि देश में प्रशिक्षित ऑप्टोमिट्रिस्ट की बहुत डिमांड है और आने वाले कुछ वर्षो तक ऐसी ही स्थिति रहने की संभावना है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में हर तीसरा अंधा व्यक्ति भारत का है। इसके अलावा लाखों लोग दृष्टिदोष से पीडित हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे से पता चला है कि भारत में दो लाख लोगों पर एक ऑप्टोमिट्रिस्ट है, जबकि विकसित देशों-मसलन अमेरिका और यूरोपीय देशों में यह अनुपात बहुत कम है। इन देशों में दस हजार लोगों पर एक ऑप्टोमिट्रिस्ट है। देश में फिलहाल पांच हजार के आसपास ऑप्टोमिट्रिस्ट है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि देश में दो लाख ऑप्टोमिट्रिस्ट की जरूरत है। देश के बडे शहरों के साथ ही मझोले और छोटे शहरों में खुल रहे अस्पतालों और ऑप्टिकल चेंस में ऐसे प्रोफशनल्स की डिमांड सबसे अधिक है।
संभावनाएं
ऑप्टोमिट्री का कोर्स करने के बाद जॉब हासिल करने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करने पडते। ऑप्टोमिट्रिस्ट के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। अस्पतालों के आई डिपार्टमेंट में ऐसे प्रोफेशनल्स की नियुक्ति होती है। अस्पतालों में ऐसे प्रोफशनल्स ऑप्टोमिट्रिस्ट बन नेत्र विभाग में सहायक के तौर पर काम करते हैं। आंखों से संबंधित विभिन्न तरह के मेडिकल उत्पाद बनाने वाली मल्टी नेशनल कंपनियां भी ऐसे प्रोफेशनल्स को सर्विस एग्जिक्यूटिव के तौर पर रिक्रूट करती हैं। ऐसा कोर्स करने के बाद कोई चाहे तो अध्यापन के क्षेत्र में भी करियर बना सकता है। ऑप्टोमिट्री फील्ड में उच्च शिक्षा हासिल करने वालों को शोध संस्थानों के साथ आई लेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, ऑप्टिकल शॉप, शोरूम में भी नौकरी मिल जाती है। इस कोर्स के बाद आप चाहें तो अपना ऑप्टिक शॉप, लेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का क्लिनिक खोलकर प्रैक्टिस भी कर सकते हैं।
पाठ्यक्रम
बैचलर इन ऑप्टोमिट्री (बी। ऑप्टम) चार वर्षीय कोर्स है। इसके अंतर्गत फिजिकल ऑप्टिक्स, ऑप्टिकल इंस्ट्रूमेंट की जानकारी, जनरल एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, आंख की एब्नॉर्मल और पैथोलॉजी कंडीशन, रिफ्रैक्टिव एरर्स के मूल्यांकन संबंधी तरीकों और ठीक करने के उपायों का अध्ययन किया जाता है। ऐसे कोर्स के सिलेबस में फार्माकोलॉजी, ऑप्टिक्स, विजन साइंस, बायोकेमिस्ट्री और सिस्टिमिक डिजीज का भी अध्ययन शामिल होता है। बी. ऑप्टम कोर्स में बेसिक साइंस, डिस्पेंसिंग ऑप्टिक्स और क्लिनिकल सब्जेक्ट्स की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी होती है। अंतिम वर्ष में छात्रों की इंटर्नशिप के लिए विभिन्न अस्पतालों और आई क्लिनिक्स में भेजा जाता है ताकि वे क्लिनिकल और ट्रेड में अनुभव हासिल कर सकें। ज्यादातर संस्थानों में कोर्स आठ सेमेस्टर में बंटा होता है। बी. ऑप्टम के बाद एम. ऑप्टम, एमफिल, एमएस या पीएचडी प्रोग्राम भी किया जा सकता है।
योग्यता
बैचलर इन ऑप्टोमिट्री कोर्स में दाखिला लेने के लिए उम्मीदवार का अंग्रेजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी या मैथमेटिक्स विषयों से इंटरमीडिएट होना आवश्यक है। उम्मीदवार का मान्यता प्राप्त बोर्ड से कम से कम पचास प्रतिशत अंकों के साथ इंटरमीडिएट उत्तीर्ण होना जरूरी है।
वेतनमान
लाभ की दृष्टि से ऑप्टोमिट्री देश के दस सबसे ज्यादा फायदेमंद व्यवसायों में शामिल है। एक ऑप्टोमिट्रिस्ट की आय उसके काम के घंटों, अभ्यास, फीस आदि पर निर्भर है। सरकारी अस्पताल में एक ऑप्टोमिट्रिस्ट को शुरुआत में आठ हजार रुपये प्रति महीने वेतन मिलता है। दो वर्ष के अनुभव के बाद यह बढकर 15-20 हजार रुपये प्रति महीने तक हो जाता है। प्राइवेट अस्पतालों और ऑप्टीकल चेंस में 8 से 10 हजार रुपये मासिक वेतन पर ऑप्टोमिट्रिस्ट को नियुक्त किया जाता है। अनुभव के बाद सैलरी बढकर 25 हजार रुपये के आसपास हो जाती है। अनुभवी ऑप्टोमिट्रिस्ट को 6 से 7 लाख रुपये तक का सालाना पैकेज आसानी से मिल जाता है।
प्रमुख संस्थान
1. डॉ.राजेन्द्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थेलॉजिक साइंसेज, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, सफदरजंग एनक्लेव, अंसारी नगर, इग्नू तथा श्रॉफ अस्पताल दरियागंज, दिल्ली
2. एल.वी. प्रसाद कॉलेज, हैदराबाद
3. एलाइट स्कूल ऑफ ऑप्टीमिट्रिस्ट, चेन्नई
4. लोटस स्कूल ऑफ मुंबई, मुंबई
5. जी. आर. मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर
6. गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, पटियाला
7. पटना मेडिकल कालेज, पटना
8. भारतीय विद्यापीठ मेडिकल कॉलेज, पुणे
9. अलीगढ मुसलिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ
10. गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल
इस क्षेत्र में डिप्लोमा पाने के लिए एक साल व डिग्री के लिए दो साल की फेलोशिप भी की जा सकती है। इस क्षेत्र में काम के घंटे नियत व भविष्य उज्ज्वल है।
दिल्ली स्थित चौधरी आई क्लीनिक के ऑटोमिट्रिस्ट सनी से बातचीत -
अपने कार्य अनुभव के बारे में बताइए?
अब तक का मेरा कार्य अनुभव बहुत ही अच्छा रहा है। मैं ऑप्टोमिट्रिस्ट के तौर पर कार्य करते हुए प्रसन्न हूं।
महिलाओं के लिए यह प्रोफेशन कैसा है?
मेरे खयाल से महिलाओं के लिए यह अच्छा प्रोफेशन है। अस्पताल में आठ घंटे की ड्यूटी होती है। समय निश्चित होता है। काम के अतिरिक्त घंटे नहीं होते, न ही घर पर काम करना होता है। इस काम को करते हुए परिवार के लिए वक्त निकालने की पूरी गुंजाइश रहती है।
डिग्री या डिप्लोमा कौन सा कोर्स बेहतर होता है?
ऑप्टोमिट्री में डिग्री कोर्स करना ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि डिग्री होल्डर्स की मांग डिप्लोमा वालों की तुलना में ज्यादा है।
इस क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं के बारे में बताइए?
देश में अस्पताल और आई क्लिनिक धडल्ले से खुल रहे हैं। लोगों में भी जागरूकता बढ रही है। ऐसे में मैं यह कह सकता हूं कि इस कोर्स को करने के बाद जॉब पाने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी।
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Posted by Udit bhargava at 1/12/2010 03:10:00 pm 0 comments
11 जनवरी 2010
गूँजती शहनाइयों के बीच उम्दा कमाई
वेडिंग प्लानर कौन होता है तथा इस क्षेत्र में करियर के क्या अवसर हैं?
वेडिंग प्लानर न सिर्फ विवाह समारोह के आयोजन की पूरी योजना बनाता है वरन् उस योजना को खास रूपरेखा प्रदान कर अंतिम रूप भी देता है। चूँकि वर्तमान में लोगों के पास समय की भारी कमी है। इसके चलते वेडिंग प्लानर की माँग और ज्यादा बढ़ गई है।
वेडिंग प्लानर का पाठ्यक्रम करने हेतु शैक्षणिक योग्यता बारहवीं उत्तीर्ण है। इस व्यवसाय में आय की सीमा नहीं है। ग्राहकों को संतुष्ट करने में सफल रहे तो हजारों नहीं लाखों में आमदनी होती है। इवेंट मैनेजमेंट के क्षेत्र में डिग्रीधारी उम्मीदवार भी इस क्षेत्र में अच्छा करियर बना सकते हैं। वेडिंग प्लानिंग/ इवेंट मैनेजमेंट का कोर्स इन संस्थानों में उपलब्ध है, इंस्टीट्यूट ऑफ वेडिंग प्लानिंग आईएएमएस, आईएफजेडी, नोएडा/ देवी अहिल्या विवि, इंदौर। यूनिवर्सिटी ऑफ पुणे, गणेशखिंद पुणे, महाराष्ट्र।
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Posted by Udit bhargava at 1/11/2010 07:51:00 pm 0 comments




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