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18 मार्च 2012

बदलते माहौल से मिलते नए विचार

हार्पिक, जो एक टांयलेट क्लीनर है, को प्राइमरी पैकेजिंग के हिसाब से श्रेष्ट माना जाता है। इसके बनावट कुछ इस तरह की है की व्यक्ति इसकी बाँटल सीधी पकड़कर क्लीनीनिंग लिक्विड को ऊपर की और उड़ेल सकता है, लेकिन दुनिया में हार्पिक जैसी कुछ ही डिजाइन हैं। कारपोरेट जगत में अमूमन यह मानना जाता है की जैसे-जैसे कंपनी का आकार बड़ा होता जाता है, वह डिजाइन के बारे में सोचना उतना ही कम कर देती है और यही कारण है की बड़ी कम्पनियां डिजाइन के मामले में ज्यादा प्रयोगधर्मी नहीं होतीं।
  स्ट्रेटेजिक मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर और 'द डिजाइन आँफ बिजनेस' किताब के लेखक रोजर मार्टिन का कहना है की आगे चलकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वही बढ़त की स्थिति में होगा, जो डिजाइन के बारे में ज्यादा सोचेगा। बकौल मार्टिन, 'कारोबार में सबूत का मतलब होता है अतीत के विश्लेक्षण से जुटाए गए सटीक आंकड़े। किसी नए विचार के लिए कोइ पिचले आंकड़े नहीं होते। प्रतीकात्मक तौर पर नए विचार हमारे आस-पास के माहौल में हो रहे बदलाव के संकेतों के जरिये आते हैं, जिनकी मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती।'
  कैलीफिर्निया में मैक्डोनल्ड ब्रदर्स ने जब पहले-पहल ड्राइव-इन रेस्टोरेंट शुरू करने के बारे में सोचा, तो वे इस बार को लेकर उलझन में थे की युद्ध के बाद, बेबी बूम कल्चर के दौर में अमेरिकी उनके उत्पाद लेना पसंद करेंगे या नहीं। उन्हें इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था। कुछ बुनियादी जांच-परख की तकनीकों को अपनाने के बाद उन्हें लगा की ड्राइव-इन रेस्टोरेंट के बजाय ऐसा रेस्टोरेंट खोलना सही रहेगा,जो ग्राहकों को त्वरित सेवा दे, जिसके मेन्यु में सीमित आइटम हों और एक सर्विस विंडो हो।मैनेजमेंट में इसे सीखने की 'स्वतः शोध तकनीक' कहा जाता है। इसका मतलब है की किसी के सम्बन्ध में खुद ही सीखना या सीखने की ऐसी तकनीक अपनाना जो प्रशिक्षुओं  को अपने बलबूते समाधान तलाशने के लिए प्रेरित करे। मैक्डोनल्ड ब्रदर्स ने अमेरिकियों से सीखा की वे क्या खाना चाहते हैं, इसे किस तरह से पाना चाहते हैं और किस मात्रा या साइज में खाना चाहते हैं। बाद में मैक्डोनल्ड ने बर्गर का एक स्टैण्डर्ड साइज तय कर दिया। इस तरह एक डिजाइन तैयार हो गयी। उन्होंने बेकार के ताम-झाम को हटा दिया और फास्ट-फ़ूड रेस्टोरेंट के हर भाग का मानकीकरण कर दिया। यही कारण है कि आज मैक्डोनल्ड कैलीफोर्निया के कुछ रेस्टोरेंट्स से बढ़कर दुनिया की सबसे बड़ी फास्ट फ़ूड चेन में तब्दील हो गया।
 

17 मार्च 2012

जेल भी बन सकती है कमाई का जरिया

आखिर हमें किराए पर क्या-क्या मिल सकता है? पुराने दिनों में हमें माकन, साइकिल या अन्य वाहन किरय पर मिल सकते थे। इसके बाद कपडे, शादी के परिधान, हवाई जहाज (क्रू सेवाओं समेत या बगैर क्रू) और यहाँ तक की भूर्ण को गर्भ में रखने के लिए कोख भी करिये पर उपलब्ध होने लगी। अब एक देश द्वारा अन्य देशों को जेल भी किराए पर देने की नई अवधारणा सामने आई है।
  हालाकि, अपने यहाँ अतिरिक्त पड़े किसी सामान को किराए पर देकर आय कमाना कदाचित ही श्रेष्ठ अवधारणा मानी जाए, लेकिन नीदरलैंड्स ने किराए जैसे शब्द को पुनर्परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। इसके आधिकारिक तौर पर बेल्जियम जैसे देश को अपनी कौल्कोथारिया किराए पर देने का फैसला किया है, जो अपने यहाँ अपराधियों को कैद में रखें के लिए जगह की कमी से जूझ रहा है। अपने यहाँ बड़ी मात्रा में अतिरिक्त कालकोठरियों को देखते हुए नीदरलैंड्स ने दक्षिणी इलाके में स्थित डच सिटी आँफ टिलबर्ग की जेल में 500 बेल्जियम कैदियों को रखने पर सहमती जताई है। इसके बदले में बेल्जियम उसे तीन साल के अनुबंध के तहत सालाना 30 मिलियम यूरो की राशि देगा।
  हम इससे क्या सीख ले सकते हैं? यदि हम कुछ सीखें नहीं, तो भी कम से कम इस विचार को कांपी कर ही सकते हैं। देश में ऐसे सैकड़ों गाँव और छोटे कसबे हैं जहाँ बड़ी मात्रा में खाली जमीन है। बिल्डर लंबी सिर्फ बड़े-बड़े आकार की कालोनियां बनाती है। आखिर अंतरराष्ट्रीय स्टार के जेल बनाकर इन्हें मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता की जेल अथांरिटीज को किराए पर क्यों नहीं दिया जा सकता? देखा जाए तो सम्बंधित राज्य सरकारें अपने यहाँ अंदरूनी इलाकों में इस तरह के बड़ी जेलें बना सकती हैं और विभिन्न केन्द्रीय कारागारों की और से कब्जे में राखी गयी जमीनों को इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए मुक्त किया जा सकता है। इसके लिए गाँवों में व्यापक भूमि आधार चाहिए, जो हमारे देश में कोई समस्या नहीं है। एक सुदृढ़ दीर्घकालीन बिजनेस प्लान और राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिये ऐसा हो सकता है। फिलहाल जेल की कम से कम नब्बे प्रतिशत जगह ऐसे लोगों से भरी रहती है, जिनके बारे में तमाम कोर्ट फैसला सुना चुके हैं और जो सिर्फ अपनी सजा काट रहे हैं। सिर्फ दस प्रतिशत विचारधीन कैदियों की सुनवाई बड़े शहरों की अदालतों में होती है। यदि इन नब्बे प्रतिशत कैदियों को कोर्ट के आदेश के बाद स्थानांतरित कर दिया जाए तो इन भीडभाड भरे शहरों में काफी जगह निकल सकती है और इससे ग्रामें जनता के लिए भी बड़ी मात्रा में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

15 मार्च 2012

ग्राहक की भावनाओं का करें सम्मान

आपको फिल्म 'सारांश' में अनुपम खेर का मर्मस्पर्शी अभिनय याद ही होगा, जिसमें उन्होंने युवा बेटे के असामयिक निधन से टूट चुके पिता की भूमिका निभाई थी। फिल्म में अनुपम का किरदार मुख्यमंत्री के सामने दुखी होते हुए कहता है की वह कोई वीडियो या रेफ्रिजरेटर नहीं मांग रहा है, बल्कि अपने मृत बेटे की अस्थियाँ पाना चाहता है।
   मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में रहने वाले सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी एम.एस. श्रीवास्तव का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वह अपने बच्चों के सोनी इरिक्सन मोबाइल T -100 की बैटरी बदलवाना चाहते थे, जिसे सात साल पहले खरीदा गया था। उनके लिए यह उपकरण अपने प्रिय बच्चों की आख़िरी निशानी है, जिनकी एक दुखद दुर्घटना में अकाल मौत हो गयी। एम.एस. श्रीवास्तव की दो बेटियाँ और एक बेटा था। जून 2003 में उनकी बेटी ने अपने भाई के लिए एक सोनी मोबाइल हैंडसेट खरीदा। श्रीवास्तव की बड़ी बेटी, जो शादी के बाद सूरत में सैटल हो चुकी थी, ने जुलाई 2004 में उन्हें अपने घर बुलाया। श्रीवास्तव के भाई का लड़का भी उनके साथ वहां गया।
  श्रीवास्तव के दामाद के साथ चारों बच्चे सूरत के निकट सुवाई बीच पर पिकनिक मनाने के लिए गए। सुर्भाग्य से नियती को कुछ और ही मंजूर था। श्रीवास्तव खानदान के चारों बच्चों की डूबने से मौत हो गई, जबकि उनके दामाद को हेलीकाप्टर की मदद से बचा लिया गया। बच्चों की मौत से पूरी तरह टूट चुके श्रीवास्तव इस मोबाइल के साथ घर लौटे, जो बच्चों और उनके माता-पिता के बीच साझा कड़ी था। जब यह फोन बजता, श्रीवास्तव को यूं महसूस होता मानों उनके बच्चे उन्हें पुकार कर रहे हैं।
   श्रीवास्तव ने मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। हालांकि पिछले कुछ महीनों से इसकी बैटरी दागा देने लगी थी। उन्होंने बाजार में जगह-जगह इसकी नई बैटरी तलाशी। कंपनी का यह मोबाइल सेट चलन से बाहर हो चुका था, लिहाजा कहीं भी इसकी बैटरी उपलब्ध नहीं थी।
  लेकिन श्रीवास्तव भावनात्मक कारणों की वजह से इसे खुद से अलग नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कंपनी के सर्वित सेंटर से कई बार संपर्क किया, इसके बावजूद उन्हें बैटरी नहीं मिल सकी। आखिरकार उन्होंने फर्म के अध्यक्ष बर्ट नोर्डबर्ग को अमेरिका में एक इमेल भेजा। इस इमेल में उन्होंने अपने मरहूम बच्चों के साथ अपने 'पाक रिश्ते' का मर्मस्पर्शी अंदाज में जिक्र किया था। ईमेल भेजने के कुछ ही दिन बाद इस कंपनी को भारतीय इकाई के मुखिया और कस्टमर रिलेशन डिपार्टमेंट द्वारा उन्हें सूचित किया गया की बैटरी की वैश्विक स्तर पर खोज की जा रही है और वे जल्द ही इसकी उपलब्धता के बारे में उन्हें जानकारी देंगें। एक हफ्ते बाद उन्हें बताया गया की सिंगापुर में इसकी बैटरी मिल गई है और इसे दिल्ली लाया जा रहा है।
  दो दिन बाद उन्हें सूचित किया गया की बैटरी दिल्ली पहुँच चुकी है और अगले तीन दिनों में इसे उज्जैन में उनके पते पर कोरियर कर दिया गया। ईमेल भेजने से लेकर रिल्प्लेस्मेंट बैटरी के उन तक पहुँचने तक यह पूरा मामला 22 दिनों में निपट गया। हालांकि उन्हें अपने इस अथक प्रयास के लिए एक भी पैसा नहीं चुकाना पडा।

16 सितंबर 2011

सक्सेस की यूएसपी ( USP of Success )

ज्ञापन की दुनिया के एक मशहूर एक्सपर्ट रोजर रीव से जब यह पूछा गया कि किसी भी प्रोडक्ट, ब्रांड, संस्थान या व्यक्ति की सफलता का सूत्र क्या है, तो उन्होंने कहा कि 'There is nothing (in this world) which is successful without USP (unique selling prosposition)'

अर्थात संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने बिना "Unique Selling Proposition" के सफलता पाईआखिर यह "Unique Selling Proposition" क्या है?

इसका मतलब है कि किसी चीज या व्यक्ति में सफल होने के लिये एक ऐसी विशेषता होनी चाहिएजो केवल उसको दूसरों से अलग करे और साथ ही दूसरे व्यक्तियों को उस विशेषता से अच्छा लाभ होता हुआ भी लगे

उदहारण के लिये एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारत के ग्रामीण इलाकों के लिये एक ऐसा रेडियो चालूइसी तरह से एक शेविंग क्रीम निर्माता ने क्वालिटी को बिना गिराए ऐसी क्रीम मार्केट में उतारी, जो बेहद सस्ती थीइसका सबसे बड़ा फायदा बार्बर शाँप [नई की दुकानों] हो हुआ। यही कारण है कि देश के अधिकाँश छोटे एवं माध्यम साइज की नई की दुकानें इसी शेविंग क्रीम का इस्तेमाल ग्राहक की शेव बनाने के लिये करते हैंऐसा करने से उनकी बचत अधिक होती है। वे अधिक पैसा कमाते हैंइसी तरह यदि आप किसी संसथान के लिये कार्य कर रहे हैं तो आपको इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि आप में ऐसी क्या विशेषता है जो आपको दूसरे कर्मचारियों से अलग करती हैआप में हजारों अवगुण हो सकते हैं, जिसके बारे में सारी संस्था Gossip करती है, परन्तु एक ऐसा गुण या विशेषता भी होनी जरूरी है, जिससे संस्था को लाभ होक्या आप में सोचने की शक्ति अच्छी है, क्या आप अच्छी रिपोर्ट लिख सकते हैं या आप में भाग-दौड़ करने की क्षमता है या आपका दिमाग बहुत Analytical है या आप में Networking करने की काबलियत है अर्थात आप दूसरों से अच्छे Relation [संबंध] आसानी से बना सकते हैं इत्यादिआकर यह देखा जाता है कि कर्मचारी या एग्जीक्यूटिव अपने अवगुणों पर होने वाली Gossip को राजनीति की संज्ञा देकर उससे परेशान होते रहते हैं और अपनी Energy व्यर्थ ही Waste करते हैंउनको अपना सारा ध्यान अपने उन गुणों का विकास करने में लगा देना चाहिएजिससे संस्थान को लाभ हो और वह दूसों से अलग नजर आएं


06 फ़रवरी 2011

आंकड़ों की सच्चाई जानिये

Corporate World में Statistics का उपयोग अत्याधिक है. Smart Manager अपने सुन्दर  Laptop के साथ मीटिंगों में आते हैं और उनकी Screen पर Statistical Charts के माध्यम से अपने डिपार्टमेंट के रिजल्ट्स समझाते हैं.

इसी तरह के प्रत्येक सरकार भी Statistical आंकड़ों के मकडजाल के माध्यम से अपनी Performance जनता के सामने पेश करती है.

हमें बहुत सावधानीपूर्वक इन आकड़ों को स्वीकार करना चाहिए. यदि आप कुछ Simple Tips का इस्तेमाल करें, तो आंकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई एकदम से उजागर हो जायेगी. उदहारण के लिये एक कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर ने अपने मैनेजिंग डायरेक्टर को सूचित किया कि वर्तमान वर्ष में उनकी कंपनी के उत्पादों की बिक्री पिछले वर्ष के मुकाबले 20 प्रतिशत से बढी है. यह सब कुछ उसका एवं उसकी टीम के कठिन श्रम का नतीजा है. लिहाजा कंपनी को इस परिणाम को लेकर Celebrate करना चाहिए.

यदि आप Corporate World के सधे हुए खिलाड़ी हैं, तो उपरोक्त आंकड़ों को ध्यान से Analyse करें. अपने मैनेजर को शाबाशी देने से पहले यह पूछे कि सम्पूर्ण Industry की Growth क्या है. यानी के अपनी कंपनी और बाजार में मौजूद इसी तरह के उत्पाद बनने वाली कम्पनीयों की बिक्री को जोड़ लिया जाए. तो पिछले वर्ष के मुकाबले इस सम्पूर्ण Industry की Sales में कितनी वृद्धी हुई है. यदि यह वृद्धी 75 प्रतिशत है, तो आपकी कंपनी के लिये यह चिंता का विषय है कि आपकी कंपनी की प्रतिशत वृद्धी मात्रा 20 प्रतिशत क्यों है. इसका दूसरा सीधा सा मतलब यह भी निकलता है कि आपकी प्रतिद्वंदी कंपनी की बिक्री आपके मुकाबले अधिक तेजी से बढी है. जिसके परिणामस्वरूप आपकी कंपनी का मार्केट शेयर काफी कम हो गया है.

ऐसी स्थिति में तो आपकी कंपनी को Celebrate न करके, मैनेजर को Punish करना चाहिए.

इसी तरह से यदि आपको सूचना मिले कि पिछले वर्ष के मुकाबले आपकी कंपनी की Sales कम हो गई है, तो आपको फ़ौरन यह देखना चाहिए कि सम्पूर्ण Industry की Sales कितनी कम हुई है. यदि Industry की Sales अधिक गति या प्रतिशत से कम हुई है, तो आपको मैनेजर को शाबासी देनी चाहिए कि उसके प्रयासों से कंपनी की बिक्री में कम गिरावट आई है.

याद रहे......                                                                                                                        
जब सबको फायदा हो रहा है, तो मेरा फायदा सबसे अधिक होना चाहिए. और यदि सबको नुकसान हो रहा है, तो मेरा नुकसान सबसे कम होना चाहिए.

05 फ़रवरी 2011

बच्चे के रूझान के मुताबिक़ हो शिक्षा


हरियाणा के पानीपत जिले में स्थित कुराना जैसे छोटे गाँव से निकलकर IIT में शिक्षा हासिल करना अशोक कुमार के लिये  सपने के सच होने जैसा था. हालांकि जब कुमार को यह महसूस हुआ कि उनकी दिलचस्पी लोगों की सेवा करने में है, तो उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (I.P.S) से जुड़ने का फैसला किया. फिलहाल वह दिल्ली में सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स (C.R.P.F) में प्रतिनियुक्ति पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

कुमार की किताब 'Human in Khaki', जिसमें उन्होंने एक IPS  के कंरियर से जुड़े वृतांत और घटनाओं का वर्णन किया है, का हाल ही में दिल्ली में विमोचन हुआ है. इस किताब में आज के भारत के समक्ष मौजूद तमाम समकालीन मुद्दों मसलन आतंकी हमले, महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और बदलते Value System इत्यादि का जिक्र किया गया है. कुमार ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्कूल में पूरी की और IIT दिल्ली से Mechanical Engineering में B.Tec और Tharmal Engineering में M.Tec Degree हासिल की. उन्हें 1986-87 में IIT, दिल्ली में Writer of the Year के खिताब से भी नवाजा गया.

कंरियर में बदलाव से जुडी मुश्किलों के बारे में बात करते हुए कुमार कहते हिं, 'हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी है कि हमें अपने कंरियर संबंधी निर्णय तब लेने पड़ते हैं, जब हम स्कूल में होते हैं और बारहवीं कक्षा वह स्तर नहीं होता जब हम आत्मावलोकन करते हुए यह तय कर सकें कि अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं. हमारे निर्णय ज्यादातर दूसरों से प्रेरित होते हैं. कोई जाँब करते समय ही हम उसकी खूबियों या खामियों के बारे में समझ पाते हैं. तब ही हम यह तय कर पाते हैं कि बाकी जीवन भी इसे करते रहना चाहते हैं या नहीं.' उनका आगे कहना था, 'पुलिस में नौकरी करते हुए कई जगहों पर अलग-अलग तरह से सेवाएं देने के बाद अब मुझ लगता है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद मैं आम आदमी के जीवन में कुछ बदलाव लाने में कामयाब रहा. हमेशा से यही मेरा लक्ष्य रहा है.'

कुमार के मुताबिक़ IIT जैसे संस्थान व्यक्ति को जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रभावी, सक्षम और उत्कृष्ठ बनाना सिखाते हैं. कुमार आगे कहते हैं, 'इससे मुझे अपनी पुलिस सेवा में मदद मिली. मेरी ताकत इस बात में निहित है कि मैं कितनी कुशलता से गरीब, जरूरतमंद और उत्पीडित लोगों की मदद कर सकता हूं.’

कुमार ने कंरियर में Engineering की राह न चुनकर पुलिस सेवा को चुना. लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी दिलचस्पी वाले काम से जुड पाते हैं? पुलिस भी अपने बीच IIT से निकले शख्स को पाकर खुश हो सकती है, लेकिन ऐसे कितने कार्यक्षेत्र हैं, जिनमें उन लोगों को जगह मिलेगी, जो उसके कार्यक्षेत्र हैं, जिनमें उन लोगों को जगह मिलेगी, जो उसके विशेषज्ञ नहीं हैं? हमारा शिक्षा तन्त्र हर काम को अनुभव करने की इजाजत नहीं देता, ताकि हम समझ सकें कि आगे चलकर कौन सा काम करना चाहते हैं.

फंडा यह है कि...                                                                                                                          
हमारे अभिभावकों व शिक्षकों को यह जानना चाहिए कि बच्चे की दिलचस्पी किस क्षेत्र में है. बच्चे की रुचि को समझकर उसे उसी दिशा में शिक्षित करे ताकि उसका जीवन सार्थक हो सके.

ग्राहक और बाजार के बारे में रहे पूरी जानकारी


ग्राहक एक बार किसी कंपनी से मुंह फेर लें, तो फिर दुबारा उसकी ओर नहीं लौटता. इन ग्राहकों को आपसे दूर ले जाने का काम कोई और नहीं आपके प्रतिस्पर्धी ही करते हैं. यह कहना है Rodenberg Tilmain and Associates के Managing Partner Joseph Rodenberg का. उनका मानना है कि संतुष्टि का भाव ही सफलता का सबसे बड़ा शत्रु है.

किसी भी कंपनी के सबसे अहम निर्णय बोर्डरूम के अंदर नहीं, बल्कि बाहर लिये जाते हैं. इन निर्णयों को लेने वाले कोई दूसरे नहीं, कंपनी के ग्राहक ही होते हैं. ये निर्णय इस सन्दर्भ में होते हैं कि कंपनी के उत्पाद खरीदे जाएं या नहीं. उनके कंपनी दैनिक, साप्ताहिक या मासिक आधार पर एक्सेल चार्ट पर निगाह दौडाते हुए यह जानने की कोशिश करती हैं कि बिक्री में किस तरह का उतार-चढ़ाव आया. यदि उनकी बिक्री बढ़ती है तो वे जश्न मनाती हैं और अगर इसमें गिरावट आती है तो अपनी सेल्स टीम को बुलाकर फटकारती हैं या पुराने सेल्सकर्मियों को हटाकर नए लोग ले आती है. इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में कंपनियों के भीतर Competitive Intelligence (प्रतिस्पर्धी जानकारी) पर आधारित प्रबंधन व नीति-निर्धारण पीछे छूट जाता है.

इस प्रतिस्पर्धी  माहौल को देखते हुए किसी भी बाजार में कंपनी के लिये ऐसी जानकारियों की जरूरत होती है, जिस पर आगे काम किया जा सके. इसके लिये विशुद्ध तथ्यों पर आधारित Competitive Intelligence (सीआई) बहुत अहम है. Strategic and Technical Intelligence यह जानना है कि बाजार आपको 'क्यों' और 'कैसे' प्रभावित करता है. बाजार के आंकड़े और जानकारिया सबके लिये उपलब्ध हैं, लेकिन इनमें से 80 फीसदी आंकड़े बेतरतीब होते हैं. उपलब्ध आंकड़े कंपनी के लिये प्रासंगिक हो भी सकते हैं और नहीं भी. यदि इन आंकड़ों पर काम न किया जाते तो ये बेतरतीब पड़े-पड़े बेकार हो जाते हैं. Competitive Intelligence आंकड़ों को उपयोगी जानकारी में बदलने की कला है. इसके लिये उन आकड़ों का विशलेक्षण करना होता है जो कंपनी के लिये प्रासंगिक हैं. अपनी बाजार संबंधी नीति तैयार करने के लिये ऐसी जानकारी जुटानी पड़ती है, जिस पर आगे काम किया जा सके.

किसी भी कंपनी को अपने ग्राहक, बाजार की हलचल, तकनीक व रूझान में बदलाव, अपने प्रतिस्पर्धियों, उनकी रणनीति, उनके लक्ष्य, ग्राहकों के Feedback इत्यादि के बारे में लगातार जानकारी जुटाने की जरूरत है.

 रोड़ेनबर्ग कहते हैं, 'Competitive Intelligence पर आधारित मेरी मास्टर क्लास से जुड़ने वाले ज्यादातर लोग Strategic Intelligence based Management and Marketing की जरूरत को समझते हैं, लेकिन वे लगातार पूछते रहते हैं कि उन्हें इससे सम्बंधित जानकारी कहाँ से मिल सकती है?' प्रबंधन द्वारा रणनीतिक मामलों पर चर्चा के लिये सालाना बैठक बुलाने की Competitive Intelligence कोई साल में एक बार होने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह तो अपने ग्राहकों और प्रतिस्पर्धियों के बारे में जानकारी पाने और उसे लगातार अपडेट करते रहने की सतत प्रक्रिया है. यह अनुशासित ढंग से सोचने और काम करने की प्रक्रिया है. Competitive Intelligence कंपनी को अग्रगामी रूप से सक्रीय होने और बाजार के बदलावों के प्रति प्रतिक्रियाशील न होने में मदद करती है.

फंडा यह है कि...                                                                                                               
यदि आप अपने ग्राहकों के बारे में नहीं जानते और यह नहीं समझते कि वे आपके उत्पाद को क्यों पसंद या नापसंद करते हैं, तो प्रतिस्पर्धी बाजार में अंदर ही अंदर चल रहे बदलावों के बारे में सटीक जानकारी नहीं जुटा पायेंगे. 

04 फ़रवरी 2011

परदेश में बसो तो ध्यान रखो...

अपने देश को छोड़कर दूसरे देशों में रहने की तमन्ना भारतीयों में अथाह है. जोड़-तोड़ लगाकर और जोश में भारतीय चले तो जाते हैं, लेकिन वहां के समाज में घुलने-मिलने में प्रारम्भिक वर्षों में उन्हें बहुत कठिनाई होती है. उन्हें दूसरे देश के निवासियों का रिजेक्शन झेलना पड़ता है और चरम परिस्थितियों में कई भारतीय एडजस्ट नहीं होने के कारण मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर आत्महत्या तक को मजबूर हो जाते हैं. जिसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि बातें बहुत छोटी-छोटी सी होती है.

अमरीकी किसी के भी बहुत जल्दी दोस्त बन जाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपके कठिन परिस्थितियों में वे आपके वित्तीय एवं व्यक्तिगत दायित्वों की पूर्ती में सहायक होंगे. भारत में इसके विपरीत किसी भी दोस्ती में दोनों ही चीजों की आवश्यकता है.

जापान के समाज में निवासी बनने से पहले यह जान लो कि किसी भी जापानी द्वारा की गई सहायता [चाहे कितनी भी छोटी हो या बड़ी हो] को भविष्य में आपके द्वारा लौटाना आवश्यक है. अक्सर जापानी यह आशा करते हैं कि कुछ हजार डाँलर आपको डाक्टर, वकील, अध्यापक को प्रति वर्ष उनकी फीस के अलावा देने हैं, क्योंकि वे आपके परिवार का ध्यान रखते हैं. वहां यह भी पारंपरिक है कि जैसे ही आपका बच्चा प्राइमरी स्कूल की क्लास उत्तीर्ण करे, तो एक-दो लाख रूपये आप स्कूल के अधिकारियों को थेंक यू मनी के रूप में दे. इसी तरह से यदि आप कहीं बैठकर गप-शाप कर रहे हैं, तो किसी भी उम्र का अमरीकन यह आशा करेगा कि आप उसके प्रथम नाम से उसे पुकारें. यहीं जर्मनी, फ्रांस आदि के नागरिक इसको ठीक नहीं मानते हैं. चीन में यदि कोई अपना नाम बताता है तो पहले वह अपना फेमिली नेम बताता है और फिर अपना नाम. वे भी इस बात से हिचकिचाते हैं कि कोई भी उन्हें बिना प्रगाढ़ संबंध बने, प्रथम नाम से पुकारें. यदि हम उपहार की बात करें, तो अमरीका में कपड़ों का उपहार देना ठीक नहीं माना जाता है क्योंकि कपड़ों के बारे में निर्णय बहुत पर्सनल डिसीजन माने जाते हैं. इसी तरह से कपड़ों के उपहार रसिया में रिश्वत मानी जाती है. रूमालों के उपहार थाईलैंड, इटली, वेनेजुएला, ब्राजील देशों में ठीक नहीं माने जाते क्योंकि वहां इसको ट्रेजडी का प्रतीक माना जाता है. इसी तरह से चीन और जापान में कभी भी 'चार' वस्तुएँ एक साथ उपहार में नहीं देनी चाहिए. इसे अशुभ माना जाता है. इसी तरह ताइवान एवं चीन में घड़ी एक उपहार की तरह नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि यह मृत्यु का घोतक है.  

फंडा यह है कि...                                                                                                                                           
सारांश यही है कि जब किसी भी देश में रहने जाएं, तो उसकी संस्कृति का अध्ययन करें और उसका अपने व्यवहार में ध्यान रखें.

टाइम मैनेजमेंट का हुनर सीखें

एक ऐसा Topic है जिसके बारे में हर Meetings या Business Deal के दौरान चर्चा होती है, वह है Time Management, Time Manage कैसे किया जाए? यहाँ इसका जवाब पेश है. आप एक Paper Sheet लें और उसके शीर्ष पर 'बेहद अहम' लिख लें. ऐसी बेहद-बेहद अहम चीजों को याद करें, जिनके बगैर आप जिन्दगी से हाथ धो सकते हैं, आपकी नौकरी छूट सकती है, आपकी जमापूंजी ख़त्म हो सकती है या आपका परिवार छूट सकता है. ज्यादातर समय तो इस Column में कुछ भी ऐसा लिखने को नहीं मिलेगा.

अब इस कागज़ पर एक खडी रेखा खींचते हुए इसे दो हिस्सों में बाँट दें और उसके दोनों ओर 'Urgent व 'Non-Urgent' लिख लें. इनके नीचे आप अपनी समझ के मुताबिक UrgentNon-Urgent कार्यों को लिखें. आप 'Urgent Column के अंतर्गत तो कई Points लिख सकते हैं, लेकिन 'Non-Urgent' काँलम में कुछ भी लिखने में मुश्किल हो सकती है. अब उस 'Non-Urgent' को काटकर वहां 'अपने व अपने परिवार के लिये निवेश' के बारे में लिखें. यहाँ आप जो Points लिखेंगे, उन्हें देखकर हैरत हो सकती है. यहाँ पर Carrier और Health जैसे विषयों के अलावा आप यह भी लिख सकते हैं कि आपके बच्चे को मैट्रिक के बाद या Graduation अथवा Post Graduation में कौन सा कोर्स करना चाहिए. अब इस Chart को गौर से देखें. तमाम जरूरी व Urgent काम जो आपको अपने लिये करने हैं, वे अपने या अपने परिवार के लिए निवेश Column के अंतर्गत आ जाते हैं, जबकि बाकी सारे काम जो आसानी से अपने सहकर्मियों या किसी और को दे सकते हैं, 'Urgent' Column के अंतर्गत आ जाते हैं. इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपके Ideas कितने जबरदस्त हैं और आपका उत्पाद कितना बेहतरीन हैं. यदि आपके पास ग्राहकों की शिकायतों पर गौर करने का समय नहीं है तो आपका बिजनेस ख़त्म हो जायेगा.

यहीं आकर Choice Management की महत्ता समझ में आती है. चूंकि आप हर काम खुद करना चाहते हैं, इसलिए आपके पास समय नहीं होता. आपको काम बांटना होगा. अपने पास कम से कम काम रखते हुए यह समझना होगा कि आस-पास क्या चल रहा है. आपके पास जितना अधिक वक्त होगा, उतने बेहतर ढंग से आप अपना काम Manage कर पायेंगे.

बढाएं अपनी रोजगार क्षमता


बिहार की मोनिका डोगरा बेहतर शैक्षणिक रिकार्ड के बावजूद मुम्बई में अपना ड्रीम Job पाने में नाकाम रहीं. Networking के एक कोर्स पर 45,000 रूपये खर्च करने के बाद भी वह अपने लिये ऐसी नौकरी नहीं तलाश सकीं जिससे उन्हें अपने रोजाना के खर्चों के अलावा पढाई का खर्च उठाने में भी मदद मिलाती. उन्हें Computer Product बेचने वाली एक दुकान में महज 2500 रूपये मासिक वेतन पर एक Technical Support Job ही मिल सका. इसके पीछे मुख्य वजह यह थी कि मोनिका को English बोलनी नहीं आती थी.

दरअसल मोनिका समझ ही नहीं पाई कि पढाई-लिखाई के अलावा आप English, Soft Skills और Personality Development की ट्रेनिंग के जरिये Corporate जगत की जरूरत के मुताबित बन सकते हैं. तभी मोनिका को अपने कुछ परिचितों की मदद से तीन महीने के एक कोर्स के बारे में पता चला जिससे उसकी जरूरतें पूरी हो सकती थीं. सोमवार से शनिवार तक रोज आठ घंटे चलने वाली इस कक्षा में प्रशिक्षकों ने मोनिका को अपना अँग्रेजी शब्दज्ञान, व्याकरण और बोलने का लहजा बेहतर करने के साथ-साथ आत्मविश्वास बढाने में भी मदद की.

अँग्रेजी भाषा का ज्ञान और बोलचाल का लहजा सुधरने के साथ अब मोनिका की आय चार अंकों के बजाय पांच अंकों की श्रेणी में पहुच गई. यहाँ पर यह समझना जरूरी है कि अँग्रेजी एकमात्र योग्यता नहीं है, बल्कि आपको Corporate एटीकेट का भी ज्ञान होना चाहिए, जिनके बारे में कई बार एमबीए छात्रों को भी पता नहीं होता. इसके अलावा Corporate एटीकेट और मैनरिज्म कुछ ऐसी चीजें हैं, जिन पर छोटे शहरों में ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता. त्रिची, शिलांग, मालदा और मोगा जैसी जगहों पर मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, कामर्स व हास्पिटैलिटी  इत्यादी की पढाई कर रहे अनेक छात्र अब ऐसे कार्यक्रमों को भी अपना रहे हैं, जिससे उनकी रोजगार पाने की क्षमता में इजाफा हो. किसी भी Job में दूसरे व्यक्तियों के साथ प्रभावी Communication की जरूरत होती है. Selectors ऐसे कर्मियों की तलाश में रहते हैं जो दूसरों के सामने अपनी बात स्पष्ट ढंग से रख सकें.

फंडा यह है कि.....                                                                                                      
यदि आप बेहतर नौकरी हासिल करना चाहते हैं तो आपको ऐसी क्षमताओं से लैस होना होगा जो कारपोरेट जगत के हिसाब से जरूरी है. 

अलग तरह से भी हो सकती है देशभक्ति

बड़े कामों की शुरूआत कई बार छोटी-छोटी चीजों से और छोटी-छोटी जगहों पर होती है. इस बार गणतंत्र दिवस के अवसर जहाँ पूरा देश राष्ट्रीय तिरंगे को फहराते हुए राष्ट्रगान गा रहा था, वही बिहार की राजधानी पटना की एक काँलोनी में स्थित 'Trimurti Housing Society' में रहने वाले लोगों ने इस राष्ट्रीय पर्व को कुछ अलग ढंग से मनाने का फैसला किया. इस Apartment के ठीक सामने झुग्गी-झोपड़ियों की एक कतार है, जिनमें रहने वाले ज्यादातर परिवारों के मुखिया मुजरिम करार देते हुए विभिन्न सजाओं के अंतर्गत बेउर जेल में बंद हैं. इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे गरीबी में जीने को विवश हैं, जिनका शिक्षा से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा. ऐसे में गणतंत्र दिवस पर Apartment के रहवासियों ने अपने परिसर में एक सरस्वती पूजा का आयोजन किया और झोपड़ियों में रहने वाले 6 से 14 वर्ष के तकरीबन 30 बच्चों को इकट्ठा करते हुए उन्हें शिक्षा के साथ जोड़ने की पहल की.

धुल-मिट्टी से सने हुए इन बच्चों का पेन्सिल या इरेजर से कभी कोई वास्ता नहीं पडा था. एक बच्चे ने पेन्सिल को हाथ में चाकू की तरह थाम लिया और बोला, 'मेरे पिता इसी तरह चाकू पकड़ते हैं, जब वह मेरी माँ को धमकाते हैं' उन बच्चों को बताया गया कि पेन्सिल को उँगलियों के बीच कैसे थामा जाता है. बच्चे भी पहली बार अपने हाथ में पेन्सिल पकड़ कागज़ पर उल्लती-सीधी लिखावट में कुछ लिखते हुए काफी उत्साहित थे. यह देखते हुए Trimurti के रहवासियों ने इन बच्चों को पास के एक सरकारी स्कूल में भर्ती कराने का फैसला किया. अपने इस प्रयास के लिये Funds जुटाने की खातिर ये लोग निकट स्थित अन्य आवासीय Societies को भी Approach करने के बारे में सोच रहे हैं. ऐसे में हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा- आखिर देशभक्ति क्या है? दरअसल Trimurti Apartment के रहवासियों ने जो किया, उसमें देशभक्ति की सच्ची भावना की झलक मिलती है. उन्होंने इन बच्चों को अपराध की दुनिया में जाने से बचाते हुए  शिक्षा के साथ जोड़ते की पहल की. 18वीं सदी में ब्रिटीश राजनीतिज्ञ  रांबर्ट वालपोल ने कहा था, 'लोग अक्सर देशभक्ति के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं इसकी सार्थकता तभी है, जबकि इसे सही मायनों में अमल में लाया जाए.' यदि पटना में रहने वाले कुछ लोग देशभक्ति की सही भावना को व्यवहार में ला सकते हैं तो हम क्यों नहीं.

फंडा यह है कि...                                                                                                                  
देशभक्ति होने के लिये तिरंगा फहराना या राष्ट्रगान गाना ही काफी नहीं है. हमें कुछ ऐसा काम करना होगा, जिससे देश और समाज का व्यापक तौर पर भला हो सके.

साथ मिलकर काम करने में आसानी

मुंबई के लोग बंगलों की बजाय फ़्लैट्स में रहना ज्यादा पसंद करते हैं। इसकी वजह सिर्फ़ जगह की कमी और इसकी आसमान छूती कीमतें ही नहीं हैं, बल्कि बंगलों में जाने के बाद जिस तरह की कागजी खानापूर्ति और मेंटेनेंस का काम करना होता है, उससे भी वे बचना चाहते हैं। इस महानगर में 99.5 फ़ीसदी लोग फ़्लैट्स में रहते हैं और 95 फ़ीसदी लोगों को पता भी नहीं होता कि उन्हें पानी किस तरह मिलता है, उनकी सोसायटी की चौकीदारी कौन करता है, वे कितना कर चुकाते हैं और उनकी मैनेजिंग कमेटी को नगर प्राधिकरणों, विघुत आपूर्तिकर्ताओं जैसे विभिन्न सेवा प्रदाताओं से कितना जूझना पड़ता है। इन 95 फीसदी लोगों में से 70 फीसदी यह भी नहीं जानते कि मैनेजिंग कमेटी में कौन-कौन है। जब भी कोई बिल आता है तो वे चेक काटकर दे देते हैं और आँफिस निकल जाते हैं। याद रखें, यदि आप अकेले हैं तो आप पर अपनी व्यक्तिगत जरूरतें पूरी करने का बोझ और बढ़ जाता है. इसे यहाँ पेश एक स्टोरी के जरिये बेहतर ढंग से समझा जा सकता है.

आपने भी कभी-कभार आकाश में हंसों को 'वी' आकार के समूह में उड़ाते देखा होगा। उनके इस तरह उड़ने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है। दरअसल समूह में जब भी कोई हंस अपने पंख फडफडाता है तो वह अपने से पीछे वाले हंस के लिये झटका उत्पन्न कर उसे उड़ने में सहयोग करता है। अकेले पक्षी के मुकाबले 'वी' आकार में पूरा समूह 71 फीसदी ज्यादा दूर तक उड़ सकता है। इसी तरह जो लोग एक ही दिशा में जाते हैं या जिनमें टीम भावना होती है, वे ज्यादा दूर तक आसानी से यात्रा कर लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योकि वे एक-दूसरे के सहयोग से यात्रा करते हैं। जब भी कोई हंस इस आकार (समूह) से बाहर आता है तो उसे उड़ान में कठिनाई होने लगती है और जल्द ही वह फिर से 'वी' आकार के समूह में लौट आता है।

जब समूह में सबसे आगे उड़ने वाला हंस थक जाता है, तो वह पीछे आ जाता है और दूसरा हंस उसका स्थान ले लेता है। मुश्किल काम करते समय अदला-बदली करने में ही समझदारी है। पीछे उड़ रहे हंस प्रोत्साहन के स्वर निकालकर आगे उड़ने वाले हंसों को प्रोत्साहित करते हैं। अगर हममें भी हंसों जैसी बुद्धि हो तो हम कभी भी एक-दूसरे की मदद करने से नहीं चूकेंगे।

फंडा यह है कि....                                                                                                        
यदि बहुत से लोगों का लक्ष्य एक है तो बेहतर यही होगा कि अलग-अलग काम करने के बजाय मिलकर काम किया जाए।

01 फ़रवरी 2011

जीने की कला है: Active Life

Corporate World में इस बात पर विश्वास किया जाता है 'The Trick to live your life is to make shure that you don't die waiting for Prosperity to Come' इसका मतलब है कि 'आप अपनी जिन्दगी एक्टिव होकर जियें'. हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे. आपको ऐसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़े, जिसमें आप इनेक्टिव होकर सम्पन्नता के आने के इंतज़ार में मर जाएं.

इस तरह की जिन्दगी का उधाहरण आपको सोनी कंपनी के Co-Founder. akio morita की लाइफ का अध्ययन करने से मिलता है. इनका जन्म 26 जनवरी 1921 में हुआ था. इनकी फैमिली की 14 पीढियां व्यापार ही करती आई थी. इनको स्कूल से ही इस तरह से ग्रूम किया गया कि इनको बड़ा होकर अपना पुश्तैनी व्यापार संभालना है. परन्तु ये अपने पुश्तैनी व्यापार पर डिपेंड होकर नहीं बैठे. इन्होने पहले जापानी नेवी को ज्वाइन किया. और वहीं उनकी मुलाक़ात मासुरीइबूका से हुई, जो सोनी कंपनी के Co-Founder बने. इन दोनों ने 7 मई 1946 को अपनी कंपनी की स्थापना की और एक्टिवली अपने इलेक्ट्रोनिक के बिजनेस में रम गए. इन्होने प्रारम्भ में ही यह सोच लिया था कि टेक्नोलाँजी के विकास के कारण इस संसार की विशालता कम होती जा रही है. अब यह सम्भव है कि जापान से बाहर निकलकर पूरे संसार पर छाया जा सकता है. इस सोच के साथ akio morita ने जापान को छोड़कर अपनी फैमिली के साथ अमरीका शिफ्ट हो गए. उन्होंने माना कि अमरीका में रहकर वह उनके कल्चर को अच्छी तरह से समझ सकते हैं, और उसके अनुसार अपने प्रोडक्ट बना सकते हैं. उनके दिन-रात की मेहनत का परिणाम था कि सोनी संसार की पहली कंपनी थी जिसने 50 के दशक में ट्रांजिस्टर पर आधारित रेडियो बाजार में पेश किया.

1994 में इनको सुबह के वक्त टेनिस खेलते हुए ब्रेन हैमरेज हुआ और 1995 में इन्होने सोनी की चेयरमैनशिप से इस्तीफा दिया. इन्होने अपना सक्सेसर नोरिओ को बनाया. ये वो व्यक्ति थे जिन्होंने akio morita को एक पत्र लिखकर सोनी के टेप रिकाँर्डर की क्वालिटी की जमकर बुराई की थी. इस पत्र के बाद akio morita ने उन्हें सोनी में ज्वाइन करवा लिया था. akio morita की जिन्दगी सुपरएक्टिव थी. ब्रेन हैमरेज होने के दो महीने पहले के उनके शिड्यूल का अध्ययन करेंगे, तो हम पायेंगे कि वे अधिकतर समय वर्ल्ड टूर पर रहे जिसमें वे अपने कर्मचारियों, डीलरों, ग्राहकों से मिलते रहे. इनके मिलने वालों में छोटे से लेकर बड़े आदमी सभी शामिल थे. वे क्वीन एलीजाबैथ, जैक वेल्च, फ्रांस के प्रेसीडेंट जैक चिराक आदि से भी मिले. शायद उनको पता था कि जिन्दगी को एक्टिव होकर जीना चाहिए उनकी एक्टिव लाइफ का ही परिणाम है कि सोनी आज एक वर्ल्ड ब्रांड है.

मंत्र:  हाथ पर हाथ धरकर जीने के बजाय एक्टिव लाइफ जीना बेहतर है.

सही निर्णय से बने सफल इंसान

 Too much planning is Bad

बिजनेस में एक अच्छी प्लानिंग की जरूरत होती है. परन्तु कई मैनेजमेंट विशेषज्ञों का यह मानना है कि 'You Can not Overestimate the need to plan and prepair. You can not overprepare in Business.' अर्थात पहले से प्लानिंग एवं तैयारी की जरूरत को बिजनेस में बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बताने की आवश्यकता नहीं है. बिजनेस को बहुत ज्यादा Overprepare (जरूरत से अधिक एडवांस प्लानिंग) करके नहीं चलाया जा सकता है.'

बिजनेस करना एक तेज गेम खेलने के समान है, जिसमें आपको अपने उद्देश्य और प्रतिद्वंदी खिलाड़ियों की रणनीति के अनुसार अपना खेल खेलना पड़ता है. एक मंझे हुए खिलाड़ी को On the Spot कई ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते है, जिनकी कोई एडवांस प्लानिंग नहीं की जा सकती है. इसका यह मतलब नहीं है कि एडवांस प्लानिंग और तैयारियों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए. इनकी अपनी एक महत्ता है. परन्तु ये इतनी ज्यादा भी नहीं करनी चाहिए कि वर्तमान परिस्थितियों का आकलन ही ख़त्म हो जाए. बिजनेस की यात्रा में हर कदम पर नई से नई कठिनाइयां मुंह फाड़े खडी होती है, और साथ ही नए-नए लाभ के रास्ते भी नजर आने लगते हैं. इन सबका पहले से पूर्वानुमान लगाना सम्भव हैं. तीव्र सोच एवं समय रहते निर्णयों से एक कंपनी उन क्षेत्रों में तरक्की कर सकती है जिनके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं था.

उदहारण के लिये जापान की मित्शुबिशी कंपनी को ले सकते हैं. इसका प्रारम्भ 1870 में यातारो श्वासाकी द्वारा एक शिपिंग कंपनी के रूप में किया गया. मित्सुबिशी दो शब्दों से बना हुआ है. 'मित्सू' जिसका अर्थ है 'तीन' और 'बिशी' जिसका अर्थ है 'वाटर चैस्टनट (एक पानी का पौधा) इसने 1881 में परिस्थितियों को देखते हुए कोल माइनिंग के व्यापार में कदम रखा, इससे इनके शिपिंग व्यापार को भी काफी मदद मिली. थोड़े ही समय में मित्शुबिशी को इस कदर सफलता मिली कि इसने Banking, Insurance, Warehousing, Trade aur Technology Products आदि में सफल व्यापार स्थापित किये. इनके द्वारा बनाए गए 'जीरो' हवाई जहाज़ों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका के पर्ल हार्बर पर जबरदस्त तबाही मचाई. द्वितीय विश्वयुद्ध में हार के बाद मित्सुबिशी पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए और उनकी विकास यात्रा में जबरदस्त रूकावट पैदा हुई. परन्तु इन्होने हार नहीं मानी. नए रूल्स और रेगुलेशन के अंतर्गत मित्सुबिशी ने अपने आपको कई स्वतंत्र कंपनियों में विभाजित कर लिया. जिनके अपने बिजनेस माँडल थे, परन्तु सभी अपने प्रांडक्ट्स  के लिये मित्सुबिशी ब्रांड नेम उपयोग करती रही. इनमें से कुछ कंपनियों पर ये आरोप भी लगे कि ये अच्छी काँर्पोरेट प्रैक्टिस का पालन नहीं करती. उदहारण के लिये इनके पूर्व असंतुष्ट एग्जीक्यूटिव कमल सिन्हा ने एक वेबसाईट 'मित्सुबिशी वाच' के नाम से आरम्भ कर रखी है, जिसमें इस तरह की प्रैक्टिस पर ध्यान आकर्षित किया जाता है.

इन सारी कठिनाइयों के बावजूद मित्सुबिशी द्वारा समय रहते किये हुए निर्णयों के कारण अपनी लोकप्रियता कायम रखी.

मंत्र:  एडवांस प्लानिंग से हर वक्त काम नहीं बनता. मौके पर ले मूल्यवान निर्णय.

सही समय पर लो सही निर्णय

फोर्ड मस्टांग कार के चीफ प्रजेक्ट अधिकारी और अमरीका की क्राइसलर कार कंपनी के पूर्व C.E.O श्री ली आयाकोका के अनुसार 'Even a correct decision is wrong when it was taken too late.' अर्थात बहुत देरी से लिया गया सही निर्णय भी कई बार गलत साबित हो सकता है. यदि यह सही निर्णय पूर्ण रूप से गलत नहीं होते तो उनके सुखद परिणाम नहीं मिलते जो सही वक्त पर निर्णय लेते वक्त मिल जाते. उदहारण के लिये वर्तमान में यदि दुनिया के देशों के बीच यदि Armed Conflicts में कमी आई है तो साथ की इनके बीच व्यापारिक युद्ध बहुत बढ़ गए हैं. अब इस बात की बहुत प्रतिस्पर्धा हो गई है कि किस देश की आर्थिक प्रगति की दर अधिक है और किस देश ने विश्व बाजार के निर्यात पर अपना कब्जा बढाया है. अक्सर लोग भारत की तुलना चीन से करते हैं जिसमें वह बार-बार कहा जाता है कि भारत सरकार द्वारा नहीं लिये जाने वाले सही निर्णयों के कारण चीन से पिछड़ रहा है. पिछले दिनों जयपुर में इनफ़ोसिस कंपनी के संस्थापक नारायण मूर्ती ने यही बात बार-बार दोहराई.

उन्हों कहा की भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 26 प्रतिशत कृषि पर आधारित है. उसकी तुलना में भारत तकरीबन 60 प्रतिशत लोग अपना रोजगार कृषि से प्राप्त करते हैं. इतनी बड़ी मात्रा में लोग यदि कृषि पर निर्भर रहेंगे, तो उनकी उत्पादकता बहुत कम होती. मूर्ती ने चीन का उद्धरण देते हुए कहा कि वहां सरकार ने Policy निर्णय लेते हुए वहां की काफी बड़ी कृषि पर आधारित जनसंख्या को लाँटेक (सरल टेक्नोलांजी पर आधारित) उद्योग धंधो पर हस्तान्तरित कर दिया. इससे चीन के लोगों की इनकम बढी और वहां के एक्सपर्ट में भी इजाफा हुआ और चीन एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर कर आया. भारत को भी इसी चीज की जरूरत है. उन्होंने जोर देकर कहा, भारत के Policy Maker समय पर निर्णय नहीं ले पाते और यदि देर से निर्णय लेते भी हैं तो उसका पालन तुरंत नहीं कर पाते. उन्होंने कई लोगों की इस बात को गलत कहा कि भारत एक प्रजातंत्र है, अतः यहाँ निर्णय देर से ही होते हैं. उन्होंने कहा कि यूरोप के कई देशों में भी प्रजातंत्र है, परन्तु वहां पर निर्णय बहुत फास्ट लिये जाते हैं. अपने दिए गए भाषण में उन्होंने यह मंत्र बार-बार दोहराया कि तुरंत निर्णय कीजिये, अन्यथा देरी से लिये गए सही निर्णय भी आपको विश्व प्रतिस्पर्धा में अधिक हैल्प नहीं कर पायेंगे.

मंत्र:   निर्णय तुरंत कीजिये, देरी से लिये गए निर्णय के कारण आप प्रतिस्पर्धा में पीछे हो सकते हैं.

दुश्मनी क्यों होती है?

यूं तो प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से प्यार व दोस्ती करना चाहता है, परन्तु उसमें दुश्मनी की भावना आने में भी एक क्षण लगता है.

Management Expert के सामने यह एक अध्ययन का विषय है कि एक व्यक्ति दूसरे का दुश्मन क्यों बन जाता है. दुशमन होने का यहाँ तात्पर्य यह है कि एक व्यक्ति दूसरे से घृणा करता है और वह दूसरे को अपने मन, वचन और कर्म से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जबर्दस्त हानि पहुंचाने का मजबूत प्रयास एक रणनीति या आवेश के तहत करता है.

मैनेजमेंट विशेषज्ञों के अनुसार किसी दुश्मनी के पीछे वैसे तो अनगिनत कारणों का योगदान रहता है. परन्तु सबसे मुख्य कारण एक व्यक्ति द्वारा दूसरे के अहमको किसी तीसरे के सामने चोट पहुंचाना होता है. एक व्यक्ति की अतिमहत्वपूर्ण संपत्ति उसका अहम होता है. उसको बचाने के लिये एक समझदार व्यक्ति भी अजीबों गरीब हरकतें करने से बाज नहीं आता है.

कुछ वर्ष पहले, एक Executive को उसके पांच साल की शानदार सर्विस के बाद एकदम से कंपनी से बाहर निकाल दिया गया. उसने अपने परिवार को इसके बारे में कुछ नहीं बताया. हर सुबह वह रोज की तरह अपने घर से ऐसे तैयार होकर निकलता था जैसे कि वह आँफिस जा रहा है. उसके बाद वह अपना सारा दिन सिनेमा हाँल और यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में निकालता था और शाम को थका हारा अपने घर पहुंचता था. इस तरह से दो-तीन महीने निकलने के बाद वह तो अच्छा हुआ कि उसकी पत्नी ने किसी कारणवश आँफिस फोन कर लिया और तब जाकर पूरी बात समझ में आई. उपरोक्त उदाहरण वास्तव में बहुत ट्रैजिक है, परन्तु यह इस बात को तो दर्शाता ही है कि एक व्यक्ति अपना Face loss बचाने के लिये किसी भी स्तर पर जाकर नाटक खेल सकता है.

इसी तरह के अन्य उदहारण में एक बेहद सुलझा हुआ, समझदार विनम्र आँफिसर एक सफेदपोश दरिन्दे के रूप में उभर कर आया. हुआ ये कि उसके नीचे कार्य करने वाला एक Executive के सामने रूटीन में बताई. इस पर उस एग्जीक्यूटिव को शाबासी मिली. उसको शाबासी देने में यह आँफिसर स्वयं भी था. परन्तु इस एपीसोड एक बाद यह आँफिसर उस Executive के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से हाथ धोकर पड़ गया. अब वह उसका प्रतिदिन आने-जाने का रिकार्ड रखने लगा. छोटी-छोटी गलतियों पर उसको नोटिस इश्यू करने लगा. और कई मौकों पर उसकी पब्लिक में आलोचना भी करने लगा. उसको वार्षिक वेतन वृद्धि भी अधिक नहीं मिली. अंत में उसको त्यागपत्र देना पडा.

इसलिए मंत्र यही है कि जहाँ तक हो सके एक Executive को दूसरे का पब्लिक में अहम कम करने के जाने अनजाने प्रयासों से बचना चाहिए. उसको दूसरे तरीकों से अपने उद्देश्य हासिल करने चाहिए.

मंत्र:  किसी भी फील्ड में आप क्यों न हो? हमेशा जूनियर और सीनियर के अहम का ध्यान रखें.  

विज्ञापनों में उलझ न जाएं बच्चे

युवराज की उम्र महज दस साल है, लेकिन जब पिज्जा या बर्गर की बात आती है, तो उसके माता-पिता के लिये उसे मनाना काफी मुश्किल होता है. इस दस वर्षीय बालक के पिता सुब्रमण्यम को काफी मान-मनुहार के बाद आखिरकार बेमन से ही सही, लेकिन उसे हफ्ते में एक दिन पिज्जा या बर्गर खिलाने की मंजूरी देनी ही पडी, इस वादे के साथ कि बाकी छः दिन वह अपनी माँ के द्वारा पकाया हुआ खाना खाएगा. हमारे ज्यादातर घरों में कुछ ऐसे ही हालात हो सकते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो डायबिटीज फाउंडेशन आँफ इंडिया जैसे संस्थानों को आँन रिकाँर्ड यह कहना नहीं पड़ता कि 'जंक फ़ूड के विज्ञापनों का बच्चों की आदतों पर गहरा प्रभाव पड़ता है.' विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O) के मुताबिक़ दुनिया में कम से कम 4 करोड़ 30 लाख प्री-स्कूली बच्चे ( जिनकी उम्र पांच साल से कम है ) मोटापे का शिकार हैं और इनमें से 3 करोड़ 50 लाख बच्चे भारत जैसे विकासशील देशों में रहते हैं. एक सर्वे के अंतर्गत कम से कम 54 फीसदी बच्चों का कहना था कि वे घर में पकाए गए खाने के बजाय विज्ञापनों में दिखाए गए खाघ उत्पादों को लेना ज्यादा पसंद करेंगे.

W.H.O ने दुनिया के तमाम देशों से अपील की है कि वे अपने बच्चों को इस तरह के विज्ञापनों से दूर रखें. इस सन्दर्भ में उसने कुछ अंतरराष्टीय अनुशंसाओं को लागू करने का सुझाव भी दिया है. गौरतलब है कि पिछले साल मई में W.H.O ने बच्चों के लिये खाघ पर्दार्थों की मार्केटिंग के सन्दर्भ में अंतरराष्टीय अनुशंसाओं का एक सेट तैयार किया था, लेकिन हमारे जैसे देश में इनका क्रियान्वयन नहीं के बराबर देखने में आता है. जहाँ कई देशों ने अपने यहाँ अस्वास्थ्यकर उत्पादों की मार्केटिन को नियंत्रित करते हुए इनके विज्ञापनों को टेलीविजन या रेडियो पर प्रसारित करना बंद कर दिया है, वहीं भारत समेत ऐसे कई देश हैं, जिन्हों अब इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है. इस तरह का नियंत्रण भारत के लिये बहुत अहम है, क्योंकि हम एक ऐसे देश हैं, जहाँ युवाओं की काफी तादाद है और यदि आज इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो आज से छह या सात साल बाद हमार्रे यहाँ मोटे लोगों की विशाल आबादी होगी.

फंडा यह है कि...
बच्चे विज्ञापनों का सबसे आसान लक्ष्य हैं. अभिभावकों को देखना होगा कि कोई भी उनके बच्चों का इस्तेमाल (वह भी उनकी सेहत की कीमत पर) न कर सके.

28 जनवरी 2011

समझें सेहत की अहमियत

हमारे देश अमेरिका में वर्ष 1990 से लेकर अब तक प्रति व्यक्ति चिकित्सकीय खर्च तीन गुना तक बढ़ गया है. अमेरिकन के नेशनल हेल्थ सर्विसेज का तो यही कहना है. भारत में 50 से 60 वर्ष की उम्र के बीच के लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे कि हमारे यहाँ भी चिकित्सा बिल में पहले के मुकाबले जबरदस्त इजाफा हो चुका है.

दूसरी ओर यह भी देखा गया है कि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकियों में बाहर खाने की आदतों के साथ मोटापे की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है. इसे देखते हुए वहां कई जगहों पर स्थानीय सरकारों ने लोगों को पौष्टिक खाना खाने के प्रति प्रोत्साहित करके की कोशिश की.

उन्होंने यह सोचते हुए अपने यहाँ के हर खाघ उत्पाद के पैकेट पर कैलोरी व वसा की मात्रा लिखनी शुरू कर दी इससे लोग कुछ भी उलटा-सीधा खाने से डरेंगे और हल्का, सुपाच्य व पौष्टिक खाना खाने के लिए प्रोत्साहित होंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जिस तरह हम जैसे कई लोग सिगरेट के पैकेट पर लिखी कैंसर संबंधी चेतावनी को नजरंदाज कर देती हैं, उसी तरह अमेरिकी भी कैलोरी संबंधी सूक्ष्म जानकारी को अनदेखी कर रहे हैं.

वाशिंगटन में टेको टाइम नामक एक फास्ट-फ़ूड श्रृंखला से जुड़े शोधार्थियों ने पाया कि खान-पान की आदतें बहुत मुश्किल से छूटती है.  वहां मेन्यू में कैलोरी संबंधी जानकारी देने से पिज्जा जैसे किसी भोज्य पदार्थ की खपत पर कोई असर नहीं पडा.

भारत में बाहर खाने की प्रवृत्ति बढी है, जिसका प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से सीधा संबंध जोड़ा जा सकता है.

दूसरी ओर सिंगापुर में प्राथमिक स्कूलों के 3000 से ज्यादा बच्चों पर दो वर्ष तक किये गए एक अध्ययन ने बच्चों और गेमिंग के बीच जुड़ाव पर रोशनी डाली. कम्प्युटर या मोबाइल फोन लगातार दीवानों की तरह वीडियो गेम खेलते रहना किसी भी किशोरवय बच्चे के लिये दोपहर गुजारने का कोई सेहतमंद तरीका तो नहीं है. यह नई रिसर्च कहती है कि लगातार वीडियो गेम से चिपके रहने वाले इन 'लती' गेमर्स के अभिभावकों को इनकी मानसिक बीमारी से जुडी समस्याओं से जूझना पड़ सकता है.

फंडा यह है कि...
आगे चलकर हेल्थ का मसला काफी अहम होगा. डाँक्टरों के लिये भले ही यह कारोबारी अवसर हो, लेकिन आम इंसानों के लिये यह चिंता का विषय है.

26 जनवरी 2011

गुस्से की एनर्जी को जोश में बदलो

जब एक व्यक्ति को गुस्सा आता है, तो वह पागलपन की हदें पार कर जाता है. अपने गुस्से को ठंडा करने के लिये वह कुछ भी कर गुजरता है.

कहते हैं कि एक पोले मैच हारने के बाद [स्वतंत्रता से पहले] अलवर के महाराजा को इतना अधिक गुस्सा आया कि उन्होंने अपने घोड़े पर पेट्रोल छिड़क कर सबके सामने उसको आग लगा दी.

इसी तरह के दूसरे उदहारण में समय-समय पर आने वाले अनचाहे मेहमानों से परशान होकर एक दिन महाराजा ने एक ज्योतिषी [जो मुम्बई से चलकर अलवर पहुंचा था] को जेल में डाल दिया. जब उसने पूछा कि यह सब उसके साथ क्यों हो रहा है, तो उसकी हंसी उड़ाते हुए उसको बताया गया कि वह एक अक्षम ज्योतिषी है क्योंकी वह अपनी स्वयं की गिरफ्तारी की भविष्यवाणी नहीं कर पाया.

मैनेजमेंट विशेषज्ञ यह मानते हैं कि गुस्सा आने का एकमात्र कारण- 'एक व्यक्ति द्वारा अपने टार्गेट को प्राप्त करने में असफल होना'. एक व्यक्ति एक दिन में प्रत्येक मिनट किसी न किसी गतिविधि या क्रिया में व्यस्त होता है. मैनेजमेंट विशेषज्ञ यह कहते हैं कि 'ऐसी कोई भी गतिविधि या कार्य नहीं होता, जिसका कोई उद्देश्य नहीं हो'. इसका सीधा सा मतलब होता है कि एक व्यक्ति प्रत्येक मिनट किसी ना किसी उद्देश्य का पीछा कर्ता है. उद्देश्य प्राप्ति पर उसे बहुत खुशी होता है परन्तु उद्देश्य की पूर्ती ना होने पर उसके गुस्सा या आक्रामक होने की अत्यधिक संभावनाएं होती है. रोजाना एक व्यक्ति को लगभग 50 प्रतिशत कार्यों में पाने उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं होती है. इसलिए एक औसत आदमे को रोजाना किसी न किसी बात पर गुस्सा जरूर आता है. उदहारण के लिये, आपके सामने गाडी चलाने वाला व्यक्ति आपके बार-बार होर्न मारने के बावजूद साइड नहीं देता है, तो आप गुस्से में कुछ उलटा-सीधा कर बैठते हैं.

क्रोध एक ऐसे एनर्जी है जिसको यदि सही वक्त पर उचित दिशा में धकेल दिया जाए, तो वह एक जोश का रूप धारण कर लेती है, और इस जोश के फलस्वरूप एक व्यक्ति दीर्घकाल में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल करने में सक्षम हो जाता है.

मैनेजमेंट विशेषग्य ये सलाह देते हैं कि गुस्से के रूप में निकलने वाली ऊर्जा से एक व्यक्ति को अपनी क्रिएटिवीटी ट्रिगर करना चाहिए. यदि उसको उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो रही है तो उस पर गुस्सा करने के बजाय अपनी रचनात्मकता को उपयोग में लाकर ऐसे रास्तों की खोज करनी चाहिए जिससे आपके उद्देश्य प्राप्त हो सके. आप में स्वयं में आत्मविश्वास भी होना चाहिए को जो उद्देश्य अभी आपको प्राप्त नहीं हो सका है उसको आप कुछ समय बाद अपनी क्रिएटिवीटी से अवश्य प्राप्त कर लोगे. इससे आपको अपना क्रोध कम करने में मदद मिलेगी, और क्रोध की ऊर्जा को जोश की तरह इस्तेमाल करके दीर्घकाल में आप एक सफल इंसान भी बनोगे.

25 जनवरी 2011

महिलाओं से बढ़ता है वेल्थ क्रियेशन

मैनेजमेंट विशेषज्ञ ये मानते हैं कि किसी भी समाज की सम्रद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की स्त्रियाँ कितना व्यापारिक गतिविधियों में भाग लेती है. जितनी उनकी व्यापारिक भागीदारी बढ़ती जायेगी, उतना ही समाज में वेल्थ क्रियेशन [पूंजी का निर्माण] भी अधिक होगा।

उदहारण के लिये अमरीका में महिलाओं की व्यापारिक भागीदारी सन 1972 में मात्रा 4 प्रतिशत थी, अर्थात अमरीका 4 प्रतिशत व्यापार पर उनका मालिकाना हक़ था। जो 2006 तक बढ़कर 38 प्रतिशत से भी अधिक हो गया।  इसका सीधा सा मतलब उन महिलाओं द्वारा संचालित व्यापारिक गतिविधियों से लगभग 20 लाख करोड़ रूपयों से अधिक का कारोबार होता है और तकरीबन 30 लाख भी अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त हो रहा है।

इसका मुख्य कारण वहां पर मैनेजमेंट डिग्री के अंतर्गत एंटरप्रेन्योर्शिप विषय के प्रोत्साहन से है। एंटरप्रेन्योर्शिप का सीधा सा मतलब होता है 'रीलेंटलैसपरसूट आँव अपोर्च्यूनीटीज बियांड रिसोर्सिस करंटली कंट्रोल्ड' अर्थात उन व्यापारिक अवसरों से कदम रखो जो आपके वर्तमान के रिसोर्सिस की सीमा में असंभव दीखते हैं। लोन आदि के माध्यम से पूंजी जुटाकर व्यापारिक गतिविधियाँ प्रारंभ करके उसे सफल बनाना, अपने लोन को चुकाना और लाभ के माध्यम से समाज में सम्रद्धि का विस्तार करना।

भारत में महिलाओं की भागीदारी अमरीका के मुकाबले नगण्य है। हालांकि एमबीए आदि डिग्री में लडकियां अधिक से अधिक प्रवेश लेने लगी हैं, लेकिन उनकी भागीदारी में अधिक इजाफा नहीं हुआ है। 'एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के अनुसार 'अभी भी अधिकाँश लडकियां एमबीए डिग्री को एक कास्मेटिक डिग्री मानती हैं, इससे उनके शादी के प्रोस्पेक्टस अच्छे हो जाते हैं। शादी करने के बाद वे कोई कार्य नहीं करती, सिर्फ अपना घर-बार संभालती है।

कुछ समय से भारतीय परिवारों की सोच में कुछ बदलाव जरूर आया है, जिसके कारण से महिलाएं रोजगार क्षेत्र में प्रवेश करने लगी है, लेकिन स्वयं का व्यापार प्रारम्भ करने में अभी भी बहुत पीछे है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि वृहद स्तर पर ऐसे प्रयास किये जाएँ, जिससे अधिक से अधिक महिलाएं व्यापार के क्षेत्र में आगे आयें।