अगर आप फर्स्ट डेट पर जा रहे हैं, तो आपकी ड्रेस कैसी हो, यह बहुत मायने रखता है। ड्रेस डिसाइड करने से पहले इन टिप्स पर गौर करें:
- अगर आप सोच रहे हैं कि फर्स्ट डेट पर नई ड्रेस पहन कर जाएं, तो ऐसा बिल्कुल भी न करें। अपने वॉर्डरोब में से कोई भी ड्रेस पहन कर जाएं।
- लड़के अक्सर अपनी फर्स्ट डेट पर लड़की को इंप्रेस करने के लिए डीप नेक या स्लीवलेस टी-शर्ट पहनना पसंद करते हैं, ताकि उनकी गर्लफ्रेंड उनकी सेक्सी बॉडी देख कर इंप्रेस हो जाएं। वहीं लड़कियां भी सेक्सी व हॉट ड्रेस पहनना पसंद करती है। अगर आप ऐसी कोई योजना बना रहे हैं, तो बिल्कुल भी ऐसा न करें।
आपकी फर्स्ट डेट पर सभी का ध्यान आप पर होगा, इसलिए कुछ भी अलग पहननें से न हिचकें, ताकि आप अन्य लड़के/लड़की से अलग दिखें।
-सिंपल पहनें, जिसमें आप सुंदर दिख सकें।
-आप भौंडे कपड़े पहनने से बचें, लेकिन ऐसे कपड़े पहन सकते हैं, जिसमें आपके सिक्स पैक एब्स नजर आएं। वहीं लड़कियां भी ऐसी ड्रेस पहनें, जिसमें उनकी अट्रैक्टिव फिगर नजर आएं।
-आपने जो ड्रेस चुनी है, वह कंफर्टेबल होनी चाहिए ताकि वह आपकी डेट का मजा किरकिरा न करे।
-ड्रेस का चुनाव करते समय उसके कलर का विशेष ध्यान रखें। ड्रेस का कलर आपका फेवरिट हो और आप पर खिलें।
-ड्रेस का चुनाव करते समय उसके कलर का विशेष ध्यान रखें। ड्रेस का कलर आपका फेवरिट हो और आप पर खिलें।
- चेहरे पर ज्यादा मेकअप न थोपें, इससे आपकी नेचरल ब्यूटी दब जाएगी। चेहरे पर लाइट मेकअप करें।
-ड्रेस से मैच करती हुई हल्की-फुल्की जूलरी पहनें। हैवी जूलरी पहनने से बचें।
14 फ़रवरी 2012
सेक्सी दिखने की कोशिश न करें पहली डेट पर
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 2/14/2012 09:36:00 pm 0 comments
गर हो पहली डेटिंग, तो लड़के क्या करें
डेटिंग का मतलब है एक दूसरे को समझने की कसरत। लेकिन जब आप पहली डेटिंग पर जा रहे हों, तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है:
जब बात पहले डेट पर जाने की हो, तो झिझकना एक सामान्य-सी बात है। लेकिन जब बात फर्स्ट इंप्रेशन की हो, तो आपका झिझकना ठीक नहीं। फर्स्ट डेट पर कुछ खासों बातों का खयाल रखना जरूरी होता है, ताकि सामने वाले को आप इंप्रेस कर सके और उसके बारे में काफी कुछ पता कर सकें।
फर्स्ट डेट पर कभी भी उसके पिछले प्यार के बारे में न पूछें। वास्तव में, इसे तो तब तक अवॉइड करना चाहिए, जब तक कि वह खुद इस टॉपिक को नहीं छेड़ती। ऐसा संभव है कि उसका पिछला प्यार दुख पहुंचाने वाला रहा हो या फिर वह अभी भी उसे प्यार कर रही हो। ऐसे में पहले ही दिन का मजा किरकिरा करना ठीक नहीं।
किसी लड़की की रुचियों के बारे में जानने का ट्रिकी फॉर्म्युला यह है कि आप उससे पिछले ट्रैवल डेस्टिनेशन के बारे में बात करें और पूछें कि भविष्य में वह कहां जाना चाहती है। अगर वह ऐसे किसी प्लेस की जानकारी आपको देती है, जहां वह जाना चाहती है तो आप वहां चलने का ऑफर उसे दे सकते हैं। इस टॉपिक पर बातचीत का बड़ा फायदा यह है कि आपको एक-दूसरे के कल्चरल बैकग्राउंड और नए एडवेंचर्स के प्रति खुले नजरिए का पता चल जाएगा।
उससे उसके दोस्तों के बारे में पूछिए। अगर आप उन दोस्तों को नहीं जानते हैं, तब भी वह अपने दोस्तों और उनसे मिलने के बारे में आपको खुशी-खुशी बताएगी। उसके दोस्तों की जानकारी से आप उसके बारे में भी काफी कुछ समझ पाएंगे।
अगर आप पहले डेट पर किसी बार या रेस्तरां में हैं, तो आप यह आसानी से पता लगा सकते हैं कि खाने-पीने के मामले में उसकी रुचि क्या है। और यह भी कि कहीं वह अल्कोहल तो नहीं लेती।
जब आप बात कर रहे हों, तो करियर और एजुकेशन की बातें क्यों छोड़ी जाएं? ऐसे में एकेडमिक अचीवमेंट और जॉब की बातें आपको उसे समझने और उत्साहित करने में मदद करेंगी।
आप उसकी हॉबिज के बारे में बात कर सकते हैं। वह क्या पसंद करती है? खेल में उसकी कितनी दिलचस्पी है? किस तरह का संगीत पसंद है? इन सवालों के जवाब से आपको यह पता चलेगा कि आपके बीच कितना बेहतर बॉन्ड बन सकता है।
बहरहाल, इन सबके बावजूद एक बात हमेशा याद रखें और वह कि एक ही मुलाकात में आप किसी के बारे में सब कुछ नहीं जान सकते हैं। इसलिए सब्र रखें और कुछ चीजें बाद के दिनों के लिए भी छोड़ दें।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 2/14/2012 09:26:00 pm 0 comments
29 दिसंबर 2011
कैसी हो आपकी ड्रीम पार्टनर
किसी महिला या पुरुष को अपने पार्टनर में किन गुणों की तलाश होती है, अगर यह सवाल अलग-अलग लोगों से पूछा जाए तो उनके जवाब एक हो ही नहीं सकते। कई लोग शारीरिक सुंदरता को महत्व देते हैं तो कुछ लोग मन की खूबसूरती के दीवाने होते हैं। कुछ लोग इस सवाल का वह जवाब भी देंगे, जो आपके जहन में है। अलग-अलग लोगों के मन में अपनी ड्रीम गर्ल या सपनों के शहजादे की अलग-अलग तस्वीर होती है, फिर भी महिलाओं के कुछ ऐसे गुण हैं, जिनकी चाहत ज्यादातर पुरुषों को होती है। आइए इनकी चर्चा करते हैं।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 12/29/2011 07:16:00 pm 0 comments
पावरफुल लव स्टोरीज
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 12/29/2011 07:11:00 pm 0 comments
15 जनवरी 2011
शादी का पहला साल...
हनीमून के बाद विवाहित जोड़े धीरे-धीरे अपनी असली जिंदगी में लौटने लगते हैं। जब आप अपने साथी की आदतों को और करीब से जानने और समझने लगते हैं। आप पाते हैं आपका साथी ज्यादा समय तो स्पोर्ट्स चैनल से ही चिपका रहता है। या फिर पड़ोसियों के गॉसिप में ही वक्त बिताता है। ये छोटी-छोटी बातें भी आपके बीच दूरियाँ पैदा कर सकती हैं। ऐसी नौबत भी आ जाती है जब पति-पत्नी एक ही छत के नीचे किसी अनचाहे रूमेट की तरह रहने लगते हैं। जिनके बीच प्यार कम और झगड़े ज्यादा होते हैं। नए जोड़ों के लिए शुरूआती एक साल काफी मुश्किल भरा होता है । जीवनभर साथ निभाने के उस वादे के बोझ तले उनका रिश्ता घुटने लगता है । ऐसे स्थिति में वो हमेशा गुस्से और परेशानी में नजर आते हैं। उनको लगने लगता है कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। ऐसी स्थिति भी आती है जब दोनों का प्यार धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। जिस प्यार और विश्वास की नींव पर रिश्ते का महल खड़ा करते हैं वो भी चटकने लगता है।
ऐसे भाग्यशाली बहुत कम होते हैं जो कॉलेज लाइफ में कभी न कभी दिल की चोट नहीं खाते। लेकिन यह भी सच है कि ऐसी चोटों से इस उम्र में दिल नहीं टूटा करते। दिल के लिहाज से यह उम्र कच्ची भले होती है, लेकिन इसमें टूट-फूट से उठकर खड़े होने की क्षमता भी खूब होती है। सवाल है कि शीशा-ए-दिल की इस खूबी का कैसे इस्तेमाल किया जाए? आइए हम बताते हैं-
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 1/15/2011 08:50:00 am 0 comments
रिश्तों की उम्र को लगी नजर
शुरुआती दौर में प्यार का खुमार इस कदर सिर चढ़कर बोलने लगता है कि इनसान सब कुछ भूल मोहब्बत को जिंदगी का मकसद बना लेता है। प्यार के इस चढ़ते हुए खुमार में प्रेमिका की एक झलक पाने भर के लिए नौजवान घर से लेकर स्कूल, कॉलेज तथा दफ्तर तक के चक्कर लगाते नजर आते हैं। जिंदगी भर तारों की छाँव में रखकर हर एक आरजू पूरी करने का दावा ठोकते हैं।
मगर मोहब्बत के परवान चढ़ते ही प्यार की पूरी खुमारी ही काफुर होने लगती है। अग्नि के चारों ओर लगने वाले सात फेरे मोहब्बत की सारी आग ठंडी कर देते हैं। इसी के साथ शुरू हो जाती है वो हकीकत जिसमें आटे-दाल का भाव मोहब्बत का पूरा नशा उतार देता है। प्रेम के दौर में जिस प्रेमिका के लिए सब कुछ छोड़कर आस-पास मंडराने वाला नौजवान बिस्तर से उठने तक को तैयार नहीं होता।
मल्टीनेशनल फाइनेंस कंपनी में काम करने वाला आशीष मार्च के पूरे महीने इस कदर व्यस्त रहता था कि आराम करने का समय भी नहीं मिल रहा था। गुड़गाँव के दफ्तर से तिमारपुर के अपने घर तक का सफर भी उसे भारी लगता था। घरवालों के कहने पर तो किसी भी काम के लिए हिलने को तैयार नहीं होता था। इसी बीच प्रेमिका श्वेता ने बताया कि उसे रात में करनाल स्थित अपने घर जाना है। आशीष रात के नौ बजे ही घर से अपनी बाइक उठाकर सरायकाले खाँ बस अड्डे पहुँच गया। श्वेता को बाइक पर बैठा रात में करनाल तक छोड़ने भी चला गया। बिजी शेड्यूल और दिनभर की थकान के बावजूद करनाल तक जाने वाला ऐसा प्रेमी पाकर श्वेता भी निहाल हुए जा रही थी।
एक साल बाद घरवालों को मनाकर दोनों ने शादी कर ली। कुछ ही दिनों में प्यार का पुराना दौर खत्म होना शुरू हो गया। अब आशीष के पास श्वेता के लिए समय नहीं होता था। बेटा हुआ और कुछ साल के बाद स्कूल भी जाने लगा। अब सुबह के समय स्कूल बस आती है। तीसरी मंजिल पर रहने वाला आशीष अब श्वेता के लाख कहने पर भी बच्चे को स्कूल बस में बिठाने के लिए भी नीचे नहीं आता क्योंकि मोहब्बत की तिजारत अब काफुर हो चुकी है।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 1/15/2011 07:45:00 am 0 comments
19 दिसंबर 2010
नए वर्ष में खुशी का पैगाम
हेलो दोस्तो! यह कैसा विचित्र सा समय है। वर्ष के बीत जाने का दुख और नए वर्ष के आने की खुशी, दोनों ही अहसास इस कदर घुलमिल गए हैं कि उनमें भेद कर पाना कठिन हो रहा है। ऐसा लगता है मानो हम बीते वर्ष के साथ अभी पूरी तरह जी भी नहीं कह पाए थे कि वह हाथ से निकल गया। कितना कीमती था वह हर पल, हर लम्हा, हर दिन, हर सप्ताह और हर महीना! आज उसकी अहमियत समझ में आ रही है। मन में यही कसक उठती है कि काश एक बार फिर से यही वर्ष जीने को मिल जाए तो वे सारे पल जिसकी हम कद्र नहीं कर पाए, उसे आदरपूर्वक गले लगा लेते। वर्ष के हर क्षण का सदुपयोग कर पाते। पर गया वक्त कभी हाथ आया है क्या? इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए नए वर्ष का पूरे सम्मान के साथ स्वागत करना चाहिए।
जो छूट गया उसका अफसोस करने के बजाए जो आने वाला है उसके स्वागत की तैयारी करनी है हमें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारी जरा सी चूक से आने वाला समय भी हमसे कतराकर चला जाएगा। हमारा फर्ज बनता है कि आने वाले हर लम्हे के लिए हम सतर्क हो जाएँ। आने वाले हर पल का हिसाब हमारे मन में, हमारी डायरी में भली-भाँति होना चाहिए। आने वाले वर्ष का हर लम्हा, हर दिन हमारे लिए अनेक अनमोल तोहफे और कामयाबी की सौगात लेकर खड़ा है। उसे जतन और प्यार से हासिल करने का सचेत प्रयास हमें जी-जान से करना चाहिए। आने वाला हर समय खुशियों के अनेक रंगों के गुलदस्ते लिए हमारे इंतजार में है इसलिए बेहद चतुराई से आलस को चकमा देकर उसे हमें हासिल करना है।
यह बहुत ही सही समय है जब हमें बारीकी से विचार कर लेना चाहिए कि हम कहाँ-कहाँ चूक गए और हमें संकल्प लेना चाहिए कि वह भूल हम फिर नहीं दुहराएँ। समय तभी तक हमारा है जब तक हम कुछ सोच सकते हैं और उसके अनुरूप कार्य कर सकते हैं। जब हमारे अंदर वह ताकत नहीं बचती कि हम अपनी सोच को साकार कर सकें तो वह समय हमारा होकर भी हमारा नहीं होता इसीलिए उन सभी लोगों के लिए यह समय बेशकीमती बन जाता है जो वयस्क हैं और जिन्हें अपने सपने को साकार करने का मौका मिला है।
हमें आने वाले वर्ष में इस बात का बेहद सतर्कता से ध्यान रखना चाहिए कि हम खुद को न भूलें। समय का सही उपयोग तभी होता है जब हम स्वयं को खुश रखने के बारे में गंभीरता से सोचें। एक खुश व्यक्ति अपनों को भी खुश रखने की चेष्टा करता है।
कहते हैं प्रेम से जो खुशी मिलती है वह और किसी चीज से नहीं मिल सकती। प्रेम से जो प्रेरणा मिलती है वह हर हौसले को इतना बुलंद कर देती है कि सागर, पर्वत सब तुच्छ जान पड़ते हैं पर प्रेम के सही मायने तभी तक सार्थक लगते हैं जब तक इसकी ताकत से जीवन को सकारात्मकता के साथ रचा जाए। इसकी ताकत का सही उपयोग तभी होता है जब प्रेम की भावना में मिट जाने के बजाए निर्माण की सोचें।
यदि प्रेम में कोई भी साथी दूसरे को गंभीरता से नहीं लेता है, केवल अपनी सुविधा, अपनी मर्जी से रिश्ते को चलाना चाहता है तो सामने वाला अपना धैर्य खो देता है। कोई पूरी निष्ठा, ईमानदारी से कितना भी समर्पित भाव क्यों न रखता हो उसके बलिदान की भी सीमा होती है। एक वक्त आता है जब ऐसे रिश्ते बेजान होकर टूट जाते हैं। प्रेम के रिश्ते में दोस्ती की भावना को सबसे ज्यादा अहमियत देनी चाहिए ताकि दोनों को समान रूप से उसकी शक्ति मिलती रहे।
प्रेम करने वाले एक-दूजे के साथ चाहे जैसा भी व्यवहार करें, जितना भी समय बिताएँ पर नेकनीयती का दामन न छोड़ें। यदि एक दूसरे के बारे में नीयत साफ न हो तो वह प्यार अपनी गरिमा खो देता है। कई बार अच्छा समय बिताने को भी प्यार का नाम दे देते हैं। पर समय के बीतने के साथ ही उसकी गहराई समझ में आ जाती है। दोनों की भावना, नीयत एक समान है या नहीं इसे जानने का एक ही तरीका है, समय। जिस रिश्ते को दूर तक ले जाना है, उसे धीमी गति से परखने का मौका देना चाहिए।
नए वर्ष में पूरी ईमानदारी से रिश्ते को निभाने का संकल्प लें। जिनके दिल टूट गए हैं उनके लिए जिंगल बेल अवश्य बजेंगे। बस इस बार प्यार का दामन जीवन को संवारने के लिए थामें, जिंदगी में घुन लगाने के लिए नहीं।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 12/19/2010 06:25:00 pm 0 comments
17 अगस्त 2010
आपका प्यार प्यार है या कुछ और ? ( Your Love is love or something? )
सच तो यह है की हम सब कुछ करते हैं बस प्रेम नहीं करते। यही कारण है हमने प्रेम को इतने नाम दिए हैं और असफल हुए हैं। क्या है हमारा प्रेम ? ज़रा सोचने और तय करें की यह प्रेम है या कुछ और ?
प्रेम और आदत
आपको सोच के हैरानी होगी की जिसे हम आमतौर पर प्यार करते हैं वह हमारी आदत है। अधिकतर लोग आदत को ही अपना प्यार समझ लेते हैं। लेकिन प्यार आदत नहीं। यही आदत है जो आपको इतना उलझाए हुए हैं। क्योंकि आदत जितनी गहरी और पुरानी होती है उतनी और मज्बोत हो जाती है और इस मजबूती को हम अपना गहरा प्यार समझ लेते हैं।
हमें किसी का हंसना, बोलना, उसके साथ घूमना-फिरना इतना अच्छा लगने लगता है की हम उसे अपनी रोज की आदत में, दिनचर्या में शामिल कर लेते हैं। फिर उसकी छोटी-छोटी चीज व हरकतें हमारे ऊपर असर करने लगी हैं। उसके उपहार, उसकी छुअन- आलिंगन उसके फोन उसके पत्र व उससे सुख-दुःख बांटने की आदत आदि इतनी घनी हो जाती है की हम उससे स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते फिर उस बंधन में हमें सुकून मिलने लगता है और इस सुकून को, एक दूजे की देखभाल को इस बंधी हुई आदत को हम प्यार का दर्जा दे देते हैं। किसी दूसरे की इतनी लत, किसी के लिये उसकी तन्हाई का समाधान हो सकती है, लेकिन प्यार नहीं।
प्रेम और दर्द
दर्द का प्रेम से गहरा नाता है क्योंकि जहाँ प्रेम है वहां दर्द भी है। बिना दर्द के प्रेम कभे हासिल नहीं होता। लेकिन प्रेम में दर्द मिलना तथा दर्द को प्रेम में परिवर्तित करना दो अलग-अलग बातें हैं।
अक्सर लोगों का प्रेम दर्द की नींव पर खडा होता है। अर्थात जिन्दगी के गम, वक्त के थपेड़े व तन्हाई एवं संघर्षों से चूर जब कोई इंसान टूट जाता है तब उसकी एक ही ख्वाहिश होती है की कोई उसकी तन्हाई को, उसके दर्द को सुने, समझे और बांटे। फिर उम्र के जिस मोड़ पर हमें वह शख्श मिलता है जो हमें समझता है हमारे गम बाँट लेता है तो वह हमें प्रिय लगने लगता है। यही नहीं जब तक हम उससे दिल की बात नहीं कह लेते दिल को चैन नहीं मिलता। इस आस और उस इंसान के साथ को हम सबसे अच्छे व करीबी दोस्त का दर्जा दे देते हैं। दोस्ती गहरी होकर हमसफ़र की इच्छा तब्दील होने लगी है और इसी गहरी इच्छा और आपसी जरूरत को हम प्रेम कह देते हैं।
दर्द बांटने वाला, आपको समझने वाला आपका अच्छा दोस्त हो सकता है, सलाहकार या हम सफ़र हो सकता है परन्तु वह आपका प्रेमी ही होगा या आपको उससे प्रेम ही होगा यह कहना गलत है, तभी तो दोस्ती दुश्मनी में बदल जाती है, विवाह तलाक में बदल जाते हैं। दर्द बांटने वाला, दर्द का जिम्मेदार हो जाता है। परन्तु वास्तविक प्रेम शाश्वत है, स्थिर है।
प्रेम और जिम्मेदारी
कई लोगों के लिये प्रेम जिम्मेदारी जैसा है जिसे निभा कर उन्हें लगता है की वह प्रेम करते हैं खासतौर पर जब वह रिश्ता माँ-बाप तथा पति-पत्नी के रूप में हो तो। माता-पिता वह हर कार्य करते हैं जो उन्हें अपने बच्चे के लिये करने चाहिए। जी जान से इतना प्यार करने के बाद भी बच्चे उनके अनुसार नहीं निकलते और आपसी मतभेद किनारे हो जाते हैं ओर हम उन्हें जनरेशन गैप कहकर किनारे कर देते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि रिश्तों में सिर्फ जिम्मेदारियां होती हैं प्रेम नहीं। क्योंकि प्रेम का तो अर्थ है जहाँ कोई गैप न हो।
पति सदियों से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं पत्नियां सदियों से अपने फर्ज अदा कर रही हैं। दोनों अपनी जिम्मेदारियों को पूरा-पूरा निभा रहे हैं फिर भी असंतुष्ट हैं, अतृप हैं। पति को कोई और प्यार करने वाला चाहिए तो पत्नी चाहती है की उसे कोई और उसके तल पर समझे, जानें और स्वीकार करे। जिम्मेदारियां आपसी मुठभेड़ की शक्ल ले लेती हैं। क्योंकि जिम्मेदारियां बोझ से जन्म लेती हैं या मजबूरी से, प्रेम से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता।
कोई एक चूका नहीं, की गैर जिम्मेदार होने की, बेवफा होने की, ना प्यार करने की शिकायतें शुरू हो जाती हैं। किसके जिम्मे क्या था किसने क्या नहीं निभाया आदि शुरू हो जाता है। सारा का सारा प्यार हक़ और हिस्से में बदल जाता है। प्रेम बांटता नहीं है जोड़ता है। प्रेम दोष दूसरे में नहीं खुद में ढूंढता है। प्रेम दूसरे को बदलने का नाम नहीं स्वयं को ढालने का नाम है। जिम्मेदारियों का अर्थ ही है दो, अर्थात करने वाला, लेने वाला। लेकिन वास्तविक एवं सच्चे प्रेम में कोई जिम्मेदारियां, हक़, शर्त और हिस्से जैसी चीजें नहीं होती।
प्रेम और जूनून
जूनून एक ऐसी स्थिति है जब कोई किसी की चाहत में हदों से भी पार हो जाता है। न उसे खुद की खबर होती हैं न जमाने की बस प्रेमी का ही नाम जहाँ में बचता है। दिलों दिमाग में उसी प्रेमी का भूत व प्यार की धुन सवार होती है। बस एक जिद होती है उसे अपने प्रेमी को ही पाना है। यदि उसे उसका प्रेमी नहीं मिला तो वह अकेला मर जायेगा। जूनून की इस अवस्था को देखकर लगता है की यह सच्चे एवं वास्तविक प्रेम के लक्षण हैं। कुछ हद तक यह स्थिति या अवस्था सच्चे प्रेम की ओर इशारा करती है लेकिन प्रेम, जूनून नहीं। प्रेम में प्रेमी की भी किसी हद तक यही हालत होती है परन्तु प्रेमी से मिलना ही एक मात्रा उसका उद्देश्य या लालसा नहीं होती। प्रेमी अपना किसी पर अधिकार नहीं चलाता। लेकिन जुनूनी अपने प्रेमी पर अपना आधिपत्य समझता है। वह नहीं चाहता की उसका प्रेम किसी और की तरफ नजर उठाकर भी देखे। जूनून को प्रेम की नकारात्मक दशा भी कहा जा सकता है क्योंकि यदि जुनूनी को उसका प्यार मिलता नजर नहीं आता तो वह अपना धैर्य खो बैठता है। विद्रोह पर उतर जाता है। प्रेमी को प्राप्त न कर पाने का दुःख उसे हर हद पार करना सिखा देता है यहाँ तक की उसे यदि आत्महत्या भी करनी पड़े तो वह हिचकिचाता नहीं है। परन्तु वास्तविक या सच्चे प्रेमी में यह लक्षण नहीं पाए जाते। उसके लिये प्रेमी को प्राप्त करना ही के लक्ष्य नहीं होता। विद्रोह, बदला, आत्महत्या आदि जैसे कुविचार या अवस्था प्रेमी के लक्षण नहीं। प्रेमी अपने प्रेम को हर हाल में खुश देखना चाहता है। खुद भी जीता है दूसरे को भी जीने देता है।
प्रेम और सुविधा एवं योग्यता
कई लोगों के लिए प्रेम सुविधा जैसा है अर्थात जहां वह जिसके साथ वह स्वयं को कम्फ़र्टेबल महसूस करते हैं, जिसके साथ स्वयं को जोड पाने में सहूलियत महसूस करते हैं, जहां हमें ज्यादा जद्दोजहद करने की आवश्यकता न पडे बस सरलता से हम दूसरे को और दूसरा हमको स्वीकार कर ले। फ़िर वह स्कूल-कांलेज हो या दफ़्तर, घर-बाहर हो या रिश्तेदारी जिसके साथ हम सुविधा महसूस करते हैं उसके साथ संबंध को गहरा बनाने में जुट जाते हैं और उसी गहरे रिश्ते को हम अपना प्यार समझते हैं।
कितने लोग तो ऐसे हैं जो कम्फ़र्टेबलिटी के साथ-साथ काम्पैटिबलिटी भी देखते हैं। अर्थात योग्यता भी। वह जब किसी को अपने योग्य समझते हैं तभी उसको अपने दिल में जगह देते हैं क्योंकि वहां दिल के तार बैठाना उन्हें सरल लगता है। वहां कोई बडी परीक्षा नहीं करनी पडती और ना ही कोई परीक्षा देनी पडती है। योग्य साथी के साथ उन्हें समझोते कम पडते हैं। सहने और बर्दाश्त करने की अधिक गुंजाइश नहीं होती। इसलिए लोग अपना कम्पैटेबल यानी अपने योग्य साथी की तलाश करते हैं और जब संबंध-गहराई पर पहुंचता है तो वह उसे प्यार का नाम दे देते हैं। व्यवहारिक तौर पर देखा जाए तो यह ठीक लगता है, परंतु यह भी प्रेम नहीं। इतना सोच-समझकर, इतना देख परखकर अपनी सुविधा और योगयता अनुसार लोग अपना साथी चुनते हैं, प्यार करते हैं पर कितने दिन चलता है यह प्यार? कब तक और कैसे टिकते हैं ऐसे संबंध? कुछ भी छिपा नहीं है। सब जग जाहिर है।
सुविधा और योगयता को देखकर जो रिशते बनते हैं वह कभी प्रेम नहीं हो सकते। प्रेमी को हम सभी-बुराइयों और कमियों के साथ स्वीकार करते हैं, उसकी काबिलियत या योगयता का प्रेमी के प्यार पर कोई प्रभाव नहीं पडता। सच्चा प्रेमी कभी किसी परीक्षा या प्रतीक्षा से नहीं डरता। सहने और बर्दाश्त करने के भय से कभी भी प्रेम करना नहीं छोडता। प्रेमी, अपने प्रेम को सुविधा देता है सुविधा लेता नहीं है। प्रेमी स्वंम को योग्य बनाने में जुटा रहता है ना कि अपने लिए किसी को योग्य बनाता है या कोई योग्य तलाश्ता है।
प्रेम और अवधि
कितने ही लोग ऐसे हैं जो अपने प्रेम का संबंधों को अवधि से तौलते हैं। उनका मानना है संबंध जितना पुराना होगा प्रेम उतना ही गहरा होता है। तभी तो लोग अपने प्रेम में इस बात का दावा करते हैं कि मैं फ़ंला को पांच साल से चाहता हूं, मै फ़ंला को दस साल से चाहता हूं आदि। प्रेमी सोचता है जिसके साथ वह अब तक सबसे लंबे समय तक साथ रहा है उसके पीछे उसका वास्तविक प्रेम है या दूसरा भी उसे उतना ही प्यार करता है तभी उसका प्रेम फ़ंला वर्षो पुराना है। परंतु होता कुछ और है पुराने रिशतों के पीछे प्यार कम उम्मीदें, कोशिशे, इंतजार, स्वार्थ आदि ज्यादा होते हैं जिसकी आकांक्षाओं में, इंतजार में प्रेमी एक दूसरे के संबंध निभाते रहते हैं।
जैसे प्यार का पुराना होना इस बात को प्रमाणित करता है कि यह प्यार सच्चा है। यदि ऐसा होता तो लोगों को प्यार में अपना वक्त जाया करने का गम कभी नहीं होता। असफ़ल प्रेम के बाद या लंबे समय के बाद अधिकतर प्रेमियों को यह मलाल रहता है कि किसी को इतना कीमती वक्त देने के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगा।
यही कारण है कि विवाह के बाद तीस-चालीस वर्ष बिता देने के बाद भी पति-पत्नी से यदि वास्तविक सच्चे प्रेम के बारे में पूछा जाए तो दोनों चुप्पी साध लेते हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि जिसके साथ इतने वर्षो से हों वह प्यार की ही निशानी हो।
प्रेम और शरीर एवं काम
प्रेम और शरीर का, जिस्म के स्पर्श का अपना ही विशेष स्थान है। तभी तो कहने वालों ने प्रेम को आंखे चार करना कहा है। आखिर हम पहले किसी को उसके शरीर से, बाहरी भावभंगीमाओं से, अदाओं आदि से ही पसंद करते हैं। शरीर पर किसी की आत्मा या उसका दिल नहीं दिखता कि सामने वाले की सीरत कैसी है। हम केवल सरत देखकर ही फ़िदा हो जाते हैं।
कहते हैं पहला प्यार कभी भुलाए नहीं भुलता क्यों? क्योंकि पहले प्यार में जो सबसे पहले घटित होता है वह शरीर के माध्यम से ही अनुभव में आता है।
जिससे हमारे शारीरिक संबंध हों वह जरूरी नहीं वह हमारा प्रेम हो यह मात्र आकर्षण है। संभोग शरीर की भूख है, प्रेम आत्मा की। शरीर की मांग परिवर्तनशील व क्षणभंगुर है परंतु प्रेम शाश्वत है वह स्थिर है। संभोग प्रेम का एक भाग हो सकता है, एक हिस्सा हो सकता है परंतु संपूर्ण प्रेम नहीं होता। जहां काम है वहां दूसरा है, जहां दूसरा है वहां निर्भरता है और जहां निर्भरता है वहां स्वतंत्रता नहीं हो सकती, आनंद नहीं हो सकता। वास्तविक प्रेम महाआनंद है, स्वतंत्र है। इसलिए शरीर से शरीर का रिश्ता वासना पैदा करता है, जरूरत पैदा करता है। जिनके साथ हम शरीर से जुडते हैं उनके साथ हमें ऐसी भ्रांती पैदा होती है कि यह सबसे गहरा नाता है क्योंकि शरीर हमें दिखता है उसे ही हम अपनी पहचान व बहुमूल्य वस्तु मानते हैं और जब हम अपना शरीर किसी को दे देते तो हमें ऐसा लगता है कि हमने सबसे बडी चीज कर दी। जितना अत्याधिक स्व्यं को सौंपा जा सकता था हमने स्वयं को सौंप दिया। इसलिए वह हमारा प्रेम है। परंतु वास्तविक प्रेम शरीर का नहीं आत्मा का है सच्चा प्रेम शरीर के माध्यम से तो संभव है पर इस शरीर से नही।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 8/17/2010 06:04:00 pm 0 comments
08 अगस्त 2010
सामाजिक बंधन तो निभाने ही होंगे ( If social bonds are about to play )
हेलो दोस्तो! इस समाज में सही- गलत के न जाने कितने ही पैमाने बने हुए हैं। अच्छा-बुरा, नैतिक-अनैतिक, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य आदि जैसे भारी-भरकम शब्दों से हम हर समय दबे रहते हैं।
देखा जाए तो इस समाज में खुलकर साँस लेना बेहद मुश्किल है। पंडित, मुल्ला-काजी जैसे धर्मगुरुओं के अलावा भी समाज के नियम-कानून तय करने वाले अनेक ठेकेदार हैं। परंपरा की दुहाई देने वाले केवल कट्टरपंथी दकियानूस लोग ही नहीं बल्कि मौजूदा व्यवस्था को हर दृष्टिकोण से नकारा करार देने वाले अति प्रगतिशील लोग भी रिश्तों के घिसे-पिटे नियमों को ही सही एवं उचित मानते हैं। शायद वे भूल जाते हैं कि हम और हमारे रिश्ते व्यवस्था से भिन्न तो नहीं हो सकते। व्यवस्था पर होने वाला प्रहार और बदलाव हमें भी उतना ही प्रभावित करता है।
रिश्तों का बदला हुआ रूप सब तरह के लोगों को तिलमिला देता है और उनका तरह-तरह का मुखौटा उतरने लगता है। ऐसे तमाम लोगों के खिलाफ जाना बहुत बड़ी चुनौती होती है। खासकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला मामला तो इतना नाजुक एवं संवेदनशील होता है कि वहाँ आपका जीना मुहाल हो जाता है। आप पश्चाताप की आग में इस कदर जलते हैं कि आपका जीना दूभर हो जाता है। ऐसी ही ग्लानि और गुनाह की आग में जल रहे हैं जगत कुमार (बदला हुआ नाम)। अब न तो उन्हें अपनी भूल को सही रूप देने का कोई रास्ता नजर आ रहा है और न ही उन्हें अपने पापों के प्रायश्चित का कोई उपाय समझ में आता है।
हुआ यह है कि जगत अपनी ममेरी बहन से प्यार कर बैठे हैं और शादी करना चाहते हैं। यदि शादी नहीं हुई तो इस पाप का प्रायश्चित उन्हें इस संसार में मुमकिन नहीं लगता है।
जगत जी, अपने अधीन किसी नासमझ आश्रित को डराकर या बहकाकर उसकी मजबूरी का फायदा उठाना सबसे बड़ा गुनाह होता है पर आपने ऐसा कोई पाप नहीं किया है। हाँ, समाज में प्रचलित नियमों का जिस प्रकार आपने उल्लंघन किया है उसे आमतौर पर लोग माफ नहीं करेंगे। ऐसा आपको नहीं करना चाहिए था। आप जिस धर्म से ताल्लुक रखते हैं वहाँ तो यूँ भी यह रिश्ता नाजायज है पर जिन धर्मों में ऐसी शादी की इजाजत है वहाँ भी इस प्रकार के रिश्ते बनाना मर्यादा के खिलाफ माना जाता है।
आपने पूछा है कि क्या आप शादी कर सकते हैं? आपके धर्म के अनुसार जवाब है, नहीं। किसी और धर्म का सहारा लेकर भी यदि आपने शादी कर ली तो आप बेइंतहा अकेले पड़ जाएँगे और तबाह हो जाएँगे। आपका परिवार किसी रूप में इसे स्वीकार नहीं करेगा। यह इतना संवेदनशील मुद्दा है कि आपके संगी-साथी भी आपसे मुँह मोड़ लेंगे। इस प्रकार के सामाजिक बहिष्कार को झेलने में इनसान हर प्रकार से टूट जाता है। आप आत्मनिर्भर भी नहीं हैं। थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि आप सबसे दूर चले जाएँगे तो इस समाज में यूँ सबसे कटकर जीना आसान नहीं होगा।
इस रिश्ते को हर प्रकार से भूल जाना ही उचित है। इस समय समझदारी का यही तकाजा है कि अब आप अपनी रिश्ते की बहन से न मिलें।अब रही बात अपने को कोसने और ग्लानि में घुलकर मरने की तो खुद को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुँचाने वाली सोच से आप तौबा करें। यदि आप दिल से यह महसूस करते हैं कि आपने गलती की है तो यही आपकी सजा है। जगत जी, हर मनुष्य, नैतिक-अनैतिक की अवधारणा अपने परिवार, परंपरा और धार्मिक नियम कानून से सीखता है। कई बार एक ही धर्म में आस्था होने के बाद भी अलग भाषा, राज्य और प्रांत का होने के कारण रिश्तों की परिभाषा भिन्न होती है।
दक्षिण भारतीय समाज में सगे मामा-भांजी में शादी सबसे उत्तम संबंध माना जाता है जबकि अन्य राज्यों में इसी धर्म के लोग इसे घोर पाप समझेंगे। यहाँ तक कि जिस धर्म में ममेरे, चचेरे, फूफेरे भाई-बहनों में शादी जायज है, वहाँ भी सगे मामा, चाचा, मौसा आदि के साथ ऐसे रिश्ते की कल्पना नहीं की गई है यानी उनके लिए भी वह गुनाह है। एक ही संबंध किसी के लिए पाप है तो किसी के लिए बेहद पवित्र, आदरणीय और स्वीकार्य।
हम जिस राज्य, प्रांत, समाज और परिवार में पैदा हुए हैं वहाँ के नियम ही पाप-पुण्य की परिभाषा तय करते हैं। और, उन नियमों को मानकर चलने में ही हमारी भलाई है।
आपकी गलती होते हुए भी इसकी पूरी जिम्मेदारी समाज को जाती है। हमारा समाज नौजवानों को ऐसा स्वस्थ वातावरण नहीं दे पा रहा है जहाँ वह अपनी हमउम्र लड़की-लड़के से खुलकर दोस्ती कर सके। हँसी-मजाक के लिए उचित माहौल हो। अपनी सोच, रचनात्मकता और जिज्ञासा के लिए कोई परिपक्व मार्गदर्शक हो। किसी प्रश्न का उत्तर जानने का सही तरीका हो। जब कुछ भी नहीं है तो सारी उत्सुकता बहुत ही संकीर्ण रूप में सामने आती है। इसे प्रेम का नाम देना भी उचित नहीं जान पड़ता है। यह तो मजबूरी में एक अनजान भावना को जानने की चाह है।
ऐसा नहीं है कि आप जीवन में १०-२० लड़कियों के दोस्त रहे हों। उन्हें करीब से जाना है और फिर आपने अपनी इस रिश्ते की बहन में ऐसा विशेष गुण और विचारोत्तेजक बुद्धि व ज्ञान देखा कि आपके सोचने का तरीका बदल गया। आप उसके विचारों से इतने वशीभूत हो गए कि आपके सामने धर्म-अधर्म जैसे तर्क का कोई मतलब नहीं रह गया पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
यदि ऐसा होता तो आपको ग्लानि नहीं होती क्योंकि आप इस भावना को अपने दिल-दिमाग में लाने के पहले हजार दफा विचार करते। विचार द्वारा उठाया गया कदम न केवल साहस देता है बल्कि आपको सही व सच्चे होने की ताकत भी देता है। तब व्यक्ति, हाय यह मैंने क्या कर दिया, कहकर न तो मुँह छुपाता है और न ही अपना सीना कूटता है। आपका यह रिश्ता हर दृष्टिकोण से निहायत ही उथला, बचपना भरा और अनैतिक है। इस पर सियापा करने के बजाय इस अध्याय को चुपचाप बंद कर दें। अपने मन को स्थिर करें। आपका विश्वास भगवान में है तो मंदिर जाकर माफी माँग लें।
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Posted by Udit bhargava at 8/08/2010 05:11:00 pm 0 comments
29 जुलाई 2010
टीना का करीब होना अच्छा लगता था ( Tina loved to be around )
टीना मुनीम से मुलाकात फिल्म के सेट पर हुई थी। वह मेरा ऑटोग्राफ लेने आई थी। मैंने पूछा- 'क्या आप बॉम्बे से हैं?' हाँ, उसने कहा। स्कूल जाती हो। टीना ने कहा अब नहीं। मैं अरूबा में थी और मैंने मिस फोटोजेनिक का खिताब जीता है। फिर तुम्हें भी मुझे ऑटोग्राफ देना होगा। क्या करना चाहती हो? मैंने कुछ सोचा नहीं है टीना ने कहा। मैंने पूछा क्या फिल्मों में जाने के बारे में कभी सोचा है? आई डोंट केयर, टीना ने कहा और जब मैंने उससे स्क्रीन टेस्ट पर आने के लिए कहा तो वह मान गई। मैंने फिल्म 'देस परदेस'की नायिका को चुन लिया था। टीना का करीब होना अच्छा लगता था। ऐसा लगता था कि बुलबुले वाली रेड वाइन आपको परोस दी गई हो। टीना खूबसूरत, मसखरी लड़की थी, जिसे सभी पसंद करते थे।
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Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/29/2010 01:00:00 pm 0 comments
27 जुलाई 2010
उनकी बाँहों में... ( In his arms ... )
यहाँ गोआ में कितने खूबसूरत समुद्र तट हैं, चारों ओर सुंदरता मानो बिखरी हुई है। मनोहारी सूर्यास्त के दृश्य और गुजारा गया समय तो बहुत ही बेहतरीन है। अपने प्रियतम की बाहों में सिमटकर सूर्यास्त देखते हुए मुझे एक पल को अकेलापन महसूस नहीं हुआ। सुबह उसकी मुस्कान के साथ होती है तो दोपहर की गर्माहट को हम हाथों में हाथ डालकर घूमते हुए महसूस करते हैं।
उस पल को याद करती हूँ जब हम बस में सफर कर रहे थे और मैं बीच में फँसी बैठी थी। मेरे पड़ोस में कौन बैठा है इसका पता मुझे तब चला जब मेरी सहेली ने धूप से बचने के लिए खिड़की बंद की। वह मेरी ओर देखकर मुस्कराया, वैसे तो मैं अनजान लोगों की तरफ देखना भी पसंद नहीं करती लेकिन न जाने क्या बात थी उस निश्चल मुस्कान में कि मैं भी जवाब में मुस्करा दी। फिर उसने हैलो कहा मैंने जवाब दिया। इसके बाद बातचीत में घंटों ऐसे बीत गए जैसे हम बरसों से एक दूसरे को जानते हों। थोड़ी देर बाद बस रुकी और वह घूमने के लिए नीचे उतरा। मेरी सहेली ने चुटकी ली 'अरे मैं भी साथ में हूँ मुझसे तो बात ही नहीं की आपने और लगीं है उसे अजनबी से बतियाने में।' सहेली की बात मुझे लग गई। जब वह वापिस आया तो जानबूझकर मैंने अपना मुँह एक किताब में गड़ा लिया। जब भी किताब से नजरें हटाकर देखती तो पाती कि वह मुझे ही देख रहा है।
बस से हम लोग साथ ही उतरे। उसे उसी शहर की किसी और कॉलोनी में जाना था। फोन नंबर और घर के पतों का आदान-प्रदान पहले ही हो चुका था। मुझे लग तो रहा था कि वह फोन जरूर करेगा। उसने फोन किया, फिर से बहुत सी बातें हुई और यह सिलसिला चल निकला। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यूँ ही सफर के दौरान इतने अच्छे व्यक्ति से मुलाकात हो जाएगी। अरे उसका नाम तो मैंने बताया ही नहीं? उसका नाम है अवनीश। अवनीश बेहद अच्छा इंसान है स्वार्थ तो उसके मन में रत्ती भर भी नहीं है। वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता है। अपने लिए उसके पास समय नहीं है लेकिन दूसरों के लिए समय निकाल ही लेता है।
अभी जब हम गोआ में हैं तब भी वह अपने कंप्यूटर पर लगा है और मुसीबत में पड़े दोस्तों की मदद कर रहा है। कभी-कभी तो वह दूसरों के लिए रात भर भी जागता है लेकिन सुबह उठकर जब भी मेरे साथ बीच पर हाथों में हाथ लिए टहलता है तो मुझे लगता है कि सारे जहाँ की खुशियाँ सिमटकर मेरे हाथों में आ गई हैं।
मुझे तो भरा पूरा परिवार मिला है पर उसने परिवार की खुशियाँ नहीं देखीं। उसके पिता बहुत अच्छे थे लेकिन उसने उन्हें बहुत जल्दी खो दिया। माँ भी उसे प्यार नहीं दे पाई क्योंकि वे मानसिक रोग से पीड़ित हैं। वह माँ की सेवा भी करता है। उसने जीवन में बहुत कठिनाइयाँ देखीं हैं और अब मैंने उसे अपनी कोमल बाँहों का सहारा दिया है। आज हमारी सगाई हो चुकी है और हम सोचते हैं कि उस दिन बस में मुलाकात नहीं होती तो क्या होता? आज हम गोआ में हैं और एक दूसरे से बहुत खुश हैं। वह कुछ भी ज्यादा नहीं चाहता पर मैं उसे सब कुछ देना चाहती हूँ।
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Posted by Udit bhargava at 7/27/2010 11:32:00 pm 1 comments
19 जुलाई 2010
विल्हण-रतिलेखा ( Willhon - Arathilekha )
चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य के राजकवि विल्हण का उस समय के कवियों, विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ स्थान था। उनका कहना था कि इस संसार में केवल एक ही ऐसा रस है, जो लोहे के आदमी को भी मोम बना देता है और वह हैं 'प्रेम रस'।
राजकवि विल्हण राजा के विश्वासपात्र थे। इसलिए राजा ने राजकुमारी रतिलेखा की शिक्षा-दीक्षा की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। किंतु विल्हण अति सुंदरी रतिलेखा को काव्य पढ़ाते-पढ़ाते प्रेम शास्त्र पढ़ाने लगे और एक दिन जब रतिलेखा और विल्हण गंधर्व विवाह करके गंधर्व क्रीड़ा के लिए तैयार थे, तभी राजा ने उन्हें देख लिया और राजा ने तुरंत विल्हण को फाँसी की सज़ा दे दी।
फाँसी का तख्त नर-मुण्डों की भूमि पर ख़ड़ा प्रतीत हो रहा था। एक तरफ राजा ऊँचे सिंहासन पर विराजमान थे। बधिकों ने विल्हण से कहा, 'अंतिम बेला आ पहुँची है, अपने इष्ट का स्मरण करो।' राजकवि ने उस समय एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ था- ''जिसने जीवन के सुखों का संपूर्ण मर्म समझने में बराबर का योग दिया, जिसने वाणी को कोमल शब्द उच्चारण करने की सामर्थ्य दी, जिसने मृत्युलोक में ही स्वर्ग की कल्पना को साकार दिया, उसी तरह रतिलेखा का स्मरण विल्हण करता है- विल्हण के लिए वही चरम आनंद की जननी है।''
फिर वही श्लोक सहस्त्रों मुखों से बार-बार मुखरित होने लगा। रतिलेखा राजा के चरणों पर गिरकर विलाप करने लगी, 'हे राजन, विल्हण के साथ ही राज्य की श्री, मुषमा, सुशीलता सबका अंत हो जाएगा। जीवन दासता से कलंकित होगा, रसराज का आदर खत्म हो जाएगा, जन-जन कुमार्गगामी हो जाएँगे। विल्हण को क्षमा करो, नहीं तो उनकी चिता पर गंधर्व विवाह से उनकी पत्नी बन चुकी रतिलेखा भी जीवित ही भस्म हो जाएगी।
फिर तो राजा को जनता और रतिलेखा के सामने झुकना पड़ा और उन्होंने विल्हण को अभयदान देकर दोनों के प्रेम व वैवाहिक संबंधों को स्वीकार किया। यहीं नहीं, इसके बाद राजा ने विल्हण को 'महाकवि' की उपाधि से भी सम्मानित किया।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/19/2010 03:40:00 pm 0 comments
रूहानी प्यार कभी खत्म नहीं होता ( Spiritual love would never end )
वो नजरें झुकाकर क्लासरूम की तरफ बढ़ रही है, उसने किताबें अपने सीने के साथ लगाई हुई हैं। जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सीने से लगाकर चलती है। इतने में वो एक नौजवान लड़के के साथ टकरा जाती है और किताबें नीचे गिरती हैं, दोनों के मुँह में से एक ही अल्फाज सुनाई देता है सॉरी। बस इस दौरान दोनों की निगाहें एक दूसरे से टकराती हैं, और पहली ही नजर में प्यार हो जाता है। कुछ ऐसा ही दृश्य होता है हिन्दी फिल्मों में, बस जगह और हालात बदल दिए जाते हैं, किताबों की जगह कुछ और आ जाता है। मगर लड़का लड़की आपस में अचानक टकराते हैं और वहाँ से ही प्यार की ज्वाला भड़क उठती है। क्या इसे ही प्यार कहते हैं? मेरा जवाब तो नहीं है, औरों का क्या होगा पता नहीं।
पहली नजर में प्यार कभी हो ही नहीं सकता, वह तो एक आकर्षण है एक दूसरे के प्रति, जो प्यार की पहली सीढ़ी से भी कोसों दूर है। जैसे दोस्ती अचानक नहीं हो सकती, वैसे ही प्यार भी अचानक नहीं हो सकता। प्यार भी दोस्ती की भाँति होता है, पहले पहले अनजानी सी पहचान, फिर बातें और मुलाकातें। सिर्फ एक नए दोस्त के नाते, इस दौरान जो तुम दोनों को नजदीक लेकर आता है वह प्यार है। कुछ लोग सोचते हैं कि अगर मेरी शादी मेरे प्यार से हो जाए तो मेरा प्यार सफल, नहीं तो असफल। ये धारणा मेरी नजर से तो बिल्कुल गलत है, क्योंकि प्यार तो नि:स्वार्थ है, जबकि शरीर को पाना तो एक स्वार्थ है। इसका मतलब तो ये हुआ कि आज तक जो किया एक दूसरे के लिए वो सिर्फ उस शरीर तक पहुँचने की चाह थी, जो प्यार का ढोंग रचाए बिन पाया नहीं जा सकता था।
सच तो यह है कि प्यार तो रूहों का रिश्ता है, उसका जिस्म से कोई लेना देना ही नहीं, मजनूँ को किसी ने कहा था कि तेरी लैला तो रंग की काली है, तो मजनूँ का जवाब था कि तुम्हारी आँखें देखने वाली नहीं हैं। उसका कहना सही था, प्यार कभी सुंदरता देखकर हो ही नहीं सकता, अगर होता है तो वह केवल आकर्षण है, प्यार नहीं। माँ हमेशा अपने बच्चे से प्यार करती है, वो कितना भी बदसूरत क्यों न हो, क्योंकि माँ की आँखों में वह हमेशा ही दुनिया का सबसे खूबसूरत बच्चा होता है।
एक वो जिन्होंने प्यार को हमेशा रूह का रिश्ता बनाकर रखा, और जिस्मानी रिश्तों में उसको ढलने नहीं दिया, उनको आज भी वो प्यार याद आता है, उसकी जिन्दगी में आ रहे बदलाव उनको आज भी निहारते हैं। उसको कई सालों बाद फिर निहारना आज भी उनको अच्छा लगता है। रूहानी प्यार कभी खत्म नहीं होता। वो हमेशा हमारे साथ कदम दर कदम चलता है। वो दूर रहकर भी हमको ऊर्जावान बनाता है।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/19/2010 01:23:00 pm 0 comments
15 जुलाई 2010
स्वार्थ पर न टिके प्यार की नींव ( Love is not dependent on interest )
आज के इस भौतिकवादी युग में प्यार ढूँढने जाएँ तो कोसों दूर नहीं मिलता, क्योंकि प्यार का स्थान स्वार्थ ने ले लिये है। आज प्रेम भी वहीं दिल लगाना चाहते हैं जहान पर उन्हें फायदा दिखाई देता है। जिस तरह कई शादियों की नीवं दहेज़ पर टिकी होती है, ठीक उसी तरह आज के जमाने में प्यार की नींव स्वार्थ पर टिकी है। आज के युग में 1-2 वर्ष पुराना प्रेम ओल्ड फैशन हो गया है। यो लोग भूले-भटके किसी के प्यार में अपनी जिन्दगी दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं वे बेवक़ूफ़ वे पागलों में गिने जाते हैं।यह सत्य है की आज प्रेम के बारे में उनका ज्ञान कच्चा है। इस जीवन के बारे में लोगों का ज्ञान केवल पारिवारिक अनुभवों या हिंदी फिल्मों में दिखाए गए दृश्यों तक ही सीमित रहता है।
प्रारंभ का प्रेम
प्यार के शुरूआती महीने में हर मौसम सुहान और जीवन का हर रंग खूबसूरत लगता है। इस दौरान गर्लफ्रेंड और ब्वायफ्रेंड एक-दूसरे के प्रति अत्यंत आकर्षित रहते हैं। वे एक- दूसरे के प्रति उदार, सहयोगी और हाथों-हाथ लेने का भाव प्रदर्शित करते हैं, ताकि जीवनसाथी को लगे की वह दुनिया का सर्वाधिक भाग्यशाली व्यक्ति है। इस दौरान कटु अनुभव होने की गुंजाइश बहुत कम होती है। यह सुहाना सफ़र कितना लंबा होगा यह तो अलग जोड़ों की अवस्था पर निर्भर करता है। कपल्स जो एक दूसरे से कम उमीदें रखते हैं उनका प्रेम अधिक समय तक टिकता है। लेकिन वे लोग जो यह सोचते हैं की प्यार में समझौता की कोई आवश्यकता नहीं है और सेक्स का मतलब सिर्फ प्यार है वे जल्द ही प्रेम से वंचित हो जाते हैं।
प्यार से पहले समझौता या अलगाव
प्यार अगर ताकत है तो प्यार कमजोरी भी है। अगर प्यार में इंसान अपनी भावनाओं के तहत कमजोर होता जाता है तो रिश्ता चाहे कोई भी हो सामने वाला इंसान उसका फायदा जरूर उठता है। फिर चाहे वह प्रेम माँ-बाप का बच्चों के प्रति हो या पति या पत्नी का अपने पार्टनर के प्रति हो।
प्रेमा बताती है, 'मेरा प्रेमी विवेक निहायत ही शरीफ और समझदार इंसान है। लड़कियों के साथ खासतौर से उसका व्यवहार शालीन भरा है। उसके किसी गुण के कारण ही उसकी तरफ आकर्षित हो गई। चूंकि में उसे मन ही मन चाहती थी। इसलिए विवेक की हर बात मानती थी। उसे भी इस बात की जानकारी थी की मैं उससे प्यार करती हूँ। इसलिए वह मुझे ऐसे रोब मारता था की मैं उसकी पत्नी हूँ। 'मेरे प्यार का फायदा उठाते हुए वह हमेशा मनमानी करता था। जब उसका दिल चाहता मुजस से मिलने आ जाता था लेकिन मेरे मिलने के लिये बुलाने पर वह कभी नहीं आता था। इस व्यवहार ने मुझे झकझोर कर रख दिया, फिर भी मैं चुप थी। लेकिन काफी वर्षों तक भी जब उसने मुझे शादी के लिये प्रपोज नहीं किया तो मैं भी उसे छोड़ने का फैसला कर लिया। दो महीने तक मैंने उससे बात तक नहीं की। मेरे इस व्यवहार ने उसका दिमाग खोल दिया। अब वह खुद मुझसे मिलने के लिये बेताब रहने लगा। एक दिन शाम को उसने मुझसे शादी के लिये प्रपोज कर दिया। इस समय हम दोनों पति-पत्नी के रूप में खुशी से जीवन का मजा ले रहें हैं।'
इस प्रकार हम देखते हैं की यह चारण जीवन के दोराहे पर लाकर खडा कर देता है, जहाँ से दो रास्ते दिखाई पड़ते हैं 'समझौता' या 'अलगाव'। जीवन की इस अवस्था में सभी जोड़ों को अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि एक भी गलत फैसला उन्हें हमेशा के लिये अलग कर सकता है। यहाँ दूसरे की गलतियों पर चीखने-चिल्लाने की जगह जीवनसाथी को उसकी कमियों के साथ स्वीकार करने की भावना जीवन को स्थायी बनाने का काम करती हैं, जबकि इसके विपरीत प्रतिक्रया सम्बन्ध विच्छेद या अलगाव की राह पर ले जाती है। जो कपल्स जीवन का आनंद उठाना चाहते हैं वे समझदारी से काम लेते हुए टकराव की परिस्थितियों को ढालने में रुचि दिखाते हैं। वे जीवन की इस वास्तविकता को समझ लेते हैं की परिवर्तन प्रकृति का नियम है और नई जिम्मेदारियां, नए अनुभवों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। वे जीवनसाथी पर फैसलों को थोपने की जगह उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उससे कुछ सार्थक सीखने का प्रयास करते हैं।
संबंधों में दरार तर्क से पड़ती है
हर सम्बन्ध में मतभेद होते हैं और इन पर बहस होती है। इश्क होने का मतलब यह नहीं होता की कपल्स के दिमाग भी एक हो गए हैं। हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है और कोई भी कपल्स हर समय हर बात पर सहमत नहीं हो सकते हैं।
तर्क से बचने के लिये चुप्पी साधना कोई हल नहीं हैं, लेकिन बहस को कटु होने से जरूर बचना चाहिए। देखा जाए तो स्वस्थ बहस की तुलना में चुप रहकर मन में घुटते रहना दाम्पत्य जीवन को अधिक नुक्सान पहुंचाता है।
आप जितनी अधिक गलतियाँ निकालेंगे जीवनसाथी खुद को न बदलने के लिये उतना ही दृढ प्रतिज्ञ होता जायेगा।
अगर आप अपने जीवनसाथी को वाकई बदलना चाहते हैं तो उसके सकारात्मक पहलुओं की इमादारी से प्रशंसा कीजिये। आप पायेंगे की कुछ समय बाद नकारात्मक पहलुओं में स्वतः कमी आनी शुरू हो गई है।
जीवन में जीवनसाथी से कोई भी बात न छिपाना निःसंदेह एक आदर्श विचार है, लेकिन सच यह है की हर बात बता देना आप दोनों को करीब लाने की गारंटी नहीं है।
सही जानकारी का पता न चलना
अब तो अधिकतर प्यार इन्टरनेट के जरिये हो रहा है। अब पहले जमाने की तरह खानदान का विस्तार तो रहा नहीं, परिवार सिमटकर पति-पत्नी और दो बच्चों तक रह गया है। ऐसे में प्यार के लिये जांच-पडतान करवा पाना भी मुश्किल होता जा रहा है। इन्टरनेट में बहुत बातें छिपा दी जाती हैं, इसलिए शादी के लिये जल्दबाजी न करें जब तक सामनेवाले पक्ष के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त न कर लें, तब तक रिश्ता तय न करें।
उमा बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। उसने जल्दबाजी में रेलवे में नौकरी करते लड़के से शादी कर ली। लड़का तुषार देखने में काफी स्मार्ट था। उमा भी सुंदर जीवनसाथी पाकर खुश थी। जब तीन साल गुजर गए और संतान पैदा नहीं हुआ तो सास ने ताना मारना शुरू कर दिया। उमा ने डाँक्टर को दिखाया लेकिन डाँक्टर डीपी राय ने उमा में कोई कमी नहीं पायी। यह सुनकर उमा की चिंता तो दूर हो गई, लेकिन उसने रात को एक दिन तुषार को भी चेकअप कराने को कहा। इस पर तुषार तुनक गया. उल्टी-सीधी बातें करने लगा। वह तो उलटे उमा को ही खरी-खोटी सुनाने लगा।
समय बीतता गया। उमा कुंठित सी हो गई। आखिरकार एक दिन सच सामने आ ही गया। तुषार के एक पुराने फ़ाइल में उमा को उसका मेडिकल चेकअप मिल गया। उसकी रिपोर्ट के अनुसार तुषार नपुंसक था। उमा के तो होश ही उड़ गए। अब उसको पिछले दिनों की सारी बातें याद आने लगी। उसका पति एक-एक बहाना बना कर उससे दूर क्यों रहता था, तब बात उसको समझ में आ गई।
ऐसा नहीं है की किसी में कमी नहीं होती, लेकिन यदि इन कमियों को सही रूप में पहले ही सामने रख दिया जाए तो शायद बाद में सब ठीक हो जाएगा। आजकर थोड़ा बहुत झूठ बोलना तो आम बात हो गई है, लेकिन झूठ ऐसा न हो की वह रिश्तों को बिगाड़ दे, या मन में हमेशा के लिये गाँठ पड़ जाए। झूठ और अविश्वास की नींव पर रचे गए संबंधों में न तो स्थिरता होती है और न ही मधुरता।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/15/2010 06:25:00 pm 0 comments
08 जुलाई 2010
आपकी दोस्ती कहीं प्यार तो नहीं ( Not much love your friendship )
इसलिये आपकी दोस्ती कहीं प्यार तो नहीं?
जानिये के प्रश्नावली से हर सवाल का जवाब 'हाँ' या 'ना' में ही दें। हर 'हाँ' के लिये खुद को एक अंक दें और अंत में सबको जोड़ लें।
1. क्या आपको खुद से ज्यादा अपने दोस्त की चिंता रहती है?
2. क्या आप दोस्त से मिलने के लिये समय से पहले पहुँच जाते हैं?
3. दोस्त से मिलने जाने से पहले आप खुद तय नहीं कर पाते कि क्या पहनना है क्या नहीं?
4. मिलने पर किन विषयों पर बात करनी है तथा किन प्रशनों आदि का जिक्र करना है, इन सबको पहले से सोच लेते हैं?
5. क्या बातें करते समय आप सिर्फ दोस्त के पूछने पर ही जवाब देते हैं?
6. हर अगली मुलाक़ात के लिये आप तत्पर तथा बेचैन रहते हैं?
7. आप अपने दिल की बात अपने दोस्त से किसी तीसरे के जरिये व बहाना बनाकर करते हैं?
8. फोन के पास बैठकर आप अपने दोस्त के काँल का इंतज़ार करते हैं?
9. किसी से अपने दोस्त का जिक्र व नाम सुनकर आपके चेहरे पर रंगत छा जाती है?
10. सार्वजनिक स्थानों से निकलकर क्या आपकी, अपने दोस्त से कहीं तन्हाई में मिलने की इच्छा होती है?
11. मुलाक़ात के समय आपको समय का पता ही नहीं चलता तथा आपको यह महसूस होता है कि आप घर जल्दी जा रहे हैं?
12. बहुत कुछ कह कर भी ऐसा लगता है जैसे आपने कुछ भी कहा ही नहीं?
13. क्या आपको त्योंहारों से ज्यादा दोस्त के जन्मदिन के आने का इंतज़ार रहता है?
14. जब भी आप शाँपिंग पर जाते हैं तो दोस्त के लिये कुछ सरप्राइज गिफ्ट जरूर लेते हैं?
15. आपको अपने बीच तीसरे का जिक्र या मौजूदगी आफत लगती है?
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/08/2010 07:42:00 pm 0 comments
5 वायदें जो अक्सर टूट जाते हैं ( 5 Promises which often breaks )
समय पर पहुंचेंगे
इस तरह का वायदा हर लड़का व लड़की एक दूसरे से कई बार करते हैं, पर हर बार तोड़ते हैं। इस समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार से करें।
समाधान : अगर आपने अपने साथी से मिलने का वादा किया है तो समय पर पहुंचें। अगर किसी कारणवश आप टाइम से नहीं पहुँच सकते तो इसकी सूचना पार्टनर को जरूर दें। झूठे बहाने बनाकर उन्हें मनाने की कोशिश भूलकर भी न करें, क्योंकि एक न एक दिन इस झूठ का राज तो जरूर खुलेगा।
लड़ाई-झगडा नहीं करेंगे
अक्सर देखा जाता है कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच लड़ाई ज्यादा होती है, प्यार कम। लड़ाई का कोई मतलब नहीं होता, पर फिर भी छोटी-छोटी बातें कब बड़ा रूप ले लेती हैं पता नहीं चलता। जब झगडा ज्यादा बढ़ जाता है तो दोनों एक-दूसरे से वायदा करते हैं कि आगे ऐसा दोबारा नहीं होगा। पर कुछ दिनों बाद फिर लड़ाईयां शुरू हो जाती हैं।
समाधान : एक बात का ख़ास ध्यान रखें कि जब भी मिलें तो एक-दूसरे से कोई भी ऐसी बात न करें, जिससे झगड़ा हो। अगर आपको लगे कि किसी बात से पार्टनर नाराज है तो उसकी नाराजगी दूर करें। छोटी-मोटी नोंक-झोंक से बचें।
कोई बात नहीं छुपाएंगे
प्यार में पार्टनर एक-दूसरे से कुछ न छुपाने की कसम खाते हैं, पर ली गयी कसम कब चूल्हे में भस्म हो जाती है, उन्हें भी नहीं पता चलता और जब पता चलता है तो फिर दोबार वायदे किये जाते हैं, पर थोड़े दिन में विफल हो जाते हैं।
समाधान : अगर आपने वायदा किया है तो उसे पूरी तरह से निभाएं। कोशिश यहीं करें कि छोटी-छोटी बात उनसे शेयर करें। अगर वो छोटी-छोटी बातों को नहीं सुनती तो उन्हें समझाएं कि आपकी बातों को वो गंभीरता से लें, ताकि आप उनसे कुछ न छुपा पायें। अगर कुछ बातों को सुनकर वो नाराज होती हैं तो मौक़ा देखकर बोलें।
जिन्दगी भर साथ निभाएंगे
साथ निभाने का वादा करके प्यार के परवाने कब अलग होने का फैसला कर लेते हैं उन्हें भी पता नहीं होता। आज कई लोग सिर्फ टाइमपास के लिए प्यार करते हैं। साथ न निभाने का वायदा लड़के ही ज्यादा तोड़ते हैं, क्योंकि वो भावनात्मक रूप से सीरियस नहीं होते हैं, जिसके कारण रिश्ता बीच मझधार में अटक जाता है।
समाधान : जिंदगी में प्यार बहुत कम लोगों को मिलता है और जिनको मिलता है वो बहुत भाग्यशाली होते हैं, इसलिये इससे दूर होने के बजाये अपनाने की कोशिश करें। प्यार इंसान को कहाँ से कहाँ पहुंचा देता है, सिर्फ सच्चा प्यार ही जानता है। इसलिये अपने पार्टनर को इस तरह धोखा न दें। आप दोनों को अगर लगे कि रिश्ते में दूरियां बढ़ रही हैं, तो उसे दूर करने की कोशिश करें। रिश्ते को किसी तीसरे के कारण न बिखरने दें, बल्कि सहेज कर रखने का प्रयास करें।
मिलकर करेंगे बचत
अक्सर यही होता है कि बचत करने का वायदा करते हैं, पर बचत नहीं हो पाती। शादी से पहले एक-दूसरे को सरप्राइज गिफ्ट, घुमाने-फिराने में बजट बिगड़ जाता था, पर शादी के बाद भी वही हाल रहता है।
समाधान : सबसे पहले प्लान बनाकर चलने कि हमें कितना खर्च करना है। अगर आप डेटिंग पर जा रहे हैं तो ऐसी जगह चुनें जो ज्यादा महँगा न हो। बेमतलब में एक-दूसरे को उपहार न दें। दोनों लोग मिलजुल कर खर्चा करें।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/08/2010 06:55:00 pm 1 comments
02 जुलाई 2010
प्यार में अहंकार कहाँ?
सुरेश और रिया ने लगभग 2 वर्ष पहले ही प्रेम विवाह किया है। दोनों ही सर्विस करते हैं। शादी के बाद शुरू के 3 महीने तक तो सब ठीक चला। लेकिन फिर छोटी-छोटी बातों को लेकर दोनों ने लड़ना-झगड़ना शुरू कर दिया। आखिर में दोनों ने तंग आकर तलाक का फैसला किया। दोनों ने अपने वकील से बात की जोकि उन दोनों का ही दोस्त भी है। इस वकील ने सलाह थी कि रिया कुछ दिनों के लिए अपने मायके चले जाए और ठंडे दिमाग से अपने निर्णय के बारे में विचार करें। रिया और सुरेश दोनों सहमत हो गए। रिया अनपे मायके चली गई। उसका मायका दूसरे शहर में है।
अगले दिन सुबह उठते ही सुरेश ने आवाज लगाई। रिया मेरा न्यूज पेपर और चाय...। दूसरे ही क्षण उसे याद आया कि रिया तो अब उसके घर में है नहीं। खुद ही उठकर दरवाजे से उठाकर न्यूज पेपर लाया और थोड़ी देर बाद चाय बनाने किचन में चला गया।
अब उसे रह-रहकर रिया की अच्छी-अच्छी बातें याद आ रही थीं। साथ ही यह भी कि रिया के रहने पर उसे यह छोटे-छोटे काम कभी खुद नहीं करने पड़े थे। खुद पर झल्लाते हुए उसने जैसे-तैसे चाय बनाई और दफ्तर की तैयारी करने लगा। बाथरूम में टॉवेल से लेकर ड्रेस का प्रबंध खुद ही किया और बगैर लंच के दफ्तर रवाना हुआ। लंच का ऑर्डर उसने टिफिन सेंटर पर दिया।
ऑफिस से लौटते हुए डिनर होटल में लिया और घर पहुँच गया। बिस्तर पर लेटने के बाद नींद उससे कोसों दूर थी। उसके दिमाग में बस रिया की बातें ही चल रही थी। उसका लड़ना-झगड़ना। बात-बात पर टोका-टाकी करना आदि।
उसके जेहन में वह सभी बातें आ रही थी जिन पर रिया आपत्ति लेती थी वह विचार करता जा रहा था कि क्या वास्तव में रिया सही है? और उसे ही अपनी आदतों में सुधार लाना चाहिए। सुरेश के घर पर रहने पर कई लड़कियों के फोन आते थे जबकि दफ्तर में रिया के फोन करने पर उसे बिजी होने का वास्ता देकर हमेशा टाल दिया करता था।
सिगरेट के साथ-साथ उसने शराबी दोस्तों का संग कर लिया था और अब वह इनका आदि हो चला था जबकि पहले कभी-कभी ऑफिस की पार्टी वगैरह में ही ड्रिंक लेता था। लेकिन वह अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था और अभी भी सोच रहा था कि कुछ भी हो। यदि आज वह झुक गया तो रिया उससे हमेशा अपनी बात मनवाती रहेगी। इसलिए वह रिया से माफी नहीं माँगेगा और अपनी बात पर कायम रहेगा।
दूसरी ओर रिया भी मायके में विचार कर रही थी। सही होने के बावजूद उसे लगा क्या वाकई सुरेश उसे तलाक दे देगा। शादी से पहले जब उनका प्रेम प्रसंग चल रहा था तब तो बहुत साथ जीने-मरने की बात करने वाला सुरेश अचानक इतना बदल कैसे गया। सुरेश का यह रूप उसके लिए बहुत अप्रत्याशित था और उसने कभी इसकी कल्पना भी नहीं की थी। उसके माता-पिता उसे ढाढस बँधाते रहते थे। बेटी सुरेश ऐसा लड़का नहीं है। उसे जरूर अपनी गलती का अहसास होगा और वह तुम्हें आकर ले जाएगा। पति-पत्नी में ऐसा चलता रहता है। तुम कहो तो मैं उससे बात करूँ। लेकिन रिया उन्हें यह कहकर रोक देती थी कि आपका कहा न मानकर शादी का फैसला मैंने ही किया था अब मैं अपनी गलती के लिए आपको जलील नहीं होने दूँगी।
दिन सुरेश के धर्मगुरु उसी शहर में थे और उनके प्रवचन हो रहे थे। सुरेश भी समय निकालकर वहाँ गया और उन्हें सुना। सुरेश गुरुजी को दिल से मानता था। आज जिस बात पर गुरुजी बोल रहे थे वह था अहंकार। आदमी के जीवन में अहंकार कितने रोड़े खड़े करता है। किस तरह से प्रताड़ित करता है। यह अहंकार आदमी को कुछ देता नहीं, उसे तोड़कर जरूर रख देता है। गुरुजी का एक-एक शब्द उसे लग रहा था कि सुरेश के लिए ही बोल रहे हों। क्योंकि इस समय वह काफी तनाव के दौर से गुजर रहा था।
किचन में जाकर खाना बनाना शुरू किया। सब्जी बनाते समय मसाले का आइडिया उसे नहीं लग रहा था। मन में विचार आया इस वक्त उसकी हेल्प रिया कर सकती है। लेकिन फोन लगाने को तैयार नहीं हुआ। उसने मन में विचार किया कि वह रिया को आखिर फोन क्यों नहीं लगा रहा है। कारण वही उसका ईगो, (अहंकार)। एक यही चीज आड़े आ रही है और गुरुजी की बातें उसके जेहन में फिर से आने लगी। उसने अपने गुरुजी का ही कहा मानकर रिया को फोन लगाया। रिया ने तुरंत फोन उठाया मानो वह सुरेश के ही फोन का इंतजार कर रही थी। मन में आए खुशी के भावों को दबाते हुए बोली हेलो।
सुरेश की हिम्मत सीधे उससे सॉरी बोलने की तो नहीं हुई। बोला रिया, मैं सेंव की सब्जी बना रहा था लेकिन मसाले के लिए तुम्हारी हेल्प की जरूरत थी। क्या तुम मुझे बता सकती हो। रिया भी सभी चीजें उसे बताती गई। अंत में सुरेश ने एक दो अनौपचारिक बातों के बाद फोन रख दिया। खाना खाकर सोने गया। उसे ध्यान आया कि जब से रिया गई है अब उसकी महिला दोस्तों के फोन तक आना बंद हो गए। उसे अहसास हुआ कि आखिर तक कोई साथ देगी तो वह है उसकी पत्नी रिया और कोई नहीं।
सुबह उठकर उसने बॉस को छुट्टी के लिए फोन लगाया और रिया को लेने उसके घर की गाड़ी पकड़ी। घर पर उसे देखते ही रिया और उसके माता-पिता बहुत खुश हुए। रिया को समझते देर नहीं लगी कि सुरेश को अपनी गलती का अहसास हो चुका था और फौरन उसके साथ आने की तैयारी करने लगी। लौटकर जब उनका वकील मिला तो उसने तलाक की फीस से ज्यादा फीस उनका साथ बनाए रखने की ली और रिया और सुरेश ने सहर्ष दे भी दी। आखिर उसने सच्चे दोस्त की भूमिका निभाई थी।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 7/02/2010 11:35:00 pm 1 comments
22 जून 2010
प्यार में इकरार से डरता है दिल?
ज़िंदगी में किसी न किसी मोड़ पर हर व्यक्ति प्यार की महक महसूस करता है। प्यार तो सभी करते हैं, लेकिन खुशनसीब लोगों को ही अपनी मंज़िल मिल पाती है। अगर आप भी किसी को मन ही मन पसंद करती हैं, लेकिन उनसे अपनी चाहत का इज़हार करने से डरती हैं तो इन टिप्स को आप क्यों नहीं आज़माती? हो सकता है आपकी झिझक दूर हो जाए और जिसको आप हमसफर बनाना चाहती हों, वह आपकी चाहत को कबूल कर ले।
पसंद-नापसंद
आप जिसे चाहती हैं, उनसे मिलने से पहले उनकी पसंद और नापसंद जान लें। ऐसे में जब आपकी उनसे पहली मुलाकात होगी तो आप उनकी पसंद के मुद्दों पर ही उनसे बात कर सकेंगी और उनके आपकी ओर आकर्षित होने के चांस पूरे होंगे।
जवाब का इंतज़ार करें
आपने पहली मुलाकात में उन्हें इंप्रेस कर लिया है तो अब उन्हें मौका दें। कुछ पुरुषों को लड़कियों की ओर से पीछा किया जाना ठीक नहीं लगता। इसलिए अब आप उन्हें फॉलो न करें, बल्कि उनकी ओर से जवाब का इंतज़ार करें।
डोंट वरी, बी हैपी
लड़कियां हमेशा इस बात को लेकर परेशान रहती हैं कि वह जो कर रही है क्या वह सही है? अगर आप किसी को पसंद करती हैं तो ऐसी स्थिति में केवल दो ही तरह की बातें हो सकती हैं। आप जिसे प्रपोज़ कर रही हैं, वह एकदम मान जाए या उसके लिए आपको कुछ मेहनत करनी पड़े। दोनों ही हालत में वह आपके साथ ही होंगे इसलिए बेकार में परेशान न हों।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 6/22/2010 08:11:00 pm 0 comments
14 मई 2010
रिश्ते सुधारने के नुस्खे
दोस्तो! हर किसी की यही तमन्ना होती है कि जो उसे प्यार करे हमेशा एक सा प्यार करता रहे पर बहुत कम रिश्तों में ऐसा होता है जहाँ हमेशा खुशी और उत्साह बना रहे। एक बार रिश्ता कोई स्वरूप धारण कर लेता है तो बस उसी के इर्द-गिर्द एक बेजान मशीन की तरह वह घूमता रहता है पर हताश होने की जरूरत नहीं इस बेजान सी मशीन में फिर से जान डाली जा सकती है। यूँ तो बहुत से तरीके हैं अपने बेरंग रिश्ते में रंग भरने के लेकिन यहाँ पर उन्हीं नुस्खों को आपके लिए पेश किया जा रहा है जिसमें दोनों की खुशी बरकरार हो :
निर्जीव हुए रिश्तों में जान फूँकने का सबसे अच्छा तरीका है अपनों के साथ समय बिताना। जो लोग आपके जीवन में मायने रखते हों उनके साथ क्वालिटी टाइम यानी गुणवत्ता समय बिताना बहुत असरदार होता है। समय का अभाव है तो समय निकालें। समय चाहे थोड़ा हो पर यह अहसास करना कि उनके साथ समय बिताना आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है, जरूरी है। कई बार दोनों अपने-अपने काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि एक-दूसरे के लिए समय निकालने की जरूरत ही नहीं समझते हैं। उनके दिमाग में एक ही बात होती है कि हम ये सब काम सिर्फ अपने लिए तो नहीं कर रहे हैं पर ऐसा करते हुए हम एक घर में रहते हुए भी अकेले से हो जाते हैं। इस अजनबीयत को तोड़ने का बस एक ही तरीका है कि सोच-समझकर समय साथ-साथ बिताएँ।
हम पूरी दुनिया की बात ध्यान से सुनते हैं और उन्हें सम्मान करते हैं पर जो हमारे अपने होते हैं हम उनकी बातों को ध्यान से सुनने की जरूरत ही नहीं समझते और ऐसा कर हम उनका अपमान करते हैं। यह आदत बदलने की जरूरत है। हमने सामाजिक व्यवहार में यही सीखा हुआ होता है कि यदि हम किसी के विचारों से असहमत हैं फिर भी उनके नजरिए को जरूर सुनें पर अपने करीबी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करने का प्रशिक्षण हमें अमूमन नहीं मिला होता है इसलिए जैसे ही किसी की राय हमसे भिन्न होती है तो हम बेचैन होकर उसी समय उस बात को काटकर रोक देते हैं।
* अपने सब्र का दामन कभी न छोड़ें, चाहे शिकायत का मुद्दा आपकी सोच से विपरीत क्यों न हो। अगर आपने उनकी शिकायत को धैर्य से नहीं सुना तो सामने वाले को यही लगेगा कि आपको उनकी परवाह नहीं है। हो सकता है उनकी शिकायत पूरी तरह वाजिब न हो पर यह दुख या सवाल उनके मन में आपके ही किसी व्यवहार से आया है। बेहतर यही है कि उस शिकायत को खुले दिल से सुन लें। ऐसी परिस्थितियों से बचने से या अपनी बात कहकर चुप कराने से रिश्तों का अपनापन जाता रहता है।
* अपने प्यार करने वालों को घर की मुर्गी की तरह नहीं लेना चाहिए। अकसर कुछ समय के बाद हम यही मानने लगते हैं कि यह कहाँ जाएगा या जाएगी। इस खड़ूस को कौन चाहने वाला मिल सकता है या मिल सकती है पर जब कभी ऐसा होता है तब पाँव तले से जमीन खिसकने लगती है। हैरानी तब होती है जब वही व्यक्ति डर के मारे छोटी-बड़ी बातों का खयाल रखने लगता है। फिर उन्हें अपने साथी की पसंद-नापसंद पर नजर रखना भी आ जाता है। हँसना-हँसाना भी वे सीख जाते हैं पर यही सारा कुछ कोई पहले से ही करे तो जिंदगी इतनी बेरौनक न हो कि गुलजार करने के लिए किसी और का सहारा लिया जाए।
* अगर आप किसी रिश्ते को लेकर आश्वस्त हैं तो आपके साथी तक अपने आप ही उस आश्वस्ती की लहर पहुँच जाएगी। आपका भरोसा, अपनापन बिना शब्दों में ढाले ही दूसरे पर प्रतिबिंबित होगी। जहाँ मन की सच्चाई नहीं हो वहाँ कोई शब्द, कोई जादू-टोना काम नहीं करता। यदि एक व्यक्ति आश्वस्त नहीं है तो दूसरे से आश्वस्ती की उम्मीद करना बेकार है।
* यदि अनजाने में कोई भूल हो गई है तो माफ करने की कोशिश करनी चाहिए। यदि सचमुच उसका इरादा दुख पहुँचाने का नहीं था तो उस बात को दिल से लगाए रखने का कोई तुक नहीं है। माफ करते हुए रिश्ते को आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए। समझौते की गुंजाइश हमेशा रहने देना चाहिए। चीखना-चिल्लाना और बहुत क्रूर होना तो भूल ही जाना चाहिए। इससे रिश्ते सुधरते नहीं हैं बल्कि बिगड़ते हैं।
ऊपर लिखे सातों नुस्खों को हम यदि आजमाएँ तो यकीन मानिए कम से कम पचास प्रतिशत तो हमारे रिश्ते में सुधार आना निश्चित है। रिश्ते में गरमाहट और खुशी भी तभी मिलती है जब हम उसे सच्चे मन व सचेत रूप से निभाते हैं।
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Posted by Udit bhargava at 5/14/2010 06:43:00 pm 0 comments
तलाश... जो पूरी न हुई
लियो टॉल्स्टाय ने 18वीं सदी में एक उपन्यास लिखा था- अन्ना कारेनिना। एक विवाहित स्त्री का प्रेम के लिए भटकना और उसे पाकर भी मौत को पाना, विचारों की जटिलता प्रस्तुत करता है। यह एक ऐसे दौर की कथा है, जब समाज में स्त्री का प्रेम करना अपराध माना जाता था और यदि एक विवाहित स्त्री ऐसा कर रही है, तो उससे बड़ा कलंक और क्या हो सकता था! लेकिन उपन्यास की नायिका अन्ना कारेनिना ने उन बंधनों को मानने से इंकार कर दिया और प्रेम कर बैठी।
अन्ना ने जिस प्यार के लिए अपने पति और पूरे समाज से बगावत की, उससे ही दूरियाँ बढ़ने लगीं थीं। अब अन्ना और व्रोन्स्की के रिश्ते बोझिल होने लगे थे, अन्ना के जीवन में न प्रेम रहा और न ही पति नाम का कोई सामाजिक रिश्ता। दोराहे पर खड़ी अन्ना को लगा कि उसकी जिंदगी में मौत से बेहतर विकल्प और कुछ नहीं हो सकता। अंतत: उसने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली, और प्रेम की तलाश पूरी होकर भी अधूरी रह गई।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 5/14/2010 06:42:00 pm 0 comments








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