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11 फ़रवरी 2011

आनंद कहाँ ?

आनंद क्या है? अर्थात आनंद को किस तरह परिभाषित किया जा सकता है? क्या आनंद भी श्री कृष्ण के विराट रूप की तरह है? मूल प्रश्न है कि आनंद क्या है. क्या सुख की चरमावस्था ही आनंद कहलाती है? लेकिन वह सुख क्या है? क्या दुःख का अभाव ही सुख है? जिस तरह आनंद को विभिन्न स्तरों पर अनुभव किया जा सकता है, दुःख को भी उसी तरह विभिन्न स्तरों पर अनुभव किया जा सकता है. पर दुःख क्या है?

क्या मन के अनुकूल कोई बात न हो तो वह दुःख है? क्या प्रतिकूल अनुभव ही सुख का जनक है? दुःख? बुद्ध के चार आर्य सत्यों का मूल. बुद्ध दुःख से मुक्ति का उपाय भी बताते हैं. उनके अनुसार अष्टांग मार्ग पर चलकर दुःख से मुक्ति पाई जा सकती है. अष्टांग मार्ग अर्थात माध्यम मार्ग. मध्यम मार्ग अर्थात अति से दूर, बीच का रास्ता सम्यक द्रष्टि. तो क्या दुःख की निवृत्ति कर आनंदित रहा जा सकता है? पंचम जगद गुरू कृपालु महाराज की घोषणा है- ईश्वर ही आनंद है या आनंद ही ईश्वर है. उनके अनुसार श्रीकृष्ण की अहेतुक उपासना कर यह आनंद प्राप्त किया जा सकता है. आहेतुक उपासना अर्थात कामना रहित उपासना. सम्पूर्ण, बिना किसी प्रतिदान की लालसा के.

इसे ही परमानंद कहा जाता है. जगद गुरू कृपालु महाराज कहते हैं, जीव जन्म जन्मांतर से इसी आनंद को पाने के लिये व्यग्र है. लेकिन जीव हर जन्म से कुछ न कुछ आनंद पाता ही है - अपने-अपने ढंग से. आध्यात्मिक जगत में इसी आनंद को लेकर गहन चिंतन किया गया है. आनंद के दो वर्ग बनाए गए हैं. - मायाजन्य आनंद और ईश्वर का रूप. ब्रह्मानंद कहें या ईश्वरानं दोनों, एक ही है. शंकराचार्य ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या मानते हैं, पर जगत क्या सचमुच मिथ्या है? पक्ष-विपक्ष में बुद्धि को भ्रमित कर देने वाले तर्कों और मत-मतांतरों का यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें अभिमन्यु की तरह प्रवेश तो सहज है. पर निकलना असंभव या दुष्कर.

फिर वही जिज्ञासा कि आनंद क्या है? एक सोच उभरती है - आनंद परिभाषा का नहीं, अनुभव का क्षेत्र है. गूंगे के गुड की तरह. गूंगा गुड के स्वाद का अनुभव तो कर सकता है, पर उस अनुभव को व्यक्त नहीं कर सकता. हम सब अपने जीवन में शायद प्रतिदिन किसी न किसी क्षण आनंद का अनुभव करते हैं - सुख तो पाते ही हैं, अपनी-अपनी रूची, अपनी अपनी हैसियत और अपने-अपने संस्कारों के अनुसार.

ऐसा लगता है कि जिस तरह कस्तूरी मृग की नाभि में होती है, उसी तरह शान्ति और आनंद हमारी नाभि में है. इस स्तर पर हम सब कस्तूरी मृग ही हैं. आनंद का सृजन भी हम ही करते हैं, अनुभव भी हम ही करते हैं. इस तरह आनंद के जनक और उसके उपभोक्ता दोनों हम स्वयं हैं.

दरअसल आनंद एक मन स्थिति का नाम है. दुःख और सुख दोनों हमारी मन स्थिति के रूप हैं. लेकिन विंड बना यह है कि हमारी मनस्थिति के स्वामी हम स्वयं नहीं हैं, उस पर हमारे आसपास के वातावरण का, मिलने-जुलने वाले लोगों का भी अच्छा-खासा असर पड़ता है.

हमारे आपास के वातावरण के कुप्रभावों से बचाव और आनंद की प्राप्ति का एक रास्ता है, और वह है सहज रहना, पर जीवन में सहजता लाना किसी तपस्या से कम नहीं.

यदि हम अपने में सहज जीवन जीने की आदत डाल लें, तो आनंद की प्राप्ति सहज हो जाएगी. सहजता एक कुंजी है, सनान्तन आनद ही.

28 अगस्त 2010

प्रेम के लिए जरूरी है ज्ञान से मुक्ति ( Love's knowledge necessary for salvation )

यहां प्रेम सिखाया जा रहा है। और प्रेम को सिखाया कैसे जा सकता है? एक ही काम किया जा सकता है - ज्ञान छीन लिया जाए। चट्टान हट जाए, झरना बह उठे। वही काम यहां चल रहा है। यह अविद्यापीठ है। यह एंटी -यूनिवर्सिटी है।

इस काम को फैलाना है, क्योंकि दुनिया ज्ञान से बहुत बोझिल है। मनुष्य को ज्ञान से मुक्त करवाना है।

पश्चिम के एक विचारक डी. एच. लारेंस ने कहा था :  अगर सौ साल के लिए सारे विश्वविद्यालय बंद हो जाएं तो आदमी फिर से आदमी हो जाए, बात कीमत की है।

लेकिन मैं इस बात के लिए राजी नहीं हूं कि विश्वविद्यालय बंद हो जाएं। मेरी प्रस्तावना दूसरी है। मेरी प्रस्तावना है - जितने विश्वविद्यालय हों, उतने एंटी-युनिवर्सिटी, उतने ही अविद्यापीठ भी हों। विश्वविद्यालय बंद हो जाएं तो कुछ अधिक नहीं हो जाएगा। आदमी इससे बेहतर आदमी होगा फिर भी - आदमी हो जाएगा, जैसे जंगलों के वासी हैं। फिर थाप पड़ेगी। फिर घुंघरू बंधेंगे। फिर लोग नाचेंगे, चांद-तारों के नीचे। फिर लोग प्रेम करेंगे।

मगर इससे भी ऊंची एक जगह है और वह है - विश्वविद्यालय से गुजरना और विश्वविद्यालय ने जो भी दिया है उसे छोड़ देना। वह उससे भी ऊंची जगह है। फिर प्रेम की थाप पड़ती है। फिर घुंघरू बंधते हैं। लेकिन यह ऊंची जगह है, पहली से।

इसको ऐसा समझो तो समझ में आ जाएगा। बुद्ध ने राजमहल छोड़ा, राजपाट छोड़ा, पद-प्रतिष्ठा छोड़ी, भिखारी हो गए। एक तो भिखारी बुद्ध हैं और एक भिखारी पूना की सड़कों पर। तुम किसी को भी पकड़ ले सकते हो- भिखारी को। ये दोनों भिखारी हैं ऊपर से देखने में। लेकिन बुद्ध के भिखारीपन में एक समृद्धि है। बुद्ध ने जान कर छोड़ा। अनुभव से छोड़ा। दूसरा भिखारी सिर्फ दरिद्र है। दोनों के भीतर बड़ा अंतर है। और तुम अगर दोनों की आंखों में झांकोगे तो पता चल जाएगा अंतर। बुद्ध में तुम्हें सम्राट दिखाई पड़ेगा; और भिखारी सिर्फ भिखारी।

इसलिए हमारे पास दो शब्द हैं- भिक्षु और भिखारी । वह हमने फर्क करने के लिए बनाए हैं। दुनिया की किसी भाषा में दो शब्द नहीं हैं- भिक्षु और भिखारी। भिक्षु या भिखारी - एक ही शब्द काफी होता है, क्योंकि दुनिया ने दूसरा अनुभव ही नहीं जाना है। बुद्ध जैसे भिखारी सिर्फ भारत ने जाने; भारत के बाहर किसी ने नहीं जाने। तो हमें एक नया शब्द खोजना पड़ा- ÷भिक्षु'। भिक्षु में बड़ा सम्मान है; भिखारी में बड़ा अपमान है।

भिखारी का इतना ही मतलब है - इस आदमी के पास धन कभी था नहीं; इसने धन कभी जाना नहीं। ÷भिक्षु' का अर्थ है, धन था, धन जाना और जाना कि व्यर्थ है और उसे छोड़+ा। यहां बड़ी ऊंची बात है। इसमें बड़ी गरिमा है।

ऐसा ही मेरा खयाल है। डी. एच. लारेंस से मैं थोड़ी दूर तक राजी, लेकिन मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि सारे विश्वविद्यालय बंद हो जाएं। विश्वविद्यालय मजे से रहें; लेकिन इनका मुकाबला भी पैदा हो। बुद्धि के विश्वविद्यालय मजे से रहें; उनकी जरूरत है - दुकानदारी में, काम-काज में, विज्ञान में - उनकी आवश्यकता है। गणित एकदम व्यर्थ नहीं है। लेकिन इनके मुकाबले हृदय के मंदिर भी हों, प्रेम के मंदिर भी हों - जहां सिर्फ ढाई अक्षर प्रेम के पढ़ाए जाते हों; जहां कुछ और न पढ़ाया जाता हो; पढ़ाया-लिखाया गया छीना जाता हो और झपटा जाता हो।

जब कोई आदमी सब जानकर जानता है कि जानना व्यर्थ है - तो वह सिर्फ आदमी नहीं हो जाता; वह सिर्फ आदिवासी नहीं हो जाता। सुकरात को तुम आदिवासी नहीं कहोगे। और आदिवासियों ने कोई सुकरात पैदा नहीं किया है, यह भी खयाल रखना। सुकरात के पैदा होने के लिए एथेंस चाहिए; एथेंस की शिक्षा चाहिए; एथेंस के शिक्षक चाहिए। और एक दिन सुकरात कहता है कि मैं कुछ भी नहीं जानता।

सुकरात ने कहा कि जब मैं युवा था, तो मैं सोचता था कि मैं बहुत कुछ जानता हूं; फिर जब मैं बूढ़ा हुआ तो मैंने जाना कि मैं बहुत कम जानता हूं, बहुत कुछ कहां! इतना जानने को पड़ा है ! मेरे हाथ में क्या है- कुछ भी नहीं है, कुछ कंकड़-पत्थर बीन लिए हैं ! और इतना विराट अपरिचित है अभी ! जरा-सी रोशनी है मेरे हाथ में - चार कदम उसकी ज्योति पड़ती है और सब तरफ गहन अंधकार है ! नहीं, मैं कुछ ज्यादा नहीं जानता; थोड़ा जानता हूं।

और सुकरात ने कहा कि जब मैं बिलकुल मरने के करीब आ गया, तब मुझे पता चला कि वह भी मेरा वहम था कि मैं थोड़ा जानता हूं। मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। मैं अज्ञानी हूं।

जिस दिन सुकरात ने यह कहा,  मैं अज्ञानी हूं', उसी दिन डेलफी के मंदिर के देवता ने घोषणा की - सुकरात इस देश का सबसे बड़ा ज्ञानी है। जो लोग डेलफी का मंदिर देखने गए थे, उन्होंने आगे आकर सुकरात को खबर दी कि डेलफी के देवता ने घोषणा की है कि सुकरात इस समय पृथ्वी का सबसे बड़ा ज्ञानी है। आप क्या कहते हैं?

सुकरात ने कहा - जरा देर हो गई। जब मैं जवान था तब कहा होता तो मैं बहुत खुश होता। जब मैं बूढ़ा होने के करीब हो रहा था, तब भी कहा होता, तो भी कुछ प्रसन्नता होती। मगर अब देर हो गई, क्योंकि अब तो मैं जान चुका कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं।

जो यात्री डेलफी के मंदिर से आए थे, वे तो बड़ी बेचैनी में पड़े कि अब क्या करें। डेलफी का देवता कहता है कि सुकरात सबसे बड़ा ज्ञानी है और सुकरात खुद कहता है कि मैं सबसे बड़ा अज्ञानी हूं; मुझसे बड़ा अज्ञानी नहीं। अब हम करें क्या? अब हम मानें किसकी? अगर डेलफी के देवता की मानें कि सबसे बड़ा ज्ञानी है तो फिर इस ज्ञानी की भी माननी ही चाहिए, क्योंकि सबसे बड़ा ज्ञानी है। तब तो मुश्किल हो जाती है कि अगर इस सबसे बड़े ज्ञानी की मानें तो देवता गलत हो जाता है।

वे वापिस गए। उन्होंने डेलफी के देवता को निवेदन किया कि आप कहते हैं, सबसे बड़ा ज्ञानी है सुकरात और हमने सुकरात से पूछा। सुकरात उलटी बात कहता है। अब हम किसकी मानें? सुकरात कहता है - मुझसे बड़ा अज्ञानी नहीं।

डेलफी के देवता ने कहा- इसीलिए तो हमने घोषणा की है कि वह सबसे बड़ा ज्ञानी है। ज्ञान की चरम स्थिति है - ज्ञान से मुक्ति। ज्ञान की आखिरी पराकाष्ठा है- ज्ञान के बोझ को विदा कर देना। फिर निर्मल हो गए। फिर स्वच्छ हुए। फिर विमल हुए। फिर कोरे हुए।

आदिवासी भी कोरा है, लेकिन उसने अभी लिखावट नहीं जानी।

एक छोटा बच्चा, ऐसा समझो, छोटा बच्चा, अभी इसने कोई पाप नहीं किए- लेकिन तुम इसे संत नहीं कह सकते, क्योंकि इसने पाप किए ही नहीं, पाप का रस ही नहीं जाना, पाप का त्याग भी नहीं किया, पाप की व्यर्थता नहीं पहचानी। यह तो सिर्फ भोला है; इसको संत नहीं कह सकते। और चूंकि यह भोला है, इसलिए अभी पूरी संभावना है कि यह पाप करेगा, क्योंकि बिना पाप को किए कोई कब पाप से मुक्त हुआ है ! यह जाएगा बाजार में। यह उतरेगा दुनिया में। यह चोरी, बेईमानियां, सब करेगा। यह अभी भोला है, यह बात सच है। मगर यह भोलापन टिकनेवाला नहीं है, क्योंकि यह भोलापन कमाया नहीं गया। यह तो प्राकृतिक भोलापन है, नैसर्गिक भोलापन है। यह तो नष्ट होने वाला है। यह कुंवारापन, यह ताजगी, जो बच्चे में दिखाई पड़ती है, यह टिकने वाली नहीं। तुम भी जानते हो, सारी दुनिया जानती है कि यह आज नहीं कल दुनिया में जाएगा, जाना ही पड़ेगा। हर बच्चे को जाना पड़ेगा।

और अगर तुम बच्चे को घर में ही रोक लो चहारदीवारियां खड़ी करके, तो तुम उसके हत्यारे हो। क्योंकि वह बच्चा भोला ही नहीं रहेगा, पोला भी हो जाएगा। उसके जीवन में कुछ वजन ही नहीं होगा। उसके जीवन में वजन तो चुनौतियों से आनेवाला है। भटकेगा तो वजन आएगा। जो भटक-भटककर घर लौटता है, वही घर लौटता है। घर में ही जो बैठा रहा, भटका ही नहीं - उसका घर में बैठने का कोई अर्थ नहीं है - उसके भीतर का चित तो भटकता ही रहेगा। वह सोचता ही रहेगा कैसे निकल भागूं !
                                                                                                                                                                                 - ओशो वाणी

20 जुलाई 2010

क्या सही क्या गलत ( What right wrong )

व्यक्ति, जितना बुद्धिमान होगा, उतना स्वयं के ढंग से जीना चाहेगा। सिर्फ बुद्धिहीन व्यक्ति पर ऊपर से थोपे गए नियम प्रतिक्रिया, रिएक्शन पैदा नहीं करेंगे। तो, दुनिया जितनी बुद्धिहीन थी, उतनी ऊपर से थोपे गए नियमों के खिलाफ बगावत न थी। जब दुनिया बुद्धिमान होती चली जा रही है, बगावत शुरू हो गई है। सब तरफ नियम तोड़े जा रहे हैं। मनुष्य का बढ़ता हुआ विवेक स्वतंत्रता चाहता है।

स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्‍छंदता नहीं है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि मैं अपने व्यक्तित्व की स्वतंत्रता पूर्ण निर्णय करने की स्वयं व्यवस्था चाहता हूँ, अपनी व्यवस्था चाहता हूँ। तो अनुशासन की पुरानी सारी परंपरा एकदम आकर गड्‍ढे में खड़ी हो गई है। वह टूटेगी नहीं। उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, उसे चलाने की कोशिश नहीं ही करें, क्योंकि जितना हम उसे चलाना चाहेंगे, उतनी ही तीव्रता से मनोप्रेरणा उसे तोड़ने को आतुर हो जाएगी। और उसे तोड़ने की आतुरता बिल्कुल स्वाभाविक, उचित है।

गलत भी नहीं है। तो अब एक नये अनुशासन के विषय में सोचना जरूरी हो गया है, जो व्यक्ति के विवेक के विकास से सहज फलित होता है। एक तो यह नियम है कि दरवाजे से निकलना चाहिए, दीवार से नहीं निकलना चाहिए। यह नियम है। जिस व्यक्ति को यह नियम दिया गया है, उसके विवेक में कहीं भी यह समझ में नहीं आया है कि दीवार से निकलना, सिर तोड़ लेना है। और दरवाजे से निकलने के अतिरिकत कोई मार्ग नहीं है। उसकी समझ में यह बात नहीं आई है। उसके विवेक में यह बात आ जाए तो हमें कहना पड़ेगा कि दरवाजे से निकलो।

वह दरवाजे से निकलेगा। निकलने की यह जो व्यवस्था है उसके भीतर से आएगी, बाहर से नहीं। अब तक शुभ क्या है, अशुभ क्या है, अच्छा क्या है, बुरा क्या है, यह हमने तय कर लिया था, वह हमने सुनिश्चित कर लिया था। उसे मानकर चलना ही सज्जन व्यक्ति का कर्तव्य था। अब यह नहीं हो सकेगा, नहीं हो रहा है, नहीं होना चाहिए।

मैं जो कह रहा हूँ, वह यह है कि एक-एक व्यक्ति के भीतर उतना सोचना, उतना विचार, उतना विवेक जगा सकते हैं। उसे यह दिखाई पड़ सके कि क्या करना ठीक है, और क्या करना गलत है। निश्चित ही अगर विवेक जगेगा, तो करीब-करीब हमारा विवेक एक से उत्तर देगा, लेकिन उन उत्तरों का एक सा होना बाहर से निर्धारित नहीं होगा, भीतर से निर्धारित होगा। प्रत्येक व्यक्ति के विवेक को जगाने की कोशिश की जानी चाहिए और विवेक से जो अनुशासन आएगा, वह शुभ है। फिर सबसे बड़ा फायदा यह है कि विवेक से आए हुए, अनुशासन में व्यक्ति को कभी परतंत्रता नहीं मालूम पड़ती है।

दूसरे के द्वारा लादा गया सिद्धांत परतंत्रता लाता है। और यह भी ध्यान रहे, परतंत्रता के खिलाफ हमारे मन में विद्रोह पैदा होता है। विद्रोह से नियम तोड़े जाते हैं, और अगर व्यक्ति स्वतंत्र हो, अपने ढंग से जीने की कोशिश से अनुशासन आ जाए, तो कभी विद्रोह पैदा नहीं होगा। इस सारी दुनिया में नए बच्चे जो विद्रोह कर रहे हैं, वह उनकी परतंत्रता के खिलाफ है। उन्हें सब ओर से परतंत्रता मालूम पड़ रही है।

मेरी दृष्टि यह है कि अच्छी चीज के साथ परतंत्रता जोड़ना बहुत महँगा काम है। अच्छी चीज के साथ परतंत्रता जोड़ना बहुत खतरनाक बात है। क्योंकि परतंत्रता तोड़ने की आतुरता बढ़ेगी, साथ में अच्‍छी चीज भी टूटेगी। क्योंकि आपने अच्छी चीज के साथ स्वतंत्रता जोड़ी है। अच्छी चीज के साथ स्वतंत्रता हो ही सकती है क्योंकि अच्छी चीज होने के भीतर स्वतंत्रता का स्वप्न ही अनिवार्य है; अन्यथा हम उसके विवेक को जगा सकते हैं। शिक्षा बढ़ी है, संस्कृति बढ़ी है, सभ्यता बढ़ी है, ज्ञान बढ़ा है। आदमी के विवेक को अब जगाया जा सकता है। अब उसका ऊपर से थोपना ‍अनिवार्य नहीं रह गया है।

मेरा कहना यह है कि विवेक विकसित करने की बात है एक-एक चीज के संबंध में। लंबी ‍प्रक्रिया है। किसी को बँधे-बँधाए नियम देना बहुत सरल है कि झूठ मत बोलो, सत्य बोलना धर्म है। पर नियम देने से कुछ होता है? नियम देने से कुछ भी नहीं होता। पुराना अनुशासन गया, आखिरी साँसें गिन रहा है। और पुराने मस्तिष्क उस अनुशासन को जबरदस्ती रोकने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अगर अनुशासन चला गया, तो क्या होगा? क्योंकि उनका अनुभव यह है कि अनुशासन के रहते भी आदमी अच्छा नहीं था, और अगर अनुशासन चला जाए तो मुश्किल हो जाएगी।

उनका अनुभव यह है कि अनुशासन था, तो भी आदमी अच्छा नहीं था तो अनुशासन नहीं रहेगा, तो आदमी का क्या होगा? उन्हें पता नहीं है कि आदमी के बुरे होने में उनके अनुशासन का नब्बे प्रतिशत हाथ था। गलत अनुशासन था- अज्ञानपूर्ण था, थोपा हुआ था, जबरदस्ती का था।

एक नया अनुशासन पैदा करना पड़ेगा। और वह अनुशासन ऐसा नहीं होगा कि बँधे हुए नियम दे दें। ऐसा होगा‍ कि उसके विवेक को बढ़ाने के मौके दें, और उसके विवेक को बढ़ने दें, और अपने अनुभव बता दें जीवन के, और हट जाएँ रास्ते से बच्चों के। एकदम रास्ते पर खड़े न रहें उनके। सब चीजों में उनके बाँधने की, जंजीरों में कसने की कोशिश न करें। वे जंजीरें तोड़ने को उत्सुक हो गए हैं।

अब जंजीरें बर्दाश्त न करेंगे। अगर भगवान भी जंजीर मालूम पड़ेगा तो टूटेगा, बच नहीं सकता। अब तोड़ने की भी जंजीर बचेगी नहीं, क्योंकि जंजीर के खिलाफ मामला खड़ा हो गया है। अब पूरा जाना होगा, जंजीर बचनी नहीं चाहिए।

लेकिन मनुष्य चेतना के विकास का क्रम है। एक क्रम था जब चेतना इतनी विकसित नहीं थी, नियम थोपे गए थे, सिवाय इसके कोई उपाय नहीं था। अब नियम थोपने की जरूरत नहीं रह गई है। अब नियम बाधा बन गए हैं। अब हमें समझ, अंडरस्टैंडिंग ही बढ़ाने की दिशा में श्रम करना पड़ेगा। तो मैं कहना चाहता हूँ कि समझ, विवेक, एकमात्र अनुशासन है। पूरी प्रक्रिया बिल्कुल अलग होगी। नियम थोपने की प्रक्रिया बिल्कुल अलग थी।, बायोलॉजिकल अपोजिट है, दोनों बिल्कुल विरोधी हैं। खतरे इसमें उठाने पड़ेंगे। खतरे पुरानी प्रक्रिया में भी बहुत उठाए।

सबसे बड़ा खतरा यह उठाया कि आदमी जड़ हो गया। जिसने नियम माना, वह जड़ हो गया, जिसने नियम नहीं माना, वह बर्बाद हो गया। वे दोनों विकल्प बुरे थे। अगर किसी ने पुराना अनुशासन मान लिया तो वह बिल्कुल ईडियाटिक हो गया, जड़ हो गया। उसकी बुद्धि खो गई। और‍ जिसने बुद्धि को बचाने की कोशिश की, उसे नियम तोड़ने पड़े। वह बर्बाद हो गया, वह अपराधी हो गया, वह प्रॉब्लम बन गया, वह समस्या बन गया। दोनों विकास बुरे सिद्ध हुए। जिसने नियम माना वह खराब हुआ; क्योंकि नियम ने उसको जड़ बना दिया। गुलाम बना दिया। और जिसने नियम तोड़ा, वह स्वच्छंद हो गया। नियम से अच्छापन नहीं आया।

26 जून 2010

महानता के लक्षण

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। पुत्र भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय का ध्यान रखता।
एक दिन दरवाज़े पर किसी ने - 'माई! ओ माई!' पुकारते हुए आवाज़ लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया काँपते हाथ फैलाए खड़ी थी।

उसने कहा, 'बेटा! कुछ भीख दे दे।'

बुढ़िया के मुँह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और माँ से आकर कहने लगा, 'माँ! एक बेचारी गरीब माँ मुझे बेटा कहकर कुछ माँग रही है।'
उस समय घर में कुछ खाने की चीज़ थी नहीं, इसलिए माँ ने कहा, 'बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहे तो चावल दे दो।'
पर बालक ने हठ करते हुए कहा - 'माँ! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊँगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूँगा।'
माँ ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा, 'लो, दे दो।'

बालक खुशी-खुशी वह कंगन उस भिखारिन को दे आया। भिखारिन को तो मानो एक ख़ज़ाना ही मिल गया। कंगन बेचकर उसने परिवार के बच्चों के लिए अनाज, कपड़े आदि जुटा लिए। उसका पति अंधा था। उधर वह बालक पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान हुआ, काफ़ी नाम कमाया।

एक दिन वह माँ से बोला, 'माँ! तुम अपने हाथ का नाप दे दो, मैं कंगन बनवा दूँ।' उसे बचपन का अपना वचन याद था।
पर माता ने कहा, 'उसकी चिंता छोड़। मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूँ कि अब मुझे कंगन शोभा नहीं देंगे। हाँ, कलकत्ते के तमाम ग़रीब बालक विद्यालय और चिकित्सा के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनके लिए तू एक विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवा दे जहाँ निशुल्क पढ़ाई और चिकित्सा की व्यवस्था हो।'

माँ के उस पुत्र का नाम ईश्वरचंद्र विद्यासागर।

23 जून 2010

प्रभु मिलन की आकांक्षा

मीरा कहै प्रभु हरि अविनासी, तन मन ताहि पटै रे।' मीरा कहती है कि मैं तुम्हें यह कह दूं कि मुझे जबसे यह अविनाशी मिला है, जबसे यह शाश्वत मिला है, तब से मेरा तन-मन, आत्मा सब एक हो गए हैं। वे द्वंद्व भीतर के गए; मैं निर्द्वंद्व हो गई हूं। वे जो भीतर खंड-खंड थे मेरे, वे सब समाप्त हो गए हैं; मैं अखंड हो गई हूं।

अखंड से जुड़ो तो अखंड हो जाओगे।

साधारणतः आदमी संसार में जीता है तो खंड-खंड रहता है, क्योंकि कितने खंडों से तुम जुड़े हो। एक हाथ पश्चिम जा रहा है, एक हाथ पूरब जा रहा है। एक पैर दक्षिण जा रहा है, एक पैर उत्तर जा रहा है। तुम कट गए। एक इच्छा कहती है - धन कमा लो; एक इच्छा कहती है - पद बना लो; एक इच्छा कहती है कि ज्ञान अर्जित कर लो; एक इच्छा कहती है यहीं संसार की चिंता में पडे+, थोड़ा स्वर्ग में भी इंतजाम कर लो, कभी कुछ दान-पुण्य भी कर लो। ऐसी हजार इच्छाएं हैं - और तुम हजार हो गए हजार इच्छाओं के कारण। और इन सबमें कलह है। ये इच्छाएं एक दिशा में भी नहीं जा रही हैं, क्योंकि अगर धन कमाना है तो पद न कमा पाओगे। अगर पद कमाना है तो धन गंवाना पड़ेगा। चुनाव लड़ना हो तो धन गंवाना ही पड़ेगा। और धन कमाना हो तो फिर चुनाव लड़ने से जरा बचना पड़ेगा। अगर स्वर्ग में कुछ पद-प्रतिष्ठा पानी हो, वहां सोने के महलों में वास करना और चांदी के रास्तों पर चलना हो, तो फिर आदमी को यहां भूखे मरना पड़े, उपवास करना पड़े - इत्यादि।

आकांक्षाएं विपरीत हैं। शरीर कहता है- भोजन करो। मन की आकांक्षाएं लोभ से भरी हैं; वह कहता है कि यहां क्या करना भोजन, स्वर्ग में ही कर लेंगे इकट्ठा। अभी कुछ दिन की बात है, गुजार लो; वहां शराब के चश्मे बह रहे हैं। मन कहता है - सुंदर स्त्री जा रही है, क्यों छोड़ दे रहे हो? एक मन कहता - इस स्त्री में उलझे तो फिर अप्सराएं नहीं मिलेंगी और खयाल रखना, फिर पछताओगे। अरे, यह तो दो दिन की बात है; एक दफा पहुंच गए स्वर्ग, तो अप्सराएं मिलेंगी। फिर भोगना सुख-ही-सुख अनंतकाल तक।

ऐसा मन अनेक-अनेक खंडों में बंटा है। इन खंडों के कारण तुम भी खंडित हो गए हो; तुम्हारी एकता टूट गई है।

सारे शास्त्रों का शास्त्र एक ही है कि तुम एक हो जाओ। लेकिन तुम एक कैसे होओगे; जब एक ही आकांक्षा रह जाए। उस एक आकांक्षा को ही हम राम कहते हैं। उस एक आकांक्षा का अर्थ ही यह है कि राम के सिवा कुछ भी नहीं पाना है। बाकी सब पाना उसी पर चढ़ा देना है; बस एक परमात्मा को पा लेना है।

जब एक ही आकांक्षा रह जाएगी तो तुम एक ही हो जाओगे। और कोई उपाय नहीं है। तुम्हारे भीतर योग साधने का और कोई उपाय नहीं है। जितनी आकांक्षाएं, उतने टुकड़े। यह बात तो तुम्हारी समझ में आ जाएगी कि जितनी आकांक्षाएं उतने टुकड़े हो जाते हैं। हर आकांक्षा एक टुकड़ा लेकर भागने लगती है। जब एक ही आकांक्षा रह जाएगी तो तुम अखंड हुए। वही है अर्थ - ÷मेरो मन रामहि राम रटै रे।' एक ही आकांक्षा बची है। बस एक ही को पाने की धुन सवार हुई है। सब धुनें खो गईं। सभी धुनें उसी में लीन हो गईं। जैसे सब छोटे-छोटे नदी-नाले आकर गंगा में सम्मिलित हो गए हैं, और गंगा सागर की तरफ - ऐसे ही सब छोटी-छोटी इच्छाएं एक विराट इच्छा बन गई हैं प्रभु को पाने की और सारी आकांक्षाएं उसी में सम्मिलित हो गई हैं। एक ही लक्ष्य बचा।

फिर ज्यादा देर तुम रुक न सकोगे। बहोगे अपने-आप, सागर तक पहुंच जाओगे। छोटे-छोटे नाले सागर तक नहीं पहुंच सकते; रास्ते में खो जाएंगे, मरुस्थलों में उड़ जाएंगे। लेकिन सब इच्छाएं मिल जाएं और एक अभीप्सा बन जाए... । अभीप्सा शब्द का यही अर्थ है। अभीप्सा का अर्थ होता है - सारी इच्छाएं एक इच्छा में निमज्जित हो गईं। छोटी-छोटी लपटें सब एक विराट लपट में खो गईं। तुम एक मशाल बन गए।

अब इस अविनाशी से लगन लग गई; अब तन और मन के बीच जो फासला था वह पट गया। अब कोई फासले नहीं रहे। अब कोई भेद नहीं रहे। अब कोई खंड नहीं रहे। मैं अखंड हो गई हूं।

05 अप्रैल 2010

अध्यात्म

प्रेम के तीन रूप

प्रेम तीन तरह का होता है - जो आकर्षण से पैदा हो, जो घनिष्ठता से उत्पन्न हो और तीसरा, ईश्वर के प्रति प्रेम। आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूं?

आकर्षण से पैदा प्रेम अधिक समय तक नहीं टिकता है क्योंकि यह अनजानेपन और आकर्षण के कारण होता है। पर एक बार पहचान होने पर शीघ्र ही आकर्षण समाप्त हो जाता है और मन ऊबने लगता है, जैसा कि प्रायः प्रेम-विवाह में देखने में आता है। इस प्रकार का प्रेम घटता जाता है और साथ में लाता है भय, शंका, असुरक्षा और दुःख।

घनिष्ठता से उत्पन्न प्रेम बढ़ता है, तुम आत्मीयता महसूस करते हो, जैसे कि एक पुराने घनिष्ठ मित्र के साथ, बजाय किसी नये व्यक्ति के साथ। पर इस प्रेम में कोई रोमांच नहीं, कोई उत्साह या आवेश नहीं।

ईश्वर के प्रति प्रेम इन सब के ऊपर है। ईश्वरीय प्रेम सदा नवीन रहता है। जितना तुम समीप आते हो, उतना अधिक आकर्षण और गहराई पाते हो। इस प्रेम में सुख, उत्साह और आत्मीयता सभी है। इस प्रेम में कभी नीरसता नहीं आती, यह सब को उत्साहित और सजग रखता है।

सांसारिक प्रेम महासागर की तरह हो सकता है, पर महासागर का भी एक तल है।

ईश्वरीय प्रेम आकाश की तरह है- असीम, अनंत।

महासागर के तल से ऊपर उड़ जाओ विशाल नभ तक !

प्रिय बनो
तुम्हें ज्ञान को कायम रखने की चिंता करने की जरूरत नहीं। जब ज्ञान विवेक बनकर तुममें समा जाएगा, वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा। विवेक हृदय में समा जाता है। ईश्वर को अपना वैलेन्टाइन, अपना प्रियतम बना लो। जीवन का यही आखिरी कार्य है और प्रथम भी।

अपने हृदय को एक सुरक्षित स्थान में रखो, यह बहुत ही कोमल है। घटनाएं तथा छोटी-छोटी बातें इस पर गहरा प्रभाव डालती हैं। अपने हृदय को सुरक्षित और मन को स्वस्थ और पवित्र रखने के लिए तुम्हें ईश्वर से बेहतर और कोई स्थान नहीं मिलेगा। जब तुम अपना हृदय ईश्वर को दे दोगे, तो समय और घटनाएं तुम्हें छू नहीं सकती, उनका कोई निशान भी तुम पर नहीं पड़ेगा।

एक मूल्यवान रत्न को सोने या चांदी में जड़ा जाता है ताकि वह गिर न जाए और उसे पहना जा सके; वैसे ही विवेक और ज्ञान हमारे हृदय को ईश्वर में जड़कर रखते हैं।

ईश्वर को अपना पिय्रतम बनाओ।

बस, रहो .... और जानो कि तुम प्रिय हो।

यही है, ÷÷प्रिय तम''।

प्रेम तो तुम्हारा अस्तित्व ही है
मान लो कोई तुम्हारे प्रति बहुत प्रेम दिखाता है। तुम क्या करते हो?

1. तुम्हें समझ में नहीं आता कि उत्तर में कैसा व्यवहार करें।
2. तुम आभार और बंधन महसूस करते हो।
3. तुम संकुचित होते हो या शर्माकर दूर हो जाते हो।
4. तुम मूर्ख और अनाड़ी महसूस करते हो।
5. तुम प्रत्युत्तर देने की चेष्टा करते हो, हालांकि वह सच्चे मन से नहीं होता।
6. उस प्रेम की अभिव्यक्ति पर संदेह करते हो या अपनी योग्यता पर।
7. तुम्हें भय होता है कि तुम सम्मान खो दोगे क्योंकि सम्मान में एक दूरी होती है और प्रेम दूरी रहने नहीं देता।
8. तुम्हारा अहं दृढ़ होता है और वह तुम्हें न तो प्रेम को स्वीकार करने देता है, न ही प्रत्युत्तर देने देता है।
9. और कुछ? .......................(रिक्त स्थान स्वयं भर लो)

प्रेम पाने की योग्यता प्रेम देने की क्षमता से आती है। तुम जितने अधिक केंद्रित हो और, अनुभव से, जानते हो कि तुम ही प्रेम हो, उतना ही अधिक तुम आत्मीयता महसूस करोगे, चाहे जितना भी अधिक प्रेम, किसी भी रूप में, तुम्हारे प्रति दर्शाया जाए। तुम्हारे अंतःकरण में तुम यह जान लोगेः

प्रेम कोई भावना नहीं!
प्रेम तो तुम्हारा अस्तित्व ही है।
इन्हें भी देखें :-