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04 मई 2012

मुगालते अपने अपने


रूठे चेहरे अब हँसते नजर आते हैं,
बंजर वीरानियाँ भी खिलते गुलज़ार नजर आते हैं।

कोई कसर न छोडी जिन्होंने दुश्मनी निभाने में,
शुक्र है, अब उन्हीं से दोस्ती के आसार नजर आते हैं।

ताउम्र हम जिन की याद में तड़पते रहे, 
शाम ए सहर क्या बात है, वे भी आज बेकरार नजर आते हैं।

गमे मुफलिसी में जिंदगी गुजारी हम ने,
आज सपने खुशियों के बेशुमार नजर आते हैं।

उन से नजरें जो मिलीं, खिल उठा नसीबा अपना,
महफिलें ऐसी सजीं कईं त्योहार नजर आते हैं।

अपने मतलब के लिए हर किसी ने रिश्ते बनाए हम से,
शायद इस जहां में हम ही उन्हें बेकार नजर आते हैं।
                                                                 
       - एस. अहमद 




29 अप्रैल 2012

कोई भीगा स्पर्श

कच्ची बूंदों की
फुहारों में सिहर कर
 जब किसी फूल का अंतर
झील सा काँप कर
गुनगुनाने लगता है,
अथवा किसी पक्षी की
रोमिल बरौनियों की छाँव में
कोई एकांत प्रतीक्षा तीव्रतर हो
सुगबुगाने लगती है,
तब लगता है कि आकाश ने
जरूर किसी मेघखंड की
काव्य ऋचा लिखी है।

वक्त का थोड़ा सा बदलाव
कितने एहसासों को
जन्म दे देता है,
कितने अनगूंजे, अनकहे स्वर
पुरवाई के आसपास
मंडराने लगते हैं।

ऐसे में यदि बादल का
कोई भीगा स्पर्श
सुबह का आँचल थाम
उठाता है और द्वार पर,
मौसम फुर्सत से आवाज
लगा कर पुकारता है,
तब जैसे दिन के पूरे पृष्ट का
शीर्षक ही बदल जाता है।
शायद ऐसे ही क्षण
बस सार्थक होते हैं,
हमारे निजी होते हैं।

                          - सावित्री परमार
    

12 मार्च 2012

कौन?

कौन नशीले नैनों को
मधुशाला कहता होगा,
कौन छलकते होठों को
हालाप्याला कहता होगा?

कौन गुलाबी गालों को
गुंचा गुलाब कहता होगा,
कौन तुम्हारे मुखड़े को
जन्नत का ख्वाब कहता होगा?

किस को स्याह घटाओं में
एक आफताब दीखता होगा,
ए माहताब! हो कर बेताब
फिर लाजवाब कहता होगा।

                                       - सुनीति रावत       

06 मार्च 2012

आएगें आज...

आएगें आज पिया।

यौवन को सजने दे
पैजनियाँ बजने दे
मेरे मन आँखों में
अंजन को लगने दे

नाचेगा रात हिया।

घायल है सारा तन
घायल है सारा मन
ख्यालों के जंगल में
खोयाखोया जीवन

सुधियों ने छेड दिया।

आग लगे बस्ती में
आग लगे हस्ती में
करना क्या चिंता है
डूबे हैं मस्ती में

मौसम ने लूट लिया।

                        - हेमंत नायक  
      
 

चाँद की ओट में

काश,
प्रभात के सिंदूरी सूर्य से
तुम्हारी मांग भर पाता।

समुद्र की नीली गहराई
तुम्हारे नयनों में भर पाता
और काले मेघों से तुम्हारे
नयन आंज पाता,
इन्द्रधनुष के रंगों से
तुम्हारी बिंदिया सजाता।

भरपूर प्रीत की मेहंदी से
हथेलियाँ,
ललाई कचनार सी, महावर
पांवों में सजा कर
चाँद की ओट में, प्यार भरा
एक चुम्बन, सिर्फ एक चुम्बन
तुम्हारे गालों का ले पाता।

                             - रामनिवास शर्मा      

आज मन कुछ गा रहा है।

सतरंगी मौसम में
किसी की प्रीति लिए,
नयनों में नीर भरे
दिल की आवाज लिए,
चेहरे पर भाव भरे
होंठों पर मुसकान लिए,
        प्रीति सागर हिलोरें ले रहा है
        आज मन कुछ गा रहा है।
भंवरी का मन विकल क्यों है
भंवरे से मिलने के लिए,
गगन क्यों झुक रहा है
धरा के चुंबन के लिए?
तार मन के बजते हैं
प्रिय की सांसों में बसने के लिए,
         कौन स्वप्नों में हलचल मचा रहा है,
         आज मन कुछ गा रहा है।
यहांवहां लक्ष्य की तलाश में
क्षणक्षण गुजरता दीर्घ श्वास में,
मन घूमता आस में, विश्वास में
चपला का कोलाहल लिए हुए,
बादलों की महफ़िल व्योम में,
मिलन आकांक्षा को मन में लिए,
         प्रतीक्षारत पलपल गुजार रहा है,
         आज मन कुछ गा रहा है।

                                        - नीता माहेश्वरी       

10 मार्च 2010

सुतून ऐ दार

सुतून ऐ दार की उँचाई से न डर बाबा
जो हौसला है तो इस राह से गुज़र बाबा

ये देख जु़लमत ए शब का पहाड़ काट के हम
हथेलियों पे सजा लाए हैं सहर बाबा

मिली है तब कहीं इरफ़ान ए ज़ात की मंजिल
खुद अपने आपमें सदियों किया सफ़र बाबा

बुलंदियाँ भी उसे ‍सर उठा के देखती हैं
सुतून ए दार की ज़ीनत बने जो सर बाबा

16 फ़रवरी 2010

ग़ज़ल- इकबाल

अजब बाइज़ की दींदारी है या रब
अदावत है इसे सारे जहाँ से

कोई अब तब न ये समझा कि इन्साँ
कहाँ जाता है, आता है कहाँ से

वहीं से रात को जुल्मत मिली है
चमक तारों ने पाई है जहाँ से

हम अपनी दर्द मन्दी का फ़साना
सुना करते हैं अपने राज़दाँ से

बड़‍ी बारीक हैं वाइज़ की चालें
लरज़ जाता है आवाज़े अज़ा, से !

03 फ़रवरी 2010

शायरी - ग़ज़ल

ख़ुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है
रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है

इक कहानी ख़त्म करके वो बहुत है मुतमइन
भूल बैठा है कि आगे इक कहानी और है

बोरिए पर बैठिए, कु्ल्हड़ में पानी पीजिए
हम क़लन्दर हैं हमारी मेज़बानी और है

जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूँ मैं
एक बीमारी ये मुझमें ख़ानदानी और है