04 मई 2012
मुगालते अपने अपने
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Posted by Udit bhargava at 5/04/2012 06:37:00 pm 2 comments
29 अप्रैल 2012
कोई भीगा स्पर्श
फुहारों में सिहर कर
जब किसी फूल का अंतर
झील सा काँप कर
गुनगुनाने लगता है,
अथवा किसी पक्षी की
रोमिल बरौनियों की छाँव में
कोई एकांत प्रतीक्षा तीव्रतर हो
सुगबुगाने लगती है,
तब लगता है कि आकाश ने
जरूर किसी मेघखंड की
काव्य ऋचा लिखी है।
वक्त का थोड़ा सा बदलाव
कितने एहसासों को
जन्म दे देता है,
कितने अनगूंजे, अनकहे स्वर
पुरवाई के आसपास
मंडराने लगते हैं।
ऐसे में यदि बादल का
कोई भीगा स्पर्श
सुबह का आँचल थाम
उठाता है और द्वार पर,
मौसम फुर्सत से आवाज
लगा कर पुकारता है,
तब जैसे दिन के पूरे पृष्ट का
शीर्षक ही बदल जाता है।
शायद ऐसे ही क्षण
बस सार्थक होते हैं,
हमारे निजी होते हैं।
- सावित्री परमार
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Posted by Udit bhargava at 4/29/2012 09:24:00 am 0 comments
12 मार्च 2012
कौन?
मधुशाला कहता होगा,
कौन छलकते होठों को
हालाप्याला कहता होगा?
कौन गुलाबी गालों को
गुंचा गुलाब कहता होगा,
कौन तुम्हारे मुखड़े को
जन्नत का ख्वाब कहता होगा?
किस को स्याह घटाओं में
एक आफताब दीखता होगा,
ए माहताब! हो कर बेताब
फिर लाजवाब कहता होगा।
- सुनीति रावत
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Posted by Udit bhargava at 3/12/2012 07:33:00 pm 1 comments
06 मार्च 2012
आएगें आज...
यौवन को सजने दे
पैजनियाँ बजने दे
मेरे मन आँखों में
अंजन को लगने दे
नाचेगा रात हिया।
घायल है सारा तन
घायल है सारा मन
ख्यालों के जंगल में
खोयाखोया जीवन
सुधियों ने छेड दिया।
आग लगे बस्ती में
आग लगे हस्ती में
करना क्या चिंता है
डूबे हैं मस्ती में
मौसम ने लूट लिया।
- हेमंत नायक
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Posted by Udit bhargava at 3/06/2012 09:05:00 pm 0 comments
चाँद की ओट में
प्रभात के सिंदूरी सूर्य से
तुम्हारी मांग भर पाता।
समुद्र की नीली गहराई
तुम्हारे नयनों में भर पाता
और काले मेघों से तुम्हारे
नयन आंज पाता,
इन्द्रधनुष के रंगों से
तुम्हारी बिंदिया सजाता।
भरपूर प्रीत की मेहंदी से
हथेलियाँ,
ललाई कचनार सी, महावर
पांवों में सजा कर
चाँद की ओट में, प्यार भरा
एक चुम्बन, सिर्फ एक चुम्बन
तुम्हारे गालों का ले पाता।
- रामनिवास शर्मा
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Posted by Udit bhargava at 3/06/2012 08:59:00 pm 0 comments
आज मन कुछ गा रहा है।
किसी की प्रीति लिए,
नयनों में नीर भरे
दिल की आवाज लिए,
चेहरे पर भाव भरे
होंठों पर मुसकान लिए,
प्रीति सागर हिलोरें ले रहा है
आज मन कुछ गा रहा है।
भंवरी का मन विकल क्यों है
भंवरे से मिलने के लिए,
गगन क्यों झुक रहा है
धरा के चुंबन के लिए?
तार मन के बजते हैं
प्रिय की सांसों में बसने के लिए,
कौन स्वप्नों में हलचल मचा रहा है,
आज मन कुछ गा रहा है।
यहांवहां लक्ष्य की तलाश में
क्षणक्षण गुजरता दीर्घ श्वास में,
मन घूमता आस में, विश्वास में
चपला का कोलाहल लिए हुए,
बादलों की महफ़िल व्योम में,
मिलन आकांक्षा को मन में लिए,
प्रतीक्षारत पलपल गुजार रहा है,
आज मन कुछ गा रहा है।
- नीता माहेश्वरी
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Posted by Udit bhargava at 3/06/2012 08:55:00 pm 0 comments
10 मार्च 2010
सुतून ऐ दार
सुतून ऐ दार की उँचाई से न डर बाबा
जो हौसला है तो इस राह से गुज़र बाबा
ये देख जु़लमत ए शब का पहाड़ काट के हम
हथेलियों पे सजा लाए हैं सहर बाबा
मिली है तब कहीं इरफ़ान ए ज़ात की मंजिल
खुद अपने आपमें सदियों किया सफ़र बाबा
बुलंदियाँ भी उसे सर उठा के देखती हैं
सुतून ए दार की ज़ीनत बने जो सर बाबा
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Posted by Udit bhargava at 3/10/2010 07:48:00 am 1 comments
16 फ़रवरी 2010
ग़ज़ल- इकबाल
अजब बाइज़ की दींदारी है या रब
अदावत है इसे सारे जहाँ से
कोई अब तब न ये समझा कि इन्साँ
कहाँ जाता है, आता है कहाँ से
वहीं से रात को जुल्मत मिली है
चमक तारों ने पाई है जहाँ से
हम अपनी दर्द मन्दी का फ़साना
सुना करते हैं अपने राज़दाँ से
बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालें
लरज़ जाता है आवाज़े अज़ा, से !
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Posted by Udit bhargava at 2/16/2010 07:44:00 am 1 comments
03 फ़रवरी 2010
शायरी - ग़ज़ल
ख़ुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है
रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है
इक कहानी ख़त्म करके वो बहुत है मुतमइन
भूल बैठा है कि आगे इक कहानी और है
बोरिए पर बैठिए, कु्ल्हड़ में पानी पीजिए
हम क़लन्दर हैं हमारी मेज़बानी और है
जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूँ मैं
एक बीमारी ये मुझमें ख़ानदानी और है
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Posted by Udit bhargava at 2/03/2010 07:11:00 am 1 comments
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