पौराणिक कथाएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पौराणिक कथाएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

24 सितंबर 2010

देवी-देवताओं की चमत्कारिक कथाएँ

त्रिदेवों की उत्पत्ति

ष्टि के आरम्भ से पूर्व ब्रह्माण्ड जल में डूबा हुआ था। चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, प्राणी किसी की भी उत्पत्ति नहीं हुई थी। केवल भगवती जगदम्बिका परब्रह्म के रूप में विघमान थीं।
 
एक बार देवी भगवती के मन में सृष्टि-रचना का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने सबसे पहले एक पत्ते पर विष्णुजी की उत्पत्ति की। जन्म लेने के बाद विष्णुजी के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे। तब देवी भगवती ने प्रकट होकर उन्हें दिव्य-ज्ञान प्रदान करते हुए तपस्या के लिये प्रेरित किया। देवी के अंतर्ध्यान होने के बाद विष्णुजी तपस्या में लीन हो गए।

भगवान विष्णु को तपस्या करते हुए अनेक वर्ष बीत गए। तपस्या के तेज से उनकी नाभि से एक कमल-पुष्प उत्पन्न हो गया। धीरे-धीरे यह पुष्प विकसित होने लगा। पूर्ण विकसित होने के बाद जब इसकी पंखुड़ियां खुलीं तो उसमें से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई।

ब्रह्माजी ने अपने चारों ओर जल-ही-जल देखा। विष्णुजी के समान ही उनके मन में भी अनेक प्रश्न उठने लगे-- 'मैं कौन हूँ? मैं किस प्रकार उत्पन्न हुआ? ये दिव्य पुरूष कौन हैं जो इस समय घोर तपस्या में लीन हैं?'

तभी एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। इस तेज को देखकर ब्रह्माजी भयभीत हो गए। तब उस तेज में से आकाशवाणी हुई-- "हे पुत्र! भयभीत मत हो। ये तेज देवी भगवती के निराकार रूप का प्रतीक है। तुम्हारी उत्पत्ति देवी भगवती की कृपा से हुई है। इस ब्रह्माण्ड में देवी भगवती ही निराकार और साकार-- दोनों अवस्थाओं में व्याप्त हैं। उन्हीं की इच्छा से प्रलय; और सृष्टि में जन्म और मृत्यु का चक्र चलता है। अतः हे पुत्र! देवी भगवती की तपस्या करो।"

ब्रह्माजी ने तपस्या आरम्भ कर दी। तत्पश्चात देवी भगवती ने शिव की उत्पत्ति की। तीनों देवों ने देवी भगवती की तपस्या करनी शुरू कर दी।

हजारों वर्षों तक तपस्या करने के बाद, अंत में देवी भगवती साक्षात प्रकट हुईं और तीनों देवों से बोलीं-- "हे त्रिदेवों! तुम्हारे अंदर मेरी ही शक्ति साकार रूप में समाहित है। मेरे द्वारा ही तुम्हारी रचना हुई है। तुम्हारी उत्पत्ति का उद्देश्य सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से चलाना है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करेंगे, विष्णु सृष्टि का पालन करेंगे और शिवजी सृष्टि का संहार करेंगे। इस प्रकार यह चक्र सदैव चलता रहेगा।"

इतना कहने के बाद भगवती ने त्रिदेवों के लिये तीन विभिन्न लोकों-- ब्रह्म-लोक, विष्णु-लोक और शिव-लोक का निर्माण किया। देवी भगवती की आज्ञा से त्रिदेवों ने अपने-अपने आसन ग्रहण कर सृष्टि-रचना का कार्य आरभ कर दिया।

आगे पढ़ें :-

त्रिदेव बने स्त्रियाँ
सुघुम्न की कथा  
रेवती नक्षत्र का आकाश से गिरना
शुकदेव का जन्म
स्वर्गारोहण
हयग्रीव अवतार
ऋषि रूरू की कथा
शशिकला की कथा
भक्त को वैभव
कश्यप ऋषि को शाप
अदिति को दिति का शाप
भगवान-भक्त क युद्ध
श्रीविष्णु को शाप
शुक्राचार्य का विवाह

19 जुलाई 2010

रामायण - बालकाण्ड 1 ( Ramayana - Balkand 1 )

महामुनि वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था। एक दिन नारद मुनि वहाँ पधारे। वाल्मीकि ने शास्त्रोक्त विधि से उनकी पूजा की और कहा, "महात्मा, इस युग में क्या कोई ऐसा पुरुष है, जो सकल सद्‌गुण संप और महा पराक्रमी हो?''

तब नारद ने, वाल्मीकि को श्रीराम की कथा सविस्तार सुनायी। नारद महामुनि के वहाँ से निकलते-निकलते स्नान का समय हो गया। उनके चले जाने के बाद वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज को लेकर तमसा नदी के तट पर गये।

वहॉं उन्होंने क्रौंच पक्षियों की एक जोडी देखी। वल्कल वस्त्र पहनकर पानी में उतरते हुए वे क्रौंच पक्षियों का आनंद व उत्साह देखते रह गये। इतने में एक भील ने पुरुष पक्षी पर अपना बाण चलाया। वह नीचे गिरकर छटपटाने लगा। मादा पक्षी आर्तनाद करने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि के हृदय में उस पक्षी पर दया उमड़ आयी। उस किरात पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। उनके मुँह से अनायास ही एक श्लोक निकल पड़ा, जिसमें उन्होंने कहा, "अरे ओ कठोर मानव, तुमने प्रेम में मग्न दो पक्षियों में से एक को मार डाला। जीवन भर तुम सुखी और शांत नहीं रहोगे।''

अपने मुँह से निकले श्र्लोक पर वाल्मीकि स्वयं विस्मित हुए। आश्रम लौटने के बाद भी उसी श्र्लोक के बारे में सोचते रहे।

इतने में ब्रह्मा उन्हें देखने आये। उन्हें देखते ही वाल्मीकि तुरंत उठ खडे हो गये और साष्टांग प्रणाम किया। फिर वे मौन खड़े रहे। तब ब्रह्मा ने कहा, "वाल्मीकि, मेरे अनुग्रह के कारण तुम कविता करने लगे हो। तुमने तो इसके पूर्व राम की कथा सुन ली है। उस कथा को महाकाव्य के रूप में रचो। जब तक यह पृथ्वी है, तब तक वह भी शाश्वत रहेगा। जब तक वह होगा, तुम्हारा संचार उत्तम लोकों में होता रहेगा।'' यों कहकर ब्रह्मा अदृश्य हो गये।

यों ब्रह्मा के प्रोत्साहन से प्रेरित होकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, जिसे पढ़कर किसने आनंद नहीं लिया होगा।

वैवस्वत सूर्य का पुत्र था। इक्ष्वाकु वैवस्वत का पुत्र था। वैवस्वत ने सातवॉं मनु होकर शाश्वत कीर्ति कमायी। उनके तदुपरांत इक्ष्वाकु के संतान सूर्यवंशज कहलाये जाने लगे। इनमें से सगर भी एक था। वह छे चक्रवर्तियों में से एक था। स्वर्ग से गंगा को ले आनेवाले भगीरथ इसी सगर का पोता था। सूर्यवंश के राजाओं ने अयोध्या नगर को अपनी राजधानी बनाकर कोसल देश पर शासन किया। वैवस्वत मनु ने स्वयं अयोध्या का निर्माण किया।

शत्रुओं के लिए दुर्भेद्य अयोध्या पर सूर्यवंशी राजा दशरथ शासन करते थे । वे ऐश्वर्य में कुबेर से कम नहीं थे । वे महा पराक्रमी थे।

दृष्टि, जयंत, जिय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मंत्रपाल, सुमंत ये आठों दशरथ के मंत्री थे। वसिष्ठ महामुनि इनके कुलगुरु थे। वसिष्ठ व वामदेव उनके पुरोहित थे। गुप्तचरों के द्वारा उन्हें जानकारी मिलती रहती थी कि देश के किस कोने में क्या हो रहा है। अपने मंत्रियों की सहायता से दशरथ न्यायपूर्वक शासन चलाते थे। उनकी प्रजा हर तरह से सुखी थी। किसी पर कोई अन्याय नहीं करता था। सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते थे। इनके राज्य में कोई दीन-दुखी नहीं था।

दशरथ को किसी बात की कमी नहीं थी, किन्तु वे संतानहीन थे । इसी को लेकर वे बहुत चिंतित रहते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि अश्र्वमेध याग करके देवताओं को संतुष्ट करूँ और संतान पाऊँ। अपने मंत्रियों में से अग्रगण्य सुमंत के द्वारा उन्होंने वसिष्ठ, वासुदेव, सुयज्ञ, बाबालि आदि गुरुओं को तथा अन्य ब्राह्मण श्रेष्ठों को बुलवाया और उनकी सलाह माँगी। उन्हें अश्वमेध यज्ञ का विचार अच्छा लगा।

उन सबके चले जाने के बाद मंत्री सुमंत ने दशरथ से कहा, "महाराज, आपने जिस अश्वमेध यज्ञ की बात सोची है, वह नितांत उचित है। परंतु इस याग को संपादित करने की शक्ति व महिमा केवल ऋश्यशृंग में ही है। उनसे बढ़कर कोई और नहीं है। उनका वृत्तांत मुझसे सुनिये,'' फिर सुमंत ने यों उनकी कथा सुनायीः

अंगदेश का शासक रोमपाद दशरथ के मित्रों में से एक था। एक बार अंगदेश में भयंकर अकाल पड़ा। रोमपाद इस अकाल को लेकर चिंताग्रस्त हो गया। ब्राह्मणों को बुलवाकर अकाल के अंत का उपाय पूछा।

ब्राह्मणों ने कहा, "महाराज, ऋश्यशृंग, विभंडक मुनि का पुत्र है। जहाँ वह रहता है, वहाँ अकाल नहीं पड़ता। उसे अंगदेश बुलवाइये, अपनी पुत्री शांता से उसका विवाह रचाइये, उसे अंगदेश में ही स्थायी रूप से रहने का प्रबंध कीजिये तो अकाल मिट जायेगा और देश सुभिक्ष होगा।''

तब रोमपाद ने अपने पुरोहित और मंत्रियों को बुलवाया और उनसे कहा, "आप लोग जाइये और ऋश्यशृंग को यहाँ ले आइये।''

यह सुनते ही पुरोहित व मंत्री डर गये, क्योंकि ऋश्यशृंग अरण्य व तपस्या को छोड़कर कहीं निकलता नहीं था। किसी के बुलाने से जानेवालों में से नहीं था। क्रोधित होकर शाप देने की संभावना भी थी। उसे ले आना हो तो कोई मायामय उपाय ढूँढ़ना होगा। पुरोहित ने वह उपाय रोमपाद को यों सुनायाः

"महाराज, ऋश्यशृंग बचपन से ही लेकर अरण्य में ही रहा और वेदों का अध्ययन किया। तपस्या में ही अधिकतर मग्न रहता है। लेकिन उसे प्राकृतिक सौन्दर्य देखते हुए वन में घूमना अच्छा लगता है। वैसे वह बाहर कभी नहीं जाता लेकिन वन के फूलों, पशु-पक्षियों को देखते हुए वह कोसों दूर निकल जाता है। उसमें सांसारिक ज्ञान लेश मात्र भी नहीं है। उसे यह भी नहीं मालूम कि स्त्रियाँ कैसी होती हैं। हम चंद नर्तकियों को उसके पास भेजें तो शायद वह उनके प्रति आकर्षित होकर उनके साथ यहाँ चला आये।

रोमपाद ने इसके लिए अपनी सहमति दे दी। कुछ नर्तकियों को अच्छी तरह से अलंकृत करके उन्हें ऋश्यशृंग के आश्रम में भेजा। ऋश्यशृंग सदा पिता की सेवा सुश्रूषा में लगा रहता था और आश्रम को छोड़कर कहीं जाता नहीं था। परंतु एक दिन किसी कारणवश वह आश्रम के बाहर आया। नर्तकियाँ गीत गाती हुई, नृत्य करती हुई उसके पास पहुँचीं। उनके नयनाभिराम स्वरूपों, अलंकारों, मधुर कंठों को सुनकर ऋश्यशृंग आश्र्चर्य में डूब गया और उनके प्रति आकर्षित हो गया।

नर्तकियों ने उससे पूछा, "आप कौन हैं? इस अरण्य में क्यों अकेले घूम रहे हैं?'' "मैं विभंडक महामुनि का पुत्र हूँ। आप आश्रम आयेंगी तो मैं आपकी उचित रूप से पूजा करूँगा,'' ऋश्यशृंग ने कहा। वे उसके साथ-आश्रम गयीं और उसके दिये कंद, फल खाये। उन नर्तकियों ने भी अपनी तरफ से कुछ पकवान उसे दिये और कहा, "ये भी फल हैं, इन्हें चखकर देखिये। हमें तपस्या करने के लिए अभी लौटना है,'' यह कहती हुई वे वहाँ से चली गयीं।

ऋश्यशृंग ने उनके दिये पकवान खाये और समझा कि वे भी फल ही हैं। परंतु वे पकवान फलों से अधिक स्वादिष्ट थे। दूसरे दिन, उन्हें देखने और मिलने की आशा लेकर वह उसी स्थल पर गया, जहाँ वे कल उससे मिली थीं।

उसे देखते ही उन नर्तकियों ने कहा, "महाशय, आप भी हमारे आश्रम में पधारियेगा। वहाँ आपकी अच्छी आवभगत होगी।''

ऋश्यशृंग ने सानंद अपनी स्वीकृति दे दी और उनके साथ चल पड़ा। ऋश्यशृंग ने अंगदेश में जैसे ही पदार्पण किया, वर्षा होने लगी। रोमपाद ने ऋश्यशृंग का स्वागत किया, साष्टांग नमस्कार किया और उसे इस प्रकार से अपने देश में ले आने के लिए क्षमा माँगी। फिर अपनी पुत्री शांता से उसका विवाह करवाया। ऋश्यशृंग, शांता के साथ अंगदेश में ही बस गया।

सुमंत की बतायी इस कथा को सुनकर दशरथ बहुत ही आनंदित हुए। वसिष्ठ महामुनि की अनुमति पाकर, अपनी पत्त्नियों व मंत्रियों को लेकर दशरथ अंगदेश गये। रोमपाद ने दशरथ का भव्य स्वागत किया। फिर सहर्ष अपने दामाद ऋश्यशृंग व पुत्री शांता को दशरथ के साथ अयोध्या भेजा।

ऋश्यशृंग के अयोध्या आये कुछ दिन बीत गये। वसंत ऋतु ने प्रवेश किया। दशरथ न ऋश्यशृंग से कहा, "कृपया आप यज्ञ का प्रारंभ कीजिये और स्वयं उसे चलाइये।'' अश्वमेध यज्ञ के लिए बहुत बड़े पैमाने पर तैयारियाँ शुरू हो गयीं। यज्ञ करनेवाले, वेदों का पठन करनेवाले सुयज्ञ, वामदेव, बाबालि, काश्यप आदि ब्राह्मण श्रेष्ठ निमंत्रित किये गये। सरयू नदी के उत्तरी तट पर यज्ञशाला का निर्माण हुआ।

शुभ मुहूर्त के दिन दशरथ यज्ञशाला पहुँचे। यज्ञ शुरू हो गया। प्रथम हविर्भाग इंद्र को अर्पित करने के बाद होम चलने लगा।

अश्वमेध यज्ञ तीन दिवसों का यज्ञ है। शास्त्रोक्त विधि से समाप्ति के बाद दशरथ ने यज्ञ करानेवाले ऋत्विजों को सारी भूमि दान में दे दी। उन्होंने दशरथ से कहा, "महाराज, भूमि लेकर हम क्या करेंगे? इस भूमि के बदले हमें मणियाँ, सोना, गायें या कुछ और जो भी है, दान में दीजिये।'' दशरथ ने उन्हें दस लाख गायें, सौ करोड़ का सोना, चार सौ करोड़ की चांदी दान में दिये।

ब्राह्मणों को जो भी दान में मिला, उसे उन्होंने ऋश्यशृंग व वसिष्ठ को समर्पित कर दिया। इतने में एक दरिद्र ब्राह्मण वहाँ आया और दशरथ के सामने हाथ फैलाये। दशरथ ने तुरंत अपने हाथ का कंकण उतारा और उस ब्राह्मण को दे दिया। सब ब्राह्मणों ने दशरथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

अश्वमेध यज्ञ जैसे ही पूरा हुआ, ऋश्यशृंग ने दशरथ से पुत्र कामेष्टि विधि पूरी करवायी। समस्त देवी-देवता आकर अपने-अपने उचित स्थानों पर आसीन हो गये। उस अवसर पर देवताओं ने ब्रह्मा से सविस्तार बताया कि वे रावणासुर के हाथों कितना सताये जा रहे हैं।

ब्रह्मा ने उनसे कहा, "दुष्ट रावण ने वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु देव, दानव, गंधर्व, यक्ष के हाथों न हो। उसकी दृष्टि में मानवों की कोई हस्ती ही नहीं थी। वह उन्हें अशक्त, निस्सहाय व भीरु मानता था। उसका विश्वास था कि मनुष्य जैसा प्राणी भला उसका क्या बिगाड़ सकता है! इसी कारण उसने मनुष्यों से रक्षा नहीं माँगी। सुनो, महाविष्णु दशरथ की पत्त्नियों में से किसी का एक पुत्र होकर जन्म लेंगे और नर रूप में रावण का संहार करेंगे।'' यह घोषणा सुनकर देवता बहुत प्रसन्न हुए।

इतने में होम कुंड से जगमगाता हुआ एक दिव्य स्वरूपी प्रकट हुआ। वह दिव्य स्वरूपी अपने हाथों में एक कलश लिये हुए था। वह कलश सोने का था और उसका ढक्कन चांदी का। उस दिव्य स्वरूपी ने दशरथ से कहा, "राजन्‌, देवताओं ने इस कलश में अपनी पकाई खीर भर कर दी है । प्रजापति की आज्ञा के अनुसार मैं इसे लेकर आया हूँ। यह खीर तुम अपनी पत्त्नियों को खिलाओगे तो वे गर्भवती होंगी और पराक्रमी पुत्रों को जन्म देंगी।''

दशरथ ने बड़े ही आनंद से उस कलश को अपने हाथों में लिया और उस दिव्य स्वरूपी की प्रदक्षिणा की।

दशरथ ने उस कलश में भरी खीर का आधा भाग कौसल्या को दिया। शेष खीर में आधा भाग सुमित्रा को और शेष आधा भाग कैकेयी को। तीनों को देने के बाद जो बचा, उसे पुनः सुमित्रा को दिया। शीघ्र ही तीनों गर्भवती हुईं।

एक ओर महाविष्णु मानव रूप में प्रकट होने की तैयारियाँ कर रहे थे तो दूसरी ओर ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवताओं ने काम रूपी बानरों की सृष्टि की। देवेंद्र से बाली, सूर्य से सुग्रीव, कुबेर से गंधमादन, अश्र्विनी देवताओं से मैंदद्विविद, विश्वकर्मा से नल, अग्नि से नील, वरुण से सुषेण, पर्जन्य से शरथ, वायुदेव से हनुमान जन्मे। ये सबके सब महाबली वानर श्रेष्ठ थे। शेष देवताओं से हज़ारों वानर जन्मे। ये वानर ऋष्यमूक नामक पर्वत के निकट बस गये और वाली, सुग्रीव को अपना राजा बनाकर तथा नल, नील, हनुमान आदि को अपना मंत्री बनाकर जीवन यापन करने लगे।

पुत्र कामेष्टि की पूर्ति के बारहवें महीने में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में कौसल्या ने राम को जन्म दिया। पुष्यमी नक्षत्र में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। अश्लेषा नक्षत्र में मध्याह्न समय पर सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। अयोध्या नगर के नागरिकों ने आनन्दोत्सव मनाया। गलियाँ नाचने-गानेवालों से खचाखच भर गयीं। पूरे राज्य में खुशी की लहर फैल गई। गरीबों में भोजन और वस्त्र बाँटे गये। महीनों तक वातावरण में शीत-संगीत का स्वर गूंजता रहा। राजा के महल में ही नहीं, बल्कि हर प्रजा के घर में राजकुमारों के जन्म का उत्सव मनाया जा रहा था। दशरथ ने विपुल मात्रा में ब्राह्मणों को गोदान व अन्नदान किया।

चारों बालक क्रमशः बडे होने लगे। यद्यपि राम, लक्ष्मण एक ही मॉं के पुत्र नहीं थे, परंतु सदा मिल जुलकर रहते थे। उसी प्रकार भरत, शत्रुघ्न दोनों एक साथ घूमते-फिरते, खेलते-कूदते थे। चारों ने वेद शास्त्रों का अध्ययन किया, धनुर्विद्या में निष्णात बने और पिता की सेवा-सुश्रूषा करते हुए युवक हुए। दशरथ उनके विवाह को लेकर मंत्रियों और पुरोहितों से सलाह-मशविरा करने लगे।

राजा और मंत्री जब इसी चर्चा में तल्लीन थे, तब द्वारपालक ने आकर कहा, "महाराज, कुशिक वंश के, गाधि राजकुमार विश्वामित्र महामुनि आपके दर्शनार्थ आये हैं और द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।''

दशरथ तुरंत पुरोहित को लेकर विश्वामित्र से मिलने गये और उनकी पूजा की, उनका सादर स्वागत किया।

विश्वामित्र ने कहा, "राजन्‌, तुम और तुम्हारी प्रजा सकुशल है न? शत्रु का कोई भय तो नहीं है न?'' कुशल-मंगल जानने के बाद उन्होंने वसिष्ठ से बातें कीं और राजभवन में प्रवेश करके उचित आसन पर आसीन हो गये।

"महामुनि, आपके आगमन से हम धन्य हुए। कहिये, मुझसे आपको क्या चाहिये।'' दशरथ ने पूछा।

विश्वामित्र प्रसन्न होते हुए बोले, "राजन्‌, जिस काम पर मैं आया हूँ उसे पूरा करके प्रमाणित करो कि तुम सत्यनिष्ठ हो। मैंने एक यज्ञ प्रारंभ किया, किन्तु दो पराक्रमी राक्षसों ने मेरी यज्ञ वेदिका पर रक्त मांस बिखेर दिया और मेरे व्रत संकल्प को बिगाड़ डाला। तुम मेरे साथ अपने बड़े बेटे राम को भेज दो। मारीच, सुबाहु नामक उन दोनों राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा करेगा।''

यह सुनते ही दशरथ को लगा कि उसका हृदय मानों फट गया हो। भय-दुख उमड़-उमड़कर आने लगे। सिंहासन से उतरकर कांपते हुए स्वर में दशरथ ने कहा,"महामुनि, राम अभी बालक है। उसके सोलह साल भी पूरे नहीं हुए। वह धनुर्विद्या भी भली-भांति नहीं जानता। भला, वह राक्षसों से क्या लड़ेगा? मेरे पास एक अक्षौहिणी सेना है। मैं स्वयं आकर उनसे युद्ध करूँगा और उन्हें मार डालूँगा। बताइये तो सही, आख़िर वे राक्षस हैं कौन?''

विश्वामित्र ने कहा, "तुम तो रावण नामक राक्षस राजा को जानते हो। ब्रह्मा को प्रस करके उसने कितनी ही अमोघ शक्तियाँ प्राप्त कीं। रावण विश्रवस का पुत्र है, कुबेर का साक्षात्‌ छोटा भाई है। जब वह स्वयं यज्ञ को भंग नहीं कर सकता, तब इन बलशाली मारीच, सुबाहु को भेजता रहता है।''

"बाप रे! रावण? उसका सामना भला मैं क्या करूँगा? जब यह काम मुझसे ही नहीं हो सकता तो बालक राम क्या करेगा?'' दशरथ ने अपनी असहायता जतायी। क्रोध से विश्वामित्र की आँखें लाल हो गयीं। यह कहते हुए वे अचानक उठ गये, "महाराज, वचन से मुकर गये न? क्या यही तुम्हारी सत्यनिष्ठा है? अपकीर्ति ढोते हुए सुखी रहो।''

तब कुलगुरु वसिष्ठ ने दशरथ को डॉंटते हुए कहा,"राजन्‌, जो करना नहीं चाहिये, वह तुम कर रहे हो। वचन से मुकरकर इक्ष्वाकु वंश को कलंकित कर रहे हो। तुमने विश्वामित्र को क्या समझ रखा है? कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं, जिसे वे न जानते हों। नये अस्त्रों की सृष्टि भी वे कर सकते हैं। क्या तुमने यह समझ रखा है कि वे उन राक्षसों को मार नहीं सकते, इसीलिए तुम्हारे पास आये हैं? तुम्हारे पुत्रों का भला करने के लिए ही वे आये हैं। तुम्हारे पुत्रों के विश्वामित्र के साथ रहने से न केवल उनकी विद्या और ज्ञान में पूर्णता आयेगी, बल्कि तुम्हारे पुत्रों को यश मिलेगा। सर्वत्र उनकी कीर्ति फैलेगी। तुम्हारे पुत्र साधारण मानव नहीं हैं। वे दिव्य पुरुष हैं। भविष्य में जो कार्य उनके द्वारा सम्पन्न होनेवाला है, उसकी आधारशिला तैयार करने के लिए विश्वामित्र तुम्हारे बालकों को लेने आये हैं। इसीलिए निश्श्चिन्त होकर राम को उनके साथ भेजो। जब तक वे उनके साथ हैं, उनका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।''

वसिष्ठ के हितबोध से दशरथ में धैर्य आ गया। उन्होंने राम, लक्ष्मण को विश्वामित्र के सुपुर्द किया। राम, लक्ष्मण विश्वामित्र के पीछे-पीछे जाने लगे। दोनों के पास धनुष बाण थे। उनके हाथों में खड्‌ग भी थे।


बालकाण्ड 2
बालकाण्ड 3
बालकाण्ड 4
बालकाण्ड 5
अयोध्या काण्ड - 1
अयोध्या काण्ड - 2
अयोध्या काण्ड - 3
अयोध्या काण्ड - 4
अयोध्या काण्ड - 5
अयोध्या काण्ड - 6
अयोध्या काण्ड - 7
अयोध्या काण्ड - 8
अयोध्या काण्ड - 9
अयोध्या काण्ड - 10
अरण्य काण्ड - 1
अरण्य काण्ड - 2
अरण्य काण्ड - 3
अरण्य काण्ड - 4
अरण्य काण्ड - 5
अरण्य काण्ड - 6
अरण्य काण्ड - 7
किष्किन्धा काण्ड - 1
किष्किन्धा काण्ड - 2
किष्किन्धा काण्ड - 3
किष्किन्धा काण्ड - 4
किष्किन्धा काण्ड - 5
किष्किन्धा काण्ड - 6
किष्किन्धा काण्ड - 7
सुन्दर काण्ड - 1
सुन्दर काण्ड - 2
सुन्दर काण्ड - 3
सुन्दर काण्ड - 4
सुन्दर काण्ड - 5
सुन्दर काण्ड - 6
सुन्दर काण्ड - 7
युद्ध काण्ड - 1
युद्ध काण्ड - 2
युद्ध काण्ड - 3
युद्ध काण्ड - 4
युद्ध काण्ड - 5
युद्ध काण्ड - 6
युद्ध काण्ड - 7

25 मार्च 2010

विष्णु पुराण - 1



क्षीर सागर में स्थित त्रिकूट पर्वत पर लोहे, चांदी और सोने की तीन चोटियाँ थीं। उन चोटियों के बीच एक विशाल जंगल था जिसमें फलों से लदे पेड़ भरे थे। उस जंगल में गजेंद्र नामक मत्त हाथी अपनी असंख्य पत्नियों के साथ विहार करते अपनी प्यास बुझाने के लिए एक तालाब के पास पहुँचा।

प्यास बुझाने के बाद गजेंद्र के मन में जल-क्रीड़ाएँ करने की इच्छा हुई। फिर वह अपनी औरतों के साथ तालाब में उतर कर पानी को उछालते हुए अपना मनोरंजन करने लगा। इस बीच एक बहुत बड़े मगरमच्छ ने गजेंद्र के दायें पैर को अपने दाढ़ों से कसकर पकड़ लिया। इस पर पीड़ा के मारे गजेंद्र धींकार करने लगा। उसकी पत्नियाँ घबड़ा कर तालाब के किनारे पहुँचीं और अपने पति के दुख को देख आँसू बहाने लगीं। उनकी समझ में न आया कि गजेंद्र को मगरमच्छ की पकड़ में से कैसे छुड़ायें?

गजेंद्र भी मगरमच्छ की पकड़ से अपने को बचाने के सारे प्रयत्न करते हुए छटपटाने लगा। गजेंद्र अपने दाँतों से मगरमच्छ पर वार कर देता और मगरमच्छ उछल कर हाथी के शरीर को अपने तेज नाखूनों से खरोंच लेता जिससे खून की धाराएँ निकल आतीं।

हाथी मगरमच्छ की पीठ पर अपनी सूंड चलाता, मगरमच्छ अपनी ख़ुरदरी पूँछ से हाथी पर वार कर देता। अगर हाथी अपने चारों पैरों से मगरमच्छ को कुचलने की कोशिश करता तो वह पानी के तल में जाकर छिप जाता। इस पर हाथी किनारे पर पहुँचने के लिए आगे बढ़ता, तब झट से मगरमच्छ हाथी को पकड़ कर खींच ले जाता और उसे पानी में डुबो देता। इस तरह मगरमच्छ और हाथी के बीच एक हज़ार साल तक लगातार लड़ाई चलती रही।

गजेंद्र अपनी ताक़त पर विश्वास करके हिम्मत के साथ लड़ता रहा, फिर भी धीरे-धीरे उसकी ताक़त घटती गई। मगरमच्छ तो पानी में जीनेवाला प्राणी है !

पानी के अंदर उसकी ताक़त ज़्यादा होती है ! वह हाथी का खून चूसते दिन ब दिन मोटा होता गया। हाथी कमजोर हो गया। अब सिर्फ़ उसका कंकाल मात्र रह गया। मगरमच्छ की पकड़ से अपने को बचा लेना हाथी के लिए मुमकिन न था।

आख़िर गजेंद्र दुखी हो सोचने लगा, ‘‘मैं अपनी प्यास बुझाने के लिए यहाँ पर आया। प्यास बुझाने के बाद मुझे यहाँ से चला जाना चाहिए था ! मैं नाहक़ क्यों इस तालाब में उतर पड़ा? मुझे कौन बचायेगा? फिर भी मेरे मन के किसी कोने में यह यक़ीन जमता जा रहा है कि मैं किसी तरह बच जाऊँगा। इसका मतलब है कि मेरी आशा का कोई आधार ज़रूर होगा। उसी को मैं ईश्वर कहकर पुकारता हूँ।''

‘‘देवता, भगवान, ईश्वर नामक भावना का मूल बने हे प्रभु ! तुम्हीं सभी कार्य-कलापों के कारण भूत हो !

‘‘मुझ जैसे घमण्डी प्राणी जब तक खतरों में नहीं फँसते, तब तक तुम्हारी याद नहीं करते ! दुख न भोगने पर तुम्हारी ज़रूरत का बोध नहीं होता ! तुम तब तक उसे दिखाई नहीं देते, जब तक वह यह नहीं मानता कि तुम हो, और उसके मन में यह खलबली नहीं मचती कि तुम हो या नहीं।'' इस तरह बराबर सोचनेवाले गजेंद्र को लगा कि मगरमच्छ के द्वारा सतानेवाली पीड़ा कुछ कम होती जा रही है !

गजेंद्र ने जब ध्यान करना शुरू किया, तभी मगरमच्छ के दाढ़ों के मसूड़ों में पीड़ा शुरू हुई। उसका कलेजा काँपने लगा। फिर भी वह रोष में आकर गजेंद्र के पैर को चबाने लगा।

‘‘प्राणियों की बुराई और पीड़ा को तुम हरनेवाले हो ! तुम सब जगह फैले हुए हो ! देवताओं के मूल रूप हे भगवान ! इस दुनिया की सृष्टि के मूलभूत कारण तुम हो। मैं यह विश्वास करता हूँ कि अपनी रक्षा करने के लिए मैं जितनी तीव्रता के साथ प्रार्थना करता हूँ, तुम उतनी जल्दी मेरी रक्षा कर सकते हो !

‘‘सब प्रकार के रूप धरनेवाले, वाणी और मन से परे रहनेवाले हे ईश्वर ! ऐसे अनाथों की रक्षा करनेवाली जिम्मेदारी तुम्हारी ही है न?

‘‘प्राण शक्तियाँ मेरे भीतर से जवाब दे चुकी हैं! मेरे आँसू सूख गये हैं? मैं ऊँची आवाज़ में तुम्हें पुकार भी नहीं सकता हूँ ! मैं अपना होश-हवास भी खोता जा रहा हूँ! चाहे तुम मेरी रक्षा करो या छोड़ दो, यह सब तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। मेरे अंदर सिर्फ़ तुम्हारे ध्यान को छोड़ कोई भावना नहीं है। मुझे बचाने वाला भी तुम्हारे सिवाय कोई नहीं है !'' यों गजेंद्र सूंड उठाये आसमान की ओर देखने लगा।

मगरमच्छ को लगा कि उसकी ताक़त जवाब देती जा रही है ! उसका मुँह खुलता जा रहा है। उसका कंठ बंद होता जा रहा है।

उधर हाथी की आँखें इस तरह बंद होने लगीं कि उसे अपने अस्तित्व का ही बोध न था। वह एक दम अचल खड़ा रह गया।

उस हालत में विष्णु आ पहुँचे। सारा आसमान उनके स्वरूप से भर उठा। गजेंद्र को लगा कि वह एक अत्यंत सूक्ष्म कण है।

विष्णु ने अपना चक्र छोड़ दियाऔर अभय मुद्रा में अपना हाथ फैलाया। बड़ी तेज़ गति के साथ चक्कर काटते विष्णु-चक्र ने आकर मगरमच्छ का सर काट डाला।

दर असल मगरमच्छ एक गंधर्व था। उसका नाम ‘हुहू' था। प्राचीन काल में देवल नामक एक ऋषि पानी में खड़े होकर तपस्या कर रहे थे, तब मगरमच्छ की तरह पानी में छिपते हुए आकर गंधर्व ने उनका पैर पकड़ लिया। इस पर ऋषि ने उसे शाप दे डाला कि तुम मगरमच्छ की तरह इस पानी में पड़े रहो ! अब विष्णु-चक्र के द्वारा उसका शाप जाता रहा।

मगरमच्छ से छुटकारा पानेवाले गजेंद्र को तालाब से बाहर खींचकर विष्णु ने अपनी हथेली से उसके कुँभ-स्थल को स्पर्श किया। उस स्पर्श की वजह से गजेंद्र अपनी खोई हुई ताक़त पाने के साथ पूर्व जन्म का ज्ञान भी प्राप्त कर सका।

गजेंद्र पिछले जन्म में इंद्रद्युम्न नामक एक विष्णुभक्त राजा थे। विष्णु के ध्यान में मग्न उस राजा ने एक बार ऋषि अगस्त्य के आगमन का ख़्याल न किया। ऋषि ने क्रोध में आकर उसे शाप दिया कि तुम अगले जन्म में मत्त हाथी बनकर पैदा होगे। उसी दिन गजेंद्र के रूप में पैदा होकर उसने मुक्ति प्राप्त की।

गजेंद्र मोक्ष की कहानी नैमिशारण्य में होनेवाले सत्र याग में पधारे हुए शौनक आदि मुनियों को सूत महर्षि ने सुनाई।

मुनियों ने सूत महर्षि से कहा, ‘‘मुनिवर, गजेंद्र मोक्ष की कहानी हमें तो सिर्फ़ एक हाथी की जैसी मालूम नहीं होती, बल्कि सारे प्राणि कोटि से संबंधित मालूम होती है। ख़ासकर कई बंधनों और मुसीबतों में फँसकर तड़पनेवाले मानव जीवन से संबंधित लगती है।''

इसके जवाब में सूतमहर्षि बोले, ‘‘हाँ, गजेंद्र मोक्ष की कहानी श्लेषार्थ से भरी हुई है। उसका अन्वय जो जिस रूप में चाहे कर सकता है। काल तो विष्णु के अधीन में है। इसलिए काल-चक्र के परिभ्रमण में कई कठिनाइयाँ और समस्याएँ हल होती जाती हैं।''

मुनियों ने पूछा, ‘‘मुनिवर, गजेंद्र मोक्ष के आधार पर हमें यह मालूम होता है कि प्रत्येक कार्य का कारणभूत सर्वेश्वर विष्णु हैं। ऐसे महाविष्णु की कहानी पूर्ण रूप से सुनने की इच्छा हमारे मन में जाग रही है। हम आपके सामने बच्चों के समान हैं। इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमारी समझ में आने लायक़ सरल शैली में विष्णु कथा की सारी बातें समझा दें। आपने महर्षि व्यास के द्वारा समस्त पुराण, इतिहास और उनके मर्म को भी जान लिया है। इसलिए आप ही वे कहानियाँ सुनाकर हमको कृतार्थ कर सकते हैं।''

मुनियों की बातें सुनकर सूत मुनि ख़ुश हुए और बोले, ‘‘हाँ, ज़रूर सुनाऊँगा। महर्षि व्यास ने विष्णु से संबंधित अनेक लीलावतारों की विशेषताओं को महा भागवत के रूप में रचा और अपने पुत्र शुक को सुनाया। विष्णु पुराण सुनकर भव सागर से तरने की इच्छा रखनेवाले महाराजा परीक्षित को शुक महर्षि ने सुनाया। गजेंद्र की रक्षा करने के लिए प्रकट हुए विष्णु का अवतार आदि मूलावतार माना गया।


भगवान विष्णु ने कई अवतार लिए; उनमें विकास की दशाओं के अनुसार दशावतार नाम से प्रसिद्ध दस अवतार ज़्यादा मुख्य हैं।

नार का अर्थ नीर है। विष्णु जल के मूल हैं, इसलिए वे नारायण कहलाये। नारायण से ही नीर या जल का जन्म हुआ। जल से प्राणी पैदा हुए। विष्णु मछली के रूप में अवतरित हुए; दशावतारों में वही पहला मत्स्यावतार है।

विष्णु जल से भरे नील मेघ के रंग के होते हैं। मेघ के अंदर जैसे बिजली छिपी हुई है, उसी प्रकार विष्णु स्वयं तेजोमय हैं, उनके भीतर से उत्पन्न जल भी तेज से भरे रहकर गोरे रंग का प्रकाश बिखेरता रहता है। वही जल कारणोदक क्षीर सागर है।

क्षीर सागर में अनंत रूपी काल (समय) शेषनाग के रूप में कुंडली मारे लेटा रहता है। शेषनाग के एक हज़ार फण हैं। अनन्त शेषनाग पर शेषशायी के रूप में विष्णु लेटे रहते हैं। उनकी नाभि में से एक लंबे नाल के साथ एक पद्म ऊपर उठा। उसी पद्म से ब्रह्मा का उदय हुआ। ब्रह्मा ने सभी प्राणियों की सृष्टि की।

अनंतकाल युगों के रूप में चलता रहता है। कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग - इन चारों को मिलाकर एक महा युग होता है।

एक हज़ार महायुग मिलकर एक कल्प होता है। एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन होता है (रात का व़क्त इसमें शामिल नहीं है) दिन के समाप्त होते ही उन्हें नींद आ जाती है। वही कल्पांत है। उस व़क्त चारों ओर गहरा अंधेरा छा जाता है। विष्णु से निकली संकर्षण की अग्नि सब को जला देती है। झंझावात चलने लगते हैं, तब भयंकर काले बादल हाथी की सूंडों जैसी जलधाराएँ लगातार गिराने लगती हैं। महासमुद्र में आसमान को छूनेवाला उफान होता है। भू, भुवर और स्वर्ग लोक डूब जाते हैं। चारों तरफ़ जल को छोड़ कुछ दिखाई नहीं देता। यही ब्रह्मा के सोने की रात प्रलयकाल है।

यही कल्पांत का समय है।


सत्यव्रत नामक राजर्षि नदी में नहाकर नारायण का ध्यान करके जब वे अर्घ्य देने को हुए तब उनकी अंजलि में सोने के रंग की एक छोटी मछली आ गई। सत्यव्रत उस मछली को नदी में छोड़ने जा रहे थे, तब वह मछली बोल उठी, ‘‘हे राजन, हमारी मछली की जाति अच्छी नहीं होती, छोटी मछलियों को बड़ी मछलियॉं खा जाती हैं। अगर उनसे बच भी जाये, मछुआरे जाल फेंककर पकड़ लेते हैं। इसलिए मैं आपकी शरण माँगने अंजलि में आ गई हूँ। कृपया से मुझे छोड़ न दीजियेगा।''

सत्यव्रत मछली को अपने कमंडलु में रखकर अपने नगर में ले गये। वे महाराजा के रूप में राज्य करते हुए बड़ी तपस्या करनेवाले एक राजर्षि थे। विष्णु के परम भक्त और बड़े ज्ञानी थे।

कमण्डलु के भीतर वाली छोटी मछली दूसरे दिन तक बड़ी हो गई और छटपटाते आर्तनाद करने लगी, ‘‘महाराज, मुझको कमण्डलु से निकाल कर बड़ी जगह पहुँचा दीजिए।''

इस पर मछली को बड़े नांद में छोड़ दिया गया। वह थोड़ी ही देर में बहुत बड़ी हो गई, तब सत्यव्रत ने उसे एक तालाब में डाल दिया। मछली बराबर बढ़ती गई, तब उसे तालाब से बड़ी नदी में, नदी से समुद्र में पहुँचाया गया।

इस पर मछली ने पूछा, ‘‘हे राजर्षि, मैं आपकी शरण में आया हूँ। ऐसी हालत में क्या आप मुझे समुद्र में छोड़कर चले जायेंगे? क्या मगरमच्छ और तिमिंगल मुझको निगल नहीं जायेंगे?''

सत्यव्रत ने कहा, ‘‘हे महामीन, बताओ, मैं इससे बढ़कर तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ? पल भर में सौ योजन बढ़नेवाले तुमको भला कौन प्राणी निगल सकता है !''


विष्णु पुराण - 2
विष्णु पुराण - 3
विष्णु पुराण - 4
विष्णु पुराण - 5
विष्णु पुराण - 6
विष्णु पुराण - 7
विष्णु पुराण - 8
विष्णु पुराण - 9
विष्णु पुराण - 10
विष्णु पुराण - 11
विष्णु पुराण - 12
विष्णु पुराण - 13
विष्णु पुराण - 14
विष्णु पुराण - 15
विष्णु पुराण - 16
विष्णु पुराण - 17

विघ्नेश्वर - 1




सत्यलोक में कमल के आसन पर बैठकर ब्रह्मा दिन भर सृष्टि करके थक गये और कल्प का अंत समीप आते ही उन्हें निद्रा के नशे ने घेर लिया। निद्रा की खुमारी में जब भी वे जंभाइयाँ लेते, तब-तब पहाड़ों की चोटियाँ चटककर आग के शोले छितराने लगतीं। निद्रा के समय ब्रह्मा की आँखें जब गीली हो जातीं तब आसमान में प्रलयकालीन मेघ हाथी की सूंड़ों जैसी धाराओं में बरसकर सारी दुनिया को जलमय करने लगते। उनकी पलकें जब भारी हो गईं तब सारी दिशाओं में अंधकार छा गया।

उस प्रलयकालीन स्थिति में ब्रह्मदेव सो गये। प्रलय उनके लिए रात का समय है। पुन: नये कल्प के आरंभ का समय निकट आया है। नये जगत पर जब प्रकाश फैलने का समय आया, तब सरस्वती देवी वीणा हाथ में लेकर भूपाल राग का आलाप करने लगी। तब जाकर ब्रह्मा की नींद खुली। ब्रह्मदेव ने पद्मासन लगाकर अपने चारों मुखों से दसों दिशाओं में नज़र डाली।

नीचे का सारा जगत जलमय हो पर्वतों के समान लहरों से कल्लोलित था। उन लहरों के बीच एक जगह सफ़ेद प्रकाश की एक किरण दिखाई दी। उस प्रकाश में लहरों पर तिरते एक बड़े वट पत्र पर चन्दामामा जैसा एक शिशु लेटकर अपने दायें पैर का अंगूठा चुबलाते दिखाई दिया।

ब्रह्मा ने हाथ जोड़ और आँखें मूँदकर ध्यान किया। आँखें खोलने पर उन्हें एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया।

ब्रह्मा अनुभवपूर्वक जान गये कि वह शिशु कोई और नहीं, बल्कि विश्व विराट स्वरूपी परब्रह्म हैं। लेकिन अब उस शिशु का सर हाथी के सिर के समान है और वह अपनी छोटी-सी सूँड से दायें पैर को पकड़कर मुँह में रखता-सा दीख रहा है।

शिशु का मुख प्रसन्न था और वह चन्द्रमा की कांति से प्रकाशमान था। उसके चार हाथ थे। ब्रह्मा आश्चर्य में आकर उस शिशु की ओर देख ही रहे थे कि अचानक वह दूसरे ही पल में पत्ते के साथ अदृश्य हो गया और उस प्रदेश में मिट्टी का एक टीला मात्र दिखाई दिया।

धीरे-धीरे जल में से विशाल भूभाग और समुद्र उत्पन्न हुए।

ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करना प्रारंभ किया। उन्होंने शुरू में पर्वत और नदियों के पैदा हो जाने का संकल्प किया और अपने कमंडलु से पानी लेकर जगत पर छिड़क दिया। इसके बाद वृक्ष, फसल और खनिजों का संकल्प किया। तदनंतर समुद्र में मछलियों, जमीन पर जानवरों और कृमि-कीट तथा पक्षियों की सृष्टि की। इसके बाद मनुष्यों की सृष्टि करने का संकल्प करके कमंडलु के जल को फिर छिड़क दिया।

उधर ब्रह्मा सृष्टि की रचना में डूबे हुए थे, इधर सरस्वती वीणा बजाने में लगी थीं। न मालूम क्यों, अनायास ही वीणा से अपश्रुति निकल पड़ी। सरस्वती ने चकित होकर नीचे की ओर देखा औरै वे एकदम आश्चर्य में पड़ गईं। ब्रह्मा अपनी अर्द्धांगिनी के चकित होने का कारण समझ न पाये। उन्होंने अपने कमल के आसन पर से ही झुककर नीचे देखाकि पर्वत सब औंधे मुँह हो रहे हैं। उनकी तलहटियाँ पृथ्वी पर पड़ते सूर्य के प्रकाश को रोकते हुए छत्रों की भांति बढ़ रही हैं। नदियाँ समुद्रों से निकलकर ऊँचे प्रदेशों की ओर बह रही हैं। वृक्ष भी उलट रहे हैं और उनकी जड़ें आसमान को छू रही हैं।

समुद्र की लहरों पर तिरते जलचर उछल-कूद कर रहे हैं। कुछ सीध में बढ़ रहे हैं। कुछ पक्षियों की भांति उड़ रहे हैं।

जानवर विकृत आकार में पैदा हुए। उनमें से कुछ जानवरों के सिर न थे, कुछ जानवरों के पिछली टांगें न थीं, कोई एक पैरवाला जानवर था, कोई तीन पैरोंवाला था, कुछ के तो आँखें व कान थे, पर मुँह न थे। किसी जानवर की पूँछ में सर था, तो किसी के सर में पूँछ उगी थी। कुछ पक्षियों के पंख न थे, कुछ के पैर न थे, इसलिए वे लुढ़कते व लोटते थे।

ब्रह्मा ने घबराकर अपनी सर्वोत्तम सृष्टि मनुष्य की ओर व्यग्रतापूर्वक देखा।

कुछ मनुष्यों के दो सर थे, एक पुरुष का था, तो दूसरा नारी का।

पुरुष कोई वित्ते भर का था, तो कोई बालिश्त भर का। नारियाँ तो बड़े-बड़े हाथियों तथा ताड़ के पेड़ों जैसी थीं। कुछ की पीठों पर सर चिपकाये से थे। किसी के चार पैर थे तो किसी के दो, तीन या एक ही पैर था।

कुछ लोगों के पेट पर बड़े-बड़े मुँह लगे थे जो कबंधों के समान आक्रंदन कर रहे थे। जानवर मुँह बायें दीनतापूर्वक चिल्ला रहे थे। गूँगा बन ताक रहे थे। वे सब ऐसे खींचातानी करते-नाचते से लगते थे, मानो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की निंदा कर रहे हों।

एक बालिश्त भर का आदमी ताड़ के पेड़ जैसी विकृत आकृतिवाली नारी को दिखाकर आसमान की ओर देखते चीख रहा था-‘‘हे ब्रह्मदेव ! इस तरह की नारी के साथ मैं कैसे अपनी गृहस्थी चला सकता हूँ?''

कुछ विकृत आकारवाले मनुष्य रोते हुए ब्रह्मा की निंदा कर रहे थे-‘‘हे ब्रह्मदेव ! आप तो चतुर्मुखी कहलाते हैं। आप चार मुखों के होते हुए भी ऐसे लगते हैं जैसे आप का कोई वास्तविक सिर ही नहीं है, यानी दिमाग नहीं है। वरना आप हमको इस रूप में क्यों पैदा करते?''

ये सब चीख-चिल्लाहटें और आक्रंदन देख सचमुच ही ब्रह्मा के चारों सिर चकरा गये। उनकी आठों आँखों के सामने अंधेरा छा गया। चकित हो ब्रह्मा ने सरस्वती की ओर असमंजस भरी दृष्टि दौड़ाई। उनके चारों सरों को सफ़ेद बने देखकर सरस्वती मुस्कुरा उठीं और मौन रह गईं।

ब्रह्मा स्वगत में सोचते हुए आख़िर जोर से चिल्ला उठे-‘‘मेरी सृष्टि का यह हाल क्यों हुआ? मैंने तो सही ढंग से सृष्टि करने का संकल्प करके ही इस जगत के निर्माण की योजना बनाई। आख़िर ऐसा क्यों हो गया?'' ब्रह्मा की यह आवाज़ दसों दिशाओं में गूंज उठी। असमंजस भरी चकित दृष्टि दौड़ानेवाले ब्रह्मा को एक अपूर्व प्रकाश दिखाई पड़ा। उस प्रकाश में उन्हें एक अद्भुत मूर्ति दिखाई दी। उस मूर्ति के हाथी का सिर था। उसके चार हाथ थे। वे चारों हाथ क्रमश: पाश, अंकुश, कलश और परशु धारण किये हुए थे। वह पूर्ण चन्द्रमा की भांति प्रकाशमान था। उसकी सफ़ेद शाल सारे आसमान में फड़फड़ा रही थी। उस व़क्त सरस्वती ने अपनी वीणा में ओंकार नाद किया। सरस्वती देवी की उंगलियाँ अपने आप वीणा पर नाद नामक्रिया का राग ध्वनित करते माया माळव गौळ राग आलापित करने लगीं, फिर वह राग हंसध्वनि राग में अपने आप बदल गया। गजानन की आकृति में साक्षात्कार हुए मूर्ति ने वट पत्र पर खड़े हो ब्रह्मा को अभय मुद्रा में आशीर्वाद दिया। उनके चारों तरफ़ शरत्कालीन पूर्णिमा की चांदनी जैसी रोशनी फैली हुई थी।

ब्रह्मा ने अप्रयत्न ही हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए पूछा-‘‘हे महानुभाव ! आप अद्भुत मूर्ति कौन हैं? मैं ऐसा अज्ञानी हूँ कि आप को समझ नहीं पा रहा हूँ। इसलिए मुझ पर अनुग्रह कीजिए।''

‘‘वत्स, ब्रह्मदेव ! संकल्प के पीछे सदा विकल्प भी दौड़ा करता है। उसी को विघ्न कहते हैं। विघ्न को रोककर संकल्प की पूर्ति करानेवाला मैं विघ्नेश्वर हूँ। विघ्नों का नेतृत्व करनेवाले विकल्प को मैं अपनी कुल्हाड़ी द्वारा भेद देता हूँ और प्रत्येक कार्य को पूर्ण कलश की तरह सफल बनानेवाला विघ्न विनायक हूँ। पंच भूत कहलानेवाले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश रूपी भूत गणों का अधिपति बना हुआ मैं गणपति हूँ। खाद्य पदार्थों तथा फसलों को नष्ट करनेवाले मत्त हाथी जैसे विघ्नों को मैं अपने तेज अंकुश से क़ाबू में रखता हूँ और उन्हें अपने पाश नामक मजबूत रस्से से बांध देता हूँ। इसलिए आप मुझे भविष्य में विघ्नेश्वर पुकारा कीजिए।'' यों विघ्नेश्वर ने गंभीर स्वर में समझाया।

इस पर ब्रह्मा ने कहा-‘‘हे देव ! हे विघ्नेश्वर ! मेरी सृजन शक्ति में क्यों इस प्रकार भयंकर विघ्न पैदा हुआ? कृपया आप मेरे द्वारा उत्तम सृष्टि करने लायक़ कोई मार्ग विस्तारपूर्वक समझाइये।'' ‘‘आप को विघ्न की जानकारी कराने के लिए ही यह सब घटित हुआ है। वटपत्र पर बाल गणपति के रूप में मैंने ही आपको दर्शन दिये थे। उस व़क्त आप मेरे बारे में सोच नहीं पाये। मेरे बारे मैं सोचने का मतलब है कि विघ्न के संबंध में पहले ही सावधान रहनेवाला ज्ञान प्राप्त करना। मैं उसी ज्ञान का स्वरूप हूँ। ब्रह्मा से लेकर बुद्धि रख़नेवाले प्रत्येक प्राणी को अपना कार्य प्रारंभ करने के पूर्व विघ्न से बचने के लिए और कार्य की सफलता के लिए उचित सावधानी बरतनी चाहिए। हाथी अपना क़दम आगे बढ़ाने के पहले जमीन की मजबूती को परख लेता है। प्राणियों में हाथी सब से बड़ा है, उसी प्रकार बुद्धि-बल भी ज्ञान के क्षेत्र में बड़ा है। हाथी जैसा मेधा प्राप्त करना चाहिए; इसके संकेत के रूप में मैं गजानन की आकृति में हूँ। आप जब सो रहे थे, तब सोमकासुर नामक राक्षस ने आप के चारों वेदों का अपहरण कर लिया और उन्हें समुद्र तल में छिपा दिया है। महाविष्णु ने मत्स्य का अवतार धारण करके उस राक्षस का संहार किया और आप के वेद लाकर वट पत्र शायी बने मुझे सौंप गये हैं। लीजिए, इनको फिर से ग्रहण कर आप अपनी सृष्टि का कार्य निर्विघ्न संपन्न कीजिए।'' यों समझाकर विघ्नेश्वर ने ब्रह्मा के हाथ वेद सौंप दिये।


ब्रह्मा वेदों को ग्रहण कर परम प्रसन्न हुएऔर विघ्नेश्वर की स्तुति करने लगे-‘‘हे विघ्नेश्वर ! सृष्टि का संकल्प करने के पहले ही आपका ध्यान करके, हृदय पूर्वक आपकी पूजा करके अपने कार्य में प्रवृत्त होऊँ, ऐसा वर प्रदान कीजिए। इस व़क्त मेरी सृष्टि जो बेढंग बनी हुई है, उसे वापस होने लायक़ वर दीजिए।''

इसके बाद विघ्नेश्वर के प्रभाव से पहले की वक्रतापूर्ण सृष्टि पल भर में गायब हो गई। इस पर विघ्नेश्वर ने ब्रह्मा को पुन: समझाया-‘‘हे ब्रह्मदेव ! मैं वक्रता को तुंड-तुंड़ों के रूप में टुकड़े-टुकड़े करता हूँ। इसलिए मैं अपने नाम वक्रतुंड को सार्थक बनाने के लिए अपनी सूंड को वक्र रखता हूँ। वक्रतुंड के रूप में मेरा ध्यान करके जो भी कार्य शुरू किया जाता है, उसमें कोई वक्रता या टेढ़ापन नहीं होता। आप अपनी इच्छा के अनुरूप मेरा ध्यान करके सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दीजिए। सृष्टि करना एक कला है। किसी भी प्रकार के टेढ़ेपन या वक्रता के बिना ही जगत आपके द्वारा रचित कला निलय बनकर शोभायमान रहेगा। आप ही के जैसे जगत के सभी प्राणियों की पहुँच में रहकर उनकी प्रथम पूजा पानेवाले विघ्नेश्वर के रूप में, समस्त विघ्नों से रक्षा करते हुए संकल्प-सिद्धि करानेवाले सिद्धि विनायक के रूप में, समस्त गणों के अधिपति के रूप में गणपति बनकर शिवजी और पार्वती के पुत्र के रूप में मैं अवतार लूँगा।'' यों कहकर ब्रह्मा को आशीर्वाद दे वह मूर्ति अदृश्य हुई।

इस पर सरस्वती देवी ने हिंदोळ और श्रीराग के द्वारा मंगलदायक स्वरों को वीणा पर ध्वनित करके इस प्रकार सुनाया कि आकाश भी पुलकित हो उठा।

ब्रह्मदेव ने ‘‘विघ्नेश्वराय नम:'' कहकर सृष्टि का उपक्रम किया। सृष्टि का कार्य पहले से भी कहीं अधिक सुंदर और निर्विघ्न चला। गंभीर व विशाल पर्वत-पंक्तियाँ, अमृत तुल्य जल से भरी नदियाँ, सुंदर वन, रंग-बिरंगे खिलौनों जैसे जानवर, शारीरिक और मानसिक दृष्टि से भी शक्तिशाली बने मानवों से यह सारा जगत ब्रह्मा के कला निलय के रूप में शोभायमान हो गया। वाग्देवी सरस्वती ने अपनी वाणी के संगीत के रूप में प्राणि मात्र को स्वर प्रदान किया। प्राणी समुदाय समस्त शुभ लक्षणों के साथ विकसित होने लगा। जटाओं को फैलानेवाले वट वृक्ष की भांति जगत फैल गया।

विघ्नेश्वर - 2
विघ्नेश्वर - 3
विघ्नेश्वर - 4
विघ्नेश्वर - 5
विघ्नेश्वर - 6
विघ्नेश्वर - 7
विघ्नेश्वर - 8
विघ्नेश्वर - 9
विघ्नेश्वर - 10
विघ्नेश्वर - 11
विघ्नेश्वर - 12
विघ्नेश्वर - 13
विघ्नेश्वर - 14
विघ्नेश्वर - 15
विघ्नेश्वर - 16
विघ्नेश्वर - 17
विघ्नेश्वर - 18
विघ्नेश्वर - 19
विघ्नेश्वर - 20
विघ्नेश्वर - 21
विघ्नेश्वर - 22
विघ्नेश्वर - 23
विघ्नेश्वर - 24

देवी भागवत - 1



नैमिशारण्य में निवास करनेवाले मुनियों को सूत मुनि ने व्यास महर्षि के द्वारा सुने अनेक पुराण सुनाये। किसी संदर्भ में सूत ने शौनक आदि मुनियों के सामने देवी भागवत नामक पुराण का उल्लेख किया था। एक दिन शौनक ने सूत को यह बात याद दिलाई और वही भागवत सुनाने का अनुरोध किया। सूत ने उन मुनियों को देवी भागवत पुराण कह सुनाया :

सूत ने सर्व प्रथम आदि शक्ति के बारे में यों कहा : देवी एक महान शक्ति है। वही विद्या है, समस्त लोक उनके आश्रय में हैं। सृष्टि, स्थिति और लय का कारणभूत वास्तव में आदि शक्ति ही है। उनकी प्रेरणा से त्रिमूर्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। ब्रह्मा विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए हैं। विष्णु का आधार आदिशेष हैं। उस जल का आधार महा शक्ति लोक माता है। ऐसी देवी से संबन्धित कथा ही देवी भागवत है।''

सूत मुनि के मुँह से देवी भागवत की कथा सुनने का कुतूहल रखनेवाले मुनियों की तरफ़ से शौनक ने सूत मुनि से पूछा-‘‘एक समय ब्रह्मा ने हमें एक चक्र प्रदान किया और कहा था कि उसकी नेमि जिस प्रदेश में टूट जाएगी, वह प्रदेश अत्यंत पवित्र है। वहाँ पर कलि का प्रवेश न होगा। उस चक्र की नेमि या धुरी यहीं पर टूट गई थी। इसलिए इस प्रदेश का नाम नैमिश पड़ा। हम लोग यहीं पर रह गये। पुनः कृत युग के आगमन तक यहीं रहकर कलि के भय से मुक्त रहेंगे। यहाँ पर हमें पुण्य गोष्ठी के अतिरिक्त अन्य काम नहीं हैं। इसलिए आप हमें पुण्यप्रद देवी भागवत पुराण सुनाइये।''

इसके बाद सूत मुनि ने यों कहा :

‘‘महामुनि व्यास ने मुझे देवी भागवत सुनाया, उसी रूप में मैं आप लेगों को वह पुराण सुनाता हूँ। अब तक सत्ताईस द्वापर बीत गये हैं और अट्ठाईसवाँ द्वापर चल रहा है। प्रत्येक द्वापर में एक व्यास का जन्म हुआ है। वेदों का विभाजन करके, पुराणों की रचना करनेवाले सात्यवतेय नामक व्यास (सत्यवती का पुत्र) मेरे गुरुदेव हैं।

वे अपने पुत्र शुक को यह देवी भागवत सुना रहे थे, उस समय मैंने अत्यंत भक्ति एवं श्रद्धापूर्वक उसे हृदयंगम कर लिया। बुजुर्ग कहा करते हैं न - ‘‘ ‘दामाद के साथ खाओ, पुत्र के साथ पढ़ो।' इसी प्रकार यह देवी भागवत सुनकर शुकमुनि तर गये। वास्तव में जिन लोगों ने यह पुराण सुना है, वे कष्टों से दूर हो जाते हैं।''

इस पर मुनियों ने पूछा-‘‘शुक मुनि व्यास महर्षि के कैसे पुत्र हुए? कहा जाता है कि उनका जन्म अरणि में हुआ है!'' इस पर सूत ने मुनियों को शुक का जन्म-वृत्तांत यों सुनाया :

एक समय व्यास महर्षि सरस्वती नदी के तट पर तपस्या कर रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ पक्षी दंपतियों के रूप में जीवन बिताते हुए बच्चे दे रहे हैं और उनके मुँह में आहार देकर उनकी खाते देख वे परमानंदित हो रहे हैं। इसे देख व्यास ने सोचा कि उन्हें भी संतान पैदा हो जाय तो क्या ही अच्छा हो! शादी करने पर पत्नी के साथ सुख भोग सकते हैं। पुत्रों को जन्म दे सकते हैं। पुत्र बड़े हो विवाह करे तो प्यारी बहू को देख प्रसन्न हो सकते हैं। पुत्रों के होने से कितने ही लाभ हैं ! वे हमारी वृद्धावस्था में श्रद्धा के साथ हमारी सेवा करेंगे। धन कमाकर ला देंगे। हमारे मरने पर सिर के नीचे आग देकर हमें उत्तम लोकों की प्राप्ति के हेतु पिंड प्रदान वगैरह करते हैं। इसलिए मानव के लिए पुत्रों से बढ़कर कोई सुख नहीं है।

यों विचार कर व्यास मुनि पुत्र पाने के विचार से तपस्या करने कांचनाद्रि पहुँचे और सोचने लगे कि किस देवता की आराधना करने से उनकी इच्छा की पूर्ति जल्दी हो सकती है। उस समय वहाँ पर नारद पहुँचे। उन्हें देखते ही व्यास ने प्रणाम करके पूछा-‘‘भगवान ! आप उचित समय पर आ गये। संभवतः मेरी कामना की पूर्ति करने के लिए ही पधारे होंगे।''

इस पर नारद ने कहा-‘‘आप सर्वज्ञ हैं। आप के लिए किसी दूसरे की सहायता की आवश्यकता ही क्या है? फिर भी आप की कोई कामना हो तो बता दीजिए!''

‘‘सुना है कि पुत्र विहीन व्यकित को परलोक प्राप्त नहीं होता। महर्षि ! बताइये, किस देवता की प्रार्थना करने पर वे मुझे पुत्र प्रदान करेंगे?'' व्यास ने पूछा।

इस पर नारद ने यों समझाया-‘‘एक समय मेरे पिता ब्रह्मा के मन में भी यही संदेह पैदा हुआ। वे विष्णु लोक में पहुँचे। विष्णु को देख पूछा-‘‘मैं आप ही को सर्वोत्तम मानता हूँ। आप से भी कोई महान व्यकित हो तो बता दीजिए।''

विष्णु ने कहा था-‘‘लोग सोचा करते हैं कि आप सृष्टिकर्ता हैं, मैं स्थितिकारक हूँ और शिवजी लयकारक हैं। लेकिन यह तो भारी भूल है। बुद्धिमान लोग जानते हैं कि तेजोप्रधान ‘आदि शक्ति' ही सृष्टि करती हैं। हम अगर सृष्टि, स्थिति और प्रलयकारक हैं तो इसका कारण है- आपको रज, मुझे सत्व और शिवजी को तमस सहायकारी हो रहे हैं। वरना हमारा मूल्य ही क्या है? यदि मैं शेषतल्प पर शयन करता हूँ, और घमण्डी राक्षसों का वध करता हूँ तो यह सब उस शक्ति की कृपा के कारण ही है न? क्या बहुत समय पूर्व मधु और कैटभ नाभक दानवों के साथ पाँच हज़ार वर्षों तक लड़कर अंत में उसी शक्ति की सहायता से ही मैंने विजय नहीं पाई? मैं कभी अपने को स्वतंत्र व्यक्ति नहीं मानता। एक बार धनुष की डोरी के द्वारा मेरा सर कट गया तो आप ने देव शिल्पी के हाथ एक घोड़े का सिर चिपकवा दिया था, इस प्रकार मैं क्या हयग्रीव नहीं बना? इसलिए मैं शक्ति के अधीन हूँ। मैं यह नहीं कह सकता कि समस्त लोकों में भी शक्ति से बढ़कर कोई चीज़ है !''

यों समझाकर नारद ने व्यास मुनि से कहा-‘‘इसलिए आप आदि शक्ति की आराधना करेंगे तो आप की इच्छा की पूर्ति होगी।''

इस पर व्यास महर्षि ने लोकमाता के प्रति तपस्या की।

इस पर मुनियों ने सूत से पूछा-‘‘विष्णु का सर कैसे कट गया? उनके धड़ पर घोड़े का सर कैसे चिपकाया गया? इसे विस्तृत रूप में सुनाइये।''

हयग्रीवावतार

प्राचीन काल में विष्णु ने राक्षसों के साथ दस हज़ार वर्ष तक युद्ध किया, आख़िर थककर चढ़ायी गयी प्रत्यंचा की डोरी पर चिबुक टिकाकर सोने लगे। उस समय देवताओं ने यज्ञ करने का संकल्प किया और उनकी खोज में आ पहुँचे। विष्णु को सोते देख वे पशोपेश में पड़ गये कि आख़िर क्या किया जाय? इस पर शिवजी ने ब्रह्मा से कहा-‘‘आप एक कीड़े की सृष्टि करके उसके द्वारा विष्णु के धनुष की प्रत्यंचा को कटवा दीजिए। प्रत्यंचा के कटते ही धनुष का छोर ऊपर उठेगा। तब विष्णु जाग पड़ेंगे। इस प्रकार यज्ञ संपन्न हो सकता है।''

इस पर ब्रह्मा ने कीड़े की सृष्टि करके प्रत्यंचा की डोरी को काटने का आदेश दिया।

तब कीड़ा बोला-‘‘महात्मा ! मैं यह काम कैसे करूँ? यह तो महान पाप है न? माता और बच्चों को अलग करना, पति-पत्नी में विरह पैदा करना, निद्रा भंग करना ये सब ब्रह्महत्या जैसे महान पाप हैं। क्या आप मुझे यह पाप करने का आदेश देते हैं?''

‘‘तुम चिंता न करो ! यज्ञ में अग्नि की आहुति न करनेवाले सारे पदार्थ मैं तुम्हें दूँगा।'' ब्रह्मा ने कीड़े को समझाया।

इस पर कीड़े ने प्रसन्न होकर प्रत्यंचा की डोरी काट दी। उस वक्त भारी आवाज़ हुई। इस पर धरती कांप उठी। प्रत्यंचा का छोर तन गया जिससे विष्णु का सर कटकर ऊपर उड़ गया। इसे देख सारे देवता घबरा गये। उनकी समझ में न आया कि क्या करे? तब सब लोग विलाप करने लगे-‘‘भगवान ! आप तो सर्वेश्वर हैं। समस्त लोकों का पालन करनेवाले हैं। आपका यह हाल कैसे हो गया है? सभी राक्षस जो कार्य नहीं कर पाये, यह काम किसने किया है? आप तो माया से भी अतीत रहते हैं ! क्या माया का इस प्रकार करना संभव है?''

इस पर देवगुरु बृहस्पति ने उन्हें समझाते हुए कहा-‘‘रोते बैठे रहने से काम कैसे चलेगा? जो हुआ सो हो गया। इसका कोई उपाय सोचिये।''

तब इंद्र ने कहा-‘‘समस्त देवताओं के देखते-देखते भगवान विष्णु का सर कटकर उड़ गया है। ऐसी हालत में हमारे प्रयत्नों के द्वारा क्या हो सकता है? भगवान की कृपा से ही कुछ संभव है !''

इस पर ब्रह्मा ने देवताओं को समझाया-‘‘सब कार्यों के लिए जगदीश्वरी का अनुग्रह चाहिए। वे ही सृष्टि, स्थिति और लयकारिणी हैं। इसलिए आप सब उस आदि शक्ति की प्रार्थना कीजिए।''

देवताओं ने आदि शक्ति की प्रार्थना की। उन पर कृपा करके देवी प्रत्यक्ष हो गईं।

देवी के दर्शन कर देवताओं ने पूछा-‘‘माता ! विष्णु भगवान का यह हाल क्यों हो गया है? उनका सर क्या हो गया है?''

देवी ने उनको समझाया-‘‘बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। एक दिन विष्णु ने शयनागार में लक्ष्मी को देख हँस दिया। तब लक्ष्मी घबरा गईं। विष्णु भगवान उनका चेहरा देख क्यों हँस पड़े? क्या उनका मुँह ऐसा भद्दा है? या उससे भी अधिक रूपवती नारी को देख वे उस पर मोहित हो गये हैं? यों विचार कर लक्ष्मी ने सोचा कि सौत के झगड़े मोल लेने की अपेक्षा पति का मर जाना कहीं उत्तम है? यों सोचकर लक्ष्मी ने विष्णु को श्राप दिया कि उनके पति का सिर कटकर समुद्र में गिर जाय। उसी श्राप के कारण विष्णु का यह हाल हो गया है। साथ ही हयग्रीव नामक राक्षस ने मेरे प्रति एक हज़ार वर्ष पर्यंत तपस्या की। मैंने प्रत्यक्ष होकर उससे वर माँगने को कहा। तब उसने पूछा कि किसी के भी द्वारा उसकी मौत न हो। मैंने समझाया कि जो भी प्राणी जन्म लेता है, उसे मृत्यु अनिवार्य है। इसलिए मैंने दूसरा वर माँगने को कहा। इसलिए उसने यह वर माँगा कि वह हयग्रीव है; अतः हयग्रीव के द्वारा ही उसकी मृत्यु हो। मैंने यह वर उसे दे दिया।


वह इस वक्त समस्त लोकों को सता रहा है। इन तीनों लोकों में उसे मारने की शक्ति रखनेवाला कोई नहीं है। इसलिए तुम लोग एक घोड़ का सर लाकर विष्णु के धड़ से लगाकर हयग्रीव की सृष्टि कर दो। ऐसा करने पर ये विष्णु हयग्रीव उस राक्षस हयग्रीव का वध कर बैठेंगे और तुम लोगों की कामना की पूर्ति भी होगी।''

यों समझाकर आदि शक्ति अदृश्य हो गई। तब देवताओं ने देवशिल्पी को बुलवाकर आदेश दिया कि घोड़े का सर लाकर विष्णु के धड़ से चिपका दे। देवशिल्पी ने ऐसा ही किया। फिर क्या था, विष्णु ने हयग्रीव के रूप में हयग्रीव राक्षस का वध करके लोगों को आनंद प्रदान किया। इसके उपरांत मुनियों ने सूत से प्रार्थना की कि उन्हें मधु और कैटभ का वृत्तांत सुनावे। तब सूत ने उन राक्षसों का वृत्तांत यों सुनाया :

क्षीर सागर में शेष शैय्या पर जब विष्णु सो रहे थेतब उनके कानों से दो राक्षस पैदा हुए। वे पानी में तैरते अपने जन्म के कारण पर आश्चर्य चकित हुए। तब कैटभ ने मधु से कहा-‘‘इस महा समुद्र और हमारे लिए भी कोई आधार ज़रूर होगा।'' उसके मुँह से ये शब्द निकलने की देरी थी कि आकाश से यह वाणी सुनाई दी।

मधु और कैटभ उस वाणी का जाप करने लगे। तभी लगा कि आसमान में कोई बिजली कौंध गई हो! राक्षसों ने उसे देख सोचा कि वह आदि शक्ति का तेज है। तब उन्हें जो ध्वनि सुनाई दी, उसी को मंत्र मानकर एक हज़ार वर्ष पर्यंत तप किया। उस तपस्या पर प्रसन्न हो देवी ने उससे वर माँगने को कहा। उन लोगों ने स्वेच्छा मृत्यु की कामना की। देवी ने उन्हें यह वर दे दिया।

इसके बाद वे जल में संचार करते रहे। एक स्थान पर ब्रह्मा को देख उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। कहा-‘‘आप हमारे साथ युद्ध कीजिए। वरना पद्मासन को छोड़ कहीं भाग जाइये।''

ब्रह्मा डर गये और योग समाधि में स्थित विष्णु से प्रार्थना की-‘‘महात्मा ! जाग जाइये! दो राक्षस मेरा वध करना चाहते हैं। मेरी रक्षा कीजिए।''

विष्णु योग निद्रा से जागे नहीं। इस पर ब्रह्मा ने आदि शक्ति योग निद्रा से ही प्रार्थना की-‘‘जगन्माता! इन राक्षसों का वध करने के लिए आप विष्णु को जगाइये या आप ही मेरी रक्षा कीजिए।'' फिर क्या था, उसी वक्त योग निद्रा विष्णु को छोड़कर चली गई। विष्णु को निद्रा से जागते देख ब्रह्मा परमानंदित हुए।


देवी भागवत - 2
देवी भागवत - 4
देवी भागवत - 3
देवी भागवत - 5