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14 मई 2012

पन्नों पर फ़ैली पीड़ा

 पन्नों पर फ़ैली पीड़ा

रात थी की बीतने का नाम ही नहीं ले रही थी। सफलता और असफलता की आशानिराशा के बीच सब के मन में एक तूफ़ान चल रहा था। आँपरेशन थिएटर का टिमटिम करता बल्ब कभी आशंकाओं को बढ़ा देता तो कभी दिलासा देता प्रतीत होता। नर्सों के पैरों की आहट दिल की धड़कनें से तेज लगती। नवीन बेचैनी से इधर से उधर टहल रहा था। हॉस्पिटल के इस तल पर सन्नाटा था। नवीन कुछ गंभीर मरीजों के रिश्तेदारों के उदास चेहरों पर नजर दौड़ाता, फ़िर सामने बैठी अपनी मां को ध्यान से देखता और अंदाजा लगाता कि क्या मां वास्तव में परेशान हैं।
   अंदर आई.सी.यू. में नवीन की पत्नी सुजाता जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी। नवीन पूरे यकीन के साथ सोच रहा था कि अभी डाक्टर आ कर कहेगा, सुजाता ठीक है।
  कल कितने चोटें आई थीं सुजाता को।
नवीन, सुजाता और उन के दोनों बच्चे दिव्यांशु और दिव्या पिकनिक से लौट रहे थे। कार नवीन ही चला रहा था। सामने से आ रहे ट्रक ने सुजाता की तरफ़ की खिडकी में जोरदार टक्कर मारी। नवीन और पीछे बैठे बच्चे तो बच गए, लेकिन सुजाता को गंभीर चोटें आईं। उस का सिर भी फ़ट गया था। कार भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। नवीन किसी से लिफ़्ट ले कर घायल सुजाता और बच्चों को ले कर यहां पहुंच गया था।
   नवीन ने फ़ोन पर अपने दोनों भाइयों विनय और नीरज को खबर दे दी थी। वे उस के यहां पहुंचने से पहले ही मां के साथ पहुंच चुके थे। विनय की यहां कुछ डाक्टरों से जानपहचान थी, इसलिए इलाज शुरू करने में कोई दिक्कत नहीं आई थी।
   नवीन ने सुजाता के लिए अपने दोनों भाइयों की बेचैनी भी देखी। उसे लगा, बस मां को ही इतने सालों में सुजाता से लगाव नहीं हो पाया। वह अपनी जीवनसंगिनी को याद करते हुए थका सा जैसे ही कुरसी पर बैठा तो लगा जैसे सुजाता उस के सामने मुसकराती हुई साकार खडी हो गई है। झट से आंखे बंद कर लीं ताकि कहीं उस का चेहरा आंखों के आगे से गायब न हो जाए।
   नवीन ने आखें बंद कीं तो पिछली स्मृतियां दृष्टिपटल पर उभर आईं...

20 साल पहले नवीन और सुजाता एक ही कालेज में पढते थे। दोनों की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला।
पढाई खत्म करने के बाद जब दोनों की अच्छी नौकरी भी लग गई तो उन्होंने विवाह करने का फ़ैसला किया।
   सुजाता के मातापिता से मिल कर नवीन को बहुत अच्छा लगा था। वे इस विवाह के लिए तैयार थे, लेकिन असली समस्या नवीन को अपनी मां वसुधा से होने वाली थी। वह जानता था कि उस की पुरातनपंथी मां एक विजातीय लडकी से उस का विवाह कभी नहीं होने देंगी। उस के दोनों भाई सुजाता से मिल चुके थे और दोनों से सुजाता की अच्छी दोस्ती भी हो गई थी। जब नवीन ने घर में सुजाता के बारे में बताया तो वसुधा ने तूफ़ान खडा कर दिया। नवीन के पिताजी नहीं थे।
   वसुधा चिल्लाने लगीं, ’क्या इतने मेहनत से तुम तीनों को पालपोस कर इसी दिन के लिए बडा किया है कि एक विजातीय लडकी बहू बन कर इस घर में आए? यह कभी नहीं हो सकता।’
   कुछ दिनों तक घर में सन्नाटा छाया रहा। नवीन मां को मनाने की कोशिश करता रहा, लेकिन जब वे तैयार नहीं हुईं, तो उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली।
   नवीन को याद आ रहा था वह दिन जब वह पहले बार सुजाता को ले कर घर पहुंचा तो मां ने कितनी क्रोधित नजरों से उसे देखा था और अपने कमरें में जा कर दरवाजा बंद कर लिया था। घंटों बाद निकली थीं और जब वे निकलीं, सुजाता अपने दोनों देवरों से पूछपूछ कर खाना तैयार कर चुकी थी। यह था ससुराल में सुजाता का पहला दिन।
   नीरज ने जबरदस्ती वसुधा को खाना खिलाया था। नवीन मूकदर्शक बना रहा था। रात को सुजाता सोने आई तो उस के चेहरे पर अपमान और थकान के मिलेजुले भाव देख कर नवीन का दिल भर आया और फ़िर उस ने उसे अपने बांहों में समेट लिया था।
   नवीन और सुजाता दोनों ने वसुधा के साथ समय बिताने के लिए आंफ़िस से छुट्टियां ले ली थीं। वे दिन भर वसुधा का मूड ठीक करने की कोशिश करते, मगर कामयाब न हो पाते।
   जब सुजाता गर्भवती हुई तो वसुधा ने एलान कर दिया, ’मुझ से कोई उम्मीद न करना, नौकरी छोडो और अपनी घरगृहस्थी संभलो।’
   यह सुजाता ही थी, जिस ने सिर्फ़ मां को खुश करने के लिए नौकरी छोड दी थी। माथे की त्योरियां कम तो हुईं, लेकिन खत्म नहीं।
   दिव्यांशु का जन्म हुआ तो विनय की नौकरी भी लग गई। वसुधा दिनरात कहती, ’इस बार अपनी जाति के बहू लाउंगी तो मन को कुछ ठंडक मिलेगी।’
   सुजाता अपमानित सा महसूस करती। नवीन देखता, सुजाता मां को एक भी अपशब्द न कहती। वसुधा ने खोजबीन कर के अपने मन की नीता से विनय का विवाह कर दिया। नीता तो वसुधा ने पहले दिन से ही सिर पर बैठा लिया। सुजाता शांत देखती रहती। नीता भी नौकरीपेशा थी। छुट्टियां खत्म होने पर वह आंफ़िस के लिए तैयार होने लगी तो वसुधा ने उस की भरपूर मदद की। सुजाता इस भेदभाव को देख कर हैरान खडी रह जाती।

कुछ दिनों बाद नीरज ने भी नौकरी लगते ही सुधा से प्रेमविवाह कर लिया। लेकिन सुधा भी वसुधा की जातिधर्म की कसौटी पर खरी उतरती थी, इसलिए वे सुधा से भी खुश थीं। इतने सालों में नवीन ने कभी मां को सुजाता से ठीक तरह से बात करते नहीं देखा था।
   दिव्या हुई तो नवीन ने सुजाता को यह सोच कर उस के मायके रहने भेज दिया कि कम से कम उस के वहां शांति और आराम तो मिलेगा। नवीन रोज आंफ़िस से सुजाता और बच्चों को देखने चला जाता और डिनर कर के ही लौटता था।
   घर आ कर देखता मां रसोई में व्यस्त होतीं। वसुधा जोडों के दर्द की मरीज थीं, काम अब उन से होता नहीं था। नीत और सुधा शाम को ही लौटती थीं, आ कर कहतीं, ’सुजाता भाभी के बिना सब अस्तव्यस्त हो जाता है।’
   सुन कर नवीन खुश हो जाता कि कोई तो उस की कद्र करती है।
   फ़िर विनय और नीरज अलगअलग मकान ले लिए, क्योंकि यह मकान अब सब के बढते परिवार के लिए छोटा पडने लगा था। वसुधा ने बहुत कहा कि दूसरी मंजिल बनवा लेते हैं, लेकिन सब अलग घर बसाना चाहते थे।
   विनय और नीरज चले गए तो वसुधा कुछ दिन बहुत उदास रहीं। दिव्यांशु और दिव्या को दिव्या प्यार करतीं, लेकिन सुजाता से तब भी एक दूरी बनाए रखतीं। सुजाता उन से बात करने के सौ बहाने ढूंढती, मगर वसुधा हां, हूं में ही जवाब देतीं।
  बच्चे स्कूल चले जाते तो घर में सन्नाटा फ़ैल जाता। बच्चों को स्कूल भेज कर पार्क में सुबह की सैर करना सुजाता का नियम बन गया। पदोन्नति के साथसाथ नवीन की व्यस्तता बढ गई थी। सुजाता को हमेशा ही पढनेलिखने का शौक रहा। फ़ुरसत मिलने ही वह अपनी कल्पनाओं की दुनिया में व्यस्त रहने लगी। उस के विचार, उस के सपने उसे लेखने की दुनिया में ले आए और दुख में तो कल्पना ही इंसान के लिए मां की गोद है। सुबह की सैर करतेकरते वह पता नहीं क्याक्या सोच कर लेखन सामग्री जुटा लेती।
   पार्क से लौटते हुए कितने विचार, कितने शब्द सुजाता के दिमाग में आते, लेकिन अकसर वह जिस तरह सोचती, एकाग्रता के अभाव में उस तरह लिख न पाती, पन्ने फ़ाडती जाती, वसुधा कभी उस के कमरे में न झांकती, बस उन्हें कूडे की टोकरी में फ़टे हुए पन्नों का ढेर दिखता तो शुरू हो जातीं, ’पता नहीं, क्या बकवास किस्म का काम करती रहती है। बस, पन्ने फ़ाडती रहती है, कोई ढंग का काम तो आता नहीं।’
   सुजाता ने गंभीरता से लिखना शुरू कर दिया था। उस समय उस के सामने था, सालों से मिलता आ रहा वसुधा से तानों का सिलसिला, अविश्वास और टूटता हौसला, क्योंकि वह खेदसहित रचनाओं के लौटने का दौर था। लौटी हुई कहानी उसे बेचैन कर देती।
   उस की लौटी हुई रचनाओं को देख कर वसुधा के ताने बढ जाते, ’समय भी खराब किया और लो अब रख लो अपने पास, लिखने में नहीं, बच्चों की पढाई पर ध्यान दो।’

   सुजाता को रोना आ जाता। सोचती, अब वह नहीं लिखेगी, तभी दिल कहता कि न घबराना है, न हारना है। मेहनत का फ़ल जरूर मिलता है और वह फ़िर लिखने बैठ जाती। धीरेधीरे उस की कहानियां छपने लगीं।
   सुजाता को नवीन का पूरा सहयोग था। वह लिख रही होती तो नवीन कभी उसे डिस्टर्ब न करता, बच्चे भी शान्ति से अपना काम करते रहते। अब सुजाता को नाम, यश, महत्त्व, पैसा मिलने लगा। उसे कुछ पुरस्कार भी मिले, वह वसुधा के पैर छूती तो वे तुनक कर चली जातीं। सुजाता अपने शहर के लिए सम्मानित हस्ती हो चुकी थी। उसे कई शैक्षणिक, सांस्कृतिक समारोहों मे विशेष अतिथि की हैसियत से बुलाया जाने लगा।
   वसुधा की सहेलियां, पडोसिनें सब उन से सुजाता के गुणों की वाहवाह करतीं।

"नवीनजी, आप की पत्नी अब खतरे से बाहर है," डाक्टर की आवाज नवीन को वर्तमान में खींच लाई।
   वह खडा हो गया, "कैसी है सुजाता?"
   "चोटें बहुत हैं, बहुत ध्यान रखना पडेगा, थोडी देर में उन्हें होश आ जाएगा, तब आप चाहें तो उन से मिल सकते हैं।"
   मां के साथ सुजाता को देखने नवीन आई.सी.यू. में गया। सुजाता अभी बेहोश थी। नवीन ने थोडी देर बाद मां से कहा, "मां, आप थक गई होंगी, घर जा कर थोडा आराम कर लो, बाद में जब नीरज घर आए तो उस के साथ आ जाना।"
   वसुधा घर आ गईं, नहाने के बाद सब के लिए खाना बनाया, बच्चे नीता के पास थे। वे सब हौस्पिटल आ गए। विनय और नीरज तो नवीन के पास ही थे। सारा काम हो गया तो वसुधा को खाली घर काटने को दौडने लगा। पहले वे इधरउधर देखती घूमती रहीं, फ़िर पता नहीं उन के मन में क्या आया कि ऊपर सुजाता के कमरे की सीढियां चढने लगीं।
   साफ़सुथरे कमरे में एक और सुजाता के पढनेलिखने की मेज पर रखे सामान को वे ध्यान से देखने लगीं। अब तक प्रकाशित 2 कहनी संग्रह, 4 उपन्यास और बहुत सारे लेख जैसे सुजाता के अस्तित्व का बखान कर रहे थे। सुजाता की डायरी के पन्ने पलटे तो बैड पर बैठ कर पढती चली गईं।
   एक जगह लिखा था, "मांजी के साथ 2 बातें करने के लिए तरस जाती हूं मैं। कोमल, कांतिमय देहयष्टि, मांजी के माथे पर चंदन का टीका बहुत अच्छा लगता है मुझे। मम्मीपापा तो अब रहे नहीं, मन करता है मांजी की गोद में सिर रख कर लेट जाऊं और वे मेरे सिर पर अपना हाथ रख दें, क्या ऐसा कभी होगा?"
   एक पन्ने पर लिखा था, "आज फ़िर कहानी वापस आ गई। नवीन और बच्चे तो व्यस्त रहते हैं, काश, मैं मांजी से अपने मन की उधेडबुन बांट पाती, मांजी इस समय मेरे खत्म हो चले नैतिक बल को सहारा देतीं, मुझे उन के स्नेह के 2 बोलों की जरूरत है, लेकिन मिल रहे हैं ताने।"
   एक जगह लिखा था, "अगर मांजी समझ जातीं कि लेखन थोडा कठिन और विचित्र होता है, तो मेरे मन को थोडी शांति मिल जाती और मैं और अच्छा लिख पाती।"
   आगे लिखा था, "कभीकभी मेरा दिल मांजी के व्यंगबाणों की चोट सह नहीं पाता, मैं घायल हो जाती हूं, जी में आता है उन से पूछू, मेरा विजातीय होना क्यों खलता है कि मेरे द्वारा दिए गए आदरसम्मान व सेवा तक को नकार दिया जाता है? नवीन भे अपनी मां के स्वभाव से दुखी हो जाते हैं पर कुछ कह नहीं सकते। उन का कहना है कि मां ने तीनों को बहुत मेहनत से पढायालिखाया है, बहुत संघर्ष किया है पिताजी के बाद। कहते हैं, मां से कुछ नहीं कह सकता। बस तुम ही समझौता कर लो। मैं उन के स्वभाव पर सिर्फ़ शर्मिंदा हो सकता हूं, अपमान की पीडा का अथाह सागर कभीकभी मेरी आंखों के रास्ते आंसू बन कर बह निकलता है।"

एक जगह लिखा था, "मेरी एक भी कहाने मांजी ने नहीं पढी, कितना अच्छा होता जिस कहानी के लिए मुझे पहला पुरस्कार मिला, वह मांजी ने भी पढी होती।"
   वसुधा के स्वभाव से दुखी सुजाता के इतने सालों के मन की व्यथा जैसे पन्नों पर बिखरी पडी थी।
   वसुधा ने कुछ और पन्ने पलटे, लिखा था, "हर त्योहार पर नीता और सुधा के साथ मांजी का अलग व्यवहार होता है, मेरे साथ अलग, कई रस्मों में, कई आयोजनों में मैं कोने में खडी रह जाती हूं आज भी। मां की द्रष्टि में तो क्षमा होती है और मन में वात्सल्य।"
   पढतेपढते वसुधा की आंखें झमाझम बरसने लगीं, उन का मन आत्मग्लानि से भर उठा। फ़िर सोचने लगीं कि हम औरतें ही औरतों की दुश्मन क्यों बन जाती हैं? कैसे वे इतनी क्रूर और असंवेदनशील हो उठीं? यह क्या कर बैठीं वे? अपने बेटेबहू के जीवन में अशांति का कारण वे स्वयं बनीं? नहीं, वे अपनी बहू की प्रतिभा को बिखरने नहीं देंगी। आज यह मुकदमा उन के मन की अदालत में आया और उन्हें फ़ैसला सुनाना है। भूल जाएंगी वे जातपांत को, याद रखेंगी सिर्फ़ अपनी होनहार बहू के गुणों और मधुर स्वभाव को।
   वसुधा के दिल में स्नेह, उदारता का सैलाब सा उमड पडा। बरसों से जमे जातिधर्म, के भेदभाव का कुहासा स्नेह की गरमी से छंटने लगा।  
                                                                                                                                                                                    - पूनम अहमद 

29 अप्रैल 2012

किनारा

मैं धड़कते दिल से डाकिये का इंतज़ार कर रही थी। मैं ही क्यों? माँ और पिताजी भले ही ऊपर से शांत दिखाई पद रहे थे, लेकिन मैं जानती हूँ कि वे अन्दर से कितने बेचैन थे।
  बात यह थी कि पिछले हफ्ते सुशांत मुझे देखने आए थे और आज उन का जवाब आने की उम्मीद थी। वैसे अपनी शादी के बारे में मैं कुछ निराश और तटस्थ सी हो गयी हूँ। लेकिन मेरे कारण पिताजी को जो चिंता थी, उस से मेरा मन ज्यादा ही व्यथित होता था। मेरे कारण माँ भी कहीं बाहर ज्यादा उठाने बैठने नहीं जाती थीं।
  अडोसपड़ोस की स्त्रियाँ अकसर मुझ से कहतीं, "अरे, शादी क्यों नहीं करती, कुसुम? तेरे छोटे भाई और दोनों छोटी बहनों की शादी हो गयी और तू किस राजकुमार का इंतज़ार कर रही है?"
  "कुसमम, तेरे जैसी सुन्दर और गुणवती लडकी की 30 साल की उम्र तक शादी नहीं हुई? कुछ अटपटा सा लगता है। सचसच बता, क्या बात है?"
   उन्हें मैं कैसे समझाऊँ कि मैं खुद इस बात से परेशान हूँ। मांबाप की मैं लाडली पहली सन्तान थी। रंगरूप सुन्दर, खानदान अच्छा, पढीलिखी। जब मेरी शादी की उम्र हुई, पिताजी कौतुक से कहते, "कुसुम के लिए मैं राजकुमार ही खोजूंगा।"
  "यह लड़का आई.ए.एस. है तो क्या हुआ, रंग तो काला है..." "यह डाक्टर लड़का होशियार है, लेकिन ठिगना है..." "इस लड़के का खानदान अपने बराबरी का नहीं है," कह कर कितने ही लड़के उन्होंने किसी न किसी वजह से नापसंद कर दी। 
 मेरी उम्र बढ़ती चली गयी। हमारी शर्तें भी कम हो गयी। लेकिन हमारी इच्छापूर्ति न हुई। इस दरम्यान भाई और दो बहनों की शादी हो गई। उन का सुखी संसार बसा। लेकिन मैं जहाँ की तहां रही। बड़ी उम्र की कारण अब लड़के मुझे नकारने लगे। समय काटने के लिए मैं ने चित्रकला और शास्त्रीय संगीत का अभ्यास शुरू कर दिया।
  गेट खुलने की आवाज आते ही पिताजी बाहर गए। मैं ने अपने कमरे से देखा, सचमुच डाकिया था। पिताजी के हाथ में उस ने लिफाफा दिया। सांस रोक कर मैं कमारे में ही खादी रही, "अरे कुसुम, तू ने बाजी मार ली," कह कर खुस हो कर पिताजी के हंसने का मैं इन्त्ताजार कर रही थी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो मैं समझ गई कि इनकार है। मन को ठेस पहुँची, थोड़ी देर बाद मन स्थिर किया और ऊपरी उत्साह से हाल में गई।
  माँ और पिताजी उदास बैठे थे।
  "माँ, मैं ने कल जो चित्र बनाया था, उस को दिखाना भूल गई। अभी ले आती हूँ।"
  मैं चित्र लाई। माँ और पिताजी ने उस की तारीफ़ की, तब मैं ने कहा, "माँ, आप को कमलाजी ने मदद के लिए जल्दी बुलाया है। आप दोनों जाइए न?"
  "कमलाजी का और हमारा निकट का सम्बन्ध अहि। उन की इकलौती बेटी मंजू का ब्याह है। जितनी मदद हम से होगी, उतने तो करेंगे ही, "पिताजी बोले, "लेकिन आज कुछ सुस्ती लग रही है।"
  "नहीं पिताजी, आप का जाना जरूरी है। आप दोनों जाइए। शादी के वक्त मैं आउंगी। शाम को 6 बजे शादी है न।"
  "हाँ बेटी," पिताजी ने कहा।
  "कुसुम, तुम को भी वहीं दोपहर का खाना खाना है," माँ ने कहा।
  "माँ, मैं घर पर ही कुछ बना लूंगी और शाम को वहां आउन्गीए।"
  माँ सब समझ गई थीं। कुछ ज्यादा बोलीं नहीं। थोड़ी देर बाद माँ और पिताजी दोनों कमलाजी के यहाँ चले गए।
  उन के जाने के बाद मेरा मन घोर निराशा से भर गया, "उफ़, मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?" असहाय सी मैं बिस्तर पर पड़े चुपचाप आंसू बहा रहे थी। पहला आवेग थमने के बाद मेरा मन कहने लगा, "अगले पगली, उठ, शादी ही जीवन का सर्वस्व नहीं है। उस तरफ का मार्ग बंद है तो दुखी होने की, घबराने की क्या जरूरत है? सुखी जीवन के अनेक मार्ग है। उन में से एकाध चुन ले। मुझ को गायन तथा चित्रकला का शौक है उसी से अपना दिल लगा ले। उठउठ, अपने जीवन के प्रवाह को चट्टान से टकराने से क्या लाभ? दूसरा सुगम मार्ग अपना ले। अब उठ और अपना जीवन नए मोड़ पर उत्साह से ले चल।"
  आश्चर्य, इस बोध से मैं चकित हुई। मेरे मन का बोझ हल्का हुआ। सच तो है कि तीव्र निराशा के बाद जीवन की आशाकिरण किखती है।
  मैं स्फूर्ति से उठी, शैम्पू से बाल धोए। नहाने से मन प्रफुल्लित हुआ। हेयर ड्रायर से बाल सुखाए। मेकप कर के हलकी गुलाबी रंग की शिफोर की सादी पहनी। आईने में अपना चेहरा देख कर मैं खुश हुई। गाना गुनगुनाते हुए हाल में गई। मेरी बनाई हुए कलाकृति वहीँ मेज पर रखी थी। उसको बड़े स्नेह से देखा मैं ने।
  इतने में दरवाजे की घंटी बजी।
दरवाजा खोला तो देखा कमलाजी का लड़का समीर और एक युवक खडा था।
  "कुसुम दीदी, यह हैं मेरे भाई अभय। आप से मिलाने आए हैं," समीर ने कहा।
  नमस्कार का आदानप्रदान हुआ।
  "आइये, बैठिये।"
  "दीदी, घर में काम है, मैं जाता हूँ। अभय भैया बैठेंगे। बाद में आप कार से उन्हें ले आइये। और हाँ, माँ ने कहा है कि आज आप को हमारे यहाँ ही खाना है। जरूर आइयेगा।" कह कर समीर चला गया।
  "मुझे पहचाना?" अभय हंस कर पूछ रहा था। मैं उसे देख रही थी। उसे पहचानने की कोशिश कर रही थी, लेकिन कुछ याद नहीं आया।
  "नहीं पहचाना न? मैं अभय हूँ। 20 साल पहले आप के पिताजी और मेरे पिताजी जबलपुर में साथ थे। दोनों के बंगले एकदूसरे से लगे हुए थे। आप करीब 9-10 साल की थीं और मैं 12 साल का था। मेरी छोटी बहन सुधा के साथ खेलने आप आती थीं। अब कुछ याद आया?"
  मुझे कुछ धुंधली याद आई, "अरे, तू हम को फल तोड़ के देता था न?"
  "चलो, कुछ थोडाबहुत तो पहचाना।" कह कर अभय हंस पडा, उस का गोराचिट्टा रंग, ऊंचापूरा गँठीला बदन, प्रसन्न व्यक्तित्व देख कर मैं बहुत प्रभावित हुई। उस के साथ बचपन की बातें कर के बहुत अच्छा लग रहा था।
  "अभय, पहले बता, तुझे कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ और तू ने मुझे कैसे पहचाना?"
  "बहुत सरल तरीके से। कमलाजी मेरी सगी मौसी हैं। इसलिए मंजू की शादी में माँ और पिताजी के साथ मैं भी आया।
कमलाजी के यहाँ तुम्हारे पिताजी से भेंट हुई। बातचीत के दौरान मैं ने तुम्हारे बारे में पूछा, तब सब पता चला और तुम से मिलाने आ गया।"
 "इतने साल बाद मेरा नाम कैसे याद आया?"
  "कोइ अचरज की बात नहीं। बचपन में कुसुम नाम की गुडिया सी लडकी ने मेरे मन पर चाप छोटी थी। वह काल प्रवाह में धूमिल अवश्य हुई थी, पर आज तुम्हारी माँ और पिताजी से मिलाने के बाद एकदम साफ़ हुई। वह छोटी गुडिया अब कैसी दिखती होगी, यह जानने के लिए मैं बड़ा उत्सुक था और एकाएक यहाँ आ गया।"
  "अब आप कहाँ रहते हैं? क्या करते हैं? सब बताइए न।" बचपन की बातें चली थीं, तब 'तुम' संबोधन सहज रूप से बोला गया। लेकिन संभाषण का रूख जब वर्त्तमान पर आया, तब अभय को युवक के रूप में देख कर 'तुम' की जगह 'आप' संबोधन आदतन आ गया।
  अभय हंस पडा, "अरे, उम्र में बड़ा हुआ तो क्या हुआ, मैं तो पुराना ही 'तुम' वाला अभय हूँ। 'आप' सम्भोधन की औपचारिकता की जरूरत नहीं।"
  मेरे चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गई। किंचित लजाते हुए मैं ने कहा, "अच्छा बाबा, 'तुम' कहूंगी। अब सब बताओ।"
  "मेरे पिताजी की बदली जबलपुर से इंदौर हो गई। वहीं पर मैं ने एम.बी.बी.एस. और एम.दी. की डिगरी हासिल की। स्वर्ण पदक भी मिला। फिर छात्र के रूप में वीजा से लेकर 25 साल की उम्र में अमरीका गया। मुझे शोध में रुचि है। अमरीका में शोध ही कर रहा हूँ। अपने अमरीकी प्राध्यापकों की मदद से बहुत संघर्ष के बाद पिचले साल मुझे ग्रीन कार्ड मिल गया। शोध की सुविधाएं अमरीका में बहुत ज्यादा हैं, इसलिए वहीँ रहना चाहता हूँ। इस साल 1 महीने के लिए भारत आया हूँ," फिर रूक कर बोला, "इतना जीवन परिचय काफी है न?"
  मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि इस की शादी कब हुई। पत्नी कैसी है? यह सब जानने के इच्छा थी, लेकिन न मालूम क्यों मैं यह सीधा सवाल नहीं पूछ सकी। इधरउधर की कुछ बातें होने लगीं। फिर मुझ से रहा न गया।
  "पत्नी भी साथ आई है न?"
  "अरे, पत्नी हो तो साथ आएगी। हम तो अभी कोरा कागज़ ही हैं।"
  फिर कुछ गंभीर ह कर स्थिर दृष्टि से मुझे देख कर वह बोला, "पत्नी की खोज के लिए ही यहाँ आया हूँ।"
  मैं एकदम सकुचाई। मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। अभय का 'यहाँ' का क्या मतलब-हिन्दुस्तान में या मेरे यहाँ? इस विचार सेमिन स्तब्ध हो गई। मेरे मन में आशा की किरणें चमकने लगीं। अभय का जादू मुझ पर हावी होने लगा था। उस की स्निग्ध और गंभीर नजर मुझ पर टिकी थी। अपनी आँखों का भाव छिपा कर मैं ने पलकें झुका लीं। दोनों की स्तब्धता और आँखों के भाव बहुत कुछ कह गए।
  थोड़ी देर में संयत हो कर मैं ने सहज ढंग से कहा, "अभय, मैं आजकल चित्रकला में रुचि ले रही हूँ। मेरे बनाए चित्र देखोगे?" कह कर मैं हाल में रखी कलाकृति के पास गई। मेरे पीचेपीचे अभय भी आया।
  उस की निकटता मुझे उत्तेजित करने लगी। मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे। मैं मुग्ध सी खडी रही। डर लग रहा था कि मेरे मन में उभरने वाली प्रणयभावना का अंदाजा कहीं अभय को न लगे। तभी पीछे से अभय ने कहा, "कुसुम, तुम से कुछ पूछना है। उस का मृदु आतुर स्वर सुन कर मेरा मन खुशी से नाचने लगा। लचीली आँखों से मैं ने उस की तरफ देखा।
  "कुसुम, तुम मेरी पत्नी बनोगी।"
  मुझे लगा जैसे कोइ दोनों हाथों से मुह पर खुशियाँ बिखेर रहा है। मेरी पलकें झुक गईं। शब्दों की स्वीकृति की जरूरत ही नहीं थी। मंद मधुर, मुसकराते हुए उस ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "अपने प्रश्न का उत्तर 'हाँ' समझूं?"
  मैं ने कब 'हाँ' कहा, कैसे और कब उस के बाहुपाश में बंध गई, मुझे पता न चला।  

                                                                                                                                                                              - कमल भालेराव 

20 मार्च 2012

मार्गरेट आने वाली है

ऋतु ने एक बार सारे घर में घूम कर देखा। कहीं कोई गंवारपन नहीं दिखाई दिया। दीवार पर टंगी घड़ी तथा कलाकृतियाँ, खिड़की पर रखा नन्हा कैक्टस का गमला, बाहर रखे बोनसाई पौधे। सभी कुछ तो आधुनिक था। अब कोई घर देख कर यह नहीं कह सकता था की घर में कोई पिछडापन है।
  उस ने घड़ी देखी, "ओह, मार्गरेट के आने में बस आधा घंटा रह गया है।" पता नहीं इस नई मेहमान के आने की खबर से उस के दिल में क्यों धुकधुक हो रही थी? एक तो आने वाले ईसाई थीं, ऊपर से गोआ की रहने वालीं। इसलिए वह अपने व्यक्तित्व के साथसाथ घर की साजसंवार के प्रति अतिरिक्त सजग हो उठी थी। अन्दर रखी हुई सजावट की वस्तुएं निकाली थीं। कुशन, परदे, यहाँ तक की तकिये के गिलाफ तक बदल दिए थे।
  एक बार फिर वह श्रृंगार मेज के सामने खडी हो गयी। कितने महीनों बाद उस ने भिड़ी पहनी थी। कमर में 'सफ़ेद धातु' की चेन भी बांधी थी, वरना शादी के बाद मन कैसाकैसा हो जाता है। लड़कपन की पोशाक पहनने में स्वयं ही संकोच होने लगता है। हालांकि अनिल को कोई मतलब नहीं था। उस की बला से कुछ भी पहनो, फिर भी भिड़ी रात में कहीं बाहर जाते समय ही पहन पाती थी।
  उस ने सोचने की कोशिश की कि मार्गरेट कैसी होंगी। उम्र तो उन की 40 वर्ष के आसपास होगी, क्योंकि उन के पति डेविड भी कम से कम 45-46 वर्ष के लगते हैं। देखने में भी वह जरूर चुस्त होंगी, क्योंकि डेविड भी तो कम आकर्षण नहीं हैं। अच्छा तो भिड़ी पहन कर आएंगी या भिड़ी पेंट पहन कर या जींस पहन कर?
  धत, तीन दिनों से मार्गरेट किस कदर उस के दिमाग पर छाई हुई हैं। कितनी बार उस ने इस बात को दिमाग से झटकना चाहा है की मार्गरेट उस के घर आने वाली हैं, किन्तु हर बार वह दिमाग में घुसती ही जा रही है। वह भी क्या करे? डेविड से उन के बारे में व उन के परिवार की शानशौकत के बारे में इतना सुना है की वह उन्हें बिना देखे ही मोहित हो गयी थी। चाचाजी हमेशा बताते रहते थे आजादी से पहले मार्गरेट के पिता किस तरह अंग्रेज अफसरों के साथ शिकार पर जाया करते थे। उन लोगों के परिवार के साथ उन के परिवार का दिन भर का उठनाबैठना था।
  तभी तो वह तीन दिनों से परेशान थी की मार्गरेट यहाँ आ कर उस में या उस के घर में कोई गंवारूपन न नोट कर लें। मन ही मन उस ने उन से बात करने के लिए बेहतर से बेहतर अंगरेजी वाक्य छांट रखे थे। वह किसी पब्लिक स्कूल में नहीं पड़ पाई तो क्या, लेकिन अंगरेजी माध्यम के अच्छे स्कूल में तो पढी हुई थी।
  अनिल और डेविड का परिचय तो बहुत पुराना था। वह नौकरी की खातिर गोआ से इतनी दूर चले आए थे। उन की पत्नी बच्चों के साथ गोआ में निजी मकान में अपनी बूढ़े सासससुर के कारण रह रही थीं।उन की कनपटियों के पास के कुछ सफ़ेद बाल उन की उम्र की चुगली खाते थे, वरना उन के अलमस्त व्यक्तित्व का उम्र से कोई लेनादेना नहीं था।
  "चीं...चीं...चीं..." चिडियानुमा घंटी बजी। वह हाथ का कंघा छोड़ झटपट दरवाजे की तरफ भागी। उफ़! मार्गरेट इतनी जल्दी आ गईं। वह जल्दी में बैठक में कोने की मेज से टकरा गई। मेज के उलटने से उस पर रखी एश ट्रे गिर गई। उस ने एश ट्रे को झटपट मेज पर रख कर दरवाजा खोला।
  दरवाजे पर खड़े डाकिए ने उस के हाथ में तीन पत्र थमा दिए। उन ने झल्ला कर जोर से दरवाजा बंद कर दिया।
  तीनों पत्र पढने के बाद फिर सोचा, चलो रसोई में एक चक्कर लगा आए। सूप, उबली हुई सब्जियां व अंडे तैयार थे। पुडिंग बना कर भी फ्रिज में रख दी थी।
  उन लोगों के आने पर सैंडविच तो शान्ति सेक देगी। रसोई का एक चक्कर लगा कर वह खुश हो गई। कितना मजा है यूरोपीय खाना बनाने में। न मेहनत, न कोई झंझट। अगर हिन्दुस्तानी खाना बनाया होता तो अब तक तो वह रसोई में ही लगी होती। रसोई भी तो कितनी साफसुथरी लग रही है। नहीं तो इस में मसाले व इलायची की खुशबू ही भरी होती।
  बहुत दिनों पहले देखी किसी अंगरेजी फिल्म की नायिका की तरह वह ऊंची एडी के सैंडिल को खटखट करती चलती बैठक में 'शिक' पत्रिका ले कर बैठ गई। हाथ पत्रिका को उलटपुलट रहे थे, लेकिन अभी भी उस के दिल में मार्गरेट के आने की उत्तेजना भरी हुई थी।
  "चीं...चीं...चीं..." इस बार दरवाजे पर अनिल, डेविड व साथ में एक महिला साड़ी में लिपटी, माथे पर सिन्दूर की बिंदी लगाए खडी हुई थी. वह खीज उठी। "उफ़, सारी मेहनत पर पानी फिर गया। आखिर मार्गरेट नहीं आईं।"
  वह उन से चहक कर "हाय!" कहे इस से पहले ही उस महिला ने हाथ जोड़ कर कहा, नमस्ते, ऋतुजी, मैं मार्गरेट हूँ।"
  उसे सहज होने में कुछ सेकण्ड लगे, "नमस्ते, आइये...आइये।"
  ऋतु को गुस्सा आया। यह तो हिन्दुस्तानी में ही बात कर रही है। इस के छांट कर रेट हुए अंगरेजी वाक्यों का क्या होगा?
  ऋतु उन की ओर लगातार कनखियों से देखती जा रही थी। जिस शिष्टाचार को सिखाने में उस के मांबाप ने जान लगा दी, मार्गरेट उन में से एक का भी पालन नहीं कर रहीं थी।
  उफ़, मेज पर बैठते ही उन्होंने गिलास फूल की तरह सजा नेपकिन टांगों पर न बिछा कर बेदर्दी से मेज पर पटक दिया था। प्लेट के एक तरफ रखे हुए छुरीकांटे को उन्होंने छुआ भी नहीं था। सैंडविच हाथ में ले कर आराम से खा रही थीं।
  "ओह", वह झुंझला उठी। कहाँ तो वह कल्पना कर रही थी की मार्गरेट धीमे से खाने की मेज की कुरसी खिसका कर आहिस्ता से उस पर बैठेंगी। उँगलियों की पोरों से नेपकिन उठा कर अपनी टांगों पर फैला कर बातों के बीच धीमेधीमे सूप सिप करेंगी। बाद में नजाकत से छुरीकांटे से सेंडविच खाएंगी। खैर, इतना न सही, कम से कम पुडिंग की ही तारीफ़ कर दें।
  जब उस से रहा नहीं गया तब वह पूछ बैठी, "क्या आप को खाना पसंद नहीं आया?"
  "ऐसी बात नहीं है, सब चीजें बहुत स्वादिष्ट हैं। ख़ास तौर से यह पुडिंग, लेकिन हमें तो उम्मीद थी की आप के यहाँ आज तो पूरी, बटाटा वाली कचौरी व खीर खाने को मिलेगी। मुझ को तो वही पसंद आता है। घर में भी मैं रोटी बनाती हूँ। ब्रेड से अधिक पौष्टिक होती है।"
  उसे लगा उस के चेहरे का मेकप एकदम से किसी ने पोंछ दिया हो। वह तो तीन दिन से परेशान होती रही की कौनकौन सा यूरोपीय भोजन बनाए और मेम साहब हैं की अभी भी पूरी कचौरी के ज़माने में रह रही हैं।
  "एक दिन हम आप के घर पूरी कचौरी खाने फिर आएँगे। और हाँ, कल आप सुबह हमारे साथ नाश्ता करने आइये आप लोगों को हलुआ और पिजा बना कर खिलाऊँगी।" फिर वह शालीनता से नमस्ते कर के चल दीं।
  हलुआ और पिजा ! क्या अद्भुद संगम है, हिन्दुस्तानी और यूरोपीय खाने का। वह विस्मित थी। वह क्यों बावली बनी, पश्चिम सभ्यता के पीछे भागती जा रही है? क्यों नहीं उस ने समन्वय ढूँढने की कोशिश की? मार्गरेट का यह संतुलन सचमुच मोहक है।
  वह खिसियाई हुई बाहर जाती हुई मार्गरेट को देख रही थी। उस का मन हुआ की जोरजोर से चीख कर वह तीन दिन से रटे हुए अंगरेजी वाक्यों में कुछ हिन्दी वाक्य मिला कर उन्हें अंगरेजी में जोर से सुना दे।

                                                                                                                                                                             - नीलम कुलश्रेष्ठ

08 मार्च 2012

सफ़ेद पोशाक

आज भी मुझे वह दिन अच्छी तरह से याद है जब हम पहली बार सेक्टर 31 के बस स्टाप पर मिले थे।
"क्या आप बताएंगी की कौन सी बस सैक्टर 17 जाएगी?"
"10 नंबर."
चूंकि मुझे भी उसी बस में जाना था, इसलिए मैं भी उसी बस में चढ़ कर आगे निकल गई। न चाहते हुए भी मैं ने पीछे मुड कर देखा तो वह पीछे आ रहा था। सैक्टर 17 पहुँचाने तक बस काफी खाली हो चुकी थी और वह मेरी आगे वाली सीट पर आ कर बैठ गया था। सैक्टर 17 आने पर भी वह नीचे नहीं उतारा था। शायद उसे पता हे न था की सैक्टर 17 यही है। मेडिकल इंस्टीट्यूट आने पर मैं बस से उतरी। बस भी वहीं ख़त्म होती थी। अब वह कुछ परेशान सा दिख रहा था। बहरहाल, मैं अस्पताल के अन्दर चली गई।
    दूसरी सुबह मैं ने उसे फिर उसी स्टाप पर खडा पाया। मेरे नजदीक आते उस ने शिकायत सी की, "कल तो आप ने सैक्टर 17 आने पर बताया ही नहीं।"
    मैं ने भी करारा सा जवाब देते हुए कहा, "जनाब, आप ने बस नंबर पूछा था, यह नहीं पूछा था की सैक्टर 17 कहाँ है? उस ने महसूस किया की उस की शिकायत उचित नहीं थी। वह मुसकराने लगा।
    फिर उस ने बताया की वह फ़्लाइंग अफसर है, उस का कलकत्ता से चंडीगढ़ तबादला हुआ है। उस ने अपना नाम भी बताया, आशुतोष। मैं ने भी औपचारिकता निभाई और अपना परिचय दिया की मैं मेडिकल इंस्टीट्यूट में एम.एस. कर रही हूँ, यहाँ वायु सेना की बस्ती में अपने चाचा के पास रहती हूँ।
   कुल मिलाकर आशुतोष काफी अच्छा लगा था मुझे। आकर्षक व्यक्तित्व, सांवला रंग और बंगालियों के नैननक्श तो  वैसे भी जादू सा कर देते हैं। इस के अलावा वायु सेना के लोग मुझे हमेशा ही अच्छे लगे थे। झट जहाज से जहां से वहां। कितना अच्छा लगता होगा हवा से बातें करना, आकाश को छु सा लेना। बस आ गई और हम दोनों इकट्ठे ही बस में चढ़े और इकट्ठे बैठे भी।
   बातों ही बातों में उस ने बताया की वह चंडीगढ़ का दौरा करना चाहता है। कलकत्ता के भीडभरे शहर से चंडीगढ़ कहीं ज्यादा साफसुथरा और शांत शहर है। यहाँ के लोग भी उसे सभी और अच्छे लगे थे। यह भी बताया की वह 6-02 पर हफ्ते में तीन बार दिल्ली उड़ान पर जाता है। बाकी दिन वैसे ही अभ्यास करता है या फिर हवाई अड्डे पर काम करता है। इसी बीच सैक्टर 17 आ गया। मैं ने कहा "लो आ गया तुम्हारा सेक्टर 17। फिर न कहना बताया नहीं।"
"फिर मिलेंगे" यह कह कर वह नीचे उतर गया। सारे रास्ते मैं उस के बारे में सोचती रही। वह कितना अच्छा और चुस्त था तथा डीलडौल में लंबातगड़ा। जल्दी ही हम ने एकदूसरे का परिचय प्राप्त कर लिया था। उस की गहरी काली आँखें, उस का हंसने का मोहक अंदाज। सब कुछ अच्छा लगा था।
  उस के बाद हमारा मिलना आम बात हो गयी। या तो मुझे बस स्टाप पर मिल जाता या शाम को वायु सेना की बस्ती के बाजार में टहलता हुआ।
  एक दिन मैं ने उसे मेडिकल इंस्टीट्यूट आने का निमंत्रण दिया। करीब दो बजे वह आया। हम ने इकट्ठे कैंटीन में चाय पी। उस दिन आशु ने बताया की वह कलकत्ता में ही पढ़ा था। फिर एन.डी.ए. में चुन लिया गया। उस के पिता की मृत्यु हो चुकी थी। उस की मां उस के दादाजी के पास कलकत्ता में ही रह रही थी।
  "कनु, चलो कल 'कोमा' फिल्म देखें। वैसे भी यह तुम्हारे विषय के अनुरूप है।
फिर देखें कैसे तुम लोग मरीजों को 'कोमा' में रख कर उन के अंगों की तस्करी करते हो?"
  "आशु, मेरे व्यवसाय के खिलाफ ऐसी बात न करना। डाक्टर का पेशा ही सब से अधिक विश्वसनीय होता है।"
  "ठीक है। पर कल का कार्यक्रम पक्का रहा।"
  अगले दिन हम ने फिल्म देखी। फिर बाहर ही खाना खाया। अब मुझे लगने लगा था की न सिर्फ मैं ही उस के तरफ आकर्षित हूँ, बलिक आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी, रोज सुबह किसी न किसी बहाने बस स्टाप पर पहुंचना इस बात का प्रमाण था। एक दिन मैं ऐसे ही बस स्टाप पर आई तो एक मोटर साइकिल आ कर रूकी।
  "हैलो, कनु।"
  "अरे आशु, तुम। यह मोटरसाइकिल किस की है?"
  "अपन की, भई। मैं ने नई खरीदी है। मैं ने सोचा, रोजरोज अब हम से डाक्टर साहर के साथ बसों में धक्के नहीं खाए जाते। हम तो पहले ही घायल हैं। और अधिक घाया हो गए तो एंबुलेंस मंगवानी पड़ेगी। पडल भी नहीं चल पाएंगे।" उस की ऐसी बातें बहुत दिलचस्प होती थी। उस दिन हम मोटरसाइकिल पर खूब घूमें।
  "आशु, तुम मोटरसाइकिल बहुत धीरे चलाते हो।" मैं ने कहा।
  "अरे भी, आकाश में बहुत रोमांच है, इसलिए सड़क पर सावधान रहना चाहता हूँ। खासकर जब तुम मेरे साथ हो।"
  उस दिन हम ने मेडिकल इंस्टीट्यूट की कैंटीन में ही दोपहर का खाना खाया। इधरउधर कैंटीन में डाक्टरों को घूमते देख, आशु ने पूछा, "कनु, यह तेरे डाक्टर तो आजकर मुझ से खूब जलाते होंगे। इन में तेरा कोइ ख़ास प्रेमी तो नहीं है?"
  "मुझे तो इन डाक्टरों का सवभाव ही अच्छा नहीं लगता। पहले तो दोस्ती कर लेते हैं। फिर जब चाहे तोड़ देते हैं। जहां दाल न गले, वहां बहनभाई बन जाते हैं। जो सम्बन्ध होना चाहिय, वही बताना चाहिये। इसीलिए, ऐसे लोगों के साथ मैं होस्टल में न रह कर चाचा के पास रहती हूँ।"
  "डाक्टर साहब, तभी तो हम आप के दीवाने हैं।"
  "ओह, आशु। मुझे डाक्टर साहब कह कर मत बुलाया करो। मुझे अच्छा नहीं लगता।"
  "अच्छा भी," और अक्सर ऐसे मौकोंपर वह अपना फौजियों वाला सैल्यूट मार देता।
  "कनु, कल हमारे नए विंग कमांडर आने की खुशी में बहुत बड़ी पार्टी हो रही है, क्या आ सकोगी मेरे साथ?
   "चचा भी तो रात की ड्यूटी लगवा देते हैं। फिर चाची आएंगी ही नहीं। और तुम जगदीश की लडकी के साथ आने का बहाना कर लेना।"
  "हाँ, ऐसा ठीक रहेगा।"
  अगले दिन सुबह ही मैं ने अपना सफ़ेद सूट प्रेस किया। फेशियल किया, थ्रेडिंग की। नेल पालिश लगाई। एक सफ़ेद फूल की तलाश में मैं इस घर से उस घर, एक गली से दूसरी गली तक भटकती रही, पर अंत में सफल हो गयी। शाम को तैयार होते मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मैं आज आशु के लिए ही तैयार हो रही हूँ। बारबार इधरउधर जाते आइना देखती।
  निश्चित समय पर मैं वहां पहुँच गयी। आशु पहले से ही बाजार में खडा मेरा इंतज़ार कर रहा था।
  "कनु, जल्दी उठो, इतनी देर लगा दी। तुम्हे पता है मुझे वहां ठीक समय पर पहुंचना है। और तुम लडकियां बेकार में इतना वक्त खराब कर देती हो।"
  मुझे इतना गुस्सा आया। मैं ने सारी छुट्टी बननेसंवरने में लगा दी। और यह इतना खुदगर्ज है की इस से दो बोल तारीफ़ के भी नहीं कहे गए। जैसेतैसे गुस्सा पी गयी। आखिर हम मिस पहुँच गए।
  मिस का भी एक अपना ही माहौल होता है। हर तरफ खूबसूरत चुस्तदुरूस्त औरतें दिख रही थीं। कईयों के बाल कटे हुए थे। कईयों ने जुड़े बनाए हुए थे। सब फ़्लाइंग अफसर इधर से उधर मंडराते नजर आ रहे थे। मेरा हाथ पकड़ कर आशु मुझे अपने स्कवाडरन लीडर मानवेन सिंह की बीवी के पास ले जा कर बोला, "मालतीजी, मेरी दोस्त से मिलें। यह है कनु।"
  "हैलो, कैसी हो? तुम्हें बहुत अच्छा दोस्त मिला है। यह हमारे यहाँ का सब से बहादुर सैनिक है। आओ, मैं तुम्हारा परिचय कुछ और दोस्तों से करवाऊं।"
  वह मुझे ले कर जा रही थीं कि स्कवाडरन लीडर मानवें सिंह मिल गए।
  "अरे, मैडम, यह खूबसूरत लडकी कौन है?"
  "यह आशु की दोस्त है," मालती बोलीं।
  "बहुत खुशी हुई आप से मिल कर।"
  तभी विंग कमांडर और उन की बीवी आ गए। सब उधर व्यस्त हो गए। नाच का कार्यक्रम शुरू हो गया। मानवें सिंह मेरे पास आ कर बोला, "क्या मैं आप के साथ नाच कर सकता हूँ?" इस से पहले कि मैं कुछ कहती, वह मुझे लगभग खींचता हुआ नृत्य के क्षेत्र (डांस फ्लोर) पर ले गया। नाच के दौरान मुझ से कहने लगा, "तुम बहुत अच्छा नाच करती हो। मुझे आशु से ईर्ष्या हो रही है।"
  परन्तु इन सब बातों का मुझ पर कोई आर नहीं हो रहा था। मेरी आँखें तो इधरउधर आशु की खोज में भटक रही थीं। वैसे तो मैं मेडिकल कालिज की कई पार्टियों में शामिल हुई थी। वहां बड़ा अनौपचारिक माहौल होता था। परन्तु यहाँ के वातावरण में कुछ घुटन महसूस हो रही थी। हो सकता है कि यह शायद आशु की अनुपस्थिति के कारण हो या उस के रूखे रवैये के कारण।
  उसी वक्त मैं ने आशु को अपनी और आते देखा। शायद वह मुझे मानवें सिंह के साथ नाच करते सहन नहीं कर पा रहा था। वह मुझे खींच कर कोने में ले कर बोला, "कनु, तुम अपने आप को क्या समझती हो? तुन ने मानवें सिंह के साथ नाच करना स्वीकार क्यों किया? तुम्हें नहीं पता कि इन लड़कों पर विशवास नहीं किया जा सकता। इन से अपनी बीवियां तो संभालतीं नहीं, पर ये दूसरों की लड़कियों पर नजर रखते हैं। चलो, बाहर खाना खाएंगे यहाँ नहीं। वहीं चलते हैं जहां हम अकसर खाना खाते हैं।"
  मेरे आसुओं की धारा बहे जा रही थी। वह इधर ध्यान दिए बिना उस ने हेलमेट पहन ली। मोटरसाइकिल चालू कर के उस ने मुझे बैठने के लिए कहा। मैं पीछे बैठ गयी। आज पता चल रहा था कि वायु सेना वाले कितने कठोर होते हैं।
  रेस्तोरां पहुँचने पर मैं ने आसूं पोंछ लिए। आशु ने जल्दिजल्दी चीनी भोजन का आदेश दे दिया, जो कि मुझे बहुत पसंद था। फिर बोला, "कनु, नाराज हो?"
  अब तो जैसे सब का पैमाना छलक चुका था। मैं ने बहुत गुस्से में कहा, "आशु, मुझे पुराने विचारों वाले मर्द बहुत बुरे लगते हैं। मुझे तो खुले विचारों वाले मर्द बहुत पसंद है जो लोग इन चोतीचोती बातों से ग्रस्त नहीं होते। मुहे तुम से यह उम्मीद नहीं थी।"
  "मैं समझता हूँ, कनु। लेकिन पता नहीं क्यों आज जब तुम तैयार हो कर आईं और मुझ से मिलीं, तो इतनी अच्च्ची लग रही थीं कि मैं ने सोचा वहां ले कर न जाऊं। वे लोग कहीं तुम्हें मुझ से चीन न लें। मेरा मूड कहीं खराब न कर दें। मुझे तुम पर पूरा विशवास है। मगर मैं क्या करून, कनु? मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। मैं तुम से शादी करना चाहता हूँ। अब तो तुम्हारे बगैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मैं नहीं चाहता कि कोई और तुम्हारे साथ नाच करे। बताओ, मुझ से शादी करोगी?" वह यह सब एक सांस में कह गया। मैं स्तंभित सी उसी की और देख रही थी। कुछ भी बोला नहीं जा रहा था, जुबान खुल ही नहीं रही थी। अजीब स्थिति थी।
  "ठीक है। सोच लो कुछ दिन। ऐसे फैसले जल्दी नहीं करने चाहिये। पर इस बात का ख़याल करना की मैं तुम्हें जितना प्यार करता हूँ उतना तुम्हें चाहता भी हूँ। तुम्हें तो बताया ही है कि मैं छोटा सा था तो पिता चल बसे। मेरी मान ने ही मुझे इस योग्य बनाया है। तुम नहीं जानतीं कि मेरी माँ तुम्हें पा कर कितनी खुश होंगी। अरे बोलो न। मानवेन सिंह के नृत्य की याद आ रही है क्या?"
  "आशु, मजाक न करो।"
  "ठीक है, नूडल्स खाओ फिर।"
  "अच्छा यह बताओ कि यह सफ़ेद सूट कभी पहले क्यों नहीं पहना? तुम इस में बहुत अच्छी लग रही हो, पता है, बंगाली में ऐसी स्थिति में क्या कहते हैं, 'एई पोशाके तोमाके सुन्दर लागछे,' समझ आए क्या? और यह नन्हा सा फूल तो तुम्हारी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा है। यह सफ़ेद रंग तो तुम पर खूब फबता है। वैसे तो डाक्टरों का सफ़ेद रंग के कोट वगैरह से काफी सम्बन्ध होता है, परन्तु यह सफ़ेद पोशाक तो तुम पर कहीं ज्यादा अच्छी लग रहीए है। तुम्हें पता है सफ़ेद रंग पवित्रता की निशानी है। मैं आज की माँ को लिखूंगा कि तुम्हारे लिए ढेरों सफ़ेद सूत व सफ़ेद फूल और बाडर वाली साड़ियाँ खरीद लें।"
  उस के बाद मैं ने आशु को चाचाजी, माँ और पिता से मिलवा दिया। मेरे मातापिता सोलन रहते थे। जल्दी ही आशु ने घर में अपना स्थान बला लिया। चाचा के साथ घंटो राजनीति पर बहस करता था। चाची के साथ रसोई में चाय बनवाता, सलाद काट देता। सब कुछ अच्छा लगाने लग गया था। अब तो चाचा की रात की ड्यूटी भी करवाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। सब कुछ खुलेआम हो रहा था।
   अब मैं और आशु ख्यालों में ही घर के लिए तिनके इकट्ठे करने लग गए थे। ख्यालों में ही कभी कुछ खरीदते तो कभी कुछ बनवाते। आज मुझे सुबह सात बजे अस्पताल जाना था। मैं जल्दी ही बस स्टाप पर पौंच गयी। तभी आशु वहां आ कर बोला, "आज माँ 10 बजे की गाडी से आ रही हैं। मैं ने अभ्यास के लिए जाना है। तुम साढे नौ तैयार रहना। मैं मेडिकल इंस्टीट्यूट आ जाउंगा। फिर इकट्ठे ही स्टेशन चलेंगे। आज तो जनाब के लिए ढेरों सफ़ेद सूट और साड़ियाँ आ रही हैं। रोज घायल हुआ करेंगे। अच्छा, साढे नौ बजे मिलेंगे।"
  बस मैं यही सोचती रही कि कहीं आशु की माँ इनकार न कर दे। वह बंगाली और मैं पंजाबी। पता नहीं क्या होगा? मेरा दिल धकधक कर रहा था। पर फिर सोचा आशु के रहते हुए मुझे किस का दर।
  अस्पताल पहुँचने पर मैं ने वरिष्ठ सर्जन डा. सुखदेव के साथ वार्डों में मरीजों को देखने जाना था। डा. सुखदेव मरीजों में बहुत लोकप्रिय थे। हर मरीज से बात करना, उन्हें हंसना, उन का स्वभाव था। मुझे तो वह एक बेटी की तरह मानते थे। अभी वार्ड नं. तीन के पास पहुंचे ही थे कि डा. सुखदेव के लिए बुलावा आ गया कि एक विमान चालाक और उस के एक साहायक चालाक हवाई दुर्घटना में बहुत बुरी तरह घायल हुए हैं। मामला गंभीर है। डा. सुखदेव ने मुझे साथ चलने के लिए कहा। मेरे पैर अनायास किसी बही के कारण कांपने से लगे थे।
  कहीं यह आशु न हो। नहीं, नहीं, वह तो एक अच्छा विमानचालक है। धड़कते दिल से मैं आपरेशन थिएटर में पहुँची। यह क्या, आशु अचेत अवस्था में पडा था। साथ में सहायक विमान चालाक था। अन्य डाक्टर भी आ गए थे। आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगा था। डाक्टर सुखदेव के संभालने पर मैं ने उन्हें आशु और अपने संबंधों के बारे में बताया।
  उन के घायल, उपचार, एंबुलेंस आदि शब्द मेरे कानों पर हथोड़े चला रहे थे। मैं असमंजंस में पड़ी नसों आदि को इकट्ठे कर रही थी। पागलों की तरह हरेक को आपरेशन थिएटर की चीजें तैयार करने को कहती।
  परन्तु डाक्टर सुख्दें ने मुझे बुला कर कहा, "देखो, कनु, मामला बहुत गंभीर है। केवल चमत्कार ही उसे बचा सकता है। तुम एक डाक्टर हो। इसीलिये मैं तुम्हें सच्चाई से अवगत करा रहा हूँ। मुझे बहुत दुःख होगा अगर मैं उसे बचा न सका। आशा रखो। अब तो दुआ ही काम करेगी।"
  वायु सेना के कुछ लोग पहुँच चुके थे। आशु की नब्ज धीरेधीरे चल रही थी। खून काफी बह चुका था। दिमाग पर काफी गहरी चोट थी। मैं परेशान थी। परन्तु मैं ने फैअला किया कि माँ को मैं स्टेशन पर अकेले ही लेने जाउंगी। आशु की माँ को पहचानना इतना मुश्किल काम नहीं लग रहा था।
  पौने दस बजे मैं स्टेशन पहुँच गई। आज हर वास्तु नीरस लग रही थी। इदह्र उधर हँसते हुए लोगों को देख कर अच्छा नहीं लग रहा था।तकदीर ने कितना पलता खाया था। कहाँ इकट्ठे आने वाले थे। और अब तो शायद कुछ भी इकठ्ठा न हो पाए। ठीक 10 बजे गाडी रूकी। मेरी आँखें आशु की माँ को तलाश करने लगीं। तभी मैं ने एक बंगाली औरत को देखा। वह भी मेरी तरफ हे देख रही थी।
  "आप आशु की माँ?"
  "और तुम कनु?"
  "जी।"
अरे, जैसा लिखा था वैसी ही हो। कितनी सुन्दर। आशु क्यों नहीं आया? वह तो शुरू से लापरवाह है। कही वक्त पर नहें पहुंचता। पता नहीं जहाज कैसे वक्त पर पहुंचा देता है।"
  "माँ, आप पहले मेरे अस्पताल चलिए।" मेरे डाक्टर होने के नाते किसी बात के शक की कोई गुंजाइश नहीं थी।
  सारे रास्ते में कुछ बोल न पा रही थी यह बताने का साहस नहीं जुटा पा रही थी कि आशु क्यों नहीं आया। वह तो मौत और जिन्दगी के बीच झूल रहा था। यूं तो मैं ने हजारों मरीजों को घायल अवस्था में देखा था। परन्तु आशा। ओह, नहीं, मैं ने आखिर क्या किया था? जो मुझे यह दिन देखना पड़ रहा है।
  टैक्सी मेडिकल इंस्टीट्यूट पहुँचने पर मैं माँ को अपने कमरे में ही ले गई। वहां चाय पिलाई, कितने धैर्य से बैठी थीं। और तभी वहीं अपना सूटकेस खोलने लग गई और बोली, "लो कनु, मैं तुम्हारे लिय काफी सफ़ेद सूट व साड़ियाँ लाई हूँ। मैं ने तो आशु को समझाया था कि कोई सफ़ेद कपडे पहनने के दिन थोड़े ही हैं। फिर मैं ने सोचा कि यह जिद्दी है, लाडला है। न ले कर गई तो कहीं नाराज न हो जाए। तुम्हें तो बताया ही होगा कि इस के पिता के बाद अब यही एक सहारा है। इसलिए इस की हर बात माँ लेती हूँ। है भी तो कितना प्यारा और कितनी प्यारी बहू ढूंढी है उस ने?"
  वह अपनी धुन में मस्त, साड़ियाँ, सूट निकाले जा रही थीं, और बोले जा रही थीं। मेरा आसूं का बाँध टूट चुका था। जब उन्होंने मेरी हिचकियाँ सुनीं तो बोलीं, "अरे कनु, बेटी क्या हुआ? इतना क्यों रो रही है? वह अभी आ जाएगा, वह तो ऐसे हे करता है। आने दो आज कान खीचून्गी उस के।" कितना आत्मविश्वास था माँ को।
  और तभी डाक्टर सुखदेव ने आ कर वहीं खबर सुनाई जिस से साफ़ जाहिर था कि अब मेरी दुनियां में कभी बहार न आएगी। बहार का मौसम होने पर भी पतझड़ नजर आ रहा था। हर तरफ अँधेरा ही अन्धेरा लग रहा था।
  और माँ। माँ का जितना बड़ा दिल था उस से कहीं बड़ा सदमा। फिर भी मुझे धीरज बांधते हुए बोलीं, "मत रोओ, कनु। मैं ने तो आशा को पहले ही कहा था कि ये सफ़ेद सूट, ये सफ़ेद साड़ियाँ, क्या मैं अपनी बहू को मुंहदिखाई में दूंगी? मैं ने तो बेटी तुम्हें बिन ब्याही विधवा बना दिया।" वह मुझ से लिपट कर रो रही थीं और मैं एक बच्चे की तरह उन के कंधे पर सिर रखे हुए थी।
  शायद अब, हम दोनों का दुःख एक हो गया था।
   
                                                                                                                                                                              -अनुजा भाम्बी

27 सितंबर 2011

ठूँठ

जा मुन्नी, बुढऊ को चाय दे, आ हाथ में चाय का प्याला थमाती घृणा से मुँह फेरती बहू सुशीला ने कहा तो सुनकर पचासी वर्षीय वृद्ध मनीराम को कुछ पल के लिए हँसी आ गयी- आज एक राहगीर ने भी पूछा था- ऐ बुड्ढे, भीखू महाजन का घर किधर है? मनीराम सोचने लगा- तन कई वर्ष पुराना है तो सम्बोधन ही बदल गया, वह संज्ञा से विशेषण हो गया। आज उसे अपनी स्थिति एक जानवर से भी गई बीती लग रही थी। जिसका सम्बोधन आयु के साथ तो नहीं बदलता। मुन्नी के हाथ से चाय लेकर वह फिर वहीं बैठ गया। बीच आँगन में शेष ठूँठ के नीचे, यह उसके आँगन में था, अभी से नहीं बचपन से, बीच आँगन में नीम का एक विशाल पेड था। इसी के नीचे वह बैठकर पढता था, कुछ बडा हुआ तो खेत से थका-हारा लौटकर इसी के नीचे बैठ जाता और पत्तियों से छन-छनकर आती तृणमणि बनाती सूर्य-किरणों की अठखेलियों में खो जाता और विवाहोपरान्त, यहीं बैठकर रसोई में खाना बनाती, हाथ भर का घूँघट काढे पत्नी सुखिया को देखा करता था जो कभी-कभी घूँघट की आड में उसे देखकर मुस्करा देती थी, तो कभी शरमा जाती थी। मनीराम अतीत को सोचकर मुस्कराता रहता था। किन्तु भूतकाल के ही कुछ लम्हे उसे डराते थे। वह उन्हें याद करना न चाहता था। फिर भी वह सभी क्षण आँखों के सामने आ ही जाते और वह काँप जाता। वह उन लम्हों को इधर-उधर देख, ध्यान से हटाना चाहता था कि घर में बहू की सखी श्यामा की तेज-कर्कश आवाज सुनाई दी, बहू ने चटाई पर उसे बैठा लिया। श्यामा ने मुडकर सिर का पल्लू ठीक करते हुए, माथे को ढाकते हुए, खा जाने वाली नजर से मनीराम को घूरा फिर सुशीला से बोली- ये तुम्हारे बुढऊ ठीक हैं जो चुपचाप बैठे रहते हैं और हमारे बुड्ढे.. राम-राम, सुबह तीन बजे से उठकर बड-बड करते हैं, तो रात के दो बजे तक बडबडाते ही रहते हैं। चाहे कितना भी बुरा, भला कहो, दूसरे की सुनते ही नहीं। बस, अपनी ही कहते हैं पता नहीं- क्या सूझा मेरे बेटे को जो शहर से मशीन लाकर देने वाला है अपने दादा को सुनने के लिए। अब तुम्ही बताओ सुशीला, जब कुछ नहीं सुनते तो इतना बोलते हैं यदि सुनने लगे तो.. अब मुझे भी जबान दबाकर बोलना होगा- यदि बुढऊ ने सुन लिया और... मेरे बेटे से.. खैर.. इसकी भी मुझे कोई परवाह नहीं। आजकल की औलाद कौन अपनी है अच्छा... छोड ये सब, ये बता तेरे ये श्वसुर... नहीं श्वसुर को तो तूने देखा ही नहीं, ये दादा सौ तो पार कर गये होंगे। क्या मालुम.... कब तक यूँ ही ठूँठ से बैठे रहेंगे। बहू ने मुँह फुलाकर कहा। जाडा अपना प्रकोप पूरी तरह फैला चुका था। कई दिन तक हुई बारिश ने उसका सहयोग और कर दिया था। 

आज बारिश न थी फिर भी लगता था कि हड्डियाँ गली जा रही हैं। सामने वाले चबूतरे पर अलाव जल रहा था, हँसी ठहाके की आवाजें आ रही थीं। कभी वह भी, जब तक अलाव में कुछ गर्मी शेष रहती वह वहीं बैठा रहता था। न जाने कितनी, खेत खलिहान से लेकर समाज की अच्छी-बुरी बातें कहता व सुनता था। पास से पंडिताइन भावज निकलकर आतीं, तो मैं भौजी राम-राम कहता। बदले में वे ठिठोली करतीं, न जाने कितनी मजाकें करती हुई निकल जातीं। बस उनके गुलाबी हाथ पैर ही दिखते थे, चेहरा तो वह कभी दिखाती ही न थीं। होली पर रंग खेलने जाते तब भी नहीं। रंग डालने के बाद होली के ढेर से पकवान सामने रखकर चली जातीं। बिना आशीर्वाद दिये तो जाने ही न देतीं। यदि कोई भूल जाता तो कहतीं.. क्यों देवर जी, बिना आशीष लिये ही चले जाओगे। सब उनका सम्मान भी करते थे। जब दुनिया से गयीं तो अन्त में सभी ने उन्हेंश्रद्धांजलि दी थी उस निर्जीव काया को। अभी पंडिताइन भौजी याद आ ही रहीं थी कि अलाव में बैठे रामकिशोर ने आल्हा गाना शुरू कर दिया। मनीराम सुनकर बडबडाया ये रामकिशोरा लय तो ठीक ठाक ले जाता है किन्तु गाता गलत-सलत है। कल इससे कहूँगा जब इधर से निकलेगा कि पहले आल्हा ठीक से कंठस्थ करे, फिर सुर निकाले। मनीराम को एक झुरझुरी फिर आयी। फटा कम्बल उसने और कसकर लपेट लिया, क्या अच्छा होता अगर वह भी अलाव के पास गरम ताप ले रहा होता। किन्तु कैसे? अलाव तो तापना तभी से भयभीत लगने लगा था जब से बेटा नारायण को भरी जवानी में इस बूढे बाप ने आग दी। अलाव तापता तो नारायण के निर्जीव शरीर को भस्म करती आग की लपटें याद आ जातीं। कैसा रोग लगा नारायण बेटा को? उसे क्यों नहीं कोई रोग घेरने आया। रोग लगा तो बेटे को, वह भी क्षय रोग। अस्पताल का डाक्टर कहता ही रहा कि अब ये रोग लाइलाज नहीं, बस नियमित दवा व अच्छी खुराक देते रहना। जमीन एक मुकदमें में गिरवी चली गयी थी। उन्हीं गिरवी रखे अपने खेतों पर ही मजदूरी करके परिवार का पेट मुश्किल से भरता था। फिर दवा और अच्छी खुराक कहाँ से लाये। जब लाख प्रयत्न करता तब चार दिन की दवा का इन्तजाम हो पाता। छ: दिन बिना दवा के ही निकल जाते। जिसने किसी के सामने हाथ न पसारे हों उसे बेटे की दवा के लिए सभी के सामने हाथ पसारने पडते। सब मना ही कर देते सिवाय चौधरी के। फिर कितना क्षोभ होता मन को कि मैंने उधार माँगा ही क्यों? एक वर्ष का इलाज दो वर्ष चला, फिर भी नारायण न बच सका। अपने हाथों जवान बेटा सीने में ठूँठ सा धँसा लिया जो हर पल करकता रहता। नारायण की माँ व पत्नी गम न सह सकी। साल भर में दोनों चली गयीं और नारायण का ही दो साल का नन्हा बच्चा सीने से लगा कर पालता रहा। थोडा बडा हुआ कुछ जमात पढा फिर उसे करतार ड्राइवर ले गया अपने साथ ड्राइवरी सिखाने, अब वह ड्राइवर है। ट्रक चलाता है शहर में। जब कभी एक दो दिन को घर आ जाता है तब बेटे को उसमें ही देख आँखें ठंडी हो जाती हैं।

तोड़ना

बडे भाई के रोएं खडे हो गए थे। चेहरे पर डर, असमंजस और अनिर्णय के ऐसे मिले-जुले भाव थे, जैसे उसके सामने ही किसी की हत्या कर दी गई हो। कुछ मिनटो तक वह वैसे ही सन्न खडा रहा, जैसे निर्णय नही कर पा रहा हो कि क्या किया जाए। फिर उसके चेहरे की भंगिमा बदलती गई। अब वहां जो कुछ हुआ, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा की चाहना थी। उसकी आंखो मे लाल डोरे उभर आए थे। होठ फडक रहे थे। मै समझ गया कि क्या होगा। हुआ वही। उसने अपने दाएं हाथ से मेरे केशो को पकडा और उसका बायां हाथ तडातड मेरे गालो पर पडने लगा। फिर उसने ढकेल कर मुझे जमीन पर गिरा दिया। मैने भी एक-दो हाथ चलाए थे, लेकिन भाई ने उसे अपने मजबूत हाथो के ढाल से बेअसर कर दिया था। अंतत: मै जमीन पर पडा-पडा गालियां बकने लगा। उसने मेरी गालियो को अनसुना कर दिया और पास ही जमीन पर पडी उस मूर्ति को उठाकर देखने लगा। उसके चेहरे पर असीम पीडा का भाव छा गया। जैसे अपने बच्चे की लाश देख रहा हो। उस कछुए की गर्दन टूट कर एक किनारे शांत पडी हुई थी। काली स्याही से रंगी पीठ भी जगह-जगह से फट गई थी और अब पीली मिट्टी साफ दिख रही थी। जैसे रेगिस्तान मे खडे आदमी का भ्रम टूटा हो, जादूगर का जादू खत्म हो गया हो। मुझे लगा भाई रो पडेगा, लेकिन वह रोया नही। बस सुन्न-सा उस टूटी मूर्ति को कुछ देर निहारने के बाद धीरे से वही पटक दिया। आखिर मैने इसे बनाया ही क्यो था..? उसके मुंह से एक आह फूटी थी। वह तेज कदमो से चलता हुआ गैरेज से निकला और घर की ओर बढ गया। धीरे-धीरे अपने हाथ-पैर और कपडो मे लगी धूल झाडता हुआ मै उठ खडा हुआ। इस पंद्रह मिनट के अंतराल मे जो कुछ हुआ था तीन दिन पहले तक हम उसकी कल्पना भी नही कर सकते थे। सब कुछ कितना अप्रत्याशित था। भाई का मुझे डांटना, उसका दुखी होना..। 

अब मुझे दुख हो रहा था। भाई की आह मेरे आसपास चक्कर काट रही थी। उस आह को मै अपने अगल-बगल ढूंढने लगा, लेकिन वह नही मिली। कुछ क्षण के बाद मैने अपने से तीन चार फर्लाग दूर उस टूटी हुई मूर्ति पर नजर दौडाई, तो देखा- वह आह वहां जा चिपकी थी। मै समझ नही पा रहा था कि अचानक मेरे भीतर वह कौन-सा तूफान उठ खडा हुआ था। एक ऐसा आवेग, जिसे रोक पाना किसी भी हालत मे संभव न था। शायद वह आत्मीयता की शक्ति थी, अपने बेकाम होने की कुंठा थी। मैने रचने की कोशिश की थी, लेकिन रच नही पाया था इसलिए दूसरे की रचना नष्ट कर उसे अपने समानांतर खडा करने की दुष्ट कोशिश की थी।

पास के बाजार मे सडक किनारे फुटपाथ पर दशहरा और दीपावली मे ढेर सारे रंग-बिरंगे खिलौने बिकने के लिए आते थे। न जाने क्यो इन मूर्तियो को देखकर मेरा मन सतयुग की अतल-असीम गहराइयो मे डूबने उतराने- लगता है। मां और दादी से सुनी रामायण की अनंत कहानियों से अहिल्या का कल्पित चेहरा झांकने लगता है, जो रामजी के पांवो से ठोकर खाकर जीती-जागती स्त्री बन गई थी। निर्जीव से सजीव हो उठी थी। उन दिनो हमे सचमुच यह विश्वास नही हो पाता कि बेरूप की मिट्टी से भी इतने सुंदर रूपाकार गढे जा सकते है। गांव मे मैने कुम्हारो को देखा था और यहां बसंत-पंचमी के पहले ज्ञान और विद्या की आराध्यदेवी मां सरस्वती की मूर्तियां बनाने वाले कारीगरो को भी। यह देखकर हैरानी होती है कि उनके चेहरे, वेशभूषा आदि एक ही जैसे होते है। कडी, धनी, धनुषाकार मूछे, सांवला चेहरा, चौकन्नी आंखे, चेहरे पर चेचक के दाग और पुरानी धोती-कुरते मे लिपटी नाटी काया। मै अक्सर सोचता, भले ये कुरूप होते है, लेकिन इनके अंतर मे जरूर कोई ऐसी सुंदरता या दैवी शक्ति होती है, जिस कारण यह मिट्टी से इतने सुंदर और सजीव रूपाकार गढ लेते है। हमारे घर से तीस-चालीस फर्लाग की दूरी पर पीली चिकनी मिट्टी का एक ढेर था, जिसे हम मिट्टी की पहाडी कहते थे। दीवाली के घरौदे बनाने के लिए हम कई बार यही से मिट्टी खोद कर ले गए थे। 


गर्मियो के दिन थे। दोपहर को चारो ओर उमस और एक अजीब-सी मनहूसियत छायी रहती। हम घरो मे दुबके होते और बाहर सायं-सायं करती लू चलती रहती। एक दिन दोपहर जब गर्मी और उमस उतनी ही थी, वैसी ही धूल उडाती लू चल रही थी, हम दोनो भाई एक पुराना थैला लिए उस मिट्टी की पहाडी की ओर जा रहे थे। हमने मिट्टी खोदी और थैला भरकर गैरेज मे आ गए। बडे भाई की सक्रियता बढी। वह कही से ढूंढकर टीन का एक डब्बा ले आया और थैले की सारी मिट्टी उसमे उलट दी। फिर उसने मुझे एक पुराना प्लास्टिक का मग देकर उसमे पानी भर लाने को कहा। जब मै मग मे पानी भरकर लाया तो टीन मे मिट्टी के अनुपात मे पानी डालकर वह उसे तन्मयता से आटा जैसा गूंधने लगा। जब मिट्टी और पानी पूरी तरह एक-दूसरे मे मिल गए, तो मै दंग रह गया। मिट्टी पानी से ज्यादा चिपचिपा न होकर गुंधे हुए आटे की तरह ठोस हो गया था। इतना सही अंदाजा। मै सोच भी नही सकता था। मैने भाई के चेहरे को देखा। भाई का रंग सांवला था। माथे के ऊपर केशो से पसीने की मोटी-मोटी बूंदे कान और गालो पर टपक रही थीं। मुझे उसका चेहरा उन्ही कुम्हारो और कारीगरो जैसा लगा, जो मेरे लिए हमेशा रहस्य और जुगुप्सा का विषय रहे है। मै कभी उसका चेहरा, कभी मिट्टी पर घूमते उनके हाथो को देखता रहा। उसने मिट्टी का एक बडा-सा गोला बनाया और उसके अगले भाग पर दाएं हाथ की उंगलियो से हल्का-हल्का जोर देकर डंडा जैसे आकार निकालने लगा। फिर उस गोले को धीरे-धीरे दबाकर बहुत बारीकी से फैलाने लगा। अब वह गोला एक स्पष्ट आकृति ग्रहण करने लगा था। थोडी देर और लगे रहने के बाद भाई ने उस गोले को कछुए की देह और उस डंडे को उसकी गर्दन का आकार दे दिया। आंखो की जगह उसने दोनो तरफ दो गोल-छोटे चमचमाते हुए शीशे लाग दिए और गर्दन के नीचे और पीछे वैसे ही खीचकर चार टांगे बना दीं।

24 सितंबर 2011

मास्टर जी


मास्टर जी का असली नाम क्या था वे कहां के रहने वाले थे वे कब उस गांव में आये यह बहुत कम ही लोग जानते थे, सारा गांव उन्हें मास्टर जी के नाम से ही जानता था। कारण यह था कि मास्टर जी ने उस गांव की दो तीन पीढियों को पढाया था, इसलिये वे बच्चों से लेकर उनके पिताओं तक के लिये भी मास्टर जी ही थे। उनके विषय में गांव में लोगों के अलग-अलग विचार थे कोई उन्हें पागल कहता था तो कोई जीनियस, लेकिन उससे मास्टर जी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडता था। छठवें दशक में नौकरी के प्रारंभिक दिनों में जब मास्टर जी अवध के उस पिछडे गांव में प्रायमरी स्कूल के प्रधान अध्यापक बनकर पहुंचे तो वह गांव उन्हें इतना भाया कि वे वहीं के होकर रह गये। लेकिन पहले दिन जब वे स्कूल पढाने पहुंचे तो वहां की दशा देखकर उनका दिल भर आया, एक मडैया के सामने महुये के पेड के नीचे बिछी बोरियों पर आडे तिरछे बस्ते पडे हुए थे और बच्चों का एक झुंड कुछ दूर पर मनोयोग से कबड्डी खेलने में लीन था। मास्टर जी को देखकर झुंड में हलचल मच गई और सब चिडियों की तरह फुर्र से उड कर अपनी सीट पर आ डटे। सरकारी टाटपट्टी और मेज कुर्सी के बारे में पूछने पर पता चला वो सब परधान के घर की शोभा बढा रही थीं। मास्टर जी ने पढाई कराने से पहले बच्चों को लगाकर महुये के पेड से गिरी पत्तियां बिनवाई और मडैया के सामने की सफाई कराई। स्कूल के इतिहास में पहली बार प्रार्थना जैसी दुर्लभ चीज गाई गई- हे प्रभो आनन्द दाता, और फिर मास्टर जी ने खटिया पर बैठकर पढाना शुरू किया।

   कुछ दिन तो मास्टर जी खामोश रहे फिर वे धीरे-धीरे अपने रंग में आने लगे बच्चों को सख्त हिदायत दी गई कि खडिया से तख्ती पोतकर स्याही से लिखने के बजाय घर के दिये में जो कालिख होती है उससे तख्ती पोती जाय और दावात में खडिया घोलकर लिखा जाये तो खडिया की बरबादी नहीं होगी। पढने में कमजोर बच्चों को फैशन में देखकर मास्टर जी फौरन दहाड लगाते, क्यों रे जितना टाइम बाल की पाटी बनाने में लगाया उतनी देर में तो एक हिसाब हल हो सकता था। हिसाब की बात पर ध्यान आया कि हिसाब में मास्टर जी का कोई जोड नहीं था पाइथागोरस की तरह गणित सिखाने के उनके अपने सिद्धांत थे। उनके अनुसार गणित बिना मार खाये आ ही नहीं सकती। इसलिए वे बच्चों को गणित में पारंगत करने के लिये एक गीली नीम का गोदा हमेशा अपने साथ रखते थे, जिसका नाम उन्होंने रख छोडा था समझावनदास। समझावनदास मास्टर जी को बहुत प्रिय थे और उनका इस्तेमाल बच्चों का दिमाग तेज करने के लिये दिन में कई बार अक्सर किया जाता था। मास्टर जी के छात्र उनसे बाघ की तरह डरते थे जिसमें निर्विवाद रूप से उनके सोटे का खासा योगदान था। लेकिन वे उनकी इज्जत भी करते थे क्योंकि मास्टर जी धुनाई और पढाई दोनों ही निष्काम भाव से करते थे।

   मास्टर जी के पढाने का ढंग भी निराला था एक बार किसी की खोपडी में सोंटे के बल पर जो विद्या वे घुसा देते थे वह जिंदगी भर शिव की जटा में गिरने वाली गंगा की तरह बाहर निकलने का रास्ता भूल जाती थी और कुंडली मारकर वहीं पडी रहती थी। मास्टर जी को अपने बारह तेरह साल पहले आजाद हुये देश पर भी बहुत गर्व था। उनका एक प्रिय तकिया कलाम था चूंकि अब देश आजाद है जिसका वे बात-बात में इस्तेमाल करते थे। हिंदी भाषा के सूर, तुलसी, कबीर के पद उन्हें मुंहजबानी कंठस्थ रहते थे किंतु अंग्रेजी के वे प्रबल आलोचक थे। उनके हिसाब से यह एक अवैज्ञानिक भाषा थी जिसका वे खुलकर मजाक उडाते थे। सायकोलॉजी की स्पेलिंग बताते थे पिसाई का लोगी, नालेज की स्पेलिंग टिप्स देते कनउ लदिगे। इतिहास के बारे में भी उनकी सूझ नितांत मौलिक थी, कभी-कभी वे बच्चों से पूछते, बच्चों बताओ कौन महान था, राणाप्रताप या अकबर? तो बच्चे चकरा जाते। मन राणा प्रताप को महान मानता लेकिन इतिहास अकबर को महान बताता था। कोई बच्चा बहुत दिमाग लगाकर अगर जवाब देता, मास्टर जी, दोनों। तो तड से उसकी पीठ पर डंडा पडता क्यों बे, दोनों एक साथ कैसे महान हो सकते हैं! मास्टर जी विदेशी जीवन शैली के घोर विरोधी थे। अपने देश की परंपरा और संस्कृति एवं अपने देशीपन पर उन्हें हद तक प्यार था।

   क्रिकेट, हॉकी उनके अनुसार पैसे की बरबादी थी। वे बच्चों को समझाते कबड्डी खेलो, दौड लगाओ, खो खो खेलो, इससे फेफडों का व्यायाम होगा और मां बाप का पैसा बचेगा। सत्तू को वे दुनिया का सबसे पौष्टिक फास्ट फूड मानते थे, उनके अनुसार गर्मी में घोल कर पीने पर सत्तू तरावट देता है और सर्दी में लिट्टी में भर कर खाने पर शरीर में गर्मी रहती है। मास्टर जी सिर्फ सलाह ही नहीं देते थे अपने ऊपर उसका एक्सपेरीमेंट भी करते थे। अपनी पुरानी घिसी धोतियों से वह मुलायम कथरियां बनवाते थे। उनके अनुसार गर्मियों में जो सुख कथरी पर लेटने में मिलता था वह रुई के गद्दे में कहां और बेकार धोतियों का उपयोग भी होता है। फूलों से उन्हें विशेष लगाव था उन्होंने मडैया के अगल-बगल क्यारियां बनवाई। उनमें गेंदा, गुलमेंहदी के फूल लगवाये जिसमें एक घंटे बच्चों को श्रमदान करना अनिवार्य था। उस ग्रामीण स्कूल में पढाते हुए मास्टर जी ने कैसे अपने छात्रों के शिक्षक के साथ-साथ गांव वालों के अभिभावक का भी दर्जा प्राप्त कर लिया यह कहना मुश्किल है। किन्तु देखा यही जाता था कि छात्रों के माता पिता शिक्षा के अलावा शादी ब्याह, खेती-बारी, हारी- बीमारी, दवा दारू के बारे में भी मास्टर जी से सलाह मांगने आते जिसका वे खुशी-खुशी निदान करते।

   इसी प्रकार समय का चक्र चलता रहा। कितने ही बसन्त, पतझड आए और चले गए। धीरे-धीरे मास्टर जी के पढाये हुए बच्चे बडे होकर जीवन की राहों में जूझने के लिए बिखर गए और मास्टर जी के पास पढने वाले बच्चों की नई-नई खेपें आती गई। मास्टर जी ने अब प्राइवेट परीक्षा देकर इंटर और बी.ए. कर लिया था। पुराना प्रायमरी स्कूल हाई स्कूल हो गया था जिसे वे हमेशा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कहा करते थे। अब वे बूढे हो रहे थे और स्कूल में उनका वह जलवा नहीं रह गया था। गांव में अब कबड्डी, खो-खो नहीं खेला जाता था, बल्कि जमीन में डंडियों का विकेट गाड कर बच्चे क्रिकेट खेलते। स्कूल के छात्रों में अब अधिक संख्या ऐसे उद्दंड बच्चों की थी जिनके लिये अब बूढे मास्टर आउटडेटेड हो चुके थे। उनकी डांट सुनकर वे व्यंग्य से हंसते थे और मास्टर जी बिना विष के ढोंढवा सांप जैसे फुफकारते रहते थे। किन्तु एक दिन जब मास्टर जी ने सुना स्कूल के ऊंची क्लास के कुछ लडकों ने साप्ताहिक बाजार में माल बेचने जा रहे एक सीधे साधे व्यापारी का गल्ला लूटने की योजना बनाई है तो उनके सब्र का बांध टूट गया और वे अपनी उम्र और सहकर्मियों की चेतावनियों को नजरअंदाज कर घटनास्थल पर पहुंच गए। वहां अपने स्कूल के आधा दर्जन लडकों को देख मास्टर जी क्रोध से आग बबूला हो गए। उन्होंने रौद्र रूप धारण कर सबको रेस्टीकेट करने की धमकी दी, तो अभियुक्तों के चेहरे भय आशंका और क्रोध से विवर्ण हो गये। उन्होंने एक दूसरे को कनखियों से देखा, यह बुढ्डा यहां क्यों मरने चला आया? आंखों ही आंखों में इशारे हुए इसे छोडना नहीं है। इन इशारेबाजियों से अनभिज्ञ बुजुर्ग मास्टर ने जब छात्रों को सजा देने के लिए हाथ उठाया तो छात्रों के हाथ मार खाने के लिये आगे बढने के बजाय ऊपर उठे और उनका सोंटा बीच में ही पकडकर उन्हें नीचे गिरा दिया और उन पर हाकियों की बौछार होने लगी। नीचे गिरते हुए मास्टर जी ने धुंधली आंखों से देखा और आंखें मूंद लीं। बाद में जब लोग उधर पहुँचे तो देखा मास्टर लहूलुहान अर्धनग्न अवस्था में जमीन पर पडे थे, आंखें सदमें से फैली हुई थीं, नाक मुंह से बहा हुआ खून चेहरे पर सूखकर ऐसा लग रहा था जैसे भारत के मानचित्र पर लाल रंग से गंगा जमुना उकेरी गई हो। लोगों को देख कर उनके होंठों में हरकत सी हुई और फुसफुसाहट जैसी धीमी किन्तु स्पष्ट आवाज सुनाई दी, अब देश आजाद है उसके बाद वे बेहोश हो गए।

22 अगस्त 2010

प्यार का इंटरव्यू ( Interview of Love )


पनी बचपन की सहेली सावित्री से फोन पर बातें करने के बाद कौशल्या ने अपने बेटे विवेक से बड़े उत्साहित अंदाज में उस की शादी का जिक्र छेड़ा.
" तेरी शादी मैं ने पक्की कर दी है, "
कौशल्या ने चौकाने वाले अंदाज में वार्तालाप आरम्भ किया.
" कब ? कहाँ ? किस से ? " सोफे पर बैठा विवेक उछल  कर खडा हो गया.
" यों मेमने की तरह मत  कूद. तुम्हें अच्छी तरह से पता है की मैं ने तुम्हारा रिश्ता किस से पक्का किया होगा."
" सावित्री आंटी की बेटी पूनम से? "
" क्या उस पूनम से, जिसे मैं ने कभी देखा नहीं है?. "
" देखा कैसे नहीं है. अरे, बचपन में तुम दोनों खूब साथ खेले और झगड़े हो. "
" माँ, इस सारी बात को हंसीमजाक में मत लो. बड़े होने के बाद हम कभी मिले नहीं हैं. फिर हमारी शादी कैसे तय हो सकती है? "

" तुझे याद नहीं, पर करीब 5 साल पहले तुम पूनम से एक शादी में मिले थे. खैर, वह लडकी लाखों में एक है. फिर उस की माँ से मैं ने बरसों पहले वादा किया था की पूनम को अपने बेटे की बहू बना कर लाऊंगी. मैं अपने वचन से मुकरना नहीं चाहती हूँ, मेरे लाल, " कौशल्या ने अपनी बात मनवाने के लिये भावुकता का सहारा लिया.
" माँ, शादी जिन्दगी भर का रिश्ता है और बिना जानेपहचाने मैं कैसे किसी लड़की से शादी करने को 'हाँ' कह सकता हूँ? "
विवेक ने चिढ़े अंदाज में विरोध प्रकट किया.
" अरे, तो उस से जानपहचान कर ले न. "
" कैसे? "
" वह मेरठ में होस्टल में रह कर पढ़ रही है. दिल्ली से 2 घंटे का रास्ता है. जा कर इस रविवार को पूनम से मिला आ. "
" ठीक है. मैं उस का इंटरव्यू ले कर आता हूँ. अगर वह मुझे पसंद नहीं आई तो तुम अपनी जिद छोड़ देना. "
" वह तुझे जरूर पसंद आएगी. "
'देखता हूँ, ' मन ही मन पूनम को रिजेक्ट करने की ठान कर विवेक वहां से उठ कर अपने कमरे में आ गया.

वेक पूनम का इंटरव्यू लेना चाहता है, यह बात कौशल्या से सावित्री तक और फिर सावित्री ने उस की बेटी पूनम तक फोन के माध्यम से पहुँची.
" वह कोई मुझे नौकरी  दे  रहा है, जो मेरा इंटरव्यू लेगा, " पूनम कौशिक ने अपनी हमनाम सहेली पूनम गुप्ता के सामने अपना गुस्सा प्रकट किया, "इस घमंडी विवेक से मेरा मिलने का बिलकुल मन नहीं है. "
" लेकिन अपनी माँ की जिद के कारण उस से मिलना तो पडेगा ही तुझे, " पूनम गुप्ता ने नकली सहानुभूति प्रकट की.
" यही तो मेरी मजबूरी है. "
" यह तो तेरी सिर्फ पहली मजबूरी है, "
पूनम गुप्ता ने इस बार उसे शरारती अंदाज में छेड़ा.
" क्या मतलब है तेरी इस बात का ? "
पूनम कौशिक चौंकी.
" माई डियर पूनम, यह मत भूल की दिल ही दिल में तू पिछले 5 सालों से उसे चाहती है. उस शादी में हुई मुलाक़ात से पैदा हुई प्रेम की भावनाएं 5 साल के समय में कमजोर नहीं पडी हैं. "
" ऐसी कोई बात मेरे दिल में नहीं है," पूनम कौशिक के इस इनकार का झूठ  उस के गुलाबी हो चले गालों से साफ़ जाहिर हुआ.
" फिक्र करने की कोई बात नहीं है, मेरी जान. तू इंटरव्यू में जरूर पास हो जाएगी. तेरे सपनों का शहजादा तुझे मिल जाएगा, " पूनम गुप्ता ने उसे फिर छेड़ा, तो उस की सहेली का गुस्सा फिर से भड़क उठा
" यह 'इंटरव्यू' शब्द मेरे दिल में कांटे सा चुभ रहा है. वह घमंडी जीवनसाथी ढूँढने आ रहा है या फायदेनुकसान का सौदा करने ?
मैं जरूर बताऊंगी उसे की इंटरव्यू कैसे लिया जाता है, " पूनम कौशिक अपनी सहेली के सामने काफी देर तक उबलने के बाद भी शांत नहीं हुई थी.
रविवार की सुबह 10 बजे के करीब विवेक पूनम कौशिक के होस्टल के गेस्टरूम में बैठा था, जब 2  खूबसूरत युवतियां उस से मिलने आईं. एक ने जींस और लाल टॉप पहन रखा था और दूसरी ने हरे रंग का सूट.

ड़े हो कर उन का स्वागत करते हुए विवेक ने उन की मुस्कराती नमस्ते का जवाब बड़े गंभीर अंदाज में दिया. इन दोनों के बैठने के बाद वह उन के सामने बैठ गया.
कुछ देर की बेचैनी भरी खामोशी के बाद विवेक ने ही वार्तालाप आरम्भ किया, " आप दोनों में से पूनम कौन है ? "
" यह है, " सूट वाली ने अपनी सहेली की तरफ हँसते हुए इशारा किया.
" यह भी है, " जींस वाली लड़की शरारती अंदाज में मुस्कराई.
" क्या आप दोनों पूनम हैं ? " विवेक उलझन का शिकार बन गया.
" हम जूठ क्यों बोलेंगी ? " जींस वाले के इस जवाब पर दोनों सहेलियां अचानक हंसने लगीं, तो विवेक की आँखों में बेचैनी के भाव उभरे.
" जी, मैं सावित्री आंटी की बेटी से मिलने आया हूँ. "
" हम दोनों ही उन की बेटियाँ हैं,
इंजीनियर साहब. आप हम दोनों का इंटरव्यू लीजिये. हम में से जो पसंद आए, उसे चुन लेना. अगर 'वैराइटी' उपलब्ध हो तो चुनने का मजा बढ़ नहीं जाएगा ? " हरे सूट वाली  ने दोस्ताना लहजे में सवाल पूछा.
" हम दोनों का एकसाथ इंटरव्यू लेने में आप को कोई एतराज या परेशानी है ? " जींस वाली लडकी ने बड़े भोलेपन से पूछा.
" नहीं, पर सावित्री आंटी की असली बेटी की अगर पहचान... "
" जनाब, इस असलीनाकली के चक्कर को गोली मारिये और इंटरव्यू शुरू कीजिये, "
जींस वाली बड़ी अदा से तन कर सीधी बैठ गई.
" आप हम दोनों के बारे में जो भी जानना चाहें, वह बेधडक पूछें. शादी के मार्केट में हमें बिकने और आप को खरीदने का अनुभव करने का यह अच्छा अवसर है, " सूट वाली की आवाज में व्यंग का कोई भाव मौजूद नहीं था.
" मैं यहाँ कुछ खरीदने नहीं आया हूँ, "
विवेक कुछ नाराज और परेशान सा नजर आया.

क यूं, सर. झूठा ही सही, पर हमें मानसम्मान का एहसास कराने के लिये हमारे दिलों से निकला 'धन्यवाद' स्वीकार करें. "
" मुझे ऐसा क्यों लग रहा है की आप दोनों मेरा मजाक उड़ा रही हैं, " माथे पर बल डाल कर विवेक ने उन दोनों को घूरा.
" तौबा, तौबा, " जींस वाले ने अपने कान पकडे.
" हमारी ऐसी मजाल कैसे हो सकती है, इंजीनियर साहब ? हम इस इंटरव्यू के प्रति पूरी तरह से गंभीर हैं और दिल से चाहती हैं की आप यहाँ से खाली हाथ न लौटें, " सूट वाली ने गंभीर नजर आने की मजाकिया कोशिश शुरू की तो विवेक मुस्कराए बिना नहीं रह सका.
" अरे, इंजीनियर साहब, खुश नजर आ रहे हैं. मौके का फायदा उठा और ज़रा मेरे गुणों का बखान कर मेरी मार्केट वैल्यू बढ़ाना, " जींस वाले ने अपनी सहेली के पेट में उंगली घुसा कर प्रोत्साहित किया.
" मेरी सहेली की खूबसूरती पर कविता लिखने वाले मजनुओं की हमारे कालेज में कोई कमी नहीं है, सर, " सूट वाले ने अपनी सहेली की तारीफ़ नाटकीय स्वर में शुरू की, " उन्हें अपनी उँगलियों पर नाचने के साथसाथ खुद भी बढ़िया नाचती है. आप ने कोयल की कूक सुनी है ? "
" हाँ. "
" बस, वैसी ही मीठी आवाज है इस की. इसे चुनिए और जिन्दगी भर संगीत और नृत्य का आनंद घर बैठे उठाइए. "
" यह कोयल की तरह से कूकती है ? "
विवेक मुस्कराया.
" बिलकुल. "
" मैं इन से शादी के लिये 'हाँ' तो कर दूं, पर इन्हें बेकार के कष्ट में नहीं डालना चाहता हूँ. "
" किस कष्ट की बात कर रहे हैं आप ? "
" कोयल की कूक पास के बाग़ में लगे ऊंचे पेड़ों की तरफ से आती है तो मन खुश हो जाता है. अब रोज सुबह आप की सहेली को कभी इस पेड़ तो कभी उस पेड़ पर चढ़ कर कूकना पडेगा, तो.... बात कष्ट देने वाली है न ? " उस की मजाक उड़ाने वाली बात सुन कर दूं सहेलियों ने तरह तरह के सादे से मुंह बनाए तो विवेक खिलखिला कर हंसा.
" मैं 'इंटरव्यू' की गंभीरता को बनाए रखने के लिये मुद्दे की बात फिर से आगे बढ़ाती हूँ, " जींस वाली लड़की ने नकली गुस्सा प्रदर्शित करते हुए विवेक को घूरा और कहा, " मेरी सहेली कालेज की पी.टी. उषा है. यह इतना तेज दौड़ती है की आज तक कोई भी युवक इसे अपने प्रेमजाल में फांस नहीं सका है. उम्दा खाना बनाने का शौक है. खाती भी शौक से है, पर दुबलीपताली बने रहने की खातिर अक्सर जानबूझ कर खाना जला देती है. इसे चुनिए और जिन्दगी भर चुस्तदुरूस्त बने रहने की आजीवन चलने वाली गारंटी पायें. "
" शादी हो जाने के बाद अगर यह अन्य लड़कियों की तरह मोटी होती चली गई, तो मैं क्या करूंगा ? " पूरे मूड में आ कर अब विवेक भी हलकेफुलके अंदाज में बातें करने लगा.
" जनाब, शादी के मार्केट में आजकल कितना कम्पीटीशन है, यह तो आप जानते ही हैं. यह मोटी हो जाए तो इसे वापस करने का आप को पूरा अधिकार होगा. आप को सौदे में नुकसान नहीं होगा, " जींस वाली लड़की व्यंग भरे अंदाज में मुस्कराइए.
" एक बात बताएंगी ? "
" पूछिए. "

दी के मार्केट में एक के साथ एक फ्री वाला आफर आप दें, तो मेरी सारी उलझन समाप्त हो जाए और मैं आप दोनों.... नहीं, नाराज मत होइए. मैं ने तो यों ही पूछ लिया था, " बड़ी मुश्किल से विवेक अपनी हंसी रोक पा रहा था.
दोनों लड़कियां अपनी कैसी भी प्रतिक्रया व्यक्त कर पातीं, उस से पहले ही 2 लड़कियों ने कमरे के अन्दर झांका. दोनों की आँखों में उत्सुकता और शरारत भरी चमक मौजूद थी.
" अरे, कोई पसंद आई ? कैसा चल रहा है इंटरव्यू ? " उन में से एक ने सवाल पूछा.
" अभी तो इंजीनियर साहब हम दोनों को ही चुनने का लालच दिखा रहे हैं, जींस वाले लड़की ने मुंह बनाते हुए जवाब दिया. "
" जल्दी से 'हाँ' या 'न' कराओ.
इंटरव्यू देने को तैयार बाकी लड़कियां बेचैन हो रही हैं, " उन दोनों ने विवेक की तरफ एक बार भी नहीं देखा और वाहाँ से चली गईं.
" कौन सी लडकियां बेचैन हो रही हैं ? "
विवेक ने चौंकते हुए सवाल किया.
" आप जैसे सुन्दर, स्मार्ट और काबिल लडके आसानी से कहाँ मिलते हैं, जनाब आप की सेवा में हाजिर हो कर इंटरव्यू देने के लिये हमारा आधा होस्टल तैयार खडा है, " जींस वाली लड़की की आवाज फिर व्यंग से भर उठी.
" आप अपने बारे में कुछ बता देते तो बड़ी कृपा होती, " सूट वाली ने विनती सी की.
" मैं उतना बुरा और नासमझ इंसान नहीं हूँ जितना आप दोनों मान बैठी हैं, " विवेक गंभीर हो गया, " मेरा मत तो यही है की शादी तभी हो जब लड़कालड़की एकदूसरे को अच्छी तरह से जानसमझ चुकें हों. मेरी माँ की जिद न होती तो मैं यों लड़की देखने आने को कभी राजी न होता. "

ह तो बड़ी अच्छी बात है, " जींस वाली ने कहा.
" अब तो कृपा कर के यह बता दें की सावित्रीजी की असली बेटी कौन है ? " विवेक ने अपने मन की दुविधा दूर करने को एक बार फिर अपना सवाल दोहराया.
" आप अभी तक नहीं पहचान सके हैं उसे ? " जींस वाले ने हंस कर पूछा.
विवेक ने इनकार में सिर हिलाया.
" हम ने तो सुना था की इंजीनियर बहुत इंटेलिजेंट होते हैं. "
" वह तो ठीक ही सुना है आप ने, पर ज्यादा शरारती लोगों से पाला पड जाए तो हार भी हो जाती है. "
" इतनी जल्दी मत हार मानिये, जनाब आप इस से गप्पे लड़ाइए और मैं आप की आवभगत का इंतजाम कर लौटती हूँ, " जींस वाली लडकी मुस्कराती हुई कमरे से बाहर चली गई.
विवेक ने आगे झुक कर सूट वाली से पूछा, " आप ही हैं न पूनम कौशिक ?"
" क्या मैं आप को उस से ज्यादा अच्छी लगी हूँ ? " उस ने शरारती अंदाज में भौंहें मटकाईं .
" बतलाइये न, प्लीज. "
" यह सवाल मेरी सहेली के लौट आने के बाद ही पूछना, इंजीनियर साहब. मैं ने सच बता दिया तो वह मेरी जान खा जाएगी. "
" मैं किसी से कभी नहीं कहूंगा की... "
" सौरी, कुछ और बात करिए, प्लीज. "
विवेक ने असहाय भाव से कंधे उचकाए और फिर उस की पढ़ाई से सम्बंधित बातें करने लगा.
करीब 10 मिनट बाद जींस वाली लड़की एक ट्रे में 3 प्लेटें सांभरवडा ले आई.
विवेक ने पहले चम्मच क स्वाद लिया और तेज मिर्चों के कारण उस की सिसकारी निकल गई. उस ने आँखें उठा कर देखा तो पाया की वे दोनों बड़े स्वाद से संभारवडा खा रही थीं.
विवेक ने अपने हावभावों को नियंत्रित किया और मुस्कराने का अभिनय करते हुए सांभरवडा खाने लगा. वह उन्हें अपना मजाक उड़ाने का कोई मौक़ा नहीं देना चाहता था.
एकाएक 2 लड़कियों ने संभारवडा खाते हुए कमरे में प्रवेश किया और सीधे विवेक के सामने आ खडी हुईं.
" किसे चुना है आप ने, सर ? " उन में से लम्बे कद वाली ने सीधेसीधे पूछ लिया.

भी तो कोई फैसला नहीं करा है मैं ने, "
विवेक ने मुस्कराते हुए जवाब दिया.
" सर, जल्दी फैसला कर लीजिये.
आजकल कैम्पस प्लेसमेंट का सीजन चल रहा है. होस्टल में यही एक गेस्टरूम है.
इंटरव्यू लेने के लिये अगली पार्टी आने ही वाली है, " दूसरी लड़की ने माथे पर बल डाल कर हल्की नाराजगी दर्शाई और फिर दोनों कमरे से बाहर चली गईं.
" मैं अपने को इस कारण शर्मिन्दा महसूस कर रहा हूँ  की मेरे यों मिलने आने को आप इंटरव्यू लेना समझ रही हैं, "विवेक ने दबे स्वर में सफाई सी दी.
" अरे, बड़े लोगों को बिलकुल शर्मिन्दा होने का अवगुण नहीं पालना चाहिए, " जींस वाली ने उसे सलाह दी.
" अभी एक कैबिनेट मिनिस्टर ने करोड़ों का घोटाला किया. हमारे इलाके का डी.एस.पी. सेक्स स्कैंडल का मुखिया निकला. दिल्ली के बड़े उघोगपति का बेटा सरेआम उस मॉडल का मर्डर कर के मुस्कराता घूम रहा है. इंजीनियर साहब, बड़े लोग कहाँ शर्मिन्दगी महसूस करते हैं ? अरे, आप तो इंटरव्यू ही ले रहे हैं शादी के लिये. उन लोगों की तुलना में तो यह काम कुछ भी नहीं. आप बेखटके इंटरव्यू लेना चालू रखिये, प्लीज. " खड़े हो कर यह स्पीच जोशीले अंदाज में देने के बाद सूट वाली लड़की दोबारा बैठ कर सांभरवडा खाने लगी.
कुछ पलों की खामोशी के बाद विवेक ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, " इंटरव्यू तो अब ख़त्म हो चुका है, देखिये.
" क्या आप ने फैसला कर लिया है ? " सूट वाली जोर से चौंकी.
" हाँ. "
" क्या मुझे चुना है आप ने अपनी दासी बनने के लिये ? "
" तुझे नहीं, मुझे चुना होगा इन्होने, " जींस वाली ने बड़े नाटकीय ढंग से अपने माथे पर हाथ मारा.
अचानक मुस्करा रहे विवेक के चेहरे पर परेशानी के भाव उभरे. इस ने हाथों से अपना पेट पकड़ लिया और उबकाइयां सी लेने लगा.
" मुझे तेज घबराहट हो रही है. सांस भी नहीं आ रहा है. तबीयत बिलकुल ठीक नहीं. आप ने मेरे सांभर में मिर्च के साथ...कुछ और गलत... चीज तो नहीं मिला.... दी... " अपने चेहरे पर भयंकर पीड़ा के भाव लिए विवेक सोफे से लुढ़क कर कालीन पर ढेर हो गया.
विवेक ने सांभर में कुछ गलत मिला देने की बात जींस वाली लड़की को संबोधित कर के कही थी. वह बेचारी उस की बिगड़ी हालत देख कर थरथर कांपने लगी.
" इस का शरीर तो ऐंठा जा रहा है, " हरे सूट वाली लड़की बुरी तरह से घबरा उठी.
" प... प... पानी के छीटें मारूं ? " जींस वाली रोंआसी हो उठी.
" बेवक़ूफ़, तू ने मिर्च के अलावा और क्या मिलाया सांभर में ? "
" मैं पागल हूँ क्या जो और कुछ मिलाऊँगी. "

से सबक सिखाने के जोश में तू ने जरूर कोई गलत काम किया है. "
" मैं ने कुछ गड़बड़ नहीं की है. अब क्या करें ? सामने वाले डाक्टर को बुला कर लाऊँ ?
मेरी माँ इस सारी घटना का ब्यौरा सुनेगी तो मुझे कच्चा ही चबा जाएगी. मुझे ऐसे मत घूर. मैं कह रही हूँ न की मैं ने कुछ गड़बड़ नहीं की है " जींस वाले लड़की के आंसू बह निकले.
" इसे सोफे पर लिटाने के लिए कुछ लड़कियों को अन्दर भेज और तू भाग कर डाक्टर को बुला ला. इसे तंग करने की तेरी स्कीम में फंस कर मैं पता नहीं किस मुसीबत में फंसने जा रही हूँ. अब जल्दी जा यहाँ से, " सूट वाली ने अपनी सहेली को जोर से डांट दिया.
जींस वाली लड़की मुडी तो अचानक विवेक ने आँखे खोलते हुए उस का हाथ मजबूती से पकड़ लिया.
उसकी डर के मारे चीख निकल गई. हरे सूट वाली पहले जोर से चौंकी और फिर राहत भरे अंदाज में मुस्करा उठी.
" तुम तो बिलकुल ठीक हो. क्यों किया तुम ने तबीयत खराब होने का ऐसा घटिया नाटक ? " हरे सूट वाली ने शिकायत लहजे में सवाल पूछा.
" इन का सही परिचय जानने के लिये. कही, मेरा अभिनय कैसा लगा, मिस पूनम कौशिक ? क्या मेरे हुनर की दाद नहीं देंगी ? " विवेक पूनम कौशिक की आँखों में प्यार से झांकता हुआ मुस्कराया.
" आप को हमें इतना ज्यादा डराना नहीं चाहिए था, " घबराई पूनम कौशिक अभी भी सहज नजर नहीं आ रही थी.
" और आप दोनों को अपनी पहचान छिपा कर मुझे इतना ज्यादा सताना नहीं चाहिए था. "
" मेरा हाथ चोदिये, प्लीज. "
" यह हाथ छोड़ने के लिये नहीं पकड़ा है मैं ने. "
" तो क्या यह इंटरव्यू में सफल हो गई है ? "
हरे सूट वाली पूनम गुप्ता ने आँखें चौड़ी कर के पूछा.

लकुल सौ में से सौर नंबर मिले हैं इन्हें. अपनी सहेली से कहो की वह भी मेरा रिजल्ट बता दे. "
" फेल हुए हैं आप, कैसा डरा दिया हमें, " पूनम कौशिक नाराजगी दिखाते दिखाते शरमा गई.
" मैं ने आप को पास किया. इस का हाथ छोड़िये और मेरा पकडिये, इंजीनियर साहब, " पूनम गुप्ता ने हँसते हुए अपना हाथ विवेक की तरफ बढ़ाया.
" चल पीछे हट, " उस की सहेली ने हाथ पकड़ कर पीछे किया और फिर लजा गई.
" आज मैं ने जाना की पहली मुलाक़ात में भी प्यार हो सकता है. अपने साथ सारी जिन्दगी गुजारने की इजाजत दोगी तुम मुझे ? " विवेक ने भावुक और रोमांटिक लहजे में अपने दिल की इच्छा प्रकट की.
सिर हिला कर 'हाँ'  कहते हुए पूनम कौशिक के गाल गुलाबी हो उठे. उस की सहेली ने तालियाँ बजा कर इस फैसले का स्वागत किया.
" ए गिफ्ट फॉर समवन यू लव, " विवेक ने जेब से चौकलेट निकाल कर अपनी प्रियतमा को पकड़ा दी और फिर 'सी सी' की आवाज निकाल  कर यह दर्शा दिया की उसे मिर्चों की जलन सता रही है.
उस चौकलेट का टुकडा पूनम कौशिक के हाथ से खाने के बाद विवेक ने उस का हाथ चूम कर इस नए रिश्ते पर प्यार की मुहर लगा दी.

                                                                                                                                                         - उषा चाचरा   

03 मार्च 2009

बेताल पच्चीसी


परिचय

बैताल पचीसी (वेताल पचीसी या बेताल पच्चीसी (संस्कृत में वेताल पंचविंशति) पच्चीस कथाओं से युक्त एक ग्रन्थ है। इसके रचयिता बेतालभट्ट बताये जाते हैं जो न्याय के लिये प्रसिद्ध राजा विक्रम के नौ रत्नों में से एक थे। ये कथायें राजा विक्रम की न्याय-शक्ति का बोध कराती हैं। बेताल प्रतिदिन एक कहानी सुनाता है और अन्त में राजा से ऐसा प्रश्न कर देता है कि राजा को उसका उत्तर देना ही पड़ता है। उसने शर्त लगा रखी है कि अगर राजा बोलेगा तो वह उससे रूठकर फिर से पेड़ पर जा लटकेगा। लेकिन यह जानते हुए भी सवाल सामने आने पर राजा से चुप नहीं रहा जाता।

बैताल पचीसी की कहानियाँ भारत की सबसे लोकप्रिय कथाओं में से हैं। इनका स्रोत राजा सातवाहन के मन्त्री “गुणादय” द्वारा रचित “बड कहा” नामक ग्रन्थ को दिया जाता है जिसकी रचना ई. पूर्व 495 में हुई थी । कहा जाता है कि यह किसी पुरानी प्राकृत में लिखा गया था और इसमे 7 लाख छन्द थे। आज इसका कोई भी अंश कहीं भी प्राप्त नहीं है। कश्मीर के कवि सोमदेव ने इसको फिर से संस्कृत में लिखा और कथासरित्सागर नाम दिया। बड़कहा की अधिकतम कहानियों को कथा सरित्सागर में संकलित कर दिए जाने के कारण ये आज भी हमारे पास हैं। “वेताल पन्चविन्शति” यानी बेताल पच्चीसी “कथा सरित सागर” का ही भाग है। समय के साथ इन कथाओं की प्रसिद्धि अनेक देशों में पहुँची और इन कथाओं का बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हुआ। बेताल के द्वारा सुनाई गई यो रोचक कहानियाँ सिर्फ़ दिल बहलाने के लिये नहीं हैं, इनमें अनेक गूढ अर्थ छिपे हैं। क्या सही है और क्या गलत, इसको यदि हम ठीक से समझ ले तो सभी प्रशासक राजा विक्रम कि तरह न्याय प्रिय बन सकेंगे, और छल व द्वेष छोडकर, कर्म और धर्म की राह पर चल सकेंगे। इस प्रकार ये कहानियाँ न्याय, राजनीति और विषण परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की क्षमता का विकास करती हैं।
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बेताल पच्चीसी कि सभी कहानियों का संग्रह आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।
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बेताल पच्चीसी – पहली कहानी
बेताल पच्चीसी – दूसरी कहानी
बेताल पच्चीसी – तीसरी कहानी
बेताल पच्चीसी – चौथी कहानी
बेताल पच्चीसी – पाँचवीं कहानी → असली वीर कौन?
बेताल पच्चीसी – छठी कहानी→ स्त्री का पति कौन?
बेताल पच्चीसी – सातवीं कहानी→ राजा या सेवक- किसका बड़ा काम ?
बेताल पच्चीसी – आठवीं कहानी
बेताल पच्चीसी – नवीं कहानी → राजकुमारी किसको मिलनी चाहिए ?
बेताल पच्चीसी – दसवीं कहानी → सबसे बड़ा त्याग किसका ?
बेताल पच्चीसी – ग्यारहवीं कहानी → सबसे कोमल कौन सी राजकुमारी ?
बेताल पच्चीसी – बारहवीं कहानी
बेताल पच्चीसी – तेरहवीं कहानी → सांप, बाज, और ब्रह्मणि, इन तीनो में अपराधी कौन ?
बेताल पच्चीसी – चौदहवीं कहानी → चोर क्यों रोया और फिर क्यों हँसते-हँसते मर गया ?
बेताल पच्चीसी – पंद्रहवीं कहानी → किस की पत्नी ?
बेताल पच्चीसी – सोलहवीं कहान
बेताल पच्चीसी – सत्रहवीं कहानी → कौन अधिक साहसी ?
पच्चीसी – अठारहवीं कहानी → विद्या क्यों नष्ट हो गयी?
बेताल पच्चीसी – उन्नीसवीं कहानी → पिण्ड किसको देना चाहिए?
बेताल पच्चीसी – बीसवीं कहानी → वह बालक क्यों हंसा ?
बेताल पच्चीसी – इक्कीसवीं कहानी → विराग में अँधा कौन ?
बेताल पच्चीसी – बाईसवीं कहानी → शेर बनाने का अपराध किसने किया ?
बेताल पच्चीसी – तेईसवीं कहानी → योगी पहले रोया क्यों फिर हंसा क्यों ?
बेताल पच्चीसी – चौबीसवीं कहानी → रिश्ता क्या हुआ ?
बेताल पच्चीसी – पच्चीसवीं और अन्तिम कहानी
! समाप्त !