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03 अक्टूबर 2010

पानी को खोजने की अनोखी विद्या

क्या लकड़ी या नारियल की सहायता से भू-जलस्तर का पता लगाया जा सकता है? आस्था और अंधविश्वास की इस कढ़ी में हम ढूँढ रहे है इसी सवाल का जवाब। जब हमें पता चला कि इंदौर में एक शख्स के पास ऐसी अनोखी विद्या है, जिससे वह जमीन में पानी के स्तर का पता लगा सकता है तो हम चल पड़े उसकी खोज में......

हमारी तलाश खत्म हुई गंगा नारायण शर्मा के पास जाकर...शर्माजी का दावा है कि वह अपने यंत्रों, लकड़ी और नारियल की सहायता से जमीन के किस भाग में अधिक पानी है और किस भाग में कम इसका पता लगा सकते हैं। जमीन में कम से कम गहराई पर पानी की उपलब्धता ढूँढने के लिए शर्मा एक अँगरेजी के Y अक्षर के आकार की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं।

लकड़ी के दोनों छोरों को हथेली के बीच रखकर वह उस स्थान के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। जिस स्थान पर लकड़ी खुद-ब-खुद जोर-जोर से घूमने लगती है वह उस स्थान पर वह पानी होने का दावा करते हैं। शर्मा इसे डाउजिंग टेकनिक कहते हैं। और इसके जरिए वे 80 प्रतिशत सफलता प्राप्त होने का दावा भी करते हैं।

भू-जल वैज्ञानिक गंगा नारायण शर्मा कहते हैं कि इसका इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में, भूकंप से भूमिगत हुई नदियों का पता लगाने और लैंड माइन का पता लगाने में भी किया जा सकता है। उनका कहना है कि वर्तमान स्थिति में भू-जल स्तर करीब 700 फुट गहराई तक चला गया है। जिसके चलते जल स्त्रोतों का पता लगाने के लिए यह तकनीक कारगर साबित होती है।

लकड़ी की स्टीक के अलावा इस कार्य को अंजाम देने के लिए वे नारियल का भी इस्तेमाल किया करते हैं। इस विधि में नारियल को हथेली पर सीधा रखा जाता है और जहाँ जमीन में पानी होने के संभावना हो वहाँ नारियल अपने आप खड़ा हो जाता है। और फिर उसी स्थल को जल प्राप्ति का पर्याप्त स्त्रोत मान लिया जाता है।

यहाँ के बिल्डर शर्मा की इस विद्या का उपयोग कर ही बोरवेल खुदवाने के कार्य की शुरुवात करते हैं, और उनका विश्वास है कि इस विद्या का उपयोग कर बोरवेल खोदने से समय और पैसे दोनों की बचत होती है। हालाँकी शर्मा जी का दावा हमेशा सही ही निकलता है यह कहना भी कठिन होगा। कई बार 150-200 फीट पर पानी निकलने का दावा 400 फीट तक भी पूरा होता नहीं दिखता है। फिर भी लोगों की इस विद्या से जुड़ी आस्था उन्हें बार-बार शर्मा तक ले आती है।

शर्मा की इस तकनीकी विद्या का इस्तेमाल कर बोरिंग खुदवा रहे रोहित खत्री का कहना है कि इसमें अंधविश्वास की कोई बात नहीं है। दावा सही साबित न होने पर भी उनका मानना है कि अत्यधिक गर्मी के चलते जल स्तर नीचे चला गया है। बावजूद इसके वे इस तकनीक को अयोग्य नहीं मानते।

दिनोदिन पानी की हो रही कमी और बोरवेल खुदवाने में लगने वाली भारी रकम के चलते लोग इस तरह की बातों पर विश्वास करने के लिए मजबूर हो जाते हैं? हर कोई अपना समय और पैसा बचाने के चक्कर में गंगा नारायण शर्मा जैसे लोगों की तलाश में रहता है।

17 सालों से जल रहा है एक दीया !

छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा गाँव लेन्ध्रा। चाहे आप इसे मान्यता कहें या फिर अन्धविश्वास, इस गाँव के लोगों ने असमय मृत्यु से बचने के लिये सत्रह सालों से एक दीये को प्रज्ज्वलित कर रखा है।

इस गाँव के मुख्य मन्दिर राधा-माधव संकीर्तन आश्रम (जो रायगढ़ से पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित है) में यह दीया पिछले सत्रह सालों से लगातार जल रहा है। लोगों की मान्यता है कि इस दीये के जलने से किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा इस गाँव पर नहीं पड़ेगी।

इस गाँव के एक श्रद्धालु भारत पाण्डेय का कहना है कि वे हर साल यहाँ आते हैं और अपने परिवार को भी साथ लाने की कोशिश करते हैं। वे चौदह साल पहले यहाँ आए थे और तब से आज तक लगातार यहाँ आ रहे हैं। उन्हें यहाँ आना काफी अच्छा लगता है।

इस दीये को जलाए रखने के लिए जो खर्च होता है, उसे पूरा गाँव मिलकर उठाता है।

इस मन्दिर के पुजारी मुकेश कुमार के अनुसार, इस दीये को जलाने के लिए पूरे छत्तीसगढ़ से श्रद्धालु यहाँ आते हैं और मन्दिर में काफी मात्रा में दान-दक्षिणा भी देते हैं। उनके लिए इस पैसे से मुफ्त भोजन का भी इंतजाम किया जाता है। इस दीये को जलाए रखने के लिये दो व्यक्तियों को भी नियुक्त किया गया है।

अधिकतर ग्रामीण मानते हैं कि इस दीये के प्रज्ज्वलित रहने से सत्रह सालों से इस गाँव पर किसी तरह की प्राकृतिक आपदा नहीं आई है। करीब 3,500 लोगों की आबादी वाला यह गाँव आसपास के क्षेत्रों में भी श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। (एएनआई)

06 अप्रैल 2010

पानी से इलाज का दावा...

आस्था और अंधविश्वास में हर बार हमने आपके समक्ष आस्था और अंधविश्वास को परिभाषित करने वाली अजीबोगरीब घटनाओं को रखा है। आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में इस बार भी हम आपको एक ऐसी हकीकत दिखा रहे हैं, जो कुछ लोगों के लिए आस्था रूपी चमत्कार है, तो कुछ लोगों के लिए अंधविश्वास का ढकोसला। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं दिल्ली में रहने वाली इंदिरा देवी की, जिनका दावा है कि वे अपनी चमत्कारिक शक्तियों से किसी भी प्रकार के रोग का इलाज कर सकती हैं।

चाहे कैंसर हो या ट्यूमर, या फिर हो शुगर या पोलियो, इंदिरा देवी का मानना है कि उन्हें ऐसी चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिससे वे इन सभी बीमारियों का उपचार कर सकती हैं। इंदिरा देवी के उपचार का तरीका भी कुछ निराला है। पहले वे रोगी के शरीर के संक्रमित स्थान पर अपने घर से लाया हुआ जल छिड़कती हैं और फिर वही जल उसे पीने के लिए देती हैं। जल के साथ वे रोगी को फूल और केले प्रसाद स्वरूप देती हैं। जल के साथ-साथ रोगी को शरीर पर फूल भी रगड़ना होते हैं।

हर उम्र और हर प्रकार के रोग से ग्रसित लोग इलाज कराने के लिए इनके दर पर कतारें लगाते हैं। इंदिरा देवी का मानना है कि उन्हें ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हैं जिसके बल पर वे रोगों का उपचार करती हैं। उनका दावा है कि उनके स्पर्श मात्र से लोगों के दु:ख-दर्द दूर हो जाते हैं।

साथ ही इंदिरा देवी यह भी कहती हैं कि वे किसी भी उपचार के लिए रोगी से कोई शुल्क नहीं लेती हैं, पर मंदिर का नजारा कुछ और ही

हकीकत बयाँ करता है। जब हमने साफतौर पर इस विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘श्रद्धालु अपने मन से बीस-पचास जो भी रखकर चला जाए, इसमें हम क्या कर सकते हैं। अगर वह अपनी लाइलाज बीमारी के उपचार के लिए दस-बीस रुपए चढ़ा भी देता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है...।’

वहीं दूसरी ओर, रोगी व उनके परिवारजन भी इंदिरा के देवी के पास ठीक होने की उम्मीदें लेकर कई बार आते हैं। उन्हें उम्मीद है कि देवी भले ही उन्हें कितनी ही बार चरणों में बुलाएँ, मगर इससे उन्हें लाभ जरूर होगा। हालाँकि इंदिरा देवी के चमत्कार में कितना दम है, अभी तक इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है, मगर फिर भी लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं नजर आती है। आप इसे आस्था का चमत्कार मानते हैं या फिर अंधविश्वास का मायाजाल

पीलिया का अनोखा इलाज

असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए लोगों का झाड़-फूँक, टोने-टोटके तथा देवी-देवताओं का सहारा लेना एक आम बात है। आज हम आपको आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में एक ऐसी जगह ले चलते हैं, जहाँ पीलिया का इलाज करने का एक अनूठा तरीका अपनाया जाता है।

पीलिया से ग्रस्त मरीजों की भीड़ का यह नजारा किसी डॉक्टर के क्लिनिक का नहीं बल्कि एक मंजीत पाल सलूजा की दुकान का है जो अपनी अनूठी विद्या से पीलिया दूर करने का दावा करते हैं। वे मरीजों के कान पर कागज का कोन बनाकर लगाते हैं और मोमबत्ती के सहारे कागज को जलाते हैं और साथ-साथ गुरुवाणी का उच्चारण करते जाते हैं। मंजीत जी इलाज के पहले गणेशजी की पूजा करना नहीं भूलते। जला हुआ कोन जब कान से हटाया जाता है तो कान के आसपास पीले रंग का पदार्थ इकट्‍ठा हो जाता है। मंजीत पाल के अनुसार यह पीलिया है, जो मरीज के शरीर से बाहर निकलता है।

उपचार हेतु पहले दिन आने वाले मरीज को साथ में हार-फूल, अगरबत्ती और नारियल लाना आवश्यक होता है। साथ ही यहाँ आने वाले लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार यहाँ चढ़ावा रखकर जाते हैं। मंजीत का कहना है कि वे मरीजों को नि:शुल्क सेवा प्रदान करते हैं। चढ़ावा तो मरीजों की श्रद्धा का प्रतीक मात्र है।

यहाँ आने वाले मरीजों को भी डॉक्टरी इलाज से ज्यादा इस विद्या पर अधिक विश्वास है। उनका मानना है कि दवा के साथ दुआ के असर से ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है।

गुरुवाणी का उच्चारण करते हुए मरीजों का इलाज करने वाले मंजीत का कहना है कि हमारे परिवार को इस विद्या का ज्ञान भगवान की देन है। उनके पिता व दादाजी भी इस अनूठी विद्या से लोगों के दर्द को दूर किया करते थे। वे यहाँ आने वाले मरीजों को एक विशेष दवा, जो कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथी दवा का मिश्रण होती है, के ड्राप्स भी पिलाते हैं। वे रोजाना करीब 80 से 90 लोगों का इलाज करने का दावा करते हैं। उनका यह भी कहना है कि वे मरीज को केवल देखकर ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि पीलिया उतरने में कितना समय लगेगा।

मंजीत पाल सलूजा के अनुसार यहाँ डॉक्टरों द्वारा भेजे गए मरीजों के अलावा कई डॉक्टर्स स्वयं यहाँ आकर खुद को व परिजनों का भी इलाज कराते हैं। पीलिया जैसी असाध्य बीमारी के इलाज हेतु इस तरह की विद्या पर विश्वास करना लोगों के अंधविश्वास को प्रकट करता है या इस विद्या के पीछे किसी वैज्ञानिक तरीका होने का अंदाज लगाया जा सकता है। 

राक्षस को पूजने वाला गाँव

क्या यह संभव है कि राक्षस को ही कुल देवता मानकर उसकी पूजा-अर्चना की जाए? आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं एक ऐसे गाँव, जहाँ के लोग एक राक्षस को अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं।

महाराष्ट्र स्थित अहमदनगर जिले की पाथर्डी तहसील में 'नांदुर निंबादैत्य'

नामक गाँव में भारत का एकमात्र दैत्य मंदिर है। यहाँ के रहवासी निंबादैत्य की ही आराधना करते हैं। और सबसे खास बात यह है कि इस गाँव में हनुमानजी का एक भी मंदिर नहीं है। पूजा तो दूर यहाँ गलती से भी हनुमानजी का नाम नहीं लिया जाता है।

कहा जाता है कि जब वनवास के दौरान भगवान राम अपनी पत्नी सीता को ढूँढ़ रहे थे। तब केदारेश्‍वर में वाल्मीकि ऋषि से भेंट के लिए जाते समय वे इसी गाँव के जंगल में ठहरे थे। इसी जंगल में रहने वाले निंबादैत्य ने भगवान राम की बहुत सेवा और आराधना की। प्रभु राम ने उसे अपने भक्त के रूप में स्वीकार कर वरदान दिया कि इस गाँव में तुम्हारा ही अस्तित्व रहेगा और यहाँ के लोग हनुमान की पूजा न करते हुए तुम्हें ही अपना कुलदेवता मानकर आराधना करेंगे।
हनुमान नाम का यहाँ इतना प्रकोप है कि गाँव के किसी व्यक्ति का नाम हनुमान या मारुति नही रखा जाता। क्योंकि मारुति भी भगवान हनुमान का दूसरा नाम है। यहाँ तक हनुमान के नाम वाले व्यक्ति का नाम बदलकर ही उसे गाँव में प्रवेश दिया जाता है।

शिक्षक एकनाथ जनार्दन पालवे के मुताबिक दो महीने पूर्व ही लातूर जिले से एक मारुति नाम का मजदूर काम करने गाँव में आया था और दो दिन बाद ही वो श्मशान के निकट विचित्र आवाज निकालकर कूदा-फाँदी करने लगा, तब गाँव के रहवासियों ने उसे दैत्य मंदिर ले जाकर उसका नाम परिवर्तित कर उसे लक्ष्मण नाम दिया और वह आश्चर्यजनक रूप से ठीक भी हो गया।

हालात यह हैं कि यहाँ के लोग एक प्रसिद्ध कंपनी की चार पहिया गाड़ी इस्तेमाल करना भी अपशकुन मानते हैं। गाँव के एक डॉक्टर देशमुख द्वारा इस कंपनी की कार खरीदने के बाद ही कुछ ऐसे हालात बने कि उन्हें एक हफ्ते में ही कार बेचना पडी। एक बार खेत में फँसा गन्ने से भरा ट्रक बड़ी मशक्कत के बाद भी बाहर नहीं निकला तो किसी ने केबिन के अंदर रखे हनुमान के चित्र को निकालने की सलाह दी, ऐसा करने पर ट्रक बड़ी आसानी से बाहर निकल गया।

इस गाँव के अधिकांश लोग रोजी-रोटी के लिए बाहर के शहरों में काम करते हैं परंतु निंबादैत्य की यात्रा के समय सभी लोग अपने गाँव जरूर लौटते हैं। पुलिस आरक्षक अविनाश गर्जे के मुताबिक यात्रा के समय विषम परिस्थितियाँ होने के बावजूद भी कोई चमत्कार भक्तों को गाँव तक खींच ही लाता है।

ये मंदिर हेमाडपंथी है और गाँव की एकमात्र दोमंजिला इमारत है। निंबादैत्य के सम्मान में यहाँ के ‍रहवासी दुमंजिला इमारतों का निर्माण नहीं करते हैं। इस मंदिर के सामने करीब 500 वर्ष पुराना बरगद का पेड़ है। दैत्य के प्रति लोगों की आस्था का यह आलम है कि यहाँ के हर मकान, दुकान और वाहनों पर भी 'निंबादैत्य कृपा' लिखा हुआ नजर आता है।

कोई राक्षस किसी का कुलदेवता हो सकता है यह बात आश्चर्यजनक जरूर है मगर है सच्ची... आप इसे मानें या न मानें। यदि आप भी किसी ऐसी ही घटना के बारे में जानते हैं तो हमे अवश्य लिखें।

रामायण पाठ से हुआ कायापलट

आस्था और अंधविश्‍वास की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं एक ऐसे गाँव, जहाँ का हर ग्रामीण रामधुन में डूब गया है। तिवड़िया ग्राम के ग्रामीणों का मानना है कि यह राम नाम और कथा का ही चमत्कार है कि हमारे गाँव का कायापलट हो गया है।

14 वर्ष पूर्व यह गाँव बीमारी, सूखे और अकाल की चपेट में था, लेकिन जबसे सिद्ध भोलेनाथ हनुमान मंदिर में अखंड रामायण पाठ का सिलसिला शुरू किया गया है, तब से गाँव सभी तरह की आपदाओं से मुक्त हो चुका है। यहाँ पर अखंड रामायण पाठ के अलावा घी की अखंड ज्योत भी जलती रहती है।

बच्चों और बूढ़ों ने रेवाशंकर तिवारी के साथ मिलकर शुरू किया था अखंड रामायण पाठ, लेकिन आज गाँव का हर आदमी इससे जुड़ गया है। क्या बच्चे और क्या बूढ़े, गाँव के प्रत्येक व्यक्ति का अब यह दायित्व हो चला है कि रामायण पाठ जारी रहे। ऐसी भी मान्यता है कि यदि यह पाठ रोका गया तो गाँव के बुरे दिन फिर से शुरू हो जाएँगे, इसीलिए गाँव का हर व्यक्ति बारी-बारी से रामायण पाठ के लिए आता है।

रामायण पाठ के आयोजक और मंदिर के पुजारी धर्मेंद्र व्यास ने बताया कि इस अखंड पाठ के आयोजन की प्रेरणा 14 वर्ष पूर्व रेवाशंकर तिवारी ने दी थी। तब से ही यह अखंड पाठ चल रहा है। जबसे यह पाठ शुरू हुआ है गाँव में खुशहाली लौट आई है। पहले इस गाँव का भू-जलस्तर 300 फुट नीचे हुआ करता था, लेकिन अब यहाँ 30 से 40 फुट पर ही पानी निकल आता है। कई जगह तो पाँच फुट पर ही पानी है।

गाँव के ही एक ग्रामीण ने बताया कि जबसे यह रामायण पाठ शुरू हुआ है, ग्रामीणों में चेतना आ गई है। हर कोई अब जागरूक है और सभी ओर खुशहाली है। यहाँ की खास बात यह है कि किसी भी प्रकार की अनहोनी नहीं होती।

व्यास ने ही हमें एक चमत्कारी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि नवरात्रि के दौरान एक बार रमेश तिवारी और गोविंद पवार कुछ लोगों के साथ पाठ कर रहे थे तभी अचानक आसमान से सभी के ऊपर बिजली गिर गई और पूरी छत पर करंट फैल गया, लेकिन चमत्कार ही था कि किसी को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं हुई।

धर्मेंद्र व्यास ने ही बताया कि मानसिक संतुलन खो चुके गोरेलाल पवार इस रामायण पाठ की बदौलत ही अब अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं और यहाँ यह भी देखने में आया है कि जो कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ थे, वे भी रामायण पाठ पढ़ने लगे हैं।

कैसे पहुँचें : देवास तहसील में इंदौर से 140 किलोमीटर दूर स्थित खातेगाँव से कुछ ही दूरी पर है ग्राम तिवडि़या। आप सड़क मार्ग से यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।

साँप का जहर उतारें फोन पर

वर्दी वाले बाबा यशवंत भागवत का दावा...
 
न धुआँ, न भभूत, न बड़े-बड़े बोल और न ही भगवा चोला। किस्से-कहानियों और किंवदंतियों को खंगालने की हमारी इस कोशिश में इस बार हम आपको मिलवा रहे हैं एक ऐसी शख्सियत से, जिसका दावा है कि वह साँप-बिच्छू का जहर अपनी मंत्रशक्ति से उतार सकता है, वह भी सिर्फ फोन पर।

यह बात पढ़कर आप चौंक गए न। हम भी इसी तरह चौंके थे। क्या ऐसा हो सकता है? क्या यह सच है? कोरी बकवास लगती है। ऐसे ही कई विचार हमारे दिमाग में भी घुमड़ने लगे थे। फिर क्या था, हमने शुरू किया सफर इस दावे की तह तक पहुँचने का। सफर की शुरुआत हुई इंदौर की रामबाग कॉलोनी से। यहाँ पहुँचकर हमने जहर उतारने वाले बाबा के बारे में जानकारी जानना चाही। जहर उतारने वाले बाबा। यह सुन पंक्चर बनाने वाला मुन्नू हँसने लगा और हमें रास्ता दिखाते हुए पुलिस क्वार्टर्स तक ले गया।

पुलिस क्वार्टर!! और जहर उतारने वाला बाबा, बात कुछ जँची नहीं। हमें लगा कि मुन्नू महाशय हमें 'मामा' बना रहे हैं। हमने पास से गुजरने वाले एक आरक्षक से यही बात पूछी। उन्होंने बताया, जी हाँ, यहीं तो हेड साहब रहते हैं। फिर बातों ही बातों में पता चला कि यशवंत भागवत नामक यह व्यक्ति पुलिस महकमे में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत हैं और पिछले 25 सालों से फोन पर साँप का जहर उतारते हैं।

 भागवतजी ने बताया पहले वे मरीज से रूबरू होने पर ही उसका जहर उतार सकते थे, लेकिन बाद में मंत्रों में कुछ शब्दों का हेरफेर कर फोन पर ही जहर उतार लेने की विधि ईजाद कर ली। इस बात की जानकारी फैलते ही यशवंत भागवत का फोन लगातार घनघनाने लगा।

अपने हुनर की खासियत बताते हुए श्री भागवत कहते हैं कि वे पीड़ित व्यक्ति से उसका, उसकी माँ का नाम और उसके रहने का पता पूछते हैं। फिर मंत्रोच्चार द्वारा जहर उतारने की अनूठी विद्या शुरू करते हैं। जब उन्हें लगता है कि जहर पूरी तरह से उतर चुका है तो वे मरीज को नारियल फोड़ने के लिए कहते हैं। इसके बाद मरीज को नमक चटाया जाता है। यदि मरीज को नमक का स्वाद खारा लगता है तो जहर उतरा माना जाता है।

इस विद्या के बारे में जानकारी मिलने के बाद हमने तलाशना शुरू किया ऐसे व्यक्ति को, जिसका यशवंतजी ने इलाज किया हो। इस तलाश के दौरान हमारी मुलाकात हुई सरमन गोयल से। पेशे से अध्यापक सरमनजी ने बताया कि मुझे ऐसी बातों पर कतई विश्वास न था। एक सुबह झाड़ू लगाते हुए मुझे साँप ने काट लिया। मैं दौड़ा-दौड़ा भागवतजी के पास गया। उन्होंने मंत्र फूंका और कुछ ही देर में जहर की जलन शांत हो गई। मैं आज भला-चंगा हूँ तो भागवतजी की कृपा से।

सरमनजी अकेले नहीं, ऐसे सैकड़ों पीड़ित लोग हैं, जिनका विश्वास है कि भागवतजी अपनी मंत्र-शक्तियों के जरिए सर्पदंश का इलाज कर देते हैं। यमराज के लेखपाल चित्रगुप्त की तरह भागवतजी ने भी अपने द्वारा इलाज किए लोगों का लेखा-जोखा अपने रजिस्टर में लिख रखा है। इस लेखे-जोखे से तीन रजिस्टर भर चुके हैं। भागवतजी हर काम ऊपर वाले के नाम पर करते हैं, इसलिए वे एक पैसा लेना भी पाप समझते हैं। वे कहते हैं मैं कुछ नहीं करता, करने वाले तो साँई-राम हैं।

यशवंत भागवत से जुड़ा एक किस्सा बताते हैं राजस्थान के जमील साहब। जमीलजी की एसटीडी-पीसीओ की दुकान है। एक बार उन्हें अपने दोस्त से भागवतजी का नंबर मिला। इन्होंने आजमाने के लिए एक सर्पदंश से पीड़ित महिला का इलाज फोन द्वारा भागवतजी से करवाया। यहाँ भागवतजी ने मंत्र पढ़े, वहाँ पीड़िता का दर्द गायब हो गया। नागपंचमी के दिन जन्मे यशवंतजी यूँ तो बवासीर, साइटिका, पीलिया जैसी बीमारियों का इलाज भी करते हैं, लेकिन उनकी पहचान साँप का जहर उतारने वाले के रूप में ज्यादा है।

यशवंतजी की इस अनूठी विद्या को मानने वालों में आम लोगों के साथ-साथ पुलिस महकमा भी शामिल है। पुलिस महकमे में रिजर्व इंस्पेक्टर के पद पर आसीन प्रदीपसिंह चौहान भी अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मेरे सरकारी आवास और ऑफिस दोनों में ही लगातार साँप दिखाई दिया करते थे। घर, आफिस में लोग खासे भयभीत होने लगे थे। तब किसी ने मुझे भागवतजी के बारे में बताया। उनके अनुष्ठान करने के बाद इनके घर और आफिस में साँप दिखाई देना बंद हो गए हैं।

एक तरफ भागवतजी की विद्या का सम्मान करने वाले बहुत लोग हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस विद्या को पूरी तरह से नकारते हैं। इन्हीं लोगों में शामिल हैं महाराजा यशवंतराव अस्पताल के मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अशोक वाजपेई। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर वाजपेई कहते हैं कि “ हमारे देश में 70 प्रतिशत साँपों में जहर होता ही नहीं है। कई लोगों की मौत की वजह जहर नहीं, बल्कि साँप के काटने का भय होता है। इस किस्से में भी ऐसा ही हो सकता है। हो सकता है कि जिस साँप ने काटा हो, वो जहरीला ही न हो या फिर काँटा चुभने पर भी महसूस हो कि साँप ने काटा है। मेरा मानना है कि साँप काटने के बाद उसका इलाज करवाना चाहिए, न कि इस तरह की झाड़-फूँक।”

जहाँ कई लोग डॉक्टर साहब की हिदायत को मानते हैं, वहीं अनेक ऐसे भी हैं, जो इसे नकारते हैं। इनमें से कुछ का दावा है कि भागवतजी उन्हें मौत से लौटाकर लाए हैं। अब ये वर्दी वाले बाबा तो यही कहते हैं कि 0731-2535534 पर फोन लगाइए और क्या सही है, क्या गलत है, खुद जान जाइए।

साँई बाबा की सवारी

आपने साँई बाबा के अनेकों चमत्कार देखें या सुने होंगे लेकिन क्या कभी ऐसा सुना कि साँई बाबा किसी के शरीर में आकर लोगों के दुख दूर करते हों। नहीं न। अब तक आपने सुना है कि माता या भेरू बाबा ही शरीर में आते हैं, लेकिन यह कम ही सुनने में आया है कि साँई बाबा किसी के शरीर में आकर लोगों की समस्या का समाधान करते हों और वह भी एक महिला के शरीर में।

'आस्था या अंधविश्वास' की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं देवास के साँई मंदिर में, जहाँ एक महिला के शरीर में साँई बाबा की सवारी आती है। यह सच है या नहीं, यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन कई लोग अपनी समस्या के समाधान के लिए बाबा के दरबार में हाजिर होते हैं।

साँई मंदिर की पुजारिन इंदुमति की बहू आशा तुरकणे विगत 15 वर्षों से बाबा के माध्यम से भक्तों की समस्या का समाधान कर रही हैं। प्रत्येक गुरुवार की रात को जब आशाजी के शरीर में साँई बाबा आते हैं तब उनकी आवाज पुरुषों जैसी हो जाती है। इस दौरान वे सिगरेट पीने और पुरुषों जैसा व्यवहार करने लगती हैं। तब भक्त उनकी बात बड़े ध्यान से सुनते हैं।

संगीतमय वातावरण के बीच बड़ी संख्या में यहाँ साँई के भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहाँ आए एक भक्त रघुवीर प्रसाद ने कहा कि मेरा बाबा में अटूट विश्वास है। बाबा की जो जिस रूप में आराधना करता है, बाबा उसके दु:ख दूर करते हैं। मालिक तो सबका एक ही है और जो भी यहाँ भक्तिभाव से आता है, उसकी मन्नत पूरी होती है। बाबा में अनन्य भक्ति होना जरूरी है। मैं 2005 में एक बार साइकिल से बाबा के दरबार में जा चुका हूँ। बाबा का बड़ा चमत्कार है।

एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि यह तो एक प्रकार का सत्य ही है कि लोगों को यहाँ कुछ मिलता होगा, तभी तो इतने लोग आते हैं। बाबा के मंदिर में आने से ही शांति मिलती है। लोगों का इसमें विश्वास है।
वैज्ञानिक युग में जहाँ इस तरह की बातों को अंधविश्वास से अधिक कुछ नहीं माना जाता, वहीं यहाँ आने वाले लोगों का कहना है कि साँई भावना के भूखे हैं। भक्त उन्हें किसी भी रूप में भजे, वे हाजिर हो जाते हैं।

साँई बाबा ने भाईचारा, साम्प्रदायिक सद्भाव और मानव सेवा के लिए महान कार्य कर लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था कि किस तरह श्रद्धा और सबुरी के साथ जीवन के दु:खों से निपटा जा सकता है इसके लिए मालिक पर विश्वास के अलावा किसी और के दर पर जाने की आवश्यकता नहीं लेकिन क्या वाकई किसी के शरीर में कोई देवी-देवता या साँई बाबा आ सकते हैं या यह महज अंधविश्वास है, फैसला आपको करना है...। आप हमें अपनी राय से जरूर अवगत कराएँ।

कैसे पहुँचे : इंदौर से 35 किलोमिटर दूर उत्तर में स्थित है देवास; जहाँ ट्रेन या बस द्वारा जाया जा सकता है।

शर्तिया बेटा ही होगा...

आज के आधुनिक युग में जब लड़कियाँ हर कदम पर खुद को लड़कों से बेहतर साबित कर रही हैं, तब भी अनेक ऐसे परिवार हैं जो लड़के की चाह रखते हैं। घर के चिराग की चाहत में ये लोग कन्या भ्रूण हत्या से लेकर, तथाकथित बाबाओं और फर्जी डॉक्टरों के चक्कर में फँस जाते हैं। आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हमारा मुद्दा भी यही है।

इस कड़ी में हम आपकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहे हैं जो दावा करता है कि उसकी दवाई का सेवन करने के बाद शर्तिया लड़का ही होगा। जी हाँ, पवन कुमार अजमेरा नामक यह शख्स पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर है और दावा करता है कि यह कोख में ही बच्चे का लिंग निर्धारण कर सकता है।

इंदौर के गाँधीनगर में इस व्यक्ति का क्लिनिक है जहाँ की दीवारों पर शर्तिया लड़का पैदा करवाने के दावे लिखे हुए हैं। शर्तिया लड़का पैदा करवाने का दावा करने वाले इन महाशय का यह भी कहना है कि उनकी दवाई उसी महिला पर असर करेगी जिसकी पहले से एक बेटी हो और उनके पास इलाज के लिए आते समय इस बात का प्रमाण साथ लाना भी बेहद जरूरी है।

बड़े-बड़े दावों के बीच पवन कुमार का यह कहना है कि वे अभी तक तीन सौ महिलाओं की गोद में लड़के डाल चुके हैं। उनके द्वारा दी गई दवाइयों को गाय के दूध के साथ सेवन करने पर महिला को शर्तिया बेटा ही होगा। अब हमारे समाज में जहाँ बेटे को ही घर का चिराग समझा जाता है वहाँ इस तरह के दावों पर विश्वास करने वाले लोगों की कमी नहीं है।

इसलिए इन महाशय का धंधा भी खूब चमक रहा है। क्लिनिक पर चक्कर लगाने वाले लोगों में से कुछ दावा करते हैं कि पवन कुमार की दी गई दवाइयों के सेवन से ही उन्हें लड़का हुआ है। इन्हीं में से एक मोहनी उपाध्याय का कहना है कि मुझे एक बिटिया है, मैं दूसरा बेटा चाहती थी। मुझे इस क्लिनिक का पता चला तो यहाँ आ गई। डॉक्टर साहब की दवाई के बाद ही मुझे बेटा हुआ है।

पवन कुमार जैसे लोग कितने भी दावे कर लें लेकिन असली डॉक्टर इन दावों को सिरे से नकारते हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मुकेश बिड़ला ने वेबदुनिया को बताया कि ऐसे दावे लोगों को मूर्ख बनाने के सिवा और कुछ नहीं। विज्ञान के नजरिए से देखें तो अभी तक कोख में लिंग निर्धारण संभव ही नहीं है।
असली डॉक्टरों के नकारने के बाद भी इन आयुर्वेदाचार्य का धंधा खूब चमक रहा है। बेटे की चाहत में ग्रसित लोग इनके दरवाजे के चक्कर काटते रहते हैं।

लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि पूरे देश में जहाँ लड़कियों की जन्मदर तेजी से गिरती जा रही है और सरकार की तरफ से जन्मपूर्व लिंग परीक्षण को गैरकानूनी करार दिया जा चुका है, वहीं मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर में शर्तिया लड़के पैदा करवाने का यह गोरखधंधा क्लिनिक के नाम पर बेरोकटोक चल रहा है और प्रशासन आँखें मूँदे बैठा है।

शिवाबाबा का प्रसिद्ध मेला

सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच घने जंगल में हर साल वसंत पंचमी से पूर्णिमा तक लगने वाला शिवाबाबा का मेला वैसे तो दिखने में एक आम ग्रामीण मेले की तरह ही है। कैसेट-सीडी, खेल-खिलौने, मिठाइयाँ, कपड़े, बर्तनों से सजी दुकानें, खरीदारी करते लोग, परंतु इन सबके अलावा भी ऐसा कुछ है यहाँ, जो खास बनाता है इस मेले को इस पूरे क्षेत्र में। जी हाँ, शिवाबाबा के मेले में लोग आते हैं मन्नतें लेकर और जब मन्नत पूरी होती है तो भेंट में चढ़ाते हैं बकरे। कोई एक तो कोई दो तो कोई पाँच-पाँच बकरे अपनी मुराद पूरी होने के बाद शिवाबाबा को चढ़ाते हैं।

शिवाबाबा के बारे में मान्यता है कि वे एक संत थे, जिनके चमत्कारों की प्रसिद्धि इस इलाके के हर एक शख्स की जबान पर है। यहाँ शिवाबाबा को भगवान शिव का अवतार मानकर पूजा की जाती है। मंदिर के पास एक बाबा जोगीनाथ का कहना है कि यह बहुत ही अद्भुत दरबार है। देर की तो बात ही नहीं, बस इधर माँगो और उधर इच्छा पूरी हो जाती है।

मन्नत पूरी होने पर लोग अपने परिजनों और दोस्तों के साथ मेले में पहुँचते हैं और फिर सजे-धजे बकरे की पूजा कर पूरे जोर-शोर से शिवाबाबा के मंदिर की ओर ले जाया जाता है। शिवाबाबा के मंदिर में स्थित देवी की प्रतिमा के सामने पुजारी बकरे पर जल छिड़ककर उसे देवता को अर्पित कर देता है।

यहाँ लाए जाने वाले ज्यादातर बकरों की बलि दी जाती है, जबकि कुछ अन्य को जंगल में छोड़ दिया जाता है। पहले बलि मंदिर के सामने स्थित चहारदीवारी में दी जाती थी, लेकिन अब यहाँ बलि देने की मनाही है अत: अब बकरे की बलि लोग अपने ठहरने के स्थान पर जाकर देते हैं। बलि के बाद बकरे के माँस को शिवाबाबा का प्रसाद मानकर मिल-बाँटकर खाया जाता है। प्रसाद को लोग मेला क्षेत्र से बाहर या अपने घर नहीं ले जा सकते। बचने पर प्रसाद को वहीं गरीबों में बाँट दिया जाता है।

मेले में आए एक कसाई से जब हमने बात की तो उसने बताया कि हर साल सम्पूर्ण मेला अवधि में करीब दो लाख बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। उसने यह भी बताया कि उस दिन सुबह से लेकर दोपहर तीन बजे तक करीब पाँच हजार बकरों की बलि दी जा चुकी है।

कहते हैं कि शिवाबाबा की कृपा से मेले के दौरान इस इलाके में मक्खियाँ और चीटियाँ नहीं होती हैं। हमने इस तथ्य की जाँच-परख की। हमने पूरा मेला क्षेत्र देखा, बकरों के कटने के स्थान देखे, मिठाइयों की दुकानें देखीं परंतु वाकई हमें एक भी मक्खी दिखाई नहीं दी। यह एक बहस के विषय हो सकता है कि क्या बकरे की बलि देने से कोई देवता प्रसन्न हो सकता है?

13 मार्च 2010

श्मशान घाट या धार्मिक स्थल!

तन्जावुर का राजगोरी घाट

क्या आप इस बात पर विश्वास करेंगे कि एक श्मशान घाट को धार्मिक स्थल के रूप में माना जाता है और उसके पास से बहने वाली नदी को उस गंगा के समकक्ष माना जाता है, जो देश की सबसे पवित्र नदी है।
जी हाँ, तन्जावुर में एक नदी के पास श्मशान घाट है जिसे वहाँ के रहने वाले लोग उसी तरह धार्मिक स्थल या तीर्थ मानते हैं जिस तरह गंगा नदी के घाट को। यहाँ बहुत लोगों से सुनने में आया है कि उनके घर के बुजुर्गों की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार राजगोरी घाट पर किया जाए और आखिरी सभी विधि-विधान उससे जुड़ी वदावरू नामक नदी के किनारे पर किए जाएँ।
यह बहुत ही बड़ा घाट है जहाँ अंतिम संस्कार के लिए सबसे ज्यादा दाह स्थल हैं। यहाँ के कर्मचारियों (वेट्टियंस) के अनुसार यहाँ एक साथ 20 अंतिम संस्कार किए जा सकते हैं।
घाट के दूसरी ओर भी बहुत से दाह स्थल थे। वहाँ मौजूद कर्मचारियों से यह मालूम हुआ कि वे सभी तन्जावुर के राजघराने के हैं और दूसरे सभी ब्राह्मण और नायक समाज के लिए हैं। 21वीं सदी में भी हर समाज के लिए यहाँ अलग-अलग दाह स्थल हैं।
यहाँ बहने वाली नदी वदावरू, कावेरी नदी की उपनदी है जिसे गंगा की तरह माना जाता है। जो लोग अपने रिश्तेदारों का दाह संस्कार करने यहाँ आते हैं वे इस नदी में स्नान जरूर करते हैं। उनका मानना है कि इस नदी में स्नान करने से मृत्यु के सारे दोष दूर हो जाएँगे।
हमारे देश में धार्मिक स्थलों जैसे मंदिर, चर्च, मस्जिद, बौद्ध और जैन धर्म स्थलों की कमी नहीं है। लेकिन एक श्मशान घाट को तन्जावुर के लोगों का धार्मिक मानना हमारे लिए एक पहेली ही है। अगर आप भी कभी ऐसे धार्मिक स्थलों के संपर्क में आएँ तो हमें जरूर बताएँ।

12 मार्च 2010

वो मुँह से निकाल देती है पथरी!

रलायता गाँव की एक वृद्ध महिला का दावा

आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हमारी मंजिल थी उज्जैन के पास का रलायता गाँव। हमने सुना था इस गाँव में रहने वाली एक बुढ़िया कैसी भी पथरी हो, मुँह से निकाल देती है। इस बात को खँगालने के लिए हमने अपना सफर शुरू किया। जैसे ही हमने उज्जैन के बाहर बने कालियादेह पैलेस को पार किया, सोचा किसी से रलायता गाँव का रास्ता पूछ लिया जाए।
जल्द ही हमें एक गड़रिया दिखा। जैसे ही हमने गडरिए से रलायता गाँव का पता पूछा। गड़रिए ने हमसे ही उल्टा सवाल किया- क्या आपको पथरी निकलवानी है। हमने कहा हाँ, कुछ ऐसा ही समझें। उसने कहा- फिर भटकते क्यों हैं, सामने की सड़क पकड़ लें। रास्ते में जो भी मिले, उससे आगे का रास्ता पूछ लेना। ठीक जगह पहुँच जाएँगे।
हमने उसकी सलाह पर अमल किया और कुछ देर में ही हम सीताबाई की ड्योढ़ी पर थे। यहाँ पहुँचने से पहले हमने अपने ड्राइवर को समझा दिया था कि उसे भी मरीज बनकर सीताबई से मिलना होगा। यहाँ पहुँचते ही हमने देखा दुर्गा मंदिर के अहाते पर एक वृद्ध स्त्री को भीड़ ने घेर रखा था। पास जाने पर पता चला, यही सीताबाई हैं, जो मुँह से पथरी निकाल लेती हैं।
और यह भीड़ उनसे इलाज करवाने वालों की थी। सीताबाई तल्लीनता से अपने काम में लगी थीं। वे एक व्यक्ति को नीचे लेटातीं। पूछतीं कहाँ दर्द हो रहा है। फिर दर्द वाले स्थान को चूसने लगतीं। कुछ पल बाद ही वे सामने बैठे लड़के को अपने मुँह से पथरी निकालकर दे देतीं।
यह सिलसिला लगातार काफी देर तक चलता रहा। जैसे ही उन्हें कुछ फुरसत मिली, हमने सवालों की झड़ी शुरू कर दी। सीताबाई ने बताया मैं पिछले 18 सालों से पथरी निकालने का काम कर रही हूँ। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहने लगीं मैं हवा हूँ, मेरे 52 स्थान हैं। हर जगह मैं अलग-अलग काम करती हूँ। इलाज का मूलमंत्र माँ पर विश्वास है। यदि विश्वास पक्का हो तो इलाज शर्तिया है, वरना कुछ नहीं हो सकता।यह कहते ही वे वापस अपने मरीजों के इलाज में लग गईं।
एक तरफ सीताबाई तेजी से पथरी निकालने का काम कर रही थीं। वहीं दूसरी तरफ बैठा पंडा पीड़ित लोगों को पालक, टमाटर, बैंगन न खाने की हिदायत दे रहा था। वहीं दवाई के रूप में तुलसी के पत्ते, बिल्वपत्र का चूर्ण दिया जा रहा था, जिसे तीन दिन तक शाम को खाने की सलाह दी जा रही थी। सीताबाई से इलाज कराने के लिए राजस्थान, कानपुर, ग्वालियर आदि अलग-अलग जगह से लोग आए थे।

जयपुर से आए एके मौरे के साथ 75 वर्षीय श्रीमती भगवानदेवी किडनी की पथरी का इलाज करवाने आई थीं। उन्होंने जयपुर में सीताबाई के बारे में सुना था। वे कहती हैं अब इस उमर में ऑपरेशन तो करा नहीं सकती हूँ, इसलिए यहाँ आई हूँ । क्या महसूस हुआ, पूछने पर वे कहती हैं अजीब-सा खिंचाव लग रहा था। दर्द नहीं हुआ। महीनेभर के अंदर यहाँ वापस आने के लिए कहा है। उसके बाद सोनोग्राफी करवाने के लिए कहा गया है। देखते हैं क्या होता है।
भगवानदेवी की तरह काफी लोग थे, जो पहली बार यहाँ आए थे। तो कुछ का दूसरा दौरा था। दूसरी बार आने वाले लोगों का कहना था, पथरी के दर्द में काफी कमी आई है। ऐसे ही एक व्यक्ति मनोज का कहना था कि वे ग्वालियर जाने के बाद अल्ट्रासाउंड कराकर देखेंगे कि पथरी खत्म हुई या नहीं।

यहाँ हम लोगों से बातचीत कर रहे थे। वहाँ सीताबाई लगातार पथरी निकालने का काम जारी रखे हुई थीं। इस बीच हमारे ड्राइवर का नंबर आ गया। उसने सीताबाई को बताया कि उसे पेट में दर्द होता है शायद पथरी है। सीता बाई ने उसका पेट अपने अंदाज में चूसा और एकदम बोल दिया कि तुम्हें पथरी नहीं है। शायद गैस की समस्या होगी खाना समय पर खाया करों। हमारे ड्राइवर को पथरी नहीं है यह उन्होंने कैसे बताया, हमें नहीं पता।
अब हम सीताबाई से बातचीत होने का इंतजार करने लगे, लेकिन ये क्या जैसे ही आखिरी मरीज का इलाज किया, सीताबाई की शख्सियत ही बदल गई। कुछ देर पहले जो महिला हमसे गुस्से में बात कर रही थी, वह गाँव की आम दादी-नानी की तरह बातें करने लगी। हमने उनसे पूछा वे यह सब कब से कर रही हैं, तो उन्होंने अजीब-सा जवाब दिया मैं क्या कर रही हूँ, करती तो देवी माँ हैं। मैं कैसे इलाज करती हूँ, इसके बारे में तो मैं भी नहीं जानती। बस एक शक्ति है, जो हमसे ये सब काम करवा रही है। यह कहकर वे अनाज साफ करने बैठ गईं।

यहाँ इलाज करा चुके कई लोगों का दावा है कि उनकी पथरी खत्म हो चुकी है, लेकिन डॉक्टरों को इस बारे में भरोसा नहीं है। जब हमने इस संबंध में जनरल सर्जन डॉ. अपूर्व चौधरी से बात की तो उन्होंने बताया पथरी यदि बारीक हुई तो वह पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाएगी, अन्यथा पूरा इलाज ही उसे दूर कर सकता है। मुँह से पथरी निकालना! ऐसा हो ही नहीं सकता। हो सकता है, कोई पहले से ही पत्थर मुँह में रखे और पथरी निकालने का दावा करे।

11 मार्च 2010

शिवलिंग का रंग बदला

क्या राम सेतु पर संकट से बदला शिवलिंग का रंग?

इसे आस्था कहें या अंधविश्वास? काशी विश्वनाथ की नगरी वाराणसी के मंदिरों में ही नहीं, वरन उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के कई शिव मंदिरों के शिवलिंगों का रंग एकाएक बदल गया है। एक ही दिन कई शिव मंदिरों में शिवलिंग का रंग बदलने की घटना ठीक उसी प्रकार प्रतीत हो रही है, जिस प्रकार पूर्व में एक बार देशभर में गणेश भगवान की मूर्तियों ने दूध पिया था।
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लखनऊ के चारों धाम मंदिर स्थित शिवलिंग के रंग बदलने की सूचना पाकर भक्तजन भक्तिरस में डूब गए और भजन-पूजन करने लगे। यह घटना रविवार दोपहर 12 बजे के आसपास की है जब मंदिर में भक्तों ने देखा कि काले पत्थर के भगवान शिव के लिंग का रंग कुछ हिस्सों में सफेद होने लगा। दर्शनार्थी अचम्भित हो उठे। इसके बाद चर्चा ने जोर पकड़ा। रानीकटरा स्थित चारों धाम मंदिर में मंदिर से जुड़े हुए परिवार और अन्य लोगों का ताँता लग गया।

"भक्तजन एवं मन्दिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी इस घटना को रामसेतु पर आए संकट से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के राम विरोधी बयान और सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा गलत हलफनामा देने से ही यह चमत्कार मालूम पड़ता है।"
चौपटिया स्थित चारों धाम सिद्धपीठ मंदिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी इस घटना को ईश्वर की अद्‍भुत घटना मान रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पुराने लखनऊ का यह इलाका छोटी काशी के नाम से विख्यात है। यहाँ चारों धाम मन्दिर एवं बड़ी कालीजी की बड़ी महिमा है। पुराने लखनऊ की सँकरी गलियों में स्थित चारों धाम मन्दिर में रामेश्वरम्‌, बद्रीनाथ, केदारनाथ, द्वारिकाधीश और जगन्नाथपुरी के साक्षात दर्शन संभव हैं। यहाँ स्वर्ग और नरक के भी साक्षात दर्शन होते हैं। मन्दिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी का कहना है कि द्वारिकाधीश मन्दिर की प्रतिमा तो बाकायदा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से पंजीकृत है।

चारों धाम मन्दिर में स्थित रामेश्वरम्‌ मन्दिर बिलकुल रामेश्वर स्थित मन्दिर की तर्ज पर बना हुआ है। शिवलिंग के करीब से ही लंका जाने के लिए रामसेतु तथा उसके बाद रावण दरबार बना हुआ है, जहाँ आजकल रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। संभवतः रावण दरबार अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। आश्चर्य है कि रामेश्वरम्‌ के नाम से बने इस मन्दिर के शिवलिंग ने अपना रंग बदला। भक्तजन एवं मन्दिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी इस घटना को रामसेतु पर आए संकट से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के राम विरोधी बयान एवं भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा गलत हलफनामा देने से ही यह चमत्कार मालूम पड़ता है।

रविवार को राजधानी लखनऊ के रानीकटरा मोहल्ला में संतोषी माता मंदिर स्थित शिवलिंग के कुछ हिस्से के रंग बदलने से भक्तजन अवाक रह गए। पुराने मंदिर में स्थित सफेद शिवलिंग के बीच में लाल धारियाँ पड़ने से भी शिवभक्तों को आश्चर्य हुआ। यही नहीं नन्दी का भी रंग बदला। इसी मंदिर में शिवलिंग में शिव के नेत्र भी उभरकर सामने दिखाई देने लगे।

संतोषी माता मंदिर के पुजारी चन्द्रशेखर तिवारी का कहना है कि वे पिछले 20 वर्षों से इस मंदिर के पुजारी हैं, किन्तु ऐसा चमत्कार उन्होंने पहली बार देखा है। उन्होंने कहा कि भगवान ही चमत्कार दिखाते हैं, ताकि भक्तजन ईश्वर अंश को समझें। जो भगवान राम एवं शिव को नहीं मानता उसे ईश्वर ऐसे कारनामे दिखाता है जिससे वे अदृश्य शक्ति मानने को मजबूर हो जाते हैं। उनका कहना है कि कहीं शिव मंदिर में नाग निकलते हैं तो कहीं कन्या। यह सब भावना का खेल है। जैसी भावना वैसा ही प्रभु का स्वरूप दिखाई पड़ता है।

"शिवलिंग के रंग बदलने की घटना को वैज्ञानिक अन्वेषण का विषय बताया। उनका कहना था कि इस प्रकार की घटना उनके विभाग द्वारा संरक्षित मूर्तियों जिनकी आयु हजारों वर्ष है, के बारे में अभी तक प्राप्त नहीं हुई है।"
अब समय के साथ मंदिर स्थित शिवलिंग अपने पुराने स्वरूप में वापस लौट रहा है। भक्तजन बताते हैं कि रविवार को शिवलिंग में जितनी लालिमा थी, वह अब धीरे-धीरे काले छल्ले में बदल रही है। रानीकटरा चौपटिया निवासी मधुबाला, योगिता सिंह, वन्दना पाण्डेय, बृजेश पाण्डेय, अजीत कुमार शर्मा, मनोज मिश्रा आदि शिवलिंग के रंग बदलने की घटना को अद्‍भुत संयोग मान रहे हैं। शिवलिंग के रंग बदलने की घटना के बाद मंदिर में भक्तजनों का ताँता लग गया। सूचना है कि इसी प्रकार की घटना चारबाग, सरोजनीनगर के गौरी गाँव आदि कई जगहों पर घटित हुई है। अधिकतर लोग इस घटना को आस्था एवं विश्वास की नजर से देख रहे हैं।

पुरातत्व निदेशालय के उपनिदेशक पी.के. सिंह ने शिवलिंग के रंग बदलने की घटना को वैज्ञानिक अन्वेषण का विषय बताया। उनका कहना था कि इस प्रकार की घटना उनके विभाग द्वारा संरक्षित मूर्तियों, जिनकी आयु हजारों वर्ष है, के बारे में अभी तक नहीं प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि शिवलिंग का रंग बदलने की घटना का संबंध पुरातत्व अन्वेषण से नहीं है। इस संबंध में आईटीआरसी के पूर्व निदेशक एवं बायोटेक पार्क के मुख्य अधिशासी अधिकारी डॉ. पी.के. सेठ से जानकारी चाही किन्तु वे कोई भी बयान देने से बचे और उन्होंने आईटीआरसी में ही किसी वैज्ञानिक से संबंध स्थापित करने को अपने निजी सचिव के माध्यम से कहा। इस तरह शिवलिंग रंग क्यों बदल रहे हैं? इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है, वहीं शिवभक्तों का कहना है जहाँ आस्था की बात आती है, वहाँ शक की गुंजाइश ही नहीं होती।

19 फ़रवरी 2010

स्पर्श से भगाएँ रोग...

ब्रह्मांड शक्ति से चिकित्सा की अनोखी रीति

क्या किसी व्यक्ति का स्पर्श आपकी लाइलाज बीमारी को ठीक कर सकता है। क्या ईश्वर से ऊपर कोई शक्ति है ...आप मानें या न मानें लेकिन केरल में रहने वाले एक व्यक्ति का यही दावा है। जी हाँ, आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपकी मुलाकात करवा रहे हैं केरल के आचार्य एमडी रवि मास्टर से। एमडी मास्टर खुद को ‘ब्रह्मगुरु’ कहते हैं। इनका दावा है कि वे सिर्फ स्पर्श के माध्यम से व्यक्ति को स्वस्थ कर सकते हैं। उसके नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में बदल सकते हैं। इसके साथ ही वे अपने अनुयायियों को नकारात्मक ऊर्जा से दूर रखने के लिए पवित्र जल भी देते हैं।

यह स्थान केरल राज्य के कोट्टयम जिले के चँगनास्सेरी नामक स्थान पर है, जो त्रिवेंद्रम से 135 और कोच्चि से करीब 87 किलोमीटर दूर स्थित है। इस जगह को ‘ब्रह्म धर्मालय’ के नाम से जाना जाता है। जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ लगी भीड़ को देखकर चौंक गए। बातचीत में पता चला कि ये सभी लोग ‘ब्रह्मगुरु’ के नाम से पहचाने जाने वाले आचार्य एमडी रवि मास्टर से इलाज करवाने आए थे। हमने देखा कि एक तेजस्वी व्यक्ति अनोखे ढंग से उनके अंदर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकाल रहे थे और सकारात्मक ऊर्जा से उनकी बीमारी दूर कर रहे थे। ये ही आचार्य एमडी रवि मास्टर थे।

"एमडी रवि मास्टर कोई चिकित्सक न होकर पेशे से दर्जी हैं, जिन्होंने बहुत मुश्किल से सामान्य शिक्षा प्राप्त की है। उनके अनुसार बीमारियों के उपचार की यह विधा उनके भीतर उनके पुनर्जन्म द्वारा आई।"
उन्होंने हमें बताया कि उनके उपचार की यह प्रणाली ‘ब्रह्मज्ञान’ की आध्यात्मिक शक्तियों पर आधारित है, जो एक सर्वव्यापी ऊर्जा है। वे इसी ऊर्जा से मरीज की बीमारियों का इलाज करते हैं। खास बात यह है कि उनका यह उपचार सभी के लिए निःशुल्क है।

रवि मास्टर का यह भी दावा है कि वे अपनी प्रार्थना के वक्त किसी भी देवी-देवता से बात कर सकते हैं, पर दूसरी ओर वे यह भी मानते हैं कि वे कोई जीवित ईश्वर नहीं हैं। वे इस कार्य को अपनी किस्मत मानते हैं, जिसका उद्देश्य लोगों की सेवा करना है।

नशे की लत के अलावा उनके धर्मालय में उनसे उपचार करवाने के लिए कई तरह के मानसिक और शारीरिक रोगों से ग्रसित लोग आते हैं, जिन्हें वे ठीक करने का दावा करते हैं। आश्चर्य की बात यह भी है कि वे सोराइसिस नामक घातक चर्मरोग का भी उपचार कर सकते हैं, जिसकी अभी तक कोई दवा नहीं बनी है। उनके इस आश्रम में किसी भी देवी-देवता की कोई मूर्ति नहीं है, जिसकी पूजा-अर्चना की जाती हो। उनका मानना है कि एक सर्वव्यापी शक्ति है, जो ईश्वर, अल्लाह या जीजस सबसे ऊपर है या मानें तो इन ईश्वरीय शक्तियों की जन्मदाता है।


मास्टर का जन्म 1953 में कोट्टयम जिले के त्रिवानांचुर नामक स्थान पर हुआ था। बचपन से ही रवि मास्टर की रुचि लोगों के भविष्यफल को जानने में थी। वे अपने रिश्तेदारों को उनके भूत-भविष्य से जुड़ी कई अजीबोगरीब बातें बताते थे, जिनके सच होने पर सभी आश्चर्यचकित हो जाते थे।

युवावस्था में उन्होंने दर्जी का पेशा चुना और इस क्षेत्र में महारत हासिल करने में जुट गए। विवाह के उपरांत 1986 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन बेटे का वजन मात्र 750 ग्राम था। बेटा कुछ बड़ा हुआ तो पता चला कि वह न तो देख सकता है और न ही चल-फिर सकता है। वे उसे लेकर एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर तक भटकते रहे, लेकिन कोई लाभ न हुआ। अंत में उन्होंने ईश्वर की उपासना को ही अपना आखिरी रास्ता माना और ईश्वर से प्रार्थना प्रारंभ कर दी।

जनवरी 1993 में एक बार जब वे पूजा के लिए दीया जला रहे थे, तो एक चमत्कारिक शक्ति कहीं बाहर से आकर उनके शरीर में से गुजरी। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनके सामने रखा हुआ दीपक स्वयं उनके ही प्रकाश से जगमगा रहा था। उन्हें कुछ भी नहीं समझ आ रहा था कि उनके कानों में एक मधुर आवाज आई कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।

उन्हें लगा कि कोई उनसे कह रहा है कि मैं ब्रह्मा हूँ, जिसने पूरे ब्रह्मांड और जीवन का सृजन किया है। अब मैं तुम्हारे भीतर समा चुका हूँ। अब तुम्हारे द्वारा हजारों-लाखों लोग उपचार प्राप्त करके गंभीर से गंभीर बीमारियों से छुटकारा पा सकेंगे और अपने जीवन को श्रेष्ठ तराके से जी सकेंगे। पुत्र की चिंता न करो, वह चार ही दिनों में बिलकुल स्वस्थ हो जाएगा।

पहले तो रवि मास्टर को लगा कि यह एक स्वप्न है, पर चौथे दिन उनका बेटा उनके समक्ष चलकर खड़ा हो गया और उसकी आँखों की ज्योति भी वापस लौट आई। तब उन्हें लगा कि उनके अंदर स्वयं ब्रह्मा का निवास है। तब से ही उन्होंने उस दीपक वाली घटना में मिले आदेश का पालन करना प्रारंभ कर दिया।

उस घटना के बाद उन्होंने पूरी तरह से नकारात्मकता द्वारा उत्पन्न लोगों की व्याधियों का निवारण करना प्रारंभ कर दिया। इन बीमारियों में कैंसर, सोरासिस, कमर दर्द और सिर दर्द जैसे रोगों का भी उन्होंने उपचार किया जिसके लिए अभी तक कोई दवा नहीं है।

वे कहते हैं कि मैं केवल मानवता की सेवा कर रहा हूँ। उनका यह उपचार बिलकुल निःशुल्क है। वे दावा करते हैं कि अभी तक तकरीबन आठ लाख से भी अधिक लोग इस उपचार प्रणाली द्वारा आराम पा चुके हैं, जिसे ब्रह्म ध्यान प्रणाली के रूप में जाना जाता है।

रवि मास्टर आगंतुकों को साल में एक बार ‘ब्रह्मतीर्थ’ नामक पवित्र जल देते हैं। वे विशेष समय में रोगियों का उपचार करते हैं। वे बताते हैं कि उन्हें अपने स्वयंभू दीपक से इन खास दिनों के निर्देश मिलते हैं, जिसे वे अपने अनुयायियों को बता देते हैं। इन खास दिनों में नवग्रहों की अद्भुत शक्ति ब्रह्मगुरु के शरीर में केंद्रित हो जाती है, जिसे वे जल में विसर्जित करते हैं। यह जल इस दीपक के सामने रखा होता है। रवि मास्टर इस जल को अपने अनुयायियों में बाँट देते हैं। माना जाता है कि इस पवित्र जल के सेवन से लोग नकारात्मक ऊर्जा से दूर रहते हैं।

जो लोग इस दैविक जल का सेवन करते हैं, उनके सारे पाप धुल जाते हैं और वे पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। उन्हें उनके सभी रोगों से छुटकारा मिलता है। ब्रह्मगुरु के अनुसार मृत्यु के उपरांत भी जीवन है। मौत के बाद कुछ आत्माएँ काली शक्तियों के वश में हो जाती हैं, जिसे हम नरक कहते हैं और कुछ चंद्र मंडल में रहती हैं, जिसे हम स्वर्ग कहते हैं। जो लोग इस पवित्र जल को ग्रहण करते हैं, उनके परिवारजनों को किसी भी तरह का क्रिया-कर्म नहीं करना पड़ता है। उनकी आत्माओं को काली शक्तियाँ नहीं छू सकती हैं और वे स्वर्ग ही पहुँचते हैं।

हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनसे उनके उपचार की क्षमता का पता चलता है, परंतु आधुनिक विज्ञान ऐसी किसी भी शक्ति को प्रामाणिक नहीं मानता है। उनके पास आने वाले लोगों का मानना है कि यह भी एक तरह की वैकल्पिक दवा है। हीलिंग के जरिये असाध्य रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। आपको क्या लगता है? क्या आप मानते हैं कि स्पर्श या पवित्र जल का सेवन करने से हर तरह की बीमारी का उपचार किया जा सकता है।

01 जनवरी 2010

मन्नत के नाम पर नागों की दुर्गति

हमारे देश में मन्नतें माँगने और उन्हे पूर्ण कराने के लिए जितने प्रयास और कयास लगाए जाते हैं, उतना किसी और देश में शायद ही कहीं होता होगा। इसका ताजा उदाहरण है बुरहानपुर के उतावली नदी स्‍थित नाग मंदिर पर मन्नत माँगने वालों की भीड़, जहाँ मन्नत पूरी होने पर नाग-नागिन का जोड़ा छोड़ा जाता है।
शहर से लगी उतावली नदी के समीप स्थित अड़वाल परिवार के नाग मंदिर पर हर वर्ष ऋषि पंचमी के दिन बड़ी संख्या में लोग पहुँचते हैं। इनमें से कुछ मन्नत माँगने तो कुछ मन्नत पूरी होने पर नाग-नागिन का जोड़ा छोड़ने आते हैं।
लोग यहाँ नौकरी-पेशे, व्यवसाय में बढ़ोतरी, बच्चे की इच्छा से लेकर शारीरिक एवं मानसिक रोगों के ठीक होने तक हर प्रकार की मन्नत माँगते हैं। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु आने वाले वर्ष में इसी दिन साँपों के जोड़े को छोड़ते हैं। ये साँपों के जोड़े स्थानीय सपेरों से खरीदे जाते हैं।
एक श्रद्धालु दिलीप यादव का कहना है कि पिछले 25 सालों से वे यहाँ इच्छा पूरी होने पर साँपों के जोड़े छोड़ रहे हैं। यहाँ हमारी हर इच्छा पूर्ण हुई है।

यहाँ से जुड़ी एक किंवदंती है कि एक बार घोड़े पर सवार राज सैनिक जंगल से जा रहे थे, रास्ते में काँटों में फँसे एक साँप ने इंसानी रूप में आकर मदद की पुकार लगाई और राज सैनिकों ने उसे काँटों से मुक्त कर दिया। नाग देवता ने तब से वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति अड़वाल मंदिर पर आकर मन्नत माँगेगा, उसकी हर इच्छा पूर्ण होगी। तब से यह प्रथा चली आ रही है।
पीढ़ी दर पीढ़ी अड़वाल परिवार ही अड़वाल नाग मंदिर की पूजा-पाठ करते आ रहे हैं, इसलिए इन्हें नागमंत्री कहा जाता है। अड़वाल परिवार के अनिल भावसार का कहना है कि देश में अड़वाल नाग मंदिर एकमात्र नाग मंदिर है, जहाँ दूर-दूर से लोग मन्नत माँगने के लिए आते हैं।
यदि बात भगवान की पूजा आराधना तक सिमित हो तो इसमें कोई बुराई नहीं है परंतु निरीह प्राणियों की आस्था के नाम पर दुर्गति करना कहाँ तक उचित है। सपेरे ऋषि पंचमी से काफी पहले साँप पकड़कर उन्हें बहुत बुरी हालत में रखते हैं। श्रद्धा-भक्ति के नाम पर इन बेजुबाँ जीवों को यूँ परेशान करना, उनकी दुर्गति करना कहाँ तक उचित है? आप मुझे अपनी राय से जरूर अवगत कराएँ।

बंदर लाया गाँव में खुशहाली

क्या कभी आपने सुना है कि मृत बंदर किसी के सपने में आकर यह कहे कि मेरा क्रिया-कर्म करने से तुम्हारे गाँव में खुशहाली आएगी और गाँव वाले बंदर की बात पर भरोसा करके उसका क्रिया-कर्म करें तो इसे आप क्या कहेंगे, आस्था या अंधविश्वास?

कुछ ऐसी ही एक घटना के कारण म।प्र. के रतलाम जिले का ग्राम 'बरसी' सुर्खियों में आया। इस गाँव में गत वर्ष एक कुत्ते ने बंदर को मार डाला था। गाँव वालों ने बंदर को हनुमान का अवतार मानकर उसकी शवयात्रा निकाली, जिसमें सभी गाँववाले सम्मिलित हुए। इसके बाद बंदर को जमीन में दफनाया गया।
गाँव के लोग धीरे-धीरे उस घटना को भूल गए और अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट गए। लेकिन घटना के लगभग एक वर्ष बाद ही गाँव में एक के बाद एक विपत्तियाँ आने लगीं। गाँव के पशु बीमार पड़ने लगे तथा अल्पवर्षा से गाँव की फसलें सुखने लगीं। इसी दरमियान वह मृत बंदर गाँव के सरपंच शंकरसिंह सिसौदिया के सपने में आया। सपने में बंदर ने कहा कि तुम मेरा क्रिया-कर्म करा दो तो तुम्हारी सारी विपत्तियाँ दूर हो जाएँगी।
सपने में बंदर की यह बात सुनकर शंकरसिंह चिंतिंत होकर पड़ोस के गाँव में 'नाग देवता' के स्थान पर गया। वहाँ जाकर उसने सपने वाली बात बताई। किसी के बदन में नाग देवता आए और उन्होंने कहा कि बंदर ने जैसा कहा है, तुम वैसा ही करो।
बंदर को हनुमान का अवतार मानने वाले बरसी गाँव के निवासियों ने जनसहयोग से बंदर का क्रिया-कर्म किया। इसके लिए हर घर से 5-5 कि।ग्रा। अनाज व धनराशि एकत्र की गई। इस आयोजन हेतु आसपास के 15 गाँवों के निवासियों को सामू‍हिक भोज का न्योता भेजा गया। इसमें लगभग 1500 से 2000 लोगों ने भोजन किया। इसके बाद गाँव के हनुमान मंदिर में रातभर 'अखंड रामायण' का पाठ कराया गया।
किसी मनुष्य के मरने पर उसका जो क्रिया-कर्म किया जाता है, वैसा ही सब कुछ गाँव वालों ने बंदर के मरने पर किया। गाँव के सरपंच सहित 20-25 पुरुषों ने अपने बाल दिए और गंजे हुए। बंदर के क्रिया-कर्म की बाकी प्रक्रिया उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर की गई। सभी क्रियाएँ संपन्न होने के दो दिन बाद ही गाँव में वर्षा हुई और गाँव के पशु फिर से स्वस्थ हो गए।
इस घटना को हम आस्था कहेंगे या अंधविश्वास। क्या मानसून की अनियमितता को बंदर का कोप कहा जा सकता है या फिर बंदर के क्रिया-कर्म के बाद गाँव में खुशहाली आना सचमुच बंदर की कृपा था? जो भी हो, इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। आस्था और अंधविश्वास की यह यात्रा आपको कैसी लगी? मुझे अपने विचारों से जरूर अवगत कराएँ।

जरूर अवगत कराएँ।

क्या आप इस बात पर विश्वास करेंगे कि एक श्मशान घाट को धार्मिक स्थल के रूप में माना जाता है और उसके पास से बहने वाली नदी को उस गंगा के समकक्ष माना जाता है, जो देश की सबसे पवित्र नदी है।
जी हाँ, तन्जावुर में एक नदी के पास श्मशान घाट है जिसे वहाँ के रहने वाले लोग उसी तरह धार्मिक स्थल या तीर्थ मानते हैं जिस तरह गंगा नदी के घाट को। यहाँ बहुत लोगों से सुनने में आया है कि उनके घर के बुजुर्गों की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार राजगोरी घाट पर किया जाए और आखिरी सभी विधि-विधान उससे जुड़ी वदावरू नामक नदी के किनारे पर किए जाएँ।
यह बहुत ही बड़ा घाट है जहाँ अंतिम संस्कार के लिए सबसे ज्यादा दाह स्थल हैं। यहाँ के कर्मचारियों (वेट्टियंस) के अनुसार यहाँ एक साथ 20 अंतिम संस्कार किए जा सकते हैं।
घाट के दूसरी ओर भी बहुत से दाह स्थल थे। वहाँ मौजूद कर्मचारियों से यह मालूम हुआ कि वे सभी तन्जावुर के राजघराने के हैं और दूसरे सभी ब्राह्मण और नायक समाज के लिए हैं। 21वीं सदी में भी हर समाज के लिए यहाँ अलग-अलग दाह स्थल हैं।
यहाँ बहने वाली नदी वदावरू, कावेरी नदी की उपनदी है जिसे गंगा की तरह माना जाता है। जो लोग अपने रिश्तेदारों का दाह संस्कार करने यहाँ आते हैं वे इस नदी में स्नान जरूर करते हैं। उनका मानना है कि इस नदी में स्नान करने से मृत्यु के सारे दोष दूर हो जाएँगे।
हमारे देश में धार्मिक स्थलों जैसे मंदिर, चर्च, मस्जिद, बौद्ध और जैन धर्म स्थलों की कमी नहीं है। लेकिन एक श्मशान घाट को तन्जावुर के लोगों का धार्मिक मानना हमारे लिए एक पहेली ही है। अगर आप भी कभी ऐसे धार्मिक स्थलों के संपर्क में आएँ तो हमें जरूर बताएँ।
कैसे पहुँचे:- चेन्नई से 310 किमी दूर स्थित है तंजावुर। यहाँ पहुँचने के लिए रेल या सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। तंजावुर के नजदीक तमिलनाडु की राजधानी चिन्नई में स्थित है चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा।

मानव शरीर में देवी माँ का वास

क्या किसी इंसान के शरीर में देवी माँ की छाया नजर आ सकती है। क्या कोई इंसान देवी का रूप धारण कर अंगारों पर चल सकता है। आइए आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं कुछ ऐसे लोगों के पास जिनका दावा है कि देवी उनके शरीर में प्रवेश कर अपने भक्तों का कल्याण करती है और उनके दु:ख-दर्द दूर करती है।

आइए चलते हैं मध्यप्रदेश के शहर में...यहाँ के माँ दुर्गा के एक मंदिर में आरती शुरू होते ही कुछ महिलाओं में देवी तो कुछ पुरुषों में देवी का वाहन शेर या काल भैरव प्रवेश करते हैं और ये अजीबो-गरीब ढंग से व्यवहार करते हुए स्वयं भी देवी की आराधना करते हैं तथा देवी के रूप में भक्तों को आशीर्वाद भी देते हैं। इन लोगों में देवी का शरीर में आगमन होने का जुनून इस हद तक होता है कि ये जलता हुआ कपूर अपनी जुबान पर रखकर देवी की आरती उतारते हैं तो कुछ हाथ में जलता कपूर लेकर देवी की आरती करते हैं।
इतना ही नहीं जब देवी माँ, शेर और काल भैरव काफी लोगों के शरीर में प्रवेश कर चुके होते हैं तब ये आपस में मिलकर नाचते-खेलते हैं और जलते हुए अंगारों पर नंगे पाँव चल पड़ते हैं। इस पूरे क्रियाकलाप में आसपास मौजूद भक्त भी इनकी मदद करते हैं और तमाशे का हिस्सा बनकर इसे देवी की आराधना का जरिया मानते हैं। जलते हुए अंगारों पर खेलते-कूदते समय इनका उत्साह ऊँचाइयों पर होता है।क्या वाकई भक्तों का इस तरह से शरीर में प्रकट होने वाली देवी की आराधना करना आस्था का प्रतीक है? क्या माँ का अपने भक्तों के शरीर में प्रवेश करने को सच्चाई माना जा सकता है या यह केवल भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करने का जरिया मात्र है? आपको क्या लगता है, अपनी राय से मुझे जरूर अवगत कराएँ।

इच्छाधारी नागिन...!

आज तक आपने इच्छाधारी नागिन या नागकन्या का रूप फिल्मों में ही देखा होगा, परंतु आज हम आपको ऐसी इच्छाधारी नागिन से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो अपने नाग पति को पाने के लिए इस मृत्युलोक में साधना कर रही है।
स्वयं नागकन्या होने का दावा करने वाली माया का कहना है कि वह हर 24 घंटे में हवन के दौरान नागिन का रूप धारण कर अपनी तीन बहनों से मिलने जाती है जो उसे अपने नाग पति को पाने के लिए किस तरह साधना की जाए, यह निर्देश देती हैं। माया के मुताबिक ये तीनों बहनें भी इच्छाधारी नागिनें हैं।
खुद को बचपन से शादीशुदा समझने वाली माया नाग के नाम का सिंदूर भरती है और उसे पूरा विश्वास है कि जल्द ही उसके पति के साथ उसका मिलन होगा। माया कहती है कि फिलहाल उसका पति इस मृत्युलोक में उसके परिवार के मोह में फँसा हुआ है और उससे सारी शक्तियाँ छीनी जा चुकी हैं।अपने पूर्व जन्म की कहानी सुनाते हुए वह कहती है कि द्वापर युग के दौरान वह एक खाई में गिर गई थी तब किसी बाबा ने गोपाल नामक नाग को उसकी मदद के ‍लिए भेजा था, तभी से उन दोनों में प्रेम हो गया था। परंतु शादी न हो पाने की वजह से उसने आत्महत्या कर ली थी। ...और तब से आज तक अपने साथी को पाने के लिए भटक रही है।
नागलोक और मृत्युलोक की अजीबो-गरीब कहानियाँ सुनाने वाली यह इच्छाधारी नागिन माया मध्यप्रदेश के बड़नगर स्थित एक आश्रम में निवास करती है। इन कहानियों से प्रभावित वहाँ के निवासी इनकी महामाया माँ भगवती के रूप में आराधना करते हैं।लोगों द्वारा माया की पूजा करना आस्था का प्रतीक है या उसका इच्छाधारी नागिन होने के अंधविश्वास का प्रभाव है? आज के इस वैज्ञानिक युग में यह घटना कितनी प्रासंगिक है, अपनी राय से हमें जरूर अवगत कराएँ।

भटक रही है मुमताज!

यूँ तो विश्व प्रसिद्ध का ताजमहल बादशाह शाहजहाँ के अपनी बेगम मुमताज महल के प्रति बेपनाह मोहब्बत की कहानी को बयाँ करता है परंतु शायद बहुत कम लोग यह जानते होंगे की ताजमहल बनने तक मुमताज के मृत शरीर को बुरहानपुर के बुलारा महल में दफनाया गया था और लोगों की मानें तो इन खंडहरों में आज भी मुमताज की आत्मा भटकती है।
कहते हैं कि आज से 400 वर्ष पूर्व जब मुगलिया सल्तनत की बेगम मुमताज की मौत बुलारा महल में हुई थी, तब शाहजहाँ बुरहानपुर में ही ताजमहल का निर्माण कराने वाले थे। परंतु किसी कारणवश यह संभव न हो सका और जब आगरा में ताजमहल बनकर तैयार हुआ तो वहाँ मुमताज की देह को ले जाकर दफनाया गया। यहाँ के रहवासियों का मानना है कि मुमताज की देह तो यहाँ से निकाल ली गई पर आत्मा आज भी इसी महल में भटकती रहती है।
यहाँ के रहवासियों का कहना है कि महल से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आना तो आम बात है, परंतु आज तक यहाँ आने वाले किसी भी शख्स को मुमताज की आत्मा ने परेशान नहीं किया और न ही नुकसान पहुँचाया है।बालचंद प्रजापति का कहना है कि यहाँ मौजूद तथ्यों के आधार पर सन 1631 में यहाँ अपनी बेटी को जन्म देने के कुछ दिनों बाद ही मुमताज चल बसी थी। कहते हैं कि यही वजह है कि उनकी आत्मा इस महल में ही बस गई।
बुरहानपुर के इन खंडहरों में क्या वाकई मुमताज की आत्मा भटकती है या यह केवल असामाजिक तत्वों द्वारा लोगों को इस स्थान से दूर रखने की कोई चाल है, जिससे कि वे अपने गैर कानूनी कार्यों को चुपचाप अंजाम दे सकें। आप इस बारे में क्या सोचते हैं। यदि आप भी ऐसे किसी स्थान के बारे में जानते हैं तो मुझे जरूर बताएँ।