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08 नवंबर 2011

आत्माएं भटकती क्यों है?

जी हां!...कुछ लोगों को आत्माओं से साक्षात्कार हुआ है!....कहतें है कि मनुष्य का शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा नष्ट नहीं होती!....कुछ आत्माओं को पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता!...उनकी मुक्ति हो जाती है...वह आत्माएं ईश्वर रुपी शक्ती में विलीन हो जाती है!...उन्हे पुण्यात्मा कहा जाता है!...ज्यादातर आत्माएं एक शरीर का त्याग कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है!...आत्मा को कभी पिछ्ले जन्म की याद नही रहती!....कुछ आत्माओं को रह जाती है...नया जन्म लेने के बाद भी पिछ्ले जन्म की कहानी कहने वाले लोग मिल जातें है!...ये लोग अपने पिछ्ले जन्म के ठिकाने...गांव या शहर का नाम भी बताते है...उनकी मृत्यु कैसे हुई थी यह भी बताते है!...अपने पिछ्ले जन्म के घर का पता भी बताते है....उनके माता-पिता और भाई बहनों को ...अगर वे जिंदा है तो पहचान भी लेते है!...पिछ्ले जन्म के लोगों की फोटोएं भी पहचान लेते है!....कुछ लोगों को तो अपने पिछ्ले तीन से चार जन्मों की याद होने के उदाहरण मिले हुए है!

हां..कुछ आत्माओं को नया शरीर प्राप्त नहीं होता....और वे भटकती रहती है!...ऐसी आत्माएं दुष्ट्ता पर उतर आती है!...मौका मिलते ही किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में घुस कर उसे और उससे जुडे हुए अन्य मनुष्यों को तकलीफ देती है!...धन का नाश करती है...बिमारियां फैलाती है...गंदगी के ढेर लगाती है..कुछ आत्माएं तो जान से मार कर ही किसी शरीर को छोडती है!

कुछ आत्माएं बिना शरीर में दाखिल हुए भी किसी रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल करती है....और टेढे मेढे स्वरुप में दिखाई देती है!...उन्हे देख कर लोग डर जाते है!...पुराने आवासों मे या खंडहर या टूटे-फूटे मकानों मे बसना इन्हें अच्छा लगता है!....मनुष्य को छोड कर अन्य प्राणी इनके अस्तित्व को तुरन्त पहचान जाते है....विशेषतः कुत्ते इनकी उपस्थिति पहचान जाते है, और भौंकना शुरु कर देते है...आपने देखा होगा बिना किसी वजह के भी कुत्ता भौंकता है!....ऐसे में समझ लीजिएगा की भट्कती आत्मा वहां घूम रही है!...ऐसी आत्माओं को वहां से भगाना बहुत जरुरी हो जाता है!

देखा गया है कि कुछ भटकती आत्माएं अच्छी भी होती है और किसी की जान भी बचाती है!..बडे बडे हादसे होने वाले होते है...तब भी अच्छी आत्माएं कुछ न कुछ संकेत दे कर आने वाले संकट से हमें अवगत कराती है!...मुझे भी ऐसा ही संकेत एक आत्मा ने दिया था..उसने होने वाले ट्रेन एक्सिडैंट से मुझे आगाह कर दिया...और मेरा बचाव हो गया!..उसने ट्रेन में मौजूद अन्य लोगों को भी आगाह किया था...लेकिन वे उसका संकेत समझ नहीं पाए और जान से हाथ धो बैठे!

इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि....अगर भगवान होता है, तो आत्माएं भी अच्छी और बुरी, दोनों तरह की होती है, जिन्हें हम भूत कहतें है!

31 अक्टूबर 2011

शमशान से आकर नहाना आवश्यक क्यों ?

शवयात्रा में जाना और मृत शरीर को कंधा देना लगभग सभी धर्मों में बड़े ही पुण्य का कार्य माना गया है। धर्म शास्त्रों का कहना है कि शवयात्रा में शामिल होने और अंतिम संस्कार के मौके पर उपस्थित रहने से, इंसान को वैराग्य रूपी सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और परम फल की प्राप्ति होती है। इस मौके पर उपस्थित रहना यानि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और अंहकार जैसे मनोविकारों से कुछ समय के लिये छुटकारा पा लेना है।

पर जब शमशान जाने के इतने सारे सांसारिक और आध्यात्कि लाभ हैं, तो वहां से आकर तुरंत नहाने की जरूरत क्या है? नहाया तो जब जाता है जब हम अशुद्ध हो जाते हैं। फिर पुण्य का कार्य करके तुरंत नहाने की क्या आवश्यकता है? सतही दृष्टि से सोचने पर यहां विरोधाभास नजर आता है, किन्तु समाधान पाने के लिये गहराई में उतरने की आवश्यकता है। शव का अंतिम संस्कार होने से पूर्व ही वह वातावरण में उपस्थित सूक्ष्म एवं संक्रामक कीटाणुओं से ग्रसित हो जाता है। इसके अतिरिक्त स्वयं मृत व्यक्ति भी किसी संक्रामक रोग से ग्रसित हो सकता है। अत: वहां पर उपस्थित इंसानों पर किसी संक्रामक रोग का असर होने की संभावना रहती है। जबकि पानी से नहा लेने से संक्रामक कीटाणु आदि पानी के साथ ही बह जाते हैं।

इसके साथ ही एक अन्य कारण भी तंत्र-शास्त्रों में बताया जाता है। शमशान भूमि पर लगातार ऐसा ही कार्य होते रहने से एक प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बन जाता है जो कमजोर मनोबल के इंसान को हानि पहुंचा सकता है। क्योंकि स्त्रियां अपेक्षाकृत पुरुषों के, कमजोर ह्रदय की होती हैं, इसलिये उन्हैं शमशान भूमि जाने से रोका जाता है। दाह संस्कार के पश्चात भी मृतआत्मा का सूक्ष्म शरीर कुछ समय तक वहां उपस्थित होता है, जो अपनी प्रकृति के अनुसार कोई हानिकारक प्रभाव भी डाल सकता है।

रात में क्यों नहीं जाते हैं श्मशान?
श्मशान का नाम सुनते ही हर इंसान के मन में एक अजीब सा डर पैदा हो जाता है। आपने जब भी कभी रात के समय श्मशान में जाने की नहीं सिर्फ पास से गुजरने की बात भी यदि अपने घर के किसी बुजुर्ग के सामने कही होगी, तो उन्हें यही कहते सुना होगा कि रात के समय श्मशान नहीं जाते हैं।

ऐसी बात सुनकर सामान्यत: सभी के दिमाग में यही सवाल उठता है कि रात के समय
शमशान क्यों नहीं जाए? आखिर इसके पीछे क्या कारण है? कुछ लोग इसे सिर्फ अंधविश्वास मानते हैं लेकिन ये अंधविश्वास नहीं है। दरअसल रात के समय निशाचरी या नकारात्मक शक्तियां का अधिक प्रभाव रहता है। रात के समय नकारात्मक शक्तियां किसी भी कमजोर व्यक्ति को तुरंत अपने प्रभाव में ले लेती है।

यदि कोई व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर है, नेगेटीव थिंकिंग से घिरा हुआ है तो ये संभावना बढ़ जाती है कि उस व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियां घेर ले। जब व्यक्ति इन नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव में आ जाता है तो उसे कई तरह की परेशानियों घेर लेती हैं। इसीलिए रात के समय शमशान में जाना हमारे लिए वर्जित किया गया है। विज्ञान भी मानता है कि सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव हम पर होता है। कमजोर सोच के व्यक्तियों को नकारात्मक शक्ति तुरंत प्रभावित कर लेती है।

सिर पर चोटी यानि कमाल का एंटिना

क सुप्रीप साइंस जो इंसान के लिये सुविधाएं जुटाने का ही नहीं, बल्कि उसे शक्तिमान बनाने का कार्य करता है। ऐसा परम विज्ञान जो व्यक्ति को प्रकृति के ऊपर नियंत्रण करना सिखाता है। ऐसा विज्ञान जो प्रकृति को अपने अधीन बनाकर मनचाहा प्रयोग ले सकता है। इस अद्भुत विज्ञान की प्रयोगशाला भी बड़ी विलक्षण होती है। एक से बढ़कर एक आधुनिकतम मशीनों से सम्पंन प्रयोगशालाएं दुनिया में बहुतेरी हैं, किन्तु ऐसी सायद ही कोई हो जिसमें कोई यंत्र ही नहीं यहां तक कि खुद प्रयोगशाला भी आंखों से नजर नहीं आती। इसके अदृश्य होने का कारण है- इसका निराकार स्वरूप। असल में यह प्रयोगशाला इंसान के मन-मस्तिष्क में अंदर होती है।

सुप्रीम सांइस- विश्व की प्राचीनतम संस्कृति जो कि वैदिक संस्कृति के नाम से विश्य विख्यात है। अध्यात्म के परम विज्ञान पर टिकी यह विश्व की दुर्लभ संस्कृति है। इसी की एक महत्वपूर्ण मान्यता के तहत परम्परा है कि प्रत्येक स्त्री तथा पुरुष को अपने सिर पर चोंटी यानि कि बालों का समूह अनिवार्य रूप से रखना चाहिये।

सिर पर चोंटी रखने की परंपरा को इतना अधिक महत्वपूर्ण माना गया है कि , इस कार्य को हिन्दुत्व की पहचान तक माना लिया गया। योग और अध्यात्म को सुप्रीम सांइस मानकर जब आधुनिक प्रयोगशालाओं में रिसर्च किया गया तो, चोंटी के विषय में बड़े ही महत्वपूर्ण ओर रौचक वैज्ञानिक तथ्य सामने आए।

चमत्कारी रिसीवर- असल में जिस स्थान पर शिखा यानि कि चोंटी रखने की परंपरा है, वहा पर सिर के बीचों-बीच सुषुम्ना नाड़ी का स्थान होता है। तथा शरीर विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि सुषुम्रा नाड़ी इंसान के हर तरह के विकास में बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चोटी सुषुम्रा नाड़ी को हानिकारक प्रभावों से तो बचाती ही है, साथ में ब्रह्माण्ड से आने वाले सकारात्मक तथा आध्यात्मिक विचारों को केच यानि कि ग्रहण भी करती है

क्यों रखी जाती है सिर पर शिखा?
सिर पर शिखा ब्राह्मणों की पहचान मानी जाती है। लेकिन यह केवल कोई पहचान मात्र नहीं है। जिस जगह शिखा (चोटी) रखी जाती है, यह शरीर के अंगों, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। शिखा एक धार्मिक प्रतीक तो है ही साथ ही मस्तिष्क के संतुलन का भी बहुत बड़ा कारक है। आधुनिक युवा इसे रुढ़ीवाद मानते हैं लेकिन असल में यह पूर्णत: वैज्ञानिक है। दरअसल, शिखा के कई रूप हैं।

आधुनकि दौर में अब लोग सिर पर प्रतीकात्मक रूप से छोटी सी चोटी रख लेते हैं लेकिन इसका वास्तविक रूप यह नहीं है। वास्तव में शिखा का आकार गाय के पैर के खुर के बराबर होना चाहिए। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे सिर में बीचोंबीच सहस्राह चक्र होता है। शरीर में पांच चक्र होते हैं, मूलाधार चक्र जो रीढ़ के नीचले हिस्से में होता है और आखिरी है सहस्राह चक्र जो सिर पर होता है। इसका आकार गाय के खुर के बराबर ही माना गया है। शिखा रखने से इस सहस्राह चक्र का जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है।

शिखा का हल्का दबाव होने से रक्त प्रवाह भी तेज रहता है और मस्तिष्क को इसका लाभ मिलता है।

व्रत उपवास क्यों करें?


व्रत का अर्थ है संकल्प या दृढ़ निश्चय तथा उपवास का अर्थ ईश्वर या इष्टदेव के समीप बैठना भारतीय संस्कृति में व्रत तथा उपवास का इतना अधिक महत्व है कि हर दिन कोई न कोई उपवास या व्रत होता ही है। सभी धर्मों में व्रत उपवास की आवश्यकता बताई गई है। इसलिए हर व्यक्ति अपने धर्म परंपरा के अनुसार उपवास या व्रत करता ही है। वास्तव में व्रत उपवास का संबंध हमारे शारीरिक एवं मानसिक शुद्धिकरण से है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। 1. नित्य 2. नैमित्तिक 3. काम्य व्रत
1. नित्य: जो व्रत भगवन को प्रसन्न करने के लिए निरंतर किया जाता है।
2. नैमित्तिक: यह व्रत किसी निमित्त से किया जाता है।
3. काम्य: किसी कामना से किया व्रत काम्य व्रत है।

स्वास्थ्य: व्रत उपवास से शरीर स्वस्थ रहता है। निराहार रहने, एक समय भोजन लेने अथवा केवल फलाहार से वाचनतंत्र को आराम मिलता है। इससे कब्ज, गैस, एसिडीटी अजीर्ण, अरूचि, सिरदर्द, बुखार, आदि रोगों का नाश होता है। आध्यत्मिक शक्ति बढ़ती है। ज्ञान, विचार, पवित्रता बुद्धि का विकास होता है। इसी कारण उपवास व्रत को पूजा पद्धति को शामिल किया गया है।
कौन न करें: सन्यासी, बालक, रोगी, गर्भवती स्त्री, वृद्धों को उपवास करने पर छूट प्राप्त है।
क्या नियम है व्रत का: जिस दिन उपवास या व्रत हो उस दिन इन नियमों का पालन करना चाहिए: किसी प्रकार की हिंसा न करें। दिन में न सोएं। बार-बार पानी न पिएं। झूठ न बोलें। किसी की बुराई न करें। व्यसन न करें। भ्रष्टाचार न करने का संकल्प लें। व्यभिचार न करें।सिनेमा, जुआं, टीवी आदि न देखें।

उपवास करने से पूर्व यह भ्रम मन से निकाल दें कि इससे आप कमजोरी महसूस करेंगे। उपवास के दौरान मन प्रसंचित तथा शरीर में स्फूर्ति आती है
उपवास के समय मुंह से दुर्गन्ध सी आती महसूस होती है और जीभ का रंग सफ़ेद पड़ जाता है।यह इस बात का लक्ष्ण है कि शरीर में सफाई काम शुरू हो गया है।
शारीरिक स्वस्थ्य व मानसिक स्वस्थ्य के लिए यह अत्यंत आवश्यक है। शरीर के अन्दुरुनी भाग के सफाई के लिए उपवास एक सरल प्राकृतिक क्रिया है। इससे शरीर को आराम भी मिलता है। कुछ ऐसे भी रोग है जिनमे उपवास नहीं करनी चाहिए, जैसे- क्षय रोग, ह्रदय रोग आदि, इसी प्रकार स्त्रियों को भी गर्भावस्था में उपवास नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त कुछ रोगों में सिर्फ उपवास करना ही पर्याप्त नहीं होता , बल्कि अन्य उपायों कि भी जरुरत है, जैसे औषधि आदि इसलिए चिकिस्क कि सलाह ले लेनी चाहिए।
वैसे भी समय-समय पर एक-दो दिन का उपवास से साधारण रोगों के साथ-साथ अनेक असाध्य रोगों , जैसे मधुमेह, बबासीर आदि में अधिक लाभ मिलता है , इसके अतिरिक्त पाचन तंत्र के रोग, जैसे कब्ज़, अपच आदि में तो उपवास एक तरह से चमत्कारी प्रभाव दिखता है।
उपवास आरम्भ करने के चौबीस घंटे पहले गरिष्ठ खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। फलाहार करना ही उचित है। उपवास करते समय बहुत साबधानी बरतनी चाहिए। पेट के विभिन्न अंग उपवास कल में क्रियाशील नहीं रहते, इसलिए उपवास समाप्त करने के तुरंत बाद ही ठोस खाद्य पदार्थों का सेवन न करें। फलों का रस लेना ही ठीक रहता है
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व्रत में ऐसा हो आहार 
व्रत शरीर और मन की शुद्धि का अशक्त माध्यम है। यही नहीं, व्रत शरीर की शुद्धी के साथ-साथ रोगों के निवारण में भी सहायक है। आहार विशेषज्ञों के अनुसार सप्ताह में एक बार व्रत रखने के अनेक लाभ हैं, परन्तु व्रत के दौरान खाघ पदार्थों का उचित चयन व उपयोग नहीं हो पाता। इस सन्दर्भ में कुछ जानकारियाँ इस प्रकार हैं-
1. व्रत के दिन पानी अधिक मात्रा में लें।
2. इस दौरान अधिक परिक्श्रम का कार्य नहीं करना चाहिए।
3. व्रत के दिन दोपहरपर्याप्त मात्रा में खाघ पदार्थ लें और रात में कम खाएं।
4. पर्याप्त मात्रा में विश्राम करे और पानी में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में शहद व नीबूं मिलाकर पीते रहें।
5. उपवास के दौरान सभी गैरजरूरी पदार्थ कोलेस्ट्रांल के रूप में शरीर से बाहर निकलते हैं। वहीं कोलेस्ट्रांल को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती है।
6. व्रत के दौरान तले हुए खाघ पदार्थ कम लेने चाहिए।
7. इस मौसम में ऐसे फल लें, जिनमें पानी की पर्याप्त मात्रा उपस्थित हो।
8. फलों का ज्यूस शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देता है। फलों के जूस में चुकंदर गाजर, सेब, अनार, संतरा आदि को शुमार कर सकते हैं।
स्वस्थ लोगों के अलावा डायबिटीज व हाइपरटेंशन के मरीज भी निम्न आहार तालिका पर अमल कर सकतें हैं।
आहार तालिका
समय                             भोज्य पदार्थ
सुबह           7-8              1 गिलास पानी-शहद 1 चम्मच-नीबूं (1/2 ) रस 
                 9-10            1 कप चाय/दूध+मखाने (50 ग्रा.) भुने हुए (बिना तेल के)
मध्याह्न       12-1             फलों की चाट/सलाद+दही 1 कटोरी(150 ग्रा.), (1 सेब, 1/2 चुकंदर, 1 गाजर, 1/2 अनार, 1 खीरा, 1 ककडी, 1 संतरा)
                 4.00             चाय या दूध एक कप +मखाने भुने हुए. 
शाम           7-8              1 गिलास फलों का रस 
                 9.00            200 ग्रा. पपीता/ 1 आलू/ 1 कटोरी लौकी
                 9.30            1/2 गिलास दूध/ सिंघाड़े के आटे का पराठा+दही