27 नवंबर 2018
रसोई में स्वास्थ्य
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Posted by Udit bhargava at 11/27/2018 09:02:00 am 0 comments
21 फ़रवरी 2012
मनुष्य को हजारों चिंतायें होती हैं ।
सौजन्य से - राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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Posted by Udit bhargava at 2/21/2012 08:11:00 am 0 comments
13 फ़रवरी 2012
पूजन के वक्त सावधानियां
- घर या व्यावसायिक स्थल में पूजा का स्थान हमेशा ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) दिशा में ही होना चाहिए।
- पूजा हमेशा आसन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही करनी चाहिए। दीपक अवश्य जलाएं।
- दो शिवलिंग की पूजा एक साथ नहीं करनी चाहिए, लेकिन नर्बदेश्वर, पारदेश्वर शिवलिंग और सालिगराम घर में शुभ होते हैं।
- धर्म शास्त्रों के अनुसार तुलसी पत्र ऎसे दिन नहीं तोड़ने चाहिए, जिस दिन सूर्य संक्रांति हो, पूर्णिमा, द्वादशी, अमावस्या तिथि हो, रविवार का दिन हो, व्यतिपात, वैधृति योग हो। रात्रि और संध्याकाल में भी इन्हें नहीं तोड़ना चाहिए।
- भगवान गणपति के दूब चढ़ानी चाहिए, जिससे भगवान गणपति प्रसन्न होते हैं। जबकि देवी के दूब चढ़ाना निषेध बताया गया है।
- घी का दीपक हमेशा देवताओं के दक्षिण में तथा तेल का दीपक बाई तरफ रखना चाहिए।
- इसी प्रकार धूपबत्ती बाएं और नैवेद्य (भोग) सन्मुख रखना चाहिए।
- दो सालिगराम जी, दो शंख और दो सूर्य भी पूजा में एक साथ नहीं रखें। सालिगराम बिना प्राण प्रतिष्ठा के भी पूजा योग्य है।
- तीन गणेश व तीन दुर्गा की भी घर में एक साथ रखकर पूजा नहीं करनी चाहिए। ऎसा करने पर जातक दोष का भागी बनता है।
- देवताओं को खंडित फल अर्पण नहीं करने चाहिए। जैसे- आधा केला, आधा सेब आदि।
- पूजा के पश्चात देसी घी से प्रज्वलित दीपक से आरती अवश्य करनी चाहिए। यदि दीपक किसी कारणवश उपलब्ध नहीं हो, तो केवल जल आरती भी की जा सकती है। आरती करने से पूजा में संपूर्णता आ जाती है।
- देवताओं पर चढ़े हुए जल और पंचामृत को निर्माल्य कहा जाता है, जिसे पैरों से स्पर्श नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे बहुत बड़ा पाप लगता है। इसे किसी पेड़ में या बहते हुए जल में विसर्जित कर देना चाहिए।
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Posted by Udit bhargava at 2/13/2012 08:49:00 pm 2 comments
27 सितंबर 2011
सात अनमोल जीवन उपयोगी प्रेरणाएं
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Posted by Udit bhargava at 9/27/2011 06:04:00 pm 0 comments
26 जुलाई 2011
तनुश्री तरूणसागरजी महाराज के अमृत वचन
* कई तरह के दान में एक रक्तदान भी है। रक्तदान एक पुण्य कार्य है। खून देने से कम नहीं होता, फिर बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हम बाल काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं, हम नाखून काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं। कुए से पाने निकालते हैं और फिर बढ़ जाता । खून देने से तुम्हारा को कुछ घटता नहीं है हाँ, किसी मरते हुए को नई जिन्दगी जरूर मिल जाती है। और फिर यह भी सच है की जो देह में अनुरक्त है वह रक्त कैसे दे सकता है? रक्त पानी बने, इससे पहले उससे किसी की जिन्दगी बना दो। नदी का पानी सागर में जाकर खारा हो- इससे पहले इसे खेतों में पहुंचा दो। याद रखें जीते जी रक्तदान, जाते जाते देहदान, जाने के बाद नेत्रदान।
* मेरा मानना है की सही मायने में देश के दो ही दुश्मन हैं; एक तो कामचोर और दूसरा रिश्वत खोर। अब राजनीति में शरीफ लोगों के लिए जगह घटती जा रही हैं। जो शरीफ होता है, वह नेता नहीं बन पाता और गलती से बन जाता है तो टिक नहीं पता। टिक भी जाता है तो केवल धृतराष्ट्र- की भूमिका निभा पाता है। अच्छे और सच्चे लोग एकांत वासी होते जा रहे हैं इसलिए बुरे और अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग सत्ता पर काबिज हो गए हैं।
* संत और सैनिक को सोने मत देना। अगर ये सो गए तो समाज और देश का भाग्य सो जाएगा। पापी इंसान और भ्रष्ट नेता को जागने मत देना क्योंकि ये जाग गए तो समाज व देश का अमन चैन खो जाएगा। जिस देश का संत व सिपाही जागरूक और ईमानदार होगा वह देश कभी भी नष्ट-भ्रष्ट नहीं हो सकता। जागरूक संत और ईमानदार सिपाही ही देश को अमन चैन दे सकता है। संत सो जाए और सैनिक बेईमान हो जाए तो समाज व राष्ट्र - की शांति का भंग होना तय है।
* आँख बड़ी नालायक है। अनर्थों की जड़ मनुष्य की आँख ही है। काम आँख में पहले आता है, मन में बाद में। मन को पवित्र रखना है तो आँखों को संभालकर रखिये। आँख बिगडती है तो मन बिगड़ता है, मन बिगड़ता है तो वाणी बिगडती है। वाणी बिगडती है तो व्यवहार बिगड़ता है, व्यवहार बिगड़ता है तो पूरा जीवन बिगड़ जाता है। सीता को देख कर रावण की आँख बिगड़ी तो उसका मन बिगाड़ा गया। फिर वाणी बिगड़ी, फिर व्यवहार बिगड़ा, फिर रावण का जीवन ही बिगड़ गया। और तो क्या कहें रावण का नाम भी बिगड़ गया। हजारों साल गुजर गए पर किसी बाप ने अपने बेटे का नाम 'रावण' नहीं रखा।
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Posted by Udit bhargava at 7/26/2011 04:22:00 pm 0 comments
01 जून 2011
दुःख की उपयोगिता
हमारी दृष्टि और हमारा दृष्टिकोण दुखों और कष्टों से विचलित हो हमें ऐसा विचारने पर मजबूर कर देते हैं। अच्छे और जिम्मेदार माता-पिता भी अपने बच्चों को उसी तरह कष्ट और दुःख में डाल देते हैं जिस तरह वह परमपिता परमात्मा अपने दुनियाभर के बच्चों को कष्ट और दुःख देता है। बच्चे अगर कुछ गलत कार्य करने को अग्रसर होते हैं या कार्य कर देते हैं तो माता-पिता उन्हें डांटते ही नहीं मारते भी हैं। बच्चों की सुरक्षा, उनका समुचित विकास, उनके जीवन को सही दिशा देने और उनके भविष्य को सुनिश्चित रूप से सुखी और सम्पन्न बनाने के लिये माता-पिता को अपने बच्चों को कष्ट और दुःख में डालना ही पड़ता है। क्या इसका अर्थ यह होगा कि वे माता-पिता हैं ही नहीं या वे शैतान हैं, कदापि नहीं। ऐसे ही परम पिता परमात्मा अपने बच्चों को बिना वजह कष्ट या दुःख नहीं देता। यह दुःख या कष्ट हमारे निखार के लिये होता है। यह औषधि रूप होता है और औषधियां तो कडवी ही होती हैं। जैसे एक स्वर्णकार जब सोने को आग में तपाता है तो उसका यह कष्ट ही उसे निखार कर इस योग्य बना देते हैं कि वह वस्त्र बन किसी सम्राट के अंग जा लगता है। दरअसल दुःख और कष्ट के बिना कोई भी निखरता नहीं।
जिस कष्ट या दुःख को हम सहना नहीं चाहते और अस्वीकार कर देते हैं वह हमारे जीवन को तोड़ने लगता है जिस कष्ट या दुःख को हम स्वीकार कर लेते हैं, अंगीकार कर लेते हैं उससे हमारा जीवन निर्मित होने लगता है यानी कष्टों या दुखों को स्वीकारने से वे कष्ट या दुःख, जो हमारा विध्वंस कर सकते थे, सृजनात्मक हो जाते है। हमारे जीवन के कष्टों एवं दुखों का सकारात्मक उपयोग(स्वीकार) कर परमपिता में असीम श्रद्धा रखते हुए हमें धैर्य और साहस के साथ जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए ताकि सोने और कपास की तरह हम भी अपने आप को निखार कर इस दुनिया में अपनी उपयोगिता और श्रेष्ठा सिद्ध कर सकें। इस सन्दर्भ में वृन्द्कवि कहते हैं।
ज्यों ज्यों कंचन तैये, त्यों-त्यों निर्मल जान॥
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Posted by Udit bhargava at 6/01/2011 10:17:00 pm 1 comments
20 जून 2010
सुखपूर्वक जीने की कला
वर्तमान में लोग भिन्न-भिन्न कारणों से बहुत दुखी हैं। इसलिये जब उन्हें सूचना मिलती है कि शहर में कोई ऐसा साधु, ज्योतिषी अथवा तांत्रिक आया है, जो दूसरों का दुःख दूर कर सकता है तो वे वहीँ चल पड़ते हैं। परन्तु आजकल सच्चे साधु-संत, ज्योतिषी या तांत्रिक प्राय: मिलते नहीं। जो मिलते हैं, वे केवल पैसा कमानेवाले, अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले ही होते हैं। किसी-किसी की प्रारब्धवश झूठी प्रसिधी भी हो जाती है। किसी बनावटी साधु के पास सौ आदमी अपनी-अपनी कामना लेकर जायं तो उनमें से पच्चीस- तीस आदमियों की कामना तो उनके प्रारब्धके कारण यों ही पूर्ण हो जायेगी। परन्तु वे प्रचार कर देंते कि आमुक साधु की कृपा से, आशीर्वाद से ही हमारी कामना पूर्ण हुई। इस प्रकार बनावटी साधु का भी प्रचार हो जाता है।
परन्तु एक शहर में कोई सच्चे संत आये। वे किसी से कुछ नहीं मांगे। भिक्षा से जीवन-निर्वाह करते हैं। किसी से भी किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं जोड़ते। किसी को चेला-चेली भी नहीं बनाते। जो उनके पास आता है, उसी का दुःख दूर करने की चेष्टा करते हैं। शहर में उनकी चर्चा फ़ैली तो लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। अनेक लोग उन संत के पास इकट्ठे हो गए। कुछ लोग अपना-अपना दुःख सुनाने लगे। संत प्रत्येक श्रोता की बात सुनकर उस का समाधान करने लगे।
एक श्रोता - महाराजजी ! में बहुत दुखी हूँ। मेरा कष्ट कैसे दूर हो?
संत - देखो भाई ! संसार में सुख भी है, दुःख भी। आजतक एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ, जो सदा सुखी रहा हो अथवा सदा दुखी रहा हो। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, वैसे ही सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता ही है। न तो दुःख सदा रहता है, न दुःख. इसलिये घबारो मत। केवल इस सत्य को स्वीकार कर लो कि यह समय सदा ऐसा नहीं रहेगा। रात बीतेगी, दिन आयेगा।
श्रोता - परन्तु वर्तमान में जो दुःख है, वह मुझसे सहन नहीं हो रहा है। कोइ उपाय बताएं।
संत - उसके लिये भगवान् से प्रार्थना करो। व्याकुल होकर भगवान् को पुकारो। उन्हें पुकारने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।
श्रोता - में भगवान् से प्रार्थना करता हूँ, पर वे सुनते ही नहीं!
संत - ऐसी बात नहीं है।
सच्चे ह्रदय से प्रार्थना जब भक्त सच्चा गाय है।
तो भक्तवत्सल कान में वह पहुँच झट ही जाय है।।
भगवान् तो सबके ह्रदय में बैठे हैं। वे आपकी प्रत्येक प्रार्थना सुनते हैं।
भगवान् वही कार्य करते हैं। जिससे परिणाम में मनुष्य का हित हो।
भगवान् श्री कृष्ण पांडवों के मित्र थे। द्रौपदी के पुकारते ही वे प्रकट हो जाते थे। फिर भी पांडवों को कितना कष्ट भोगना पडा! तुम्हारा काम है कि उन्हें पुकारो!
'हरिस्मृति: सर्वविपद्वीमोक्षणं'
'भगवान् की स्मृति समस्त विपत्तियों से मुक्त कर देती है।'
अन्य श्रोता - भगवान् दुःख देते क्यों हैं?
संत - भगवान् के पास दुःख है ही नहीं, फिर वे दुःख देंगे कैसे? दुःख तो तुम्हारा अपना पैदा किया हुआ है।
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फ़लु चाखा॥
भगवान् तो तुम्हारे किये कर्मों का फल भुग्ताकर तुम्हें शुद्ध कर रहें हैं, मुक्त कर रहे हैं। भगवान् आनंददाता हैं, दुखदाता नहीं। वे तो तुम्हें दुखों से छुडाना चाहते हैं। परन्तु तुम उनसे विमुख होकर संसार में लगे हो, जो दुखालय है, दुखों का घर है। अब भैया, तुम ही सोचो, तुम्हारा दुःख दूर कैसे होगा?
दुःख भगवान् द्वारा बनायी सृष्टि में नहीं है, अपितु जीव द्वारा बनायी सृष्टि (मैं- मेरापन) में हैं। यदि जीव मैं-मेरापन मिटा दे तो दुखों की जड़ ही कट जायेगी। परमश्रधेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज कहते थे कि त्याग से सुख मिलता है - यह अटकल लोगों को आती नहीं, तभी वे दुःख पाते हैं। दुःख से बचने का उपाय सुख नहीं है, अपितु त्याग है।'
अन्य श्रोता - महाराज ! मेरे व्यापार में निरंतर घाटा लग रहा है! आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी है। क्या करूं?
संत - रुपयों के अभाव को हम रुपयों से मिटा लेंगे- इसके समान कोई मूर्खता नहीं है! तुम प्रयत्न मत छोड़ो। पर भैया ! मिलेगा वही, जो तुम्हारे भाग्य में लिखा है। जो तुम्हें मिलने वाला है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा। उस कोई दूसरा छीन सकता ही नहीं। एक लोटेको चाहे तालाब में डुबाओ, चाहे समुद्र में, जल लोटा भर ही निकलेगा।
जब दांत न थे तब दूध दियो,
अब दांत भये कहा अन्न न दैहैं।
जीव बसे जल में थल में,
तिन की सुधि लेई सौ तेरीहु लैहैं।।
जान को देत अजान को देत,
जहान को देत सौ तोहूँ कूँ दैहैं।
काहे को सोच करैं मन मूरख,
सोच करै कछु हाथ न ऐहैं।।
श्रोता - लडकियां बड़ी हो रही हैं। भविष्य में उनका विवाह भी करना है! कैसे होगा?
संत - इसके लिये चेष्टा करो, पर चिंता मत करो -"होइहि सोई जो राम रची राखा'। लडकियां केवल तुम्हारे प्रारब्धपर ही निर्भर नहीं हैं। उनका अपना भी प्रारब्ध है। इसलिए समय आने पर उनके प्रारब्ध के अनुसार जो मिलना है, वह अवश्य मिलेगा और उनका विवाह हो जायेगा।
अन्य श्रोता - बेटा मेरे प्रतिकूल चलता है। मेरी बात बिल्किल नहीं मानता।
संत - ऐसा समझो कि वह तुम्हारे पूर्वजन्म का बाप है! उसकी बात यदि अनुचित न हो तो मान लो। तुम्हें जो बात उचित दीखे, वह उससे कह दो। अब वह माने या न माने, उसकी मर्जी। यह आग्रह छोड़ दो कि वह मेरी बात माने।
जो पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान।
क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान।।
भैया ! जब वह तुम्हारी बात मानता ही नहीं, तो फिर उसे अपना बेटा मानते ही क्यों हो? उसे अपना न मानकर भगवान् का मान लो, उसे भगवान् के अर्पण कर दो।
अन्य श्रोता - मैंने अपने रिश्तेदारों की समय पर बहुत सहायता की। पर अब वे मेरे विरुद्ध चलते हैं। वे दूसरों के आगे मेरी निंदा करते हैं और मेरे बारे में झूठी-झूठी बातें फैलाते हैं।
संत - तुम उनकी तरफ न देखकर अपने को देखो कि कहीं तुमसे कोइ गलती तो नहीं हुई है। यदि अपनी कोई गलती दीखे तो उसे दूर कर दो, और यदि अपनी कोई गलती न दीखे तो फिर दुखी होने की कोई जरूरत नहीं, प्रसन्न रहो। यह आशा मत रखो कि दूसरे तुम्हारे अनुकूल चलें। दूसरे सब हमारे अनुकूल चलें - यह सम्भव ही नहीं है। बड़े-बड़े संत हुए, भगवान् के अवतार हुए, पर उनके भी सब अनुकूल नहीं हुए।
अन्य श्रोता - महाराज जी ! मैंने सदा दूसरों पर विशवास किया, पर मेरे साथ सदा धोखा ही हुआ है।
संत - विश्वास करने योग्य तो केवल भगवान् ही है। संसार विशवास करने योग्य है ही नहीं। संसार पर विशवास करोगे तो धोखा ही मिलेगा।
संसार साथी सब स्वार्थ के हैं,
पक्के विरोधी परमार्थ के हैं।
देगा न कोइ दुःख में सहारा,
सुन तू किसी की मत बात प्यारा।
X X X
सच्चा मित्र और जन्म का साथी ईश्वर सर्वाधार,
राधेश्याम शरण चल उसकी, तब तो बड़ा पार,
दुखी का वही ठीकाना है।
किससे करिए प्यार यार खुदगर्ज ज़माना है।।
संसार सेवा के योग्य है, विश्वास के योग्य नहीं। उसकी सेवा कर दो, पर विशवास मत करो।
अन्य श्रोता - महाराजजी ! मेरी कोई संतान नहीं है। मन में चिंता रहती है कि बुढापे में हमारी सेवा कौन करेगा? क्या कोई बालक गोद ले लें?
संत - संसार में देखो, जिनकी संतान है, वे सब सुखी हैं क्या? कई लोग तो अपनी संतान से इतने दुखी हैं कि सोचते हैं, संतान न होती तो अच्छा होता! क्या इस बात का तुम्हें पता है कि संतान होने से तुम सुखी हो ही जाते अथवा बुढापे में तुम्हारी सेवा होती ही? यदि बुढापे में सबकी संतान सेवा करती तो आज वृद्धाश्रम क्यों बनाए जा रहे हैं? जब अपनी संतान भी सेवा नहीं करते तो फिर गोद लिया बालक तुम्हारी सेवा करेगा, इसकी क्या गारंटी है? यदि प्रारब्ध में होगा तो बुढापे में उन लोगों की उपेक्षा भी अच्छे सेवा होगी, जिनकी संतान है। भगवान् किसी ऐसे व्यक्ति को भेज देंगे, जो बेटे से भी बढ़कर तुम्हारी सेवा करेगा। अतः भविष्य की चिंता मत करो।
अन्य श्रोता - मैं लम्बे समय से बीमार हूँ। किसी ने मुझ पर तांत्रिक प्रयोग कर दिया है। कोई उपाय बताएं।
संत - यदि कोई तांत्रिक प्रयोग करता है तो उसका असर हम पर तभी पड़ता है, जब हमारे प्रारब्ध वैसा हो। दूसरा तो केवल उसमें निमित्त बनता है। यदि हमारे प्रारब्ध में न हो तो हमें कष्ट पहुंचाने की किसी में ताकत है ही नहीं। यदि तुम बीमार रहते हो तो यह तुम्हारा प्रारब्ध है, पुरारे कर्मों का फल है और दूसरे (तांत्रिक प्रयोग करने वाले) का यह नया कर्म है, नया पाप है, जिसका फल उसे भविष्य में भुगतना पडेगा। याद रखो कि दूसरा कोई भी व्यक्ति तुम्हें सुख या दुःख नहीं पहुंचा सकता -
सुखस्य दुखास्य न कोSपि दाता
परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।
अहं करोमीति वृथाभिमान:
स्वकर्मसूत्रे ग्रथितो हि लोक:॥
'सुख या दुःख को देने वाला कोई और नहीं है। कोई दूसरा सुख-दुःख देता है- यह समझना कुबुद्धि है। मैं करता हूँ - यह वृथा अभिमान है। सब लोग अपने-अपने कर्मों की डोरी से बंधे हुए हैं
काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता।
निज कृत करम भोग साबू भ्राता।।
अन्य श्रोता - महाराजजी ! मैं बहुत दुखी हूँ। मुझसे दुःख सहा नहीं जाता। मेरे मन में आत्महत्या करने की आती है।
संत - आत्महत्या करने से तुम अपने कर्मों के भोग से बच नहीं सकते। पूर्वकृत कर्मों का फल तो भोगना ही पडेगा, आत्महत्या करने से एक मनुष्य की हत्या करने का पाप लगता है। अत: आत्महत्या करने से तुम दुखों: से छूटोगे नहीं, अपितु और अधिक दु:खी हो जाओगे और प्रेतयोनि में भटकते रहोगे, नरकों में तडपते रहोगे। अभी जो दु:ख है, वह आगे मिट भी सकता है और तुम भविष्य में सुखी भी हो सकते हो। अंधेरी रात बीतने पर सूर्य का उदय भी हो जाता है। अत: अभी निराश न होकर नयी सुबह की प्रतीक्षा करो।
अन्य श्रोता - महाराज ! मैं पारिवारिक समस्याओं से बहुत दुखी हूं। कोई उपाय बतायें।
सन्त - दु:ख का मूल कारन है ममाता ! जिन वस्तुओं और व्यक्तियों में हमारी ममता है, उन्हीं के बनने-बिगडने का असर हम पर पडता है। संसार में असंख्य वस्तुएं हैं, पर उनके बनने-बिगडने, जीने-मरने आदि का असर हम पर नहीं पडता। इसलिये किसी भी वस्तु-व्यक्ति में ममता मत करो, फ़िर दु:ख नहीं आयेगा।
विचार करो, जितनी भी वस्तुएं और व्यक्ति हैं, वे सब-के-सब मिलने बिछुडनेवाले हैं। पहले वे हमारे साथ नहीं थे, पीछे वे हमें मिल गये, और भविष्य में वे सदा हमारे साथ नहीं रहेंगे, एक दिन वे हमसे बिछुड जायेगे अथवा हम उनसे बिछुड जाएंगे।
प्राय: मनुष्य अपने खराब स्वभाव के कारण दु:ख पाता है। अत: अपना स्वभाव सुन्दर बनाओ।
आगे पढें
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Posted by Udit bhargava at 6/20/2010 07:50:00 pm 0 comments
01 मई 2010
कब और किसे मिलते हैं भगवान ?
प्यास जगे तो बात बने: अध्यात्म क्षेत्र के तत्व ज्ञानियों का यह अनुभव सिद्ध मत है कि, जिसके बिना इंसान किसी भी कीमत पर रह ही न सके वो चीज उसे तत्काल और भरपूर मात्रा में मिल जाती है। हवा, पानी, प्रकाश आदि चीजें जितनी जरूरी हैं, ईश्वर ने उन्हैं उतना ही सुलभ बना रखा है। यही बात ईश्वर प्राप्ति के विषय में भी लागू होती है। यदि किसी भक्त के मन में ईश्वर को पाने की प्यास सांस को लेने की प्यास जितनी तीव्र हो जाए तो तत्काल ईश्वर मिल सकता है। मीरा, नानक, रैदास, कबीर, रामकृष्ण-परमहंस, सूर तथा तुलसी आदि भक्तों को भगवान तभी मिले, जब उनके मन में ईश्वर प्राप्ति की तीव्र प्यास जाग गई।
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Posted by Udit bhargava at 5/01/2010 08:33:00 am 0 comments
30 अप्रैल 2010
क्यों और कैसे किये जाते हैं सोलह श्रंगार ?
शौच- यानि कि शरीर की आन्तरिक एवं बाह्य पूर्ण शुद्धि।
उबटन- यानि हल्दी, चंदन, गुलाब जल, बेसन तथा अन्य सुगंधित पदार्थौ के मिश्रण को शरीर पर मलना।
स्नान- यानि कि स्वच्छ, शीतल या ऋतु अनुकूल जल से शरीर को स्वच्छता एवं ताजगी प्रदान करना
केशबंधन- केश यानि बालों को नहाने के पश्चात स्वच्छ कपड़े से पोंछकर,सुखाकर एवं ऋतु अनुकूल तेलादि सुगंधित द्रव्यों से सम्पंन कर बांधना।
अंजन- यानि कि आंखों के लिये अनुकूल व औषधीय गुणों से सम्पंन चमकीला पदार्थ पलकों पर लगाना।
अंगराग- यानि ऐक ऐसा सुगंधित पदार्थ जो शरीर के विभिन्न अंगों पर लगाया जाता है।
महावर-पैर के तलवों पर मेहंदी की तरह लगाया जाने वाला एक सुन्दर व सुगंधित रंग।
दंतरंजन-यानि कि दांतों को किसी अनुकूल पदार्थ से साफ करना एवं उनके चमक पैदा करना।
ताम्बूल- यानि कि बढिय़ा किस्म का पान कुछ स्वादिष्ट एवं सुगंधित पदार्थ मिलाकर मुख में धारण करना।
वस्त्र- ऋतु के अनुकूल तथा देश, काल, वातावरण की दृष्टि से उचित सुन्दर एवं सोभायमान वस्त्र पहनना।
भूषण- यानि कि शोभा में चार चांद लगाने वाले स्वर्ण, चांदी, हीरे-जवाहरात एवं मणि-मोतियों से बने सम्पूर्ण गहने पहनना।
सुगन्ध- वस्त्राभूषणों के पश्चात शरीर पर चुनिंदा सुगंधित द्रव्य लगाना। पुष्पहार-सुगंधित पदार्थ लगाने के पश्चात ऋतु-अनुकूल फूलों की मालाएं धारण करना।
कुंकुम- बालों को संवारने के बाद में मांग को सिंदूर से सजाना।
भाल तिलक- यानि कि मस्तक पर चेहरे के अनुकूल तिलक या बिन्दी लगाना।
ठोड़ी की बिन्दी-अन्य समस्त श्रृंगार के पश्चात अन्त में ठोड़ी यानि चिबुक पर सुन्दर आकृति की बिन्दी लगाना।
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Posted by Udit bhargava at 4/30/2010 08:30:00 am 0 comments
29 अप्रैल 2010
जीवन में बहुत टेंशन है...
परंतु आज के दौर में जब हमारे समयाभाव है और इसी के चलते हम मंदिर नहीं जा पाते, विधि-विधान से पूजा-अर्चना नहीं कर पाते हैं। ऐसे में भगवान की कृपा कैसे प्राप्त हो? क्या किया जा जिससे कम समय में ही हमारे सारे दुख-कलेश, परेशानियां दूर हो जाए?
अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता श्री हनुमान... जिनके हृदय में साक्षात् श्रीराम और सीता विराजमान हैं... जिनकी भक्ति से भूत-पिशाच निकट नहीं आते... हमारे सारे कष्टों और दुखों को वे क्षणांश में ही हर लेते हैं। ऐसे भक्तवत्सल श्री हनुमान की स्मरण हम सभी को करना चाहिए।
तो आपकी सभी समस्या का सबसे सरल और कारगर उपाय है हनुमानचालीसा का जाप। कुछ ही मिनिट की यह साधना आपकी सारी मनोवांछित इच्छाओं को पूरा करने वाली है। हनुमान चालिसा का जाप कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है। गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित हनुमान चालीसा अत्यंत ही सरल और सहज ही समझ में आने वाला स्तुति गान है। हनुमान चालीसा में हनुमान के चरित्र की बहुत ही विचित्र और अद्भुत व्याख्या की गई हैं। साथ ही इसके जाप से श्रीराम का भी गुणगान हो जाता है। हनुमानजी बहुत ही कम समय की भक्ति में प्रसन्न होने वाले देवता है। हनुमान चालीसा की एक-एक पंक्ति भक्ति रस से सराबोर है जो आपको हनुमान के उतने ही करीब पहुंचा देगी जितना आप उसका जाप करेंग। कुछ समय में इसके चमत्कारिक परिणाम आप सहज ही महसूस कर सकेंगे।
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Posted by Udit bhargava at 4/29/2010 08:28:00 am 0 comments
28 अप्रैल 2010
सबसे पहले स्वयं बदलने पर दें अपना ध्यान
हर इंसान दूसरों को अपने हिसाब से ढालना चाहता है। जबकि वह स्वयं तो अपने बीवी-बच्चों की कसोटी पर ही खरा नहीं है,दुनिया की बात ही कोन करे। लाख चाहकर भी कोई किसी को बदल नहीं पाता,उसे स्वयं ही बदलना होता है। जीवन का अनुभव यही सिखाता है कि दूसरों को बदलने की कोशिस करना अपना समय और श्रम बर्बाद करना है। इंसान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि ईश्वर ने उसे स्यमं को बदलने की पूरी अथारिटी दे रखी है। जब वह खुद को बदल लेता है तो उसकी दुनियां में कमाल हो जाता है, चमत्कार ही उतर आता है। यदि जीवन और दुनिया के प्रति हमारा दृष्टिकोण या नजरिया बदल जाता है तो, निश्चित रूप से हमारा जीवन और हमारी दुनिया खुद ब खुद बदल जाते हैं। किसी के लिये जिंदगी और जहान में आनंद ही आनंद है तो किसी को सबकुछ दु:ख और उदासी से भरा हुआ लगता है। भले ही दोनों की आर्थिक व सामाजिक हालत समान हो। अत:हकीकत यही है कि इंसान का दृष्टिकोण बदलने से उसकी दुनिया भी बदल जाया करती है।
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Posted by Udit bhargava at 4/28/2010 08:27:00 am 0 comments
26 अप्रैल 2010
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (1-25)
1 सत्य परायण मनुष्य किसी से घृणा नहीं करता है।
2 जो क्षमा करता है और बीती बातों को भूल जाता है, उसे इश्वर पुरस्कार देता है।
3 यदि तुम फूल चाहते हो तो जल से पौधों को सींचना भी सीखो।
4 इश्वर की शरण में गए बगैर साधना पूर्ण नहीं होती।
5 लज्जा से रहित व्यक्ति ही स्वार्थ के साधक होते हैं।
6 जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
7 रोग का सूत्रपान मानव मन में होता है।
8 किसी भी व्यक्ति को मर्यादा में रखने के लिये तीन कारण जिम्मेदार होते हैं- व्यक्ति का मष्तिष्क, शारीरिक संरचना और कार्यप्रणाली, तभी उसके व्यक्तित्व का सामान्य विकास हो पाता है।
9 सामाजिक और धार्मिक शिक्षा व्यक्ति को नैतिकता एवं अनैतिकता का पाठ पढ़ाती है।
10 यदि कोई दूसरों की जिन्दगी को खुशहाल बनाता है तो उसकी जिन्दगी अपने आप खुशहाल बन जाती है।
11 यदि व्यक्ति के संस्कार प्रबल होते हैं तो वह नैतिकता से भटकता नहीं है।
12 सात्त्विक स्वभाव सोने जैसा होता है, लेकिन सोने को आकृति देने के लिये थोड़ा-सा पीतल मिलाने कि जरुरत होती है।
13 संसार कार्यों से, कर्मों के परिणामों से चलता है।
14 संन्यास डरना नहीं सिखाता।
15 सुख-दुःख जीवन के दो पहलू हैं, धूप व छांव की तरह।
16 अपनों के चले जाने का दुःख असहनीय होता है, जिसे भुला देना इतना आसान नहीं है; लेकिन ऐसे भी मत खो जाओ कि खुद का भी होश ना रहे।
17 इंसान को आंका जाता है अपने काम से। जब काम व उत्तम विचार मिलकर काम करें तो मुख पर एक नया-सा, अलग-सा तेज आ जाता है।
18 अपने आप को अधिक समझने व मानने से स्वयं अपना रास्ता बनाने वाली बात है।
19 अगर कुछ करना व बनाना चाहते हो तो सर्वप्रथम लक्ष्य को निर्धारित करें। वरना जीवन में उचित उपलब्धि नहीं कर पायेंगे।
20 ऊंचे उद्देश का निर्धारण करने वाला ही उज्जवल भविष्य को देखता है।
21 संयम की शक्ति जीवं में सुरभि व सुगंध भर देती है।
22 जहाँ वाद-विवाद होता है, वहां श्रद्धा के फूल नहीं खिल सकते और जहाँ जीवन में आस्था व श्रद्धा को महत्व न मिले, वहां जीवन नीरस हो जाता है।
23 फल की सुरक्षा के लिये छिलका जितना जरूरी है, धर्म को जीवित रखने के लिये सम्प्रदाय भी उतना ही काम का है।
24 सभ्यता एवं संस्कृति में जितना अंतर है, उतना ही अंतर उपासना और धर्म में है।
25 जब तक मानव के मन में मैं (अहंकार) है, तब तक वह शुभ कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि मैं स्वार्थपूर्ति करता है और शुद्धता से दूर रहता है।
इन्हें भी देखें :-
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (26-50)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (51-75)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (76-100)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (101-125)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (126-150)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (151-175)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (176-200)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (201-225)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (226-250)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (251-275)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (276-300)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (301-325)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (326-350)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (351-375)
ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (376-400)
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Posted by Udit bhargava at 4/26/2010 10:28:00 pm 0 comments
बुराई एक स्थान पर रहेगी तो...
एक परम तपस्वी संत अपने शिष्यों के साथ देश भ्रमण पर निकले। घुमते-घुमते वे एक गांव में पहुंचे जहां गांव वालों ने उनका घोर निरादर किया। किसी ने उन्हें पानी पीने के लिए तक नहीं कहा। वहां वे कुछ दिन रुके परंतु इतने दिनों में एक भी बार किसी ने महात्माजी और उनके शिष्यों की ओर ध्यान नहीं दिया। गांव के सभी लोग स्त्रियों सहित असभ्य, दुराचारी और सभी प्रकार की बुराइयों वाले थे। सभी धर्म के पथ से विमुख थे। किसी ने कभी सपने में भी कोई अच्छा काम नहीं किया था।
जब शिष्यों ने देखा कि यहां स्वामीजी का घोर निरादर हो रहा है तो उन्होंने स्वामीजी से कही और चलने का आग्रह किया तब वे उस अधर्म से भरे गांव के बाहर आ गए। गांव से बाहर आते ही संत ने गांव वालो को आशीर्वाद दिया कि आबाद रहो, खुश रहो, यहीं इसी गांव में सदा निवास करों। ऐसे आशीर्वाद को सुनकर सभी शिष्यों को आश्चर्य हुआ पर कोई कुछ नहीं बोला।इसी तरह कुछ दिन चलने के बाद वे एक अन्य गांव में पहुंचे। उस गांव में सभी लोग धर्म के मार्ग पर चलने वाले, दान-पुण्य करने वाले, अतिथियों का सत्कार करने वाले थे। स्वामीजी को शिष्यों सहित देखकर गांव वालों को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनका बहुत स्वागत सत्कार किया। उनके खाने, पीने, रहने का उत्तम प्रबंध किया और सभी स्वामीजी की सेवा सदैव लगे रहने लगे। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। तब स्वामीजी ने आदेश दिया अब यहां से चलना होगा। शिष्यों ने गांव छोडऩे की तैयारी शुरू कर दी। उन्हें जाता देख गांवों वालों गहरा दुख हुआ और स्वामीजी को रोकने की चेष्टा भी की परंतु वे नहीं रुके और गांव से बाहर आ गए। बाहर आकर स्वामीजी ने उस गांव को लोगों को आशीर्वाद दिया कि पूरे देश में फैल जाओ, एक साथ मत रहो।
ऐसा आशीर्वाद सुनकर शिष्यों से रहा नहीं गया और वे बोले कि स्वामीजी जिस गांव के अधर्मी और कुमार्गी लोगों हमारा घोर निरादर किया उन्हें आपने आबाद रहने और उनके गांव में रहने का आशीर्वाद दिया। परंतु यहां के लोगों ने हमारा इतना आदर सत्कार किया, सभी धर्म का सख्ती से पालन करने वाले हैं उनकों अलग होने का आशीर्वाद क्यों?
तब संत मुस्कुराए और कहा अधर्म एक ही जगह रहेगा तो वे धर्म पर चलने वाले लोगों बिगाड़ नहीं सकेगा। अधर्मी और कुमार्ग पर चलने वाला दूसरी जगह जाएगा तो वह वहां भी अधर्म फैलाएगा। इसलिए सभी अधर्मी और बुरे लोग एक जगह रहे वो ज्यादा अच्छा है। वहीं दूसरी ओर धर्म के मार्ग पर चलने वाले जहां जाएंगे वहां सभी को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देंगे। इससे चारों ओर धर्म और अच्छाई बढ़ेगी।
स्वामीजी का उत्तर सुनकर सभी शिष्य को परम सुख की अनुभूति हुई और वे अन्य स्थान की ओर चल दिए।
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Posted by Udit bhargava at 4/26/2010 08:19:00 pm 0 comments
25 अप्रैल 2010
गहराई तक उतरने का अवसर देते हैं शब्द
शब्दों को केवल भाषा और व्याकरण से जोड़ने की भूल न करें। सूफी संतों ने भक्ति के क्षेत्र में शब्दों को च्च्नामज्ज से जोड़ा है। नाम की बड़ी महिमा रही है। नाम यानी उस परमसत्ता का जो भी नाम आप दे दें इसे अध्यात्म में पूंजी माना गया है। नानक कह गए हैं-च्च्नानक नामु न वीसरै छूटै सबदु कमाइज्ज यानी नाम को भी भूलें ना, हमेशा शब्द की कमाई करते रहें, क्योंकि जिस दिन इस शरीर का मकसद पूरा होगा उस दिन यह केवल नाम कमाई से ही होगा।जिन्हें ध्यान में उतरना हो, परमात्मा पाने की ललक हो वे मन को विचारों से मुक्त करने के लिए नाम या शब्द से मन को जोड़ दें। नाम जप जितना अंदर उतरता है, गहरा होता जाता है तब मनुष्य उस शब्द की ध्वनि में सारंगी जैसा मधुर स्वर सुन सकेगा। हम बाहर से कोई संगीत, स्वर, तर्ज सुनकर ही थिरक उठते हैं रोमांचित हो जाते हैं तो कल्पना करिए ऐसा मधुर स्वर जब भीतर से सुनाई देने लगेगा तब साधक को जो तरंग उठेगी उसी का नाम आनंद होगा। नानक ने इसी के लिए कहा है
घटि घटि वाजै किंगुरी अनदिनु सबदि सुभाइ
यह सारंगी की आवाज जब हमारे भीतर से आने लगेगी तो हमें यही सुरीला स्वर दूसरों के भीतर भी सुनाई देने लगेगा। हरेक के भीतर वही धुन। यहीं से अनुभूति होगी च्च्सिया राम मय सब जग जानीज्ज के भाव की। फिर नानक लिखते हैं च्च्विरले कउ सोझी पई गुरमुखि मनु समझाइज्ज जो इस आवाज को सुनते हैं उन्हें नानक गुरुमुख कहते हैं और ये वो लोग होते हैं जो च्च्मनु समझाएज्ज की क्रिया करते रहते हैं। सीधी बात यह है कि जो अपने मन को समझा लेते हैं वे गुरुमुख होते हैं। वे इस कला को जानते हैं कि कैसे मन से शब्द या नाम को जोड़कर परमात्मा से मिलने की तैयारी की जाए।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:57:00 am 0 comments
हर सुख के पीछे से आता है दु:ख
सुख कभी अकेला नहीं आता, उसके पीछे से चुपके-चुपके दु:ख भी आ जाता है। हमें समझना चाहिए कि दु:ख भी जीवन के लिए उतना ही जरूरी है जितना सुख। हम लाख चाहें, दु:ख को आने से नहीं रोक सकते, न सुख को जाने से रोक सकते हैं। हां, तरीका बदला जा सकता है, हम तलाश करें ऐसे सुख की जो स्थायी हो, दु:ख रहे या चला जाए, सुख चिरस्थायी हमारे साथ ही बना रहे।
स्नान करके तन तो शुद्ध किया जाता है लेकिन मन को शुद्ध करने के लिए ध्यान ही करना पड़ेगा। ध्यान की प्रत्येक विधि शुद्ध होने की प्रक्रिया है। यूं भी कहा जा सकता है कि शुद्धता की शोध का नाम ही ध्यान है। आत्मा का सुख पाने के लिए मन और शरीर को भूलना होगा। इन दोनों के विस्मरण में ही आत्मा का स्मरण है और यहीं परमात्मा की अनुभूति है जिसे सामान्य भाषा में आस्तित्व का आनंद कहा गया है।हम दोनों ओर देखने की कोशिश करते हैं बाहर भी भीतर भी। वह भी एक साथ, यह असंभव है। जब अपने भीतर भी उतर रहे हों तो पूरा भीतर उतरें, बाहर को उन क्षणों में भूल ही जाएं। इस भीतर उतरने की क्रिया में ज्यादा अक्ल भी नहीं लगाना पड़ती है। हमारे सामने कबीर और बुद्ध का उदाहरण है। कबीर अनपढ़ थे कुछ तो उन्हें बुद्धु भी मानते रहे। बुद्ध परम विद्वान थे। लेकिन दोनों गहरे में जहां पहुचे वहां जाकर फर्क समाप्त हो गया। नतीजा यह है कि परमात्मा की निकटता को, ध्यान की अवस्था को बुद्धु भी पा सकते हैं बुद्धिमान भी। इसलिए ध्यान लगाने के लिए बुद्धिमान होना जरूरी नहीं है, हां समर्पित होना जरूरी है।समर्पित होने का लाभ यह भी है कि हम सुख-दुख से परे आनंद की स्थिति में जीने लगते हैं। हम जीवनभर सुख की तलाश में रहते हैं। सफलता, महत्वाकांक्षा के लिए अपना सबकुछ झोंक देने को तैयार रहते हैं। इस दौरान हमें जो सुख मिल भी जाते हैं वे दुख मिश्रित होते हैं। सफलता के लगे-लगे दुख भी होते हैं। कभी-कभी दुख इतने भारी होते हैं कि हमें पूरी तरह से तोड़ जाते हैं और हमारी सफलता का मजा खत्म ही हो जाता है। दुख मिश्रित सुख की जगह शुद्ध सुख चाहते हैं तो स्व की ओर चलना होगा, मुड़िए भीतर। वहां जो समाधि सुख मिलेगा उसमें दुख का कोई मिश्रण नहीं होगा।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:56:00 am 0 comments
नजरिया बदलें, नजर अपने आप बदल जाएगी
अपनी उपलब्धियों के पीछे उपयोग किए गए साधनों की शुद्धता के प्रति अत्यधिक सावधान रहें। आपके किए जा रहे काम की नीयत परिणाम पर उसर रखेगी। शहंशाह अकबर की तारीफ में स्वामी रामतीर्थ कहते थे जहां चाहे जिस गोद को चाहे अपना सरहाना बनाकर बेफिक्री से जो नींद निकाल सकता था, आईने अकबरी के लेखक अबुल फजल, पुर्तगाल के पादरी, बड़े बड़े हिन्दू पंडितों के दिल में जो राज करता था वो शाहंशाह अकबर था। उनकी नजर में अकबर एक आध्यात्मिक आदमी था। अकबर की दिनचर्या थी च्च्नमाजोरोजा ओ तसवीही-तोबा इस्तगफारज्ज यानी नमाज, रोजा तसबीह (माला) तोबा (पश्चाताप) और इस्तगफार (क्षमा-प्रार्थना)।दरअसल रामतीर्थ जिस ओर इशारा कर रहे हैं वह हमारे काम की बात है। अकबर के जीवन में लगातार जीत हांसिल हो रही थी। अकेले में अकबर को ख्याल आता था धन मेरा सेवक, वैभव मेरा अनुचर हो गया है आखिर इतनी ताकत मेरे दिल दिमाग में कहां से आती है, कौन देता है?
इसी कारण सूफी संतों की संगत उन्हें खूब लुभाती थी। ऐसी कामयाबी पर रामतीर्थ की टिप्पणी थी कि क्या भोग विलास और कामयाबी एक साथ चल सकते हैं। चिमगादड़ भले ही दोपहर के वक्त शिकार करने आ जाए लेकिन सियाह दिली (हृदय की मालिकता) सफलता के तेज को नहीं सह सकती है।रामतीर्थ का संकेत है कि सफल आदमी के जीवन का शुभ पक्ष देखा जाए तो हम भी अपने सफल होने के इरादे को मजबूत बनाए रख सकेंगे। हर राजा की आलोचना की जा सकती है और की भी गई है। अकबर के आसपास भी आरोपों का घेरा रहा है। रामतीर्थ अकबर के बहाने यह कह गए हैं कि योग्यता और सफलता को केवल आलोचनाओं से मत नवाजो, परखो। खूबियों को जाति-पाति, देश, काल, परीस्थिति के मुताबिक खुले दिल से कबूल किया जाए।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:55:00 am 0 comments
अगर मिटाना हो कामना और वासना को
आध्यात्मिक जीवन में निष्कामता का बड़ा महत्व है। सभी के मन में यह प्रश्न उठता है आखिर कामनाओं का त्याग कैसे हो। गीता में चार प्रकार बताए हैं कामना त्याग के। एक विस्तारक प्रक्रिया, दो एकाग्र प्रक्रिया, तीन सूक्ष्म प्रक्रिया तथा चौथी है विशुद्ध प्रक्रिया। विस्तारक प्रक्रिया का अर्थ है हमारी जो कामना व्यक्तिगत हो उसे हम सामाजिक रूप दे दें। जैसे हम अपने बच्चे को पढ़ाना चाहें तो पूरे गांव में ही स्कूल खोल लें। इससे हमारी वासना शुद्ध रूप से विस्तृत होकर विलीन हो जाएगी। दूसरी प्रक्रिया है एकाग्र। इसमें जो भी हमारी प्रबल वासना हो केवल उस पर ही अपने चित्त को टिका दें और अन्य वासनाओं को छोड़ दें। यह ध्यान योग जैसा है। जैसे-जैसे एकाग्रता सधेगी, साधक उस एकमात्र वासना से मुक्त होने लगता है। तीसरी विधि है सूक्ष्म प्रक्रिया। इसमें स्थूल वासनाओं को त्यागकर सूक्ष्म वासनाओं पर टिक जाएं। शरीर या बुद्धि को सजाना हो तो उसके स्थान पर मन और हृदय को सजाएं। इससे हम अंतर्मुखी होंगे और बाहरी वासनाएं गिर जाएंगी। इसे संतों ने ज्ञानयोग की युक्ति कहा है। चौथी प्रक्रिया है विशुद्ध। इसमें वासना को न व्यक्तिगत, न सामाजिक, न स्थूल, न सूक्ष्म मानें। दो ही तरह की वासना होगी, शुभ या अशुभ वासना। अच्छी वासना को रखें और बुरी वासना को त्याग दें। विनोबाजी एक उदाहरण देते थे यदि मीठा खाना हो तो मिठाई के स्थान पर आम खा लें। इस तरीके से इस प्रक्रिया में वासना को मारने का दबाव नहीं है बल्कि अशुभ को शुभ में परिवर्तित करने का आग्रह है। अशुभ वासनाओं का त्याग और शुभ वासनाओं की पूर्ति करते-करते मन एक दिन शुद्ध होकर वासनाहीन हो जाता है। इसीलिए यह चौथी पद्धति अधिक मान्य है। अन्य में थोड़े खतरे हैं।
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Posted by Udit bhargava at 4/25/2010 08:49:00 am 0 comments













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