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12 जनवरी 2011

मंत्र-जप का चमत्कारी प्रभाव

जिस शब्द में बीजाक्षर है, उसी को `मंत्र´ कहते है। किसी मंत्र का बार-बार उच्चारण करना ही `मंत्र जप´ कहलाता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि वास्तव में मंत्र जप क्या है? जप से क्या परिणाम निकलता है?

हमारे मन को दो भागों में बांटा जा सकता है- १। व्यक्त चेतना (Conscious Mind) तथा २. अव्यक्त चेतना (Unconscious Mind)। हमारा जो जाग्रत मन है, उसी को व्यक्त चेतना कहते हैं। अव्यक्त चेतना में हमारी अतृप्त इच्छाएँ, गुप्त भावनाएँ इत्यादि विद्यमान हैं। व्यक्त चेतना की अपेक्षा अव्यक्त चेतना अत्यन्त शक्तिशाली हैं। हमारे संस्कार, वासनाएँ - यह सब अव्यक्त चेतना में ही स्थित होते हैं। किसी मंत्र का जब जप होता है, तब अव्यक्त चेतना पर उसका प्रभाव पड़ता है। मंत्र में एक लय होती है, उस मंत्र ध्वनि का प्रभाव अव्यक्त चेतना को स्पन्दित करता है। मंत्र जप से मस्तिष्क की सभी नसों में चैतन्यता का प्रादुर्भाव होने लगता है और मन की चंचलता कम होने लगती है। मंत्र जप के माध्यम से दो तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं। १. मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Psychological Effect) और २. ध्वनि प्रभाव (Sound Effect) - मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा ध्वनि प्रभाव के समन्वय से एकाग्रता बढ़ती है और एकाग्रता बढ़ते से इष्ट सिद्धि का फल मिलता ही है। मंत्र जप का मतलब है इच्छा शक्ति को तीव्र बनाना। इच्छा शक्ति की तीव्रता से क्रिया-शक्ति भी तीव्र बन जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप इष्ट का दर्शन या मनोवांछित फल प्राप्त होता ही है। मंत्र अचूक होते हैं तथा शीघ्र फलदायक भी होते है।

मंत्र जप और स्वास्थ्य
लगातार मंत्र जप करने से उच्च रक्तचाप, ग़लत धारणाएँ, गंदे विचार आदि समाप्त हो जाते हैं। मंत्र जप का साइड इफेक्ट यही है। मंत्र में विद्यमान हर एक बीजाक्षर शरीर की नसों को उद्दीप्त करता है, इससे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से गतिशील रहता है। `क्लीं´, `ह्रीं´ इत्यादि बीजाक्षरों को एक लयात्मक पद्धति से उच्चारण करने पर हृदय तथा फेफड़ों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व उनके विकार नष्ट होते हैं। जप के लिए ब्रहा मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उस समय परा वातावरण शान्ति पूर्ण होता रहता है, किसी भी प्रकार का कोलाहल या शोर नहीं होता। कुछ विशिष्ठ साधनाओं के लिए रात्रि का समय अत्यन्त प्रशस्त होता है। गुरू के निर्देशानुसार निर्दिष्ट समय में ही साधक को जप करना चाहिए। सही समय पर सही ढंग से किया हुआ जप अवश्य ही फलप्रद होता है।

मंत्र जप करने वाले साधक के चेहरे पर एक अपूर्व तेज छलकने लगता है, चेहरे पर एक अपूर्व आभा आ जाती है। आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाय, तो जब शरीर शुद्ध और स्वस्थ होगा, शरीर स्थित सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करेंगें, तो इसके परिणाम स्वरूप मुखमण्डल में नवीन कांति का प्रादुर्भाव होगा ही।

19 अप्रैल 2010

ऊपरी बाधाएं योग और उपाय

हम जहां रहते हैं वहां कई ऐसी शक्तियां होती हैं, जो हमें दिखाई नहीं देतीं किंतु बहुधा हम पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जिससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो उठता है और हम दिशाहीन हो जाते हैं। इन अदृश्य शक्तियों को ही आम जन ऊपरी बाधाओं की संज्ञा देते हैं। भारतीय ज्योतिष में ऐसे कतिपय योगों का उल्लेख है जिनके घटित होने की स्थिति में ये शक्तियां शक्रिय हो उठती हैं और उन योगों के जातकों के जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डाल देती हैं। यहां ऊपरी बाधाओं के कुछ ऐसे ही प्रमुख योगों तथा उनसे बचाव के उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है।

* लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत प्रदत्त पीड़ा होती है।
* चंद्र पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत से पीड़ा होती है।
* शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।
* लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत योग होता है।
* यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और संबंधित भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो उस स्थिति में भी प्रेत योग होता है।
* उक्त योगों के जातकों के आचरण और व्यवहार में बदलाव आने लगता है। ऐसे में उन योगों के दुष्प्रभावों से मुक्ति हेतु निम्नलिखित उपाय करने चाहिए।
* संकट निवारण हेतु पान, पुष्प, फल, हल्दी, पायस एवं इलाइची के हवन से दुर्गासप्तशती के बारहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक सर्वाबाधा........न संशयः मंत्र से संपुटित नवचंडी प्रयोग कराएं।
* दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के चौबीसवें श्लोक का पाठ करते हुए पलाश की समिधा से घृत और सीलाभिष की आहुति दें, कष्टों से रक्षा होगी।
* शक्ति तथा सफलता की प्राप्ति हेतु ग्यारहवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक सृष्टि स्थिति विनाशानां......का उच्चारण करते हुए घी की आहुतियां दें।
* शत्रु शमन हेतु सरसों, काली मिर्च, दालचीनी तथा जायफल की हवि देकर अध्याय के उनचालीसवें श्लोक का संपुटित प्रयोग तथा हवन कराएं।
कुछ अन्य उपाय
* महामृत्युंजय मंत्र का विधिवत्‌ अनुष्ठान कराएं। जप के पश्चात्‌ हवन अवश्य कराएं।
* महाकाली या भद्रकाली माता के मंत्रानुष्ठान कराएं और कार्यस्थल या घर पर हवन कराएं।
* गुग्गुल का धूप देते हुए हनुमान चालीस तथा बजरंग बाण का पाठ करें।
* उग्र देवी या देवता के मंदिर में नियमित श्रमदान करें, सेवाएं दें तथा साफ सफाई करें।
* यदि घर के छोटे बच्चे पीड़ित हों, तो मोर पंख को पूरा जलाकर उसकी राख बना लें और उस राख से बच्चे को नियमित रूप से तिलक लगाएं तथा थोड़ी-सी राख चटा दें।
घर की महिलाएं यदि किसी समस्या या बाधा से पीड़ित हों, तो निम्नलिखित प्रयोग करें।

सवा पाव मेहंदी के तीन पैकेट (लगभग सौ ग्राम प्रति पैकेट) बनाएं और तीनों पैकेट लेकर काली मंदिर या शस्त्र धारण किए हुए किसी देवी की मूर्ति वाले मंदिर में जाएं। वहां दक्षिणा, पत्र, पुष्प, फल, मिठाई, सिंदूर तथा वस्त्र के साथ मेहंदी के उक्त तीनों पैकेट चढ़ा दें। फिर भगवती से कष्ट निवारण की प्रार्थना करें और एक फल तथा मेहंदी के दो पैकेट वापस लेकर कुछ धन के साथ किसी भिखारिन या अपने घर के आसपास सफाई करने वाली को दें। फिर उससे मेहंदी का एक पैकेट वापस ले लें और उसे घोलकर पीड़ित महिला के हाथों एवं पैरों में लगा दें। पीड़िता की पीड़ा मेहंदी के रंग उतरने के साथ-साथ धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो, तो वहां श्वेतार्क गणपति तथा एकाक्षी श्रीफल की स्थापना करें। फिर नियमित रूप से धूप, दीप आदि से पूजा करें तथा सप्ताह में एक बार मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को बांटें। भोग नित्य प्रति भी लगा सकते हैं।

कामण प्रयोगों से होने वाले दुष्प्रभावों से बचने के लिए दक्षिणावर्ती शंखों के जोड़े की स्थापना करें तथा इनमें जल भर कर सर्वत्र छिड़कते रहें।

हानि से बचाव तथा लाभ एवं बरकत के लिए गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिंदूर, कपूर, घी, चीनी और शहद के मिश्रण से अष्टगंध बनाकर उसकी स्याही से नीचे चित्रित पंचदशी यंत्र बनाएं तथा देवी के 108 नामों को लिखकर पाठ करें।

बाधा मुक्ति के लिए : किसी भी प्रकार की बाधा से मुक्ति के लिए मत्स्य यंत्र से युक्त बाधामुक्ति यंत्र की स्थापना कर उसका नियमित रूप से पूजन-दर्शन करें।

अकारण परेशान करने वाले व्यक्ति से शीघ्र छुटकारा पाने के लिए : यदि कोई व्यक्ति बगैर किसी कारण के परेशान कर रहा हो, तो शौच क्रिया काल में शौचालय में बैठे-

बैठे वहीं के पानी से उस व्यक्ति का नाम लिखें और बाहर निकलने से पूर्व जहां पानी से नाम लिखा था, उस स्थान पर अपने बाएं पैर से तीन बार ठोकर मारें। ध्यान रहे, यह प्रयोग स्वार्थवश न करें, अन्यथा हानि हो सकती है।

रुद्राक्ष या स्फटिक की माला के प्रयोगों से प्रतिकूल परिस्थितियों का शमन होता है। इसके अतिरिक्त स्फटिक की माला पहनने से तनाव दूर होता है।

नजर दोष निवारक मंत्र व यंत्र

वायुमंडल में व्याप्त अदृश्य शक्तियों के दुष्प्रभाव से ग्रस्त लोगों का जीवन दूभर हो जाता है। प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न देने के फलस्वरूप किसी चिकित्सकीय उपाय से इनसे मुक्ति संभव नहीं होती। ऐसे में भारतीय ज्योतिष तथा अन्य धर्म ग्रंथों में वर्णित मंत्रों एवं यंत्रों के प्रयोग सहायक सिद्ध हो सकते हैं। यहां कुछ ऐसे ही प्रमुख एवं अति प्रभावशाली मंत्रों तथा यंत्रों के प्रयोगों के फल और विधि का विवरण प्रस्तुत है। ये प्रयोग सहज और सरल हैं, जिन्हें अपना कर सामान्य जन भी उन अदृश्य शक्तियों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
गायत्री मंत्र : गायत्री मंत्र वेदोक्त महामंत्र है, जिसके निष्ठापूर्वक जप और प्रयोग से प्रेत तथा ऊपरी बाधाओं, नजर दोषों आदि से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने वालों को ये शक्तियां कभी नहीं सताती। उन्हें कभी डरावने सपने भी नहीं आते।
गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित जल से अभिषेक करने से अथवा गायत्री मंत्र से किए गए हवन की भस्म धारण करने से पीड़ित व्यक्ति को प्रेत बाधाओं, ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि से मुक्ति मिल जाती है। इस महामंत्र का अखंड प्रयोग कभी निष्फल नहीं होता।

मंत्र : ओम भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्‌।

प्रयोग विधि
गायत्री मंत्र का सवा लाख जप कर पीपल, पाकर, गूलर या वट की लकड़ी से उसका दशांश हवन करें, ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी।
सोने, चांदी या तांबे के कलश को सूत्र से वेष्टित करें और रेतयुक्त स्थान पर रखकर उसे गायत्री मंत्र पढ़ते हुए जल से पूरित करें। फिर उसमें मंत्रों का जप करते हुए सभी तीर्थों का आवाहन करके इलायची, चंदन, कपूर, जायफल, गुलाब, मालती के पुष्प, बिल्वपत्र, विष्णुकांता, सहदेवी, वनौषधियां, धान, जौ, तिल, सरसों तथा पीपल, गूलर, पाकर व वट आदि वृक्षों के पल्लव और २७ कुश डाल दें। इसके बाद उस कलश में भरे हुए जल को गायत्री मंत्र से एक हजार बार अभिमंत्रित करें। इस अभिमंत्रित जल को भूता बाधा, नजर दोष आदि से पीड़ित व्यक्ति के ऊपर छिड़कर उसे खिलाएं, वह शीघ्र स्वस्थ हो जाएगा। इस प्रयोग से पैशाचिक उपद्रव भी शांत हो जाते हैं।

जो घर ऊपरी बाधाओं और नजर दोषों से प्रभावित हो, उसमें गायत्री मंत्र का सवा लाख जप करके तिल, घृत आदि से उसका दशांश हवन करें। फिर उस हवन स्थल पर एक चतुष्कोणी मंडल बनाएं और एक त्रिशूल को गायत्री मंत्र से एक हजार बार अभिमंत्रित करके उपद्रवों और उपद्रवकारी शक्तियों के शमन की कामना करते हुए उसके बीच गाड़ दें।

किसी शुभ मुहूर्त में अनार की कलम और अष्टगंध की स्याही से भोजपत्र पर नीचे चित्रांकित यंत्र की रचना करें।

फिर इसे गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर गुग्गुल की धूप दें और विधिवत पूजन कर ऊपरी बाधा या नजरदोष से पीड़ित व्यक्ति के गले में बांध दें, वह दोषमुक्त हो जाएगा।

जिन व्यक्तियों ने गायत्री मंत्र का पुरश्चरण नहीं किया हो, उन्हें यह प्रयोग करने से पहले इस मंत्र का एक बार विधिवत पुरश्चरण अवश्य कर लेना चाहिए।

अमोघ हनुमत-मंत्र : ऊपरी बाधाओं और नजर दोष के शमन के लिए निम्नोक्त हनुमान मंत्र का जप करना चाहिए।

ओम ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रीं ओम नमो

भगवतेमहाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत-पिशाच-शाकिनी डाकिनी- यक्षिणी-पूतना मारी महामारी यक्ष-राक्षस भैरव-वेताल ग्रह राक्षसादिकम क्षणेन हन हन भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट स्वाहा।

इस मंत्र को दीपावली की रात्रि, नवरात्र अथवा किसी अन्य शुभ मुहूर्त में या ग्रहण के समय हनुमान जी के किसी पुराने सिद्ध मंदिर में ब्रह्मचर्य पूर्वक रुद्राक्ष की माला पर दस हजार बार जप कर उसका दशांश हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिए ताकि कभी भी अवसर पड़ने पर इसका प्रयोग किया जा सके।
सिद्ध मंत्र से अभिमंत्रित जल प्रेत बाधा या नजर दोष से ग्रस्त व्यक्ति को पिलाने तथा इससे अभिमंत्रित भस्म उसके मस्तक पर लगाने से वह इन दोषों से मुक्त हो जाता है।

उक्त सिद्ध मंत्र से एक कील को 1008 बार अभिमंत्रित कर उसे भूत-प्रेतों के प्रकोप तथा नजर दोषों से पीड़ित मकान में गाड़ देने से वह मकान कीलित हो जाता है तथा वहां फिर कभी किसी प्रकार का पैशाचिक अथवा नजर दोषजन्य उपद्रव नहीं होता।

20 फ़रवरी 2010

नए कारोबार की शुरुआत के लिए

नए कारोबार की शुरुआत के लिए

नया कारोबार, नई दुकान या कोई भी नया कार्य करने से पूर्व मिट्टी के पांच पात्र लें जिसमें सवाकिलो सामान आ जाएं। प्रत्येक पात्र में सवा किलो सफेद तिल, सवा किलो पीली सरसों, सवा किलो उड़द, सवा किलो जौ, सवा किलो साबुत मूंग भर दें। मिट्टी के ढक्कन से ढंक कर सभी पात्र को लाल कपड़े से मुंह बांध दें और अपने व्यावसायकि स्थल पर इन पांचों कलश को रख दें। वर्ष भर यह कलश अपनी दुकान में रखें। ग्राहकों का आगमन बड़ी सरलता से बढ़ेगा और कारोबारी समस्या का निवारण भी होगा। एक वर्ष के बाद इन संपूर्ण पात्रों को अपने ऊपर से 11 बार उसार कर बहते पानी में प्रवाह कर दें। और नये पात्र भरकर रख दें।

व्यवसायिक समस्याओं के निवारण हेतु

व्यवसायिक समस्याओं के निवारण हेतु

यदि व्यवसाय में अप्रत्याशित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो, कारोबार में घाटा हो रहा हो या किसी साझेदार की वजह से परेशानी आ रही हो तो किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार के दिन यह उपाय प्रारंभ करें। प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में संपूर्ण श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र की स्थापना करें। श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करने के उपरांत एक स्वच्छ पीले वस्त्र में नागकेसर, 11 दाने साबुत हल्दी, 11 साबुत सुपारी, 11 गोमती चक्र, 11 छेद वाले तांबे के सिक्के और 11 मुट्ठी हल्दी से रंगे हुए पीले अक्षत रखकर पोटली बना लें। पोटली को अपने पूजा स्थान में यंत्र के सामने रख दें। कुंकुम, केसर और हल्दी घोलकर 21 बिंदी लगाएं। तत्पश्चात घी का दीपक जलाएं और मां महालक्ष्मी के बीज मंत्र का 108 बार जाप करें। हर रोज बिंदी लगाकर 108 बार जाप करें। ऐसा 40 दिन नियमित रूप से करें। पूजा समाप्ति के बाद चांदी का सिक्का अपनी तिजोरी में रख दें बाकी समस्त सामग्री बहते पानी में प्रवाह कर दें। कारोबारी समस्त समस्याओं का निवारण होगा।

बरकत हेतु

बरकत हेतु

परिश्रम के उपरांत भी धन का संचय नहीं हो पा रहा हो तो अमावस्या के दिन यह उपाय प्रारंभ करें। नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने तिजोरी में लाल वस्त्र बिछाये और उसमें पांच गुलाब के फूल रखें। ऐसा हर रोज करें। पहले वाले फूल का बहते पानी में प्रवाह कर दें। और नये फूल रख दें वही कपडे पर रखें। पुन: अमावस्या पर कपड़ा सहित फूल का प्रवाह कर दें और नया कपड़ा बिछा दें। और पूजन जारी रखें। ऐसा नियमित क रने से धन की प्राप्ति होगी। धन में बरकत होगी।

कारोबारी समस्याओं के निवारण हेतु

किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को कारोबारी समस्याओं के निवारण के लिए इस उपाय को करके देखें। यह उपाय नियमित 43 दिनों तक क रें। उत्तर दिशा में एक सुंदर चौकी बिछा दें। 11 मुट्ठी चने की दाल की ढेरी बनाएं और ढेरी के ऊपर श्रद्धापूर्वक श्रीयंत्र स्थापित करें। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। तत्पश्चात स्वच्छ और पवित्र पलेट में तीन अलग-अगल केसर से स्वास्तिक बनाएं। प्रत्येक स्वास्तिक पर चौमुखा घी का दीपक रखें। और इस मंत्र की पांच माला नियमित जाप करें। इस प्रयोग से धन आगमन होने लगेगा।

धनागमन हेतु कुछ उपाय

धनागमन हेतु

किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को कारोबारी समस्याओं के निवारण के लिए इस उपाय को करके देखें। यह उपाय नियमित 43 दिनों तक क रें। उत्तर दिशा में एक सुंदर चौकी बिछा दें। 11 मुट्ठी चने की दाल की ढेरी बनाएं और ढेरी के ऊपर श्रद्धापूर्वक श्रीयंत्र स्थापित करें। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। तत्पश्चात स्वच्छ और पवित्र पलेट में तीन अलग-अलग केसर से स्वस्तिक बनाएं। प्रत्येक स्वस्तिक पर चौमुखा घी का दीपक रखें। और इस मंत्र की पांच माला नियमित जाप करें। इस प्रयोग से धन आगमन होने लगेगा।

18 फ़रवरी 2010

रामचरितमानस के चमत्कारिक मंत्र

जन सामान्य की पीड़ा निवारण में रामचरित मानस और हनुमान चालीसा की चौपाइयां और दोहे जातक की कुंडली में व्याप्त ग्रह दोष और पीड़ा निवारण में सहायक हो सकते हैं। इन्हें सुगमता से समझा जा सकता है और श्रद्धापूर्वक पारायण करने से लाभ मिल जाता है। मानस की चौपाइयों में मंत्र तुल्य शक्तियां विद्यमान हैं। इनका पठन,मनन और जप करके लाभ लिया जा सकता है।
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प्रेम प्राप्ति
भुवन चारिदस भरा उछाहु।
जनक सुता रघुबीर बिआहू।।

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

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रोजगार के लिए
बिस्व भरन पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।

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क्लेश निवारण
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू।
महामोह निसि दलन दिनेसू।।

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विध्न्न -बाधा निवारण
प्रणवों पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्वदय आगार बसहि राम सर चाप धर॥

मनोरथ पूर्ति के लिए
भव भेषज रघुनाथ जसु, सुनाही
जे नर अरू नारी।
तिन्ह कर सकल मनोरथ
सिद्ध करहि त्रिसिरारी॥
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एकल चंद्र (केमेन्द्रुम दोष) निवारण
बिन सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
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कालसर्प दोष निवारण
रावण जुद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फांस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो।।
आनि खगेश तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहि जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो।।
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स्थान/ नगर में प्रवेश करते समय
प्रबिस नगर कीजे सब काजा।
ह्वदय राखि कोसलपुर राजा।।
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राहु प्रभाव से कलंक मुक्ति के लिए
मंत्र महामनि विषय ब्याल के
मेटत कठिन कुअंक भाल के
हरन मोह तम दिनकर कर से
सालि पाल जलधर के॥
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निराशा यानी शनि प्रभाव से मुक्ति
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
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आलस्य से मुक्ति
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम॥
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विजय प्राप्ति के लिए
विजय रथ का पाठ लंकाकाण्ड ( दोहा 79-80 मध्य) का नियमित पाठ विजय प्राप्त कराता है।
परिकल्पना-प्रोजेक्ट पूर्णता के लिये भागीरथ के गंगा अवतरण प्रयास का नियमित पाठ व्यक्ति की कल्पना को साकार करता है।
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बंधन मुक्ति
सौ बार हनुमान चालीसा पाठ सभी बंधनों से मुक्त करता है।
श्रद्धापूर्वक मनन,पठन, जप और श्रवण करने से सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है। पे्रम और दृढ़ विश्वास फल प्राप्ति के लिए जरूरी है। गुरू मार्गदर्शन लेकर सभी मनोरथ पूरे कर सकते हैं।

12 फ़रवरी 2010

महाशिवरात्रि पर इस तरह करें स्नान

मेष - कुंभ स्नान नई चेतना देने वाला है। राज्यभाव में चंद्रमा की उपस्थिति अनुकूल है तथापि अन्य ग्रहों की अनुकूलता के लिए स्नान करते समय लाल पुष्प एवं हल्दी जल में प्रवाहित करें तथा इस मंत्र का जाप करें- ऊं ऐं क्लीं सौ:।

वृषभ - भाग्यवर्धक योग है। अन्य ग्रहों की अनुकूलता एवं शीघ्र शुभ फल की प्राप्ति के लिए स्नान करते समय अखंड़ चावल व चंदन प्रवाहित कर स्नान करें, हो सके तो अपने साथ गौमती चक्र रखें। ऊं ऐं क्लीं श्रीं मंत्र का जप करें।

मिथुन - ग्रहगोचर सम बने हुए हैं। विशेष परिश्रम से सफलता मिल सकेगी। दूध मिश्रित जल तथा जौं प्रवाहित कर स्नान करें। स्नान के समय शंख या सीप अपने साथ रखें तथाऊं क्लीं ऐं सौ: मंत्र का जप करने से विशेष सफलता प्राप्त होगी।

कर्क - ग्रहगोचर विशेष फलदायी हैं। स्नान के पूर्व शहद, लाल फूल तथा तिल का प्रवाह करें। स्फटिक साथ में रखकर स्नान किया जाए तो शुभ फल प्राप्ति में सहयोग मिल सकेगा। ऊं ह्रीं क्लीं श्रीं मंत्र का जप आपको यशस्वी बना सकता है।

सिंह - छठे भाव में सूर्य बुध चक्र की उपस्थिति तथा सप्तम में स्थित गुरु शुक्र सफलतादायक हैं। तिल, सुगंधित इत्र तथा गोमूत्र का प्रवाह करते हुए ऊं ह्रीं श्रीं सौ: मंत्र जाप करते हुए स्नान करें। रुद्राक्ष धारण कर स्नान करना फलदायी हो सकेगा।

कन्या - जन्मस्थ शनि तथा गुरु शुक्र से षडाष्टक योग मिश्रित फलदायी है। ऐसे में स्नान के समय तिल, सुपारी व एकाधिक सिक्के प्रवाहित करें। ऊं क्लीं ऐं सौ: इस मंत्र का जाप करते हुए स्नान करें तो सफलता सहज हो सकेगी।

तुला - द्वाद्वश शनि तथा चतुर्थ में बुध सूर्य चंद्र की उपस्थिति सफलता प्राप्ति में संदेह दर्शाती है। ऐसे में स्नान के पूर्व सुगंधित इत्र, श्वेत पुष्प तथा तिल का प्रवाह करते हुए ऐं क्लीं श्रीं मंत्र का जाप सफलता दिलाने में मददगार साबित हो सकता है।

वृश्चिक - पराक्रम में सूर्य बुध तथा भाग्य में मंगल शुभ है। चतुर्थ गुरु शुक्र व्यवधान कारक हैं। ऐसे में स्नान करते समय चने की दाल, चावल व हल्दी प्रवाहित करें। स्नान करते समय ऊं ऐं क्लीं सौ: मंत्र का जाप करें।

धनु - लग्न में राहु तथा पराक्रम में गुरु शुक्र आध्यात्मिक उन्नतिकारक हैं। शुभफल की विशेष प्राप्ति के लिए स्नान के पूर्व श्वेत वस्त्र, चावल व मुलेठी लपेटकर प्रवाहित करें तथा स्नान के समय ऊं ह्रीं क्लीं सौ: मंत्र का जाप सफलतादायी रहेगा।

मकर - लग्न में सूर्य या सप्तम में मंगल की उपस्थिति सम बनी हैं। शुभ फल की प्राप्ति के लिए स्नान के समय अरगजा युक्त जल एवं तिल प्रवाहित करें तथा गोमती चक्र साथ में रखते हुए ऊं ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं सौ: मंत्र का जप करें, सफलता प्राप्त होगी।

कुंभ - लग्नस्थ गुरु शुक्र तथा लाभ भाव में राहु आध्यात्मिक चेतना जाग्रत करने वाला है। स्नान के समय गोमूत्र एवं यज्ञ भस्म प्रवाहित करें तथा ऊं ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं मंत्र का जप करें। इससे सफलता अर्जित कर सकेंगे।

मीन - पंचमस्थ मंगल तथा राज्य भाव में राहु की उपस्थिति शुभ है। अन्य ग्रहों की शुभता के लिए स्नान के समय पंचामृत एवं तुलसी का प्रवाह कर ऊं ह्रीं क्लीं सौ: मंत्र का जप करें। स्नान के समय तुलसीमाला पहनना विशेष लाभकारी रहेगा।

16 जनवरी 2010

॥वैभव प्रदाता श्री सूक्त॥

ऋग्वेद में लक्ष्मी की स्तुति बड़े विशिष्ट रूप में की गई है। निम्नांकित ऋचाओं से गाय के शुद्ध घी से नियमित हवन करने से अलक्ष्मी (अर्थात दुःख, दरिद्रता की देवी) की अकृपा प्राप्त होती है। इन ऋचाओं में अलक्ष्मी की अकृपा एवं लक्ष्मी की संपूर्ण कृपा की कामना की गई है। जिन व्यक्तियों के जीवन में धन प्राप्ति होकर भी सदैव कर्ज बना रहता है उनके लिए यह सर्वश्रेष्ठ एवं अतिउपयोगी है। जिन व्यक्तियों को धन कभी न रहा हो किंतु रोग आदि की वजह से अन्न न खा सकते हों उनके लिए भी यह सर्वाधिक उपयोगी है।

श्री सूक्त की ऋचाओं से नियमित हवन करने से विभिन्न कष्ट दूर होकर ऐश्वर्य व भोग की प्राप्ति होती है। अलक्ष्मी की अकृपा प्राप्त होने से एक ओर जहाँ दुःख दरिद्रता, रोग, कर्ज से मुक्ति मिलती है, वहीं दूसरी ओर लक्ष्मी की कृपा से भोग की प्राप्ति होती है।

श्रीसूक्तम
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्‌।
चंद्रां हिरण्यमणीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्‌।
यस्यां हिरण्यं विंदेयं गामश्वं पुरुषानहम्‌॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्‌।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्‌॥

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलंतीं तृप्तां तर्पयंतीम्‌।
पद्मे स्थितां पद्मवणा तामिहोपह्वये श्रियम्‌॥

चंद्रां प्रभासां यशसा ज्वलंतीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्‌।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसानुदन्तु या अंतरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥

उपैतु मां देवसखः कीतिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्‌ कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्‌।
अभूतिमसमृद्धि च सर्वां निर्णुद से गृहात्‌॥

गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्‌।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्‌।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्‌॥

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीम्‌।
चंद्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्‌।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्‌ ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्‌ विंदेयं पुरुषानहम्‌ ॥

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्‌ ।
सूक्तं पंचदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत्‌ ॥

॥ इति श्री सूक्तम्‌ संपूर्णम्‌ ॥

11 जनवरी 2010

विदेश यात्रा में सहायक अखंड लक्ष्मी साधना


अखंड लक्ष्मी साधना प्रयोग हर प्रकार की सफलता, उन्नति, भाग्योदय एवं विशेष रूप से विदेश यात्रा जैसी मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। यूँ तो इस साधना को नवरात्रि के आरंभ से दीपावली तक किया जाता है लेकिन प्रस्तुत प्रयोग मात्र तीन दिन का है।

विधि : इसे किसी भी बुधवार को प्रारंभ करें। प्रा‍त:काल स्नानादि से शुद्ध होकर पूर्व दिशा में किसी पात्र में अखंड लक्ष्मी यंत्र रख दें।


यंत्र की भी जल-दूध से शुद्धि करें। उस पर केसर का तिलक करें। तत्पश्चात् स्फटिक की माला से निम्न मंत्र का जाप करें। इस मंत्र की प्रतिदिन 11 मालाएँ जपना अनिवार्य है। तीन दिन तक 11 मालाएँ फेरने से मंत्र और यंत्र दोनों सिद्ध हो जाएँगे।

इस यंत्र को किसी स्वच्छ स्थान पर या तिजोरी में रखें।

मंत्र : ओम् ह्रीं अष्ट लक्ष्म्यै नम:।।