यह व्रत आषाढ चतुर्थी को करते हैं। प्रात: स्नानादि दैनिक कार्य करने के बाद दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर मम वर्तमानागामिसकल संकट निरसन पूर्वकसकलाभीष्टसिद्धयेसंकष्टचतुर्थीव्रतमहंकरिष्ये संकल्प करके दिनभर मौन रहकर अपना कार्य करें सायंकाल पुन: स्नान करकेतीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै, भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै,
सत्यायैचदिक्षुविदिक्षु, मध्येविघ्ननाशिन्यैसर्वशक्तिकमलासनायैनम:
श्लोक से पीठ पूजा करने के बाद वेदी के बीच में स्वर्णादिधातु से निर्मित गणेशजी का-
गणेशाय नम: से आह्वान,विघ्ननाशिने नम: से आसन, लम्बोदराय नम: से पाद्य, चन्द्रार्धधारिणे नम: से अर्घ्य, विश्वप्रियायनम: से आचमन, ब्रह्मचारिणे नम: से स्नान, कुमारगुरवे नम: से वस्त्र, शिवात्मजाय नम: से यज्ञोपवीत, रुद्रपुत्राय नम: से गन्ध, विघ्नहत्र्रे नम: से अक्षत, परशुधारिणे नम: से पुष्प, भवानीप्रीतिकत्र्रे नम: से धूप, गजकर्णाय नम: से दीपक, अघनाशिने नम: से नैवेद्य (आचमन), सिद्धिदाय नम: से ताम्बुल,सर्वभोगदायिने नम: से दक्षिणा अर्पण करके षोडशोपचारपूजनकरें। कर्पूर अथवा घी की बत्ती जलाकर नीराजन करें। दूर्वाकेअङ्कुरलेकर ॐगणाधिपायनम:, उमपपुत्रायनम:, अघनाशायनम:, विनायकायनम:,
ईशपुत्रायनम:, सर्वसिद्धिप्रदायककुमारगुरवेतुभ्यंपूजयामिप्रयत्नत:॥
स्तुति से दूर्वा अर्पण कर-यज्ञेन यज्ञ से मन्त्र-पुष्पांजलि अर्पण करें।
संसारपीडाव्यथितं हि मां सदा संकष्टभूतंसुमुख प्रसीद।
त्वंत्राहि मां मोचयकष्टसंघान्नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
इस श्लोक से नमस्कार करके
श्रीविप्राय नमस्तुभ्यंसाक्षाद्देवस्वरूपिणे।
गणेशप्रीतयेतुभ्यंमोदकान्वैददाम्यहम्॥
इससे मोदक, सुपारी, मूंग और दक्षिणा रखकर वायन(बायना) दें। चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा का गन्ध-पुष्पादि से विधिवत् पूजन करके
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यंनमस्तेज्योतिषांपते।
नमस्तेरोहिणीकान्तगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥
इससे गणेशजीको तीन अर्घ्यप्रदान करें।
तिथीनामुत्तमे देवि गणेशप्रियवल्लभे।
गृहाणाघ्र्यमयादत्तंसर्वसिद्धिप्रदायिके॥
इससे पुन:अर्घ्यदें।
आयातस्त्वमुमापुत्र ममानुग्रहकाम्यया।
पूजितोऽसिमयाभक्त्यागच्छ स्थानंस्वकंप्रभो॥
इससे विसर्जन कर ब्राह्मणों को भोजन करायें और स्वयं नमक वर्जित भोजन करें।
Part 2









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