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23 फ़रवरी 2011

संकष्ट चतुर्थी व्रत

यह व्रत आषाढ चतुर्थी को करते हैं। प्रात: स्नानादि दैनिक कार्य करने के बाद दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर मम वर्तमानागामिसकल संकट निरसन पूर्वकसकलाभीष्टसिद्धयेसंकष्टचतुर्थीव्रतमहंकरिष्ये संकल्प करके दिनभर मौन रहकर अपना कार्य करें सायंकाल पुन: स्नान करके
तीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै, भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै,
 सत्यायैचदिक्षुविदिक्षु, मध्येविघ्ननाशिन्यैसर्वशक्तिकमलासनायैनम:
श्लोक से पीठ पूजा करने के बाद वेदी के बीच में स्वर्णादिधातु से निर्मित गणेशजी का-
गणेशाय नम: से आह्वान,विघ्ननाशिने नम: से आसन, लम्बोदराय नम: से पाद्य, चन्द्रार्धधारिणे नम: से अ‌र्घ्य, विश्वप्रियायनम: से आचमन, ब्रह्मचारिणे नम: से स्नान, कुमारगुरवे नम: से वस्त्र, शिवात्मजाय नम: से यज्ञोपवीत, रुद्रपुत्राय नम: से गन्ध, विघ्नहत्र्रे नम: से अक्षत, परशुधारिणे नम: से पुष्प, भवानीप्रीतिकत्र्रे नम: से धूप, गजकर्णाय नम: से दीपक, अघनाशिने नम: से नैवेद्य (आचमन), सिद्धिदाय नम: से ताम्बुल,सर्वभोगदायिने नम: से दक्षिणा अर्पण करके षोडशोपचारपूजनकरें। कर्पूर अथवा घी की बत्ती जलाकर नीराजन करें। दूर्वाकेअङ्कुरलेकर ॐगणाधिपायनम:, उमपपुत्रायनम:, अघनाशायनम:, विनायकायनम:,
ईशपुत्रायनम:, सर्वसिद्धिप्रदायककुमारगुरवेतुभ्यंपूजयामिप्रयत्नत:॥
स्तुति से दूर्वा अर्पण कर-यज्ञेन यज्ञ से मन्त्र-पुष्पांजलि अर्पण करें।
संसारपीडाव्यथितं हि मां सदा संकष्टभूतंसुमुख प्रसीद।
त्वंत्राहि मां मोचयकष्टसंघान्नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
इस श्लोक से नमस्कार करके
श्रीविप्राय नमस्तुभ्यंसाक्षाद्देवस्वरूपिणे।
गणेशप्रीतयेतुभ्यंमोदकान्वैददाम्यहम्॥
इससे मोदक, सुपारी, मूंग और दक्षिणा रखकर वायन(बायना) दें। चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा का गन्ध-पुष्पादि से विधिवत् पूजन करके
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यंनमस्तेज्योतिषांपते।
नमस्तेरोहिणीकान्तगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥
इससे गणेशजीको तीन अ‌र्घ्यप्रदान करें।
तिथीनामुत्तमे देवि गणेशप्रियवल्लभे।
गृहाणाघ्र्यमयादत्तंसर्वसिद्धिप्रदायिके॥
इससे पुन:अ‌र्घ्यदें।
आयातस्त्वमुमापुत्र ममानुग्रहकाम्यया।
पूजितोऽसिमयाभक्त्यागच्छ स्थानंस्वकंप्रभो॥
इससे विसर्जन कर ब्राह्मणों को भोजन करायें और स्वयं नमक वर्जित भोजन करें।

Part 2 


व्यासजीने कहा है कि अधिक मास में चतुर्थी को गणेश्वरके नाम से पूजा करनी चाहिए। पूजन की विधि षोडशोपचारहै। सर्व प्रथम पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। लाल कनेर का फूल चढ़ा कर लड्डू आदि का भोग लगावें। लाल चन्दन, रोली, अक्षत और दूब को एक-एक नाम से अलग-अलग चढ़ायें।
तत्पश्चात् विश्वप्रियाय नम: से वस्त्र, पुष्टिदाय नम: से चन्दन,
विनायकाय नम: से पुष्प,
उमासुताय नम: से धूप,
रूद्रप्रियाय नम: से दीप,
विघ्ननाशिने नम: से नैवेद्य अर्पित करें।
फलदात्रे नम: से ताम्बूल,
सङ्कष्टनाशिने नम: से फल चढ़ावें।
इसके बाद विघ्नविनायकगणेश जी की प्रार्थना करें।
संसारपीडाव्यथितंभर्यातंक्लेशान्वितंमां सुमुख! प्रसीद।
त्रायस्वमां दु:खदारिद्यनाशन!नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
हे सुन्दर मुखवालेगणेशजी!मैं भव-बाधा से ग्रस्त, भय से पीडि़त और क्लेशों से सन्तप्त हूं, आप मेरे पर प्रसन्न होइए। हे दु:ख-दारिद्रय के नाशक गणनायकजी! आप मेरी रक्षा करें। हे विघ्नों के विनाशक! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। फिर निम्नांकित मंत्र से पुष्पांजलि देकर चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेवें।
पुष्पांजल्यामिमंमन्त्रंचन्द्रायाऽघ्र्यप्रदापयेत्।
क्षीरम्भोधि-समुद्भूत!नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
हे क्षीरसागरसम्भव!हे द्विजराज,हे षोडश कलाओं के अधिपति। शंख से सफेद फूल, चन्दन, जल, अक्षत और दक्षिणा लेकर, हे रोहिणी के सहित चन्द्रमा! आप मेरे अ‌र्घ्यको स्वीकार करें, मैं आपको प्रणाम करता हूं। तदनन्तर ब्राह्मण को भोजन करावें। लड्डू और दक्षिणा दें। देवता और ब्राह्मण से बचे अन्न द्वारा स्वयं आहार ग्रहण करें। रात्रि में भूमि पर शयन करें, लालच विहीन होकर क्रोध से दूर रहें। हर महीने गणेश जी की प्रसन्नता के निमित्त व्रत करें। इसके प्रभाव से विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन प्राप्ति एवं कुमारी कन्या को सुशील वर की प्राप्ति होती है और वह सौभाग्यवती रहकर दीर्घकाल तक पति का सुखभोग करती है। विधवा द्वारा व्रत करने पर अगले जन्म में वह सधवा होती हैं एवं ऐश्वर्य-शालिनी बन कर पुत्र-पौत्रादि का सुख भोगती हुई अंत में मोक्ष पाती है। पुत्रेच्छुको पुत्र लाभ होता एवं रोगी का रोग निवारण होता है। भयभीत व्यक्ति भय रहित होता एवं बंधन में पड़ा हुआ बंधन मुक्त हो जाता है।

अनुष्ठान-अंगार की चतुर्थी व्रत

भगवान गणेश चतुर्थी तिथि के दिन प्रकट हुए थे। अतएव यह तिथि मंगलमूर्ती  गणपति को सर्वाधिक प्रिय है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में श्रीगणेश को चतुर्थी का स्वामी (अधिपति) बताया गया है। गणेशभक्त बडी श्रद्धा के साथ चतुर्थी के दिन व्रत रखते हैं। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेकर, गणेश-पूजन करने के बाद फलाहार ग्रहण किया जाता है। कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसके व्रत से सभी संकट-विघ्न दूर होते हैं। मंगलवार के दिन चतुर्थी का संयोग गणेश जी की उपासना में अत्यन्त शुभ एवं सिद्धिदायक होता है। मंगलवार की चतुर्थी अंगारकी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। धर्मग्रन्थों में यह लिखा है कि अंगारकी चतुर्थी का इतना अधिक माहात्म्य है कि इस दिन विधिवत् व्रत करने से मंगलमूर्ती  श्रीगणेश तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। अंगार की चतुर्थी का व्रत विधिवत् करने से सालभरकी चतुर्थियों के व्रत का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में अंगार की चतुर्थी की कथा विस्तार से वर्णित है। पृथ्वीनन्दन मंगल अपनी तेजस्विता एवं रक्तवर्ण के कारण अंगारक भी कहे जाते हैं, जिसका मतलब है अंगारे के समान लाल। मंगल ने कठोर तप करके आदिदेव गजानन को जब संतुष्ट कर दिया, तब उन्होंने मंगल को यह वरदान किया कि मंगलवार के दिन चतुर्थी तिथि अंगारकी चतुर्थी के नाम प्रख्यात होगी। इस दिन सविधि व्रत करने वाले को एक वर्ष पर्यन्त चतुर्थी-व्रत करने का फल प्राप्त होगा। अंगार की चतुर्थी के प्रताप से व्रती के किसी भी कार्य में कभी विघ्न नहीं होगा। उसे संसार के सारे सुख प्राप्त होंगे तथा मंगलमूर्ती  गणेश उस पर सदैव कृपा करेंगे।

अनन्त चतुर्दशी व्रत

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता है। कहा जाता है कि जब पाण्डव जुए में अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्त सूत्र धारण किया। अनन्त चतुर्दशी-व्र तके प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए।

व्रत-विधान-व्रत कर्ता प्रात:स्नान करके व्रत का संकल्प करें। शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है, तथापि ऐसा संभव न हो सकने की स्थिति में घर में पूजा गृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्या पर लेटे भगवान विष्णु की मूíत अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों(गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र(डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंत सूत्र की षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजनोपरांत अनन्त सूत्र को मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें-
अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

अनंत सूत्र बांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें। कथा का सार-संक्षेप यह है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्य मुनि से किया। कौण्डिन्य मुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्त सूत्र बांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्त सूत्र पर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्यऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुज अनन्त देव का दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्त सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है।मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्य मुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

अनुष्ठान-अहोई अष्टमी व्रत

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएं अहोईअष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा दीवाल पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे दीवाल पर टांग दिया जाता है।

होई के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं।

उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में अहोईमाता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की होई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोईमाता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोईअष्टमी की दो लोक कथाएं प्रचलित हैं।

उसमें से एक कथा में साहूकार की पुत्री के द्वारा घर को लीपने के लिए मिट्टी लाते समय मिट्टी खोदने हेतु खुरपा(कुदाल) चलाने से साही के बच्चों के मरने से संबंधित है। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि हमें कोई भी काम अत्यंत सावधानी से करना चाहिए अन्यथा हमारी जरा सी गलती से किसी का ऐसा बडा नुकसान हो सकता है, जिसकी हम भरपाई न कर सकें और तब हमें उसका कठोर प्रायश्चित करना पडेगा। इस कथा से अहिंसा की प्रेरणा भी मिलती है। अहोईअष्टमी की दूसरी कथा मथुरा जिले में स्थित राधाकुण्डमें स्नान करने से संतान-सुख की प्राप्ति के संदर्भ में है। अहोईअष्टमी के दिन पेठे का दान करें।

जिन स्थानों में अहोईअष्टमी की रात्रि में तारे को अ‌र्घ्यदेने की प्रथा है, वहां भी गुरुवार को ही व्रत रखा जाए क्योंकि इसी दिन तारों का दर्शन अष्टमी की अवधि में होगा। ब्रजमण्डलमें उदयातिथि की विशेष मान्यता होने तथा सप्तमी से विद्धाअष्टमी को ग्रहण न किए जाने के कारण यहां राधाकुण्डमें स्नान का पर्व 2नवंबर को माना जाएगा। ब्रज में व्रत-पर्व की तारीख का निर्णय वैष्णव सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है।

अनुष्ठान:-अचला सप्तमी

माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, अरोग्य सप्तमी आदि नामों से प्रसिद्ध है। इसी कारण पुराणों में इस तिथि के व्रत की विभिन्न नामों से अलग-अलग विधियां निर्दिष्ट हैं। भविष्यपुराणमें अचला सप्तमी के व्रत का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। इस व्रत का विधान भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। षष्ठी के दिन एक समय भोजन करें। सप्तमी को प्रात:काल किसी नदी या सरोवर में स्नान करें। स्नान हेतु अरुणोदय वेला को सर्वाधिक प्रभावकारी कहा गया है। किसी पात्र में तिल का तेल डालकर दीपक प्रज्वलित करें। दीपक को सिर पर रखकर भगवान सूर्य और सप्तमी तिथि का इस प्रकार ध्यान करें-
नमस्तेरुद्ररूपायरसानाम्पतयेनम:। 
वरुणायनमस्तेऽस्तुहरिवासनमोऽस्तुते॥
यावज्जन्मकृतंपाप मयाजन्मसुसप्तसु।
तन्मेरोगंचशोकंचमाकरीहन्तुसप्तमी॥
जननी सर्वभूतानांसप्तमी सप्तसप्तिके।
सर्वव्याधिहरेदेवि नमस्तेरविमण्डले॥

तत्पश्चात् दीपक को जल के ऊपर तैरा दें। फिर स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करें। इसके बाद चंदन से अष्टदल कमल बनायें। कमल के मध्य में शिव-पार्वती की स्थापना कर प्रणव-मंत्र से पूजा करें। कमल के आठ दलों में पूर्व से प्रारंभ करके भानु, रवि, विवस्वान्,भास्कर, सविता, अर्क, सहस्त्रकिरणतथा सर्वात्मा का पूजन करें। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदि उपचारों से विधिपूर्वक सूर्यदेव की पूजा करने के उपरान्त- स्वस्थानं गम्यताम्-यह कहकर विसर्जितकर दें। अन्त में ताम्र अथवा मिट्टी के पात्र में गुड और घी सहित तिलचूर्णतथा कान का आभूषण रखकर वह पात्र दुख-दुर्भाग्य के नाश की कामना से किसी आचार्य को दान दे दें। सूर्यनारायण से प्रार्थना करें सपुत्रपशुभृत्याय मेऽर्कोऽयंप्रीयताम्।

गुरु को वस्त्र, तिल आदि दक्षिणा में देकर अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर व्रत को समाप्त करें। जो पुरुष उपर्युक्त विधि से अचला सप्तमी को स्नान करता है, उसे सम्पूर्ण माघ-स्नान का फल प्राप्त करता है। इस व्रत में एक समय नमकरहित(अलोना) खाना अथवा फलाहार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अचलासप्तमीका व्रत करने पर सालभरके रविवारोंके व्रत का पुण्यफलप्राप्त हो जाता है।

अनुष्ठान: कमला-पुरुषोत्तमा-एकादशी व्रत

एकादशी के दिन वेदी को अक्षत से पूरित करें और सफेद वस्त्र से वेष्टित कर प्रसन्नता के साथ पूजन करें। चारों और केशव आदि नामों से वेदी को अंकित करें।

पूजा विधि:-
भगवान को पंचामृत से स्नान कराके स्थापित करें। गन्ध पुष्प, अक्षत आदि से संयुक्त और पवित्र जल से पूर्ण कुम्भ पर स्थापित कर, चतुर्भुजभगवान का लक्ष्मी जी के सहित आह्वान करें। सर्वतोभद्र मण्डल के देवताओं की पूजा कर स्थापित किए हुए कलश पर देव सानिध्य करके उसमें विष्णु का आह्वान करें। ॐभू: हे विष्णो!यहां बैठें, पूजा ग्रहण करें, अच्छी तरह प्रसन्न होकर वर का देने वाले हों। ओं भुव:प्रभु का आह्वान करता हूं। ओं स्व: प्रभु का आह्वान करता हूं। रुक्मिणी, जाम्बवती,सत्यभामा और कालिन्दी का दक्षिण और पश्चिमोत्तर दल में बीच में आह्वान कर; ईशानादि दिशाविभागमें शंख, चक्र, गदा और पद्म का आह्वान करें। उसके बारह पूर्व पत्रों में अनुक्रम से विमला, उत्कर्षिणी,ज्ञान, क्रिया, योगा प्रह्वा,सत्या:,ईशानाआदि देवियों को ग्रहों के साथ पद्म के मध्य में स्थापित करें। भगवान के आगे वेदिका पर गरुड़ की मूर्ति भी स्थापित करें एवं उसका आह्वान कर पूर्व आदि दिशाओं में क्रम से लोकपालोंको स्थापित करें।

इसके बाद पूर्व आदि दिशाओं के क्रम से नाम मन्त्रों से केशव आदि का आह्वान करें। केशव के लिए नमस्कार है, केशव का आह्वान करता हूं। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, विधिक्रम,वामन, श्रीधर, हृषीकेश,पद्मनाभ, दामोदर-इन बारहों को शुक्ल एकादशी के दिन तथा संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युमन,अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अधोक्षज,नरसिंह, अच्युत, जनार्दन, उपेन्द्र, हरि, श्रीकृष्ण इन्हें कृष्ण एकादशी के दिन इसी प्रकार आह्वान करें तदस्तु से उन्हें प्रतिष्ठित करें अतो देवा इस मंत्र से विष्णु भगवान तथा आवाहितदेवताओं को नाम मन्त्र से सोलह उपचारों से पूजें।आसन, पाद्य, अ‌र्घ्यआचमनीय, स्नान, वस्त्र, उपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप दीप, नैवेद्य, आरती और प्रदक्षिणा दें।

24 जनवरी 2011

हरितालिका तीज व्रत

भाद्र शुक्ल पक्ष की तृतीय को हस्त नक्षत्र होता है. इस तिथि को हरितालिका तीज व्रत मनाया जाता है. इस व्रत को करने से कन्याओं को मनोनुकूल वर तथा सौभाग्यवती महिलाओं को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इस दिन प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर वृति स्त्री को हरितालिका तीज व्रत करने का संकल्प करना चाहिए. तदुपरांत उसे पूरे दिन निराहार रहना चाहिए. सायंकाल को पुनः स्नान करके शुद्ध एवं उज्जवल वस्त्र धारण करके शिव एवं पार्वती की पूजा उपासना करनी चाहिए. माता पार्वती को सुहाग का जोड़ा एवं सुहाग पेटी चढ़ानी चाहिए. भगवान् शिव को धोती, कुर्ता आदि पांच वस्त्र चढाने चाहिए. इसके उपरान्त सौभाग्यवती स्त्री को तेरह प्रकार के मिष्ठान बनाकर सास को भेंट करने चाहिए. अंत में हरितालिका तीज व्रत की कथा का श्रवण करना चाहिए.

व्रत-कथा
माता सती जब अपने पिता दक्ष के होमकुंड में जलकर भस्म हो गईं, तो उसके पश्चात उन्होंने मैना और हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और पार्वती कहलाईं. पार्वती बाल्यावस्था से ही शिव को पति के रूप में चाहती थीं. इसके लिये उन्होंने कठोर शिव्राध्ना करना आरम्भ किया. उन्होंने वर्षों तक अन्न त्यागकर शिव की कठोर तपस्या के. जब उनकी तपस्या फलोन्मुख हो रही थी, तो उन्हीं दीयों देवर्षि नारद हिमालय के यहाँ आए और उन्होंने पार्वते के साथ विवाह के लिये भगवान् विष्णु का प्रस्ताव रखा. हिमालय भी इस प्रस्ताव को पाकर प्रसन्न हो गए और पानी पुत्री पार्वती को इसके लिये मनाने का प्रयास किया. पार्वतीजी इस प्रस्ताव को सुनकर मूर्छित हो गई, जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने पुनः घने जंगलों में जाकर शिव की आराधना करने का निश्चय किया. अपनी सखियों के साथ पार्वतीजी ने घने जंगलों में जाकर एक गुफा में भाद्रपद शुक्लपक्ष की त्रितीय के दिन शिवलिंग की स्थापना करके शिव की तपस्या आरम्भ कर दी. शीघ्र ही भगवान् शिव ने पार्वतीजी को दर्शन दिए और अपने पत्नी के रूप में वरण करने का वरदान भी दिया. इस प्रकार हरितालिका तीज के दिन तपस्या आरम्भ करने के कारण पार्वतीजी को मनोनुकूल एवं शिवजी जैसा वर प्राप्त हुआ. इसके बाद से ही मनोनुकूल वर की कामना एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिये स्त्रियाँ हरितालिका तीज व्रत करती हैं.

07 अप्रैल 2010

मौन व्रत

आध्यात्मिक उन्नति के लिए वाणी का शुद्ध होना परमावश्यक है । मौन से वाणी नियंत्रित एवं शुद्ध होती है । इसीलिए हमारे शास्त्रों में मौन का विधान बनाया गया है । श्रावण मास की समाप्ति के बाद भावप्रद प्रतिपदा से १६ दिनों तक इस व्रत के अनुष्ठान का विधान है । ऐसी मान्यता है कि मौन से सब कामनाएं पूर्ण होती हे । ऐसा साधक शिवलोक को प्राप्त होता है । मौन के साथ श्रेष्ठ चिंतन्‌, ईश्वर स्मरण आवश्यक है । शास्त्रकार ने मौन के साथ की गणना पांच तपों मे की है -

मनः प्रसादः सौभ्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशद्धिरित्येततपो मानसमुच्यते ॥

अर्थात्‌ मन की प्रसन्नता, सौभ्य-स्वभाव, मौन, मनोनिग्रह और शुद्ध विचार ये मन के तप है।
इनमे मौन का स्थान मध्य में है । मन के परिष्कार तथा संयम के लिए मन की प्रसन्नता धारण की जाए, सौभ्यता धारण की जाए तत्पश्यात्‌ मौन का प्रयोग किया जाए । इसके प्रयोग से शुद्ध विचार उत्पन्न होते हैं । मन का परिष्कार होकर चंचलता और व्यर्थ चिंतन से मुक्ति होती है ।
चाणक्य नीति दर्पण मे कहा गया है : जो मनुष्य प्रतिदिन पूरे संवत मौन रहकर भोजन करता है, वह दस हजार कोटि वर्ष तक स्वर्ग में पूजा जाता है।

मौन की महिमा अपार है। मौन से क्रोध का दमन, वाणी का नियंत्रण,शरीर बल एवं आत्मबल में वृद्धि, मन को शांति तथा मस्तिष्क को विश्राम मिलता है, जिससे आंतरिक शक्तियों का विकास होता है और ऊर्जा का क्षरण रूकता है। इसलिए मौन व्रत को व्रत की संज्ञा दी गई है।

मौन के संबंध में महाभारत में एक कथा है। जब महाभारत का अंतिम श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा बोला गया और गणेश जी द्वारा भोज पत्र पर लिखा जा चुका, तब महर्षि वेदव्यास ने कहा -÷विनेश्वर धन्य है आपकी लेखनी ! महाभारत का सृजन तो वस्तुतः परमात्मा ने किया है, पर एक वस्तु आपकी लेखनी से अधिक विस्मयकारी है- वह है आपका मौन। इस अवधि में मैंने तो १५-२० लाख शब्द बोल डाले, परंतु आपके मुख मे मैंने एक शब्द नहीं सुना।' इस पर गणेश जी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा-÷बादरनारायण, किसी दीपक में अधिक तेल होता है और किसी में कम, तेल का अक्षय भंडार किसी दीपक में नहीं होता। उसी प्रकार देव, मानव और दानव आदि जितने भी तनधारी जीव हैं, सबकी प्राण शक्ति सीमित है, उसका पूर्णतम लाभ वही पा सकता है, जो संयम से इसका उपयोग करता है। संयम का प्रथम सोपान है- वाक्‌ संयम। जो वाणी का संयम नहीं रखता, उसके अनावश्यक शब्द प्राणशक्ति को सोख डालते हैं। वाक्‌संयम से यह समस्त अनर्थपरंपरा दग्धबीज हो जाते है। इसीलिए मैं मौन का उपासक हूं।

छठ पूजा

गन्ने के छत्र के नीचे छठ मैया का चढ़ावा

छठ पूजा के इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो इसका प्रारंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं।
छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में देवकरी ( पूजा-स्थल) व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य देवकरी के सामने जमीन पर ही सोते हैं।

पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ ( बिहार में इसे खजूर कहते हैं। यह बाजरे के आटे और गुड़ व तिल से बने हुए पुए जैसा होता है), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।

छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।

तीसरे यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं, में पूजा का सभी सामान डाल कर देवकरी में रख दिया जाता है। देवकरी में गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं। पुरूष, महिलाएँ, बच्चों की टोली एक सैलाब की तरह दिन ढलने से पहले नदी के किनारे सोहर गाते हुए जाते हैं :-

काचि ही बांस कै बहिंगी लचकत जाय
भरिहवा जै होउं कवनरम, भार घाटे पहुँचाय
बाटै जै पूछेले बटोहिया ई भार केकरै घरै जाय
आँख तोरे फूटै रे बटोहिया जंगरा लागै तोरे घूम
छठ मईया बड़ी पुण्यात्मा ई भार छठी घाटे जाय

नदी किनारे जा कर नदी से मिट्टी निकाल कर छठ माता का चौरा बनाते हैं वहीं पर पूजा का सारा सामान रख कर नारियल चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं। उसके बाद टखने भर पानी में जा कर खड़े होते हैं और सूर्य देव की पूजा के लिए सूप में सारा सामान ले कर पानी से अर्घ्य देते हैं और पाँच बार परिक्रमा करते हैं। सूर्यास्त होने के बाद सारा सामान ले कर सोहर गाते हुए घर आ जाते हैं और देवकरी में रख देते हैं। रात को पूजा करते हैं। कृष्ण पक्ष की रात जब कुछ भी दिखाई नहीं देता श्रद्धालु अलस्सुबह सूर्योदय से दो घंटे पहले सारा नया पूजा का सामान ले कर नदी किनारे जाते हैं। पूजा का सामान फिर उसी प्रकार नदी से मिट्टी निकाल कर चौक बना कर उस पर रखा जाता है और पूजन शुरू होता है।

सूर्य देव की प्रतीक्षा में महिलाएँ हाथ में सामान से भरा सूप ले कर सूर्य देव की आराधना व पूजा नदी में खड़े हो कर करती हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है सब लोगों के चेहरे पर एक खुशी दिखाई देती है और महिलाएँ अर्घ्य देना शुरू कर देती हैं। शाम को पानी से अर्घ देते हैं लेकिन सुबह दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस समय सभी नदी में नहाते हैं तथा गीत गाते हुए पूजा का सामान ले कर घर आ जाते हैं। घर पहुँच कर देवकरी में पूजा का सामान रख दिया जाता है और महिलाएँ प्रसाद ले कर अपना व्रत खोलती हैं तथा प्रसाद परिवार व सभी परिजनों में बांटा जाता है।

छठ पूजा में कोशी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मां से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोशी भरी जाती है इसके लिए छठ पूजन के साथ -साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जिस पर छ: दिए होते हैं देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। कोशी की इस अवसर पर काफी मान्यता है उसके बारे में एक गीत गाया जाता है जिसमें बताया गया है कि कि छठ मां को कोशी कितनी प्यारी है।

रात छठिया मईया गवनै अईली
आज छठिया मईया कहवा बिलम्बली
बिलम्बली - बिलम्बली कवन राम के अंगना
जोड़ा कोशियवा भरत रहे जहवां जोड़ा नारियल धईल रहे जहंवा
उंखिया के खम्बवा गड़ल रहे तहवां

छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के हर कोने में किया जाता है दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई चेन्न्ई जैसे महानगरों में भी समुद्र किनारे जन सैलाब दिखाई देता है पिछले कई वर्षों से प्रशासन को इसके आयोजन के लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं। इस पर्व की महत्ता इतनी है कि अगर घर का कोई सदस्य बाहर है तो इस दिन घर पहुँचने का पूरा प्रयास करता है। मात्र दिल्ली से इस वर्ष 6 लाख लोग छठ के अवसर पर बिहार की तरफ गए। देश के साथ-साथ अब विदेशों में रहने वाले लोग अपने -अपने स्थान पर इस पर्व को धूम धाम से मनाते हैं। पटना में इस बार कई लोगों ने नए प्रयोग किए जिसमें अपने छत पर छोटे स्वीमिंग पूल में खड़े हो कर यह पूजा की उनका कहना था कि गंगा घाट पर इतनी भीड़ होती है कि आने जाने में कठिनाई होती है और सुचिता का पूरा ध्यान नहीं रखा जा सकता। लोगों का मानना है कि अपने घर में सफाई का ध्यान रख कर इस पर्व को बेहतर तरीके से मनाया जा सकता है। छठ माता का एक लोकप्रिय गीत है--

केरवा जे फरेला गवद से ओह पर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदिक से सुगा देले जुठियाए
उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय
उ जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ ना सहाय

20 मार्च 2010

अनुष्ठान: आमलकी एकादशी

पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से बोले-धर्मनन्दन! राजा मान्धाताने महामुनिवशिष्ठ को यह बताया था कि फाल्गुन के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम आमलकी है। इसका पवित्र व्रत विष्णुलोककी प्राप्ति करने वाला है। मान्धाताके पूछने पर वशिष्ठजीने आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति की कथा और उसकी महिमा बताते हुए कहा कि आमलकी एकादशी में आंवले के वृक्ष के पास जाकर वहां रात्रि में जागरण करना चाहिए। इससे मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और सहस्रगोदानोंका फल प्राप्त करता है।

व्रती शरीर में मृत्तिका लगाकर स्नान करे। इस एकादशी में श्रीभगवान विष्णु के अवतार श्रीपरशुरामजी की पूजा की जाती है। पूजनोपरांतइस मंत्र से उन्हें अ‌र्घ्यदें-

नमस्तेदेवदेवेशजामदग्न्यनमोऽस्तुते।
गृहाणा‌र्घ्यमिमंदत्तमामलक्यायुतंहरे॥

देवदेवेश्वर! जगदग्नि-नन्दन! श्रीहरिके स्वरूप परशुरामजी! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आंवले के फल के साथ दिया हुआ मेरा यह अ‌र्घ्यग्रहण कीजिए।

तदनन्तर भगवन्नामका स्मरण,जप,संकीर्तन करते हुए रात भर जगें। उसके बाद भगवान विष्णु के नाम लेते हुए आंवले के वृक्ष की 108 अथवा 28 परिक्रमा करें। द्वादशी में किसी आचार्य को भोजन कराकर पूजा में चढाई गई सामग्री उन्हें दे दें। फिर स्वयं भी व्रत का पारण करें। ऐसा करने से समस्त तीर्थो की यात्रा का पुण्यफलप्राप्त होता है। सब प्रकार के दान देने से मिलने वाला फल भी इस एकादशी के व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से उपलब्ध हो जाता है। आमलकीएकादशी के व्रत से सब यज्ञों की अपेक्षा अधिक फल मिलता है। यह दुर्धर्षव्रत मनुष्य को सब पापों से मुक्त करने वाला है।

पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें इस व्रत के विधान का अतिविस्तृतवर्णन प्राप्त होता है।