22 अप्रैल 2010
अपने भीतर की योग्यता और संभावनाओं को जगाएं
दुनिया उसके पीछे भाग रही है जिसके पास पॉवर है, जो बड़ी हस्ती है, कुछ परिवर्तन का माद्दा रखता है। उगते सूरज को सभी नमस्कार करते हैं। हमारे मन में हमेशा लालसा रहती है कि कोई बड़ा आदमी हमें अपना नजदीकी बना ले। नजदीकियां बनाना है तो पहले खुद के भीतर इतनी योग्यता और संभावनाओं को जगाना पड़ेगा। आध्यात्मिक जीवन में भी परमात्मा की निकटता पाने के लिए अपने भीतर की संभावनाओं को जगाना पड़ेगा।
दुनिया में रहते हुए अनेक लोगों को कई बार ऐसा लगता है कि किसी बड़ी हस्ती की निकटता प्राप्त हो जाए। कोई दिव्यात्मा हमें स्पर्श कर ले और यदि ऐसा होता है तो कभी-कभी हमें एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे अध्यात्म ने सान्निध्य ऊर्जा कहा है एनर्जी ऑफ प्रॉक्सीमिटी और जब ऐसी ऊर्जा मिले तो उसका उपयोग करना हमें आना चाहिए।
श्री हनुमानजी के जीवन में एक अवसर ऐसा आया था। राजा सुग्रीव के आदेश पर जब वानर चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजे गए तो कहते हैं हनुमानजी सबसे पीछे थे। श्रीराम सबको बिदाई दे रहे थे तो लिखा गया है च्च्पाछें पवन तनय सिरु नावा, जानि काज प्रभु निकट बोलावाज्ज जो व्यक्ति सबसे पीछे आया है राम ने उन्हें काम का विचार कर अपने निकट बुलाया। श्रीराम को सीताजी के पास दूत के रूप में भेजने के लिए किसी का तो चयन करना ही था। ये सारी संभावना उन्हें हनुमानजी महाराज में दिख गई। हर बीज वृक्ष नहीं बनता लेकिन चैतन्य लोग उस एक बीज को पकड़ लेते हैं जिसमें वृक्ष बनने की संभावना है।राम चैतन्य थे और हनुमान, बीज में भरी हुई संभावना थे। बात यहीं समाप्त नहीं हुई च्च्परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।ज्ज अपने हाथों से श्रीरामजी ने हनुमानजी को स्पर्श किया और अंगुठी सौंप दी। यहां हनुमानजी को एक दिव्य सत्ता की निकटता और स्पर्श दोनों मिल गए। इस सान्निध्य ऊर्जा का उपयोग उन्होंने लंका में जाकर किया। हमें यही सीखना है। अच्छे, समझदार सक्षम और बड़े लोगों का साथ मिले ऐसा प्रयास करें किंतु उस संग से जो ऊर्जा मिले उसका भरपूर सद्उपयोग किया जाए। साथ देने के लिए इस समय सर्वाधिक सुलभ देवता हनुमानजी महाराज हैं। वे आपके पास कभी भी आ जाएंगे।
दुनिया में रहते हुए अनेक लोगों को कई बार ऐसा लगता है कि किसी बड़ी हस्ती की निकटता प्राप्त हो जाए। कोई दिव्यात्मा हमें स्पर्श कर ले और यदि ऐसा होता है तो कभी-कभी हमें एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे अध्यात्म ने सान्निध्य ऊर्जा कहा है एनर्जी ऑफ प्रॉक्सीमिटी और जब ऐसी ऊर्जा मिले तो उसका उपयोग करना हमें आना चाहिए।
श्री हनुमानजी के जीवन में एक अवसर ऐसा आया था। राजा सुग्रीव के आदेश पर जब वानर चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजे गए तो कहते हैं हनुमानजी सबसे पीछे थे। श्रीराम सबको बिदाई दे रहे थे तो लिखा गया है च्च्पाछें पवन तनय सिरु नावा, जानि काज प्रभु निकट बोलावाज्ज जो व्यक्ति सबसे पीछे आया है राम ने उन्हें काम का विचार कर अपने निकट बुलाया। श्रीराम को सीताजी के पास दूत के रूप में भेजने के लिए किसी का तो चयन करना ही था। ये सारी संभावना उन्हें हनुमानजी महाराज में दिख गई। हर बीज वृक्ष नहीं बनता लेकिन चैतन्य लोग उस एक बीज को पकड़ लेते हैं जिसमें वृक्ष बनने की संभावना है।राम चैतन्य थे और हनुमान, बीज में भरी हुई संभावना थे। बात यहीं समाप्त नहीं हुई च्च्परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।ज्ज अपने हाथों से श्रीरामजी ने हनुमानजी को स्पर्श किया और अंगुठी सौंप दी। यहां हनुमानजी को एक दिव्य सत्ता की निकटता और स्पर्श दोनों मिल गए। इस सान्निध्य ऊर्जा का उपयोग उन्होंने लंका में जाकर किया। हमें यही सीखना है। अच्छे, समझदार सक्षम और बड़े लोगों का साथ मिले ऐसा प्रयास करें किंतु उस संग से जो ऊर्जा मिले उसका भरपूर सद्उपयोग किया जाए। साथ देने के लिए इस समय सर्वाधिक सुलभ देवता हनुमानजी महाराज हैं। वे आपके पास कभी भी आ जाएंगे।
Posted by Udit bhargava at 4/22/2010 05:43:00 pm 0 comments
अगर सीधे पहुंचना हो परमात्मा तक
परमात्मा यानी उस परम शक्ति तक हम सीधे भी पहुंच सकते हैं। इसके लिए भक्ति नहीं हमें प्रयास करना होगा खुद को साधने का। खुद के स्वाभाव को फकीराना बनाना होगा। हम तीर्थो में जाते हैं तो मंदिर और प्रतिमाओं तक ही सीमित रह जाते हैं, कभी उसके भीतर यानी परमात्मा को समझने की कोशिश भी नहीं करते।
सीधे ईश्वर तक पहुंचने की तड़प आदमी के भीतर फकीरी ला देती है। मुस्लिम फकीरों की परंपरा में शिबली का नाम अदब से लिया जाता है। उनका आग्रह रहता था कि सीधे अल्लाह तक पहुंचो। अपनी इस बात को कहने के उनके ढंग निराले होते थे। धर्मस्थलों का लोगों ने उपयोग केवल दिखावे के लिए किया है इस पर शिबली को आवेश भी रहता था। एक बार वे हाथ में जलते हुए अंगारे लेकर घूम रहे थे। लोगों ने सवाल पूछा तो शिबली का जवाब था इससे खान-ए-काबा को जलाने की तैयारी है। लोगों को नाराजी आना स्वाभाविक थी। ये मुसलमान होकर काबा यानी मुसलमानों के सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान के लिए ऐसा कह रहे हैं, लेकिन जब शिबली फकीर ने अपनी बात को और साफ करके जवाब दिया तो लोग चौंके, शर्मिन्दा भी हुए और खुश भी। बात इशारे में की गई थी। उनका कहना था इसलिए ऐसा करना चाहता हूं लोग केवल वहीं की इबादत पर टिक जाते हैं और सीधे खुदा की ओर नहीं चलते। शिबली का इशारा था लोग केवल काबा की जगह पर न टिकें बल्कि साहबे काबा (परमात्मा, उस स्थान के मालिक) पर टिकें।सचमुच हम लोगों का जीवन ऐसा ही हो जाता है कि हम खुदा को सुनते हैं खुदा की नहीं सुनते। एक दफा शिबली के हाथ जलती लकड़ियां देख फिर सवाल पूछा गया, अब किसे जलाने का इरादा है। जवाब बेमिसाल ही आया। जन्नत (स्वर्ग) और दोजख (नर्क) दोनों को जला दूंगा। अभिव्यक्ति की निराले तौर तरीके के साथ फकीर बोले जन्नत और दोजख के डर से लोग उस ऊपर वाले की इबादत करें यह गलत है। व्यक्ति निलरेभ, निर्भय और निर्दोष होना चाहिए। हमें समझना होगा कि जीवन एक सतत् प्रशिक्षण है। संत फकीर अपने-अपने अन्दाज से हमें सिखाते जाते हैं।
सीधे ईश्वर तक पहुंचने की तड़प आदमी के भीतर फकीरी ला देती है। मुस्लिम फकीरों की परंपरा में शिबली का नाम अदब से लिया जाता है। उनका आग्रह रहता था कि सीधे अल्लाह तक पहुंचो। अपनी इस बात को कहने के उनके ढंग निराले होते थे। धर्मस्थलों का लोगों ने उपयोग केवल दिखावे के लिए किया है इस पर शिबली को आवेश भी रहता था। एक बार वे हाथ में जलते हुए अंगारे लेकर घूम रहे थे। लोगों ने सवाल पूछा तो शिबली का जवाब था इससे खान-ए-काबा को जलाने की तैयारी है। लोगों को नाराजी आना स्वाभाविक थी। ये मुसलमान होकर काबा यानी मुसलमानों के सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान के लिए ऐसा कह रहे हैं, लेकिन जब शिबली फकीर ने अपनी बात को और साफ करके जवाब दिया तो लोग चौंके, शर्मिन्दा भी हुए और खुश भी। बात इशारे में की गई थी। उनका कहना था इसलिए ऐसा करना चाहता हूं लोग केवल वहीं की इबादत पर टिक जाते हैं और सीधे खुदा की ओर नहीं चलते। शिबली का इशारा था लोग केवल काबा की जगह पर न टिकें बल्कि साहबे काबा (परमात्मा, उस स्थान के मालिक) पर टिकें।सचमुच हम लोगों का जीवन ऐसा ही हो जाता है कि हम खुदा को सुनते हैं खुदा की नहीं सुनते। एक दफा शिबली के हाथ जलती लकड़ियां देख फिर सवाल पूछा गया, अब किसे जलाने का इरादा है। जवाब बेमिसाल ही आया। जन्नत (स्वर्ग) और दोजख (नर्क) दोनों को जला दूंगा। अभिव्यक्ति की निराले तौर तरीके के साथ फकीर बोले जन्नत और दोजख के डर से लोग उस ऊपर वाले की इबादत करें यह गलत है। व्यक्ति निलरेभ, निर्भय और निर्दोष होना चाहिए। हमें समझना होगा कि जीवन एक सतत् प्रशिक्षण है। संत फकीर अपने-अपने अन्दाज से हमें सिखाते जाते हैं।
Posted by Udit bhargava at 4/22/2010 05:40:00 pm 0 comments
21 अप्रैल 2010
कलचुरि कालीन संस्कृतिक इतिहास
नोहटा की भौगोलिक स्थिति- 23 40 उत्तरी अक्षांश तथा 79 30 पूर्वी देशांतर पर व्यारमा नदी की सहायक गोरया तथा व्यारमा के संगम पर है। दमोह से दक्षिण पूर्व की ओर नोहटा-जबलपुर मार्ग पर दमोह से 23 किलोमीटर की दूरी पर नोहटा नामक कस्बा है। कस्बे से एक कि.मी. जबलपुर मार्ग के बांई ओर कलचुरि शिखर का शिव मंदिर अवस्थित है। स्थानीय निवासे इसे "मढा" कहते हैं।
कलचुरि शासन काल में इस भूभाग का चहुंमुखी विकास हुआ। काल विशेष में धर्म, साहित्य एवं कला-संस्कृति अपने चर्मोत्कर्ष पर थी, फ़लस्वरूप नोहलेश्वर मन्दिर का संस्कृतिक समरसता के सौहार्द्र में अभूतपूर्व योगदान रहा। ग्राम्य जीवन के संस्कृतिक पहलू को जानने के लिये स्मारक उपयोगी रहे हैं। कतिपय नोहटा ग्रामवासियों के मकानों की भित्तियों, अन्य कई स्थलों पर चतुर्भुजी देवी, नवग्रह, युगल प्रतिमाएं, चतुर्भुजी कंकाली, दण्डधर शिव, गजासुर संहारक शिव, पार्वती, गणेश आदि की प्रतिमाओं के अतिरिक्त वास्तुकला के अवशेष विघमान हैं। मन्दिर परिसर में 20 प्रतिमाएं संरक्षित हैं जो विविध देवी-देवताओं की हैं।
वर्तमान पुरातत्व शास्त्रियों के पुरातत्वीय अध्ययन के फ़लस्वरूप दमोह जिले के इतिहास को जानने में नोहलेश्वर मन्दिर के महत्व को नहीं भुलाय जा सकता है। तत्कालीन समय में शैव सम्प्रदाय उपासना, धर्मिक सद्भावना, सहिष्णुता, संस्कृतिक मेल-जोल की भावना को उजागर करता है।
क्षेत्र विशेष के अन्तर्गत जिले के ऐतिहासिक स्थलों पर नजर डालें तो कुण्डलपुर, नोहटा, कोडल, सकोर, बव्यिगढ, रनेह, हिण्डोरिया, सगोरिया, चौपडापट्टी, गुबारा, दोनी, मोहड, डूमर, बडगवां, छितराखेडा, फ़तेहपुर आदि स्थानों से क्षेत्र विशेष का परवर्ती इतिहास ज्ञात होता है।
क्षेत्र विशेष से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि दसवीं सदीं से लेकर 13वीं सदीं तक दमोह क्षेत्र के अंतर्गत कलचुरी कालीन काल का चहुंमुखी विकास हुआ। कलचुरी काल में विवेच्य क्षेत्र की समर्धि हुई। कल्च्चुरी शासक युवराज देव प्रथम गांगेयदेव लक्ष्मी कर्ण के समय में इस क्षेत्र में मंदिरों तथा मूर्तियों का व्यापक निर्माण करवाया गया। कलचुरी कालीन आरंभिक मूर्तिकला उच्चकोटि की थी। उसमें सुव्यवस्थित अंग-विन्यास के साथ-साथ भाव-प्रदशन का अत्यंत रोचक समन्वय मिलता है। कलचुरी शासकों ने साहित्यकारों तथा कुशल कलाकारों को राजाश्रय प्रदान किया।
युवराज देव प्रथम ईसवी सन 915 से 1945 तक कलचुरी शासक थे। वे अप्रतिम वीर, नीतिज्ञ तथा उदार शासक थे। युवराज देव के उतराधिकारी एवं अन्य सामयिक राजवंशों के लेखों में इस रजा के सम्बन्ध में पर्याप्त विवरण उपलब्ध है। राजशेखर कृत संस्कृत रचना विद्वशालभंजिका में भी इस राजा के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। युवराज देव का अन्य नाम कपूर्वर्ष अथवा कपूर्वर्ष प्राप्त होता है। इसके पुत्र द्वितीय लक्ष्मण राज के कारीतालाई शिलालेख में उसके विविध सैन्य अभियानों का विवरण है। बिल्हारी अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने गौड़(बंगाल), कर्णाट(कर्नाटक), गुजरात(लाट), कलिंग(उडीसा) तथा कश्मीर पर आक्रमण किया और उन प्रदेशों की रमणियों से विवाह किया। चन्देल रजा यशोवर्मा के अभिलेख में युव्राज देव के प्रताप का वर्णन निम्न पद ’विख्यात क्षितिपाल मौलीरचना विनय स्तपादाम्बुज’ (जिसने अपना पद-कमल प्रख्यात नरेशों के सिर पर स्थापित किया), में किया गया है। उसने सम्राट पड़ की सूचक पदवियां-परमेश्वर, चक्रवर्ती तथा त्रिकलिंगाधिपति धारण कर राखी थीं। राजशेखर कृत विद्वशाळाभंजिका नाटक के चतुर्थ अंक में युवराज देव द्वारा विभिन्न प्रदेशों पर विजय की चर्चा अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से की गयी है। द्वितय लक्ष्मण राज के कारीतालाई अभिलेख के अनुसार युवराज देव ने गुर्जर प्रतिहार नरेश महिपाल पर विजय प्राप्त की थी उसने गौदाधिपति, मालवनृपति और इसी तरह दक्षिण कौशालाधिपति को पराजित किया था। राष्ट्रकूट नृपति इन्द्र ने किसी कलचुरी राजकन्या से विवाह किया था। उसकी कन्नौज की चढ़ाई के समय युवराज देव ने उसे मदद पहुंचाई थी। राष्ट्रकूट और कलचुरि की सामूहिक शक्ति के समक्ष प्रतिहार नरेश महिपाल न टिक सका और उसे भी अपनी राजधानी छोड़कर भागना पडा और तभी से प्रतिहारों के साम्राज्य का ह्वास होने लगा। सुप्रसिद्ध संस्कृत कवी राजशेखर कन्नौज में प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल और महिपाल के आश्रय में थे। इस आक्रमण के बाद वे त्रिपुरी आये। वहां उन्हों "विद्वशालभंजिका" नामक नाटिका और संस्कृत साहित्य पर काव्य मीमांसा नामक एक बहुमूल्य ग्रन्थ की रचना की थी। माना जाता है कि चंदेल वंशीय त्रैलोक्यवर्मन ने 1211 ई. के लगभग त्रिपुरी के विजय सिंह को पराजित करके उसकी साम्राज्य सत्ता अपनी हाथों में ले ली थी। त्रैलोक्यमल्ल को चंदेलवंश का त्रैलोक्यवर्मन माना गया और यह निष्कर्ष निकाला गया कि उसने कलचुरी विजय सिंह से यह प्रदेश छीन लिया था।
माण्डला जिले के झूलपुर ग्राम से प्राप्त ताम्रपत्र द्वारा जानकारी मिलती है कि कलचुरी राजा विजय सिंह का पुत्र त्रैलोक्यममल्ल था। उसका जन्म 1197 ई. में हुआ था| चूंकि चंदेल त्रैलोक्यवर्मन की मृत्यु 1245 में हो चुकी थी, इसलिये 1250 ई. में राज्य करने वाला त्रिकलिंगाधिपति त्रैलोक्यवर्मन देव वास्तव में विजय सिंह का पुत्र कलचुरी राजा त्रैलोक्यमल्ल था। कलचुरी नरेश त्रैलोक्यमल्ल 1250 ई. तक राज्य करता रहा, लेकिन उसके बाद त्रिपुरी के कलचुरी वंश के इतिहास का अध्याय समाप्त होता है।
Labels: भारतीय सभ्यता/कला/संस्कृति/विरासत
Posted by Udit bhargava at 4/21/2010 06:03:00 pm 0 comments
20 अप्रैल 2010
वास्तु शास्त्र
वास्तु शास्त्र में गणपति
इन्हें भी देखें :-
भवन-निर्माण में वास्तु का महत्व
लियुली वैल्थ पांट
घर में लाएं सकारात्मक ऊर्जा और सुख समृद्धि
फेंगशुई के कुछ टिप्स
फेंगशुई: डबल ड्रैगन
वास्तुशास्त्र संबंधी सामान्य नियम
वास्तुदोष भी प्रभवित करते हैं जीवन को
अविवाहित किस दिशा में सोएँ
ऑरा चिकित्सा
आँगन : मकान का केन्द्रीय स्थल
शनि ग्रह और वास्तु
आग्नेय में स्थापित करें रसोईघर
वास्तु बदलें भाग्य बदलेगा
वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय
वास्तु दोष निवारक यन्त्र
वास्तु एवं वृक्षारोपण
वास्तु का मौलिक रूप एवं मानव जीवन में इसका महत्व
वास्तुसम्मत कार्यालय के कुछ महत्वपूर्ण उपाय
वास्तुशास्त्र का उद्रम
व्यापार केंद्र के वास्तु सूत्र
अपनी प्रोपर्टी के आप स्वयं बनें वास्तुकार
लाभकारी वास्तु टोटकें
वास्तुदोष निवारण के आसान उपाय
Labels: ज्योतिष
Posted by Udit bhargava at 4/20/2010 11:13:00 pm 0 comments
चॉकलेट मेकिंगः नया स्वाद - कॅरियर का
चॉकलेट बनाने का काम करने वालों को चॉकलेटियर कहते हैं। ये कुलिनरी ज्ञान में दक्ष तो होते ही हैं, लेकिन चॉकलेट को ज्यादा आकर्षक बनाने व दिखाने का कलात्मक पुट भी इनमें मौजूद होता है। चॉकलेट निर्माण को महज एक कला नहीं कहा जा सकता। इनके काम में चॉकलेट बनाने की केमिस्ट्री जानना भी शामिल है। इस कॅरियर में पढ़ाई के साथ ही काम का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
कार्य का स्वरूप
चॉकलेटियर बनने के लिए बहुत धर्य और दृढ़ता की आवश्यकता होती है। साथ ही अपने द्वारा तैयार की हुई चॉकलेट को थोड़े-थोड़े समय बाद नवरूप देने की कलात्मक योग्यता की भी दरकार होती है। रोजमर्रा के कार्य में चॉकलेट बनाने वाले यंत्रों की कार्यप्रणाली, सफाई व रखरखाव, निर्माण कार्य की शिडच्यूलिंग, ऑर्डर लेना, सामग्री तैयार करना और अंत में तैयार उत्पाद को गुणवत्ता के आधार पर जांचना शामिल है। व्यापार के विस्तार के अनुरूप इनके काम में बदलाव संभव हैं।
व्यावहारिक समझ
चॉकलेट के इतिहास, फ्लेवर और गुणों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि चॉकलेट से विभिन्न तरह के डेजर्ट, कैंडीज और स्कल्पचर तैयार कर सकें। बाजार में उपलब्ध कई तरह की चॉकलेट्स और उनके सही उपयोग के बारे में पता होना चाहिए। तीन तरह की चॉकलेट (सफेद, मिल्क व डार्क) की खूबी व इसे सबसे अच्छे आकार में सामने लाने का ज्ञान भी इनके लिए आवश्यक है।
योग्यता
द कुलिनरी इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका के अनुसार चॉकलेटियर के पास कलात्मक सोच के साथ ही सफल व्यापार संचालन के लिए जरूरी बातें होना आवश्यक हैं। हालांकि कुछ चॉकलेटियर्स ने औपचारिक शिक्षा लिए बगैर भी सफलता पाई है और नाम कमाया है, लेकिन कुलिनरी स्कूल से तकनीकी व व्यावहारिक शिक्षा लेने के बाद ही इसमें प्रवेश करना बेहतर रहता है। अब तो इस विधा से जुड़े ऑनलाइन कार्यक्रम भी शुरू हो चुके हैं, लिहाजा यह आपको तय करना है कि कक्षागत पढ़ाई को प्राथमिकता देंगे या ऑनलाइन को।
अनुभव
प्रशिक्षु को किसी स्थापित चॉकलेटियर का हाथ बंटाते हुए कार्य की बारीकियां सीखना चाहिए। इसमें इंटर्नशिप और हर स्तर पर कार्य करते हुए सीखने के प्रशिक्षण को कुछ समय तक जारी रखा जा सकता है। इस तरह शिक्षण के बाद व्यावहारिक शिक्षा का भी ज्ञान हो जाता है। इस तरह से अपना कार्य शुरू करने से पहले व्यवसाय की बारीकियां भी जान लेते हैं। अनुभवी चॉकलेटियर शानदार और कलात्मक चॉकलेट पीस भी तैयार करते हैं।
संभावनाएं
आवश्यक शिक्षण-प्रशिक्षण लेने और किसी स्थापित ब्रांड के साथ कार्यगत अनुभव लेने के बाद आप अपना काम शुरू कर सकते हैं। अपना काम शुरू करने में मेहनत, धर्य और सजगता की आवश्यकता होती है। फिर भी ज्यादातर लोग किसी दूसरे के साथ जुड़कर कार्य करने से ज्यादा प्राथमिकता अपना काम शुरू करने को देते हैं। वेबसाइट ह्यद्बद्वश्चद्य4द्धद्बrद्गस्र.ष्oद्व के अनुसार बीते कुछ वर्षो में इस व्यवसाय में 52 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है। इस वेबसाइट के अनुसार वेतन या आपकी कमाई अनुभव, कार्यरत या स्वयं संचालित कंपनी की तरक्की व ब्रांड वेल्यू के अनुसार बढ़ती है। इस इंडस्ट्री से जुड़ने का एक और विकल्प चॉकलेट टेस्टर बनने का भी है। इसके अलावा रिसर्च व डेवलपमेंट का कार्य संभालते हुए नई-नई रेसिपी भी ईजाद कर सकते हैं।
कोर्स
भारत में इस संबंध में कम ही कोर्स मौजूद हैं। दिल्ली स्थित चॉकलेट क्लासेज एंड मटेरियल इंस्टीट्यूट में प्रोफेशनल चॉकलेट मेकिंग, चॉकलेट डेकोरेशन, चॉकलेट पैकेजिंग और सेमी प्रोफेशनल चॉकलेट मेकिंग का कोर्स
करवाया जा रहा है। मुंबई बैरी कैलेबॉट चॉकलेट एकेडमी भी देश का एक प्रतिष्ठित संस्थान है। यहां एक और दो दिन के स्पेशल कोर्स भी हैं जो क्रमश: 3500-7000 रुपए में हो सकते हैं। ऑनलाइन कोर्सेज की बात करें तो वैंकुवर, कनाडा स्थित इकोल चॉकलेट संस्थान इस बाबत ऑनलाइन कोर्स करवाता है।
मिथक
ज्यादातार लोग इस पेशे से इसलिए जुड़ते हैं, क्योंकि उन्हें चॉकलेट खाने का शौक होता है। यह बात कुछ हद तक तो जायज है लेकिन जब बात कलात्मक नजरिये, व्यापारिक सोच और संप्रेषण की शानदार कला की आती है तो कई लोग पिछड़ जाते हैं। ऐसे में यह ध्यान रखना जरूरी है कि आप सिर्फ शौक के तहत इस उद्योग से जुड़ रहे हैं या वास्तव में चॉकलेट निर्माण से जुड़ने की धुन है।
वेतन
चॉकलेट टेस्टर के तौर पर आप किसी कंपनी में शुरुआत से ही अच्छा वेतन पा सकते हैं। ट्रेनिंग के क्षेत्र से जुड़कर आप एक सत्र में एक-दो हजार रुपए तक कमा सकते हैं। चॉकलेटियर्स की सबसे ज्यादा खपत हॉस्पिटेलिटी इंडस्ट्री में है, जहां इनका शुरुआती वेतन 8-10 हजार रुपए होता है।
कार्य का स्वरूप
चॉकलेटियर बनने के लिए बहुत धर्य और दृढ़ता की आवश्यकता होती है। साथ ही अपने द्वारा तैयार की हुई चॉकलेट को थोड़े-थोड़े समय बाद नवरूप देने की कलात्मक योग्यता की भी दरकार होती है। रोजमर्रा के कार्य में चॉकलेट बनाने वाले यंत्रों की कार्यप्रणाली, सफाई व रखरखाव, निर्माण कार्य की शिडच्यूलिंग, ऑर्डर लेना, सामग्री तैयार करना और अंत में तैयार उत्पाद को गुणवत्ता के आधार पर जांचना शामिल है। व्यापार के विस्तार के अनुरूप इनके काम में बदलाव संभव हैं।
व्यावहारिक समझ
चॉकलेट के इतिहास, फ्लेवर और गुणों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि चॉकलेट से विभिन्न तरह के डेजर्ट, कैंडीज और स्कल्पचर तैयार कर सकें। बाजार में उपलब्ध कई तरह की चॉकलेट्स और उनके सही उपयोग के बारे में पता होना चाहिए। तीन तरह की चॉकलेट (सफेद, मिल्क व डार्क) की खूबी व इसे सबसे अच्छे आकार में सामने लाने का ज्ञान भी इनके लिए आवश्यक है।
योग्यता
द कुलिनरी इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका के अनुसार चॉकलेटियर के पास कलात्मक सोच के साथ ही सफल व्यापार संचालन के लिए जरूरी बातें होना आवश्यक हैं। हालांकि कुछ चॉकलेटियर्स ने औपचारिक शिक्षा लिए बगैर भी सफलता पाई है और नाम कमाया है, लेकिन कुलिनरी स्कूल से तकनीकी व व्यावहारिक शिक्षा लेने के बाद ही इसमें प्रवेश करना बेहतर रहता है। अब तो इस विधा से जुड़े ऑनलाइन कार्यक्रम भी शुरू हो चुके हैं, लिहाजा यह आपको तय करना है कि कक्षागत पढ़ाई को प्राथमिकता देंगे या ऑनलाइन को।
अनुभव
प्रशिक्षु को किसी स्थापित चॉकलेटियर का हाथ बंटाते हुए कार्य की बारीकियां सीखना चाहिए। इसमें इंटर्नशिप और हर स्तर पर कार्य करते हुए सीखने के प्रशिक्षण को कुछ समय तक जारी रखा जा सकता है। इस तरह शिक्षण के बाद व्यावहारिक शिक्षा का भी ज्ञान हो जाता है। इस तरह से अपना कार्य शुरू करने से पहले व्यवसाय की बारीकियां भी जान लेते हैं। अनुभवी चॉकलेटियर शानदार और कलात्मक चॉकलेट पीस भी तैयार करते हैं।
संभावनाएं
आवश्यक शिक्षण-प्रशिक्षण लेने और किसी स्थापित ब्रांड के साथ कार्यगत अनुभव लेने के बाद आप अपना काम शुरू कर सकते हैं। अपना काम शुरू करने में मेहनत, धर्य और सजगता की आवश्यकता होती है। फिर भी ज्यादातर लोग किसी दूसरे के साथ जुड़कर कार्य करने से ज्यादा प्राथमिकता अपना काम शुरू करने को देते हैं। वेबसाइट ह्यद्बद्वश्चद्य4द्धद्बrद्गस्र.ष्oद्व के अनुसार बीते कुछ वर्षो में इस व्यवसाय में 52 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है। इस वेबसाइट के अनुसार वेतन या आपकी कमाई अनुभव, कार्यरत या स्वयं संचालित कंपनी की तरक्की व ब्रांड वेल्यू के अनुसार बढ़ती है। इस इंडस्ट्री से जुड़ने का एक और विकल्प चॉकलेट टेस्टर बनने का भी है। इसके अलावा रिसर्च व डेवलपमेंट का कार्य संभालते हुए नई-नई रेसिपी भी ईजाद कर सकते हैं।
कोर्स
भारत में इस संबंध में कम ही कोर्स मौजूद हैं। दिल्ली स्थित चॉकलेट क्लासेज एंड मटेरियल इंस्टीट्यूट में प्रोफेशनल चॉकलेट मेकिंग, चॉकलेट डेकोरेशन, चॉकलेट पैकेजिंग और सेमी प्रोफेशनल चॉकलेट मेकिंग का कोर्स
करवाया जा रहा है। मुंबई बैरी कैलेबॉट चॉकलेट एकेडमी भी देश का एक प्रतिष्ठित संस्थान है। यहां एक और दो दिन के स्पेशल कोर्स भी हैं जो क्रमश: 3500-7000 रुपए में हो सकते हैं। ऑनलाइन कोर्सेज की बात करें तो वैंकुवर, कनाडा स्थित इकोल चॉकलेट संस्थान इस बाबत ऑनलाइन कोर्स करवाता है।
मिथक
ज्यादातार लोग इस पेशे से इसलिए जुड़ते हैं, क्योंकि उन्हें चॉकलेट खाने का शौक होता है। यह बात कुछ हद तक तो जायज है लेकिन जब बात कलात्मक नजरिये, व्यापारिक सोच और संप्रेषण की शानदार कला की आती है तो कई लोग पिछड़ जाते हैं। ऐसे में यह ध्यान रखना जरूरी है कि आप सिर्फ शौक के तहत इस उद्योग से जुड़ रहे हैं या वास्तव में चॉकलेट निर्माण से जुड़ने की धुन है।
वेतन
चॉकलेट टेस्टर के तौर पर आप किसी कंपनी में शुरुआत से ही अच्छा वेतन पा सकते हैं। ट्रेनिंग के क्षेत्र से जुड़कर आप एक सत्र में एक-दो हजार रुपए तक कमा सकते हैं। चॉकलेटियर्स की सबसे ज्यादा खपत हॉस्पिटेलिटी इंडस्ट्री में है, जहां इनका शुरुआती वेतन 8-10 हजार रुपए होता है।
Posted by Udit bhargava at 4/20/2010 10:51:00 pm 0 comments
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग
टेलीकम्युनिकेशन का क्षेत्र दुनिया में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह क्षेत्र हमारे रोजमर्रा के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी मदद से ही हम दूर बैठे लोगों के संपर्क में रह पाते हैं। इस तकनीक की मदद से ही हम उन्हें देख और बातचीत कर पाने में सक्षम हो पाए हैं। सूचना व संचार के इस दौर में संप्रेषण के बेहतर डिजिटल माध्यम जैसे मोबाइल, इंटरनेट और सैटेलाइट सेवाएं और विस्तृत हो रही हैं। नतीजतन इस तकनीक में पेशेवर और दक्ष लोगों की मांग भी बढ़ रही है, जो टेलीकॉम इंडस्ट्री को महत्वपूर्ण बना रहे हैं।
कार्य का स्वरूप
डिजिटल और वायरलेस प्रसारण के दौर में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सिग्नल प्रोसेसिंग, डाटा नेटवर्किग, कोडिंग, एनक्रिप्शन और ट्रांसमिशन में रुचि रखने वाले इस क्षेत्र में कॅरियर बना सकते हैं। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर लाइन, वायरलेस और रेडियो संचार से डील करते हैं। इनके द्वारा किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यो में ग्राहक की मांग के अनुरूप टेलीकम्युनिकेशन के उपकरणों का निर्माण, रखरखाव, इंस्टॉलेशन और समस्या का निवारण शामिल है। नेटवर्क के रखरखाव, उत्पाद की गुणवत्ता और टेलीकॉम उद्योग के लिए नए सॉफ्टवेयर विकसित करने की जिम्मेदारी इन्हीं की है। इन्हें फाइबर ऑप्टिक्स, सेलुलर तकनीक और लेजर तकनीक का भी अच्छा ज्ञान होना चाहिए।
विस्तृत विषय
विशेषज्ञता की दरकार रखने वाले इस क्षेत्र में योग्यता और प्रशिक्षण दोनों की आवश्यकता होती है। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग मंे अध्ययन व विकास, निर्माण, मरम्मत, सेल्स, मार्केटिंग और शिक्षण मुख्य हैं। इन विषयों से स्नातक विशेषज्ञ डेवलपमेंट, प्रोडक्शन, क्वालिटी एश्योरेंस, सेल्स, सर्विसिंग या सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन सकते हैं।
शैक्षणिक योग्यता
फिजिक्स, केमिस्ट्री व मैथ्स पर अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र इसे कॅरियर के विकल्प के तौर पर अपनाकर स्नातक या स्नातकोत्तर कर सकते हैं। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर बनने के लिए स्नातक (बीई/बीटेक), स्नातकोत्तर (एमई/एमटेक) या डिप्लोमा होना आवश्यक है। रोजगार के बेहतर विकल्प के लिए इसमें एमबीए भी किया जा सकता है।
कोर्स
चार वर्ष के बीई/बीटेक, दो वर्ष के एमई/एमटेक के अलावा इस विषय में दो वर्ष का एमबीए और एक वर्ष का डिप्लोमा कोर्स भी मौजूद है। इसके अलावा तीन माह के सर्टिफिकेट कोर्स भी कुछ संस्थान करवा रहे हैं। डिप्लोमा कोर्स में छात्रों को टेलीकम्युनिकेशन के विभिन्न उपकरण जैसे मोबाइल फोन, केबल टीवी, सैटेलाइट, कंप्यूटर नेटवर्किग, राडार, नेविगेशन वगैरह की जानकारी दी जाती है। इसके अलावा मोबाइल टेलीफोनी, जीएसएम आर्किटेक्चर, इंटरनेट प्रोटोकॉल मीडिया सिस्टम, सीडीएमए, जीपीआरएस नेटवर्क और ऑप्टिकल नेटवर्क पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
व्यक्तिगत कौशल
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर बनने के लिए व्यक्तिगत योग्यताओं में संप्रेषण की कला, संगठनात्मक योग्यता, स्थिति का आकलन कर त्वरित फैसले लेने और समस्याओं को सुलझाने की समझ होनी चाहिए। टीम के साथ मिलकर कार्य करना, कंप्यूटर हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर की पूरी जानकारी होना भी आवश्यक है।
रोजगार के अवसर
इस उद्योग में आए बूम से देश-विदेश में टेलीकॉम इंजीनियर के लिए रोजगार के विकल्प बढ़ रहे हैं। टेलीकॉम इंजीनियर टेलीफोन, टेलीग्राफ, राडार, रेडियो, टेली प्रिंटर को सूचना माध्यमों के लिए और बेहतर व विकसित करने के लिए कार्य करते हैं। इस विधा में दक्ष लोगों के लिए टेलीकॉम इंडस्ट्री में कई मौके हैं, डिजाइन, निर्माण, रखरखाव, इंस्टॉलेशन और समस्या के निवारण में विशेषज्ञता रखने वालों के लिए एमटीएनएल, बीएसएनएल, रिलायंस, वोडाफोन, एयरटेल और नोकिया जैसी कंपनियों में काफी विकल्प मौजूद हैं। बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना में भी कम्युनिकेशन विशेषज्ञों की जरूरत होती है।
टेलीकम्युनिकेशन में दो-तीन वर्ष का अनुभव प्राप्त करके शिक्षण की तरफ भी जाया जा सकता है। इस विषय में एमबीए करने के बाद मैनेजेरियल जॉब भी एक विकल्प है। अगर रिसर्च व विकास में भागीदारी करना चाहते हैं तो इस दिशा में भी कदम बढ़ाए जा सकते हैं। इस क्षेत्र में नित नए अनुसंधान हो रहे हैं ताकि बदलते दौर के साथ कदमताल मिलाई जा सके। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें आपके लिए विदेशों में भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
पारिश्रमिक
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर का पारिश्रमिक उसके अनुभव, शैक्षणिक योग्यता और व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करता है। यहां सरकारी संस्थाओं के मुकाबले निजी संस्थानों में बेहतर वेतन मिलता है। संस्थानों के अनुरूप स्नातकों के लिए 10 हजार रुपए से शुरुआत हो सकती है। कुछ वष्रो का अनुभव के बाद 20 हजार रुपए से अधिक वेतन हासिल किया जा सकता है।
कोर्स करवाने वाले संस्थान
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के सभी केंद्र।
राजस्थान विधापीठ यूनिवर्सिटी, उदयपुर
किंग्सटन पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट, परगनास, पश्चिम बंगाल
महाकौशल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजी. एंड टेक्नोलॉजी, बिलासपुर
कार्य का स्वरूप
डिजिटल और वायरलेस प्रसारण के दौर में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सिग्नल प्रोसेसिंग, डाटा नेटवर्किग, कोडिंग, एनक्रिप्शन और ट्रांसमिशन में रुचि रखने वाले इस क्षेत्र में कॅरियर बना सकते हैं। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर लाइन, वायरलेस और रेडियो संचार से डील करते हैं। इनके द्वारा किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यो में ग्राहक की मांग के अनुरूप टेलीकम्युनिकेशन के उपकरणों का निर्माण, रखरखाव, इंस्टॉलेशन और समस्या का निवारण शामिल है। नेटवर्क के रखरखाव, उत्पाद की गुणवत्ता और टेलीकॉम उद्योग के लिए नए सॉफ्टवेयर विकसित करने की जिम्मेदारी इन्हीं की है। इन्हें फाइबर ऑप्टिक्स, सेलुलर तकनीक और लेजर तकनीक का भी अच्छा ज्ञान होना चाहिए।
विस्तृत विषय
विशेषज्ञता की दरकार रखने वाले इस क्षेत्र में योग्यता और प्रशिक्षण दोनों की आवश्यकता होती है। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग मंे अध्ययन व विकास, निर्माण, मरम्मत, सेल्स, मार्केटिंग और शिक्षण मुख्य हैं। इन विषयों से स्नातक विशेषज्ञ डेवलपमेंट, प्रोडक्शन, क्वालिटी एश्योरेंस, सेल्स, सर्विसिंग या सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन सकते हैं।
शैक्षणिक योग्यता
फिजिक्स, केमिस्ट्री व मैथ्स पर अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र इसे कॅरियर के विकल्प के तौर पर अपनाकर स्नातक या स्नातकोत्तर कर सकते हैं। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर बनने के लिए स्नातक (बीई/बीटेक), स्नातकोत्तर (एमई/एमटेक) या डिप्लोमा होना आवश्यक है। रोजगार के बेहतर विकल्प के लिए इसमें एमबीए भी किया जा सकता है।
कोर्स
चार वर्ष के बीई/बीटेक, दो वर्ष के एमई/एमटेक के अलावा इस विषय में दो वर्ष का एमबीए और एक वर्ष का डिप्लोमा कोर्स भी मौजूद है। इसके अलावा तीन माह के सर्टिफिकेट कोर्स भी कुछ संस्थान करवा रहे हैं। डिप्लोमा कोर्स में छात्रों को टेलीकम्युनिकेशन के विभिन्न उपकरण जैसे मोबाइल फोन, केबल टीवी, सैटेलाइट, कंप्यूटर नेटवर्किग, राडार, नेविगेशन वगैरह की जानकारी दी जाती है। इसके अलावा मोबाइल टेलीफोनी, जीएसएम आर्किटेक्चर, इंटरनेट प्रोटोकॉल मीडिया सिस्टम, सीडीएमए, जीपीआरएस नेटवर्क और ऑप्टिकल नेटवर्क पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
व्यक्तिगत कौशल
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर बनने के लिए व्यक्तिगत योग्यताओं में संप्रेषण की कला, संगठनात्मक योग्यता, स्थिति का आकलन कर त्वरित फैसले लेने और समस्याओं को सुलझाने की समझ होनी चाहिए। टीम के साथ मिलकर कार्य करना, कंप्यूटर हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर की पूरी जानकारी होना भी आवश्यक है।
रोजगार के अवसर
इस उद्योग में आए बूम से देश-विदेश में टेलीकॉम इंजीनियर के लिए रोजगार के विकल्प बढ़ रहे हैं। टेलीकॉम इंजीनियर टेलीफोन, टेलीग्राफ, राडार, रेडियो, टेली प्रिंटर को सूचना माध्यमों के लिए और बेहतर व विकसित करने के लिए कार्य करते हैं। इस विधा में दक्ष लोगों के लिए टेलीकॉम इंडस्ट्री में कई मौके हैं, डिजाइन, निर्माण, रखरखाव, इंस्टॉलेशन और समस्या के निवारण में विशेषज्ञता रखने वालों के लिए एमटीएनएल, बीएसएनएल, रिलायंस, वोडाफोन, एयरटेल और नोकिया जैसी कंपनियों में काफी विकल्प मौजूद हैं। बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना में भी कम्युनिकेशन विशेषज्ञों की जरूरत होती है।
टेलीकम्युनिकेशन में दो-तीन वर्ष का अनुभव प्राप्त करके शिक्षण की तरफ भी जाया जा सकता है। इस विषय में एमबीए करने के बाद मैनेजेरियल जॉब भी एक विकल्प है। अगर रिसर्च व विकास में भागीदारी करना चाहते हैं तो इस दिशा में भी कदम बढ़ाए जा सकते हैं। इस क्षेत्र में नित नए अनुसंधान हो रहे हैं ताकि बदलते दौर के साथ कदमताल मिलाई जा सके। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें आपके लिए विदेशों में भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
पारिश्रमिक
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर का पारिश्रमिक उसके अनुभव, शैक्षणिक योग्यता और व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करता है। यहां सरकारी संस्थाओं के मुकाबले निजी संस्थानों में बेहतर वेतन मिलता है। संस्थानों के अनुरूप स्नातकों के लिए 10 हजार रुपए से शुरुआत हो सकती है। कुछ वष्रो का अनुभव के बाद 20 हजार रुपए से अधिक वेतन हासिल किया जा सकता है।
कोर्स करवाने वाले संस्थान
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के सभी केंद्र।
राजस्थान विधापीठ यूनिवर्सिटी, उदयपुर
किंग्सटन पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट, परगनास, पश्चिम बंगाल
महाकौशल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजी. एंड टेक्नोलॉजी, बिलासपुर
Posted by Udit bhargava at 4/20/2010 10:47:00 pm 0 comments
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट में भविष्य का प्रबंधन
विदेश व्यापार में इजाफा होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुचि लेने वालों के लिए रोजगार के नए द्वार खुल रहे हैं। अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण ने भी आयात-निर्यात के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं। इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा उन लोगों की मांग है जो आयात-निर्यात के तरीकों, विदेश नीति, एक्सिम पॉलिसी, एक्सपोर्ट डॉक्यूमेंटेशन और इससे जुड़े दूसरे विषयों के पेशेवर हैं। इन लोगों की सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट हाउस, ट्रेडिंग कंपनियों, वेयरहाउस, सुपर स्टार ट्रेडिंग हाउस, निर्यात से जुड़ी इकाइयों और निर्यात को बढ़ावा देने वाली समितियों में जरूरत होती है।
इसके अलावा आयात विशेषज्ञों को नियुक्त करने वालों में कार्गो क्लीयरिंग, मरीन इंश्योरेंस कंपनियां और पैकेज उद्योग प्रमुख हैं। फॉरेन ट्रेड डेवलपमंेट सेंटर, दिल्ली के निर्देशक केएल भाटिया के अनुसार, ‘अंतरराष्ट्रीय व्यापार तेज गति से विकास कर रहा है और रोजगार के नए मौके सामने आ रहे हैं। कई ट्रेडिंग और सुपर ट्रेडिंग हाउस अपने विदेशी दफ्तरों में इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की नियुक्ति को तत्पर हैं।’
कार्य का प्रारूप
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट प्रोफेशनल का काम बहुत जिम्मेदारी का होता है, क्योंकि आपकी जरा सी भी गलती कंपनी को लाखों की चपत लगा सकती है। इस काम में कंपनी द्वारा निर्मित निर्यात होने वाले उत्पादों की मार्केटिंग, विदेशी व्यापार से जुड़ी कागजी कार्रवाई व जानकारी के अलावा पोत-परिवहन और पैकेजिंग की जानकारी होना जरूरी है। बड़ी कंपनियों में उच्च स्तर पर ऐसे पेशेवरों को नियुक्त किया जाता है जो कंपनी के सभी विदेशी कारोबार व लेन-देन की व्यवस्था बना पाएं।
योग्यता
एक्सपोर्ट मैनेजर विदेशों में कंपनी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके द्वारा निभाई जाने वाली अन्य जिम्मेदारियों में ग्राहक से जुड़े मसले सुलझाना, परिवहन, लाइसेंस, व्यापार समझौते और शीघ्र भुगतान करवाना शामिल है। इसके लिए न्यूनतम स्तर पर एक्सपोर्ट मैनेजमेंट व अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्नातक का कोर्स करना अनिवार्य है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एमबीए करने के लिए छात्रों को संयुक्त प्रवेश परीक्षा से गुजरना पड़ता है। कुछ निजी शिक्षण संस्थान जैसे फॉरेन ट्रेड डेवलपमेंट सेंटर इसमें पीजी डिप्लोमा भी करवाते हैं। यह अपनी प्रवेश परीक्षा के जरिए ही प्रवेश देते हैं। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्नीकल एजुकेशन के तहत आने वाले कई संस्थान इसके कोर्स करवा रहे हैं। शैक्षणिक योग्यता के अलावा, व्यापार की तरफ रुझान, संप्रेषण की कला में निपुणता और आत्मविश्वास आवश्यक गुणों में शामिल है।
पेशेवरों का पारिश्रमिक
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट में डिग्री लेने के बाद पेशेवरों को शुरुआत में 60-95 हजार सालाना वेतन मिल सकता है। अच्छे संस्थान से डिग्रीधारी, एक या ज्यादा विदेशी भाष के जानकार और अनुभवियों को दूसरों से ज्यादा अच्छा मेहनताना मिलता है।
इसके अलावा आयात विशेषज्ञों को नियुक्त करने वालों में कार्गो क्लीयरिंग, मरीन इंश्योरेंस कंपनियां और पैकेज उद्योग प्रमुख हैं। फॉरेन ट्रेड डेवलपमंेट सेंटर, दिल्ली के निर्देशक केएल भाटिया के अनुसार, ‘अंतरराष्ट्रीय व्यापार तेज गति से विकास कर रहा है और रोजगार के नए मौके सामने आ रहे हैं। कई ट्रेडिंग और सुपर ट्रेडिंग हाउस अपने विदेशी दफ्तरों में इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की नियुक्ति को तत्पर हैं।’
कार्य का प्रारूप
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट प्रोफेशनल का काम बहुत जिम्मेदारी का होता है, क्योंकि आपकी जरा सी भी गलती कंपनी को लाखों की चपत लगा सकती है। इस काम में कंपनी द्वारा निर्मित निर्यात होने वाले उत्पादों की मार्केटिंग, विदेशी व्यापार से जुड़ी कागजी कार्रवाई व जानकारी के अलावा पोत-परिवहन और पैकेजिंग की जानकारी होना जरूरी है। बड़ी कंपनियों में उच्च स्तर पर ऐसे पेशेवरों को नियुक्त किया जाता है जो कंपनी के सभी विदेशी कारोबार व लेन-देन की व्यवस्था बना पाएं।
योग्यता
एक्सपोर्ट मैनेजर विदेशों में कंपनी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके द्वारा निभाई जाने वाली अन्य जिम्मेदारियों में ग्राहक से जुड़े मसले सुलझाना, परिवहन, लाइसेंस, व्यापार समझौते और शीघ्र भुगतान करवाना शामिल है। इसके लिए न्यूनतम स्तर पर एक्सपोर्ट मैनेजमेंट व अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्नातक का कोर्स करना अनिवार्य है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एमबीए करने के लिए छात्रों को संयुक्त प्रवेश परीक्षा से गुजरना पड़ता है। कुछ निजी शिक्षण संस्थान जैसे फॉरेन ट्रेड डेवलपमेंट सेंटर इसमें पीजी डिप्लोमा भी करवाते हैं। यह अपनी प्रवेश परीक्षा के जरिए ही प्रवेश देते हैं। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्नीकल एजुकेशन के तहत आने वाले कई संस्थान इसके कोर्स करवा रहे हैं। शैक्षणिक योग्यता के अलावा, व्यापार की तरफ रुझान, संप्रेषण की कला में निपुणता और आत्मविश्वास आवश्यक गुणों में शामिल है।
पेशेवरों का पारिश्रमिक
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट में डिग्री लेने के बाद पेशेवरों को शुरुआत में 60-95 हजार सालाना वेतन मिल सकता है। अच्छे संस्थान से डिग्रीधारी, एक या ज्यादा विदेशी भाष के जानकार और अनुभवियों को दूसरों से ज्यादा अच्छा मेहनताना मिलता है।
Posted by Udit bhargava at 4/20/2010 10:42:00 pm 0 comments
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