04 फ़रवरी 2009

इस्लाम धर्म


इस्लाम धर्म (الإسلام) ईसाई धर्म के बाद अनुयाइयों के आधार पर दुनिया का दूसरा सब से बड़ा धर्म है। इस्लाम शब्द अरबी भाषा का शब्द है जिसका मूल शब्द सल्लमा है जिस की दो परिभाषाएं हैं (1) अमन और शांति (2) आत्मसमर्पण।
ईस्लाम एकेश्वरवाद को मानता है। इसके अनुयायियों का प्रमुख विश्वास है कि ईश्वर सिर्फ़ एक है और पूरी सृष्टि में सिर्फ़ वह ही महिमा (इबादत) के लायक है, और सृष्टि में हर चीज़, ज़िंदा और बेजान, दृश्य और अदृश्य उसकी इच्छा के सामने आत्मसमर्पित और शांत है। इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम क़ुरआन है जिसका हिंदी में मतलब सस्वर पाठ है। इसके अनुयायियों को अरबी में मुस्लिम कहा जाता है, जिसका बहुवचन मुसलमान होता है। मुसलमान यह विश्वास रखते है कि क़ुरआन जिब्राईल (ईसाईयत में Gabriel) नामक एक फ़रिश्ते के द्वारा, मुहम्मद साहब को 7 वीं सदी के अरब में, लगभग 23 साल में याद-कंठस्‍थ कराया गया था। मुसलमान इस्लाम को कोई नया धर्म नहीं मानते। उनके अनुसार ईश्वर ने मुहम्मद साहब से पहले भी धरती पर कई दूत भेजे हैं, जिनमें इब्राहीम, मूसा और ईसा शामिल हैं। मुसलमानों के अनुसार मूसा और ईसा के कई उपदेशों को लोगों ने विकृत कर दिया। अधिकतम मुसलमानों के लिये मुहम्मद साहब ईश्वर के अन्तिम दूत थे और क़ुरआन मनुष्य जाति के लिये अन्तिम संदेश है।

धार्मिक स्थल
धार्मिक पुस्तकें - कुरान, हदीथ, फ़िकह, शरिया, कलाम, तसव्वुफ़(सूफ़ीवाद)
त्योहार

03 फ़रवरी 2009

ईसाई धर्म



ईसाई धर्म या मसीही धर्म दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक सांप्रदाय है । ये ईसा मसीह के उपदेशों पर आधारित है । इसका धर्मग्रन्थ बाइबिल है । ईसाई एक ही ईश्वर को मानते हैं । लेकिन वो ईश्वर को त्रीएक के रूप में समझते हैं -- परमपिता परमेश्वर, उनके पुत्र ईसा मसीह (यीशु मसीह) और पवित्र आत्मा।
ईसा मसीह (यीशु) एक यहूदी थे जो इस्राइल के गाँव बेत्लहम में जन्मे थे (४ ईसापूर्व)। ईसाई मानते हैं की उनकी माता मारिया (मरियम) सदा-कुमारी (वर्जिन) थीं । ईसा उनके गर्भ में परमपिता परमेश्वर की कृपा से चमत्कारिक रूप से आये थे । ईसा के बारे में यहूदी नबियों ने भविष्यवाणी की थी कि एक मसीहा (अर्थात "राजा" या तारनहार) जन्म लेगा । कुछ लोग ये मानते हैं कि ईसा हिन्दुस्तान भी आये थे । बाद में ईसा ने इस्राइल में यहूदियों के बीच प्रेम का संदेश सुनाया , और कहा कि वो ही ईश्वर के पुत्र हैं ।

धार्मिक स्थल
धार्मिक पुस्तकें
त्यौहार
इसाई धर्म के पांच तत्त्व
आलेख

02 फ़रवरी 2009

सिख धर्म के पांच चिन्ह


श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सन् १६९९ ई। की बैसाखी वाले दिन खालसा पंथ की नींव रखी। उन्होंने इस दिन सिखों को दीक्षित करने के लिये खंडे – बाटे का अमृत-पान करने की परंपरा शुरु की। गुरु की चरण-पाहुल की जगह गुरुबानी का पाठ करते हुये खंडे तथा – बाटे के प्रयोग द्वारा अमृत तैयार करके, उसे सिख को पिला कर दीक्षित करना शुरू किया। उन्होंने सिख को इस दिन एक अनूठी पहचान भी प्रदान की जिसे प्रत्येक दीक्षित सिख के लिये धारण करना अनिवार्य कर दिया। इस पहचान के अंतर्गत पांच चीजें आती हैं। प्रत्येक चीज का नाम ‘क’ अक्षर से प्रारंभ होने के कारण इसे ‘पांच ककार’ कहा जाता है। ये ‘ककार’ निम्नलिखित हैं - :

1) केशः-
प्रत्येक सिख को हुकुम है कि वह जन्म से मृत्यु पर्यंत अपने शरीर के केशों की सम्भाल करे। सिर से पैरों के नख अर्थात शरीर के किसी भी हिस्से के केश सिख न तो काटेगा न उखाड़ेगा। वह इन्हें मूलभूत रुप में संभालकर रखेगा। उल्लेखनीय है कि केश संत की पहचान होते हैं। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में केशों को कत्ल करने वाले व्यक्ति को ‘बेईमान’ कहकर संबोधित किया गया है।

2) कंघाः-
लकड़ी की बनी हुई छोटी कंघी सिख को हमेशा अपने केशों में सजाकर रखने का हुकुम है। प्रत्येक सिख (नर तथा नारी) को दिन में दो वक्त अपने केशों में कंघा करने का आदेश है ताकि केश साफ-सुथरे रखे जा सकें।

3) कच्छाः-
यह तिरछे (उरेब) कपड़े से सिला हुआ लंबा पहनने का अंन्तर्वस्त्र है। जो सिख की जत-सत की निशानी है।

4) कड़ाः-
लोहे का बना हुआ कड़ा प्रत्येक सिख को अपनी दाईं कलाई पर पहनने का हुकुम है।

5) कृपाण:-
स्वयं की तथा मजलूम की रक्षा के लिये प्रत्येक सिख को अपने साथ हर वक्त कृपाण रखने का आदेश है उल्लेखनीय है कि अन्तिम उपाय के तौर पर ही इसका इस्तेमाल करने का उपदेश है। कृपाण सिपाही होने की निशानी है।

स्वर्ण मन्दिर

श्री हरिमन्दिर साहिब (पंजाबी:हरमन्दिर साहिब) या दरबार साहिब या स्वर्ण मन्दिर सिखों का सबसे प्रमुख गुरुद्वारा है। यह अमृतसर में स्थित है और यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है। पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम वास्‍तव में उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू राम दास ने अपने हाथों से कराया था।
सिक्ख गुरु को भगवान के तुल्य मानते हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सी‍ढ़ि‍यों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सी‍ढ़ि‍यों के साथ-साथ स्वर्ण मंदिर से जुड़ी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के लिए स्वर्ण मंदिर बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं, जिनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है।

परिसर
श्री हरमंदिर साहिब परिसर में दो बडे़ और कई छोटे-छोटे तीर्थस्थल हैं। ये सारे तीर्थस्थल जलाशय के चारों तरफ फैले हुए हैं। इस जलाशय को अमृतसर और अमृत झील के नाम से जाना जाता है। पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद पत्थरों से बना हुआ है और इसकी दीवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरुबानी (गुरुवाणी)की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

सरोवर
स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच में मानव निर्मित द्वीप पर बना हुआ है। पूरे मंदिर पर सोने की परत चढाई गई है। यह मंदिर एक पुल द्वारा किनारे से जुड़ा हुआ है। झील में श्रद्धालु स्नान करते हैं । यह झील मछलियों से भरी हुई है। मंदिर से 100 मी. की दूरी पर स्‍वर्ण जड़ि‍त अकाल तख्त है। इसमें एक भूमिगत तल है और पांच अन्य तल हैं। इसमें एक संग्रहालय और सभागार है। यहां पर सरबत खालसा की बैठकें होती हैं। सिक्ख पंथ से जुड़ी हर समस्या का समाधान इसी सभागार में किया जाता हैं।

द्वार
श्री हरमंदिर साहि‍ब के चार द्वार हैं। इनमें से एक द्वार गुरू रामदास सराय का है। इस सराय में अनेक हॉस्टल हैं। हॉस्टल के साथ-साथ यहां चौबीस घंटे लंगर चलता है, जिसमें कोई भी प्रसाद ग्रहण कर सकता है। श्री हरमंदिर साहब में अनेक तीर्थस्थान हैं। इनमें से जुजूबे वृक्ष को भी एक तीर्थस्थल माना जाता है। इसे बेर बाबा बुद्धा के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि जब स्वर्ण मंदिर बनाया जा रहा था तब बाबा बुद्धा इसी वृक्ष के नीचे बैठे थे और मंदिर के निर्माण कार्य पर नजर रखे हुए थे।
स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थित सभी पवित्र स्थलों की पूजा स्वरूप भक्तगण अमृतसर के चारों तरफ बने गलियारे की परिक्रमा करते हैं। इसके बाद वे अकाल तख्त के दर्शन करते हैं। अकाल तख्त के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु पंक्तियों में स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते हैं।

इतिहास
स्वर्ण मंदिर को कई बार नष्ट किया जा चुका है। लेकिन भक्ति और आस्था के कारण सिक्खों ने इसे दोबारा बना दिया। जितनी बार भी यह नष्ट किया गया है और जितनी बार भी यह बनाया गया है उसकी हर घटना को मंदिर में दर्शाया गया है। अफगा़न हमलावरों ने 19 वीं शताब्दी में इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया था। तब महाराजा रणजीत सिंह ने इसे दोबारा बनवाया था और इसे सोने की परत से सजाया था।
स्वर्ण मंदिर चौबीसों घंटे खुला रहता है। दोपहर के 2 बजे से लेकर आधी रात तक यहां सबसे ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। पूरे स्वर्ण मंदिर में फ्लड लाइट्स की व्यवस्था की गई है। सुबह और शाम के समय लाइटें बहुत सुन्दर दृश्य पेश करती हैं। स्वर्ण मंदिर शहर के पुराने क्षेत्र में स्थित है। इसके चारों तरफ गलियों का जाल बिछा हुआ है। प्रत्येक गली में अनेक गुरूद्वारे और ऐतिहासिक इमारतें हैं। इन इमारतों के साथ ही अनेक बाजार भी हैं जहां बहुत अच्छी चीजें मिलती हैं।

निकटवर्ती गुरुद्वारे
श्री हरमंदिर साहि‍ब के पास गुरूद्वारा बाबा अतल और गुरुद्वारा माता कौलन है। इन दोनों गुरुद्वारों में पैदल पहुंचा जा सकता है। इसके पास ही गुरु का महल नामक स्थान है। यह वही स्थान है जहां स्वर्ण मंदिर के निर्माण के समय गुरू रहते थे। गुरुद्वारा बाबा अतल नौ मंजिला इमारत है। यह अमृतसर शहर की सबसे ऊंची इमारत है। यह गुरुद्वारा गुरु हरगोबिंद के पुत्र की याद में बनवाया गया था। जो केवल नौ वर्ष की उम्र में मर गए थे। गुरुद्वारे की दिवारों पर अनेक चित्र बनाए गए हैं। यह चित्र गुरु नानक की जीवनी और सिक्ख संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं। इसके पास कौलन गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा बाबा अतल गुरुद्वारे की अपेक्षा छोटा है। यह हरमंदिर के बिल्कुल पास वाली झील में बना हुआ है। यह गुरुद्वारा उस दुखयारी महिला को समर्पित है जिसको गुरु हरगोबिंद ने यहां रहने की अनुमति दी थी।
इसके पास ही गुरुद्वारा सारागढ़ी साहब है। यह केसर बाग में स्थित है और आकार में बहुत ही छोटा है। इस गुरुद्वारे को 1902 ई.में ब्रिटिश सरकार ने उन सिक्ख सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया था जो एंग्लो अफ्गान युद्ध में शहीद हुए थे।
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धार्मिक महत्व
पंजाब के अमृतसर शहर में स्थित गुरुद्वारे स्वर्ण मंदिर की विशेष महत्ता है। यह गुरुद्वारा एक बड़े सरोवर के बीचोबीच स्थित है। इस गुरुद्वारे का बाहरी हिस्सा सोने का बना हुआ है, इसलिए इसे गोल्डन टेंपल अथवा स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। श्री हरमंदिर साहिब को दरबार साहिब के नाम से भी ख्याति हासिल है। यूं तो यह सिखों का गुरुद्वारा है, लेकिन इसके नाम में मंदिर शब्द का जुड़ना यह स्पष्ट करता है कि हमारे देश में सभी धर्मों को एक समान माना जाता है।
इतना ही नहीं, श्री हरमंदिर साहिब की नींव भी एक मुसलमान ने ही रखी थी। इतिहास के मुताबिक सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी ने लाहौर के एक सूफी संत से दिसंबर, 1588 में गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी।

स्थापत्य
लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद अर्जुन देव ने तैयार किया था। यह गुरुद्वारा शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। इसकी नक्काशी और बाहरी सुंदरता देखते ही बनती है। गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं। उस समय भी समाज चार जातियों में विभाजित था और कई जातियों के लोगों को अनेक मंदिरों आदि में जाने की इजाजत नहीं थी, लेकिन इस गुरुद्वारे के यह चारों दरवाजे उन चारों जातियों को यहां आने के लिए आमंत्रित करते थे। यहां हर धर्म के अनुयायी का स्वागत किया जाता है।
गुरुद्वारे के आसपास स्थित कुछ ऐसी जगहें जो दर्शनीय हैं। गुरुद्वारे के बाहर दाईं ओर अकाल तख्त है। अकाल तख्त का निर्माण सन 1606 में किया गया था। यहां दरबार साहिब स्थित है। उस समय यहां कई अहम फैसले लिए जाते थे। संगमरमर से बनी यह इमारत देखने योग्य है। इसके पास शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समि‍ति‍ का दफ्तर है, जहां सिखों से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं।
पास में बाबा अटल नामक स्थान पर एक नौमंजिला इमारत भी है। बताते हैं कि हरगोविंद सिंह के बेटे अटल राय का जन्म इसी इमारत में हुआ था। उन्हीं की याद में इस जगह का नाम बाबा अटल रखा गया। गुरु का लंगर में गुरुद्वारे आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खाने-पीने की पूरी व्यवस्था होती है। यह लंगर श्रद्धालुओं के लिए 24 घंटे खुला रहता है। खाने-पीने की व्यवस्था गुरुद्वारे में आने वाले चढ़ावे और दूसरे फंडों से होती है।

लंगर
लंगर में खाने-पीने की व्यवस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समि‍ति‍ की ओर से नियुक्त सेवादार करते हैं। वे यहां आने वाले लोगों (संगत) की सेवा में हर तरह से योगदान देते हैं। अनुमान है कि करीब 40 हजार लोग रोज यहां लंगर का प्रसाद ग्रहण करते हैं। सिर्फ भोजन ही नहीं, यहां श्री गुरु रामदास सराय में गुरुद्वारे में आने वाले लोगों के लिए ठहरने की व्यवस्था भी है। इस सराय का निर्माण सन 1784 में किया गया था। यहां 228 कमरे और 18 बडे़ हॉल हैं। यहां पर रात गुजारने के लिए गद्दे व चादर मिल जाती है। एक व्यक्ति की तीन दिन तक ठहरने की पूर्ण व्यवस्था है।
यहां दुमंजली बेरी नामक एक स्थान भी है। इसके बारे में किंवदंती है कि एक बार एक पिता ने अपनी बेटी का विवाह कोढ़ ग्रस्त व्यक्ति से कर दिया। उस लड़की को यह विश्वास था कि हर व्यक्ति के समान वह कोढ़ी व्यक्ति भी ईश्वर की दया पर जीवित है। वही उसे खाने के लिए सब कुछ देता है। एक बार वह लड़की शादी के बाद अपने पति को इसी तालाब के किनारे बैठाकर गांव में भोजन की तलाश के लिए निकल गई। तभी वहां अचानक एक कौवा आया, उसने तालाब में डुबकी लगाई और हंस बनकर बाहर निकला। ऐसा देखकर कोढ़ग्रस्त व्यक्ति बहुत हैरान हुआ। उसने भी सोचा कि अगर में भी इस तालाब में चला जाऊं, तो कोढ़ से निजात मिल जाएगी।
उसने तालाब में छलांग लगा दी और बाहर आने पर उसने देखा कि उसका कोढ़ नष्ट हो गया। यह वही सरोवर है, जिसमें आज हरमंदिर साहिब स्थित है। तब यह छोटा सा तालाब था, जिसके चारों ओर बेरी के पेड़ थे। तालाब का आकार तो अब पहले से काफी बड़ा हो गया है, तो भी उसके एक किनारे पर आज भी बेरी का पेड़ है। यह स्थान बहुत पावन माना जाता है। यहां भी श्रद्धालु माथा टेकते हैं।
परंपरा यह है कि यहां वाले श्रद्धालुजन सरोवर में स्नान करने के बाद ही गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाते हैं। जहां तक इस विशाल सरोवर की साफ-सफाई की बात है, तो इसके लिए कोई विशेष दिन निश्चित नहीं है। लेकिन इसका पानी लगभग रोज ही बदला जाता है। इसके लिए वहां फिल्टरों की व्यवस्था है। इसके अलावा पांच से दस साल के अंतराल में सरोवर की पूरी तरह से सफाई की जाती है। इसी दौरान सरोवर की मरम्मत भी होती है। इस काम में एक हफ्ता या उससे भी ज्यादा समय लग जाता है। यह काम यानी कारसेवा मुख्यत: सेवादार करते हैं, पर उनके अलावा आम संगत भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है।
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भ्रमण
अमृतसर दिल्ली से 500 किलोमीटर दूर है। पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली से अमृतसर शान-ए-पंजाब ट्रेन से पहुंचा जा सकता है। यह ट्रेन छह से सात घंटे में अमृतसर पहुंचा देती है। अमृतसर स्टेशन से रिक्शा करके गुरुद्वारे पहुंचा जा सकता है।
वैसे तो गुरुद्वारे में रोज ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में ज्यादा भीड़ होती है। बैसाखी, लोहड़ी, गुरुनानक पर्व, शहीदी दिवस, संगरांद (संक्रांति‍) जैसे त्योहारों पर पैर रखने की जगह नहीं होती है। यहां सच्चे मन से अरदास करने से सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। इसके अलावा सुखा आसन और प्रकाशोत्सव का नजारा देखने लायक होता है।
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प्रकाशोत्सव
प्रकाशोत्सव अल सुबह ढाई बजे से आरंभ होता है, जब गुरुग्रंथ साहिब जी को उनके कक्ष से गुरुद्वारे में लाया जाता है। संगतों की टोली भजन-कीर्तन करते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को गुरुद्वारे में लाती है। रात के समय सुखा आसन के लिए गुरु ग्रंथ को कक्ष में भी वापस भी इसी तरह लाया जाता है। कड़ाह प्रसाद (हलवा) की व्यवस्था भी 24 घंटे रहती है।
गुरुद्वारे के आसपास कई अन्य महत्वपूर्ण स्थान हैं। थारा साहिब, बैर बाबा बुड्ढा जी, गुरुद्वारा लाची बार, गुरुद्वारा शहीद बंगा बाबा दीप सिंह जैसे छोटे गुरुद्वारे स्वर्ण मंदिर के आसपास स्थित हैं। उनकी भी अपनी महत्ता है। नजदीक ही ऐतिहासिक जालियांवाला बाग है, जहां जनरल डायर की क्रूरता की निशानियां मौजूद हैं। वहां जाकर शहीदों की कुर्बानियों की याद ताजा हो जाती है।
गुरुद्वारे से कुछ ही दूरी पर भारत-पाक सीमा पर स्थित वाघा बार्डर एक अन्य महत्वपूर्ण जगह है। यहां दोनों ओर की सेनाएं अपने देश का झंडा सुबह फहराने और शाम को उतारने का आयोजन करती हैं। इस मौके पर परेड भी होती है।

बौद्ध धर्म


बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे । वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे । उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला, और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया । आज, बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं: थेरवाद, महायान और वज्रयान । बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।

"बुद्ध" वे कहलाते हैं, जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो । इस पहचान को बोधि नाम दिया गया है । जो भी "अज्ञानता की नींद" से जागते हैं, वे "बुद्ध" कहलाते हैं । कहा जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं - उनके पहले बहुत सारे थे और भविष्य में और होंगे । उनका कहना था कि कोई भी बुद्ध बन सकता है अगर वह उनके "धर्म" के अनुसार एक धार्मिक जीवन जीए और अपनी बुद्धि को शुद्ध करे ।

गौतम बुद्ध
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बौध धर्म के प्रमुख तत्त्व

सिख धर्म



सिख शब्द का शाब्दिक अर्थ शिष्य है। श्री गुरु नानक देव जी से लेकर श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज तक १० गुरु हुये। उनके बाद गुरुगद्दी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सौंप दी गई थी। दस गुरुओं तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हुक्म के अनुसार जीवन यापन करने वाला व्यक्ति सिख कहलाता है। इस समय सिख धर्म दुनियां का पांचवा सबसे बड़ा धर्म है। सिख धर्म के संस्थापक जगत गुरु श्री नानक देव जी हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने खालसा पंथ में उसे परिवर्तित किया। खालसा का अर्थ खालिस अर्थात शुद्ध होता है। इस प्रकार दस गुरुओं ने २४० वर्षों तक मेहनत कर मनुष्य को जिस सांचे मे ढाला, वह खालसा कहलाया। सिख धर्म पंद्रहवीं शताब्दी में उपजा और सत्रहवीं शताब्दी में धर्म रूप में परिवर्तित हुआ था। उत्तर भारत में पंजाब राज्य में जन्मा था। इसके प्रथम गुरु थे गुरु नानक देव जी, और फ़िर बाद में नौ और गुरु हुए सिख धर्म: सिख एक ही ईश्वर को मानते हैं, पर उसके पास जाने के लिये दस गुरुओं की सहायता को महत्त्वपूर्ण समझते हैं । इनका धर्मग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब है । अधिकांश सिख पंजाब (भारत) में रहते हैं । सिख एक ही ईश्वर को मानते हैं, जिसे वे एक-ओंकार कहते हैं । उनका मानना है कि ईश्वर अकाल और निरंकार है । सिख शब्द संस्कृत शब्द शिष्य से निकला है, जिसका अर्थ है शिष्य या अनुयायी। सिख धर्म विश्व का नौवां बड्क्षा धर्म है। इसे पाँचवां संगठित धर्म भी माना जाता है।

श्री गुरु नानक देव जी ने मनुष्य को ८४ लाख कष्टदायक योनियों से छुटकारा प्राप्त करने के लिये एक ईश्वर के नाम का हर वक्त सुमिरन करते रहने का उपदेश दिया है। साथ ही आपने संयम का जीवन व्यतीत करने के लिये भी कहा है। सिख गुरु दर्शन के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिये जंगल या पहाड़ों में जाकर शरीर को गैर जरुरी कष्ट देकर साधना करनी आवश्यक नही है। अपितु गृहस्थ आश्रम में ही रहते हुये जीवन को एक खास सांचे में ढालकर हंसते-खेलते, पहनते तथा खाते हुये मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि खालसा मात्र किसी खास पहरावे या वेश भुषा का नाम नही है। यों एक दीक्षित सिख को पांच तरह के चिन्ह शरीर पर धारण करने अनिवार्य हैं। ये हैं – केश, कंघा, कड़ा, कृपाण तथा कच्छ।

गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म का प्रमुख धर्मग्रन्थ है। इसका संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमे कुल 1430 पृष्ठ है।


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धर्म गुरु
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गुरू ग्रंथ साहिब

सिख धर्म का उदय उस वक्त हुआ था, जब हिन्दू धर्म के अंदर पाखंड चरम पर था। सूफी संत और दरवेश जगह-जगह जाकर सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे थे। आज अगर बात सिख समुदाय की आती है, तो ऐसे लोगों का अक्स सामने आता है, जिन्होंने मेहनत से पहचान बनाई है।

आज हिन्दुस्तान का कोई ऐसा शहर नहीं, दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं, जहां सिख मौजूद नहीं। श्री गुरू ग्रंथ साहिब में बताया गया कि किस तरह मेहनत की कमाई खाकर जीना बेहतर है। सिख धर्म की नींव गुरू नानक देव जी ने ही रखी थी। वह सिखों के पहले गुरू थे। उन की लिखी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है। गुरू नानक देव ने सिखों को बताया कि जीवन का उद्देश्य बराबरी, सहनशीलता, बलिदान, निडरता के नियमों पर चलते हुए एक निराले व्यक्तित्व के साथ जीते हुए ईश्वर में लीन हो जाना है। गुरू नानक देव ने अपनी शिक्षा और उपदेशों से लोगों को खूब प्रभावित किया और समाज को नई दिशा दी। सिख धर्म की नींव गुरू नानक देव जी ने ही रखी थी। वह सिखों के पहले गुरू थे। उन की लिखी रचनायें गुरू ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में चार बड़ी यात्रायें की। यह यात्रायें उन्होंने अपने विचार को जन मानस तक पहुंचाने के लिए और उस समय लोगों में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों को दूर करने के लिए की थी।

आज 500 सालों से भी ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन उनके कहे उपदेश आज भी सार्थक हैं और जन कल्याण करने वाले हैं। उस समय जब प्राकृतिक रहस्यों को जानने का कोई साधन भी नहीं था। उन्होंने उस समय अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर जो बातें कहीं हैं वह आज भी विज्ञान की कसौटी पर एकदम खरी उतरती हैं। गुरू नानक देव जी का जन्म 1469 को 15 अप्रैल को पंजाब के तलवंड़ी नामक एक गांव में हुआ था। जो अब पाकिस्तान में है। उनका जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहता कालू था और माता का नाम मां तृपता जी था। उनकी एक बड़ी बहन थी जिसका नाम बीबी नानकी जी था। वह नानक देव को अवतारी बालक मानती थीं। नानक देव बचपन से ही बहुत मेधावी व शांत स्वभाव के थे। उनमें बचपन से ही ईश्वर के प्रति प्रेम व समर्पण की भावना थी। कहा जाता है कि वह जब पैदा हुये थे रोने की बजाए हंसते हुये पैदा हुये थे।

उनके जीवन में अनेक ऐसी घटनायें हुई जों उनके अवतारी पुरुष होने का आभास कराती थी। जब वह कुछ बड़े हुये तो उन्हें विद्या प्राप्ति के लिए भेजा गया। अक्षरज्ञान प्राप्ति के बाद, उन्होंने अपने गुरु से कहा कि आप अपने शिष्यों को सच्ची व नेक बातें बतायें और साथ ही ईश्वर के बारे में बतायें। यह सुन उनके गुरु उनसे बहुत प्रभावित हुये। वहां उन्होंने अपने गुरू को बहुत सी प्रभु के बारे में गहन बातें भी बताईं। नौ साल की उम्र में उन्हें हिन्दू परिवार में जन्म के अनुसार जनेऊ धारण करने के लिए प्रेरित किया गया। लेकिन जब उन्हें जने पहनाने का समय आया तो उन्होंने जनेऊ पहनने से साफ इंकार कर दिया। इस पर जनेऊ धारण संस्कार करवाने वाले पंडित ने पूछा कि आप जनेऊ पहनने से क्यों इंकार कर रहे हैं? तब उन्होंने कहा कि इस जनेऊ के धागे को बांधने से क्या मेरे भीतर सत्य, संतोष, अहिसा आ जायेगी? यह धागा तो पुराना होने के बाद टूट जायेगा या घिर जायेगा। तब क्या होगा? इस से क्या मेरा मन अपने बस में रहेगा और मैं बुराइयों से दूर रहूंगा? यदि आप को मुझे जनेऊ पहनाना है तो ऐसा जनेऊ पहनाइये जो कभी भी ना टूटे और ना ही कभी पुराना पड़े। यह सुना सभी उन के तर्क पर हैरान हो गये। उन्होंने 22 सितम्बर 1939 को 69 वर्ष की आयु में अपनी भौतिक देह का त्याग किया। गुरु नानक का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। अत: इस दिन गुरु नानक जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन को गुरु पूरब के नाम से भी जाना जाता है। सिख धर्मानुयायी अन्य गुरुओं गुरू गोबिंद सिंह, गुरू तेग बहादुर, गुरू रामदास, गुरू अंगद देव, गुरू हरकिशन आदि के जन्मदिन, पुण्यतिथि या शहीदी दिवस को भी गुरू पर्व के रुप में मनाते हैं। इस दिन गुरुद्वारों में गुरू ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ चलता रहता है। गुरुद्वारों की छटा देखते ही बनती है। मुख्य समारोह यानी पूर्णिमा के दिन पवित्र गुरू ग्रंथ साहिब को फूलों से सजा कर पालकी में रखकर नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है। विभिन्न इलाकों से होता हुआ जुलूस गुरुद्वारे पर ही आकर विराम लेता है। इस अवसर पर जगह-जगह प्याउ लगाये जाते हैं और भोजन सामग्री के पैकेट बांटे जाते हैं। कई जगहों पर लंगर लगाये जाते हैं, जिसमें रास्ते में हर आने-जाने वाले को बिना किसी भेदभाव के भोजन कराया जाता है। यह सब गुरू नानक देव द्वारा दिये गए सांप्रदायिक सद्भाव के उपदेश के प्रभाव को प्रस्तुत करता है। गुरुद्वारों में प्रकाश करने का तात्पर्य भी यह माना जाता है कि लोगों का अज्ञान मिटे और जीवन में सुख-समृद्ध आये। श्री गुरुनानक देव जी से लेकर श्री गुरू गोबिंद सिंह जी तक गुरुगद्दी शारीरिक रुप में रही क्योंकि इन सभी गुरू जी ने पांच भौतिक शरीर को धारण करके मानवता का कल्याण किया। लेकिन 10वें गुरू जी ने शरीर का त्याग करने से पहले सारी सिख कौम को आदेश दिया कि आज से आपके अगले गुरू ‘श्री गुरू ग्रंथ साहेब' हैं। आज से हर सिख सिर्फ गुरू ग्रंथ साहेब जी को ही अपना गुरू मानेगा। उन्हीं के आगे शीश झुकायेगा और जो उनकी बाणी को पढ़ेगा वो मेरे दर्शन की बराबरी होगी। गुरू गोबिंद सिंह जी ने आदेश दिया कि सिख किसी भी शरीर के आगे, मूर्ति के आगे या फिर कब्र के आगे माथा नहीं झुकायेंगे। उनका एक ही गुरू होगा और वो है श्री गुरू ग्रंथ साहेब। गुरू ग्रंथ साहिब सिख धर्म का प्रमुख धर्मग्रंथ है। इसका संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरू श्री गुरू अर्जुन देव जी ने किया। गुरू ग्रंथ साहिब जी का पहला प्रकाश 16 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरू तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमें कुल 1430 पृष्ठ है। गुरू ग्रंथ साहिब में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं हैं, वरन 30 अन्य हिन्दू और मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। गुरू ग्रंथ साहिब में उल्लिखित दाशर्निकता कर्मवाद को मान्यता देती है। गुरुवाणी के अनुसार व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ही महत्व पाता है। समाज की मुख्य धारा से कटकर संन्यास में ईश्वर प्राप्ति का साधन ढ़ूंढ़ रहे साधकों को गुरू ग्रंथ साहिब सबक देता है। हालांकि गुरू ग्रंथ साहिब में आत्मनिरीक्षण, ध्यान का महत्व स्वीकारा गया है, मगर साधना के नाम पर परित्याग, अकर्मण्यता निश्चेष्टता का गुरुवाणी विरोध करती है। गुरुवाणी के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिये सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होकर जंगलों में भटकने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर हमारे हृदय में ही है, उसे अपने आंतरिक हृदय में ही है, उसे अपने आंतरिक हृदय में ही खोजने व अनुभव करने की आवश्यकता है। गुरुवाणी ब्रह्मज्ञान से उपजी आत्मिक शक्ति को लोककल्याण के लिए प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। मधुर व्यवहार और विनम्र शब्दों के प्रयोग द्वारा हर हृदय को जीतने की सीख दी गई है।