स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्ट्मी संवत 1902 को अर्धरात्रि में वृष लग्न में उत्तर प्रदेश के मेरठ नामक नगर में हुआ था। इनके पिता श्री मधुसूदन मुखर्जी हुगली जिले से आकर मेरठ में बसे थे। व्यवसाय का संचालन करते थे, किन्तु रहन- सहन राजसी था। स्वामी जी महाराज अपने माता- पिता की आठवी संतान थे, जिनका शरीर हष्ट- पुष्ट गौर्वती, महोहर और मोहक होने पर भी अत्यंत कोमल और सुकुमार था, आठ वर्ष की अवस्था में ही इनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ, इच्छा न होने पर भी माता के विशेष आग्रह पर गृहस्थ जीवन स्वीकार किया और पर्याप्त समय तक इसका निर्वाह भी किया।
ये सरल चित, दयालु, क्रियाविधिग्य, संगीत काव्य, बागवानी के भी प्रेमी थे। इन्होने प्रारंभिक अवस्था में ही संस्कृत, हिंदी, बांगला तथा अंग्रेगी लिखने -पढने का अच्छा अभ्यास कर लिया था।
श्री ज्ञानानंद जी बचपन एवं गृहस्थ जीवन का नाम श्री यज्ञेश्वर मुखर्जी था और अपने बंगले में ही आश्रम बनाकर साधना और तत्त्व चिंतन किया करते थे, किन्तु संन्यास ग्रहण करने के लिये इन्होने परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री 108 स्वामी केशवानंद जी महाराज से दीक्षा ग्रहण की जो तांत्रिक सदना तथा क्रिया सिद्वांश में पूर्ण पारंगत थे। दीक्षा ग्रहण के बाद आपने आबू पर्वत पर जाकर तपस्या की, वहां वशिष्ठ आश्रम में तपस्या कर लौटने के बाद किशनगढ में प्रथम यज्ञ, मथुरापुरी में सनातन धर्म के उद्दार और विस्तार में निगमागम मंडली की स्थापना की।
देश के धार्मिक संगठनों को परस्पर संगठित करने के उद्येश्य से स्वामी जी मथुरा में ही चैत्र कृष्ण 4 शुक्रवार संवत 1958 ता. 28 मार्च 1902 को श्री भारत धर्म महामंडल के नाम से एक संस्था को स्थापना की और दरभंगा नारेह्स इसके अध्यक्ष बनाए गए। अपनी स्थापना काल से अब तक के सौ वर्षों में श्री भारत धर्म महामंडल ने लगभग पचास वर्षों तक स्वामी जी के निर्देशन में ही कार्य किया।
स्वामी जी महाराज ने अपने जीवन काल में सनातन धर्म के उत्थान के लिये देश के अनेक धार्मिक संगठनों को संगठित किया, धर्म के कल्पद्रुम, धर्म विज्ञानं, मीमांसा शास्त्र, गुरुगीता, संयासगीता आदि पुस्तकों तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं का समय-समय पर सम्पादन एवं प्रकाश किया। संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला आदि भाषाओं में लगभग 200 ग्रंथों का प्रणयन किया। देश के विभिन्न भागों में सम्मलेन आयोजित किया। शंकराचार्य द्वारा स्थापित बदरीक आश्रम, ज्योतिश्माथ तथा चित्तौरगढ का पुनरुत्थान, धर्मालय संस्थान, धर्म प्रचारक निर्माण, गौवंश की रक्षा, महिला शिक्षा में स्वामी कि के कार्य सदैव स्मरण किये जायेंगे।
मथुरा से महामंडल कार्यालय स्वामी जी काशी लाये और यहाँ से ही अपना कार्य सञ्चालन किया। काशी हिन्दू विश्विद्यालय, काशी जीवदय विस्तारणी गौशाला, आर्य महिला महाविद्यालय गायत्री मन्दिर कि स्थापना में इनका योगदान था। स्वामी जी के शिष्यों में खैरोगढ कि महारानी सुरथ कुमारी और श्रीमती विवा देवी का नाम मुख्या रूप से आता है। श्री स्वामी दयानंद प्रमुख शिष्य तथा फलेह सिंह (उदैपुर) , महाराज रामेषर सिंह इनके सुभ्चिन्तकों में थे। विरोधियों ने समय-समय पर अपप्रचार भी क्या किन्तु शक्ति साधक स्वामी द्वारा स्त्रियों को भी दीक्षा देना साधना के अनुरूप ही था। 105 वर्ष कि अवस्था में काशी में ही माघ कृष्ण चतुर्थी संवत 2007 विक्रमी को इस महापुरुष के परमधाम गमन से सनातन धर्म की अपारक्षति हुई। स्वामी जी में श्रीकृष्ण की कर्मठता, और शंकराचार्य की विद्वता तथा महर्षि व्यास की सम्पादन क्षमता का अद्भुद समन्वय था। इन्होने दक्षिणा, साहित्य प्रचार से जो कुछ भी पाया, सब धर्म में ही व्यय किया। महामाया ट्रस्ट, विश्वेश्वर ट्रस्ट इनकी इसी निसप्रहता के परिणाम हैं। कबीर की तरह इन्होने 'ज्यों की त्यों घर दीन्ह चदरिया' को आजीवन सार्थक किया।
20 फ़रवरी 2010
युग पुरुष स्वामी ज्ञानानंद
Labels: संत महापुरुष
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 06:12:00 pm 0 comments
Hindi Novel - Elove -ch-30 डोन्ट वरी... वुई हॅव अ सोल्यूशन
वर्सोवा बिचपर अंजली विवेककी राह देख रही थी और उधर बडे बडे पत्थरोंके पिछे छुपकर अतूल और अलेक्स अपने अपने कॅमेरे उसपर केंद्रीत कर विवकके आनेकी राह देखने लगे। थोडी देरमें विवेकभी आ गया, विवेक और अंजलीमें कुछ संवाद हुवा, जो उन्हे सुनाई नही दे रहा था लेकिन उनके कॅमेरे अब उनके एक के पिछे एक फोटो खिचने लगे। थोडीही देरमें विवेक और अंजली एकदुसरेके हाथमें हाथ डालकर बिचपर चलने लगे। इधर अतूल और अलेक्सभी पत्थरोके पिछेसे आगे आगे खिसकते हूए उनके फोटो ले रहे थे।
अंधेरा छाने लगा था और एक लमहेमें उनमें क्या संवाद हुवा क्या पता?, विवेकने अंजलीको कसकर अपने बाहोंमें खिंच लिया। इधर अतूल और अलेक्सकी फोटो निकालनेकी रफ्तार तेज हो गई थी। फिरभी वे संतुष्ट नही थे। क्योंकी उन्हे जो चाहिए था वह अबभी नही मिला था।
अंजलीकी कार जब ओबेराय हॉटेलके सामने आकर रुकी। उसके कारका पिछा कर रही अतूल और अलेक्सकी टॅक्सीभी एक सुरक्षीत अंतर रखकर रुक गई। अंजली गाडीसे उतरकर हॉटेलमें जाने लगी और उसके पिछे विवेकभी जा रहा था, तब अतूलने अलेक्सकी तरफ एक अर्थपुर्ण नजरसे देखा और वे दोनोभी उनके खयालमें नही आए इसका ध्यान रखते हूए उनका पिछा करने लगे।
अब अंजली और विवेक हॉटेलके रुममें पहूंच गए थे और रुमका दरवाजा बंद हो गया था। उनका पिछा कर रहे अतूल और अलेक्स अब जल्दी करते हूए उनके रुमके दरवाजेके पास आगए। अलेक्सने दरवाजा धकेलकर देखा। वह अंदरसे बंद था।
'' अब क्या हम यहां उनकी पहरेदारी करनेवाले है ?'' अलेक्सने चिढकर लेकिन धीमे स्वरमें कहा।
'' डोन्ट वरी... वुई हॅव अ सोल्यूशन '' अतूलने उसका हौसला बढाते हूए कहा।
अलेक्स दरवाजेके कीहोलसे अंदर हॉटेलके रुममें देख रहा था ...
अंदर फोन उठाते हूए अंजलीके हाथका हल्कासा स्पर्ष विवेकको हुवा। बादमें फोनका नंबर डायल करनेके लिए उसने दुसरा हाथ सामने किया. इसबार उस हाथकाभी विवेकको स्पर्ष हुवा. इसबार विवेक अपने आपको रोक नही सका. उसने अंजलीका फोन डायल करनेके लिए सामने किया हाथ हल्केसे अपने हाथमें लिया. अंजली उसकी तरफ देखकर शर्माकर मुस्कुराई. उसने अब वह हाथ कसकर पकडकर खिंचकर उसे अपने आगोशमें लिया था. सबकुछ कैसे तेजीसे हो रहा था. उसके होंठ अब थरथराने लगे थे. विवेकने अपने गरम और अधीर हूए होंठ उसके थरथराते होंठपर रख दिए और उसे झटसे अपने मजबुत आगोशमें लेकर, उठाकर, बाजुमें रखे बेडपर लिटा दिया ....
अलेक्स अंदर कीहोलसे इतनी देरसे अंदर क्या देख रहा है? ... और वहभी कुछ शिकायत ना करते हूए। अतूलको आशंका हूई. उसने अलेक्सका सर कीहोल से बाजू हटाया. और वह अब खुद अंदर देखने लगा ...
अंदर अंजलीके शरीर पर विवेक झुक गया था और वह उसके गलेको चुम रहा था मानो उसके कानमें कुछ कह रहा हो। धीरे धीरे उसका मजबुत मर्दानी हाथ उसके नाजूक अंगोसे खेलने लगा. और प्रतिक्रियाके रुपमें वहभी किसी लताकी तरह उसे चिपककर सहला रही थी. हकसे अब वह उसके शरीरसे एक एक कर कपडे निकालने लगा और वहभी उसके शरीरसे कपडे निकालने लगी....
अलेक्सने अतूलकी उसका सर कीहोलसे बाजू होगा इसकी थोडी देर राह देखी। लेकिन वह वहांसे हटनेके लिए तैयार नही था. तब अलेक्सने जबरदस्ती उसका सर कीहोलसे बाजु हटाया और वह उसे बोला, '' मेर भाई यह देखनेसे अपना पेट भरनेवाला नही है ... थोडा अपने पेट पानीका भी सोचो ''
अंदरका दृष्य देखनेमें लिन हूवा अतूल अब कहा होशमें आ गया।
'' लेकिन अब उनके फोटो तूम कैसे निकालनेवाले हो ?'' अलेक्सने कामका सवाल पुछ लिया।
'' डोन्ट वरी वुई आर इक्वीपड विथ टेक्नॉलॉजी।'' अलेक्सने उसे दिलासा दिया और उसने अपने जेबसे एक वायरजैसी चिज निकालकर उसका एक सिरा अपने कॅमेरेसे जोडा और दुसरा सिरा दरवाजेके कीहोलसे अंदर डाला।
'' यह क्या है ... पता है ?'' अलेक्सने पुछा।
'' दिस इज स्पेशल कॅमेरा माय डियर'' अतूलने कहा और वह उस स्पेशल कॅमेरेसे हॉटेलके रुमके अंदरके सारे फोटो निकालने लगा।
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 05:04:00 pm 0 comments
Hindi katha - ENovel - CH-29 यू आर जिनियस
लगभग आधी रात हो गई थी। अतूलके कमरेका लाईट बंद था। लेकिन फिरभी कमरेमें चारो तरफ धुंधली रोशनी फैल गई थी- कमरेमें, कोनेमें चल रहे कॉम्प्यूटरके मॉनिटरकी वजहसे। अतूल कॉम्प्यूटरपर कुछ करनेमें बहुत लीन था। उसके आसपास सब तरफ खानेकी, नाश्तेकी प्लेट्स, चायके खाली, आधे भरे हूए कप्स, चिप्स, खाली हो चुके व्हिस्किके ग्लासेस और आधीसे जादा खाली हो चुकी व्हिस्किकी बॉटल दिख रही थी। उसके पिछे कॉटपर हाथपैर फैलाकर अलेक्स सोया हुवा था। उस आधी रातके सन्नाटेमें अतूल तेजीसे कॉम्प्यूटरपर कुछ कर रहा था और उसके किबोर्डके बटन्सका एक अजिब आवाज उस कमरेमें आ रहा था। उधर अतूलके पिछे सो रहे अलेक्सका बेचैनीसे करवटपे करवट बदलना जारी था।
आखिर अपने आपको ना रोक पाकर अलेक्स उठकर बैठते हूए अतूलसे बोला, '' यार तेरा यह क्या चल रहा है? ... 8 दिनसे देख रहा हूं ... दिनभर किचकिच... रातकोभी किचकिच... कभीतो शांतीसे सोने दे... तेरे इस साले किबोर्डके आवाजसे तो मेरा दिमाग पागल होनेकी नौबत आई है ...''
अतूल एकदम शांत और चूप था। कुछभी प्रतिक्रिया ना व्यक्त करते हूए उसका अपना कॉम्प्यूटरपर काम करना जारी था।
''अच्छा तुम क्या कर रहे हो यह तो बताएगा ? ... आठ दिनसे तेरा ऐसा कौनसा काम चल रहा है ?... मेरी तो कुछ समझमें नही आ रहा है ...'' अलेक्स उठकर उसके पास आते हूए बोला।
'' विवेक और अंजलीका पासवर्ड ब्रेक कर रहा हूं .... अंजलीका ब्रेक हो चुका है अब विवेकका ब्रेक करनेकी कोशीश कर रहा हूं '' अतूल उसकी तरफ ना देखते हूए कॉम्प्यूटरपर अपना काम वैसाही शुरु रखते हूए बोला....
'' उधर तु पासवर्ड ब्रेक कर रहा है और इधर तेरे इस किबोर्डके किचकीचसे मेरा सर ब्रेक होनेकी नौबत आई है उसका क्या ?'' अलेक्स फिरसे बेडपर जाकर सोनेकी कोशीश करते हूए बोला।
किसका पासवर्ड ब्रेक हूवा और किसका ब्रेक होनेका रहा इससे उसे कुछ लेना देना नही था। उसे तो सिर्फ पैसेसे मतलब था। अलेक्सने अपने सरपर चादर ओढ ली, फिरभी आवाज आ ही रहा था, फिर तकिया कानपर रखकर देखा, फिरभी आवाज आ ही रहा था, आखीर उसने तकीया एक कोनेमें फाडा और उसमेंसे थोडी रुई निकालकर अपने दोनो कानोंमे ठूंस दी और फिरसे सोनेकी कोशीश करने लगा।
अब लगभग सुबहके तिन बजे होंगे, फिरभी अतूलका कॉम्प्यूटरपर काम करना जारीही था। उसके पिछे बेडपर पडा हूवा अलेक्स गहरी निंदमें सोया दिख रहा था।
तभी कॉम्प्यूटरपर काम करते करते अतूल खुशीके मारे एकदम उठकर खडा होते हूए चिल्लाया, '' यस... या हू... आय हॅव डन इट''
वह इतनी जोरसे चिल्लाया की बेडवर सोया हूवा अलेक्स डरके मारे जाग गया और चौककर उठते हूए घबराए स्वरमें इधर उधर देखते हूए अतूलसे पुछने लगा, '' क्या हूवा ? क्या हूवा ? ''
'' कम ऑन चियर्स अलेक्स... हमें अब खजानेकी चाबी मिल चुकी है ... देख इधर तो देख ...'' अतूल अलेक्सका हाथ पकडकर उसे कॉम्प्यूटरकी तरफ खिंचकर ले जाते हूए बोला।
अलेक्स जबरदस्तीही उसके साथ आगया। और मॉनिटरपर देखने लगा।
'' यह देखो मैने विवेकका पासवर्डभी ब्रेक किया है और यह देख उसने भेजी हूई मेल '' अतूल अलेक्सका ध्यान मॉनिटरपर विवेकके मेलबॉक्ससे खोले हूए एक मेलकी तरफ आकर्षीत करते हूए बोला।
मॉनिटरपर खोले मेलमें लिखा हूवा था -
'' विवेक ... 25 को सुबह बारा बजे एक मिटींगके सिलसिलेमें मै मुंबई आ रही हूं ... 12।30 बजे हॉटेल ओबेराय पहूचूंगी ... और फिर फ्रेश वगैरे होकर 1.00 बजे मिटींग अटेंड करुंगी ... मिटींग 3-4 बजेतक खत्म हो जाएगी ... तुम मुझे बराबर 5.00 बजे वर्सोवा बिचपर मिलो ... बाय फॉर नॉऊ... टेक केअर''
'' चलो अब हमें अपना बस्ता यहांसे मुंबईको ले जानेकी तैयारी करनी पडेगी। '' अतूलने अलेक्ससे कहा।
अलेक्स अविश्वासके साथ अतूलकी तरफ देख रहा था। अब कहां उसे विवेक आठ दिनसे क्या कर रहा था और किस लिए कर रहा था यह पता चल गया था।
'' यार अतूल ... यू आर जिनियस'' अब अलेक्सके बदनमेंभी जोश दौडने लगा था।
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 04:34:00 pm 0 comments
Hindi books - Novel - ELove - CH-28 रुम पार्टनर्स
एक रुममें अतूल और अलेक्स रहते थे। रुमके स्थितीसे यह जान पडता था की उन्होने रुम किराएसे ली होगी। कमरे में एक कोने में बैठकर अतूल अपने कॉम्प्यूटरपर बैठकर चॅटींग कर रहा था और कमरेके बिचोबिच अलेक्स डीप्स मारता हूवा एक्सरसाईज कर रहा था। अतूल अपने कॉम्प्यूटरपर दिख रहे चॅटींग विंडोमें धीरे धीरे उपर खिसक रहे चॅटींग मेसेजेस एक एक करके पढ रहा था। शायद वह चाटींगके लिए कोई अच्छा साथीदार ढूंढ रहा होगा। जबसे उसे चॅटींगका अविश्कार हूवा तब से ही उसे यह बहुत पसंद आया था। पहले खाली वक्तमें वक्त बितानेका गप्पे मारना इससे कारगर कोई तरीका नही होगा ऐसी उसकी सोच थी। लेकिन अब जबसे उसे चॅटींगका अविश्कार हुवा उसकी सोच पुरी तरह बदल गई थी। चॅटींगकी वजहसे आदमीको मिले बिना गप्पे मारना अब संभव होगया था। कुछ जान पहचानवाले तो कुछ अजनबी लोगोंसे चॅट करने में उसे बडा मजा आने लगा था। अजनबी लोगोंसे आमने सामने मिलने के बाद कैसे उन्हे पहले अपने कंफर्टेबल झोन में लाना पडता है और उसके बाद ही बातचित आगे बढ सकती है। और उसके लिए सामनेवाला कैसा है इसपर सब निर्भर करता है और उसको कंफर्टेबल झोन में लाने के लिए कभी एक घंटा तो कभी कई सारे दिनभी लग सकते है। चॅटींगपर वैसा नही होता है। कोई पहचान का हो या अजनबी बिनदास्त मेसेज भेज दो। सामनेवाले ने एंटरटेन किया तो ठीक नही तो दुसरा कोई साथी ढूंढो। अपने पास सारे विकल्प होते है। कुछ न समझनेवाले तो कुछ गाली गलोच वाले कुछ संवाद उसे चॅटींग विंडोमें उपर उपर खिसकते हूए दिखाई दे रहे थे।
तभी उसे बाकी मेसेजसे कुछ अलग मेसेज दिखा ,
'' अच्छा तुम क्या करती हो? ... मेरा मतलब पढाई या जॉब?''
किसी विवेक का मेसेज था।
वह उसका असली नामभी हो सकता था या नकली ...
मैने बी। ई. कॉम्प्यूटर किया हूवा है ... और जी. एच. इन्फॉरमॅटीक्स इस खुदके कंपनीकी मै फिलहाल मॅनेजींग डायरेक्टर हूं '' विवेकके मेसेजके रिस्पॉन्सके तौरपर यह मेसेज अवतरीत हूवा था.
भेजनेवाले का नाम अंजली था।
अचानक मेसेज पढते हूए अतूलके दिमागमें एक विचार कौंधा।
इस मेसेजसे क्या मै कुछ फायदा ले सकता हूं ?...
वह मनही मन सोचकर सारी संभावनाए टटोल रहा था। सोचते हूए अचानक उसके दिमागमें एक आयडीया आ गया।
वह झटसे अलेक्सकी तरफ मुडते हूए बोला, '' अलेक्स जल्दीसे इधर आ जाओ ''
उसका चेहरा एक तरहकी चमकसे दमक रहा था।
अलेक्स एक्सरसाईज करते हूए रुक गया और कुछ इंटरेस्ट ना दिखाते हूए धीमे धीमे उसके पास आकर बोला, '' क्या है ?... अब मुझे ठिकसे एक्सरसाईज भी नही करने देगा ?''
'' अरे इधर मॉनिटरपर तो देखो ... एक सोनेका अंडा देनेवाली मुर्गी हमें मिल सकती है ॥'' अतूल फिरसे उसका इंटरेस्ट जागृत करनेका प्रयास करते हूए बोला।
अब कहा अलेक्स थोडा इंटरेस्ट लेकर मॉनिटरकी तरफ देखने लगा।
तभी चॅटींग विंडोमें अवतरीत हूवा और उपर खिसक रहा विवेकका और एक मेसेज उन्हे दिखाई दिया,
"" अरे बापरे!॥ '' तुम्हे तुम्हारे उम्रके बारेमें पुछा तो गुस्सा तो नही आएगा ?... नही ... मतलब मैने कही पढा है की लडकियोंको उनके उम्रके बारेमें पुछना अच्छा नही लगता है। ... ''
उसके बाद तुरंत अंजलीने भेजा हूवा रिस्पॉन्सभी अवतरीत हूवा -
'' 23 साल''
'' देख तो यह हंस और हंसिनी का जोडा... यह हंसीनी एक सॉफ्टवेअर कंपनीकी मालिक है ... मतलब मल्टी मिलीयन डॉलर्स...'' अतूल अपने चेहरेपर आए लालचभरे भाव छूपानेका प्रयास करते हूए बोला।
तेभी फिरसे चॅटींग विंडोमें विवेकका मेसेज अवतररीत हूवा,
'' अरे यह तो मुझे पताही था... मैने तुम्हारे मेल आयडीसे मालूम किया था.... सच कहूं ? तूमने जब बताया की तूम मॅनेजींग डायरेक्टर हो ... तो मेरे सामने एक 45-50 सालके वयस्क औरतकी तस्वीर आ गई थी... ''
अलेक्सने उन दोनोंके उस विंडोमें दिख रहे सारे मेसेजेस पढ लिए और पुछा, '' लेकिन हमें क्या करना पडेगा ?''
'' क्या करना है यह सब तुम मुझपर छोड दो ... सिर्फ मुझे तुम्हारा साथ चाहिए '' अतूल अपना हाथ आगे बढाते हूवा बोला।
'' कितने पैसे मिलेगे ?'' अलेक्सने असली बातपर आते हूए सवाल पुछा।
'' अरे लाखो करोडो में खेल सकते है हम '' अतूल अलेक्सका लालच जागृत करनेका प्रयास करते हूए बोला।
'' लाखो करोडो?'' अलेक्स अतूलका हाथ अपने हाथमे लेते हूए बोला, '' तो फिर मै तो अपनी जानभी देनेके लिए तैयार हूं ''
तभी फिरसे चॅटींग विंडोमें अंजलीका मेसेज अवतरीत हूवा , '' तूमने तुम्हारी उम्र नही बताई ?...''
उसके पिछेही विवेकका जवाब चॅटींग विंडोमें अवतरीत हूवा, '' मैने मेरे मेल ऍड्रेसकी जानकारीमें ... मेरी असली उम्र डाली हूई है ...''
'' 23 साल... बहूत नाजुक उम्र होती है ... मछली प्यारके जालमें फसकर कुछभी कर सकती है '' अतूल अजिब तरहसे मुस्कुराते हूए बोला।
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 04:28:00 pm 0 comments
Hindi books - Upanyas - ELove - CH-27 कहानी
कॉन्स्टेबल जब अतुल को वहां से ले गया और अतुल सब लोगों के नजरों से ओझल हुआ तब कहां इतनी देर से हक्का बक्का रहे लोगों मे खुसुर फुसुर शुरु हो गई। कुछ लोग अब भी डरे, सहमे और सदमे मे थे, तो कुछ लोगों को यह सब क्या हो रहा है कुछ समझ नही आ रहा था। प्रथम पुरस्कार जिसे मिला उस लडके को अचानक अंजली ने मारा और इन्स्पेक्टर ने डायस पर आकर उसे गिरफ्तार किया। सब कुछ कैसे लोगों के समझ के बाहर था। लोगों में चल रही खुसुर फुसुर देखकर इन्स्पेक्टर ने ताड लिया की लोगों को पूरा केस और उसकी गंभिरता समझाना जरुरी है, नही तो लोग और गडबडी मचा सकते है। क्योंकी अतुल जो कुछ पल पहले ही सब लोगों का हीरो था उसे अंजली ने अगले ही पल उसे व्हिलन करार दिया था। लोगों को वह सच्चा या अंजली सच्ची यह जानने की उत्कंठा होना भी लाजमी था।
'' शांत हो जाईए ... शांत हो जाईए प्लीज...'' इन्स्पेक्टर हाथ उपर कर, जो कुछ लोग उठ खडे हूए थे उन्हे बिठाते हूए बोले, '' कोई डरने की या घबराने की कोई जरुरत नही...This is a case of Blackmailing and Cyber crime... मैने खुद इस केस पर काम किया है ... और इस केस का गुनाहगार के तौर पर अभी अभी आपके सामने अतुल सरकार को पकडा गया है ...''
फिर भी लोग शांत होने के लिए तैयार नही थे, तब ऍन्कर ने फिर से माईक का कब्जा लिया, '' दोस्तो शांत हो जाईए ॥ प्लीज शांत हो जाईए .. हमारी प्रतिस्पर्धा भी इथीकल हॅकींग ... यानी की हॅकिंग के बारे मे ही थी... और इन्स्पेक्टर ने अभी आप लोगों के सामने हॅन्डल की केस भी हॅकींग और क्रॅकींग के बारे में ही थी .. इसलिए इन्स्पेक्टर साहेब को मेरी बिनती है की वे इस केस के बारे में... उन्होने यह केस कैसे हॅन्डल की... यह केस हॅन्डल करते वक्त किन किन चुनौतीयों का सामना उन्हे करना पडा... और आखिर वह गुनाहगार तक कैसे पहुंचे ... यह सब यहां इकठ्ठा हूए लोगों को विस्तार से बतायें ...''
अब कहा लोग फिर से शांत हो चुके थे। यह केस क्या है? ... और इन्स्पेक्टर ने उसे कैसे हॅन्डल किया॥ यह जानने की लोगों में उत्सुकता दिखने लगी। एन्कर ने एक बार फिर से इन्स्पेक्टर की तरफ देखा और उन्हे आगे आकर पूरी कहानी बयां करने की बिनती की। इन्स्पेक्टर ने अंजली की तरफ देखा। अंजली ने आखों से ही इजाजत दे दी। इन्स्पेक्टर सामने आये और उन्होने माईक ऍन्कर से अपने पास ले लिया।
इन्स्पेक्टर कहानी कथन करने लगे -
'' सायबर क्राईम यह अब भारत में नया नही रहा है ... आजकल पूरे देश में लगभग रोज कुछ ना कुछ सायबर क्राईम की घटनाएं घटीत होती रहती है .... लेकिन तहकिकात करते वक्त मुझे हमेशा इस बात का अहसास होता है की लोगों की सायबर क्राइम के बारें मे बहुत गलतफहमीयां है ... जितनी उनकी सायबर क्राईम के बारे में गलतफहमीयां है उतना ही उनका अपने देश के पुलिस डिपार्टमेंट पर भरोसा उडा हुआ दिखाई देता है ... उन्हे हमेशा आशंका लगी रहती है की यह टोपी और डंडे लेकर घुमने वाले पुलिस यह इतना ऍडव्हान्स... यह इतना टेक्नीकल क्राईम कैसे हॅन्डल कर सकते है? ... उन्हे सायबर क्राईम के बारे में अपना पुलिस डिपार्टमेंट कितना सक्षम है इसके बारे में आशंकाए लगी रहती है। ... लेकिन अब अभी अभी मैने हॅन्डल किए केस के जरीए मै लोगों को यकिन दिलाना चाहता हूं की ... सायबर क्राईम के बारे में अपना पोलीस डीपार्टमेंट सिर्फ सक्षम ही नही पूरी तरह से तैयार है ... इस तरह का या और किसी तरह का गुनाह होने के बाद जिस कार्य क्षमता से हम दुसरे गुनाहगारों को तुरंत पकड सकते है उसी कार्यक्षमता से हम सायबर क्रिमीनल्स को भी पकड सकते है.... लेकिन फिर भी कुछ चिजों के बारें मे हम गुनाह हॅन्डल करते वक्त कम पडते है ... खासकर जब उस गुनाह को दूसरे किसी देश के जमीन से अंजाम दिया जाता है तब... उस केस में वह गुनाहगार किसी दूसरे देश के कानून के कार्य क्षेत्र में आता है ... और फिर वह देश हमें उस गुनाह के बारे में उस गुनाहगार को पकडने के लिए कितना सहकार्य करते है इस पर सब निर्भर करता है.... सायबर गुनाह के बारे में और एक महत्वपूर्ण बात... इसमें इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों को कुछ चिजों मे बहुत ही जागरुक होना आवश्यक होता है ॥ जैसे किसी को, उस सामने के पार्टी की पूरी जानकारी रहे बिना खुदकी जानकारी ... ... पासवर्ड ॥ फोन ... मोबाईल देना बहुत ही खतरनाक होता है ... वैसे अनसेफ, अनप्रोटेक्टेड, अनसेक्यूअर कनेक्शनपर फायनांसीयल ट्रान्झेक्शन करना ... अपने खुद के प्रायव्हेट फोटो इंटरनेट पर भेजना ... इत्यादी... यह भी खतरे से खाली नही है... अब मै यह जो केस विस्तारपूर्वक बताने वाला हूं ... इससे आपको किस तरह जागरुक रहना पडेगा इसका अंदाजा आ जाएगा ...''
इतनी प्रस्तावना देकर इन्स्पेक्टर अतुल के केस के बारें मे बताने लगे ...
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 03:43:00 pm 0 comments
Hindi Novel - Fiction - ELove - CH 26 प्रथम पुरस्कार
अनघा जैसे ही स्टेज से नीचे उतरकर अपने जगह पर वापस आ गयी ऍन्कर ने फिर से माईक पर कब्जा कर लिया था ,
'' अब आखिर में हम जिस पल का इतनी बेसब्री से राह देख रहे है वह पल एकदम नजदिक आ पहुंचा है ... पहला पुरस्कार ऐलान करने का पल ... इन फॅक्ट मै अपने आपको बडा भाग्यशाली समझता हूं की पहला पुरस्कार किसको जानेवाला है यह ऐलान करने का सौभाग्य मुझे मिल रहा है ... क्योंकी वह प्रतिस्पर्धी सारे भारत में एक अव्वल प्रतिस्पर्धी रहनेवाला है ... तो पहले देखते है की वह प्रथम पुरस्कार क्या है ... प्रथम पुरस्कार है 3 लाख रुपए कॅश, मोमेंटो ऍन्ड अ जॉब ऑफर इन नेट सेक्यूरा... ''
सब लोग शांत होकर सुन रहे थे। मानो उस पलके लिए उन्होने अपनी सांसे रोककर रखी थी। बहुत लोग अपनी गर्दन उंची कर सामने देखने की कोशीश कर रहे थे। हॉलमें सब तरफ पिनड्रॉप सायलेन्स था ....
'' फर्स्ट प्राईज गोज टू ... द वन ऍन्ड ओन्ली वन... मि. अतुल बिश्वास फ्रॉम चेन्नई ...''
दूसरी कतार विचलित हूई दिखी, क्योंकी दूसरी कतार से कोई उठा था। सब लोगों के सर उस दिशामें मुड गए। इस बार हॉल में सबसे बडा और सबसे दिर्घ तालियों का आवाज हुआ। सचमुच उसका यश उसके नामके अनुरुप 'अतुल' यानी की अतुलनीय था। वह उठकर लगभग दौडते हूए ही स्टेजपर चला गया, इससे उसका अपूर्व उत्साह और आत्मविश्वास दिख रहा था। गोरा, उंचा, स्मार्ट, कसा हुआ शरीर ऐसा वह सशक्त युवक था। अंजली ने अपनी दिशा में आते उस पहले पुरस्कार के हकदार की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक तेज चमक रहा था। आंखे निली और चमकीली थी। उसकी आखों में देखकर पलभर के लिए अंजली कि विवेक की याद आ गई। लेकिन अपने विचारों को दिमाग से झटककर वह आगे गई। वह अंजली के सामने आकर खडा हो गया और उसने लोगों की तरफ मुडकर उनको अभिवादन किया। पहले की तालियों की आवाज जो अब भी बरकरार थी वह और बढ गयी। लोगों को अभिवादन कर उसने अंजली की तरफ देखा और उसकी नजर अंजली पर से हटने का नाम नही ले रही थी, मानो वह उसके मदहोश करने वाली आंखो में अटक सा गया था। तालियों की गुंज अब भी चल रही थी। लेकिन अचानक एक अजिब घटना घटी, अंजली ने जितने जोर से हो सकता है उतनी जोर से उसके गाल पर एक चाटा जड दिया था। तब कहा वो होश में आ गया। हॉल में चल रहा तालियों का आवाज एकदम से बंद हो गया , मानो किसी ne स्विच ऑफ किया हो। उसने और वहां उपस्थित किसी ने भी सोचा नही होगा वैसी अजिब वह घटना थी। हां अंजली ने उसके गाल पर एक जोर का चाटा जमा दिया था। उसका ही क्यों सारे उपस्थित लोगों को इस बातपर यकिन नही हो रहा था। हॉल में एकदम श्मशानवत चुप्पी फैल गई॥ एकदम पिनड्रॉप सायलेन्स।
'' yes I slapped him... And he deserve it... क्योंकी वह एक क्रॅकर है ... सिर्फ क्रोकर ही नही तो he is also a blacemailer...'' हॉल में चुप्पी का भंग हुआ वह अंजली के इन शब्दो ने ।
अंजली लगातार बोल रही थी। उसकी आँखों में आग थी। गुस्से से अंजली का पूरा शरीर कांप रहा था। तभी इन्स्पेक्टर कंवलजीत, जो पहले से ही तैयार थे, वे डायसपर दो कॉन्स्टेबल के साथ आ गए। उन्होने प्रथम अतुल कि कॉलर पकडकर दो तिन तमाचे उसके कान के नीचे जड दिए।
'' इन्स्पेक्टर '' अतूल गुर्राया।
उसके मासूम, स्मार्ट चेहरे ने अब उग्र रुप धारण किया था। उसे जडाए हुए तमाचों की वजह से लाल हुआ उसका चेहरा और भी भयानक लग रहा था। इन्स्पेक्टरने ने ज्यादा वक्त ना दौडाते हुए उसे हथकडीयां पहनाकर अरेस्ट किया और वे गुस्से से चिल्लाए, '' take this basterd away...''
कॉन्स्टेबल उसे लेकर, लगभग खिंचते हुए ही वहां से चले गए। उसका मद और नशा अब भी उतरा हुआ नही दिखाई दे रहा था। वह वहां से जाते हूए कभी गुस्से से इन्स्पेक्टर की तरफ तो कभी अंजली की तरफ देख रहा था।
याद रखो मुझे अरेस्ट करना तुम्हे बहुत महंगा पडने वाला है '' जाते जाते वह चिल्लाया।
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 03:18:00 pm 0 comments
घरेलु नुस्खे कड़ी सं- 1
Labels: घरेलु नुस्खे
Posted by Udit bhargava at 2/20/2010 08:58:00 am 0 comments

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