श्री राम जय राम जय जय राम
श्री राम जय राम जय जय राम,
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 08:15:00 pm 1 comments
राम बाण लगे वह तो जाने,
प्रभु के बाण लगे वही जाने ।
अरे मूर्ख तू मन में क्या बने?
रामबाण लगे तभी तू जाने,
ध्रुव को लगा प्रहलाद को लगा ।
वे तो बैठे हरि के ठिकाने ॥१॥
गर्भवास में शुक्रदेव को लगा
ये तो वेद वचन प्रमाने ॥२॥
मोरध्वज राजा का मन हर लिया ।
हरि तोआये उसी के ठीकाने ॥३॥
आरी चलाई पुत्र के सिर पर।
पत्नी पुत्र तर गये प्रभु के धामें ॥४॥
मीराबाई पर क्रोध किया था।
राणा चले तलवार चलाने ॥५॥
विष का प्याला गिरधर पिया ।
यह तो बना अमृत के साने ॥६॥
नरसिंह मेहता क़ी हुन्डी स्वीकारी ।
ऋण को उतारा समय के सहारे ॥७॥
आगे संत अनेक पधारे ।
ऐसा धन्नो भगत उचारे ॥८॥
रामबाण लगे वही तो जानी ।
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 07:39:00 pm 0 comments
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 07:24:00 pm 0 comments
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 05:48:00 pm 0 comments
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 05:33:00 pm 0 comments
विशाल सागर की अपार लम्बाई देख कर सभी वानर शोकाकुल हो एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। अंगद, नल, नील तथा अन्य किसी भी सेनापति को समुद्र पार कर के जाने का साहस नहीं हुआ। उन सबको निराश और दुःखी देख कर वृद्ध जाम्बन्त ने कहा, "हे पवनसुत! तुम इस समय चुपचाप क्यों बैठे हो? तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो। तेज और बल में तो राम और लक्ष्मण की भी बराबरी कर सकते हो। तुम्हारा वेग और विक्रम पक्षिराज गरुड़ से किसी भी भाँति कम नहीं है जो समुद्र में से बड़े-बड़े सर्पों को निकाल लाता है। इतना अतुल बल और साहस रखते हुये भी तुम समुद्र लाँघ कर जानकी जी तक पहुँचने के लिये तैयार क्यों नहीं होते? तुम्हें तो समुद्र या लंका में मृत्यु का भी भय नहीं है क्योंकि तुम्हें देवराज इन्द्र से यह वर प्राप्त है कि मृत्यु तुम्हारी इच्छा के आधीन होगी। जब तुम चाहोगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी अन्यथा नहीं। तुम केशरी के क्षेत्रज्ञ और वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसीलिये उन्हीं के सदृश तेजस्वी और अबाध गति वाले हो। हम लोगों में तुम ही सबसे अधिक साहसी और शक्तिशाली हो। इसलिये उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ। तुम्हीं इन निराश वानरों की चिन्ता को दूर कर सकते हो। मैं जानता हूँ, इस कार्य को केवल तुम और अंगद दो ही व्यक्ति कर सकते हो, पर अंगद अभी बालक है। यदि वह चूक गया और उसकी मृत्यु हो गई तो सब लोग सुग्रीव पर कलंक लगायेंगे और कहेंगे कि अपने राज्य को निष्कंटक बनाने के लिये उसने अपने भतीजे को मरवा डाला। यदि मैं वृद्धावस्था के कारण दुर्बल न हो गया होता तो सबसे पहले मैं समुद्र लाँघता। इसलिये हे वीर! अपनी शक्ति को समझो और समुद्र लाँघने को तत्पर हो जाओ।"
जाम्बवन्त के प्रेरक वचनों को सुन कर हनुमान को अपनी क्षमता और बल पर पूरा विश्वास हो गया। अपनी भुजाओं को तान कर हनुमान ने अपने सशक्त रूप का प्रदर्शन किया और गुरुजनों से बोले, "आपके आशीर्वाद से मैं मेघ से उत्पन्न हुई बिजली की भाँति पलक मारते निराधार आकाश में उड़ जाउँगा। मुझे विश्वास हो गया है कि मैं लंका में जा कर अवश्य विदेहकुमारी के दर्शन करूँगा।" यह कह कर उन्होंने बड़े जोर से गर्जना की जिससे समस्त वानरों के हृदय हर्ष से प्रफुल्लित हो गये। सबसे विदा ले कर हनुमान महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गये और मन ही मन समुद्र की गहराई का अनुमान लगाने लगे।
आगे पढ़ें :-
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Labels: रामायण
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 05:30:00 pm 0 comments
Posted by Udit bhargava at 4/01/2010 05:20:00 pm 0 comments
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