08 जुलाई 2010

भारत का अनमोल रतन ( India's Anmol Ratan )

रतन टाटा, एक ऐसी शख्सियत हैं, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि अगर आपमें प्रतिभा है, तो आप देश में रहकर भी ऐसे शिखर पर पहुँच सकते हैं, जहाँ हर भारतीय आप पर नाज करे। रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को मुंबई में हुआ था। कैपियन स्कूल से शुरूआती पढाई करने के बाद रतन टाटा ने कार्निल यूनिवर्सिटी, लंदन से आर्किटेक्चर एंड स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और फ़िर हार्वड विश्वविघालय से एडवांस मैनेजमेंट प्रोग्राम कोर्स किया। उन्हें प्रतिष्टित कंपनी आईबीएम से नौकरी का बढिया प्रस्ताव मिला, लेकिन रतन ने उस प्रस्ताव को ठुकराकर अपने पुश्तैनी बिजनेस को ही आगे बढाने की ठानी।

उन्होंने अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में नेल्को और सेंट्रल इंडिया टेक्सटाइल जैसी घाटी की कंपनियों को संभाला और उन्हें प्रांफ़िटेबल यूनिट में बदल कर अपनी विलक्षण प्रतिभा को सबके सामने पेश किया। फ़िर साल दर साल उन्होंने अनेक क्षेत्रों में टाटा का विस्तार किया और सफ़लता पाई।

देश की पहली कार जिसकी डिजाइन से लेकर निर्माण तक का कार्य भारत की कंपनी ने किया हो, उस टाटा इंडिका प्रोजेक्ट का श्रेय भी रतन टाटा के खाते में ही जाता है। इंडिका के कारण विश्व मोटर कार बाजार के मानचित्र पर उभरा है।

1991 में वह टाटा संस के अध्यक्ष बने और उनके नेतृत्व में टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, टाटा टी, टाटा केमिकल्स और इंडियन होटल्स ने भी काफ़ी प्रगति की। टाटा ग्रुप की टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) आज भारत की सबसे बडी सूचना तकनीकी कंपनी है। वह फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन के बोर्ड आंफ़ ट्रस्टीज के भी सदस्य हैं।
कंपनी के नियमानुसार 65 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बाद वह पद से तो रिटायर हो गए, पर काम करने का जुनून अभी भी उन पर हावी है और उनकी अगुवाई में टाटा के कंपनियां नए आयामों को छू रही हैं।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएल) और टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों को बुलंदी पर पहुंचाकर अब रतन देश के मध्यम्वर्गी लोगों के लिए सस्ती कार के ख्वाब को पूरा करने में लगे हैं। रतन टाटा बाजार में एक लाख रूपय कीमत की कार लांन्च करने की तैयारी कर रहे हैं, जो कार खरीदने का सपना रखने वाले आम भारतीयों के लिए उनका तोहफ़ा होगी। वर्सेटाएल पर्सेनैलिटी रतन को देश के साथ ही विदेशों में भी सशक्त उघोगपति माना जाता है। उन्हें मित्सुबिशी कांरपोरेशन, अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रुप, जेपी मांर्गन चेज, बूज एलन हैमिल्टन इंक जैसी विदेशी कंपनियों में भी रतन टाटा को जगह मिली, साथ ही साथ इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट काउंसिल, न्यूयांर्क स्टांक एक्सचेंच के निदेशक मंडल की एशिया पैसिफ़िक एडवाइजरी कमेटी, बिल एण्ड मिलिंडा गेटस फ़ाउंडेशन, रैंडस सेंटर फ़ांर एशिया पैसिफ़िक पांलिसी आदि से भी रतन टाटा से गहरा जुडाव रहा है।

भारतीय रिजर्व बैंक के सैंट्रल बोर्ड और व्यापार-उघोग से संबंधित काउंसिल में भी रतन टाटा ने अहम भूमिका निभाई है। देश में निवेश बढाने के लिए गठित कमेटी के वह अध्यक्ष भी रहे हैं। उनकी इन सेवाओं के कारण 2000 में उन्हें पदम्भूषण से सम्मानित किया गया है।


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श्रीविद्या उपासना

अखिल चराचर जगत की अघिष्ठात्री शक्ति की महत्ता मातृ सत्ता के रूप में भारतीय वनाद्गमय में वर्णित है। वही शक्ति विश्व का सृजन, पालन, संहार, निग्रह एवं अनुग्रह इन पंच कर्मो की नियामिका है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड की केंद्रभूता यही शक्ति शरीर में अंतर्निहित प्राण शक्ति है। इसे ही योगियों की भाषा में चेतना शक्ति अथवा कुंडलिनी शक्ति कहा गया है। अखिल ब्रह्माण्ड की प्रतीकात्मक आकृति है श्री-यंत्र।

श्रीयंत्र के मध्य बिंदु में विराजमान भगवती महात्रिपुरसुन्दरी श्री श्रीविद्या के नाम से जानी जाती हैं। इन्हें मणिपुर-द्वीप वासिनी भी कहा जाता है। श्रीविद्या धाम,इंदौर में मां की इसी इसी विश्वमोहनी स्वरूप की प्रतिष्ठा की गई है।

स्वामी गिरिजानंदजी सरस्वती का इसकी स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान है।महात्रिपुरसुंदरी का यह मंदिर श्री यंत्र की रचना के आधार पर अष्टकोणीय है, जिसके मध्य में पंच प्रेतासन पर राजराजेश्वरी जगज्जननी मां पराम्बा ललिता महात्रिपुर संुदरी श्री विद्या विराजमान हैं। सिंहासन के चार आधार-स्तम्भ के रूप में चार देव ब्रह्मा, विष्णु,रूद्र एवं इर्शान हैं। पर्यड्क पर योगिराज शिव लेटे हैं, जिनकी नाभि से निकले सहस्रदल कमल पर मातेश्वरी आसीन हैं। श्रीश्रीविद्या का स्वरूप षोडश वर्षीया बालिका का है,जिनके चार हाथ एवं तीन नेत्र हैं। भगवती ने चारों हाथों में क्रमश: इक्षु-धनुष, पंच पुष्पबाण, पाश एवं अंकुश धारण किए हैं। मुख मण्डल प्रसन्न है तथा वाम नेत्र से भगवान सदाशिव को देख रही हैं। सदगुरू के श्रीमुख से प्राप्त की जाने वाली श्रीविद्या की दीक्षा ही साधना में सफलता दिलाती है। गुरू कृपा से फलीभूत होती है। श्री विद्या उपासना करने से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

ऎसे करें पूजन
माघ पूर्णिमा को भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुर सुंदरी मां श्री विद्या की पूजा मां के स्वरूप श्री यंत्र में करें। पूर्वाभिमुख होकर बैठें। लाल आसन का प्रयोग करें। शुद्ध और स्वच्छ वस्त्रों को स्त्रान करके धारण करें। शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। स्वर्ण,रजत,कांस्य अथवा पीतल के स्वच्छ पात्र में श्रीयंत्र की स्थापना करनी चाहिए। पुष्पों,अक्षत,गुलाब जल की बूंदों से माता को आसन देकर श्रीयंत्र स्थापित करना चाहिए।भगवती के नाम से श्री यंत्र के ऊपर श्रीविद्या का आह्वान करें। तीन बार पृथक पृथक जल चढ़ाएं। पंचामृत स्त्रान करवाएं। इसके बाद तीर्थ जल से मां को स्त्रान करवाना चाहिए। चंदन-केसर से भी श्री यंत्र को स्त्रान करवाना चाहिए। इत्र, गुलाब जल से भी स्त्रान कर मां को प्रसन्न करना चाहिए। श्री सूक्त से मां का अभिषेक दूध या गुलाब जल, गंगा जलादि अथवा गन्ने के रस से करना चाहिए। नए और शुद्ध वस्त्र से श्री यंत्र का प्रोक्षण कर स्थापित करें। पंच रंग का धागा यानी कलावा मां को अर्पित करें। इसके पश्वात श्रद्धापूर्वक मां को चंदन, केसर,अक्षत, बिल्व पत्र,कुंद,जूही, गुलाब, हार श्रृंगार ,चंपा (मां को विशेष प्रिय),कमल के फूल अथवा माला चढ़ाएं। कुंकुम-चावल, हलदी,अबीर,गुलाल, मेंहदी आदि सौभाग्य वस्तुएं जगत जननी को अर्पित करें।

मंत्र जप
अति गोपनीय और गुरू मुख से ग्राह्य श्रीविद्या की दीक्षा के अभाव में जन सामान्य इन मंत्रों से मां का जप करना चाहिए-
या देवी सर्वभूतेषु श्रीविद्यारूपेण संश्रिता।
नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमो नम:।।
श्री ललिता अम्ब्कायै नम:।

श्रीविद्यायै नम:।
श्रीमत्त्रिपुर सुन्दरायै नम:।
श्री चक्रराज निलयायै नम:।

श्रीविद्या पूजन के तीन भेद हैं। यथा परापूजा,परापरा पूजा और अपरापूजा। परापूजा यह ज्ञान है। परापरा पूजा यह भक्ति है। अपरापूजा यह कर्म है। इस विद्या के फल की ओर दृष्टि रखकर उपासना करने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। फल की अपेक्षा रखे बिना उपासना करने से जल्दी सिद्धि प्राप्त होती है। ऎसा सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में कहा गया है।

आरती
जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे
मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे।। हरि ऊं जय देवि...
प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्ये
पारावारविहारिणि नारायणि ह्वद्ये।
प्रपंचसारे जगदाधारे श्रीविद्ये
प्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ।। 1 ।। हरि ऊं जय देवि॥
दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदने
पदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने।
विकसित पंकजनयने पन्नगपतिशयने
खगपतिवहने गहने संकटवन दहने ।। 2।। हरि ऊं जय देवि॥
मंजीरांकित चरणे मणिमुक्ताभरणे
कंचुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्ब्ाुजधरणे।
शक्रामयभय हरणे भूसुर सुखकरणे
करूणां कुरू मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ।। 3।। हरि ऊं जय देवि॥
छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्
ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान।
विहरसि दानव ऋद्धान् समरे संसिद्धान्
मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् ।। 4।। हरि ऊं जय देवि॥

07 जुलाई 2010

तुलसी से महकाएं बगिया

तुलसी के महत्व से लोग अनजान नहीं हैं। तुलसी के पत्ते से बने काढ़े का प्रयोग सर्दीजुकाम व सामान्य बुखार में सदियों से किया जा रहा है, इसीलिय हर घर में तुलसी का पौधा लगाना भारतीय परम्परा रही है।

आसीमम केनाम : इसे वन तुलसी भी कहा जाता है। वनस्पतिक विज्ञान में यह आसीमम केनाम के नाम से जानी जाती है। इस का पादप एकवर्षीय रोमयुक्त होता है। तथा छोटा होता है। पत्तियाँ हलके हरे रंग की होती हैं।

आसीमम ग्रेतीसीनाम : तुलसी पादप की सभी जातियों में यह सब से बड़ी होती है। इस के पुष्प सफ़ेद रंग के होते हैं। इसे अर्जक नाम से भी जाना जाता है।

आसीमम सेंतम : इसे तुलसी गौरी या वृंदा के नाम से भी जाना जाता है। आसीमम सेंतम इस का वनस्पतिक नाम है। इस की शाखाएं सीधी एवं फ़ैली हुई होती हैं।

आसीमम बेसीलिकम : तुलसी की सभी जातियों में यह सब से अधिक तीक्ष्ण खुशबु वाली है। इसे आम बोलचाल की भाषा में ’मरूहा’ के नाम से जाना जाता है। ’अजगंधिका’ या ’मरूबक’ नाम भी इस जाति के लिए प्रचलित हैं। इस के फ़ूल बैंगनी रंग के होते हैं। इस की शाखाएं हरी या फ़ीके पीले रंग की होती हैं।

आमतौर पर तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल कफ़, कृमि या वमन के नष्ट करने में किया जाता है। श्याम तुलसी का उपयोग रक्तदोष, ज्वर, वमन, कृमि आदि को समाप्त करने में करते है। ’मरूहा’ की तेज गंध घरों में मच्छरों को भगाती है।

घर में या बगिया में तुलसी का पौधा आसानी से लगाया जा सकता है। इसलिए तुलसी के पौधे को गमले में भी लगाया जा सकता है। एक बार तुलसी के पौधे को लगा देने के बाद पौधे से परिपक्व बीज गिर कर अंकुरित हो नए पौधे का निर्माण कर लेते हैं। तुलसी के पौधों का निर्माण कर लेते हैं। तुलसी के पौधों का निर्माण कर लेते हैं। तुलसी के पौधों को बढवार के लिए किसी विशेष खाद की जरूरत भी नहीं है। सिर्फ़ आप की थोडी सी देखभाल से तुलसी आप की बगिया को महका सकती है।

06 जुलाई 2010

महाभारत - पाण्डवों तथा कौरवों का जन्म

एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों - कुन्ती तथा माद्री - के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृग ने पाण्डु को शाप दिया, "राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।"

इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले, "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़" उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।" पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।

इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा, "राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।"

ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, "हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?" कुन्ती बोली, "हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।" इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

इधर युधिष्ठिर के जन्म होने पर धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी के हृदय में भी पुत्रवती होने की लालसा जागी। गान्धारी ने वेदव्यास जी से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। गर्भ धारण के पश्चात् दो वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी जब पुत्र का जन्म नही हुआ तो क्षोभवश गान्धारी ने अपने पेट में मुक्का मार कर अपना गर्भ गिरा दिया। योगबल से वेदव्यास को इस घटना को तत्काल जान लिया। वे गान्धारी के पास आकर बोले, "गान्धारी तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र सौ कुण्ड तैयार कर के उनमें घृत भरवा दो।" गान्धारी ने उनकी आज्ञानुसार सौ कुण्ड बनवा दिये। वेदव्यास ने गान्धारी के गर्भ से निकले मांसपिण्ड पर अभिमन्त्रित जल छिड़का जिसे उस पिण्ड के अँगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गये। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गान्धारी के बनवाये सौ कुण्डों में रखवा दिया और उन कुण्डों को दो वर्ष पश्चात् खोलने का आदेश दे अपने आश्रम चले गये। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुण्ड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। दुर्योधन के जन्म के दिन ही कुन्ती का पुत्र भीम का भी जन्म हुआ। दुर्योधन जन्म लेते ही गधे की तरह रेंकने लगा। ज्योतिषियों से इसका लक्षण पूछे जाने पर उन लोगों ने धृतराष्ट्र को बताया, "राजन्! आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। इसे त्याग देना ही उचित है। किन्तु पुत्रमोह के कारण धृतराष्ट्र उसका त्याग नहीं कर सके। फिर उन कुण्डों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दुश्शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ। गान्धारी गर्भ के समय धृतराष्ट्र की सेवा में असमर्थ हो गयी थी अतएव उनकी सेवा के लिये एक दासी रखी गई। धृतराष्ट्र के सहवास से उस दासी का भी युयुत्स नामक एक पुत्र हुआ। युवा होने पर सभी राजकुमारों का विवाह यथायोग्य कन्याओं से कर दिया गया। दुश्शला का विवाह जयद्रथ के साथ हुआ।

05 जुलाई 2010

क्यों है गंगा जल पवित्र

गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक जिस तीर्थ से भी गंगा प्रवाहित होती है। वहां आने वाले तीर्थयात्री गंगा के प्रति आस्था के कारण वापसी में अपने साथ पवित्र गंगाजल ले जाना नहीं भूलते। सनातन परंपराओं में गंगाजल का उपयोग धार्मिक, मांगलिक कर्मों में पवित्रता के लिए किया जाता है। शिशु जन्म या मृत्यु के बाद के कर्मों में इसी गंगा जल से गृह शुद्धि की परंपरा है। साथ ही मृत्यु के निकट होने पर व्यक्ति को गंगा जल पिलाने और दाह संस्कार के बाद उसकी राख को गंगा के पवित्र जल में प्रवाहित करने की भी पंरपरा रही है। क्योंकि धार्मिक मान्यताओं में गंगा पापों का नाश क र मोक्ष देने वाली देव नदी मानी गई है। किंतु गंगा मात्र धार्मिक दृष्टि से ही पवित्र नहीं है, बल्कि विज्ञान ने भी गंगा के जल को पवित्र माना है। जानते हैं गंगा के जल की पवित्रता के पीछे छुपे वैज्ञानिक तथ्यों को।
गंगा जल की वैज्ञानिक खोजों ने साफ कर दिया है कि गंगा जल का धार्मिक महत्व ही नहीं है वरन इसका वैज्ञानिक महत्व भी है। क्योंकि गंगा अपने उद्गम स्थल से लेकर मैदानों में आने तक प्राकृतिक स्थानों, वनस्पतियों से होकर प्रवाहित होती है। अत: इस जल में औषधीय गुण पाए जाते हैं। इसके साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधानों में यह पाया गया है कि गंगाजल में कुछ ऐसे जीव होते हैं जो जल को प्रदूषित करने वाले विषाणुओं को पनपने ही नहीं देते बल्कि उनको नष्ट भी कर देते हैं। जिससे गंगा का जल लंबे समय तक प्रदूषित नहीं होता है। इस प्रकार के गुण अन्य किसी नदी के जल में नहीं पाए गए हैं। इस तरह गंगा जल धर्म भाव के कारण मन पर और विज्ञान की नजर से तन पर सकारात्मक प्रभाव देने वाला है।

04 जुलाई 2010

जीवन परिचय - गौतम बुद्ध ( Introduction to Life - Gautama Buddha )

नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान है। वहाँ एक लुम्बिनी नाम का वन था। गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले जब कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो रास्ते में लुम्बिनी वन में हुआ। तब इनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। इनके पिता का नाम शुद्धोदन था। जन्म के सात दिन बाद ही माँ का देहांत हो गया। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया।

सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ तो पढ़े ही, राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता। बचपन से ही सिद्धार्थ के मन में करुणा भरी थी। उससे किसी भी प्राणी का दुःख नहीं देखा जाता था। यह बात इन उदाहरणों से स्पष्ट भी होती है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था।

एक बार की बात है सिद्धार्थ को जंगल में किसी शिकारी द्वारा तीर से घायल किया हंस मिला। उसने उसे उठाकर तीर निकाला, सहलाया और पानी पिलाया। उसी समय सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त वहाँ आया और कहने लगा कि यह शिकार मेरा है, मुझे दे दो। सिद्धार्थ ने हंस देने से मना कर दिया और कहा कि तुम तो इस हंस को मार रहे थे। मैंने इसे बचाया है। अब तुम्हीं बताओ कि इस पर मारने वाले का हक होना चाहिए कि बचाने वाले का?

देवदत्त ने सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोदन से इस बात की शिकायत की। शुद्धोदन ने सिद्धार्थ से कहा कि यह हंस तुम देवदत्त को क्यों नहीं दे देते? आखिर तीर तो उसी ने चलाया था? इस पर सिद्धार्थ ने कहा- पिताजी! यह तो बताइए कि आकाश में उड़ने वाले इस बेकसूर हंस पर तीर चलाने का ही उसे क्या अधिकार था? हंस ने देवदत्त का क्या बिगाड़ा था? फिर उसने इस पर तीर क्यों चलाया? क्यों उसने इसे घायल किया? मुझसे इस प्राणी का दुःख देखा नहीं गया। इसलिए मैंने तीर निकालकर इसकी सेवा की। इसके प्राण बचाए। हक तो इस पर मेरा ही होना चाहिए।

राजा शुद्धोदन को सिद्धार्थ की बात जँच गई। उन्होंने कहा कि ठीक है तुम्हारा कहना। मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा है। इस पर तुम्हारा ही हक है। शाक्य वंश में जन्मे सिद्धार्थ का सोलह वर्ष की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ हुआ। राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए। पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं। विषयों में उसका मन फँसा नहीं रह सका।

सांसारिक दुःख देखकर विचलन : वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले। उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था। कुमार (सिद्धार्थ) ने अपने सारथी सौम्य से पूछा- 'यह कौन पुरुष है? इसके बाल भी औरों के समान नहीं हैं!'

सौम्य ने कहा- 'कुमार! यह भी एक दिन सुंदर नौजवान था। इसके भी बाल काले थे। इसका भी शरीर स्वस्थ था। पर अब जरा ने, बुढ़ापे ने इसे दबा रखा है।' कुमार बोला- 'सौम्य! यह जरा क्या सभी को दबाती है या केवल इसी को उसने दबाया है?' सौम्य ने कहा- 'कुमार, जरा सभी को दबाती है। एक दिन सभी की जवानी चली जाती है!' 'सौम्य, क्या किसी दिन मेरा भी यही हाल होगा?' 'अवश्य, कुमार!' कुमार कहने लगा- 'धिक्कार है उस जन्म पर, जिसने मनुष्य का ऐसा रूप बना दिया है। धिक्कार है यहाँ जन्म लेने वाले को!'

कुमार का मन खिन्न हो गया। वह जल्दी ही लौट पड़ा। राजा को पता लगा, तो उन्होंने कुमार के लिए और अधिक मनोरंजन के सामान जुटा दिए। महल के चारों ओर पहरा बैठा दिया कि फिर कभी ऐसा कोई खराब दृश्य कुमार न देख पाएँ। दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया। उसकी साँस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बाँहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। फिर कुमार ने सारथी से पूछा- 'यह कौन है सौम्य?'

'यह बीमार है कुमार! इसे ज्वर आता है।' 'यह बीमारी कैसी होती है, सौम्य?' 'बीमारी होती है धातु के प्रकोप से।' 'क्या मेरा शरीर भी ऐसा ही होगा सौम्य?' 'क्यों नहीं कुमार? शरीरं व्याधिमंदिरम्‌। शरीर है, तो रोग होगा ही!' कुमार को फिर एक धक्का लगा। वह बोला- 'यदि स्वास्थ्य सपना है, तो कौन भोग कर सकता है शरीर के सुख और आनंद का? लौटा ले चलो रथ सौम्य।' कुमार फिर दुःखी होकर महल को लौट आया। पिता ने पहरा और कड़ा कर दिया।

फिर एक दिन कुमार बगीचे की सैर को निकला। अबकी बार एक अर्थी उसकी आँखों के सामने से गुजरी। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था।

यह सब देखकर कुमार ने सौम्य से पूछा- 'यह सजा-सजाया, बँधा-बँधाया, कौन आदमी लेटा जा रहा है बाँस के इस खटोले पर?'
सौम्य बोला- 'यह आदमी लेटा नहीं है कुमार। यह मर गया है। यह मृत है, मुर्दा है। अपने सगे-संबंधियों से यह दूर चला गया। वहाँ से अब कभी नहीं लौटेगा। इसमें अब जान नहीं रह गई। घरवाले नहीं चाहते, फिर भी वे इसे सदा के लिए छोड़ने जा रहे हैं कुमार।' 'क्या किसी दिन मेरा भी यही हाल होगा, सौम्य?' 'हाँ, कुमार! जो पैदा होता है, वह एक दिन मरता ही है।' 'धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है। क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य?'

'हाँ कुमार!' 'कुमार को गहरा धक्का लगा। वह उदास होकर महल को लौट पड़ा।' राजा ने कुमार की विरक्ति का हाल सुनकर उसके चारों ओर बहुत सी सुंदरियाँ तैनात कर दीं। वे कुमार का मन लुभाने की तरह-तरह से कोशिश करने लगीं, पर कुमार पर कोई असर नहीं हुआ। अपने साथी उदायी से उसने कहा- 'स्त्रियों का यह रूप कभी टिकने वाला है क्या? क्या रखा है इसमें?' चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। उसने फिर पूछा- 'कौन है यह, सौम्य?' 'यह संन्यासी है कुमार!'

'यह शांत है, गंभीर है। इसका मस्तक मुंडा हुआ है। अपने हाथों में भिक्षा-पात्र लिए है। कपड़े इसके रंगे हुए हैं। क्या करता है यह सौम्य?'
'कुमार इसने संसार का त्याग कर दिया है। तृष्णा का त्याग कर दिया है। कामनाओं का त्याग कर दिया है। द्वेष का त्याग कर दिया है। यह भीख माँगकर खाता है। संसार से इसे कुछ लेना-देना नहीं।'

कुमार को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसका चेहरा खिल उठा। बगीचे में पहुँचा, तो हरकारे ने आकर कहा- 'भगवन पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ है।'
'राहुल पैदा हुआ!' -कुमार के मुख से निकला। उसने सोचा कि एक बंधन और बढ़ा। पिता ने सुना तो पोते का नाम ही 'राहुल' रख दिया!

सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़ा। वह राजगृह पहुँचा। वहाँ उसने भिक्षा माँगी। सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचा। उनसे उसने योग-साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर उससे उसे संतोष नहीं हुआ। वह उरुवेला पहुँचा और वहाँ पर तरह-तरह से तपस्या करने लगा।

सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की, बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूखकर काँटा हो गया। छः साल बीत गए तपस्या करते हुए। सिद्धार्थ की तपस्या सफल नहीं हुई।

शांति हेतु बुद्ध का मध्यम मार्ग : एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई वहाँ से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहा था। उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा- 'वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो। ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ।' बात सिद्धार्थ को जँच गई। वह मान गया कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है।

सुजाता की खीर और बुद्ध को बोध-प्राप्ति : वैशाखी पूर्णिमा की बात है। सुजाता नाम की स्त्री को पुत्र हुआ। उसने बेटे के लिए एक वटवृक्ष की मनौती मानी थी। वह मनौती पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ वहाँ बैठा ध्यान कर रहा था। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- 'जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।'

उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से वे बुद्ध कहलाए। जिस वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध प्राप्त हुआ, उसका नाम है बोधिवृक्ष। जिस स्थान की यह घटना है, वह है बोधगया। ईसा के 528 साल पहले की घटना है, जब सिद्धार्थ 35 साल का युवक था। बुद्ध भगवान 4 सप्ताह तक वहीं बोधिवृक्ष के नीचे रहे। वे धर्म के स्वरूप का चिंतन करते रहे। इसके बाद वे धर्म का उपदेश करने निकल पड़े।

बुद्ध का धर्म-चक्र-प्रवर्तन : जब सिद्धार्थ को सच्चे बोध की प्राप्ति हुई उसी वर्ष आषाढ़ की पूर्णिमा को भगवान बुद्ध काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे। वहीं पर उन्होंने सबसे पहला धर्मोपदेश दिया। भगवान बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाने के लिए लोगों से कहा। दुःख, उसके कारण और निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग सुझाया। अहिंसा पर बड़ा जोर दिया। यज्ञ और पशु-बलि की निंदा की।

80 वर्ष की उम्र तक भगवान बुद्ध ने अपने धर्म का सीधी सरल लोकभाषा में पाली में प्रचार किया। उनकी सच्ची सीधी बातें जनमानस को स्पर्श करती थीं। लोग आकर उनसे दीक्षा लेने लगे।

बौद्ध धर्म सबके लिए खुला था। उसमें हर आदमी का स्वागत था। ब्राह्मण हो या चांडाल, पापी हो या पुण्यात्मा, गृहस्थ हो या ब्रह्मचारी सबके लिए उनका दरवाजा खुला था। जात-पाँत, ऊँच-नीच का कोई भेद-भाव नहीं था उनके यहाँ।

बौद्ध संघ की स्थापना : बुद्ध के धर्म प्रचार से भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बनने लगे। शुद्धोदन और राहुल ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। जब भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी तो बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बाद में लोगों के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में ले लेने के लिए अनुमति दे दी, यद्यपि इसे उन्होंने विशेष अच्छा नहीं माना।

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रचार : भगवान बुद्ध ने 'बहुजन हिताय' लोककल्याण के लिए अपने धर्म का देश-विदेश में प्रचार करने के लिए भिक्षुओं को इधर-उधर भेजा। अशोक आदि सम्राटों ने भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। आज भी बौद्ध धर्म का भारत से अधिक विदेशों में प्रचार है। चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में बौद्ध धर्म आज भी जीवित धर्म है और विश्व में 50 करोड़ से अधिक लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।

बुद्ध का निर्वाण : भगवान बुद्ध ने सत्य और अहिंसा, प्रेम और करुणा, सेवा और त्याग से परिपूर्ण जीवन बताया। वैशाखी पूर्णिमा को उनका जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और उसी दिन निर्वाण। ईसा से 483 साल पहले भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।

भगवान बुद्ध का आदर्श जीवन युग-युग तक लोगों को सत्य, प्रेम और करुणा की प्रेरणा देता रहेगा। काश, हम उनके जीवन से, उनके उपदेश से कुछ सीख पाएँ!

आनन्द : ये बुद्ध और देवदत्त के भाई थे और बुद्ध के दस सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक हैं। ये लगातार बीस वर्षों तक बुद्ध की संगत में रहे। इन्हें गुरु का सर्वप्रिय शिष्य माना जाता था। आनंद को बुद्ध के निर्वाण के पश्चात प्रबोधन प्राप्त हुआ। वे अपनी स्मरण शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।

महाकश्यप : महाकश्यप मगध के ब्राह्मण थे, जो तथागत के नजदीकी शिष्य बन गए थे। इन्होंने प्रथम बौद्ध अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

रानी खेमा : रानी खेमा सिद्ध धर्मसंघिनी थीं। ये बीमबिसारा की रानी थीं और अति सुंदर थीं। आगे चलकर खेमा बौद्ध धर्म की अच्छी शिक्षिका बनीं।

महाप्रजापति : महाप्रजापति बुद्ध की माता महामाया की बहन थीं। इन दोनों ने राजा शुद्धोदन से शादी की थी। गौतम बुद्ध के जन्म के सात वर्ष पश्चात महामाया की मृत्यु हो गई। तत्पश्चात महा- प्रजापति ने उनका अपने पुत्र जैसे पालन-पोषण किया। राजा शुद्धोदन की मृत्यु के बाद बौद्ध मठमें पहली महिला सदस्य के रूप में महाप्रजापिता को स्थान मिला था।

मिलिंद : मिलिंदा यूनानी राजा थे। ईसा की दूसरी सदी में इनका अफगानिस्तान और उत्तरी भारत पर राज था। बौद्ध भिक्षु नागसेना ने इन्हें बौद्ध धर्म की दीक्षा दी और इन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया।

सम्राट अशोक : सम्राट अशोक बौद्ध धर्म के अनुयायी और अखंड भारत के पहले सम्राट थे। इन्होंने ईसा पूर्व 207 ईस्वी में मौर्य वंश की शुरुआत की। अशोक ने कई वर्षों की लड़ाई के बाद बौद्ध धर्म अपनाया था। इसके बाद उन्होंने युद्ध का बहिष्कार किया और शिकार करने पर पाबंदी लगाई। बौद्ध धर्म का तीसरा अधिवेशन अशोक के राज्यकाल के 17वें साल में संपन्न हुआ। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महिंद और पुत्री संघमित्रा को धर्मप्रचार के लिए श्रीलंका भेजा। इनके द्वारा श्रीलंका के राजा देवनामपिया तीस्सा ने बौद्ध धर्म अपनाया और वहाँ 'महाविहार' नामक बौद्ध मठ की स्थापना की। यह देश आधुनिक युग में भी थेरावदा बौद्ध धर्म का गढ़ है।

गुलदाऊदी की बहार

'फ़ूलों की रानी' गुलदाऊदी के फ़ूल बहुरंगे और खूबसूरत होते हैं। वनस्पति जगत में यह सूरजमुखी नस्ल का ही एक सदस्य है। घर आंगन में इस पौधे को गमले और जमीन दोनों जगह लगाया जा सकता है।


जाडे के मौसम में फ़ूलों की बहार देने वाला गुलदाऊदे फ़ूलदारा पौधा है। अलग-अलग रंगो की छट बिखेरते इस के फ़ूलों से पूरा वातावरण महक उठता है। इसे चाहे गमलों में लगाया जाए या क्यारियों में, इस के फ़ूलों से पौधा लद जाता है।

गुलदाऊदी को ईस्ट की रानी भी कहा जाता है। इस की उत्पत्ति चीन से हुई थी। इस के फ़ूलों को ’रे फ़्लोरेट’ व ’डिस्क फ़्लोरेट’, 2 प्रकार में विभाजित किया जा सकता है। इस की बडे और छोटे फ़ूल वाली किस्में हैं। इसे व्यावसायिक खेती के लिए तो क्यारियों में उगाया जाना चाहिए पर गमलों में भी उगाया जा सकता है। गुलदाऊदे को प्रदर्शनी के लिए उगाया जाए तो आप को कुछ खास बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। एक तो बडे फ़ूल वाली किस्मों को प्राथमिकता दें, दूसरे, प्रति पौधा अधिक से अधिक 3 फ़ूल ही रहने दें।

स्थान कैसा हो

गुलदाऊदी की पौदावार के लिए ऐसे स्थान का चयन करें जहां दिन के समय 4 से 5 घंटे आती हो, स्थान खुला हो व जल के निकास की सुविधा हो। वहां की मिट्टी दोमट (यानी न अधिक चिकनी न अधिक रेतीली) हो, मिट्टी में कंकडपत्थर भी न हो। यदि रेतीली मिट्टी हो तो उस में गोबर या किसी जैविक खाद को मिला दें।

तैयारी कैसे करें

पौधे लगाने से पहले क्यारियों की ठीक प्रकार से खुदाई कर लें। पुरानी लगाई गई फ़सल के अवशेष, घास तथा कंकड मिट्टी से निकाल दें। मिट्टी में 25 से 30 किलो गोबर की सडी खाद प्रति वर्ग मीटर क्षेत्रफ़ल में मिला दें और पानी दे दें इस से मिट्टी में खरपतवार के पौधे जम जाएंगे तो उन्हें खेत से निकाल कर फ़िर खुदाई कर दें। ऐसा करने से क्यारियां खरपतवार मुक्त हो जाएंगी। खेती की तैयारी अक्तूबर के प्रथाम सप्ताह तक कर लेनी चाहिए।
गमलों में गुलदाऊदी लगाने के लिए गोबर की खाद 1 भाग, कंपोस्ट छना हुआ 1 भाग, मिट्टी 1 भाग और प्रति गमला 2 चम्मच हड्डी का चूरा मिला कर गमले को भर दें। गुलदाऊदे के लिए 10 और 12 इंच आकार के गमलों का चयन करें। गमले में मिट्टी भरते समय ध्यान रखें कि उस का 2.5 सेंतीमीटर ऊपरी भाग खाली रहे ताकि पानी रूकने के लिए उपयुक्त जगह हो।

देखभाल कैसे करें

पौधों की अच्छी बढवार और स्वस्थ फ़ूल लेने के लिए उस की देखभाल करना जरूरी हो जाता है। ध्यान रखें कि अच्छे फ़ूल लेने के लिए उर्वरक देना बेहद जरूरी है।
पौधा रोपने के 15 दिन बाद से तरल खाद देनी शुरू कर देनी चाहिए। तरल खाद देनी शुरू कर देनी चाहिए। तरल खाद बनाने के लिए ताजा गोबर की 1.2 किलो मात्रा, खली (सरसों अथवा नीम) की 1.2 मात्रा किलो को 10 लिटर पानी में घोल दें। 10 दिने में यह घोल सड जाता है। जब इस का रंग चाय जैसा हो जाए तब इस को छान कर 10 दिन के अंतराल पर प्रति गमला आधा लिटर घोल डाल दें।

सिंचाई कब करें

बरसात न होने तक नियमित सिंचाई करें। ध्यान रहे, सिंचाई हमेशा सुबह के समय करना लाभदायक रहता है। पौधो की पत्तियों से धूल एवं मिट्टी को पानी की बौछारों से हटाते रहना चाहिए। अधिक पानी भी गुलदाऊदे के पौधे के लिए हानिकारक है, अत: जल निकास का उचित प्रबंध होना आवश्यक है। यदि बरसात अधिक हो रही है तो गमलों को थोडा तिरछा कर के भी पौधे को अधिक पानी से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

खरपतवार मुक्त रखें

पौधा शुरू में बढवार की अवस्था में होता है, इसलिए खरवतवार नियंत्रण करना बहुत ही जरूरी होता है, क्योंकि वे न केवल पौधे का पोषण ही सीमित करते हैं बल्कि बढ्वार पर भी प्रतिकूल असर डालते हैं। अत: खरपतवार को समय-समय पर क्यारियों से निकालते रहना चाहिए।

पौधों को सहारा देना

गुलदाऊदी के पौधों से अच्छे फ़ूल पाने के लिए किनारे वाली शाखाओं को खपच्चियों से सहारा देना आवश्यक समझा गया है। गमले में सहारे के लिए डंडियों को गमले से बाहर की तरफ़ रखते हैं। ऐसा करने से पौधे को बढने और फ़ूलने के लिए पर्याप्त स्थान मिल जाता है।

पिंचिग कैसे करें

यह क्रिया पौधे को छोटा, अधिक शाखाओं वाला तथा अधिक संख्या में फ़ूल पाने के लिए की जाती है। इस में 3 से 5 सेंमी। लंबाई से पौधे के ऊपरी हिस्से (फ़ुनगी) को हाथ से तोड दिया जाता है। ऐसा करने से साइड से अधिक शाखाएं बनती हैं, जिस के परिणामस्वरूप प्रति पौधा अधिक संख्या में फ़ूल बनते हैं।  

कलियों को तोडना

गुलदाऊदी से बडे आकार के अचछे फ़ूल पाने के लिए कलियों को तोडना चाहिए। पौधे पर कुछ कलियों को छोड कर शेष को काट दिया जाता है। प्रदर्शनी के लिए 2-3 कलियां प्रति पौधा रखनी चाहिए।
इन क्रियाओं के अलावा पौधे की जड के पास से निकलने वाली शाखाओं को बराबर काटते रहें जिस से पौधे को दी जाने वाली खुराक का उपयोग ये शाखाएं न कर पाएं तथा पौधे पर फ़ूल किस्म के अनुरूप आएं।

प्रमुख किस्में

गुलदाऊदी की प्रमुख रूप से, बडे फ़ूल वाली और छोटे फ़ूल वाली 2 किस्में होती हैं।

बडे फ़ूल वाली किस्में
सफ़ेद रंग : स्नोवाल, ब्यूटी, जोहन वेवर, वेलेंट, कस्तूरबा गांधी, परपिल, मीरा, प्रेसीडेंट विगर।
पीला रंग : चंद्रिमा, सनराइज, स्टार यलो, सोनार बंगला, जैकस्ट्रा, मधुराज, महाराज सिक्किम, इवनिंग स्टार, सुपर जाइंट, मेनटेनर।
लाल रंग : गोल्डी डायमंड, एपर्ट डिस्टेक्शन, वदगर तामरा, अकन, जोहन हीट।
बैंगनी रंग :  मीरा, पिंक, ज्वाइंट, महात्मा गांधी, स्टार आफ़ इंडिया, टैक्टेशन, फ़िश टेल, राज।

छोटे फ़ूल वाली किस्में
सफ़ेद रंग : बीरबल साहनी, शरद मुक्ता, शरद तारिका।
बैंगनी रंग : शरद बहार, शरद प्रभा वीनस, विनशम, फ़्लीर्ट वसंती, कुंदन।
पीला रंग : नानको, लिलीपुट, कस्तूरी, कालियोत्टेरा।
लाल रंग : मैरी, लोहित, तारा, पारागोन।

रोग और सुरक्षा के उपाय

रस चूसने वाले कीडों (थ्रित्स) एवं चैपा की रोकथाम के लिए रोगोर अथवा मेटासिस्टाक्स नामक कीटनाशक 1.5 मिलीमीटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिडकाव करें।

पत्ती का काला धब्बा रोग ( फ़फ़ूंदी जनित) की रोकथाम 2 ग्राम मोन्कोजेव युक्त फ़फ़ूंदनाशक जैसे इंडोफ़िल एम-45 आदि का प्रति लिटर पानी में घोल कर छिडकाव करें। यदि आवश्यकता हो तो उपरोक्त दवाओं का छिडकाव हर 15 दिन पर करें।