24 सितंबर 2010

त्रिदेव बने स्त्रियाँ


क बार की बात है, सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्माजी को अनुभव हुआ की विघा, वैभवता और भय के बिना; सृष्टि सौन्दर्यविहीन होती है। विघा के अभाव में प्राणियों को अपने जीवन के उद्देश्य का ज्ञान नहीं होता। वैभवता के अभाव में सृष्टि की सुन्दरता समाप्त हो जाती है। भय न होने से प्राणी पाप-कर्म करने से नहीं डरते। अतः इन समस्याओं का समाधान आवश्यक है। इन समस्याओं के उपाय के लिये ब्रह्माजी विष्णु-लोक गए।

लेकिन विष्णुजी भी इनका कोई समाधान नहीं निकाल सके। तभी वहां भगवान शिवजी प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्माजी और विष्णुजी को संबोधित करते हुए कहा- "हे विष्णु! हे ब्रह्मा! इस समस्या का समाधान न आप कर सकते हैं और न ही मैं। केवल माता भगवती इसका उपयुक्त उपाय बता सकती हैं। इसलिए हमें माता भगवती की शरण में चलना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए। देवी भगवती अत्यंत दयालु हैं, वे हमारी प्रार्थना अवश्य सुनेंगी।"

ब्रह्मा और विष्णु को शिवजी का परामर्श उचित लगा। वे देवी भगवती की कृपा-दृष्टि प्राप्त करने के लिये उनके महल के द्वार पर पहुंचे। प्रवेश द्वार बंद था। त्रिदेव किसी भी प्रकार से उसमें प्रवेश न पा सके। तब उन्होंने देवी भगवती का स्मरण करना आरम्भ कर दिया। तभी देवी भगवती की माया से त्रिदेव तीन सुन्दर स्त्रियों में परिवर्तित हो गए। उनके शरीर पर सुन्दर वस्त्र और आभूषण अलंकृत हो गए। अपनी यह दशा देख त्रिदेव अत्यंत विस्मित हुए। त्रिदेवों के स्त्रीरूप में परिवर्तित होते ही महल का द्वार अपने आप खुल गया।

महल में प्रवेश करने पर उनकी दृष्टि भगवती माता पर पडी। अनेक सखियों और सेविकाओं से घिरी हुईं भगवती माता कमल के एक सुन्दर आसन पर विराजमान थीं। उन्होंने दिव्य पीत वस्त्र और आभूषण धारण कर रखे थे। उनका चेहरा करोड़ों सूर्य के समान तेजपूर्ण था।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने भगवती माता की स्तुति की और उनसे अपने इस रूप-परिवर्तन का कारण पूछा। तब भगवती माता बोलीं-- "हे त्रिदेवों! आप जिस समस्या को लेकर मेरे पास आए हैं, ये रूप परिवर्तन उसी समस्या का समाधान है। समस्त प्राणियों को ज्ञान, वैभवता और भय मिश्रित फल आपके इन्हीं रूपों से प्राप्त होगा। आपके ये तीनों रूप वास्तव में मेरे ही अंश हैं जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली के नाम से विख्यात होंगे। सरस्वती ब्रह्माजी की सहचरी बनकर प्राणियों में ज्ञान की ज्योति जलाएँगी, लक्ष्मी विष्णुजी का वरण करके सद-प्राणियों को वैभवता प्रदान करेंगी और काली शिवजी की अर्धांगिनी बनकर दुष्ट-कर्मों और पापों के प्रति प्राणियों में भय उत्पन्न करेंगी।"

तत्पश्चात त्रिदेव अपने वास्तविक रूप में आ गए। उनके समक्ष माता भगवती के शक्ति-अंश से बनी तीन देवियाँ- सरस्वती, लक्ष्मी और काली प्रकट हो गईं। देवी भगवती की आज्ञा से तीनों देवियों ने त्रिदेवों का वरण किया और उनके साथ सृष्टि-रचना का कार्य करने लगीं।

देवी-देवताओं की चमत्कारिक कथाएँ

त्रिदेवों की उत्पत्ति

ष्टि के आरम्भ से पूर्व ब्रह्माण्ड जल में डूबा हुआ था। चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, प्राणी किसी की भी उत्पत्ति नहीं हुई थी। केवल भगवती जगदम्बिका परब्रह्म के रूप में विघमान थीं।
 
एक बार देवी भगवती के मन में सृष्टि-रचना का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने सबसे पहले एक पत्ते पर विष्णुजी की उत्पत्ति की। जन्म लेने के बाद विष्णुजी के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे। तब देवी भगवती ने प्रकट होकर उन्हें दिव्य-ज्ञान प्रदान करते हुए तपस्या के लिये प्रेरित किया। देवी के अंतर्ध्यान होने के बाद विष्णुजी तपस्या में लीन हो गए।

भगवान विष्णु को तपस्या करते हुए अनेक वर्ष बीत गए। तपस्या के तेज से उनकी नाभि से एक कमल-पुष्प उत्पन्न हो गया। धीरे-धीरे यह पुष्प विकसित होने लगा। पूर्ण विकसित होने के बाद जब इसकी पंखुड़ियां खुलीं तो उसमें से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई।

ब्रह्माजी ने अपने चारों ओर जल-ही-जल देखा। विष्णुजी के समान ही उनके मन में भी अनेक प्रश्न उठने लगे-- 'मैं कौन हूँ? मैं किस प्रकार उत्पन्न हुआ? ये दिव्य पुरूष कौन हैं जो इस समय घोर तपस्या में लीन हैं?'

तभी एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। इस तेज को देखकर ब्रह्माजी भयभीत हो गए। तब उस तेज में से आकाशवाणी हुई-- "हे पुत्र! भयभीत मत हो। ये तेज देवी भगवती के निराकार रूप का प्रतीक है। तुम्हारी उत्पत्ति देवी भगवती की कृपा से हुई है। इस ब्रह्माण्ड में देवी भगवती ही निराकार और साकार-- दोनों अवस्थाओं में व्याप्त हैं। उन्हीं की इच्छा से प्रलय; और सृष्टि में जन्म और मृत्यु का चक्र चलता है। अतः हे पुत्र! देवी भगवती की तपस्या करो।"

ब्रह्माजी ने तपस्या आरम्भ कर दी। तत्पश्चात देवी भगवती ने शिव की उत्पत्ति की। तीनों देवों ने देवी भगवती की तपस्या करनी शुरू कर दी।

हजारों वर्षों तक तपस्या करने के बाद, अंत में देवी भगवती साक्षात प्रकट हुईं और तीनों देवों से बोलीं-- "हे त्रिदेवों! तुम्हारे अंदर मेरी ही शक्ति साकार रूप में समाहित है। मेरे द्वारा ही तुम्हारी रचना हुई है। तुम्हारी उत्पत्ति का उद्देश्य सृष्टि का कार्य सुचारू रूप से चलाना है। ब्रह्माजी सृष्टि की रचना करेंगे, विष्णु सृष्टि का पालन करेंगे और शिवजी सृष्टि का संहार करेंगे। इस प्रकार यह चक्र सदैव चलता रहेगा।"

इतना कहने के बाद भगवती ने त्रिदेवों के लिये तीन विभिन्न लोकों-- ब्रह्म-लोक, विष्णु-लोक और शिव-लोक का निर्माण किया। देवी भगवती की आज्ञा से त्रिदेवों ने अपने-अपने आसन ग्रहण कर सृष्टि-रचना का कार्य आरभ कर दिया।

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23 सितंबर 2010

टीनएजर्स की बदलती सोच ( Teenagers Changing Thinking )


न-एजर्स यानी भरपूर जोश, कुछ नया, अलग करने की चाह। जो चीज जैसी है उसे ज्यों का त्यों न स्वीकारने की आदत। समय से आगे निकलने की जिद्द। खुद को सही साबित करें का जूनून। सबको प्रभावित करने की चाहत आदि और न जाने क्या-क्या। ऐसा ही कुछ होता है जब बच्चा टीन-एज में कदम रखता है यानी 13 से 19 साल तक की उम्र जीता है।
यह एक ऐसी उम्र होती है जिसमें मासूमियत भी होती है, तो चालाकी भी। ऐसे में बच्चे न केवल जोश और ऊर्जा से, बल्कि अनेक प्रकार के हुनर से भी भरे होते हैं। हर चीज को अपना द्रष्टिकोण देना उनका स्वभाव बन जाता है। जिसके पीछे उनका अपना ही मनोविज्ञान व तर्क होता है जो उनकी बदलती सोच और अंदाज को दर्शाता है। लेकिन आज का 'टीन' पहले की तरह नहीं है। इनकी सोच जितनी गंभीर है उतनी ही संवेदनशील भी। आईये जानते हैं जीवन के कई अहम विषयों पर टीन-एजर्स की राय, उनकी औसतन प्रतिक्रया व सोच कुछ इस तरह हैं।

  मनी
टीन में रूपये-पैसे को लेकर गहन आकर्षण है। यह मानते हैं कि पैसे के बिना कुछ सम्भव नहीं। यहाँ तक कि आज अपने काम निकलवाने तक के लिये भी पैसे का होना जरूरी है। स्कूल-काँलेज में जो बच्चा अपने फ्रेंड्स को अधिक केंटीन ले जाता है, घुमाता-फिराता है, उपहार आदि देता है, उसका सबमें रूतबा ही कुछ और होता है। जिसके चलते उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
लेकिन इस पैसे के महत्व को देखते हुए वह अपने करियर के प्रति काफी सतर्क और जागरूक अवश्य हुए हैं। इस लिये वह स्कूल-काँलेज के साथ ट्यूशन पढ़ाने या पार्ट टाइम जाँब करने की भी सोचते हैं ताकि अपनी पांकेट मनी निकाल सकें और आत्मनिर्भर हो सके।

  कंरियर
आज का टीन मानता है कि कंरियर नहीं तो कुछ नहीं। हमें अपनी अलग पहचान बनानी है। जो हमारे बाप-दादाओं ने किया वह उनका अपना था, हमें कुछ करना है, बैठकर नहीं खाना, कमाना भी है। और कमाना ही नहीं है बल्कि अपना अलग स्टेटस भी बनाना है। किस पढ़ाई से, किस कोर्स से क्या लाभ है उसे कब और कहाँ से करना है, सबके बारे में जागरूक है।

  मैरेज
यह उम्र घोर आकर्षण की होती है, जिसमें टीन अपने से विपरीत लिंगी की ओर आकृष्ट होता है। वह साथी के साथ की अधिक से अधिक इच्छा रखता है, लेकिन शादी कर के खुद को बाँधना नहीं चाहता। टीन्स का मानना है कि विवाह के बाद इंसान कि 'लाइफ ब्लांक' हो जाती है और लम्बे समय तक किसी के पार्टनर के साथ परमानेंटली रहना, उन्हें गवारा नहीं। इसलिए एक तौर पर वह विवाह जैसे संस्कार से बचना चाहते है और टेंशन फ्री लाइफ जीना चाहते हैं और यदि वह भविष्य में विवाह की इच्छा रखते है तो केवल इस कारण से कि 'ऐसा घर-परिवार एवं समाज में सदियों से होता आया है। इसलिए उन्हें भी करनी पड़ेगी' वरना विवाह उनकी कोई निजी पसंद नहीं है।

  सेक्स
सेक्स के प्रति टीन-एजर्स का रवैया बहुत बदला है। उनकी सोच इसके प्रति सकारात्मक हुई है। वह सेक्स को मूड फ्रेश का जरिया मानते हैं। विवाह से पूर्व सेक्स इनकी नजर में साधारण है। सच तो यह है टीन्स की नजर में प्यार, जवानी और सुख की यही परिभाषा है। वह मानते हैं सेक्स प्यार को इजहार करने का तरीका है। सच तो यह है टीन्स की फेंटसी का सेक्स एक अहम हिस्सा है।
सेक्स का अधूरा व गलत ज्ञान बच्चों को भटका सकता है। सेक्स से सम्बंधित जिज्ञासाओं का शांत होना बहुत जरूरी है। इस बात को टीन्स समझते हैं तभी तो अपने अध्यापकों एवं परिवार वालों के समक्ष इस विषय पर खुलकर बात कर लेते हैं।

  धर्म-अध्यात्म
धर्म एवं अध्यात्म की बातें टीन्स के गले कुछ कम ही उतरती है। उनका मानना है पूजा-पाठ, मन्दिर-तीर्थ आदि सब बुजुर्गों का काम है। मन्दिर एवं पूजा-पाठ में यदि थोड़ा बहुत रूझान भी है तो वह या तो घरवालों के आग्रह के कारण या फिर भगवन के भय के कारण। वरना आज का टीन हर चीज का वैज्ञानिक आधार जानना चाहता है। किसी भी कर्मकांड को तभी करने में विश्वास करता है जब वह उसे अपने अनुभव में ले लेता है। चमत्कार और जादू में कम ही विश्वास करता है।

  परंपरा- संस्कृति
आज का टीन लकीर का फ़कीर नहीं है। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सदियों से परम्परा के नाम पर क्या और क्यों चला आ रहा है। सच तो यह है उसका आकर्षण भारतीय संस्कृति से ज्यादा पाश्चात्य संस्कृति की ओर अधिक है। वह उनकी परम्परा को अपनाना अपनी शान समझता है। भारत की परम्परा उसे पिछडी, पुरानी और दकियानूसी लगती है।
रीति-रिवाजों को निभाना आज के टीन्स महज एक सिरदर्दी समझते हैं। उन्हें यह सब व्यर्थ का दिखावा लगता है। टीन्स का मानना है कि कोई भी काम तब करना चाहिए जब मन हो या फिर जरूरी हो। आपसी होड़ या चलन के नाम पर या फिर 'लोग क्या कहेंगे' इस भय से परम्पराओं को निभाया गलत है।

  लाइफ स्टाइल  
आज के टीन-एजर्स को सिंपल लाइफ पसंद नहीं। वह हर चीज में स्टाइल और ग्लैमर चाहते हैं। फिर खाना-पीना हो या रहन-सहन। साधारण और सहज रहना जैसे उन्हें पसंद ही नहीं। हर चीज को कम समय में, जल्दी करना इनकी आदत होती है। हर परिश्रम का शीघ्र परिणाम चाहते हैं। ध्यान और योग नहीं डिस्को और शाँपिंग पसंद होता है इन्हें। घर बैठना या एक जगह टिककर बैठना इन्हें पसंद नहीं होता। रिश्तेदारों एवं घरवालों से ज्यादा प्रिय इन्हें अपने दोस्त होते हैं।
खतरों से खेलना व हैरत-अंगेज काम करना, नियमों को ताड़ना या कहना न मानना इन्हें अच्छा लगता है। टीन्स भोजन भी फास्ट फ़ूड चाहते हैं। पूरी दुनिया को इंटरनेट और मोबाइल के जरिया अपनी मुठ्टी में करना चाहते हैं। बाइक की माँडिफिकेशन हो या उसकी स्पीड दोनों को ही टीन्स  युवा होने की पहचान बताते हैं। स्कूटर या साईंकिल को चलाना तो अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। जल्दी सोने-उठने के बजाये यह देर से सोना-उठना पसन्द करते हैं।

  देश प्रेम  
जहाँ कभी देश के युवा या टीन्स देशभक्ति की भावना से लबरेज होते थे, वहीं आज के टीन्स ठीक उसके विपरीत हैं। उन्हें न तो देश की फिक्र है, न ही देशवासियों की। समाज व देश के प्रति उनके क्या कर्त्तव्य एवं जिम्मेदारियां हैं यह जानना तो दूर की बात है अपने देश का राष्ट्रगान तक उन्हें याद नहीं।
यदि आज का टीन राजनीति से लगाव रखता भी है तो सिर्फ भविष्य में सत्ता पाने के लिये, देश व देश की समस्याओं से उसे कोई सरोकार नहीं और तो और आज का अमूमन हार पढ़ा-लिखा टीन पढ़-लिखकर भविष्य में विदेश में ही सेटल होने का ख्वाब देखता है।

20 सितंबर 2010

फूलों में छिपा है प्यार ( Flowers love lies )


लाब केवल सौंदर्य का ही प्रतीक नहीं, अपितु प्रेम, समर्पण, पवित्रता, संवेदना, आशक्ति आदि का भी प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि प्यार के प्रतीक इस फूल की रचना यूनान की देवी क्लारिस ने की। आज हर देश और जाती के लोग इसको अपने से दूर नहीं कर पाए हैं, बल्कि बंधे हुए हैं।

लाल गुलाब
लाल गुलाब सच्चे प्रेम का प्रतीक है। इसे भेंट करने का अर्थ है सामने वाला आपको प्रेम का प्रस्ताव दे रहा है। अगर वह कली दे रहा/रही है तो इसका मतलब है कि वह बता रहा/रही है कि आप बहुत सुन्दर, पवित्र और प्यारे/प्यारी हैं।

सफ़ेद गुलाब
जब कोई किसी को सफ़ेद गुलाब देता है तो इसका अर्थ होता है कि सामने वाले क प्यार आपके लिये पवित्र है। सफ़ेद फूल देकर सामने वाला यह दर्शाता है कि उसका प्यार सच्चा व निर्भय है, उसमें किसी भी तरह क कोई छल-कपट नहीं है। अगर लाल किनारी का फूल भेंट करते हैं तो वह एकता का परिचायक है।

पीला गुलाब
यह दोस्ती का फूल है। जब कोई इसे देता है तो इसका मतलब है कि वह आपसे अच्छी फ्रेंडशिप रखने का इच्छुक है। साथ ही यह खुशी और प्रसन्नता की भाषा को प्रकट करता है।

गुलाबी गुलाब
गुलाबी गुलाब भेंट करने का अर्थ है कि सामने वाला आपकी सराहना कर रहा है कि आपने जो काम किया है वह काफी अच्छा है। मैं आपका आभारी हूँ। वह अपनी भावना का इजहार भी करता है। अगर हल्का गुलाबी गुलाब देता है तो इसका मतलब है कि उसको आपसे सहानुभूति है।

नारंगी गुलाब
नारंगी गुलाब देने का मतलब होता है कि मेरा प्यार अनंत, असीमित है, जिसकी कोई सीमा नहीं है और न ही जिसका कोई अंत है।

काला गुलाब
काला गुलाब देने का मतलब है यदि आप किसी से प्रेम या दोस्ती कायम रखना नहीं चाहते हैं, लेकिन सामनेवाले को मंजूर है अथवा वह इसे जारी रखना चाहता है, परन्तु कहने में हिचकिचाता है तो काला गुलाब दिया जाता है।

घर कि शोभा मनीप्लांट ( Home Beauty : Moneyplant )


धुनिक समय में दिन भर की बढ़ती भागदौड़ एवं बढ़ती व्यवस्था में यह आवश्यक भी है कि थोड़ा सा समय पेड़-पौधों को भी दें। बढ़ते शहरीकरण के कारण जमीन का दिनोंदिन अभाव हो रहा है, ऐसी स्थिती में हरे सुन्दर व आकर्षक सजावटी पौधों की श्रेणी में मनीप्लांट एक ऐसा पौधा है जो बड़ी-बड़ी कोठियों, बंगलों, अधिकारियों के कार्यालयों एवं घरों के ड्राइंग रूम की शोभा बढाता है।

मनीप्लांट इस पौधे का लोकप्रिय नाम है। इसका वानस्पतिक नाम पोथांस स्कैंडेंस है। यह पौधा अरेसी फैमली का है। अब इसको शेफिडोफोरा ओरियस के नाम से भी जाना जाता है। मनीप्लांट के पौधे कलम, दाब अथवा संकर्स द्वार तैयार किये जाते हैं। इन पौधों को किसी भी प्रकार के गमलों, लटकती टोकरियों अथवा कांच या प्लास्टिक की बोतलों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यह पौधा आंशिक छायादार स्थान से लेकर धूप वाले स्थानों पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

इस पौधे की विशेषता है कि यह पौधा केवल पानी मात्रा में आसानी से वृद्धि कर लेता है। साथ ही बिजली के बल्ब की रोशनी मात्र में यह आसने से बढ़ता है।

किस्में : मनीप्लांट की मुख्य रूप से 5 किस्में लोकप्रिय है।
गोल्डन क्वीन : यह हलके पीले धब्बों वाली सुन्दर लोकप्रिय किस्म है।
मार्बल क्वीन : यह सफ़ेद सुन्दर पत्तों वाली हलके हरे धब्बों से युक्त सुन्दर किस्म है।
सिल्वार्मून : इस किस्म के पत्ते चांदी जैसे चमकीले क्रीम रंग के आकर्षक धब्बों वाले होते हैं।
ग्रीन ब्यूटी : इस किस्म के पत्ते चिकते गहरे रंग के होते हैं
मैकरोफिला : इस किस्म के पत्ते काफी बड़े आकार के होते हैं। यह भी एक लोकप्रिय किस्म है। इसे पोथास मैकरोफिला कहते हैं।

कहाँ उगाएं : मनीप्लांट की वृद्धी के लिये हल्की रेतीली उपजाऊ एवं नमी युक्त मिट्टी अच्छी रहती है। इसके पौधे आंशिक छायादार स्थानों जहाँ पर शुद्ध हवा का आवागमन हो अच्छी प्रकार उगाए जा सकते हैं। पीली एवं सूखी पट्टियों एवं टहनियों को हटाने के लिये समय-समय पर कांट-छांट करते रहना चाहिए।

कब लगाएं पौधे : इसके पौधे मार्च अथवा जुलाई माह में लगाना उपयुक्त रहता ही। यदि मिट्टी में लगाना हो तो एक फीट व्यास के डेढ़ फुट गहरे गधे खोद लें। उसमें एक टोकरी गोबर की सड़ी खाद डाल दें। यदि पौधे गमले में लगाने हों तो गमले में आधा भाग मिट्टी एवं आधा भाग गोबर की खाद को मिला लें। पौधों को बारहमास पानी देते रहें। इन पौधों को घर के उत्तर दिशा में लगाना ठीक रहता है। अन्यथा गर्मी के मौसम में पानी देने की कठिनाई आ सकती है। पानी न मिलने पर पौधे झुलस भी सकते हैं।

मनीप्लांट एक ऐसा पौधा है जिस पर कोई रोग नहीं लगता है। यह पौधा आपके घर की सुन्दरता में चार चाँद लगा देगा।

मिक्स फू्रट पल्प

सामग्री- 2 कप पपीते के टुकड़े, 1 केला, 2 चीकू, आधा कप संतरे का रस, 2 बड़े चम्मच नींबू का रस, आधा कप चीनी, 750 मिली। सोडा वाटर, आवश्यकतानुसार आइस क्यूब्स।
विघि- पपीता, चीकू व केले की एक साथ प्यूरी तैयार करें। चीनी में आधा कप पानी मिलाकर घोलें। इसे छानकर संतरे व नींबू के रस में मिला दें। इसे तैयार फ्रूट प्यूरी में मिला दें। ठंडा होने के लिए रेफ्रीजरेटर में रखें। सोडा वाटर व आइस क्यूब्स डालकर सर्व करें।

15 सितंबर 2010

गायत्री उपासना हम सभी के लिये अनिवार्य ( Gayatri Worship is greatful for us )

यत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक का समस्त दिवय ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर शक्तियों, सिद्घियों के प्रतीक है । गायत्री उपासना करने वाले साधक की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है ।

गायत्री वेदमाता है एवं मानव मात्र का पाप का नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिये भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिये भी एक मात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु कीर्ति, धन एवं ब्रहमवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गये है, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते है ।

भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिये । विधिपूर्वक की गई उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय इक्कीसवीं सदी का ब्रहम मुहूर्त है । आगतामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगें । युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री के तत्वदर्शन को जन-जन तक पहुँचाया व उसे जन-सुलभ बनाया । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पय पान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है, सबके लिये उसकी उपासना-साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है ।

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकांडों के साथ की गई उपासना अति फलदायी मानी गई है । तीन माला नायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत होकर नियत स्थान, नियत समय पर सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहियें ।

उपासना का विधि विधान इस प्रकार है

ब्रह्म संध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिये की जाती है । इसके अन्तर्गत पाँच कृत्य करने पड़ते है ।

पवित्रीकरण – बाँए हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक लिया जाए । पवित्रीकरण का मंत्रोच्चारण किया जाए । तदुपरांत उस ज को सिर तथा शरीर पर छिड़क लिया जाये ।

ऊँ अपवित्रः पवित्रोवा, सर्वावस्थां गतोडपि वा ।
यः स्मरेत्पुणडरीकाक्षं, स बाहृाभ्यन्तरः शुचिः ।।
ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु ।

आचमन – वाणी, मन व अन्तःकरण की शुद्घि के लिये चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाये ।

ऊँ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।। 1 ।।
ऊँ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।। 2 ।।
ऊँ सत्यं यशः श्रीर्मयि, श्रीः श्रयतां स्वाहा ।। 3 ।।

शिखा स्पर्श एवं विंदन – शिखा के स्थान को भीगी पाँचों अंगुलियों से स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सदविचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें ।

ऊँ चिदरुपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्घि कुरुष्व मे ।।

प्रणायाम – श्वास को धीमी गति से बाहर से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के कृत्य में आता है । श्वांस खींचने के साथ भावना करें कि प्राणशक्ति की श्रेष्ठता श्वांस के द्घारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वांस के साथ बाहर निकल रहे है । प्राणायाम, मंत्र के उच्चारण के बाद किया जाये ।

ऊँ भूः ऊँ भुवः ऊँ स्वः ऊँ महः ऊँ जनः ऊँ तपः ऊँ सत्यम् । ऊँ भूर्भवः स्वः त्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ऊँ आपोज्योतीरसोडमृतं, ब्रहम भूर्भऊवः स्वः ऊँ ।

न्यास – इसका प्रयोजन है – शरीर के सभी महत्तवपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देवपूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाँयें हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों को उसमें भिगोकर बताए गये स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।

ऊँ वाड.मे आस्येडस्तु (मुख को)
ऊँ नसोर्मेप्राणोडस्तु (नासिका के दोनो छिद्रों को)
ऊँ अक्ष्णोर्मेचक्षुरस्तु (दोनों नेत्रों को)
ऊँ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ऊँ बाहृोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ऊँ ऊर्वोर्मे ओजोडस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ऊँ अरिष्टानि मेड़्रानि, तनूस्तन्वा में सह सन्तु (समस्त शरीर को)

आत्मशोधन की ब्रहम संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्घि होतथा मलिनाता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र प्रखर व्यक्ति ही भगतवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते है ।

देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतंभरा गायत्री है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की भावना के अनुरुप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापिर हो रही है ।

ऊँ आयातु वरदे देवि । त्र्यक्षरे ब्रहमवादिनि ।
गायत्रिच्छन्दसां मातः, ब्रहृयोने नमोडस्तु ते ।। 3 ।।
श्री गायत्र्यै नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।
ततो नमस्कारं करोमि ।

गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सदगुरु के रुप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिनन्दन करते हुए उपासना की सफलता हेतु प्रार्थना के साथ गुरु आवाहन् निम्न मंत्रोच्चर के साथ करें ।

ऊँ गुरुब्रर्हमा गुरुविष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः ।
गुरुरेव परब्रहृ, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। 1 ।।
अखन्डमणडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। 2 ।।
मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका ।
नमोडस्तु गुरु सत्तायै, श्रद्घा-प्रज्ञायुता च या ।। 3 ।।
ऊँ श्री गुपवे नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, धयायामि ।

माँ गायत्री व गुरुसत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापना हेतु पंचोपचार पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेघ प्रतीक के रुप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते है । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पांचों को समर्पित करते चलें । जल का अर्थ है – नम्रता, सहृदयता । अंक्षत का अर्थ है – समयदान, अंशदान । पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता, आंतरिक उल्लास । धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य परमार्थ तथा नैवेघ का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता, शालीनता का समावेश ।

ये पांचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिये किये जाते है । कर्मकांड के पीछे भावना महत्वपूर्ण है ।

3. जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पन्द्रह मिनट नियमित रुप से किया जाये, अधिक बन पड़े तो अधिक उत्तम । होंठ हिलते रहे, किंतु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप प्रकि्या कषाय-कल्मषों-कसंस्कारों को धोने के लिये की जाती है ।
ऊँ भूर्भवः स्वः त्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए भावना की जाए कि हम निरंतर पवित्र हो रहे है । दुर्वुद्घि की जगह सदबुद्घि की स्थापना हो रही है

4. ध्यान - जप तो अंग अवयव करते है, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रुप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों के शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्घा-प्रज्ञा निष्ठा रुपी अनुदान उतरने की मान्यता परपक्व की जाती है । जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस कृत्य का महत्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।

5. सूर्याध्र्यदान – जप समाप्ति कके पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्घ्य रुप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है ।

ऊँ सूर्यदेव । सहस्त्रांशो, तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्तया, गृहाणार्घ्य दिवाकर ।।
ऊँ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः ।।

भावना यह करें कि जल आत्मसत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट ब्रहृ का तथा हमारी सत्ता-संपदा समष्टि के लिये समर्पित विर्सजित हो रही है ।

नमस्कार एवं विसर्जन – इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर विदाई के लिये करबद्घ नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख लिया जाये । जप के लिये माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिये । सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है । मौन मानसिक जप चौबीस घंटे कभी किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें ।

ऊँ घौः शान्तिरन्तरिक्ष ऊँ शान्तिः, पृथिवि शान्तिरापः, शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्र्वेदेवाः, शान्तिब्रर्हशान्तिः, सर्व ऊँ शान्तिः, शान्तिरेवः, सा मा शान्तिरेधि ।। ऊँ शान्तिः, शान्तिः, शान्ति । सर्वारिष्ट-सुशान्तिभर्वतु ।।