गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मेरी कोई शक्ति इस धरा धाम पर अवतार लेकर भक्तों के दु:ख दूर करती है और धर्म की स्थापना करती है। अंजनी कुमार श्री बाला जी घाटा मेहंदीपुर में प्रादुर्भाव इसी उद्देश्य से हुआ है। घाटा मेहंदीपुर में भगवान महावीर बजरंगबली का प्रादुर्भाव वास्तव में इस युग का चमत्कार है। राजस्थान राज्य के दो जिलों सवाईमाधोपुर दौसा में विभक्त घाटा मेहंदीपुर स्थान बड़ी लाइन बांदी कुई स्टेशन से जो कि दिल्ली, जयपुर, अजमेर अहमदाबाद लाइन पर 24मील की दूरी पर स्थित है। अब तो हिण्डौन, आगरा, कानपुर, मथुरा, वृंदावन,दिल्ली जयपुर, अजमेर अहमदाबाद लाइन पर 24मील की दूरी पर स्थित है। अब तो हिण्डौन, आगरा, कानपुर, मथुरा, वृन्दावन, दिल्ली आदि से जयपुर जाने वाली सभी बसें बालाजी मोड़ पर रुकती है। यहां तीनों देवों की प्रधानता है। श्री बालाजी महाराज श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल (भैरव) यह तीन देव यहां आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे। इनके प्रकट होने से लेकर अब तक बारह महंत इस स्थान पर सेवा पूजा कर चुके हैं जिनमें अब तक इस स्थान के दो महंत इस समय भी विद्यमान हैं। किसी शासक ने श्री बाला जी महाराज की मूर्ति को खोदने का प्रयत्न किया, सैकड़ों हाथ खोद देने के बाद भी जब मूर्ति के चरणों का अंत नहीं पाया तो वह हार मानकर चला गया। वास्तव में इस मूर्ति को अलग से किसी कलाकार ने गढ़कर नहीं बनाया है, अपितु यह तो पर्वत का ही अंग है।
यह समूचा पर्वत ही मानो उनका कनक मूधराकार शरीर है। इस मूर्ति के चरणों में एक छोटी सी कुडी थी जिसका जल कभी भी खत्म नहीं होता था, यह रहस्य है कि महाराज की बायीं छाती के नीचे एक बारीक जल धारा बहती रहती है, जो पर्याप्त चोला चढ़ जाने के बाद भी बन्द नहीं होती है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मूर्ति के अतिरिक्त किसी व्यक्ति विशेष का कोई चमत्कार नहीं है। यहां प्रमुख है सेवा और भक्ति।
22 जून 2010
मेहंदीपुर के श्री बालाजी महाराज
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Posted by Udit bhargava at 6/22/2010 09:29:00 pm 0 comments
प्यार में इकरार से डरता है दिल?
ज़िंदगी में किसी न किसी मोड़ पर हर व्यक्ति प्यार की महक महसूस करता है। प्यार तो सभी करते हैं, लेकिन खुशनसीब लोगों को ही अपनी मंज़िल मिल पाती है। अगर आप भी किसी को मन ही मन पसंद करती हैं, लेकिन उनसे अपनी चाहत का इज़हार करने से डरती हैं तो इन टिप्स को आप क्यों नहीं आज़माती? हो सकता है आपकी झिझक दूर हो जाए और जिसको आप हमसफर बनाना चाहती हों, वह आपकी चाहत को कबूल कर ले।
पसंद-नापसंद
आप जिसे चाहती हैं, उनसे मिलने से पहले उनकी पसंद और नापसंद जान लें। ऐसे में जब आपकी उनसे पहली मुलाकात होगी तो आप उनकी पसंद के मुद्दों पर ही उनसे बात कर सकेंगी और उनके आपकी ओर आकर्षित होने के चांस पूरे होंगे।
जवाब का इंतज़ार करें
आपने पहली मुलाकात में उन्हें इंप्रेस कर लिया है तो अब उन्हें मौका दें। कुछ पुरुषों को लड़कियों की ओर से पीछा किया जाना ठीक नहीं लगता। इसलिए अब आप उन्हें फॉलो न करें, बल्कि उनकी ओर से जवाब का इंतज़ार करें।
डोंट वरी, बी हैपी
लड़कियां हमेशा इस बात को लेकर परेशान रहती हैं कि वह जो कर रही है क्या वह सही है? अगर आप किसी को पसंद करती हैं तो ऐसी स्थिति में केवल दो ही तरह की बातें हो सकती हैं। आप जिसे प्रपोज़ कर रही हैं, वह एकदम मान जाए या उसके लिए आपको कुछ मेहनत करनी पड़े। दोनों ही हालत में वह आपके साथ ही होंगे इसलिए बेकार में परेशान न हों।
Labels: प्रेम गुरु
Posted by Udit bhargava at 6/22/2010 08:11:00 pm 0 comments
लड़के-लड़कियों को सेक्स एजुकेशन अलग-अलग
सेक्स एजुकेशन के बाबत जानकारी देने के लिए को-एजुकेशनल स्कूलों में जल्द ही लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग क्लास होगी। यह क्लास हफ्ते में एक बार 30 मिनट की होगी।
छात्रों को मेल टीचर और छात्राओं को फीमेल टीचर सेक्स एजुकेशन के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे। क्लास में स्टूडंट्स को यह बताया जाएगा कि सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इनफेक्शन (एसटीआई) क्या होता है, इसके लक्षण क्या होते हैं, एचआईवी कैसे फैलता है, क्या एचआईवी से बचने के लिए संयम एक बेहतर विकल्प है, इस खतरनाक बीमारी से बचने के लिए क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि देश की पहली आधिकारिक सेक्स एजुकेशन मैनुअल में इस बीमारी की रोकथाम के बाबत कुछ अहम सुझाव दिए गए हैं। इन सुझावों पर लोग अगस्त तक अपनी राय दे सकते हैं। उम्मीद है कि इस मैनुअल (नियमावली) को अक्टूबर तक अंतिम रूप दे दिया जाएगा।
बहरहाल, टीचरों से कहा गया है कि वे स्टूडंट्स से कुछ नई बीमारियों के नाम पूछें। जब स्टूडंट एचआईवी/एड्स का जिक्र करेंगे तभी टीचर इस बीमारी के बारे में चर्चा शुरू करेंगे। इस दौरान टीचर यह बताएंगे कि किस तरह से वायरस की उत्पत्ति होती है, महिलाओं और बच्चों को प्रभावित होने का ज्यादा खतरा क्यों रहता है और किस तरह से यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के शरीर में पहुंचता है।
ऐसा भी हो सकता है कि जब क्लास में इतने अहम विषय पर टीचर जानकारी दे रहे हों तब बच्चे इसे हंसकर टाल दें अथवा इसे गंभीरता से न लें। लेकिन, टीचर की बातों पर ध्यान देना ही बेहतर है क्योंकि मैनुअल के मुताबिक, टीचरों को हिदायत दी गई है कि क्लास समाप्त होने के बाद वे स्टूडंट्स से सवाल करें ताकि जो जानकारी उन्हें दी गई वह बेकार न जाए।
Labels: सेक्स रिलेशन
Posted by Udit bhargava at 6/22/2010 08:07:00 pm 0 comments
महाभारत - दुर्योधन को शाप
पाण्डवगण दुर्योधन से अपमानित होकर हस्तिनापुर के वर्द्धमानपुर वाले द्वार से निकल कर उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करने लगे। हस्तिनापुर की प्रजा भी रोती-बिलखती उनके पीछे-पीछे चल रही थी। जब प्रजा उनके साथ बहुत दूर तक आ गई तो अत्यन्त कठिनाई से युधिष्ठिर ने उन्हें समझा-बुझा कर नगर वापस भेजा। सन्ध्याकाल तक वे गंगा के तट तक पहुँच गये। रात्रि उन्होंने गंगा तट पर ही एक विशाल वट वृक्ष के नीचे व्यतीत की। प्रातःकाल होने पर यधिष्ठिर की भेंट शौनक ऋषि से हुई। शौनक ऋषि ने युधिष्ठिर से कहा, "हे धर्मराज! मैं जानता हूँ कि आप लोग बारह वर्ष के वनवास तथा एक वर्ष के अज्ञातवास के लिये निकले हैं। इस अवधि को सुगम बनाने के लिये मेरी सलाह है कि आप भगवान सूर्य की उपासना करें।" इतना कह कर वे चले गये।
धर्मराज युधिष्ठिर ने पुरोहित धौम्य से सूर्य के एक सौ आठ नामों का वर्णन करते हुये सूर्योपासना की विधि सीखी और सफलतापूर्वक भगवान सूर्य की आराधना की। उनकी उपासना से प्रसन्न हो कर भगवान सूर्य ने उन्हें दर्शन दिया और कहा, "हे पाण्डवश्रेष्ठ! तुमने मेरी अति उत्तम उपासना की है। तुम्हारी उपासना से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें यह अक्षयपात्र प्रदान कर रहा हूँ। इस अक्षयपात्र से तुम्हारी गृहणी समस्त प्रकार के भोज्य पदार्थ प्राप्त कर पायेगी, जिससे वह ब्राह्मणों, भिक्षुकों आदि को भोजन कराने के पश्चात् तुम लोगों की क्षुधा शांत करने में सर्वदा समर्थ रहेगी। किन्तु द्रौपदी के भोजन कर लेने के पश्चात् इस पात्र की क्षमता दूसरे दिन तक समाप्त हो जाया करेगी तथा दूसरे दिन इस पात्र की भोजन प्रदान करने की क्षमता पुनः वापस आ जाया करेगी।" इतना कहकर सूर्य नारायण ने युधिष्ठिर को ताम्र से बना वह अक्षयपात्र प्रदान किया और अन्तर्ध्यान हो गये।
इधर पाण्डवों के वनगमन के पश्चात् धृतराष्ट्र को बड़ी व्याकुलता हुई। धृतराष्ट्र पाण्डवों की भलाई तो चाहते थे किन्तु उनका मोह अपने दुष्ट, अन्यायी तथा अत्याचारी पुत्रों के प्रति अधिक था और वे सदा दुर्योधन के वश में रहते थे। इस प्रकार की मनोस्थिति के कारण धृतराष्ट्र की बुद्धि कभी स्थिर न हो पाती थी। उन्होंने विदुर को बुला कर कहा, "विदुर! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे कौरवों और पाण्डवों में मित्रता हो जाये?" विदुर ने उत्तर दिया, "धर्म और न्याय के आचरण से ही अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फल प्राप्त होते हैं। किन्तु आपके पुत्र अधर्मी और अन्यायी हैं, इसलिये पाप से मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है कि आप पाण्डवों को पुनः वापस बुलवा कर उन्हें उनका राज्य सम्मान के साथ लौटा दें। दुष्ट शकुनि को गान्धार वापस भेज दें और यदि दुर्योधन आपकी आज्ञा की अवहेलना करे तो उसे भी बन्दीगृह में डाल दीजिये।" विदुर के वचनों को सुन कर धृतराष्ट्र क्रोधित होकर बोले, "विदुर! तुम सदैव पाण्डवों के हित और मेरे पुत्रों के अनिष्ट की बातें करते हो। दूर हो जाओ मेरी दृष्टि से।"
धृतराष्ट्र के कठोर वचन सुन कर विदु वहाँ से वन में पाण्डवों के पास आ गये। पाण्डवगण सदैव विदुर को पूज्य, सम्माननीय तथा अपना हितचिन्तक समझते थे और उनकी नीतियुक्त वचनों का पालन किया करते थे। विदुर ने युधिष्ठिर से कहा, "वत्स! मैं चाहता हूँ कि तुम सभी भाइयों में परस्पर प्रेम तथा एकता सदैव बनी रहे क्योंकि इसी के बल पर तुम अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकोगे।" युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर उनके इस उपदेश को स्वीकार किया।
विदुर को कठोर वचन कहने के कुछ दिनों के बाद धृतराष्ट्र को अपने व्यवहार पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने संजय के द्वारा विदुर को वन से वापस बुलवाकर कहा, "विदुर! क्या करूँ, मैं अपने पुत्रमोह को अत्यन्त प्रयास करने के पश्चात् भी नहीं छोड़ सकता और न ही तुम्हारे बिना जीवित रह सकता हूँ। मुझे अपने कहे गये कठोर वचनों के लिये अत्यन्त दुःख है।" धृतराष्ट्र के पश्चाताप को देख कर विदुर ने उन्हें क्षमा कर दिया।
इधर पाण्डवों को वन में निरीह, निहत्था तथा सेनारहित जानकर कौरवों ने उन्हें मार डालने की योजना बना कर एक विशाल सेना का संगठन कर लिया और पाण्डवों से युद्ध करने का अवसर खोजने लगे। दुर्योधन द्वारा तैयार किये गये इस योजना में उनके परम मित्र कर्ण का भी समर्थन था। योगबल से उनकी योजना के विषय में वेदव्यास को ज्ञात हो गया और धृतराष्ट्र के पास आकर उन्होंने कहा, "धृतराष्ट्र! तुम्हारे पुत्रगण पाण्डवों को वन में मार डालने की योजना बना चुके हैं। आप उन्हें रोकें अन्यथा कौरवों का शीघ्र नाश हो जायेगा।" इस पर धृतराष्ट्र बोले, "हे महर्षि! उस दुर्बुद्धि दुर्योधन को आप ही समझायें।" वेदव्यास ने उत्तर दिया, "वत्स! मैं तुम्हारे अन्यायी और अत्याचारी पुत्रों का मुख नहीं देखना चाहता, अतः मैं जा रहा हूँ। अभी यहाँ पर मैत्रेय ऋषि आने वाले हैं। तुम उन्हीं से प्रार्थना करना कि वे तुम्हारे पुत्रों को समझायें।"
कुछ काल पश्चात् मैत्रेय ऋषि वहाँ पधारे। धृतराष्ट्र के द्वारा यथोचित सत्कार प्राप्त करने के पश्चात् वे बोले, "राजन्! मैं अभी पाण्डवों से भेंट कर के आ रहा हूँ। वहाँ तुम्हारे पुत्रों के द्वारा किये हुये अन्याय और अत्याचार की बात सुनी। भीष्म, द्रोण एवं तुम्हारे जैसे गुरुजनों के होते हुये पाण्डवों के साथ अन्याय हुआ वह कदापि उचित नहीं हुआ।" फिर धृतराष्ट्र की प्रार्थना पर वे दुर्योधन को समझाते हुये बोले, "दुर्योधन! तुम मेरी सलाह मान कर पाण्डवों से सन्धि कर लो और अपने कुल की रक्षा करो।" मैत्रेय ऋषि के वचनों को मानना तो दूर, दुर्योधन उनकी बातें सुन कर जोर जोर से हँसने लगा और अपनी जंघा ठोंक ठोंक कर उनका उपहास करने लगा। दुर्योधन की असभ्यता से मैत्रेय ऋषि क्रोधित हो उठे और बोले, "रे दुष्ट! तू अपनी जंघा ठोंक ठोंक कर मेरा अपमान कर रहा है। मैं तुझे शाप देता हूँ कि युद्ध में भीम तेरी इसी जंघा को अपनी गदा से तोड़कर तुझे और तेरे भाइयों को यमलोक पहुँचायेगा।" इतना कहकर मैत्रेय जी वहाँ से प्रस्थान करने के लिये उठ खड़े हुये। यह देख कर धृतराष्ट्र उनके चरणों में गिर पड़े और अपने पुत्र के अपराध को क्षमा करने की प्रार्थना करने लगे। उनकी इस प्रार्थना पर मैत्रेय ऋषि ने कहा, "धृतराष्ट्र! यदि तुम्हारा पुत्र पाण्डवों से सन्धि कर लेगा तो मेरे शाप का प्रभाव समाप्त हो जायेगा अन्यथा मेरे शाप को पूर्ण होने से कोई नहीं रोक सकता।" इतना कह कर मैत्रेय ऋषि वहाँ से चले गये।
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Posted by Udit bhargava at 6/22/2010 07:30:00 pm 0 comments
20 जून 2010
सुखपूर्वक जीने की कला
वर्तमान में लोग भिन्न-भिन्न कारणों से बहुत दुखी हैं। इसलिये जब उन्हें सूचना मिलती है कि शहर में कोई ऐसा साधु, ज्योतिषी अथवा तांत्रिक आया है, जो दूसरों का दुःख दूर कर सकता है तो वे वहीँ चल पड़ते हैं। परन्तु आजकल सच्चे साधु-संत, ज्योतिषी या तांत्रिक प्राय: मिलते नहीं। जो मिलते हैं, वे केवल पैसा कमानेवाले, अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाले ही होते हैं। किसी-किसी की प्रारब्धवश झूठी प्रसिधी भी हो जाती है। किसी बनावटी साधु के पास सौ आदमी अपनी-अपनी कामना लेकर जायं तो उनमें से पच्चीस- तीस आदमियों की कामना तो उनके प्रारब्धके कारण यों ही पूर्ण हो जायेगी। परन्तु वे प्रचार कर देंते कि आमुक साधु की कृपा से, आशीर्वाद से ही हमारी कामना पूर्ण हुई। इस प्रकार बनावटी साधु का भी प्रचार हो जाता है।
परन्तु एक शहर में कोई सच्चे संत आये। वे किसी से कुछ नहीं मांगे। भिक्षा से जीवन-निर्वाह करते हैं। किसी से भी किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं जोड़ते। किसी को चेला-चेली भी नहीं बनाते। जो उनके पास आता है, उसी का दुःख दूर करने की चेष्टा करते हैं। शहर में उनकी चर्चा फ़ैली तो लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। अनेक लोग उन संत के पास इकट्ठे हो गए। कुछ लोग अपना-अपना दुःख सुनाने लगे। संत प्रत्येक श्रोता की बात सुनकर उस का समाधान करने लगे।
एक श्रोता - महाराजजी ! में बहुत दुखी हूँ। मेरा कष्ट कैसे दूर हो?
संत - देखो भाई ! संसार में सुख भी है, दुःख भी। आजतक एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ, जो सदा सुखी रहा हो अथवा सदा दुखी रहा हो। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, वैसे ही सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता ही है। न तो दुःख सदा रहता है, न दुःख. इसलिये घबारो मत। केवल इस सत्य को स्वीकार कर लो कि यह समय सदा ऐसा नहीं रहेगा। रात बीतेगी, दिन आयेगा।
श्रोता - परन्तु वर्तमान में जो दुःख है, वह मुझसे सहन नहीं हो रहा है। कोइ उपाय बताएं।
संत - उसके लिये भगवान् से प्रार्थना करो। व्याकुल होकर भगवान् को पुकारो। उन्हें पुकारने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।
श्रोता - में भगवान् से प्रार्थना करता हूँ, पर वे सुनते ही नहीं!
संत - ऐसी बात नहीं है।
सच्चे ह्रदय से प्रार्थना जब भक्त सच्चा गाय है।
तो भक्तवत्सल कान में वह पहुँच झट ही जाय है।।
भगवान् तो सबके ह्रदय में बैठे हैं। वे आपकी प्रत्येक प्रार्थना सुनते हैं।
भगवान् वही कार्य करते हैं। जिससे परिणाम में मनुष्य का हित हो।
भगवान् श्री कृष्ण पांडवों के मित्र थे। द्रौपदी के पुकारते ही वे प्रकट हो जाते थे। फिर भी पांडवों को कितना कष्ट भोगना पडा! तुम्हारा काम है कि उन्हें पुकारो!
'हरिस्मृति: सर्वविपद्वीमोक्षणं'
'भगवान् की स्मृति समस्त विपत्तियों से मुक्त कर देती है।'
अन्य श्रोता - भगवान् दुःख देते क्यों हैं?
संत - भगवान् के पास दुःख है ही नहीं, फिर वे दुःख देंगे कैसे? दुःख तो तुम्हारा अपना पैदा किया हुआ है।
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फ़लु चाखा॥
भगवान् तो तुम्हारे किये कर्मों का फल भुग्ताकर तुम्हें शुद्ध कर रहें हैं, मुक्त कर रहे हैं। भगवान् आनंददाता हैं, दुखदाता नहीं। वे तो तुम्हें दुखों से छुडाना चाहते हैं। परन्तु तुम उनसे विमुख होकर संसार में लगे हो, जो दुखालय है, दुखों का घर है। अब भैया, तुम ही सोचो, तुम्हारा दुःख दूर कैसे होगा?
दुःख भगवान् द्वारा बनायी सृष्टि में नहीं है, अपितु जीव द्वारा बनायी सृष्टि (मैं- मेरापन) में हैं। यदि जीव मैं-मेरापन मिटा दे तो दुखों की जड़ ही कट जायेगी। परमश्रधेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज कहते थे कि त्याग से सुख मिलता है - यह अटकल लोगों को आती नहीं, तभी वे दुःख पाते हैं। दुःख से बचने का उपाय सुख नहीं है, अपितु त्याग है।'
अन्य श्रोता - महाराज ! मेरे व्यापार में निरंतर घाटा लग रहा है! आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी है। क्या करूं?
संत - रुपयों के अभाव को हम रुपयों से मिटा लेंगे- इसके समान कोई मूर्खता नहीं है! तुम प्रयत्न मत छोड़ो। पर भैया ! मिलेगा वही, जो तुम्हारे भाग्य में लिखा है। जो तुम्हें मिलने वाला है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा। उस कोई दूसरा छीन सकता ही नहीं। एक लोटेको चाहे तालाब में डुबाओ, चाहे समुद्र में, जल लोटा भर ही निकलेगा।
जब दांत न थे तब दूध दियो,
अब दांत भये कहा अन्न न दैहैं।
जीव बसे जल में थल में,
तिन की सुधि लेई सौ तेरीहु लैहैं।।
जान को देत अजान को देत,
जहान को देत सौ तोहूँ कूँ दैहैं।
काहे को सोच करैं मन मूरख,
सोच करै कछु हाथ न ऐहैं।।
श्रोता - लडकियां बड़ी हो रही हैं। भविष्य में उनका विवाह भी करना है! कैसे होगा?
संत - इसके लिये चेष्टा करो, पर चिंता मत करो -"होइहि सोई जो राम रची राखा'। लडकियां केवल तुम्हारे प्रारब्धपर ही निर्भर नहीं हैं। उनका अपना भी प्रारब्ध है। इसलिए समय आने पर उनके प्रारब्ध के अनुसार जो मिलना है, वह अवश्य मिलेगा और उनका विवाह हो जायेगा।
अन्य श्रोता - बेटा मेरे प्रतिकूल चलता है। मेरी बात बिल्किल नहीं मानता।
संत - ऐसा समझो कि वह तुम्हारे पूर्वजन्म का बाप है! उसकी बात यदि अनुचित न हो तो मान लो। तुम्हें जो बात उचित दीखे, वह उससे कह दो। अब वह माने या न माने, उसकी मर्जी। यह आग्रह छोड़ दो कि वह मेरी बात माने।
जो पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान।
क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान।।
भैया ! जब वह तुम्हारी बात मानता ही नहीं, तो फिर उसे अपना बेटा मानते ही क्यों हो? उसे अपना न मानकर भगवान् का मान लो, उसे भगवान् के अर्पण कर दो।
अन्य श्रोता - मैंने अपने रिश्तेदारों की समय पर बहुत सहायता की। पर अब वे मेरे विरुद्ध चलते हैं। वे दूसरों के आगे मेरी निंदा करते हैं और मेरे बारे में झूठी-झूठी बातें फैलाते हैं।
संत - तुम उनकी तरफ न देखकर अपने को देखो कि कहीं तुमसे कोइ गलती तो नहीं हुई है। यदि अपनी कोई गलती दीखे तो उसे दूर कर दो, और यदि अपनी कोई गलती न दीखे तो फिर दुखी होने की कोई जरूरत नहीं, प्रसन्न रहो। यह आशा मत रखो कि दूसरे तुम्हारे अनुकूल चलें। दूसरे सब हमारे अनुकूल चलें - यह सम्भव ही नहीं है। बड़े-बड़े संत हुए, भगवान् के अवतार हुए, पर उनके भी सब अनुकूल नहीं हुए।
अन्य श्रोता - महाराज जी ! मैंने सदा दूसरों पर विशवास किया, पर मेरे साथ सदा धोखा ही हुआ है।
संत - विश्वास करने योग्य तो केवल भगवान् ही है। संसार विशवास करने योग्य है ही नहीं। संसार पर विशवास करोगे तो धोखा ही मिलेगा।
संसार साथी सब स्वार्थ के हैं,
पक्के विरोधी परमार्थ के हैं।
देगा न कोइ दुःख में सहारा,
सुन तू किसी की मत बात प्यारा।
X X X
सच्चा मित्र और जन्म का साथी ईश्वर सर्वाधार,
राधेश्याम शरण चल उसकी, तब तो बड़ा पार,
दुखी का वही ठीकाना है।
किससे करिए प्यार यार खुदगर्ज ज़माना है।।
संसार सेवा के योग्य है, विश्वास के योग्य नहीं। उसकी सेवा कर दो, पर विशवास मत करो।
अन्य श्रोता - महाराजजी ! मेरी कोई संतान नहीं है। मन में चिंता रहती है कि बुढापे में हमारी सेवा कौन करेगा? क्या कोई बालक गोद ले लें?
संत - संसार में देखो, जिनकी संतान है, वे सब सुखी हैं क्या? कई लोग तो अपनी संतान से इतने दुखी हैं कि सोचते हैं, संतान न होती तो अच्छा होता! क्या इस बात का तुम्हें पता है कि संतान होने से तुम सुखी हो ही जाते अथवा बुढापे में तुम्हारी सेवा होती ही? यदि बुढापे में सबकी संतान सेवा करती तो आज वृद्धाश्रम क्यों बनाए जा रहे हैं? जब अपनी संतान भी सेवा नहीं करते तो फिर गोद लिया बालक तुम्हारी सेवा करेगा, इसकी क्या गारंटी है? यदि प्रारब्ध में होगा तो बुढापे में उन लोगों की उपेक्षा भी अच्छे सेवा होगी, जिनकी संतान है। भगवान् किसी ऐसे व्यक्ति को भेज देंगे, जो बेटे से भी बढ़कर तुम्हारी सेवा करेगा। अतः भविष्य की चिंता मत करो।
अन्य श्रोता - मैं लम्बे समय से बीमार हूँ। किसी ने मुझ पर तांत्रिक प्रयोग कर दिया है। कोई उपाय बताएं।
संत - यदि कोई तांत्रिक प्रयोग करता है तो उसका असर हम पर तभी पड़ता है, जब हमारे प्रारब्ध वैसा हो। दूसरा तो केवल उसमें निमित्त बनता है। यदि हमारे प्रारब्ध में न हो तो हमें कष्ट पहुंचाने की किसी में ताकत है ही नहीं। यदि तुम बीमार रहते हो तो यह तुम्हारा प्रारब्ध है, पुरारे कर्मों का फल है और दूसरे (तांत्रिक प्रयोग करने वाले) का यह नया कर्म है, नया पाप है, जिसका फल उसे भविष्य में भुगतना पडेगा। याद रखो कि दूसरा कोई भी व्यक्ति तुम्हें सुख या दुःख नहीं पहुंचा सकता -
सुखस्य दुखास्य न कोSपि दाता
परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।
अहं करोमीति वृथाभिमान:
स्वकर्मसूत्रे ग्रथितो हि लोक:॥
'सुख या दुःख को देने वाला कोई और नहीं है। कोई दूसरा सुख-दुःख देता है- यह समझना कुबुद्धि है। मैं करता हूँ - यह वृथा अभिमान है। सब लोग अपने-अपने कर्मों की डोरी से बंधे हुए हैं
काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता।
निज कृत करम भोग साबू भ्राता।।
अन्य श्रोता - महाराजजी ! मैं बहुत दुखी हूँ। मुझसे दुःख सहा नहीं जाता। मेरे मन में आत्महत्या करने की आती है।
संत - आत्महत्या करने से तुम अपने कर्मों के भोग से बच नहीं सकते। पूर्वकृत कर्मों का फल तो भोगना ही पडेगा, आत्महत्या करने से एक मनुष्य की हत्या करने का पाप लगता है। अत: आत्महत्या करने से तुम दुखों: से छूटोगे नहीं, अपितु और अधिक दु:खी हो जाओगे और प्रेतयोनि में भटकते रहोगे, नरकों में तडपते रहोगे। अभी जो दु:ख है, वह आगे मिट भी सकता है और तुम भविष्य में सुखी भी हो सकते हो। अंधेरी रात बीतने पर सूर्य का उदय भी हो जाता है। अत: अभी निराश न होकर नयी सुबह की प्रतीक्षा करो।
अन्य श्रोता - महाराज ! मैं पारिवारिक समस्याओं से बहुत दुखी हूं। कोई उपाय बतायें।
सन्त - दु:ख का मूल कारन है ममाता ! जिन वस्तुओं और व्यक्तियों में हमारी ममता है, उन्हीं के बनने-बिगडने का असर हम पर पडता है। संसार में असंख्य वस्तुएं हैं, पर उनके बनने-बिगडने, जीने-मरने आदि का असर हम पर नहीं पडता। इसलिये किसी भी वस्तु-व्यक्ति में ममता मत करो, फ़िर दु:ख नहीं आयेगा।
विचार करो, जितनी भी वस्तुएं और व्यक्ति हैं, वे सब-के-सब मिलने बिछुडनेवाले हैं। पहले वे हमारे साथ नहीं थे, पीछे वे हमें मिल गये, और भविष्य में वे सदा हमारे साथ नहीं रहेंगे, एक दिन वे हमसे बिछुड जायेगे अथवा हम उनसे बिछुड जाएंगे।
प्राय: मनुष्य अपने खराब स्वभाव के कारण दु:ख पाता है। अत: अपना स्वभाव सुन्दर बनाओ।
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Labels: ज्ञान- धारा
Posted by Udit bhargava at 6/20/2010 07:50:00 pm 0 comments
रजनीगंधा उगाएं वाटिका महकाएं
रजनीगन्धा के फूल को कहीं कहीं 'अनजानी', 'सुगंधराज' और उर्दू में गुल-ए-शब्बो' के नाम से पहचाना जाता है. अंगरेजी और जर्मन भाषा में रजनीगन्धा को 'टयूबेरोजा', फ़्रेंच में 'ट्यूबरेयुज' इतालवी और स्पेनिश में 'ट्यूबेरूजा' कहते हैं। इस का मूल उत्पत्ति स्थान मध्य अमेरिका माना जाता है, जहां से यह दूसरे देशों में पहुंचा।
यह कंद (बल्ब) से उगाया जाने वाला पौधा है और हर किस्म की साफ़ मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है। विशेषकर यह बलुई-दोमट या दोमट मिट्टी में अधिक उगता है।
भूमि का चुनाव और तैयारी
रजनीगंधा के लिये भूमि का चुनाव करते समय 2 बातों पर विशेष ध्यान दें। पहला, खेत या क्यारी छायादार जगह पर न हो, यानी जहां सूर्य का प्रकाश भरपूर मिलता हो। दूसरा, खेत या क्यारी में जल निकास का उचित प्रबंध हो। सब से पहले खेत, क्यारी व गमले की मिट्टी को मुलायम व बराबर कर लें, चूंकि यह कंद बीज वाली किस्म है, अत: कंद के समुचित विकास के लिये खेत की तैयारी विधिवत होनी चाहिए। खासकर मिट्टी को खरपतवार रहित कर लें, अन्यथा निराई करने में बडी कठिनाई होगी।
कंदो की बुआई/रोपाई : इस फ़ूल के बीज, जिन्हें कंद, गांठ या बल्ब कहते हैं, रोपने का समय अप्रैल से मई-जून तक होता है। कंद का आकार 2 सेंटीमीटर व्यास का या इस से बडा होना चाहिए। हमेशा स्वस्थ और ताजे कंद ही इस्तेमाल करें।
रजनीगंधा की प्रजातियां : फ़ूल के आकारप्रकार, पत्तियों के रंग के अनुसार इसे 4 वर्गो में बांटा गया है:
सिंगल : इस वर्ग के फ़ूल सफ़ेद रंग के होते हैं तथा इन में पंखडियों की केवल एक ही पंक्ति होती है।
डबल : सफ़ेद फ़ूल तथा पंखडियों का ऊपरी सिरा हलका गुलाबी रंग लिए होता है। पंखडियां कई पंक्तियों में सजी होती हैं, जिस से फ़ूल का केंद्रबिंदु दिखाई नहीं देता।
अर्धडबल : यह डबल किस्म की तरह ही है, परंतु पंखडियों की संख्या कम, केवल 4-5 की पंक्ति होती है। इस की पंक्तियों के आकर्षक रंगो एवं विविधता के कारण ही इसे क्रमश: स्वर्णरेखा और रजतरेखा के नामों से जाना जाता है।
खाद और उर्वरक डालना : इस फ़ूल के पौधों में एक वर्गमीटर की क्यारी में 2 से 4 किलो कंपोस्ट, 20 ग्राम नाइट्रोजन, 20-40 ग्राम फ़ास्फ़ोरस और पोटाश डालना लाभदायक है। क्यारी बडी हो तो इसी अनुपात में खाद की मात्रा बढा लें। बराबर-बराबर मात्रा में नाइट्रोजन 3 बार देना चाहिए। एक तो रोपाई से पहले, दूसरी इस के करीब 60 दिन बाद तथा तीसरी मात्रा तब दें जब फ़ूल निकलने लगे। (लगभग 90 से 120 दिन बाद) कंपोस्ट, फ़ास्फ़ोरस और पोटाश की पूरी खुराक कंद रोपने के समय ही दे दें।
सिंचाई : पहले साल कंद रोपने के बाद से ले कर बारिश आने तक हर एक सप्ताह के अंतर से सिंचाई करें। दूसरे साल, गरमी के दिनों में, सप्ताह में 2 बार सिंचाई करें। बरसात के होने पर नमी की जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें।
देखरेख के दूसरे तरीके : रजनीगंधा के पौधों के लिए खाद व उर्वरक का इस्तेमाल ठीक ढंग से करें। खेत, क्यारियों में खरपतवार दिखाई देते ही निकाल दें। निराई करने से पौधों के आसपास मिट्टी ढीली हो जाती है, जिस से उन में वायु संचार ठीक से होता है तथा कंद और जडों का विकास भी यही होता रहता है।
3 साल बाद हर पौधो से 25-30 छोटेबडे कंद भी प्राप्त होते हैं, डबल किस्म के स्पाइक (डंडियां) लगभग 75-95 सेंटीमीटर लंबे होते हैं, जिन से हर डंठल से 40-50 फ़ूल प्राप्त होते हैं। स्पाइक को यदि काटा न जाए तो 18 से 22 दिन तक उस पर फ़ूल खिलते रहते हैं। ऐसा देखा गया है कि सिंगल किस्म के फ़ूल लगभग हर मौसम में पूरी तरह खिल जाते हैं।
डबल किस्म के फ़ूल केवल जाडे के मौसम में ही पूरी तरह से खिलते हैं। फ़लस्वरूप बाकी समय इस फ़ूल के सुगंध बहुत कम या न के बराबर होती है। अत: व्यावसायिक दृष्टि से पैदावार के लिये सिंगल किस्म अधिक उपयुक्त पाई गई है।
फ़ूल सहित डंठल की बुडाई : रजनीगंधा के फ़ूल डंठल पर लगते हैं और जब इन फ़ूलों को माला, गजरा अथवा बुके बनाने के लिये चुनना यानी तोडना हो तो प्रात: का समय उपयुक्त रहता है। व्यावसायिक तौर पर उगाए गए फ़ूलों को यदि शाम को तोड कर दूसरे दिन सुबह बाजार भेजते हैं तो लगभग इस से प्रति फ़ूल 20-30 प्रतिशत वजन कम हो जाता है। एक व्यक्ति एक दिन में प्राय: 5 से 6 किलो तक फ़ूल तोड पाता है। कटे फ़ूल (कट्फ़्लावर) के रूप में इन के डंठल को 100-100 का बंडल बना कर बाजार में भेजा जाता है। यदि डंठल दूर भेजने हैं तो उस के नीचे खिलने वाले फ़ूलों को खिलने के पहले ही काट लें और यदि निकट बाजार के लिए हैं तो 2-3 फ़ूल खिलने पर डंठल को काट कर भेजना चाहिए। डंठल जितने लंबे होंगे मूल्य अधिक मिलेगा। अत: यथासंभव निचले भाग से तेज चाकू से काट कर तुरंत पानी भरी प्लास्टिक की बाल्टी में रखना चाहिए।
फ़ंगस से बचाव : रजनीगंधा में रोगों का प्रकोप प्राय: न के बराबर है लेकिन पानी से गीले होने वाले भाग पर फ़फ़ूंद (फ़ंगस) की बीमारी अकसर लग जाती है, जो पत्ती और फ़ूल दोनों को प्रभावित करती है। बचाव के लिए कीटनाशक दवा ’ब्रसीकोल’ (2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर) का छिडकाव करें।
कीटों (कीडों) में खासतौर से थ्रिप्स (एक छोटा कीडा) तथा माइट (दीमक) का आक्रमण होता है, जोकि पत्ति और फ़ूल दोनों को प्रभावित करते है। थ्रिप्स से बचाव के लिये ’नूवान’ (2 ग्राम प्रति लिटर पानी में) या ’सेविन’ 0.4 प्रतिशत की दर से छिडकाव करना लाभकारी रहता है। कभी-कभी कैटर-पिल्लर भी पत्तियों, फ़ूल और डंठल को खा कर नुकसान पहुंचाते है।
अत: आक्रमण होने पर ’नुवान’ या ’रोजर’ दवाओं का छिडकाव 0.02 प्रतिशात की दर से करें, लाभ होगा।
Labels: बागवानी
Posted by Udit bhargava at 6/20/2010 07:33:00 pm 0 comments
बढाएं सोशल स्किल्स ( Increase Social Skills )
वर्तमान समय में सोशल स्किल्स आपके पर्सनैलिटी को निखारने के लिये आवश्यक हो गए हैं। आज यह आपके प्रोफेशनल और बिज़नस मैनर्स का एक भाग बन गए हैं। साथ ही करियर को बुलंदी पर पहुंचाने के लिये आज यह काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
दूसरों के साथ आपका व्यवहार कैसा है, यह आपकी उन्नती का एक कारण बन सकता है, इसलिए आवश्यक है कि आप अपने व्यवहार को इस तरह का बनाएं कि सभी के साथ आपके अच्छे सम्बन्ध बने रहें, ताकि आपकी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के टारगेट्स निर्बाध पूरे हो सकें। यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति में यह सोशल स्किल्स स्वभावतः ही हों। थोड़े अभ्यास से इस गुण को अपने अन्दर विकसित कर सकते हैं। इससे आपको करियर में आगे बढ़ने में काफी लाभ भी मिलेगा। सोशल स्किल्स को विकसित करने के लिये आपको कुछ बातों पर ध्यान देना होगा। अधिकांशतः हम दूसरों की बात को सुनने से पहले ही सोच लेते हैं कि वह क्या कहेगा, ऐसा एटीट्यूड ठीक नहीं है। अक्सर ऐसा तब भी होता है, जब हमारे उच्चाधिकारी हमें कुछ निर्देश देते हैं और हम उसे समझ नहीं पाते है। परिणामस्वरूप गलतियाँ होना स्वाभाविक ही होता है, पर देखने में ऐसा लगता है कि निर्देशों का उचित पालन नहीं हुआ। इस सभी से बचने के लिये आपको अपने में कुछ परिवर्तन लाकर निम्न बातों को अपनाना चाहिए।
आपसे जो भी बात कही जा रही है, उसे ध्यानपूर्वक सुनें और समझें, ताके उसका सही अनुपालन हो सके। अपनी बात को स्पस्ट रूप से और प्रभावी ढंग से कहने की आदत डालें। आपसे जो कुछ कहा जा रहा है, उसे अच्छी तरह से समझकर ही करें, जिससे आप अपेक्षित परिणाम दे सकें। यदि आपको किसी की बात एक बार में समझ में न आए, तो दूसरी बार पूछने में झिझकें नहीं, क्योंकि गलती करके सीखने से अच्छा है कि बिना किसी हिचकिचाहट के बात को स्पस्ट तरीके से समझकर उसके ही अनुरूप काम किया जाए।
साथ ही कुछ साफ्ट स्किल्स भी प्रयास कर सीखने की कोशिश करें, जैसे कि कम्युनिकेशन स्किल्स और बॉडी लैंग्वेज की समझ। इससे अतिशय तनाव के क्षणों में आप अपने को ज्यादा शांत रख सकेंगे। उदहारण के लिये अगर कोई समस्या आपको परेशान कर रही है, तो उसे अपने सुपरवाइजर या बाँस से से डिस्कस करने में संकोच न करें। अपनी बात को उन्हें पूर्ण रूप से समझाएं, लेकिन याद रखें आप अपनी समस्या को उनके पास 'एक्सप्लेन' करने गए हैं, न कि 'कंप्लेन' करने। अपनी समस्या बताते समय अपनी आवाज और भाषा-शैली पर पूर्ण नियंत्रण रखें। यहीं पर आपके कम्युनिकेशन स्किल्स की भूमिका शुरू होती है। आपको पता होना चाहिए कि कौन से शब्दों से आपकी बात शिकायत कम, घटना का ब्यौरा ज्यादा लगेगी। बाँस से बात करते समय अपनी बाँडी लैंग्वेज पर कण्ट्रोल करना भी आपके फेवर में जायेगा।
इन बातों का ध्यान रखकर आप अपने व्यवहार और व्यक्तित्व में सुधार के साथ-साथ अपनी सोशल इमेज भी इम्प्रूव कर सकते हैं।
Posted by Udit bhargava at 6/20/2010 09:03:00 am 1 comments

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