10 दिसंबर 2011

व्यक्तित्व को भी नष्ट कर देता है अहंकार

अहंकार और आत्मगौरव दोनों मनोभावों में मैं प्रधान होता है। मगर दोनों मनोभाव एक दूसरे के एकदम विपरीत होते हैं। मैंने देश के साथ कभी गद्‌दारी नहीं की - यह आत्मगौरव है। मेरे समान कोई दूसरा देशभक्त नहीं है- यह अहंकार है। आत्मगौरव व्यक्ति के चरित्र और स्वभाव को बल प्रदान करता है। अहंकार व्यक्ति के चरित्र और स्वभाव को केवल नष्ट ही नहीं करता, अहंकारी द्वारा कल्पित उसके नए चरित्र और स्वभाव को उसके मौलिक चरित्र और स्वभाव पर आरोपित कर देता है।

अहंकार के जन्म के कल्पनीय-अकल्पनीय असंख्य कारण हो सकते हैं। अहंकार सम्मान से भी उत्पन्न हो सकता है, अपमान से भी। वह सुख से भी उत्पन्न हो सकता है, दुख से भी, उपलब्धि से भी, अनुपलब्धि से भी, संपन्नता से भी, विपन्नता से भी, विजय से भी, पराजय से भी। मगर वह जिससे भी उत्पन्न हो, अहंकारी के ग्रहण करने की क्षमता के साथ-साथ उसके उचित-अनुचित विवेक को नष्ट कर देता है। वह इतना प्रबल और प्रभावशाली होता है कि वशिष्ठ जैसे ब्रह्म ज्ञान से संपन्न ब्राह्मण को भी आक्रांत कर सकता है, अपनी तपस्या और ब्रह्म-ज्ञान-साधन से राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र को भी।

ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र जुड़ा एक प्रसंग इसका एक सटीक उदाहरण है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जंगल में ध्यानमग्न थे कि अचानक उन्हें भगवान के कहीं निकट ही उत्पन्न होने का आभास हुआ। यह आभास होते ही वे आनंद से विह्वल हो उठे और फिर ध्यानमग्न होकर यह जानने की कोशिश करने लगे कि भगवान ने कहां अवतार लिया है। उन्होंने ध्यान में देखा कि भगवान ने अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में जन्म लिया है। इससे अधिक प्रसन्नता की और क्या बात हो सकती थी? उन्होंने फिर ध्यानमग्न होकर यह जानने की कोशिश की भगवान का सान्निध्य सुख उन्हें कैसे प्राप्त हो सकता है। जो उन्होंने जाना, उससे उनके अहंकार को गहरी ठेस लगी। वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि तो हो गए थे, मगर सारे ब्रह्मज्ञान के बावजूद उनका क्षत्रियोचित अहंकार अभी भी नष्ट नहीं हुआ था। जिस वशिष्ठ को अपने ब्रह्मज्ञान से पराजित कर वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि हुए थे, भगवान के सानिध्य-सुख का अवसर वशिष्ठ की अनुमति के बिना नहीं मिल सकता। यह विश्वामित्र का सौभाग्य था कि उनका अहंकार उन पर इतना हावी नहीं हुआ कि वे उस महान अवसर से वंचित रह जाते। वे वशिष्ठ की शरण में गए और यह आश्वासन प्राप्त करने में सफल हुए कि दशरथ के पुत्रों को शिक्षित करने का सौभाग्य उन्हें ही प्राप्त होगा।

लेकिन अहंकार शायद ही ऐसे विवेक का अवसर देता है। इसीलिए प्रत्येक अहंकार के त्याग का उपदेश करता है। जैन धर्म साधना की तो यह पहली शर्त है। जैन ग्रथों में इससे जुड़ी अनेक कहानियां प्राप्त होती हैं। एक कहानी के अनुसार एक राजा का पुत्र जब युवा हुआ और उसे राज्य के उत्तरदायित्व सौंपने के दिन करीब आए, राजा ने उसे उचित शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने गुरु के यहां भेजने का निर्णय किया। उन्होंने अपने पुत्र को बुलाकर शिक्षा के लिए उनके आश्रम में जाने का आदेश किया। पुत्र राजा का बेटा था, वैसा होने के अहंकार से भरा। स्वभावतर्‍ उसने गुरु को भी अपने सेवकों की नजर से देखा। गुरु पर रौब जमाने की गरज से वह नौकर-चौकरों की एक पूरी फौज के साथ उनके आश्रम की ओर चला। गुरु को उसके इस अहंकार का पूर्वाभास हो गया।

उसने आश्रम में रहने वाले अपने शिष्यों को उसके आते ही उसे मार-पीट कर भगा देने का आदेश किया। पिटकर राजपुत्र वापस लौट गया। पिता से शिकायत की। पिता ने समझाया -तुमसे जरूर कोई भूल हुई होगी। इस बार अकेले जाओ। वे तुम्हें जरूर स्वीकार करेंगे। पिता की आज्ञा मानकर राजपुत्र दुबारा गया, पर अकेले। मगर आश्रम में प्रवेश करते ही गुरु के शिष्यों ने गुरु की आज्ञा से उसे फिर मार-पीट कर भगा दिया। बहरहाल राजपुत्र रोते-गाते फिर पिता के सामने उपस्थित हुआ। पिता ने फिर समझाया-तुमसे फिर कोई गलती हुई होगी। इस बार ऐसा करो कि आश्रम के बाहर विनीत भाव से बैठ जाओ। मन ही मन पूरी भक्ति के साथ प्रार्थना करते रहना कि हे गुरुदेव मुझे स्वीकार कीजिए। राजपुत्र ने वैसा ही किया। कई दिन गुजर गए, कुछ नहीं हुआ। मगर ध्यानमग्न राजपुत्र को किसी के आने न आने का ध्यान ही कहां था? एक दिन गुरु शिष्यों के साथ आए। और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।

जैन-धर्म साधना में अहंकार का नाश इसीलिए पहली शर्त है क्योंकि अहंकार ज्ञान के मार्ग तो अवरुद्ध करता ही है, व्यक्ति को स्वभाव से भी विमुख कर देता है। वह अपने यथार्थ को भूल जाता है। ऐसा केवल साधारण व्यक्तियों के साथ ही नहीं होता है। भारतीय पुराणों-महाकाव्यों में परशुराम एक ऐसे ही महापुरुष हैं। परशुराम का नाम भी राम ही था, मगर क्षत्रियों के विनाश की प्रक्रिया में वे परशु की शक्ति से इस हद तक अभिभूत हो गए और उन्हें अपनी शक्ति का ऐसा ऐसा अहंकार हो गया कि वे स्वयं को राम की जगह परशुराम के नाम से जानने लगे। उन्हें अपना सब कुछ भूल गया-अपना विगत, अपना वंश, अपना ब्राह्मणत्व। शक्ति के अहंकार से अभिभूत परशुराम को सीता स्वयंवर के अवसर पर शिव के धनुष का राम द्वारा तोड़ा जाना असहज और अविश्र्वसनीय प्रतीत हुआ। वे राम की शक्ति से प्रसन्न न होकर राम लक्ष्मण को दंडित करने पर उतारू हो गए। राम के द्वारा उनके क्रोध को शांत करने का हर विनम्र उपाय उन्हें उदंडता लगे। क्षत्रिय चरित्र के अहंकार के कारण उन्हें भृगुवंशी होना, करुणामूर्ति कहा जाना गाली की तरह मालूम हुए।
जो अहंकार परशुराम जैसे महापुरुष के स्वभाव को नष्ट कर सकता है, उसे साधारण मनुष्यों के स्वभाव को नष्ट करने में कितना समय लग सकता है?

व्यवहार बदलने की कला :ध्यान

मेडिटेशन यानी ध्यान हमारे मस्तिष्क को शांत रखने में सहायक है। यह हमें शांत मस्तिष्क के साथ साथ जीवन के विभिन्न आयामों में सफलता की तरफ ले जाता है। तब हम विचलित हुए बिना सफल होते हैं। अगर हमारे मन में शांति नहीं है, तो हमारी सफलता उस फूल की तरह है, जिसमें सुगंध नहीं होती।

हमारे अंदर असुरक्षा की भावना आने के पीछे विगत का असंतोष, वर्तमान का भ्रम और भविष्य के प्रति एक अविश्वास का होना है। किसी भी व्यक्ति को अपने विगत के अनुभव से सीखना चाहिए, वर्तमान का आनंद लेना चाहिए और भविष्य के लिए उसके मन में एक योजना होनी चाहिए। ये तीनों बातें हमारे अंदर की असुरक्षा की भावना को कम करने में सहायक हैं। मनस्थिति की ये अलग अलग अवस्थाएं हैं।

इसका भाव यही है कि अगर अतीत में ही उलझे रहोगे, तो वर्तमान के आनंद से वंचित हो जाओगे। अगर विगत से अनुभव नहीं लोगे, तो जीवन को बेहतर नहीं बना पाओगे, और भविष्य के लिए अगर योजना नहीं होगी तो आगे के सफर में मन में विचलन रहेगा।

यथार्थ जीवन हमारी अंतश्चेतना में समाया रहता है। वह हमारी प्रवृत्तियों में नजर आता है। इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति का मस्तिष्क बिल्ली की तरह है, तो वह बाहरी जीवन के किसी चीज का प्रभाव पड़ने पर बिल्ली की प्रवृति के अनुकूल ही काम करेगा।

इस प्रवृति के लोगों में भी यही व्यवहार देखा जाता है, उन्हें केवल अपने से मतलब होता है। दूसरी प्रवृत्ति कुत्ते की है जो केवल तब तक दुम हिलाता है जब तक उसे प्यार मिलता है। मेडिटेशन हमारे मस्तिष्क की ऐसी प्रवृत्तियों को दूर करता है। मेडिटेशन मस्तिष्क के इस तरह के क्षणिक स्वभाव को दूर करने में सहायक है। मेडिटेशन से हमारा मस्तिष्क स्थिर और शांत होता है। मेडिटेशन की अवस्था के अलग अलग चरण हैं। इसमें आनंद की अवस्था धीरे-धीरे आती है। मेडिटेशन से जब हमारे व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगे तो यह अवस्था कुछ पा जाने की है। मेडिटेशन से विचारों पर तो एकदम प्रभाव पड़ता है, लेकिन महत्व इस बात का है कि मेडिटेशन आपके व्यवहार में भी बदलाव ला दे। यह अवस्था अभ्यास से लाई जाती है। दिमाग की अवस्था हमेशा एक सा होनी चाहिए। हमेशा संतुलन की स्थिति होनी चाहिए। विचलन की स्थिति ठीक नहीं। हमारे दिमागी संतुलन और मस्तिष्क चेतना के लिए मेडिटेशन की पुरानी और आधुनिक पदतियां उपयोगी साबित हुई हैं। इससे दिमागी असंतुलन को दूर करने में मदद मिली है। यह हमें व्यावहारिक रूप से भी सहज बनाता है। उसमें भी एक तरह का संतुलन लाने में सहायक हुआ है।

कलयुग केवल नाम अधारा

संतो व सिद्धों को अपनी गति और नियति का पहले से ही अनुमान होता है। हुनमान भक्त पुरुषोत्तम दास जी भी ऐसे ही संत हैं। सबसे पहले कई दशक पूर्व वे माघ माह में स्नान करने प्रयाग आए, यहीं उनका परिचय कानपुर के अयोध्या प्रसाद शुक्ल और गंगा सागर मिश्र से हुआ। उनकी हनुमत भक्ति और विद्वता से प्रभावित होकर ही दोनों ने उन्हें कानपुर आने का आमंत्रण दिया और पनकी के पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन का आग्रह किया।

माघ समाप्त होने के बाद पुरुषोत्तम दास जी कानपुर आए और पनकी स्थित पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन किए। पुरुषोत्तम दास जी के मन में काफी दिनों से एक शंका थी कि हनुमान चालीसा की चौपाई 'हाथ वज्र और ध्वजा विराजे' में हुनमान जी का वज्र कहां है? पुरुषोत्तम दास जी की इस शंका का निवारण भी पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद हो गया। उन्होंने अपने एक शिष्य को बताया कि हनुमानजी की कृपा से ही मुझे यह ज्ञान मिला कि वज्र खुद हनुमान जी का हाथ ही है। इसी प्रकार पुरुषोत्तम दास जी के मन में एक शंका यह भी थी कि अगर हनुमान जी शिव जी के अवतार हैं तो पार्वती जी कहां हैं? पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन के बाद पुरुषोत्तम जी अपने एक शिष्य से बोले, 'पार्वती जी हनुमान जी के साथ उनकी पूंछ में प्रतिष्ठापित थीं। जब शंकर जी ने विश्वकर्मा से पार्वती जी के लिए लंका का निर्माण करवाया तो गृहप्रवेश के समय रावण को ही उन्होंने अपना आचार्य बनाया था। लेकिन रावण ने शिव जी से दक्षिणा में लंका ही मांग ली। इससे पार्वती बहुत रुष्ट हुईं। शिव जी को पार्वती जी उतनी ही प्रिय थीं जितनी वानर को अपनी पूंछ। अतः शिव जी ने जब हनुमान जी के रूप में अवतार लिया तब पार्वती जी उनकी पूंछ बनी और इसी पूंछ से उन्होंने लंका को जलाकर रावण से अपना बदला लिया।

पुरुषोत्तम दास जी कहते हैं कि कलयुग में प्रभु नाम का स्मरण ही मोक्ष का माध्यम है। प्रभुनाम स्मरण स्वतंत्र साधना है और यह बाह्य आचरण पर निर्भर नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने १३ करोड़ राम नाम के जप का संकल्प लिया था जिसे १२ अक्तूबर १९८५ को पूरा के बाद बिठूर में महाराज घाट पर गंगा में विसर्जित कर दिया।

                                                                                                                                                                                -शशिशेखर त्रिपाठी

समाज-सुधारक थे श्रीमद्‌ शंकरदेव

असम के महान संत श्रीमद्‌ शंकरदेव का जन्म नौगांव जिले के अली पुखरी में १४४९ में हुआ था। उनका जीवन अनेक अनूठी घटनाओं से पूर्ण था। अपने दूरदर्शी प्रयास से उन्होंने अनेक जाति-वर्गों में विभाजित पूर्वोत्तर में भक्ति रस की जो धारा प्रवाहित की और जनसाधारण को कल्याण की राह दिखाई, वह अतुलनीय है।
शंकरदेव के पूर्वज चंडीवर भूइयां पहले बंगाल आकर बसे थे और वहां से असम आ गए थे। उनके वशंजों ने मध्य असम के विभिन्न भागों में भूइयां-राज्यों की स्थापना की थी। शंकरदेव के पिता शिरोमणि भूइयां कुसुंबर अली पुखरी में आकर बस गए थे।
शंकरदेव की माता का नाम सत्यसंधा था। बचपन में ही शंकर को माता-पिता की स्नेह-छाया से वंचित होना पड़ा।
उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया। बारह वर्ष की आयु में शंकर महेंद्र कंदली की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन करने लगे। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के माध्यम से उनके मन में तत्व-ज्ञान की ज्योति जल उठी। अल्प समय में ही अतुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर वे घर लौटे, परंतु उनका मन भक्ति में रम गया था।
आम लोगों की दशा पर उन्होंने ध्यान दिया और अनुभव किया कि भक्ति की राह पर चलकर ही उनको उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। परिवार के सदस्यों के आग्रह पर उन्होंने सूर्यावती से विवाह किया। सांसारिक कर्मों से उदासीन होकर वे चिंतन-लेखन में जुट गए। इन्हीं दिनों उन्होंने चिह्न यात्रा नाटक की रचना की और उसका मंचन किया। फिर वे अपने साथियों के साथ बारह वर्षों तक भ्रमण करते रहे। इस दौरान जहां उन्होंने तीर्थ स्थानों की यात्रा की, वहीं कई संतों के संपर्क में भी आए। उन्हें श्रीमद्‌भागवत पर आधारित कृष्ण भक्ति का प्रचार करने की प्रेरणा मिली।

वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।
शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।
शंकरदेव की प्रमुख कृतियां विशुद्ध असमिया भाषा में -काव्यः हरिशचंद्र उपाख्यान एवं रुक्मिणी हरण काव्य -भक्ति पद : कीर्तन घोष, भक्ति प्रदीप, गुणमाला ब्रजावली भाषा में - प्रगीत पद- बरगीत - टीकाः शंकरदेव ने भक्ति तत्व संबंधी संस्कृत ग्रंथ भक्ति रत्नावली की टीका भी लिखी थी। अनूदित कृतियां शंकरदेव ने उत्तर कांड रामायण तथा श्रीमद्‌ भागवत के कई स्कंधों का असमिया भाषा में अनुवाद भी किया।
शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।

                                                                                                                                                                                      - ब्रजमोहन सिंह

23 नवंबर 2011

प्रेम के चार रूप : भक्ति, श्रद्धा, मैत्री और स्नेह

जीवन के दो रूप हैं- स्वार्थ केन्द्रित और पर-केन्द्रित। एक तीसरा रूप है- परमार्थ- केन्द्रित जिसमें स्वार्थ और पर का भेद समाप्त हो जाता है। स्वार्थ- केन्द्रित जीवन भोग है, पर- केन्द्रित त्याग है और परमार्थ- केन्द्रित प्रेम है। भोग में घुटन है, त्याग में कष्ट है, प्रेम में आनंद है।

इसमें प्रेम के चार रूप हैं- भक्ति, श्रद्धा, मैत्री और स्नेह। अस्तित्व- मात्र के प्रति भक्ति है, बड़ों के प्रति प्रेम श्रद्धा है, बराबर वालों से प्रेम मैत्री है और छोटों के प्रति प्रेम स्नेह है। प्रेम के इन चारों ही रूपों में अहंकार का विसर्जन रहता है जिसे हमने अस्तित्व कहा उसे सामान्य भाषा में भगवान् कहते हैं। हम अस्तित्व का एक भाग हैं। इस बोध में भक्तिभाव उत्पन्न होता है। अस्तित्व ही अस्तित्व के लिए कुछ कर रहा है, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। यह भावभक्ति है।

अस्तित्व निराकार है। वह साकार बनता है हमारे परिवेश के रूप में। माता-पिता, गुरूजन भी अस्तित्व का ही रूप हैं। इसलिए इन्हें हम भगवान् ही कहते हैं-
"गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु:, गुरूर्देवो महेश्वर:। गुरू: साक्शात्परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।"
गुरूजनों के प्रति यह श्रद्धा हममें नमनीयता लाती है, ग्रहणशीलता लाती है। हम ग्रहणशील होते हैं तो कुछ सीख पाते हैं- 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्'। उद्दण्ड व्यक्ति कुछ नहीं सीख पाता। श्रद्धा में झुकना पड़ता है तो अहंकार छोड़ना पड़ता है। बराबर वालों से मैत्री होती है| मैत्री में परायापन नहीं होता। जिस रहस्य को हम किसी से नहीं कह सकते उसे मित्र से कह कर मन हल्का कर लेते हैं। मित्रता में अद्वैत रहता है। यह अद्वैत भी भगवान् का ही एक रूप है। अर्जुन की श्रीकृष्ण से मैत्री थी तो उसके लिए श्रीकृष्ण भगवान् ही बन गये।

अपने से छोटों के प्रति प्रेम स्नेह कहलाता है। यही वात्सल्य-रस है। हमारे यहाँ एक शब्द प्रचलित है- बाल-गोपाल। अर्थ यह है की छोटे बच्चे भी भगवान् का ही एक रूप हैं। वे सब कार्य नि:स्वार्थ-भाव से करते हैं। वे सरल होते हैं। उनमें अपने पराये का भेद नहीं होता। साधना का उत्कृष्ट रूप यह है की व्यक्ति बच्चा बन जाये। इस प्रकार प्रेम नर में ही नारायण की प्रतिष्ठा कर देता है। सेवा, त्याग, तपस्या आदि नैतिकता के शब्द हैं; प्रेम अध्यात्म का शब्द है। नैतिकता में दबाव रहता है कर्तव्य-भावना का। प्रेम में कोई दबाव नहीं होता।

अहंकार का पत्थर हटे तो प्रेम का झरना फूट सकता है। प्रेम ही ज्ञान है- 'ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' प्रेम ही जीवन है। प्रेम के बिना व्यक्ति का सांस लेना ऐसा ही है जैसा लोहार की धौंकनी का चलना।

जीवन जीने की कला : जरा रखिये सकारात्मक सोच

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धैर्य और आशा के साथ अपने प्रेरणा पूर्ण नवाचारों के माध्यम से लक्ष्य प्राप्ति के दृष्टिकोण को पूरा करने में समर्थ एवं सफल होने को ही सकारात्मक सोच कहा गया है।

सकारात्मक सोच क्यों-
इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, और चेतना के विकास के साथ ही मानव ने प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया जो अन्य जातियां नहीं कर सकी, और उन्हीं प्रश्नों को पूरा करने की चाह में आज हम कहाँ आ पहुंचे हैं।
आज प्रत्येक व्यक्ति की परम इच्छा होती है की लोग उसकी प्रशंसा करें, उसके कार्य को सराहा जाए, उससे मिलना एवं बात करना पसंद करें, और यही प्रश्न वह अपने आप से पूछता है की मैं अपने आप में ऐसा क्या आकर्षण निर्मित करूँ कि मेरे प्रश्नों का हल प्राप्त हो जाए।
आकर्षण का नियम जीवन का महान रहस्य है।
आकर्षण का नियम कहता है कि सामान चीजें, सामान चीजों को आकर्षित करती हैं, इसलिए जब आप एक विचार सोचते हैं तो आप उसी जैसे अन्य विचारों को अपनी और आकर्षित करते हैं।
विचार चुम्बकीय है और हर विचार की एक फ्रिक्वेंसी होती है, जब आपके मन में विचार आते हैं तो वे ब्रह्माण्ड में पहुँचते है और चुम्बक की तरह उसी फ्रिक्वेंसी वाली सारी चीजों को आकर्षित करते हैं। हर भेजी गयी चीजें स्त्रोत तक यानी आप तक लौटकर आती हैं।
आप मानवीय ट्रांसमिशन टाँवर की तरह हैं और अपने विचारों की फ्रिक्वेंसी प्रसारित कर रहें हैं, अगर आप अपनी जिंदगी में कोई चीज बदलना चाहते हैं तो अपने विचार बदलकर फ्रिक्वेंसी बदल लीजिये।
आपके वर्त्तमान विचार आपके भावी जीवन का निर्माण कर रहे हैं। आप जिसके बारे में सबसे ज्यादा सोचते हैं, या जिस पर सबसे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करते हैं, वह आपकी जिंदगी में प्रकट हो जाएगा।

आपके विचार वस्तु बन जाते हैं-
आपके विचार वस्तु कैसे बन जाते हैं, आपको बताना चाहूंगा इस कहानी से: अफ्रीका का एक कबीला जिसके बारे में कहावत थी कि वे जब भी डांस करते हैं, बारिश होती है, तब उनसे इसका राज जाना गया तो पता चला कि वो तब तक डांस करते हैं जब तक वर्षा नहीं हो जाती।

सकारात्मक सोच कैसे-
वजन कम करने के लिए वजन कम करने पर ध्यान केन्द्रित न करे। इसके बजाय अपने आदर्श वजन पर ध्यान केन्द्रित करें। अपने आदर्श वजन की संभावनाएं महसूस करेंगे तो आप इसका आह्वान करके इसे अपनी और आकर्षित कर सकेंगे।
आकर्षण के नियम की शक्ति महसूस करने के लिए छोटी चीजों से शुरूआत करें, सफलता मिलने पर बड़ी चीजों की कल्पना करने लगेंगे। उम्मीद एक प्रबल आकर्षण शक्ति है उन चीजों की उम्मीद करें जिन्हें आप चाहते हैं उन चीजों की उम्मीद न करें, जिन्हें आप नहीं चाहते है। आकर्षण के नियम का लाभ लेने के लिए इसे सिर्फ एक बार की घटना न बनाकर इसको आदत में शामिल कर लें।
हंसी, खुशी को आकर्षित करती है। नकारात्मक को नष्ट करती है और चमत्कारिक इलाज की और ले जाती है क्योंकि खुशी के साइड इफेक्ट्स पर किये गये शोधों में पाया गया है कि खुश लोग ज्यादा सफल होते हैं, क्योंकि खुश लोग -
-    मजबूत रिश्तों का आनंद उठाते है।
-    कम बीमार पड़ते है।
-    उम्मीद हमेशा ज़िंदा रखते है।
-    बुरे अनुभवों से जल्दी उभर जाते है।

महत्वपूर्ण बातें -
-     आप अपने आपको अभी अच्छा महसूस करें।
-     काम को इस तरीके से करे जिससे आप खुशी महसूस करें, जिससे खुशियाँ आपकी तरफ दौड़ी आयेंगी।
-     आलोचना करने से कभी कोई सुधरता नहीं अलबत्ता सम्बन्ध जरूर बिगड़ जाते हैं।

लोगों को प्रभावित करने के मूल तरीके -
-     बुराई मत करों, निंदा मत करो, शिकायत मत करो।
-     सच्ची तारीफ़ करने की आदत डालिये।
-     सामने वाले आदमी में प्रबल इच्छा जगाइये।

लोगों का चहेता बनने के तरीके -
-     दूसरे लोगों में सचमुच रुचि लें।
-     मुस्करायें।
-     याद रखें किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण और मधुरतम शब्द होता है।
-     बोलने वाले सबकी पसंद नहीं होते किन्तु सुनने वाले सबको भाते हैं, अच्छा श्रोता बनाने का प्रयास करें।
-     सामने वाले व्यक्ति की रुचि के विषय में बात करें।
-     सामने वाले व्यक्ति के महत्वपूर्ण होने का अहसास करायें और ईमानदारी से करायें।
-     गलती मानने का अर्थ यह है कि अब आप पहले से बेहतर है।

लोगों से अपनी बात कैसे मनवायें -
-     बहस से एक ही फायदा हो सकता है और वह है इससे बचना।
-     दूसरे व्यक्ति के विचारों के प्रति सम्मान दिखाएँ और यह कभी नहीं कहे- "आप गलत है"
-     अगर गलती आपकी हो तो तत्काल और पूरी तरह अपनी गलती मान लें।
-     बातचीत दोस्ताना तरीके से शुरू करें।
-     सामने वाले से तत्काल हाँ हाँ कहलवाने का प्रयास करें।
-     सामने वाले आदमी को ज्यादा बातें करने दें।
-     दूसरे व्यक्ति को यह लगने दे कि यह विचार उसी का है।
-     ईमानदारी से सामने वाले व्यक्ति का नजरिया समझने की कोशिश करें। सामने वाले व्यक्ति के विचारों और इच्छाओं के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने का प्रयास करें।
-     तारीफ़ और सच्ची प्रशंसा से बात शुरू करें।
-     लोगों की गलतियाँ सीधे तरीके से न बतायें।
-     किसी की आलोचना करने से पहले अपनी गलती बतायें।
-     सीधे आदेश देने की बजाय प्रश्न पूछना अधिक बेहतर होगा।
-     थोड़े से भी सुधार की तारीफ़ करें और हर सुधार पर तारीफ़ करें।
-     सामने वाले व्यक्ति को कई काम इस तरह सौपें कि वह आपका कहा काम खुशी से कर दें।

यदि यह सब अपने दैनिक जीवन में कर सकें तो अच्छा होगा।
                                                                                                                                                                          - कपिल, अलवर

08 नवंबर 2011

आत्माएं भटकती क्यों है?

जी हां!...कुछ लोगों को आत्माओं से साक्षात्कार हुआ है!....कहतें है कि मनुष्य का शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा नष्ट नहीं होती!....कुछ आत्माओं को पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता!...उनकी मुक्ति हो जाती है...वह आत्माएं ईश्वर रुपी शक्ती में विलीन हो जाती है!...उन्हे पुण्यात्मा कहा जाता है!...ज्यादातर आत्माएं एक शरीर का त्याग कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है!...आत्मा को कभी पिछ्ले जन्म की याद नही रहती!....कुछ आत्माओं को रह जाती है...नया जन्म लेने के बाद भी पिछ्ले जन्म की कहानी कहने वाले लोग मिल जातें है!...ये लोग अपने पिछ्ले जन्म के ठिकाने...गांव या शहर का नाम भी बताते है...उनकी मृत्यु कैसे हुई थी यह भी बताते है!...अपने पिछ्ले जन्म के घर का पता भी बताते है....उनके माता-पिता और भाई बहनों को ...अगर वे जिंदा है तो पहचान भी लेते है!...पिछ्ले जन्म के लोगों की फोटोएं भी पहचान लेते है!....कुछ लोगों को तो अपने पिछ्ले तीन से चार जन्मों की याद होने के उदाहरण मिले हुए है!

हां..कुछ आत्माओं को नया शरीर प्राप्त नहीं होता....और वे भटकती रहती है!...ऐसी आत्माएं दुष्ट्ता पर उतर आती है!...मौका मिलते ही किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में घुस कर उसे और उससे जुडे हुए अन्य मनुष्यों को तकलीफ देती है!...धन का नाश करती है...बिमारियां फैलाती है...गंदगी के ढेर लगाती है..कुछ आत्माएं तो जान से मार कर ही किसी शरीर को छोडती है!

कुछ आत्माएं बिना शरीर में दाखिल हुए भी किसी रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल करती है....और टेढे मेढे स्वरुप में दिखाई देती है!...उन्हे देख कर लोग डर जाते है!...पुराने आवासों मे या खंडहर या टूटे-फूटे मकानों मे बसना इन्हें अच्छा लगता है!....मनुष्य को छोड कर अन्य प्राणी इनके अस्तित्व को तुरन्त पहचान जाते है....विशेषतः कुत्ते इनकी उपस्थिति पहचान जाते है, और भौंकना शुरु कर देते है...आपने देखा होगा बिना किसी वजह के भी कुत्ता भौंकता है!....ऐसे में समझ लीजिएगा की भट्कती आत्मा वहां घूम रही है!...ऐसी आत्माओं को वहां से भगाना बहुत जरुरी हो जाता है!

देखा गया है कि कुछ भटकती आत्माएं अच्छी भी होती है और किसी की जान भी बचाती है!..बडे बडे हादसे होने वाले होते है...तब भी अच्छी आत्माएं कुछ न कुछ संकेत दे कर आने वाले संकट से हमें अवगत कराती है!...मुझे भी ऐसा ही संकेत एक आत्मा ने दिया था..उसने होने वाले ट्रेन एक्सिडैंट से मुझे आगाह कर दिया...और मेरा बचाव हो गया!..उसने ट्रेन में मौजूद अन्य लोगों को भी आगाह किया था...लेकिन वे उसका संकेत समझ नहीं पाए और जान से हाथ धो बैठे!

इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि....अगर भगवान होता है, तो आत्माएं भी अच्छी और बुरी, दोनों तरह की होती है, जिन्हें हम भूत कहतें है!