16 सितंबर 2011

सक्सेस की यूएसपी ( USP of Success )

ज्ञापन की दुनिया के एक मशहूर एक्सपर्ट रोजर रीव से जब यह पूछा गया कि किसी भी प्रोडक्ट, ब्रांड, संस्थान या व्यक्ति की सफलता का सूत्र क्या है, तो उन्होंने कहा कि 'There is nothing (in this world) which is successful without USP (unique selling prosposition)'

अर्थात संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने बिना "Unique Selling Proposition" के सफलता पाईआखिर यह "Unique Selling Proposition" क्या है?

इसका मतलब है कि किसी चीज या व्यक्ति में सफल होने के लिये एक ऐसी विशेषता होनी चाहिएजो केवल उसको दूसरों से अलग करे और साथ ही दूसरे व्यक्तियों को उस विशेषता से अच्छा लाभ होता हुआ भी लगे

उदहारण के लिये एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारत के ग्रामीण इलाकों के लिये एक ऐसा रेडियो चालूइसी तरह से एक शेविंग क्रीम निर्माता ने क्वालिटी को बिना गिराए ऐसी क्रीम मार्केट में उतारी, जो बेहद सस्ती थीइसका सबसे बड़ा फायदा बार्बर शाँप [नई की दुकानों] हो हुआ। यही कारण है कि देश के अधिकाँश छोटे एवं माध्यम साइज की नई की दुकानें इसी शेविंग क्रीम का इस्तेमाल ग्राहक की शेव बनाने के लिये करते हैंऐसा करने से उनकी बचत अधिक होती है। वे अधिक पैसा कमाते हैंइसी तरह यदि आप किसी संसथान के लिये कार्य कर रहे हैं तो आपको इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि आप में ऐसी क्या विशेषता है जो आपको दूसरे कर्मचारियों से अलग करती हैआप में हजारों अवगुण हो सकते हैं, जिसके बारे में सारी संस्था Gossip करती है, परन्तु एक ऐसा गुण या विशेषता भी होनी जरूरी है, जिससे संस्था को लाभ होक्या आप में सोचने की शक्ति अच्छी है, क्या आप अच्छी रिपोर्ट लिख सकते हैं या आप में भाग-दौड़ करने की क्षमता है या आपका दिमाग बहुत Analytical है या आप में Networking करने की काबलियत है अर्थात आप दूसरों से अच्छे Relation [संबंध] आसानी से बना सकते हैं इत्यादिआकर यह देखा जाता है कि कर्मचारी या एग्जीक्यूटिव अपने अवगुणों पर होने वाली Gossip को राजनीति की संज्ञा देकर उससे परेशान होते रहते हैं और अपनी Energy व्यर्थ ही Waste करते हैंउनको अपना सारा ध्यान अपने उन गुणों का विकास करने में लगा देना चाहिएजिससे संस्थान को लाभ हो और वह दूसों से अलग नजर आएं


दो प्रेरक प्रसंग

होटल की एक मेज पर एक वृद्ध व एक वृद्धा दोनों बैठे थे। दोनों ने चाय पी और एक-दूसरे से परिचय प्राप्त किया। वृद्ध ने मेज छोड़ने से पहले वृद्धा से पूछा की क्या वह उसके साथ रह सकता है?
वृद्धा ने पूछा-क्यों?
वृद्ध ने उत्तर किया-क्योंकि हम दोनों अकेले हैं। मैं विधुर हूँ और आप विधवा।
बात को बढाते-बढाते दोनों साथ रहने को राजी हो गए. लेकिन वृद्धा ने अपनी संतुष्टि को संतोष देने के लिए वृधा से पूछा, तुम मेरे साथ क्यों रहना चाहते हो?
वृद्ध बोला-तुम्हारे बाल बहुत सुन्दर हैं।
वृद्ध से उत्तर पाकर वृद्धा बोली, तुम्हारी उम्र इतनी ज्यादा हो गयी है, फिर भी, तुम्हारी दांत बहुत सुन्दर हैं। तुमने इन्हें इतना सुन्दर बनाकर कैसे रखा है?
वृद्ध अपने प्रशंसा सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने दाँतों का जबड़ा निकालकर मेज पर रख दिया।
वृद्धा ने अपने बालों का जुदा निकालकर मेज पर रख दिया।
~ यही माया है। माया सत्य का दर्शन नहीं करने देती। असार को सार बताना माया है।
~ चिंतन: स्वयं का खाना खाना - प्रकृति।
               दूसरे का खाना छीनकर खाना - विकृति।
               दूसरे को खिलाकर खाना - संस्कृति। 

(2)
एक रात राजा जनक ने स्वप्न देखा की वे एक भिक्षुक बन गए हैं। उनके हाथ में मिट्टी का एक पात्र है। वह अपनों से, अपने राज्य के लोगों से भीख मांग रहे हैं और उन्हें कोइ भीख नहीं दे रहा है। उनकी भूख बढ़ती जा रहे है। 

उन्होंने देखा की एक भिखारी बासी रोटी व दाल को फेंकने जा रहा है। राजा जनक उसकी और दौड़े और बासी रोटी व दाल माँगी। वे खाने ही वाले थे की एक कुत्ता आया और बासी रोटी व दाल छीनकर ले गया। उन्होंने हताश में अपने मस्तक पर हाथ मारा और वह हाथ सोने के पलंग पर लगा। राजा जनक की नींद खुल गई।

राजा जनक एक विक्षिप्त की भाँती अपने शयन-कक्ष से बाहर आए और दौड़-दौड़ कर कहने अलगे, क्या मैं राजा हूँ? क्या मैं ही राजा हूँ?

सब दरबारी हंसाने लगे की आज राजा को क्या हो गया? वह क्यों विनोद कर रहा है?
राजा जनक ने अपने गुरू अष्टावक्र से पूछा, सत्य क्या है, वह सत्य था या यह सत्य है?
गुरू अष्टावक्र बोले, 'दोनों ही असत्य हैं। स्वप्न झूठ है और तू राजा है यह भी झूठ है। देह राजा है तू राजा नहीं। तू देही है। तेरा आवरण देह राजा है। इस स्वप्न में जो सत्य है उसे जानना ही अध्यात्म है।
~ चिंतन: शरीर जब शरीर मांगता है - वासना।
               मन जब मन से बंधता है - प्रेम।
               आत्मा जब परमात्मा की और बढ़ता है - भक्ति।

साउथ अफ्रीका के 'गांधी' डेसमंड टुटु

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नोबेल प्राइज विजेता डेसमंड टुटु को इस बार गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। डेसमंड टुटु का जन्म 1931 में सोने की खदानों के लिए प्रसिद्ध ट्रांसवाल में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनका परिवार जोहान्सबर्ग शिफ्ट हो गया था। उनके पिता एक शिक्षक थे। डेसमंड एक फिजिशियन (चिकित्सक) बनना चाहते थे, लेकिन उनका परिवार इसकी शिक्षा का व्यय उठाने में असमर्थ था। टुटु ने प्रिटोरिया बंटु नॉर्मल कॉलेज में 1951 से 1953 तक पढ़ाई की, फिर जोहान्सबर्ग बंटु हाईस्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। 1957 में उन्होंने बंटु एजुकेशन ऐक्ट का विरोध करते हुए नौकरी से इस्तीफा दे दिया। यह ऐक्ट काले (ब्लैक) साउथ अफ्रीकियों की उत्तम शिक्षा के खिलाफ था। टुटु ने पादरियों से प्रभावित होकर चर्च जॉइन करने की सोची। उन्होंने थियोलॉजी में शिक्षा ली और 1960 में वह पादरी बन गए। 1962 से 66 तक वह लंदन में ही रहे और वहीं से थियोलॉजी में बैचलर और मास्टर डिग्री हासिल की। 1967 में वह साउथ अफ्रीका लौट आए और 1972 तक उन्होंने अश्वेत लोगों की स्थितियों को हाईलाइट किया। 1972 में ही वह फिर ब्रिटेन आए, जहां उन्हें थियोलॉजिकल एजुकेशन फंड ऑफ द वर्ल्ड काउंसिल ऍाफ चर्चेस का वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया। कुछ समय तक वह लंदन के थियोलॉजिकल इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में भी कार्यरत रहे। 1975 में वह पहले ऐसे अश्वेत व्यक्ति बने, जिसे जोहान्सबर्ग का डीन बनाया गया। 1976 से पहले टुटु विद्रोही अश्वेतों के मध्य काफी लोकप्रिय थे, लेकिन सोवेटो हिंसा से कुछ दिन पहले वह श्वेत (गोरे) साउथ अफ्रीकियों के सुधार के प्रचारक बन गए। साउथ अफ्रीका में न्याय और नस्लवाद जैसे मुद्दों पर कार्य करते हुए टुटु को अपरिहार्य कारणों से राजनीति में आना पड़ा। वह स्वयं कहते हैं कि उनकी रुचि धर्म में है, न कि राजनीति में। वह अपनी सरकारों को सदैव नस्लवाद के खिलाफ सचेत करते रहे। 1986 में टुटु केपटाउन के आर्कबिशप

निर्वाचित हुए। उन्हें अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 2000 में उन्हें बेट्‌स कॉलेज से एलएचडी की उपाधि मिली, 2005 में यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ फ्लोरिडा ने उन्हें सम्मानित किया। टुटु ने 1989 में प्रेसीडेंट एफडब्लू डी क्लार्क की उदारवादी नीति का समर्थन किया, इसी नीति के तहत नेल्सन मंडेला की रिहाई और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पर से प्रतिबंध हटाया गया। टुटु लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाते भी हैं। डेसमंड टुटु की काबिलियत और ईमानदारी से प्रभावित होकर साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने उन्हें साउथ अफ्रीका ट्रुथ ऐंड रिकंसिलिएशन कमीशन का कार्यप्रभार प्रदान किया। इस कमीशन का काम रंगभेद की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करना होता है। वास्तव में, साउथ अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें दुनिया का हीरो बना दिया है। जब उनके नेता नेल्सन मंडेला को जेल में डाला गया, तो रंगभेद के खिलाफ उनकी अलख को टुटु ने जलाए रखा। 1984 में नोबेल प्राइज से सम्मानित होने वाले टुटु ने हमेशा हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद रखा। 2006 में उन्हें वर्जीनिया के कॉलेज ऑफ विलियम ऐंड मैरी ने डॉक्टर ऑफ पब्लिक सर्विस की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें दलाई लामा द्वारा लाइट ऑफ ट्रुथ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। राजनीतिक जीवन से अब संन्यास ले चुके आर्कबिशप टुटु अपने अदम्य साहस और प्रभाव के कारण विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखते हैं।

चर्चित बयान

-  राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे के अधीन जिम्बाब्वे तानाशाही की ओर जा रहा है।
-  इराक पर अमेरिकी और ब्रिटिश हमला अनैतिक था।
-  2002 में इस्त्राइल पर फलस्तीन के खिलाफ नस्लवादी होने का आरोप लगाया।
-  मैं भारत का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे इस प्रतिष्ठा के काबिल समझा। लेकिन मैं भारत सरकार से पुरजोर सिफारिश करता हूं कि आप तिब्बत की आजादी में अपनी मदद दें।


13 सितंबर 2011

टोने टोटके - कुछ उपाय - 13 (Tonae Totke - Some Tips - 13)

1.  आपका व्यवसाय यदि कम हो गया हो या किसी ने उसे बाँध दिया हो, तो दीपावली से पूर्व धनतेरस के दिन पूजा स्थल पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर 'धनदा यन्त्र' को स्थापित करें और धूप, दीप दिखाएं, नैवेघ अर्पित करें. यह क्रिया करते समय मन ही मन श्रीं श्रीं मंत्र का जप करते रहें. प्रतिदिन नहा धोकर यन्त्र का निष्ठापूर्वक दर्शन करें. 

2.  दीपावली पूजन के समय 501 ग्राम चुहारों का पूजन करें. उनका तिलक करें, धुप दीप से आरती उतारें, प्रसाद का भोग लगाएं और रात्री भर पूजा स्थान पर रखा रहने दें. अगले दिन उन्हें लाल चमकीले या मखमली कपडे में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें. 51  दिन तक प्रतिदिन एक रूपया किसी भी मंदिर में माता लक्ष्मी को अर्पित करें. इससे वर्ष भर लक्ष्मी स्थिर रहती है. 

3.  कोर्ट कचहरी में मुकदमा चल रहा हो तो पांच गोमती चक्रों को दीपावली के दिन पूजन पर रखें. जब तारीख पर कोर्ट जाना हो तो उन्हें जेब में रख कर जाएं, जाते समय मन ही मन इश्वर से विजय की प्रार्थना करते रहें, सफलता प्राप्त होगी. 

4.  यदि आपका उधार लिया हुआ पैसा कोई लम्बे अरसे से नहीं लौटा रहा हो तो, उस व्यक्ति का नाम लेकर ग्यारह गोमती चक्र पर तिलक लगा कर, इष्ट देव का स्मरण कर, उससे निवेदन करें, कि मेरा पैसा जल्द से जल्द लौटा दो. इसके बाद पूजित गोमती चक्रों को पीपल के वृक्ष के पास जमीन में दबा दें. 

5.  व्यापार में हानि, धन नाश, बढ़ते कर्ज, व्यापार में बाधा आदि से मुक्ति पाने के लिए. दीपावली के दिन श्वेतार्क गणपति को गंगाजल से स्नान कराकर लाल वस्त्र पर रखें. फिर उनके समीप लाल चन्दन का एक टुकड़ा, ग्यारह धनदायी कौडियाँ, ग्यारह गोमती चक्र एवं ताम्बे की पादुकाएं या ताम्बे का एक टुकड़ा रखें. शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सफ़ेद कागज़ पर लाल चन्दन से अपनी दुकान का नाम लिखकर इसी सामग्री के पास रखें. लाल चन्दन की माला से "ॐ गं गणपतये नमः" का एक माला जप करें. लाल चन्दन की माला न हो तो रूद्राक्ष की माला से भी जप कर सकते हैं. फिर सारी सामग्री को उसी लाल वस्त्र में लपेट कर पोटली बना लें और उसे लाल मौली या रिबन से बांधें, धूप दीप दिखाएं व व्यापार स्थल में उत्तर पूर्व दिशा में बाँध दें. नित्य प्रातः व्यापार शुरू करने से पहले, उसे धूप दीप दिखाएं. ऐसा करते समय मन ही मन गणपति के पूर्वोक्त मंत्र का जप करते रहे. ऋण मुक्ति का यह बहुत प्रभावी उपाय है. 

6.  गाय को प्रतिदिन दो रोटी तेल लगाकर गुड रखकर खिलाएं, पक्षियों को दाना व जल दें और अपनी आय में से दो गरीबों को भरपेट भोजन कराते रहें, लाभ होगा. 

7.  कार्यसिद्धि के लिए कार्यसिद्धि यन्त्र अत्यंत फलदायी है. अपनी मनोकामना को लाल चन्दन से भोजपत्र पर लिख लें. लाल या पीले वस्त्र पर कार्यसिद्धि यन्त्र स्थापित करें. अगरबत्तियां व घी का दीपक जलाएं और आरती उतारें. कार्य सिद्ध हो जाने पर प्रभु के नाम पर कोई सत्कार्य जैसे कार्य करने को कहें. उदहारणतया पांच गरीबों को भोजन कराने, या घर में भजन कीर्तन कराने या फिर कोई भी सेवा करने का प्राण करें, कार्य सिद्ध हो जाने पर उसे भूलें नहीं. अब भोजपत्र को तह करके कार्यसिद्धि यन्त्र के नीचे रख दें. नित्य प्रति पांच अगरबत्तियां जलाएं और प्रतिदिन इक्कीस बार यन्त्र के सामने अपनी भोजपत्र पर लिखी मनोकामना को दोहराएं, अगरबत्तियों को मुख्यद्वार पर लगाएं. कुछ ही दिनों में आपका कार्य सिद्ध हो जाएगा. 

9.  यदि कमाई का कोई जरिया न हो, तो एक गिलास कच्चे दूध में, चीनी डाल कर जामुन वृक्ष की जड़ में चढ़ाएं. यह क्रिया धनतेरस से शुरू करें और चालीस दिन लगातार करें. कभी-कभी सफाई कर्मचारी को चाय की 250  ग्राम पत्ती या सिगरेट दान करें. सफ़ेद धागे में दीपावली पूजन के पश्चात धागे में दीपावली पूजन के पश्चात ताम्बे का सिक्का गले में पहनें. उस दिन रसोईघर में बैठकर भोजन करें. लाभ स्वयं दिखने लगेगा.    

12 सितंबर 2011

जिनका पाला उस भूत से पड़ा (सत्य कथा)

बात उन दिनों की है जब हर गाँव, बाग-बगीचों में भूत-प्रेतों का साम्राज्य था। गाँवों के अगल-बगल में पेड़-पौधों, झाड़-झंखाड़ों, बागों (महुआनी, आमवारी, बँसवारी आदि) की बहुलता हुआ करती थी । एक गाँव से दूसरे गाँव में जाने के लिए पगडंडियों से होकर जाना पड़ता था। कमजोर लोग खरखर दुपहरिया या दिन डूबने के बाद भूत-प्रेत के डर से गाँव के बाहर जाने में घबराते थे या जाते भी थे तो दल बनाकर। हिम्मती आदमी दल का नेतृत्व करता था और बार-बार अपने सहगमन-साथियों को चेताया करता था कि मुड़कर पीछे मत देखो। जय हनुमान की दुहाई देते हुए आगे बढ़ो।

उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में सोखाओं की तूँती बोलती थी और किसी के बीमार पड़ने पर या तो लोग खरबिरउआ दवाई से काम चला लेते थे नहीं तो सोखाओं की शरण में चले जाते थे। तो आइए अब आप को उसी समय की

एक भूतही घटना सुनाता हूँ- हमारे गाँव के एक बाबूसाहब पेटगड़ी (पेट का दर्द) से परेशान थे । उनकी पेटगड़ी इतनी बड़ गई कि उनके जान की बन गई। बहुत सारी खरविरउआ दवाई कराई गई; मन्नतें माँगी गई, ओझाओं-सोखाओं को अद्धा, पौवा के साथ ही साथ भाँग-गाँजा और मुर्गे, खोंसू (बकरा) भी भेंट किए गए पर पेटगड़ी टस से मस नहीं हुई। उसी समय हमारे गाँव में कोई महात्मा पधारे थे और उन्होनें सलाह दी कि अगर बाबूसाहब को सौ साल पुराना सिरका पिला दिया जाए तो पेटगड़ी छू-मंतर हो जाएगी। अब क्या था, बाबूसाहब के घरवाले, गाँव-गड़ा, हितनात सब लोग सौ साल पुराने सिरके की तलाश में जुट गए। तभी कहीं से पता चला कि पास के गाँव सिधावें में किसी के वहाँ सौ साल पुराना सिरका है।

अब सिरका लाने का बीड़ा बाबूसाहब के ही एक लँगोटिया यार श्री खेलावन अहिर ने उठा लिया । साम के समय खेलावन यादव सिरका लाने के लिए सिधावें गाँव में गए। (सिधावें हमारे गाँव से लगभग एक कोस पर है) खेलावन यादव सिरका लेकर जिस रास्ते से चले उसी रास्ते में एक बहुत पुराना पीपल का पेड़ था और उसपर एक नामी भूत रहता था। उसका खौफ इतना था कि वहाँ बराबर लोग जेवनार चढ़ाया करते थे ताकि वह उनका अहित न कर दे। अरे यहाँ तक कि वहाँ से गुजरनेवाला कोई भी व्यक्ति यदि अंजाने में सुर्ती बनाकर थोंक दिया तो वह भूत ताली की आवाज को ललकार समझ बैठता था और आकर उस व्यक्ति को पटक देता था। लोग वहाँ सुर्ती, गाँजा, भाँग आदि चढ़ाया करते थे।

अभी खेलावन अहिर उस पीपल के पेड़ से थोड़ी दूर ही थे तब तक सिरके की गंध से वह भूत बेचैन हो गया और सिरके को पाने के लिए खेलावन अहिर के पीछे पड़ गया। खेलावन अहिर भी बहुत ही निडर और बहादुर आदमी थे, उन्होंने भूत को सिरका देने की अपेक्षा पंगा लेना ही उचित समझा। दोनों में धरा-धरउअल, पटका-पटकी शुरु हो गई। भूत कहता था कि थोड़ा-सा ही दो लेकिन दो। पर खेलावन अहिर कहते थे कि एक ठोप (बूँद) नहीं दूँगा; तूझे जो करना है कर ले। अब भूत अपने असली रूप में आ गया और लगा उठा उठाकर खेलावन यादव को पटकने पर खेलावन यादव ने भी ठान ली थी कि सिरका नहीं देना है तो नहीं देना है। पटका-पटकी करते हुए खेलावन अहिर गाँव के पास आ गए पर भूत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और वहीं एक छोटे से गढ़हे में ले जाकर लगा उनको गाड़ने। अब उस भूत का साथ देने के लिए एक बुढ़ुआ (जो आदमी पानी में डूबकर मरा हो) जो वहीं पास की पोखरी में रहता था आ गया था। अब तो खेलावन यादव कमजोर पड़ने लगे। तभी क्या हुआ कि गाँव के कुछ लोग खेलावन यादव की तलाश में उधर ही आ गए तब जाकर खेलावन यादव की जान बची।

दो-तीन बार सिरका पीने से बाबूसाहब की पेटगड़ी तो एक-दो दिन में छू-मंतर हो गई पर खेलावन अहिर को वह पीपलवाला भूत बकसा नहीं अपितु उन्हें खेलाने लगा। बाबूसाहब ताजा सिरका बनवाकर और सूर्ती, भाँग आदि ले जाकर उस पीपल के पेड़ के नीचे चढ़ाए और उस भूत को यह भी वचन दिया कि साल में दो बार वे जेवनार भी चढ़ाएँगे पर तुम मेरे लँगोटिया यार (खेलावन यादव) को बकस दो। पीपलवाले भूत ने खेलावन यादव को तो बकस दिया पर जबतक बाबूसाहब थे तबतक वे साल में दो बार उस पीपल के पेड़ के नीचे जेवनार जरूर चढ़ाया करते थे।

उस पीपल के पेड़ को गिरे लगभग 20-25 साल हो गए हैं और वहीं से होकर एक पक्की सड़क भी जाती है पर अब वह भूत और वह पीपल केवल उन पुरनिया लोगों के जेहन में है जिनका पाला उस भूत से पड़ा।
सिरका चाहें आम का हो या कटहल का या किसी अन्य फल का पर यह वास्तव में पेट के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है और जितना पुराना होगा उतना ही बढ़िया ।

प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
( के सौजन्य से )

11 सितंबर 2011

हास्टलवाला भूत

हमारे गाँव के पास ही एक स्नातकोत्तर महाविद्यालय है। इसकी गणना एक बहुत ही अच्छे शिक्षण संस्थान के रूप में होती है। दूर-दूर से बच्चे यहाँ शिक्षा-ग्रहण के लिए आते हैं।

7-8 साल पहले की बात है। बिहार का एक लड़का यहाँ हास्टल में रहकर पढ़ाई करता था। वह बहुत ही मेधावी और मिलनसार था। हास्टल में उसके साथ रहनेवाले अन्य बच्चे उसे दूबेभाई-दूबेभाई किया करते थे। एकबार की बात है कि वह अपने बड़े भाई की शादी में सम्मिलित होने के लिए 15 दिन के लिए गाँव गया। हास्टल के अन्य बच्चों ने उससे कहा कि दूबेभाई जल्दी ही वापस आ जाइएगा।

15 दिन के बाद वह लड़का फिर से आकर हास्टल में रहने लगा। लेकिन अब वह अपने दोस्तों से कम बात करता था। यहाँ तक कि वह उनके साथ खाना भी नहीं खाता था और कहता था कि बाद में खा लूँगा। अब वह पढ़ने में भी कम रुचि लेता था। जब उसके साथवाले बच्चे उससे कुछ बात करना चाहते थे तो वह टाल जाता था। वह दिनभर पता नहीं कहाँ रहता था और रात को केवल सोने के लिए हास्टल में आता था।

घर से हास्टल में आए उसे अभी एक हप्ते ही हुए थे कि एकदिन उसके कुछ घरवाले हास्टल में आए। सबके चेहरे उदासीन थे। एक लड़का उन लोगों से बोल पड़ा कि दूबेभाई तो अभी हैं नहीं, वे तो केवल रात को सोने आते हैं। उस लड़के की बात सुनकर दूबे के घरवाले फफककर रो पड़े और बोले वह रात को भी कैसे आ सकता है।
हमलोग तो उसका सामान लेने आए हैं। अब वह नहीं रहा। हास्टल से जाने के दो दिन बाद ही वह मोटरसाइकिल से एक रिस्तेदार के वहाँ जा रहा था। उसकी मोटरसाइकिल एक तेज आती ट्रक से टकरा गई थी और वह आन स्पाट ही काल के गाल में समा गया था। इतना कहकर वे लोग और तेज रोने लगे। हास्टल के जो बच्चे ये बात सुन रहे थे उन्हे ठकुआ मार गया था और उनके रोएँ खड़े हो गए थे। वे बार-बार यही सोच रहे थे कि रात को जो लड़का उनके पास सोता था या जिसे वे देखते थे क्या वह दूबेभाई का भूत था।

खैर उस दिन के बाद दूबेभाई का भूत फिर कभी सोने के लिए हास्टल में नहीं आया पर कई महीनों तक हास्टल के सारे बच्चे खौफ में जीते रहे और दूबेभाई के रहनेवाले कमरे में ताला लटकता रहा।

लोग कहते रहे कि दूबेभाई को अपने हास्टल से बहुत ही लगाव था इसलिए स्वर्गीय होने के बाद भी वे हास्टल का मोह छोड़ न सके।

कहते हैं आज भी जो बच्चे दूबेभाई के भूत के साथ सोते थे डरे-सहमे ही रहते हैं।

यह घटना सही है या गलत; यह मैं नहीं कह सकता। क्योंकि मैंने यह घटना अपने क्षेत्र के कुछ लोगों से सुनी है।
खैर भगवान दूबेभाई की आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करें।

प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
 (के सौजन्य से)  

भूत भी कई प्रकार के होते हैं........

आज मैं भूतों की जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ वो बुड़ुआओं (एक प्रकार के भूत) के बारे में है। जब कोई व्यक्ति किसी कारण बस पानी में डूबकर मर जाता है तो वह बुड़ुआ बन जाता है। बुड़ुआ बहुत ही खतरनाक होते हैं पर इनका बस केवल पानी में ही चलता है वह भी डूबाहभर (जिसमें कोई डूब सकता हो) पानी में।

हमारे तरफ गाँवों में जब खाटों (खटिया) में बहुत ही खटमल पड़ जाते हैं और खटमलमार दवा डालने के बाद भी वे नहीं मरते तो लोगों के पास इन रक्तचूषक प्राणियों से बचने का बस एक ही रास्ता बचता है और वह यह कि उस खटमली खाट को किसी तालाब, खंता (गड्ढा) आदि में पानी में डूबो दिया जाए। जब वह खटमली खाट 2-3 दिनतक पानी में ही छोड़ दी जाती है तो ये रक्तचूषक प्राणी या तो पानी में डूबकर मर जाते हैं या अपना रास्ता नाप लेते हैं और वह खाट पूरी तरह से खटमल-फ्री हो जाती है।

एकबार की बात है कि हमारे गाँव के ही एक पंडीजी एक गड्ढे (इस गड्ढे का निर्माण चिमनी के लिए ईंट पाथने के कारण हुआ है नहीं तो पहले यह समतल खेत हुआ करता था) में अपनी बँसखट (बाँस की खाट) को खटमल से निजात पाने के लिए डाल आए थे। बरसात के मौसम की अभी शुरुवात होने की वजह से इस गड्ढे में जाँघभर ही पानी था। यह गड्ढा गाँव के बाहर एक ऐसे बड़े बगीचे के पास है जिसमें बहुत सारी झाड़ियाँ उग आई हैं और इसको भयावह बना दी हैं साथ ही साथ यह गड्ढा भी बरसात में चारों ओर से मूँज आदि बड़े खर-पतवारों से ढक जाता है।

दो-तीन दिन के बाद वे पंडीजी अपनी बँसखट (बाँस की खाट) को लाने के लिए उस गड्ढे की ओर बढ़े। लगभग साम के 5 बज रहे थे और कुछ चरवाहे अपने पशुओं को लेकर गाँव की ओर प्रस्थान कर दिए थे पर अभी भी कुछ छोटे बच्चे और एक-दो महिलाएँ उस गड्ढे के पास के बगीचे में बकरियाँ आदि चरा रही थीं।

ऐसी बात नहीं है कि वे पंडीजी बड़े डेराभूत (डरनेवाले) हैं। वे तो बड़े ही निडर और मेहनती व्यक्ति हैं। रात-रात को वे अकेले ही गाँव से दूर अपने खेतों में सोया करते थे, सिंचाई किया करते थे। पर पता नहीं क्यों उस दिन उस पंडीजी के मन में थोड़ा भय व्याप्त था। अभी पहले यह कहानी पूरी कर लेते हैं फिर उस पंडीजी से ही जानने की कोशिश करेंगे कि उस दिन उनके मन में भय क्यों व्याप्त था?

उस गड्ढे के पास पहुँचकर जब पंडीजी अपनी बँसखट (बाँस की खाट) निकालने के लिए पानी में घुसे तो अचानक उनको लगा की कोई उनको पानी के अंदर खींचने की कोशिश कर रहा है पर वे तबतक हाथ में अपनी खाट को उठा चुके थे। अरे यह क्या इसके बाद वे कुछ कर न सके और न चाहते हुए भी थोड़ा और पानी के अंदर खींच लिए गए।

अभी वे कुछ सोंचते तभी एक बुड़ुआ चिल्लाया, "अरे! तुम लोग देखते क्या हो टूट पड़ो नहीं तो यह बचकर निकल जाएगा और अब यह अकेले मेरे बस में नहीं आ रहा है।" तबतक एक और बुड़ुआ जो सूअर के रूप में था चिल्लाया, "हम इसको कैसे पकड़े, इसके कंधे से तो जनेऊ झूल रहा है।" इतना सुनते ही जो बुड़ुआ पंडीजी से हाथा-पाई करते हुए उन्हें पानी में खींचकर डूबाने की कोशिश कर रहा था वह फौरन ही हाथ बढ़ाकर उस पंडीजी के जनेऊ (यज्ञोपवीत) को खींचकर तोड़ दिया।

जनेऊ टूटते ही लगभग आधा दरजन बुड़ुआ जो पहले से ही वहाँ मौजूद थे उस पंडीजी पर टूट पड़े। अब पंडीजी की हिम्मत और बल दोनों जवाब देने लगे और बुड़ुआ बीस पड़ गए। बुड़ुआओं ने पंडीजी को और अंदर खींच लिया और उनको लगे वहीं पानी में धाँसने। पंडीजी और बुड़ुआओं के बीच ये जो सीन चल रहा था वह किसी बकरी के चरवाहे बच्चे ने देख लिया और चिल्लाया की बीरेंदर बाबा पानी में डूब रहे हैं। अब सभी बच्चे चिल्लाने लगे तबतक बुड़ुआओं ने पंडीजी (बीरेंदर बाबा) को उल्टाकर के कींचड़ में उनका सर धाँस दिया था और धाँसते ही चले जा रहे थे। पानी के ऊपर अब रह-रहकर पंडीजी (बीरेंदर बाबा) का पैर ही कभी-कभी दिखाई पड़ जाता था।

बच्चों की चिल्लाहट सुनकर तभी हमारे गाँव के श्री नेपाल सिंह वहाँ आ गए और एक-आध बड़े बच्चों के साथ गड्ढे में घुस गए। गड्ढे में घुसकर उन्होंने अचेत पंडीजी (बीरेंदर बाबा) को बाहर निकाला। पंडीजी के मुँह, कान, आँख और सर आदि में पूरी तरह से कीचड़ लगी हुई थी। अबतक आलम यह था कि हमारा लगभग आधा गाँव उस गड्ढे के पास जमा हो गया था। आनन-फानन में उस पंडीजी को नहलाया गया और खाट पर सुलाकर ही घर लाया गया। कुछ लोगों को लग रहा था कि पंडीजी अब बचेंगे नहीं पर अभी भी उनकी सँसरी (साँस) चल रही थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डाक्टर आ चुके थे और पंडीजी का इलाज शुरु हो गया था। दो-तीन दिन तक पंडीजी (बीरेंदर बाबा) घर में खाट पर ही पड़े रहे और अक-बक बोलते रहे। 15-20 दिन के बाद धीरे-धीरे उनकी हालत में सुधार हुआ पर उनकी निडरता की वजह से उन पर इन दिनों में भूतों का छाया तो रहा पर कोई भूत (बुड़ुआ) उनपर हाबी नहीं हो पाया।

आज अगर कोई उस पंडीजी (बीरेंदर बाबा) से पूछता है कि उस दिन क्या हुआ था तो वे बताते हैं कि दरअसल इस घटना के लगभग एक हप्ते पहले से ही कुछ भूत उनके पीछे पड़ गए थे क्योंकि वे कई बार गाँव से दूर खेत-बगीचे आदि में सुर्ती या कलेवा आदि करते थे तो इन भूतों को नहीं चढ़ाते थे। इस कारण से कुछ भूत उनके पीछे ही लग गए थे जिसकी वजह से वे उन दिनों में थोड़ा डरे-सहमे हुए रहते थे।

पंडीजी आगे बताते हैं कि जो बुड़ुआ पहले उनको पकड़ा वह गुलाब (हमारे गाँव का ही एक ब्राह्मण कुमार जो एक बड़े पोखर में डूबकर मर गया था) था क्योंकि दूसरे किसी भी बुड़ुवे में मेरा जनेऊ तोड़ने की हिम्मत तो दूर पास आने की भी हिम्मत नहीं थी पर जब गुलाब (ब्राह्मण बुड़ुए का नाम) ने जनेऊ तोड़ दिया तो सभी बुड़ुओं ने हमला बोलकर मुझे धाँस दिया।

अगली कहानी में मैं गुलाब के डूबने और उसके बुड़ुआ बनने की बात बताऊँगा।

भूत-पिचास निकट नहीं आवें, महाबीर जब नाम सुनावें।
जय बजरंगबली, जय हनुमान।

पिछली कहानी में हमने देखा कि किस प्रकार आधा दर्जन बुड़ुआओं (भूतों) ने मिलकर एक पंडीजी को गड्ढे में धाँस दिया था और उनको धाँसने में जिस बुड़ुआ ने सबसे अधिक अपने बल और बुद्धि का प्रयोग किया था उसका नाम गुलाब था। मैंने पिछली कहानी में यह भी बता दिया था की जो प्राणी पानी में डूबकर मरता है वह बुड़ुआ (एक प्रकार का भूत) बन जाता है।

अब आइए 40-50 साल पुरानी इस कहानी के माध्यम से यह जानने की कोशिश करते हैं कि गुलाब कौन था और किस प्रकार वह बुड़ुआ (भूत) बन गया था।

स्वर्गीय (स्वर्गीय कहना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि अगर गुलाब स्वर्गीय हो गए तो फिर बुड़ुआ बनकर लोगों को सता क्यों रहे हैं- खैर भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।) गुलाब हमारे गाँव के ही रहने वाले थे और जब उन्होंने अपने इस क्षणभंगुर शरीर का त्याग किया उस समय उनकी उम्र लगभग 9-10 वर्ष रही होगी। वे बहुत ही कर्मठी लड़के थे। पढ़ने में तो बहुत कम रूचि रखते थे पर घर के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। चउओं (मवेशियों) को चारा देने से लेकर उनको चराने, नहलाने, गोबर-गोहथारि आदि करने का काम वे बखूबी किया करते थे। वे खेती-किसानी में भी अपने घरवालों का हाथ बँटाते थे। उनका घर एक बड़े पोखरे के किनारे था। यह पोखरा गरमी में भी सूखता नहीं था और जब भी गुलाब को मौका मिलता इस पोखरे में डुबकी भी लगा आते। दरवाजे पर पोखरा होने का फायदा गुलाब ने छोटी ही उम्र में उठा लिया था और एक कुशल तैराक बन गए थे। आज गाँववालों ने इस पोखरे को भरकर घर-खलिहान आदि बना लिया है।

एकबार की बात है की असह्य गरमी पड़ रही थी और सूर्यदेव अपने असली रूप में तप रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वे पूरी धरती को तपाकर लाल कर देंगे। ऐसे दिन में खर-खर दुपहरिया (ठीक दोपहर) का समय था और गुलाब नाँद में सानी-पानी करने के बाद भैंस को खूँटे से खोलकर नाँद पर बाँधने के लिए आगे बढ़े। भैंस भी अत्यधिक गरमी से परेशान थी। भैंस का पगहा खोलते समय गुलाब ने बचपने (बच्चा तो थे ही) में भैंस का पगहा अपने हाथ में लपेट लिए। (इसको बचपना इसलिए कह रहा हूँ कि लोग किसी भी मवेशी का पगहा हाथ में लपेटकर नहीं रखते हैं क्योंकि अगर वह मवेशी किसी कारणबस भागना शुरुकर दिया तो उस व्यक्ति के जान पर बन आती है और वह भी उसके साथ घसीटते हुए खींचा चला जाता है क्योंकि पगहा हाथ में कस जाता है और हड़बड़ी में उसमें से हाथ निकालना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। ) जब गुलाब भैंस को लेकर नाँद की तरफ बढ़े तभी गरमी से बेहाल भैंस पोखरे की ओर भागी। गुलाब भैंस के अचानक पोखरे की ओर भागने से संभल नहीं सके और वे भी उसके साथ तेजी में खींचे चले गए। भैंस पोखरे के बीचोंबीच में पहुँचकर लगी खूब बोह (डूबने) लेने। चूँकि पोखरे के बीचोंबीच में गुलाब के तीन पोरसा (उनकी तंबाई के तिगुना) पानी था और बार-बार भैंस के बोह लेने से उन्हें साँस लेने में परेशानी होने लगी और वे उसी में डूब गए। हाथ बँधा और घबराए हुए होने की वजह से उनका तैरना भी काम नहीं आया।

2-3 घंटे तक भैंस पानी में बोह लेती रही और यह अभाग्य ही कहा जाएगा कि उस समय किसी और का ध्यान उस पोखरे की ओर नहीं गया। उनके घरवाले भी निश्चिंत थे क्योंकि ऐसी घटना का किसी को अंदेशा नहीं था। 2-3 घंटे के बाद जब भैंस को गरमी से पूरी तरह से राहत मिल गई तो वह गुलाब की लाश को खिंचते हुए पोखरे से बाहर आने लगी। जब भैंस लगभग पोखरे के किनारे पहुँच गई तो किसा व्यक्ति का ध्यान भैंस की ओर गया और वह चिल्लाना शुरु किया। उस व्यक्ति की चिल्लाहट सुनकर आस-पास के बहुत सारे लोग जमा हो गए। पर यह जानकर वहाँ शोक पसर गया कि कर्मठी गुलाब अब नहीं रहा। भैंस ने अपनी गरमी शांत करने के लिए एक निर्बोध बालक को मौत के मुँह में भेज दिया था।

इस घटना को घटे जब लगभग 5-6 साल बीत गए तो लोगों को उस पोखरे में बुड़ुवे (भूत) का एहसास होने लगा। गाँव में यह बात तेजी से फैल गई कि अब गुलाब जवान हो गया है और लोगों पर हमला भी करने लगा है। आज वह पोखरा समतल हो गया है, उसपर घर-खलिहान आदि बन गए हैं पर जबतक उसमें पानी था तबतक गुलाब उस पोखरे में अकेले नहानेवाले कई लोगों पर हमला कर चुका था। एक बार तो वह एक आदमी को खींचते हुए पानी के अंदर भी लेकर चला गया था पर संयोग से किसी महिला की नजर उसपर पड़ गई और उसकी चिल्लाहट सुनकर कुछ लोगों ने उस व्यक्ति की जान बचाई।

प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
  ( के सौजन्य से )