15 अगस्त 2011

भारतवर्ष का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और उर्दू


यह एक सर्वविदित तथ्य है कि किसी भी देश को गुलामी के बंधन से मुक्ति दिलाने में उस देश की भाषा और वहां के साहित्य का बहुत बड़ा योगदान होता है। भारतवर्ष के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का यदि अवलोकन किया जाए तो यह देखकर सुखद अनुभूति होती है कि यहाँ की विभिन्न भाषाओं के कवियों एवं साहित्यकारों ने कलम से तलवार का काम लेकर देशवासियों को यह प्रेरणा दिलाई कि अंग्रेजों को, जिन्होंने जबरदस्ती उनके देश पर कब्जा करके उन्हें परतंत्रता की बेड़ियों में जकड रखा है, देश से निकाल बाहर करें और अपनी मातृभूमि को विदेशी आधिपत्य से मुक्ति दिलाने के लिए किसी भी प्रकार की आहुति देने में संकोच न करें।

जिस समय देश में स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चल रहा था, उस समय भारतीय भाषाओं में उर्दू एक ऐसी भाषा थी जो देश के कोने-कोने में समझी और बोली जाती थी. उर्दू के शायरों और साहित्यकारों ने भी देश के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझा और उसका निर्वाह भी किया. यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी की उर्दू ने पूरे स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास को अपने आप में समाहित कर लिया है। यदि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उर्दू भाषा के योगदान को ही लिपिबद्ध किया जाए तो केवल यही अवलोकन कई वृहद ग्रंथों पर आधारित होगा।
उर्दू के कवि और साहित्यकार देशवासियों के ह्रदय में अंग्रेजी के प्रति विरोध की भावना भड़काने की चेष्टा उसी समय से कर रहे थे जब से अंग्रेज व्यापार के बहाने इस देश पर अपना अधिकार जमाने का प्रयास कर रहे थे। आसिफुददौला की मृत्यु के बाद अंग्रेज किस प्रकार अपने अधिकारों को विस्तृत करने लगे इस तथ्य से देशवासियों को अवगत कराते हुए अकबर अली खां 'अकबर' ने अपनी मसनवी 'सारा मुल्क तहोबाला' में कहा:-

बस इसमें असिफुददौला ने रहलत 
जूँ ही की वूँ ही सर पर आई आफत 
तहो बाला हुआ वह मुल्क सारा
दखील इसमें हुआ आकर नसारा 
यह वीरा आह हिन्दोस्तान हुआ सब 
जहाँ सारा फिरगिस्तान हुआ सब    

उस समय देश की स्थिति क्या थी इस पर शाह कमालुद्दीन 'कमाल' ने इस प्रकार प्रकाश डाला:-
वही यह शहर है और वही यह हिन्दोस्तां
कि जिसको रश्के जिना जानते हैं सब इन्सां
फिरंगियों की सो कसरत से हो सब वीराँ
नजर पड़े हैं बस अब सूरते फिर्गिस्तान 
नहीं सवार या सिवाए तुर्क सवार 
जहाँ की नौबतो शहनाई झांझ की थी सदा 
फिरंगियों का है उस जा पे टमटम अब बजता 
इसी से समझो रहा सल्तनत का क्या रूतबा 
हो जब कि महल सराहो में गौरों का पहरा 
न शाह है न वजीर अब फिरंगी है मुख्तार
न होवे देख के क्यों कर दिल अपना अब मगमूम
हो जब कि जाए हुआ आज आश्यानाएं बूम
वह चहचहे तो बस इस मुल्क में हैं सब मादूम 
फिरंगियों के जो हाकिम थे हो गए महकूम
तो हम गरीबों का फिर क्या है या कतारो-शुमार।

की उर्दू शायरों को यह दुःख था उनकी मातृभूमि विदेशियों के कब्जे में है और फिरंगी दोनों हाथों से उनके देश की धन संपत्ति लूट कर उन्हें कंगाल बना रहे हैं। उनकी रचनाओं में अंग्रेजों के आधिपत्य से मुक्ति पाने की जो छटपटाहट है उसे भलीभांति महसूस किया जा सकता है-
है दुश्मन दकन वह कुलह पोश जिसने फैज
गारत किया है तख़्तए हिन्दोस्तान को 
                                 (शमसुद्दीन "फैज" हैदराबादी)
हिन्दोस्तां की दौलतों-हशमत जो कुछ कि थी 
जालिम फिरंगियों ने बतदबीर खींच ली
                                 ("मुसहफ़ी")
दिल मुल्क अंग्रेज़ी में जीने से तंग है
रहना बदन में रूह को कैदे फिरंग है 
                                 ("नासिख")
हवाए दहर अगर इन्साफ पर आये तो सुन लेना
गुलो बुलबुल चमन में होंगे बाहर बागबां होगा
                                 ("आतिश")
अंग्रेजों के विरूद्ध पकता हुआ नफरत का लावा 1857 में ज्वालामुखी बन कर फूटा तो उर्दू का शायर मूकदर्शक नहीं बना रहा। उसने अंग्रेजों के विरूद्ध अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त कीं, जिसकी उसे सजा भी मिली, किसी ने अंग्रेजों के अत्याचार सहे तो कैद की काल कोठरी किसी का ठिकाना बनी. बहुत बड़ी संख्या ऐसे शायरों की भी थी जिन्हें इस हंगामें में अपनी जान तक से हाथ धोना पडा। जिन शायरों ने उस समय अपनी जान गंवईं उनमें मिर्जा अब्बास बेग बरेलवी "अब्बास" और बदरूल इस्लाम अब्बासी बदायूनी मशहूर थे। अब्बास बेग बरेलवी 'अब्बास' ने 1857 में बाँदा के नवाब का साथ दिया था। जिस शेर के कहने पर उन्हें फांसी की सजा हुई वह शेर था:-
अख्तर झपक गए तेरे खालों के सामने
गोरों के पाँव उठ गए कालों के सामने 
बदरूल इस्लाम अब्बासी बदायूनी की जो नज्म उनकी मौत का कारण बनी उसका एक मिसाल था:
सर कंपनी का कट के बिका एक आने में
1857 के स्वतन्त्रता आन्दोलन में उर्दू के शायरों ने अपनी कविताओं से आन्दोलनकारियों का उत्साह-वर्धन भी किया। 2 अगस्त को बहादुर शाह ने एक ऐसी ही रचना वख्त खाँ को लिख कर भेजी, जो 3 अगस्त 1857 के "सादिकुल" अखबार में प्रकाशित हुई। 1 अगस्त 1857 को बकरीद का त्यौहार था, अंग्रेजों ने प्रयास किया की किसी प्रकार इस अवसर पर दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगा हो जाए लेकिन बहादुर शाह ने अपनी कूटनीति से अंग्रेजों की इस साजिश को नाकाम कर दिया। यह बात अंग्रेजों ने अपनी चिट्ठियों में भी स्वीकार की. एक और तो बहादुर शाह जफ़र ने ऐसे फरमान जारी किए जो हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों को प्रगाढ़ करने में सहायक सिद्ध हुए तो दूसरी तरफ उन्होंने अपनी कविताओं से आन्दोलनकारियों का उत्साह भी बढाया - 
लश्करे आदा इलाही आज सारा क़त्ल हो
गोरखा गूजर से लेकर ता नसारा क़त्ल हो
आज का दिन ईद-ए-कुर्बान का जभी जागेंगे हम 
ऐ जफ़र तहे तेग जब कातिल तुम्हारा क़त्ल हो
इसी सम्बन्ध में मुंशी गुलाम अली मुश्ताक ने भी दो कते कहे जो 3 अगस्त के ही 'सादिकुल' अखबार में प्रकाशित हुए:
ईद हर साल तुम्हें तहानियत आमेज रहे
गर्के खून जाने उर्दू खंजरे खूँ-रेज रहे  
क़त्ल कुफ्फार हों और फतह मुबारक हों जफ़र
नाम को भी न जहाँ में सरे अंग्रेज रहे
जिस समय प्रथम स्वतन्त्रता आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर था उस समय मुहम्मद हुसैन आजाद ने एक नज्म 'तारीखे इन्कलाब इबरत 'अफ्जा' कही जिसकी एक-एक पंक्ति अंग्रेजों से नफरत के जहर में बुझी थी-
है कल का अभी जिक्र कि जो कौन नसारा
थी साहबे इक्बालो जहाँ बख्शो जहाँ दार 
थी साहबे इल्मो हुनर हिवमतो फितरत  
थी साहबे जाहो हशम लश्करे जर्रार 
सब जौहरे अक्ल उनके रहे टाक पे रखे
सब नाखुने तदबीर खिरद हो गए बेकार 
उर्दू को यह श्रेय भी प्राप्त है कि इसी भाषा में भारत का पहला कौमी तराना लिखा गया जिसे नाना साहब के सहयोगी अजीमुल्ला खाँ ने लिखा था। यह तराना ब्रिटिश म्यूजियम लन्दन में सुरक्षित है। यह तराना उस समय के अखबार 'पयामे आजादी' में प्रकाशित हुआ, जिसमें 1857  के स्वतंत्रता संग्राम से सम्बंधित साहित्य प्रकाशित होता था। देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत इस तराने के कुछ शेर प्रस्तुत हैं:
हम हैं इसके मालिक हिन्दोस्तां हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा
कितना कदीम कितना नईम सब दुनिया से न्यारा 
करती है जरखेज जिसे गंगोजमन की धारा 
इसकी खानें उगल रही हैं सोना हीरा पारा
इसकी शानों शौकत का दुनिया में जैकारा
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा 
लूटा दोनों हाथ से प्यारा वतन हमारा
आज शहीदों ने हैं तुमको अहले वतन ललकारा 
तोड़ गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा 
हिन्दू मुस्लमाँ सिख हमारा भाई-भाई प्यारा 
ये है आजादी का झण्डा इसे सलाम हमारा       

1857  में उर्दू के शायरों ने अपनी कविताओं से भारतवासियों के ह्रदय में देश प्रेम की भावना जगाई तो उलेमाओं ने अपने फताबों और पंडितों ने अपने उपदेशों से देशवासियों के दिलों में अंग्रेजों के प्रति घृणा की ज्वाला धधकाई। अंग्रेजों के विरोध दी गए फतवों की जबान भी उर्दू ही थी। बख्तखां बरेली से दिल्ली आए तो उन्होंने एक फतवा लिखवा कर वितरित करवाया। इस फतवे पर चौंतीस उलेमाओं के हस्ताक्षर थे। 1857 में न केवल दिल्ली वरन देश के दूसरे भागों में फतवा प्रकाशित कराकर लोगों को लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रेरित किया गया। अंग्रेजों ने फतवा जारी करने वाले उलेमाओं पर जमकर गुस्सा निकाला। मौलवी लियाकत अली जिन्होंने इलाहबाद में और मौलवी इनायत अली जिन्होंने रूहेलखण्ड में अंग्रेजों के विरूद्ध फतवा दिया, इन दोनों को स्वंतंत्रता संग्राम कुचलने के बाद काला पानी भेज दिया गया।

अंग्रेजों के विरूद्ध विरोध की भावना उन एलानों और पोस्टरों ने भी भड़काई जो प्रकाशित करके देश के विभिन्न भागों में वितरित किए गए या जगह-जगह चिपकाए गए। इन पोस्टरों की भाषा भी उर्दू थी। ये इश्तेहार गुप्त रूप से लगाए जाते थे और लगाने वाले पकड़ में भी नहीं आते थे। इसका कारण यह था की इस प्रकार की गतिविधियों में स्वयं पुलिस भी मिली होती थी। लखनऊ में लगाए गए एलान में लिखा था-
"हिन्दू, मुसलामानों मुत्तहिद (एकजुट) होकर उठो और एक ही बार मुल्क की किस्मत का फैसला कर दो क्योंकि अगर मौक़ा हाथ से निकल गया तो तुम्हारे लिए जान बचाने का भी मौक़ा हाथ न आएगा। ये आख़िरी मौक़ा है, अब या कभी नही"

इसी प्रकार मद्रास में भी अंग्रेजों के खिलाफ नफरत का प्रचार एक एलान के द्वारा किया गया। इसके बारे में मशहूर हुआ कि इसे मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने प्रकाशित कराया था। इस एलान में लिखा था-

"देशवासियों और धर्म के मानने वालो तुम एक साथ उठो फिरंगियों को बर्बाद करने के लिए, जिन्होंने हमारे मुल्क को ख़ाक में मिलाने का इरादा किया है। सिर्फ एक ही इलाज है और वह यह कि रक्त-रंजित जंग की जाए। यह आजादी के लिए जिहाद है - यह हक़ और इंसाफ़ के लिए धर्म युद्ध है"

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उर्दू ने पग-पग पर साथ दिया। दिल्ली पर आन्दोलनकारियों का कब्जा हुआ तो लोकतंत्र पर आधारित एक कोर्ट का गठन हुआ। इस कोर्ट का क़ानून उर्दू में ही प्रकाशित किया गया आन्दोलनकारियों ने एक दूसरे से फ़ौजी सहायता प्राप्त करने के लिए जो पत्र भेजे उनकी भाषा भी उर्दू थी। प्रस्तुत है ऐसे ही एक पत्र का अंश जिसे धार के आन्दोलनकारियों, शाहजादा फिरोजशाह के नाम भेजा गया था-

"हमारे और अंग्रेजों के बीच लड़ाई हो रही है, जिसमें हम हार गए हैं। हमने धार के इलाके में पनाह ली है। आप हमें दो हजार से लेकर तीन हजार फ़ौज से मदद दीजिए, ताकि हम सफलता प्राप्त कर लें, खुदा के लिए पत्र देखते ही सहायता भेज दीजिए-हम क्या लिखें हमारी हार-हार है।"

दुर्भाग्यवश यह पत्र शहजादा फिरोजशाह तक नहीं पहुँच सका और इसे नवाब जावरा के आदमियों ने पकड़ लिया, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के वफादार थे, इसे इन्होने इंदौर में ब्रिटिश रेजिडेंट को सौंप दिया।

जिस समय खान बहादुर खान गिरफ्तार हुए उस वक्त अंग्रेजों ने उनके पास से 36  कागजात बरामद किए जिनकी भाषा उर्दू थी इनमें के पत्र बहादुर शाह का था, जिसे पढ़कर अंग्रेज आश्चर्यचकित रह गए की यह ख़त इतनी देखभाल के बाद खान बहादुर खान तक किस प्रकार पहुंचा। इन्हीं पत्रों में से एक पत्र हजरत महल का भी था जिसमें हजरत महल ने खान बहादुर खान से सहायता माँगी थी।

1857 में असंख्य आन्दोलनकारियों ने फांसी के फंदे को गले में डालने से पूर्व अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अपने ह्रदय के उदगारों को इसी भाषा में व्यक्त किया। नादिर खाँ जो नाना साहब के निकटतम साथी थे उन्हें जब फांसी के लिए ले जाया जाने लगा तो उन्होंने अपने देशवासियों को इन शब्दों से संबोधित किया :
अपनी तलवारें उस वक्त तक म्यान में न करना, 
जब तक अंग्रेजों को ख़त्म करके आजादी न प्राप्त हो जाए।
1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन में उर्दू के प्रेम और अखबार का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं रहा। उर्दू के कवियों और साहित्यकारों की तरह उर्दू के पत्रकारों ने भी इस आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और इसके लिए उन्होंने कठोर यातनाएं भी सहन की।

अंग्रेजों ने ऐसे प्रेस और उनके मालिकों पर जमकर गुस्सा निकाला जिन्होंने 1857  के आन्दोलन में किसी भी प्रकार से हिस्सा लिया था। "देहली उर्दू अखबार" के एडीटर मौलवी मुहम्मद बाकर को गोली मार दी गयी। "सादिकुल अखबार" के एडीटर जमीलुद्दीन को तीन साल के कठोर कारावास का दंड मिला और उनकी जायदाद जब्त कर ली गयी। कलकत्ता के अखबार "गुलशने नौबहार" की प्रेस को भी अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। अंग्रेजों के विरूद्ध भावनाएं भड़काने में जिस प्रेस की भूमिका सबसे अधिक सराहनीय रही वह था बरेली का "बहादुरी प्रेस"। इस प्रेस के संस्थापक मौलवी क़ुतुब शाह ने 'बहादुरी प्रेस' की स्थापना 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की थी। 1857 का हंगामा हुआ तो कुतुबशाह बरेली कालेज में उर्दू फारसी के अध्यापक थे, उन्होंने इस लड़ाई में भाग लेने के लिए बरेली कालेज की नौकरी छोड़ दी और बरेली कालेज लाइब्रेरी और दूसरे सामानों को नीलाम करके उन्हीं पैसों से 'बहादुरी प्रेस' की स्थापना की और रूहेलखंड में 1857 के आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले खान बहादुर खाँ के नाम पर इस प्रेस का नाम "बहादुरी प्रेस" रखा था। इस प्रेस से बड़ी संख्या में अंग्रेज विरोधी इश्तेहार प्रकाशित हुए। बहादुर शाह जफ़र, खान बहादुर खाँ और शाहजादा फिरोजशाह की अपीलें इसी प्रेस  हुईं। खान बहादुर खान के एलान में भारतवासियों को यह प्रेरणा दी गयी कि वे एक जुट होकर विदेशी आधिपत्य से अपनी मातृभूमि को मुक्ति दिलाएं और अंग्रेजों की हर साजिश को नाकाम कर दें।

"हिन्दू, मुसलमान भाइयो तुम्हें मालूम होना चाहिए की अगर तुमने अंग्रेजों को यहाँ रहने दिया तो यह तुम सब को ख़त्म करके तुम्हारे दीन और धर्म को तबाह कर देंगे। हिन्दोस्तानियों को इतनी लम्बी अवधि से अंग्रेज धोखा दे रहे हैं और उन्हीं की तलवार से उनका गला काट रहे हैं। वह फिर फूट डालने का अपना पुराना हथियार इस्तेमाल करेंगे लेकिन हिन्दू भाइयो उनके धोखे में न आना हमें यह बताने की जरूरत नहीं कि अंग्रेज कभी अपने वायदे पूरे नहीं करते। वे चालबाज और विश्वासघाती हैं। इस पवित्र लड़ाई में शामिल हो जाओ एक झंडे के नीचे लड़ो और खून की तलवार नदियों से अंग्रेजों का नाम और निशान हिन्दोस्तान से धो डालो।"

इसी प्रकार शहजादा फिरोजशाह के एलान में, जो इसी प्रेस से प्रकाशित हुआ, भारतवासियों को अंग्रेजों की कूटनीतिक चालों से सचेत कराकर उन्हें इस बात के लिए तत्पर करने की चेष्टा की गयी कि वे देशहित में अपने तन, मन और धन की आहुति देने में संकोच न करें। स्वयं क़ुतुब शाह ने अपनी ओर से ऐसे एलान प्रकाशित कराए जिनमें अंग्रेजों की 'लड़ाओ ओर हुकूमत करो' की नीति से देशवासियों को होशियार कराने की कोशिश की गयी। अंग्रेजों के विरूद्ध नफरत की भावना भड़काने वाले सभी ऐलानों पर प्रकाशक एवं मुद्रक की हैसियत से मौलवी क़ुतुब शाह का नाम छापा होता था। अंग्रेज अपने ऐसे खुले दुश्मन को भला क्यों माफ़ कर देते रूहेलखंड पर कब्जे के बाद क़ुतुब शाह की तलाश शुरू हुई, वह मेरठ से गिरफ्तार हुए मेरठ से वह बरेली लाए गए। उन पर मुकदमा चलाया गया। पहले उनके लिए फांसी की सजा देने का फैसला हुआ लेकिन बाद में यह सजा आजीवन कारावास में बदल दी गयी ओर उन्हें अंडमान भेज दिया गया। देशहित में कालापानी की सजा स्वीकार करके सैयद क़ुतुब शाह ने उर्दू साहित्य के इतिहास में ही नहीं वरन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में भी अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करा लिया।

जिस भाषा ने मातृभूमि के मस्तक से गुलामी का दाग छुड़ाने के लिए इतना महत्वपूर्ण योगदान दिया उसके इतिहास का अवलोकन किए बिना कुछ लोग इसे देश को तोड़ने वाली भाषा का आरोप मढ़ कर इसे तिरस्कृत करने की चेष्टा करते हैं, कुछ तो इसे वर्ग विशेष की भाषा बताकर लोगों को दिग-भ्रमित करने का कार्य करते हैं। जबकि उर्दू भाषा का इतिहास यह सिद्ध करता है कि इसने दिलों को तोड़ने का नहीं जोड़ने का काम किया है इकबाल के शब्दों में उर्दू का कवि तो इस बात के लिए प्रतिज्ञाबद्ध था की
 पिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दोनों को 
जो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ करके छोडुंगा 
उर्दू भाषा पर लगाया गया यह आरोप भी निराधार है कि यह ख़ास वर्ग या धर्म की भाषा है क्योंकि इसे सजाने संवारने ओर निहारने में हर वर्ग ने बराबर का योगदान दिया है। इस भाषा ने, जिसका जन्म ही इस देश में हुआ, एक भारतीय भाषा होने की हैसियत से अपने कर्तव्य को समझा भी है ओर निभाया भी है। भारतवर्ष के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उर्दू भाषा का योगदान देश की किसी भी दूसरी भाषा की तुलना में किसी प्रकार से कम नहीं है।

13 अगस्त 2011

प्रखर व्यक्तित्व के धनी संत कबीर


संत कबीर ने अपनी एक साखी में लिखा है की संतों का लक्षण उनका निर्वैर और निष्काम होना, प्रभु प्रेम में मग्न और विषयों से विरक्त होना है -
नीरवैरो निहकामता साईं सेतो नेह।
विषयां सू न्यारा रहे संतान को अंग एह।।

इसी भाव से चौथे गुरू, गुरू रामदास ने व्यक्त करते हुए कहा था की जिसे श्वास-प्रश्वास में अपने ह्रदय से हरि का नाम विस्मृत नहीं होता, वह धन्य है, वही पूर्ण संत है -
जिना सासि गिरासि न वीसरै हरिनाम मणि मंत।।
धंनु सि सोई नानका पूरण सोई संत।।

 आदि ग्रन्थ में संग्रहीत 15 संत कवि विभिन्न प्रदेश, विभिन्न परिवेश, विभिन्न संस्कारों, विभिन्न समय में अवतरित व्यक्ति थे, फिर भी उनमें अनेक बातों में वैचारिक और मानसिक एकता थी। इन संतों को उनकी विचारधारा के अनुसार निर्गुण और सगुण में बांटने की प्रथा उतनी ही प्राचीन दिखती है। अधिसंख्य संतों का आग्रह परमात्मा के निर्गुण स्वरुप की ओर था। वे अवतारवाद के विरोधी थे। मूर्तिपूजा का खंडन करते थे, वर्ण व्यवस्था और जात-पात में उनका विशवास नहीं था। सगुणवादी धारा परम्परागत वैष्णव धारा से जुडी हुई थी। उसके प्रस्तोता अधिकतर सनातनी ब्रह्मण थे। निर्गुण संतों में अब्राह्मणों का बाहुल्य था। उनमें अत्यंत जातियों के ऐसे भक्त भी थे जिन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था समान पूजन का अधिकार नहीं देती थी। अवतारों की मूर्तियों से सज्जित मंदिर में उनका प्रवेश निषिद्ध था। मंदिर के बाहर खड़े रहकर उसके कलश मात्र के दर्शन से ही संतुष्ट हो जाना ही उनकी सीमा थी।

परमेश्वर की निर्गुण-निराकार अवधारणा उन्हें वर्ण और ऊंच-नीच की सीमाओं से मुक्त कर देती थी। सर्व्यापी, घट-घट वाली ब्रह्म की प्राप्ति के लिए उन्हें किसी मंदिर, किसी पुरोहित, किसी कर्मकांड, किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं थी। संत कबीर ने इस विभेद को अनेक स्थलों पर रेखांकित किया है -
जानसि काठ कथसि अयाना
हम निर्गुण तुम सरगुण जाना


माध्यमयुग के भक्ति आन्दोलन का प्रारम्भ दक्षिण के द्रविड़ प्रदेश से हुआ माना जाता है। यह भी कहा जाता है की उसे उत्तर में स्वामी रामानंद लाए और संत कबीर ने उसे चतुर्दिक फैला दिया -
भगती द्राविड ऊपजी लाए रामानंद
परगट किया कबीर ने सात दीप नव खंड 

आदि ग्रन्थ में संग्रहीत 15 संतों की वाणी में सबसे अधिक रचनाएं संत कबीर की हैं - 292 पद और 249 श्लोक। इनका योग 541 है। भारतीय साहित्य में कबीर का अनन्य स्थान है। जीवन भर काशी में रहकर वे कट्टर ब्राह्मणों और मुल्लाओं से जूझते रहे और उन्हें खरी-खोटी सुनाते रहे। उस समय परंपरागत मान्यता यह थी की काशी मोक्ष का द्वार है और उसके पास का नगर मगहर इस बात के लिए अभिशप्त है की वहां जिसकी मृत्यु होती है वह नरक का भागी होता है। संत कबीर ने इस चुनौती को स्वीकार किया था। जीवन भर काशी में रहकर वे अंत समय में मगहर चले गए थे। आदि ग्रन्थ में शामिल उनकी रचनाओं में ऐसे संकेत हैं-
अब कहु राम कवन गति मोरी।
तजीले बनारस मति भई थोरी।।
सगल-जनम शिवपुरी गवाया।।
मरती बार मगहरि उठि धाया।। 

संत कबीर के सम्बन्ध में यह बहुप्रचलित चर्चा है कि वे एक विधवा ब्रह्माणी के पुत्र थे। लोक लाज के डर से माँ ने उन्हें त्याग दिया था। उनका पालन-पोषण नीरू नाम के एक मुसलमान जुलाहे ने किया था। उनका परिवेश इस्लामी परिवेश था, इस बात का संकेत संत रविदास ने भी किया है जो काशी निवासी थे और कबीर के समकालीन थे। रविदास कहते हैं कि जिनके घर के लोग इर्द-बकरीद के अवसर पर गोवध करते हैं, शेख, शहीद और पीर मानते हैं, उन्हीं के पूत ने इसके बिलकुल विपरीत किया। इसी कारण कबीर तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गए-
जो कै ईद कबरीदि कुल गऊ रे बधु करहि
मानीअहि सेख, सहीद, पीरा।।
जा कै बाप वैसी करी, पूत ऐसी सरी।।
तिहू रे लोक परसिध कबीरा।।

मध्ययुगीन धर्म साधना के दो स्वरुप हमारे सम्मुख स्पष्ट से उभरते हैं। एक शास्त्रमार्गी और दूसरा लोकमार्गी। आधुनिक विद्वान् आठवीं शती को भारतीय साहित्य के पूर्व की अंतिम सीमा मानते हैं। आठवीं से अठारवीं शती तक को सामान्यतया मध्ययुग माना जाता है। इस काल के भी दो भाग हैं। आठवीं से तेरहवीं शती तक का काल पूर्व मध्य युग है और तेरहवीं से अठारहवीं शती तक का काल उत्तर मध्य युग है।

पूर्व मध्ययुग (गुप्तकाल) में हिन्दू धर्म का जो स्वरुप विक्सित हुआ था उसमें पूर्ववर्ती आर्य ग्रंथों को अकाट्य रूप से मानने के प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती गयी थी। वेदों को स्वतः प्रमाण मानने के आग्रह से यह बद्धमूल हो गयी और वेदविरोधी सम्प्रदायों को नास्तिक और हेय माना जाने लगा। प्राय सभी सम्प्रदायों के उपास्य देवताओं की मूर्ती कल्पित की गयी और प्रत्येक देवता की शक्ति की भी कल्पना की गई। इन  देवियों और देवताओं की स्तुति में मनोहर काव्य रचे गए। यह चिंतन पूरी तरह शास्त्रमार्गी चिंतन था।

बौद्ध धर्म का चिंतन प्रारम्भ से ही लोकमार्गी चिंतन था। इस काल में यह चिंतन वैदिक-पौराणिक हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी प्रतिरोधी शक्ति था। महाभारत और भगवत आदि ग्रंथों में कलियुग का बड़ा ही चिंताजनक और उद्वेलित करने वाला रूप चित्रित किया गया है। प्रायः प्रत्येक पुराण में इस बात पर आग्रह किया गया है की कलियुग में लोगों का चरित्र पतित हो जाएगा। श्रुति-स्मृति में दिए गए निर्देश मिटने लगेंगे। वर्णाश्रम वयवस्था टूटने लगेगी। शूद्र लोग संन्यास लेकर उच्च वर्णों को उपदेश देने का ढोंग रचेंगे। स्त्रियाँ चरित्रहीन हो जाएँगी। अनेक पुरानों में ज्यों-का-त्यों पाया जाने वाला एक श्लोक मिलता है, जिसके अनुसार कलियुग में वे लोग धर्मोपदेश करेंगे जो शठतायुक्त बुद्धि के होंगे। उनके दांत सफ़ेद होंगे (भ-दन्त) वे जितेन्द्रिय होने का दावा करेंगे तथा मुंडित और काषाय वस्त्र धारण करने वाले होंगे-
शुक्ल दन्ता जिताक्षाशय मुण्डाः काषायावाससः।।
शुद्ध धर्म वदिष्यन्ति शाठ्य बुद्धयोप जीविनः ।। 
ये सभी संकेत बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए हैं। बुद्ध ने शूद्रों को भी सन्यासी बनाकर उपदेश देने की अनुमति दी थी। बौद्ध विहारों में स्त्रियों के प्रवेश को स्वीकार किया गया था। बौद्ध भिक्षु मुण्डित होते थे, काषाय वस्त्र धारण करते थे। भदन्त, बौद्धों में अति सम्मानित व्यक्ति को कहा जाता था। बुद्ध ने वेदों को अपौरूषेय और अकाट्य नहीं स्वीकार किया है। वैदिक धर्मी बुद्ध-दर्शन को नास्तिक दर्शन मानते थे।

उत्तर मध्य युग में शास्त्रमार्गी और लोकमार्गी भक्ति धाराएं समान्तर चलीं और टकराईं भी। सगुण धारा और निर्गुण धारा इनका प्रतिनिधत्व करती हैं। संत कबीर के समय निर्गुण और सगुण भक्तिधारा का टकराव बहुत मुखर हो जाता है। कबीर शास्त्र और ब्राह्मण की प्रभुता को पूरी तरह नकारते हैं। शास्त्र पढने वाले पंडित को संबोधित करते हुए वे कहते हैं - पोथियों को पढ़कर कोई पंडित नहीं हो जाता। जो प्रभु-प्रेम का एक अक्षर पढ़ लेता है, वह पंडित हो जाता है -

पोधी पढि-पढि जग मुआ पंडित भया न कोइ।
एकै आखर प्रेम का पढै सो पंडित होइ।। 

संत कबीर शास्त्र अध्ययन की उपेक्षा अपने अनुभव, जो उन्होंने लोगों के बीच रह कर प्राप्त किया था, पर अधिक बल देते हैं -
तू कहता कागद की लेखी 
मैं कहता आँखिन की देखी।।

किन्तु शास्त्रमार्गी सगुण कवि यह स्वीकार नहीं करते की श्रुतियों द्वारा निर्धारित मार्ग से कोई विरत हो कर ईश्वर भक्त हो सकता है। वे शूद्रों का तत्व ज्ञानी होना स्वीकार नहीं करते। संत तुलसीदास की मान्यता थी की श्रुतियों ने वर्ण व्यवस्था के माध्यम से सभी वर्णों के धर्म और कर्तव्य निर्धारित कर दिए हैं। उनका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। शूद्रों को ब्राह्मणों से बराबरी का दावा नहीं करना चाहिए।

बादहिं सूद्र द्विजन सन हम तुम ते कछु घाटि।।
जानहि ब्रह्म सो विप्रवर आंखि देखावहि डांटि।। 

एक स्थान पर तुलसीस ने लिखा है -
सूद्र करहि जप तप ब्रत नाना। बैठी बरासन कहहि पुराना।।
सूद्र द्विजन उपदेसहि ज्ञाना। मेली जनेऊ लेई कुदाना।।

संत रविदास ने अपने एक पद में कहा था कि यदि कोई ब्राह्मण गुणहीन न हो तो वह पूज्य नहीं है। यदि कोई चांडाल ज्ञान में प्रवीण हो तो उसके पाँव पखारने चाहिए।

रैदास ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुनहीन।।
पाँव पूज चण्डाल के जो हो ज्ञान प्रवीन।। 

इसके उत्तर में गोवामी तुलासीदार ने कहा है की श्रुतिनीति तो यह है की सबसे पहले ब्राह्मण के पैर पखारने चाहिए। यदि कोई ब्रह्मण शील-गुण हीन हो तो भी वह पूज्य है। उसके सम्मुख यदि कोई शूद्र गुण-ज्ञान में प्रवीन हो तो वह तजे जाने योग्य है -

प्रथमहि विप्रचरन अति प्रीती। निज-निज करम निरत श्रुति नीती।
पूजहिं विप्र सील गुण हीना। तजयि सूद्र गुण ज्ञान प्रवीना।। 

किन्तु निर्गुण संतों में बहुतायत उनकी थी जिन्हें शूद्रों की श्रेणी में रखा जाता था। नामदेव छीपा थे, सैण नाई थे, सदना कसाई थे, रविदास चमार थे, धन्ना जाट थे और कबीर जुलाहा थे। गुरू नानक तथा उनके परवर्ती गुरू सवर्ण समाज के खत्री थे किन्तु उनकी प्रतिबद्धता उन संतों के साथ थी, जिन्हें शास्त्रमार्गी सगुण धारा स्वीकार नहीं करती थी।

मध्ययुगीन संतों में कबीर का अनन्य स्थान है। अपने जीवनकाल और उसके पश्चात अनेक शताब्दियों तक वे भक्ति-संसार पर पूरी तरह छाए रहे। समकालीन संतों में उनकी असीम प्रशंसा भी हुई और एक पक्ष द्वारा उनकी बरसक निंदा भी हुई। स्तुति-निंदा के मध्य किसी की चिंता न करते हुए एक फक्कड़ संत की भांति वे बीच बाजार में अपनी लुकाटी लिए उद्घोष करते रहे-
 कबिरा खडा बाजार में लिए लुकाटी हाथ।। 
जो घर जाले आपना सो चले हमारे साथ।।
 संत कबीर का समय अत्यंत संकट का समय था। तुर्की और पठानों का शासन स्थापित हुए चार सदियों से अधिक समय व्यतीत हो चुका था। चारों और गहरा अवसस छाया हुआ था। स्वामी वल्लभाचार्य ने इस अवसाद को व्यक्त करते हुए कहा था : 'देश मलेच्छक्रांत है, गंगादि तीर्थ उनके द्वारा भ्रष्ट हो रहे हैं, आशंका और अज्ञान के कारण वैदिक धर्म नष्ट हो रहा है, सत्पुरुष पीड़ित तथा ज्ञान विस्मृत हो रहा है, ऐसी स्थिति में एकमात्र, कृष्णाश्रय में ही जीवन का कल्याण है।' किन्तु संत कबीर को ऐसे विकल्पहीन समर्पण में ही समस्या का पूर्ण निदान नहीं दिखाई दिया था। निराशा भरी स्थिति उन्हें उद्वेलित करती थी, आक्रोश से भरती थी। एक और वे अपने समय के पंडों, पुरोहितों, काजियों, मुल्लाओं को उनके पाखंडपूर्ण चरित्र के लिए खरी-खोटी सुनाते थे, तो दूसरी ओर भविष्य में उभरने वाले किसी संभावित प्रतिरोध और संघर्ष की मनोभूमिका भी तैयार करते थे। संत कबीर के जीवन पर चर्चा करते हुए उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष अनदेखा-सा रह जाता है। कबीर का एक पद है -  
गगन दमामा बाजियों, परयो निताने घाउ।
 खेत जो मंडियों सूरमा, अब जूझन को दाउ।। 
 सूरा सो पहचानी, जू लरै दीन के हेत।
पुरजा-पुरजा कटि मरै, कबहूँ न छाडे खेत।।

इस पद की शब्दावली पूरी तरह वीर रस से भरपूर दिखती है और भक्ति काल के अन्य संतों-भक्तों से बहुत भिन्न दिखाई देती है। यह शब्दावली किसी भी सूरमा को इस बात के लिए प्रेरित करती है कि वह दीन (गरीब और पीड़ित) जनों की रक्षा के लिए युद्ध करे। इस कार्य में चाहे उसके टुकडे-टुकडे हो जाएं, किन्तु वह रणभूमि त्यागने का भाव अपने मन में न आने दे।   

आकाश का नगाड़ों की ध्वनि में गुंजारित होना, शास्त्र-द्वारा ठीक निशाने पर घाव लगाना। सूरमा द्वारा रणभूमि को खेत की भाँती गोडना और उसमें जूझने का अवसर ढूंढना, दीन-दुनियाँ के लिए सूरमा  बनकर लड़ना और
टुकडे-टुकडे होकर मर जाना किन्तु रणभूमि को न छोड़ने के निश्चय पर दृढ रहना - ऐसी आकांशा है जो भक्ति काल की सम्पूर्ण मनोभूमिका से सर्वथा अलग दिखाई देती है। कबीर का व्यक्तित्व बहुत विरल था। उनके समकालीन संत उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। अपनी भक्ति की अनंतता पर उन्हें पूरा विश्वास था। इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने कहा था की जीवन रूपी सफ़ेद चादर ऋषियों-मुनियों ने भी ओढी, किन्तु वे भी उसे निष्कलुष नहीं रख सके थे, किन्तु कबीर दास ने उस पर कोई दाग नहीं लगने दिया। उन्होंने उसे पवित्र रख कर प्रभु को वापस कर दिया - 

सो चादर सुन नर मुनि ओढी।
ओढ़ी के मैली कीनी चदरिया।।
दास कबीर जतन से ओढी।
ज्यों का त्यों धर दीनी चदरिया।।

07 अगस्त 2011

प्रेम सिखाया नहीं जा सकता

प्रेम एक हार्दिक घटना है। ना तो प्रेम की कोइ प्रामाणिक व्यव्यस्था है और न ही कोई विधि है। न कोई तंत्र है न कोई मंत्र। चूंकि प्रेम एक हार्दिक भाव है इसलिए प्रार्थना भी एक हार्दिक भाव है। प्रेम सिखाया नहीं जा सकता क्योंकि सीखना मस्तिष्क के ताल की घटना है इसलिए प्रार्थना भी सिखाई नहीं जा सकती। विज्ञान सिखाया जा सकता है। 'केमिस्ट्री, फिजिक्स, गणित' आदि सिखाये जा सकते हैं परन्तु धर्म सिखाया नहीं जा सकता। इसलिए सीखी हुई प्रार्थना के परिणाम नहीं मिलते। दरअसल प्रेम, प्रार्थना और परमात्मा ये सब एक ही ताल पर घटने वाली घटनाओं के नाम हैं और वह ताल मष्तिष्क में नहीं ह्रदय स्थल पर स्थित होता है। टालस्टांय़ की एक छोटी सी कहानी से समझने का प्रयास करें।

एक झील के उस पार तीन बेपढ़े-लिखे फ़कीर रहते थे। उनकी बड़ी ख्याति हो गयी थी की वे बड़े पवित्र पुरूष हैं। ये खबर बड़े पुरोहित के पास पहुँची तो उसने कहा उन्होंने तो दीक्षा भी नहीं ली है वे पवित्र कैसे हो सकते हैं? वह पुरोहित नाव पर बैठ झील के उस पार पहुंचा। वे तीनों फ़कीर एक पेड़ के नीचे बैठे थे। जब वह महापुरोहित उनके सामने आया तो उन तीनों ने झुक कर उसको प्रणाम किया। महापुरोहित ने पूछा तुम क्या करते हो? क्या है तुम्हारी प्रार्थना? तुम्हारी पद्वति क्या है? तुमने प्रार्थना कहाँ से सीखी? वे तीनों एक दूसरे के तरफ देखने लगे। उन्होंने कहा हम पढ़े लिखे नहीं हैं, ना ही किसी ने हमें कुछ सिखाया है। हमारी खुद की बनायी हुई छोटी सी प्रार्थना है, वही हम करते हैं। महापुरोहित अकड़ कर बोला - क्या है तुम्हारी प्रार्थना? फकीरों ने कहा की हमने सुन रखा है की परमात्मा तीन हैं, 'त्रिमूर्ति' हैं। तो हमने एक प्रार्थना बना ली 'यू आर थ्री, वी आर आल्सो थ्री, हैव मर्सी आंन अस'। तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो। महापुरोहित बोला यह भी कोई प्रार्थना है, मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूँ इसको याद करो और आज से यह प्रार्थना शुरू करो। पुरोहित ने उन्हें लम्बी प्रार्थना बताई तो उन फकीरों ने कहा की क्षमा करें हमें इतनी लम्बी प्रार्थना याद न रहेगी। महापुरोहित बोला यह प्रामाणिक प्रार्थना है यह संक्षिप नहीं की जा सकती। फकीरों ने कहा तो फिर एक बार फिर दोहरा दें ताकि हम याद कर सकें। महापुरोहित प्रार्थना दोबारा बता कर बड़ी प्रसन्नता के साथ नाव पर वापिस लौट पड़ा। आधी झील में पहुँचने पर उसने पीछे देखा की एक बवंडर सा पानी में उसकी और चला आ रहा है। वह घबरा गया। थोड़ी देर में उसे दिखाई दिया कि वे तीनों फ़कीर पानी पर दौड़ते चले आ रहे हैं। तीनों नाव के पास आकर पुरोहित के पाँव पकड़ कर बोले की वह प्रार्थना एक बार और दोहरा दें, हम भूल गए। हम पर कृपा करें हम बेपढ़े-लिखे लोग हैं। उस महापुरोहित ने कहा की क्षमा करो, तुम्हारी प्रार्थना काम कर रही है तुम अपनी प्रार्थना जारी रखो 'यू आर थ्री, वी आर आल्सो थ्री, हैव मर्से आंन अस।'

05 अगस्त 2011

स्वस्थ्य कौन है?

आयुर्वेद ने स्वस्थ रहने के लिए तीन उपस्तंभ बताए हैं:- (1) आहार (2) निद्रा और (3) ब्रहमचर्य। इनमें आहार का नाम सबसे पहले लिया है क्योंकि आहार से ही शरीर कायम रहता है और शरीर की रक्षा करना और इसका पोषण करना सबसे ज्यादा जरूरी बताया है। कहा है - 'सर्वमन्यत्परीत्यज्य शरीर मनुपालयेत' (चरक संहिता) अर्थात सब कुछ छोड़ कर पहले शरीर का रक्षण और फिर पोषण करो क्योंकि 'तद्भावे हि भावानां सर्वा भावः शरीरिणाम' के अनुसार शरीर है तो सब कुछ है और शरीर ही न रहे तो कुछ भे न रहेगा। शरीर के स्वाथ्य रहने में आहार की क्या भूमिका और महत्ता है यह इस बोधकथा से समझें।

एक बार एक महर्षि चरक एक पक्षी का रूप धारण कर नदी के तट पर गए। वहां अनेक लोग स्नान कर रहे थे। पक्षी रूप में महर्षि मनुष्य की भाषा में बोले - स्वस्थ्य कौन है? स्वस्थ्य कौन है? वहां स्नान कर रहे व्यक्तियों में से एक बोला - जो च्वनप्राश रसायन खाता है। दूसरा व्यक्ति बोला- जो मकरध्वज और स्वर्ण भस्म खाता है। तीसरा व्यक्ति बोला - जो भोजन के बाद द्राक्षासव का सेवन करता है वह स्वथ्य है। इस प्रकार अनेक लोगों ने अनेक औषधियों के नाम गिनाते हुए स्वस्थ्य व्यक्ति को परिभाषित कर दिया। यह सुन कर पक्षी रूपी महर्षि चरक उदास हो गए और विकलता के साथ कहने लगे की मैंने आयुर्वेद शास्त्र इसलिए नहीं लिखा की मनुष्य औषधि के सहारे स्वास्थ्य रहे बल्कि मैंने यह शास्त्र इसलिए लिखा की मनुष्य अस्वस्थ्य हो जाने पर औषधि के प्रयोग से अपने रोग का निवारण कर सके। उनका मन असंतोष से भर उठा और वे सोचने लगे की मेरे शास्त्र का दुरुपयोग हुआ है। लोगों ने अपने पेट को औषधालय ही बना लिया है। पक्षी रूपी चरक यह सब विचरते हुए थोड़ा आगे बढे तो दूसरे तट पर जाकर फिर वही प्रश्न किया की स्वस्थ्य कौन है? उस पर तट पर महर्षि वाग्भट स्नान कर रहे थे उन्होंने जैसे ही सुना 'कोsरूक' (स्वस्थ्य कौन है?) वे बोल उठे - 'हितभुक्' - जो हितकर भोजन करता है। पक्षी ने दूसरी बार पूछा - स्वस्थ्य कौन है? वाग्भट फिर बोल उठे - 'मितभुक्' जो अल्प भोजन करता है। तीसरी बार पक्षी ने फिर पूछा - स्वस्थ्य कौन है? वाग्भट ने फिर उत्तर दिया 'रितभुक्' - जो ऋतु के अनुसार आहारीय पदार्थ खाता है। पक्षी रूपी चरक ने सुख की सांस ली और अपने निवास पर लौट गए। 

04 अगस्त 2011

काश! जवानी सोच सकती; बुढापा कर सकता?

कैसी विधि की विडम्बना है कि यौवन होता है तो अकल नहीं होती और अकल आती है तो यौवन चला जाता है। जब तक माला गूंथी जाती है, फूल कुम्हला जाते हैं।

काश! जवानी सोच पाती; और बुढापा कर पाता?

जवानी के साथ जोश आता है, होश नहीं और जब होश आता है तो जोश ठंडा पड़ जाता है। 

यौवन एक नशा है जिसमें चूर होने के बाद मनुष्य को कुछ नहीं सूझता। जवानी दीवानी है और दीवानापन मनुष्य को अंधा बना देता है।

बुढापा समझदारी का पर्याय है, लेकिन शक्ति के अभाव में समझदारी केवल पश्चाताप ही कर पाती है।

जवानी जिन्दगी का ज्वालामुखी है जिसमें असीम शक्ति भरी है। यौवन में एक उत्तेजना है, अग्नि है जो चिंगारी पाते ही दहक उठती है।

यौवन में कल्पना है और बुढ़ापे में चिन्तन। जवानी में जीवनी शक्ति है और बुढ़ापे में संजीवनी बूटी।

जवानी जिन्दगी का बसंत है और बसन्त में बहार है। बुढापा जीवन का शरद है और शरद में समझदारी ठंडी पड़ जाती है।

यौवन एक प्रवाह है और मात्र प्रवाह में दिशा-बोध का अभाव रहता है।

बुढापे में दिशा बोध है और प्रवाह का अभाव है। यौवन में गति है, बुढापे में ज्ञान। ज्ञान गति का दिशा दर्शन करता है तभी यौवन प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है। यौवन में आवेश है बुढापे में अनुभव, जवानी में संवेग है, बुढापे में विवेक।

काश! जवानी के स्पेयर पार्ट्स मिल पाते ताकि उन्हें बुढापे की मशीन में फिट किया जा सकता और बुढापे के अनुभव प्राप्य होते ताकि वे जवानी को दिशा बोध कर पाते।

26 जुलाई 2011

प्रार्थना का सही अवसर

सुख में सुमिरन न किया, दुःख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।।              - संत कबीर

सुख में तो कभी याद किया नहीं और दुःख में याद करने लगे, कबीरदास कहते हैं की उस दास की प्रार्थना कौन सुने।

विमर्श - हमारे अन्दर प्रार्थना सदैव सुखी परिस्थितियों में ही उत्पन्न होती है, सुख के समय तो हमें इश्वर की याद ही नहीं आती। समस्या यह है की दुःख का स्वभाव परमात्मा के स्वभाव से बिलकुल मेल नहीं खाता  क्योंकि दुःख तो उससे ठीक विपरीत दशा है, फिर दुःख में इश्वर को इसलिए याद किया जाता है ताकि दुःख हट जाए यानी वह परमात्मा की याद नहीं है, सुख की याद है, सुख की आकांशा है। जब हम दुःख में इश्वर को पुकारते हैं तब उसे नहीं सुख को पुकारते हैं इसलिए जब सुख मिल जाता है तो इश्वर विस्मृत हो जाता है क्योंकि अब उसकी क्या जरूरत रही। सुख की आकांशा से प्रार्थना का कोई सम्बन्ध नहीं होता बल्कि सुख में की गयी प्रार्थना में ही परमात्मा की आकांशा होती है  और जब हम उसी के लिए प्रार्थना करते हैं तभी प्रार्थना सुनी जाती है, अन्यथा नहीं। कवि रहीम ने कहा है- 'बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न चून ' परमात्मा के द्वार पर जो बिना मांगे खडा हो जाता है उसे सब मिल जाता है, मोती बरस जाते हैं और जो भिखारी की तरह खडा होता है उसे कुछ नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यह है की प्रार्थना में मांग नहीं होना चाहिए क्योंकि मांग रहित धन्यवाद रूपी प्रार्थना ही इश्वर तक पहुँचती है।  दुखी व्यक्ति बिना मांगे प्रार्थना कर नहीं सकता और फिर दुखी अवस्था में हम सिकुड़ जाते हैं और परमात्मा है विस्तार, जो फैला हुआ है सब ओर इसलिए दुखी व्यक्ति और परमात्मा के बीच कोई तालमेल नहीं बैठता। हिन्दू संस्कृति में परमात्मा के लिए 'ब्रह्म' शब्द को चुना गया है  जिसका अर्थ होता है विस्तीर्ण; जो फैलता ही चला जाता है। सिर्फ सुखी अवस्था ही ऐसी होती है जिसमें हम थोड़ा फैलते हैं यानी बहुत ही छोटे अर्थों में हम परमात्मा जैसे हो जाते हैं। यही यह अवसर है जब प्रार्थना की जा सकती है या की जानी चाहिए क्योंकि इस संसार में सुख झलक है परमात्मा की और जब उसकी झलक मिले तभी पुकारना उचित है क्योंकि वह कहीं आसपास ही है। जब भी इस झलक से हम भरें यानी सुख और आनंद का अनुभव हो वही अवसर प्रार्थना करने का सही अवसर होता है।

तनुश्री तरूणसागरजी महाराज के अमृत वचन

*  वस्तुए तुम्हें छोड़ दें तो मौत है। तुम वस्तुओं को छोड़ दो तो मोक्ष है। जो बार बार आये वह मौत है। जो एक बार आए वह मोक्ष है। मौत भोगी को आती है। मोक्ष योगी को होता है। भोगी को मौत छोड़ती नहीं है, योगी को मौत छेड़ती नहीं है। पुराने वस्त्र(शरीर) उतार कर नए वस्त्र धारण करना मौत है। पुराने वस्त्र उतार फेंकना और फिर नए धारण न करना मोक्ष है। मौत को मौत आ जाना ही मोक्ष है। मोह का क्षय ही मौत है।

*  कई तरह के दान में एक रक्तदान भी है। रक्तदान एक पुण्य कार्य है। खून देने से कम नहीं होता, फिर बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हम बाल काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं, हम नाखून काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं। कुए से पाने निकालते हैं और फिर बढ़ जाता । खून देने से तुम्हारा को कुछ घटता नहीं है हाँ, किसी मरते हुए को नई जिन्दगी जरूर मिल जाती है। और फिर यह भी सच है की जो देह में अनुरक्त है वह रक्त कैसे दे सकता है? रक्त पानी बने, इससे पहले उससे किसी की जिन्दगी बना दो। नदी का पानी सागर में जाकर खारा हो- इससे पहले इसे खेतों में पहुंचा दो। याद रखें जीते जी रक्तदान, जाते जाते देहदान, जाने के बाद नेत्रदान।

*  मेरा मानना है की सही मायने में देश के दो ही दुश्मन हैं; एक तो कामचोर और दूसरा रिश्वत खोर। अब राजनीति में शरीफ लोगों के लिए जगह घटती जा रही हैं। जो शरीफ होता है, वह नेता नहीं बन पाता और गलती से बन जाता है तो टिक नहीं पता। टिक भी जाता है तो केवल धृतराष्ट्र- की भूमिका निभा पाता है। अच्छे और सच्चे लोग एकांत वासी होते जा रहे हैं इसलिए बुरे और अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग सत्ता पर काबिज हो गए हैं।

*  संत और सैनिक को सोने मत देना। अगर ये सो गए तो समाज और देश का भाग्य सो जाएगा। पापी इंसान और भ्रष्ट नेता को जागने मत देना क्योंकि ये जाग गए तो समाज व देश का अमन चैन खो जाएगा। जिस देश का संत व सिपाही जागरूक और ईमानदार होगा वह देश कभी भी नष्ट-भ्रष्ट नहीं हो सकता। जागरूक संत और ईमानदार सिपाही ही देश को अमन चैन दे सकता है। संत सो जाए और सैनिक बेईमान हो जाए तो समाज व राष्ट्र - की शांति का भंग होना तय है।

* आँख बड़ी नालायक है। अनर्थों की जड़ मनुष्य की आँख ही है। काम आँख में पहले आता है, मन में बाद में। मन को पवित्र रखना है तो आँखों को संभालकर रखिये। आँख बिगडती है तो मन बिगड़ता है, मन बिगड़ता है तो वाणी बिगडती है। वाणी बिगडती है तो व्यवहार बिगड़ता है, व्यवहार बिगड़ता है तो पूरा जीवन बिगड़ जाता है। सीता को देख कर रावण की आँख बिगड़ी तो उसका मन बिगाड़ा गया। फिर वाणी बिगड़ी, फिर व्यवहार बिगड़ा, फिर रावण का जीवन ही बिगड़ गया। और तो क्या कहें रावण का नाम भी बिगड़ गया। हजारों साल गुजर गए पर किसी बाप ने अपने बेटे का नाम 'रावण' नहीं रखा।

धर्म परम्परा नहीं, परम है। धर्म आवरण नहीं, आचरण है। धर्म बला नहीं, जीने की कला है। धर्म क्रूरता नहीं, करूणा है। आज धर्म के नाम पर संसार में जो हत्याएं और युद्ध हो रहे हैं, वह धर्म नहीं, धर्म की लाश है और जब तक इस लाश को घर से बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक देश और दुनिया में शांति नहीं होगी। हिन्दुस्तान में 20 लाख देवी-देवता हैं जिनकी सभी लोग पूजा करते हैं। देवी-देवता सिर्फ पूजा के लिए नहीं है, वरन उनसे प्रेरणा भी लेनी चाहिए।