13 अगस्त 2011

प्रखर व्यक्तित्व के धनी संत कबीर


संत कबीर ने अपनी एक साखी में लिखा है की संतों का लक्षण उनका निर्वैर और निष्काम होना, प्रभु प्रेम में मग्न और विषयों से विरक्त होना है -
नीरवैरो निहकामता साईं सेतो नेह।
विषयां सू न्यारा रहे संतान को अंग एह।।

इसी भाव से चौथे गुरू, गुरू रामदास ने व्यक्त करते हुए कहा था की जिसे श्वास-प्रश्वास में अपने ह्रदय से हरि का नाम विस्मृत नहीं होता, वह धन्य है, वही पूर्ण संत है -
जिना सासि गिरासि न वीसरै हरिनाम मणि मंत।।
धंनु सि सोई नानका पूरण सोई संत।।

 आदि ग्रन्थ में संग्रहीत 15 संत कवि विभिन्न प्रदेश, विभिन्न परिवेश, विभिन्न संस्कारों, विभिन्न समय में अवतरित व्यक्ति थे, फिर भी उनमें अनेक बातों में वैचारिक और मानसिक एकता थी। इन संतों को उनकी विचारधारा के अनुसार निर्गुण और सगुण में बांटने की प्रथा उतनी ही प्राचीन दिखती है। अधिसंख्य संतों का आग्रह परमात्मा के निर्गुण स्वरुप की ओर था। वे अवतारवाद के विरोधी थे। मूर्तिपूजा का खंडन करते थे, वर्ण व्यवस्था और जात-पात में उनका विशवास नहीं था। सगुणवादी धारा परम्परागत वैष्णव धारा से जुडी हुई थी। उसके प्रस्तोता अधिकतर सनातनी ब्रह्मण थे। निर्गुण संतों में अब्राह्मणों का बाहुल्य था। उनमें अत्यंत जातियों के ऐसे भक्त भी थे जिन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था समान पूजन का अधिकार नहीं देती थी। अवतारों की मूर्तियों से सज्जित मंदिर में उनका प्रवेश निषिद्ध था। मंदिर के बाहर खड़े रहकर उसके कलश मात्र के दर्शन से ही संतुष्ट हो जाना ही उनकी सीमा थी।

परमेश्वर की निर्गुण-निराकार अवधारणा उन्हें वर्ण और ऊंच-नीच की सीमाओं से मुक्त कर देती थी। सर्व्यापी, घट-घट वाली ब्रह्म की प्राप्ति के लिए उन्हें किसी मंदिर, किसी पुरोहित, किसी कर्मकांड, किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं थी। संत कबीर ने इस विभेद को अनेक स्थलों पर रेखांकित किया है -
जानसि काठ कथसि अयाना
हम निर्गुण तुम सरगुण जाना


माध्यमयुग के भक्ति आन्दोलन का प्रारम्भ दक्षिण के द्रविड़ प्रदेश से हुआ माना जाता है। यह भी कहा जाता है की उसे उत्तर में स्वामी रामानंद लाए और संत कबीर ने उसे चतुर्दिक फैला दिया -
भगती द्राविड ऊपजी लाए रामानंद
परगट किया कबीर ने सात दीप नव खंड 

आदि ग्रन्थ में संग्रहीत 15 संतों की वाणी में सबसे अधिक रचनाएं संत कबीर की हैं - 292 पद और 249 श्लोक। इनका योग 541 है। भारतीय साहित्य में कबीर का अनन्य स्थान है। जीवन भर काशी में रहकर वे कट्टर ब्राह्मणों और मुल्लाओं से जूझते रहे और उन्हें खरी-खोटी सुनाते रहे। उस समय परंपरागत मान्यता यह थी की काशी मोक्ष का द्वार है और उसके पास का नगर मगहर इस बात के लिए अभिशप्त है की वहां जिसकी मृत्यु होती है वह नरक का भागी होता है। संत कबीर ने इस चुनौती को स्वीकार किया था। जीवन भर काशी में रहकर वे अंत समय में मगहर चले गए थे। आदि ग्रन्थ में शामिल उनकी रचनाओं में ऐसे संकेत हैं-
अब कहु राम कवन गति मोरी।
तजीले बनारस मति भई थोरी।।
सगल-जनम शिवपुरी गवाया।।
मरती बार मगहरि उठि धाया।। 

संत कबीर के सम्बन्ध में यह बहुप्रचलित चर्चा है कि वे एक विधवा ब्रह्माणी के पुत्र थे। लोक लाज के डर से माँ ने उन्हें त्याग दिया था। उनका पालन-पोषण नीरू नाम के एक मुसलमान जुलाहे ने किया था। उनका परिवेश इस्लामी परिवेश था, इस बात का संकेत संत रविदास ने भी किया है जो काशी निवासी थे और कबीर के समकालीन थे। रविदास कहते हैं कि जिनके घर के लोग इर्द-बकरीद के अवसर पर गोवध करते हैं, शेख, शहीद और पीर मानते हैं, उन्हीं के पूत ने इसके बिलकुल विपरीत किया। इसी कारण कबीर तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गए-
जो कै ईद कबरीदि कुल गऊ रे बधु करहि
मानीअहि सेख, सहीद, पीरा।।
जा कै बाप वैसी करी, पूत ऐसी सरी।।
तिहू रे लोक परसिध कबीरा।।

मध्ययुगीन धर्म साधना के दो स्वरुप हमारे सम्मुख स्पष्ट से उभरते हैं। एक शास्त्रमार्गी और दूसरा लोकमार्गी। आधुनिक विद्वान् आठवीं शती को भारतीय साहित्य के पूर्व की अंतिम सीमा मानते हैं। आठवीं से अठारवीं शती तक को सामान्यतया मध्ययुग माना जाता है। इस काल के भी दो भाग हैं। आठवीं से तेरहवीं शती तक का काल पूर्व मध्य युग है और तेरहवीं से अठारहवीं शती तक का काल उत्तर मध्य युग है।

पूर्व मध्ययुग (गुप्तकाल) में हिन्दू धर्म का जो स्वरुप विक्सित हुआ था उसमें पूर्ववर्ती आर्य ग्रंथों को अकाट्य रूप से मानने के प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती गयी थी। वेदों को स्वतः प्रमाण मानने के आग्रह से यह बद्धमूल हो गयी और वेदविरोधी सम्प्रदायों को नास्तिक और हेय माना जाने लगा। प्राय सभी सम्प्रदायों के उपास्य देवताओं की मूर्ती कल्पित की गयी और प्रत्येक देवता की शक्ति की भी कल्पना की गई। इन  देवियों और देवताओं की स्तुति में मनोहर काव्य रचे गए। यह चिंतन पूरी तरह शास्त्रमार्गी चिंतन था।

बौद्ध धर्म का चिंतन प्रारम्भ से ही लोकमार्गी चिंतन था। इस काल में यह चिंतन वैदिक-पौराणिक हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी प्रतिरोधी शक्ति था। महाभारत और भगवत आदि ग्रंथों में कलियुग का बड़ा ही चिंताजनक और उद्वेलित करने वाला रूप चित्रित किया गया है। प्रायः प्रत्येक पुराण में इस बात पर आग्रह किया गया है की कलियुग में लोगों का चरित्र पतित हो जाएगा। श्रुति-स्मृति में दिए गए निर्देश मिटने लगेंगे। वर्णाश्रम वयवस्था टूटने लगेगी। शूद्र लोग संन्यास लेकर उच्च वर्णों को उपदेश देने का ढोंग रचेंगे। स्त्रियाँ चरित्रहीन हो जाएँगी। अनेक पुरानों में ज्यों-का-त्यों पाया जाने वाला एक श्लोक मिलता है, जिसके अनुसार कलियुग में वे लोग धर्मोपदेश करेंगे जो शठतायुक्त बुद्धि के होंगे। उनके दांत सफ़ेद होंगे (भ-दन्त) वे जितेन्द्रिय होने का दावा करेंगे तथा मुंडित और काषाय वस्त्र धारण करने वाले होंगे-
शुक्ल दन्ता जिताक्षाशय मुण्डाः काषायावाससः।।
शुद्ध धर्म वदिष्यन्ति शाठ्य बुद्धयोप जीविनः ।। 
ये सभी संकेत बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए हैं। बुद्ध ने शूद्रों को भी सन्यासी बनाकर उपदेश देने की अनुमति दी थी। बौद्ध विहारों में स्त्रियों के प्रवेश को स्वीकार किया गया था। बौद्ध भिक्षु मुण्डित होते थे, काषाय वस्त्र धारण करते थे। भदन्त, बौद्धों में अति सम्मानित व्यक्ति को कहा जाता था। बुद्ध ने वेदों को अपौरूषेय और अकाट्य नहीं स्वीकार किया है। वैदिक धर्मी बुद्ध-दर्शन को नास्तिक दर्शन मानते थे।

उत्तर मध्य युग में शास्त्रमार्गी और लोकमार्गी भक्ति धाराएं समान्तर चलीं और टकराईं भी। सगुण धारा और निर्गुण धारा इनका प्रतिनिधत्व करती हैं। संत कबीर के समय निर्गुण और सगुण भक्तिधारा का टकराव बहुत मुखर हो जाता है। कबीर शास्त्र और ब्राह्मण की प्रभुता को पूरी तरह नकारते हैं। शास्त्र पढने वाले पंडित को संबोधित करते हुए वे कहते हैं - पोथियों को पढ़कर कोई पंडित नहीं हो जाता। जो प्रभु-प्रेम का एक अक्षर पढ़ लेता है, वह पंडित हो जाता है -

पोधी पढि-पढि जग मुआ पंडित भया न कोइ।
एकै आखर प्रेम का पढै सो पंडित होइ।। 

संत कबीर शास्त्र अध्ययन की उपेक्षा अपने अनुभव, जो उन्होंने लोगों के बीच रह कर प्राप्त किया था, पर अधिक बल देते हैं -
तू कहता कागद की लेखी 
मैं कहता आँखिन की देखी।।

किन्तु शास्त्रमार्गी सगुण कवि यह स्वीकार नहीं करते की श्रुतियों द्वारा निर्धारित मार्ग से कोई विरत हो कर ईश्वर भक्त हो सकता है। वे शूद्रों का तत्व ज्ञानी होना स्वीकार नहीं करते। संत तुलसीदास की मान्यता थी की श्रुतियों ने वर्ण व्यवस्था के माध्यम से सभी वर्णों के धर्म और कर्तव्य निर्धारित कर दिए हैं। उनका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। शूद्रों को ब्राह्मणों से बराबरी का दावा नहीं करना चाहिए।

बादहिं सूद्र द्विजन सन हम तुम ते कछु घाटि।।
जानहि ब्रह्म सो विप्रवर आंखि देखावहि डांटि।। 

एक स्थान पर तुलसीस ने लिखा है -
सूद्र करहि जप तप ब्रत नाना। बैठी बरासन कहहि पुराना।।
सूद्र द्विजन उपदेसहि ज्ञाना। मेली जनेऊ लेई कुदाना।।

संत रविदास ने अपने एक पद में कहा था कि यदि कोई ब्राह्मण गुणहीन न हो तो वह पूज्य नहीं है। यदि कोई चांडाल ज्ञान में प्रवीण हो तो उसके पाँव पखारने चाहिए।

रैदास ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुनहीन।।
पाँव पूज चण्डाल के जो हो ज्ञान प्रवीन।। 

इसके उत्तर में गोवामी तुलासीदार ने कहा है की श्रुतिनीति तो यह है की सबसे पहले ब्राह्मण के पैर पखारने चाहिए। यदि कोई ब्रह्मण शील-गुण हीन हो तो भी वह पूज्य है। उसके सम्मुख यदि कोई शूद्र गुण-ज्ञान में प्रवीन हो तो वह तजे जाने योग्य है -

प्रथमहि विप्रचरन अति प्रीती। निज-निज करम निरत श्रुति नीती।
पूजहिं विप्र सील गुण हीना। तजयि सूद्र गुण ज्ञान प्रवीना।। 

किन्तु निर्गुण संतों में बहुतायत उनकी थी जिन्हें शूद्रों की श्रेणी में रखा जाता था। नामदेव छीपा थे, सैण नाई थे, सदना कसाई थे, रविदास चमार थे, धन्ना जाट थे और कबीर जुलाहा थे। गुरू नानक तथा उनके परवर्ती गुरू सवर्ण समाज के खत्री थे किन्तु उनकी प्रतिबद्धता उन संतों के साथ थी, जिन्हें शास्त्रमार्गी सगुण धारा स्वीकार नहीं करती थी।

मध्ययुगीन संतों में कबीर का अनन्य स्थान है। अपने जीवनकाल और उसके पश्चात अनेक शताब्दियों तक वे भक्ति-संसार पर पूरी तरह छाए रहे। समकालीन संतों में उनकी असीम प्रशंसा भी हुई और एक पक्ष द्वारा उनकी बरसक निंदा भी हुई। स्तुति-निंदा के मध्य किसी की चिंता न करते हुए एक फक्कड़ संत की भांति वे बीच बाजार में अपनी लुकाटी लिए उद्घोष करते रहे-
 कबिरा खडा बाजार में लिए लुकाटी हाथ।। 
जो घर जाले आपना सो चले हमारे साथ।।
 संत कबीर का समय अत्यंत संकट का समय था। तुर्की और पठानों का शासन स्थापित हुए चार सदियों से अधिक समय व्यतीत हो चुका था। चारों और गहरा अवसस छाया हुआ था। स्वामी वल्लभाचार्य ने इस अवसाद को व्यक्त करते हुए कहा था : 'देश मलेच्छक्रांत है, गंगादि तीर्थ उनके द्वारा भ्रष्ट हो रहे हैं, आशंका और अज्ञान के कारण वैदिक धर्म नष्ट हो रहा है, सत्पुरुष पीड़ित तथा ज्ञान विस्मृत हो रहा है, ऐसी स्थिति में एकमात्र, कृष्णाश्रय में ही जीवन का कल्याण है।' किन्तु संत कबीर को ऐसे विकल्पहीन समर्पण में ही समस्या का पूर्ण निदान नहीं दिखाई दिया था। निराशा भरी स्थिति उन्हें उद्वेलित करती थी, आक्रोश से भरती थी। एक और वे अपने समय के पंडों, पुरोहितों, काजियों, मुल्लाओं को उनके पाखंडपूर्ण चरित्र के लिए खरी-खोटी सुनाते थे, तो दूसरी ओर भविष्य में उभरने वाले किसी संभावित प्रतिरोध और संघर्ष की मनोभूमिका भी तैयार करते थे। संत कबीर के जीवन पर चर्चा करते हुए उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष अनदेखा-सा रह जाता है। कबीर का एक पद है -  
गगन दमामा बाजियों, परयो निताने घाउ।
 खेत जो मंडियों सूरमा, अब जूझन को दाउ।। 
 सूरा सो पहचानी, जू लरै दीन के हेत।
पुरजा-पुरजा कटि मरै, कबहूँ न छाडे खेत।।

इस पद की शब्दावली पूरी तरह वीर रस से भरपूर दिखती है और भक्ति काल के अन्य संतों-भक्तों से बहुत भिन्न दिखाई देती है। यह शब्दावली किसी भी सूरमा को इस बात के लिए प्रेरित करती है कि वह दीन (गरीब और पीड़ित) जनों की रक्षा के लिए युद्ध करे। इस कार्य में चाहे उसके टुकडे-टुकडे हो जाएं, किन्तु वह रणभूमि त्यागने का भाव अपने मन में न आने दे।   

आकाश का नगाड़ों की ध्वनि में गुंजारित होना, शास्त्र-द्वारा ठीक निशाने पर घाव लगाना। सूरमा द्वारा रणभूमि को खेत की भाँती गोडना और उसमें जूझने का अवसर ढूंढना, दीन-दुनियाँ के लिए सूरमा  बनकर लड़ना और
टुकडे-टुकडे होकर मर जाना किन्तु रणभूमि को न छोड़ने के निश्चय पर दृढ रहना - ऐसी आकांशा है जो भक्ति काल की सम्पूर्ण मनोभूमिका से सर्वथा अलग दिखाई देती है। कबीर का व्यक्तित्व बहुत विरल था। उनके समकालीन संत उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। अपनी भक्ति की अनंतता पर उन्हें पूरा विश्वास था। इसी विश्वास के आधार पर उन्होंने कहा था की जीवन रूपी सफ़ेद चादर ऋषियों-मुनियों ने भी ओढी, किन्तु वे भी उसे निष्कलुष नहीं रख सके थे, किन्तु कबीर दास ने उस पर कोई दाग नहीं लगने दिया। उन्होंने उसे पवित्र रख कर प्रभु को वापस कर दिया - 

सो चादर सुन नर मुनि ओढी।
ओढ़ी के मैली कीनी चदरिया।।
दास कबीर जतन से ओढी।
ज्यों का त्यों धर दीनी चदरिया।।

07 अगस्त 2011

प्रेम सिखाया नहीं जा सकता

प्रेम एक हार्दिक घटना है। ना तो प्रेम की कोइ प्रामाणिक व्यव्यस्था है और न ही कोई विधि है। न कोई तंत्र है न कोई मंत्र। चूंकि प्रेम एक हार्दिक भाव है इसलिए प्रार्थना भी एक हार्दिक भाव है। प्रेम सिखाया नहीं जा सकता क्योंकि सीखना मस्तिष्क के ताल की घटना है इसलिए प्रार्थना भी सिखाई नहीं जा सकती। विज्ञान सिखाया जा सकता है। 'केमिस्ट्री, फिजिक्स, गणित' आदि सिखाये जा सकते हैं परन्तु धर्म सिखाया नहीं जा सकता। इसलिए सीखी हुई प्रार्थना के परिणाम नहीं मिलते। दरअसल प्रेम, प्रार्थना और परमात्मा ये सब एक ही ताल पर घटने वाली घटनाओं के नाम हैं और वह ताल मष्तिष्क में नहीं ह्रदय स्थल पर स्थित होता है। टालस्टांय़ की एक छोटी सी कहानी से समझने का प्रयास करें।

एक झील के उस पार तीन बेपढ़े-लिखे फ़कीर रहते थे। उनकी बड़ी ख्याति हो गयी थी की वे बड़े पवित्र पुरूष हैं। ये खबर बड़े पुरोहित के पास पहुँची तो उसने कहा उन्होंने तो दीक्षा भी नहीं ली है वे पवित्र कैसे हो सकते हैं? वह पुरोहित नाव पर बैठ झील के उस पार पहुंचा। वे तीनों फ़कीर एक पेड़ के नीचे बैठे थे। जब वह महापुरोहित उनके सामने आया तो उन तीनों ने झुक कर उसको प्रणाम किया। महापुरोहित ने पूछा तुम क्या करते हो? क्या है तुम्हारी प्रार्थना? तुम्हारी पद्वति क्या है? तुमने प्रार्थना कहाँ से सीखी? वे तीनों एक दूसरे के तरफ देखने लगे। उन्होंने कहा हम पढ़े लिखे नहीं हैं, ना ही किसी ने हमें कुछ सिखाया है। हमारी खुद की बनायी हुई छोटी सी प्रार्थना है, वही हम करते हैं। महापुरोहित अकड़ कर बोला - क्या है तुम्हारी प्रार्थना? फकीरों ने कहा की हमने सुन रखा है की परमात्मा तीन हैं, 'त्रिमूर्ति' हैं। तो हमने एक प्रार्थना बना ली 'यू आर थ्री, वी आर आल्सो थ्री, हैव मर्सी आंन अस'। तुम भी तीन हो, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करो। महापुरोहित बोला यह भी कोई प्रार्थना है, मैं तुम्हें प्रार्थना बताता हूँ इसको याद करो और आज से यह प्रार्थना शुरू करो। पुरोहित ने उन्हें लम्बी प्रार्थना बताई तो उन फकीरों ने कहा की क्षमा करें हमें इतनी लम्बी प्रार्थना याद न रहेगी। महापुरोहित बोला यह प्रामाणिक प्रार्थना है यह संक्षिप नहीं की जा सकती। फकीरों ने कहा तो फिर एक बार फिर दोहरा दें ताकि हम याद कर सकें। महापुरोहित प्रार्थना दोबारा बता कर बड़ी प्रसन्नता के साथ नाव पर वापिस लौट पड़ा। आधी झील में पहुँचने पर उसने पीछे देखा की एक बवंडर सा पानी में उसकी और चला आ रहा है। वह घबरा गया। थोड़ी देर में उसे दिखाई दिया कि वे तीनों फ़कीर पानी पर दौड़ते चले आ रहे हैं। तीनों नाव के पास आकर पुरोहित के पाँव पकड़ कर बोले की वह प्रार्थना एक बार और दोहरा दें, हम भूल गए। हम पर कृपा करें हम बेपढ़े-लिखे लोग हैं। उस महापुरोहित ने कहा की क्षमा करो, तुम्हारी प्रार्थना काम कर रही है तुम अपनी प्रार्थना जारी रखो 'यू आर थ्री, वी आर आल्सो थ्री, हैव मर्से आंन अस।'

05 अगस्त 2011

स्वस्थ्य कौन है?

आयुर्वेद ने स्वस्थ रहने के लिए तीन उपस्तंभ बताए हैं:- (1) आहार (2) निद्रा और (3) ब्रहमचर्य। इनमें आहार का नाम सबसे पहले लिया है क्योंकि आहार से ही शरीर कायम रहता है और शरीर की रक्षा करना और इसका पोषण करना सबसे ज्यादा जरूरी बताया है। कहा है - 'सर्वमन्यत्परीत्यज्य शरीर मनुपालयेत' (चरक संहिता) अर्थात सब कुछ छोड़ कर पहले शरीर का रक्षण और फिर पोषण करो क्योंकि 'तद्भावे हि भावानां सर्वा भावः शरीरिणाम' के अनुसार शरीर है तो सब कुछ है और शरीर ही न रहे तो कुछ भे न रहेगा। शरीर के स्वाथ्य रहने में आहार की क्या भूमिका और महत्ता है यह इस बोधकथा से समझें।

एक बार एक महर्षि चरक एक पक्षी का रूप धारण कर नदी के तट पर गए। वहां अनेक लोग स्नान कर रहे थे। पक्षी रूप में महर्षि मनुष्य की भाषा में बोले - स्वस्थ्य कौन है? स्वस्थ्य कौन है? वहां स्नान कर रहे व्यक्तियों में से एक बोला - जो च्वनप्राश रसायन खाता है। दूसरा व्यक्ति बोला- जो मकरध्वज और स्वर्ण भस्म खाता है। तीसरा व्यक्ति बोला - जो भोजन के बाद द्राक्षासव का सेवन करता है वह स्वथ्य है। इस प्रकार अनेक लोगों ने अनेक औषधियों के नाम गिनाते हुए स्वस्थ्य व्यक्ति को परिभाषित कर दिया। यह सुन कर पक्षी रूपी महर्षि चरक उदास हो गए और विकलता के साथ कहने लगे की मैंने आयुर्वेद शास्त्र इसलिए नहीं लिखा की मनुष्य औषधि के सहारे स्वास्थ्य रहे बल्कि मैंने यह शास्त्र इसलिए लिखा की मनुष्य अस्वस्थ्य हो जाने पर औषधि के प्रयोग से अपने रोग का निवारण कर सके। उनका मन असंतोष से भर उठा और वे सोचने लगे की मेरे शास्त्र का दुरुपयोग हुआ है। लोगों ने अपने पेट को औषधालय ही बना लिया है। पक्षी रूपी चरक यह सब विचरते हुए थोड़ा आगे बढे तो दूसरे तट पर जाकर फिर वही प्रश्न किया की स्वस्थ्य कौन है? उस पर तट पर महर्षि वाग्भट स्नान कर रहे थे उन्होंने जैसे ही सुना 'कोsरूक' (स्वस्थ्य कौन है?) वे बोल उठे - 'हितभुक्' - जो हितकर भोजन करता है। पक्षी ने दूसरी बार पूछा - स्वस्थ्य कौन है? वाग्भट फिर बोल उठे - 'मितभुक्' जो अल्प भोजन करता है। तीसरी बार पक्षी ने फिर पूछा - स्वस्थ्य कौन है? वाग्भट ने फिर उत्तर दिया 'रितभुक्' - जो ऋतु के अनुसार आहारीय पदार्थ खाता है। पक्षी रूपी चरक ने सुख की सांस ली और अपने निवास पर लौट गए। 

04 अगस्त 2011

काश! जवानी सोच सकती; बुढापा कर सकता?

कैसी विधि की विडम्बना है कि यौवन होता है तो अकल नहीं होती और अकल आती है तो यौवन चला जाता है। जब तक माला गूंथी जाती है, फूल कुम्हला जाते हैं।

काश! जवानी सोच पाती; और बुढापा कर पाता?

जवानी के साथ जोश आता है, होश नहीं और जब होश आता है तो जोश ठंडा पड़ जाता है। 

यौवन एक नशा है जिसमें चूर होने के बाद मनुष्य को कुछ नहीं सूझता। जवानी दीवानी है और दीवानापन मनुष्य को अंधा बना देता है।

बुढापा समझदारी का पर्याय है, लेकिन शक्ति के अभाव में समझदारी केवल पश्चाताप ही कर पाती है।

जवानी जिन्दगी का ज्वालामुखी है जिसमें असीम शक्ति भरी है। यौवन में एक उत्तेजना है, अग्नि है जो चिंगारी पाते ही दहक उठती है।

यौवन में कल्पना है और बुढ़ापे में चिन्तन। जवानी में जीवनी शक्ति है और बुढ़ापे में संजीवनी बूटी।

जवानी जिन्दगी का बसंत है और बसन्त में बहार है। बुढापा जीवन का शरद है और शरद में समझदारी ठंडी पड़ जाती है।

यौवन एक प्रवाह है और मात्र प्रवाह में दिशा-बोध का अभाव रहता है।

बुढापे में दिशा बोध है और प्रवाह का अभाव है। यौवन में गति है, बुढापे में ज्ञान। ज्ञान गति का दिशा दर्शन करता है तभी यौवन प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है। यौवन में आवेश है बुढापे में अनुभव, जवानी में संवेग है, बुढापे में विवेक।

काश! जवानी के स्पेयर पार्ट्स मिल पाते ताकि उन्हें बुढापे की मशीन में फिट किया जा सकता और बुढापे के अनुभव प्राप्य होते ताकि वे जवानी को दिशा बोध कर पाते।

26 जुलाई 2011

प्रार्थना का सही अवसर

सुख में सुमिरन न किया, दुःख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।।              - संत कबीर

सुख में तो कभी याद किया नहीं और दुःख में याद करने लगे, कबीरदास कहते हैं की उस दास की प्रार्थना कौन सुने।

विमर्श - हमारे अन्दर प्रार्थना सदैव सुखी परिस्थितियों में ही उत्पन्न होती है, सुख के समय तो हमें इश्वर की याद ही नहीं आती। समस्या यह है की दुःख का स्वभाव परमात्मा के स्वभाव से बिलकुल मेल नहीं खाता  क्योंकि दुःख तो उससे ठीक विपरीत दशा है, फिर दुःख में इश्वर को इसलिए याद किया जाता है ताकि दुःख हट जाए यानी वह परमात्मा की याद नहीं है, सुख की याद है, सुख की आकांशा है। जब हम दुःख में इश्वर को पुकारते हैं तब उसे नहीं सुख को पुकारते हैं इसलिए जब सुख मिल जाता है तो इश्वर विस्मृत हो जाता है क्योंकि अब उसकी क्या जरूरत रही। सुख की आकांशा से प्रार्थना का कोई सम्बन्ध नहीं होता बल्कि सुख में की गयी प्रार्थना में ही परमात्मा की आकांशा होती है  और जब हम उसी के लिए प्रार्थना करते हैं तभी प्रार्थना सुनी जाती है, अन्यथा नहीं। कवि रहीम ने कहा है- 'बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न चून ' परमात्मा के द्वार पर जो बिना मांगे खडा हो जाता है उसे सब मिल जाता है, मोती बरस जाते हैं और जो भिखारी की तरह खडा होता है उसे कुछ नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यह है की प्रार्थना में मांग नहीं होना चाहिए क्योंकि मांग रहित धन्यवाद रूपी प्रार्थना ही इश्वर तक पहुँचती है।  दुखी व्यक्ति बिना मांगे प्रार्थना कर नहीं सकता और फिर दुखी अवस्था में हम सिकुड़ जाते हैं और परमात्मा है विस्तार, जो फैला हुआ है सब ओर इसलिए दुखी व्यक्ति और परमात्मा के बीच कोई तालमेल नहीं बैठता। हिन्दू संस्कृति में परमात्मा के लिए 'ब्रह्म' शब्द को चुना गया है  जिसका अर्थ होता है विस्तीर्ण; जो फैलता ही चला जाता है। सिर्फ सुखी अवस्था ही ऐसी होती है जिसमें हम थोड़ा फैलते हैं यानी बहुत ही छोटे अर्थों में हम परमात्मा जैसे हो जाते हैं। यही यह अवसर है जब प्रार्थना की जा सकती है या की जानी चाहिए क्योंकि इस संसार में सुख झलक है परमात्मा की और जब उसकी झलक मिले तभी पुकारना उचित है क्योंकि वह कहीं आसपास ही है। जब भी इस झलक से हम भरें यानी सुख और आनंद का अनुभव हो वही अवसर प्रार्थना करने का सही अवसर होता है।

तनुश्री तरूणसागरजी महाराज के अमृत वचन

*  वस्तुए तुम्हें छोड़ दें तो मौत है। तुम वस्तुओं को छोड़ दो तो मोक्ष है। जो बार बार आये वह मौत है। जो एक बार आए वह मोक्ष है। मौत भोगी को आती है। मोक्ष योगी को होता है। भोगी को मौत छोड़ती नहीं है, योगी को मौत छेड़ती नहीं है। पुराने वस्त्र(शरीर) उतार कर नए वस्त्र धारण करना मौत है। पुराने वस्त्र उतार फेंकना और फिर नए धारण न करना मोक्ष है। मौत को मौत आ जाना ही मोक्ष है। मोह का क्षय ही मौत है।

*  कई तरह के दान में एक रक्तदान भी है। रक्तदान एक पुण्य कार्य है। खून देने से कम नहीं होता, फिर बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हम बाल काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं, हम नाखून काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं। कुए से पाने निकालते हैं और फिर बढ़ जाता । खून देने से तुम्हारा को कुछ घटता नहीं है हाँ, किसी मरते हुए को नई जिन्दगी जरूर मिल जाती है। और फिर यह भी सच है की जो देह में अनुरक्त है वह रक्त कैसे दे सकता है? रक्त पानी बने, इससे पहले उससे किसी की जिन्दगी बना दो। नदी का पानी सागर में जाकर खारा हो- इससे पहले इसे खेतों में पहुंचा दो। याद रखें जीते जी रक्तदान, जाते जाते देहदान, जाने के बाद नेत्रदान।

*  मेरा मानना है की सही मायने में देश के दो ही दुश्मन हैं; एक तो कामचोर और दूसरा रिश्वत खोर। अब राजनीति में शरीफ लोगों के लिए जगह घटती जा रही हैं। जो शरीफ होता है, वह नेता नहीं बन पाता और गलती से बन जाता है तो टिक नहीं पता। टिक भी जाता है तो केवल धृतराष्ट्र- की भूमिका निभा पाता है। अच्छे और सच्चे लोग एकांत वासी होते जा रहे हैं इसलिए बुरे और अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग सत्ता पर काबिज हो गए हैं।

*  संत और सैनिक को सोने मत देना। अगर ये सो गए तो समाज और देश का भाग्य सो जाएगा। पापी इंसान और भ्रष्ट नेता को जागने मत देना क्योंकि ये जाग गए तो समाज व देश का अमन चैन खो जाएगा। जिस देश का संत व सिपाही जागरूक और ईमानदार होगा वह देश कभी भी नष्ट-भ्रष्ट नहीं हो सकता। जागरूक संत और ईमानदार सिपाही ही देश को अमन चैन दे सकता है। संत सो जाए और सैनिक बेईमान हो जाए तो समाज व राष्ट्र - की शांति का भंग होना तय है।

* आँख बड़ी नालायक है। अनर्थों की जड़ मनुष्य की आँख ही है। काम आँख में पहले आता है, मन में बाद में। मन को पवित्र रखना है तो आँखों को संभालकर रखिये। आँख बिगडती है तो मन बिगड़ता है, मन बिगड़ता है तो वाणी बिगडती है। वाणी बिगडती है तो व्यवहार बिगड़ता है, व्यवहार बिगड़ता है तो पूरा जीवन बिगड़ जाता है। सीता को देख कर रावण की आँख बिगड़ी तो उसका मन बिगाड़ा गया। फिर वाणी बिगड़ी, फिर व्यवहार बिगड़ा, फिर रावण का जीवन ही बिगड़ गया। और तो क्या कहें रावण का नाम भी बिगड़ गया। हजारों साल गुजर गए पर किसी बाप ने अपने बेटे का नाम 'रावण' नहीं रखा।

धर्म परम्परा नहीं, परम है। धर्म आवरण नहीं, आचरण है। धर्म बला नहीं, जीने की कला है। धर्म क्रूरता नहीं, करूणा है। आज धर्म के नाम पर संसार में जो हत्याएं और युद्ध हो रहे हैं, वह धर्म नहीं, धर्म की लाश है और जब तक इस लाश को घर से बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक देश और दुनिया में शांति नहीं होगी। हिन्दुस्तान में 20 लाख देवी-देवता हैं जिनकी सभी लोग पूजा करते हैं। देवी-देवता सिर्फ पूजा के लिए नहीं है, वरन उनसे प्रेरणा भी लेनी चाहिए।

20 जुलाई 2011

वृद्धावस्था में सुखी कैसे रहें?

संसार में प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना चाहता है और ऐसा होना स्वाभाविक ही है। 
शरीर को यथासंभव निरोग रखने के उपाय करते रहना चाहिए और दूसरी बात आर्थिक रूप से कुछ बचत सुरक्षित रखना आवश्यक है, जिससे अपनी प्रतिदिन की आवश्यकताओं के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े।  कहा गया है - पहला सुख निरोगी काया।  दूजा सुख जब घर में हो माया। 

वृद्धावस्था को सुखी बनाने के लिए निम्न शिक्षा को ग्रहण करना अच्छा होगा -
1.  जरूरत से ज्यादा मत बोलिए।  बिना मांगे बहू-बेटे को सलाह मत दीजिये। 
2.  साठ साल की उम्र हो जाए तो अधिकार का सुख छोड़ दीजिए। तिजोरी की चाबी भी बेटे को दे दीजिए। 
3.  मगर हाँ अपने लिए इतना जरूर बचा लेना चाहिए की कल को किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। 


 वृद्धावस्था में शारीरिक रूप से स्वस्थ्य रहने के लिए कुछ उपयोगी सूत्र इस प्रकार हैं -

रहे निरोगी जो कम खाय।  बात न बिगरे जो गम खाय। 
कम खाने वाला शारीरिक रूप से हमेशा निरोग और गम खाने वाला लड़ाई-झगड़ों से बचा रहेगा। 
*  आस्ट्रेलिया के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डा. हार्न ने कहा है की लोग जितना खाते हैं, उसका एक तिहाई भी पचा नहीं पाते।  सर विलियम टेम्पिल ने अपनी किताब 'लांग लाइफ' में भी मिताहार पर बहुत जोर दिया है और कहा है - यदि अधिक जीना हो तो अपनी खुराक को घटाकर उतनी ही रखें, जितने से पेट को बराबर हल्कापन महसूस होता रहे। मिताहार को हर युग में श्रेष्ट कहा गया है। 

*  प्रतिदिन की दिनचर्या इस प्रकार रखिये की व्यवस्था बनी रहे। शरीर को उपयोगी कार्यों में वयस्त रखिये।
अपनी रुचि के अनुसार कार्य करें।  यथा - बागवानी, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कलात्मक कार्य, पेंटिंग, चित्रकारी, सत्संग, समाज सेवा के कार्यों में भाग लेना आदि। व्यस्त रहने से और शारीरिक श्रम से आपको अच्छी भूख लगेगी, निद्रा भी ठीक रहेगी और अनावश्यक चिंताओं से मुक्ति भी मिलेगी। 

*  वृद्धजनों को समय और परिस्थिति के अनुसार अपनी सोच को बदलना चाहिए।  पूर्वाग्रह को छोड़ना ही श्रेष्ट है। जिन परिवारों में बुजुर्ग समय के अनुसार अपनी विचारधारा में परिवर्तन कर लेंते हैं, वहां वृद्धजनों को पर्याप्त सम्मान मिलता है। 

*  मित्र बनें और मित्रता करें।  जीवन में सच्चे मित्र का होना अत्यंत आवश्यक है।  सुख-दुःख की चर्चा मित्र से ही की जा सकती है।  मित्र से खुलकर बातें करने से तनाव दूर होता है, मन को शांति मिलती है। 

*   सदैव प्रसन्न रहें।  खूब हंसें और दूसरों को भी हंसाएं - इसमें आपका कुछ भी खर्च नहीं होता।  आपको मानसिक शांति मिलेगी।  तनाव दूर होगा।  शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में भी आश्चर्यजनक सुधार होगा। 

*  यदि आप परिवार के साथ रहते हैं तो केवल एक बात का ध्यान रखें - बेटों-बहुओं की आलोचना-निंदा बिलकुल न करें।  बच्चों के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने का सुख कम नहीं होता।  पारिवारिक कार्यों में सहायक बनें। 

*  क्रोध कभी न करें और सहनशील बनें।  कमाऊ व्यक्ति का क्रोध परिवार के सदस्य सहन भी कर लेते हैं, परन्तु अब आप कमाऊ नहीं हैं।  क्रोध करना तो किसी प्रकार भी उचित नहीं माना जाता। 

*  अतीत की अप्रिय घटनाओं अथवा दुखद क्षणों को भूलना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अच्छा होता है।  बीती हुई दुखद बातों को मन में गाँठ बांधकर रखना स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। 

*  यदि सभी आपको अप्रिय, कटु एवं व्यंग्यात्मक वाणी भी सुनने को मिले तो उस पर भी ध्यान न दीजिये, बल्कि उस स्थान को छोड़कर एकांत में जाकर प्रभु का जप करें।  उक्त अवसरों पर अपनी सहनशीलता की शक्ति का परिचय दीजिये। 

*  वृद्धावस्था में अकेले रहने की गलती न कीजिएगा।  अकेला रहने वाला व्यक्ति तनावपूर्ण जीवन जीता है, वह अनेक बीमारियों का शिकार बन जाता है।  सुरक्षा की दृष्टि से भी अकेला रहना ठीक नहीं है।