हाफिज नूरानी, शेखचिल्ली के पुराने दोस्त थे। नारनौल में उनका कारोबार था। बीवी थी नहीं। बड़ी हवेली में बेटे और बहू के साथ रहते थे।
बेटे को दूल्हा बने सात बरस बीत चुके और बहू की गोद न भरी, तो हाफिज साहब को फिक्र हुई कि या खुदा, खानदान का नाम आगे कैसे चलेगा?
उन्होंने एक ख़त शेखचिल्ली को लिखकर राय माँगी। शेखचिल्ली कुरूक्षेत्र के किसी पीर के मुरीद थे। कोसों दूर होने के बावजूद थोड़े-थोड़े अरसे बाद वहां जाते-आते रहते थे। बस, एक दिन हाफिज नूरानी को बेटे-बहू के साथ ले गए पीर साहेब के पास।
पीर भी काफी पहुंचे हुए थे। उन्होंने बहू को कुछ पढ़कर पानी पिलाया और एक तावीज उसके बाजू पर बांधकर बोले--"परवरदिगार ने चाहा, तो इस बरस आरजू पूरी हो जाएगी।"
पीर साहब की दुआ का असर हुआ। एक बरस बीतते-न-बीतते बहू के पाँव भारी हो गए। वक्त आने पर चाँद-से बेटे ने जन्म लिया। हाफिज साहब का आँगन खुशियों से भर उठा।
हाफिज नूरानी की खुशियों का पारावार न था। तुरंत जश्न का इंतजाम होने लगा। उसमें शेखचिल्ली को खातौर से बुलाया गया।
शेखचिल्ली को दावतनामा मिला, तो बड़े खुश हुए। बेगम से बोले--"तुरंत चलने की तैयारियां करो।"
"तैयारियां क्या ख़ाक करूं!" बेगम तुनककर बोलीं--"न ढंग के कपडे हैं, न टन पर एक गहना। तुम्हारे पास तो फटी-पुरानी जूतियाँ भी हैं, मेरे पास तो वह भी नहीं। अगर ऐसे हाल में वहां गए, तो खासी हंसाई होगी।"
शेखचिल्ली खामोश हो गए। बेगम की एक-एक बात सच थी। हाफिज नूरानी नारनौल के बड़े रईस थे। उनका जश्न भी छोटा-मोटा न होगा। बड़े-बड़े अमीर-उमरा भी आएँगे। चूंकि यह दिन शेखचिल्ली की वजह से देखना नसीब हुआ है, इसलिए हाफिज साहब उनको सभी से मिलाएंगे भी। ऐसी सूरत में वहां फटेहाल पहुंचना क्योंकर मुनासिब होगा?
शेखचिल्ली को खुदा पर गुस्सा आने लगा कि आखिर क्या सोचकर उसने उन्हें इस हालत में छोड़ रखा है?--मगर वक्त गुस्से का नहीं, कुछ तरकीब भिडाने का था।
नवाब साहब का धोबी शेखचिल्ली को बहुत मानता था। कुछ ही दिन पहले उसने उन्हें इस हालत में छोड़ रखा है?--मगर वक्त गुस्से का नहीं, कुछ तरकीब भिडाने का था।
नवाब साहब का धोबी शेखचिल्ली को बहुत मानता था। कुछ ही दिन पहले शेखचिल्ली ने उसे नवाब के गुस्से से निजात दिलाई थी। बस, जा धमके उसके पास। बोले--"एक काम के लिए आया हूँ। मना मत करना!"
धोबी ने शेखचिल्ली के मांगने पर जान तक देने की बात कही, तो शेखचिल्ली ने सारी उलझन उसे बताकर अपने और बेगम के लिये कुछ कपडे मांगे। बोले--"नारनौल से लौटते ही वापस कर दूंगा।"
धोबी इस अनोखी मांग से कुछ घबराया तो, मगर वायदा कर चुका था। जी कडा करके शेखचिल्ली के मनपसंद कपडे उसे दे दिए। बोला--"ये कपडे नवाब और उनकी भांजी के हैं। सही-सलामत वापस कर देना!"
शेखचिल्ली उन्हें ले घर लौटे। बेगम ने देखे, तो बड़ी खुश हुईं। फिर बोलीं--"कपडे तो मिल गए, मगर जूतियों का क्या करोगे? नारनौल पैदल तो जाएंगे नहीं। सवारी का क्या होगा?"
शेखचिल्ली पहुंचे मोची के यहाँ। बोले--"दो जोड़ी जूतियाँ चाहिएं। एक मेरे लिये, एक बेगम के लिये।"
मोची ने तरह-तरह की जूतियाँ दिखाईं। शेखचिल्ली ने सबसे कीमती जूतियाँ पसंद कर लीन। बोले--"इन्हें बेगम को और दिखा लाऊँ। तब खरीदूंगा।"
मोची मान गया। शेखचिल्ली जूतियाँ ले घर सटक गए। अब सवाल रहा सवारी का।
सबसे अच्छी घोड़ा-गाडी झज्जर के बनी घनश्याम के पास थी। वह उसे किराए पर भी चलाता था। शेखचिल्ली उसके पास पहुंचे। बोले--"मुझे नवाब साहब के काम से नारनौल जाना है। नवाब साहब की बग्घी का एक घोड़ा बीमार है। सो अपनी घोड़ा-गाडी दे दो। किराया नवाब साहब से दिला दूंगा।"
अच्छा किराया मिलने के लालच में घनश्याम ने बिना हील-हुज्जत के अपनी घोड़ा-गाडी उनके हवाले कर दी। और शेखचिल्ली बेगम को ले नारनौल रवाना हो गए।
नारनौल उस वक्त रियासत झज्जर ही का एक कस्बा था। शाही ठाठ-बाट से शेखचिल्ली माय बेगम वहां पहुंचे, तो हलचल मच गई। वे जश्न से एक दिन पहले पहुंचे थे, इसलिए पहले मेहमान थे। बड़ी आवभगत हुई। पूरे कसबे में शेखचिल्ली की अमीरी के चर्चे गूंजने लगे। उन्हें हर मौके पर जाफरानी तम्बाकू वाला हुक्का पेश किया जाने लगा। शेखचिल्ली यूं हुक्का बहुत पहले छोड़ चुके थे, मगर यहाँ मुफ्त का जो हुक्का मिला तो कश पर कश लगाने लगे, जैसे ठेठ नवाबी खानदान के हों।
मगर इन जश्न के मौके पर सारा गुड गोबर हो गया। हाफिज नूरानी के कुछ दोस्त नवाब के घराने से भी जुड़े थे। शेखचिल्ली को सबसे मिलवाया गया, तो नवाब साहब के जो कपडे वह पहने हुए थे, पहचान लिए गए। उस समय तो किसी ने कुछ न कुछ कहा, मगर बाद में जो फुसफुसाहटें फैलीं, तो शेखचिल्ली को भनक लग गई। बस, हुक्का पकडे-पकडे भागे जनानखाने की ओर। बेगम से बोले--"जल्दी करो! यहाँ से तुरंत चल देने में ही भलाई है। कपड़ों की बाट फूट गई है। ऐसा णा हो कि नवाब को पता चल जाए और धोबी के साथ-साथ हम भी रगड़े जाएं।"
बस, दोनों जश्न के बीच से जो खिसके, तो नारनौल के बाहर आकर ही दम लिया।
"सत्यानाश जाए उन लोगों का! कीड़े पड़ें निगोड़ों की आँखों में!"-- बेगम तुनतुनाकर बोलीं--"कितना मजा आ रहा था! सारी औरतें मुझे सिर-आँखों पर बिठाए थीं।"
तभी उनका ध्यान गया हुक्के पर, जो अभी भी शेखचिल्ली के हाथ में था। बोलीं--"यह हुक्का क्यों उठा लाए? नूरानी भाई ढूंढते फिरेंगे कि हुक्का कहाँ गया?"
मगर शेखचिल्ली भी ऐसे बने बैठे थे, जैसे वह उन लोगों को अभी फाड़ खाएंगे, जिन्होंने नवाब के कपडे पहचाने थे। बेगम की बात उनके कानों में पहुँची ही नहीं--
'काश! मेरे बस में होता कि जिसको चाहूँ फांसी पर चढ़ा दूं। कमबख्तों से कोई पूछे कि नवाब के कपड़ों पर क्या उसका नाम लिखा है कि गुनगुनाने लगे--कपडे तो नवाब के-से लगते हैं!
'मैं अल्लाहताला का इतना नेक बन्दा। दिलो-जान से उसकी इबादत करने वाला। पाँचों वक्त नमाज अदा करने वाला। पीरों और फकीरों की कदमबोसी से पेट भरने वाला। फिर भी पता नहीं, मेरी इतनी बेइज्जती उसे कैसे गवारा होती है? अता क्यों नहीं फरमा देता मुझे कोई ऐसी गैबी ताकत कि जिसकी ओर टेढ़ी नजर से देखूं, वह ख़ाक हो जाए!
'अल्लाह, अगर ऐसी गैबी ताकत मुझे मिल जाए, तो''' तो फिर मैं इन सबकों देख लूंगा। सबसे पहले हाफिज नूरानी के जशन में वापस जाऊंगा। उन सारे बेहूदा लोगों को ऐसी टेढ़ी नजर से देखूंगा कि सर से पाँव तक शोला बन जाएंगे कमबख्त। इधर-उधर भागेंगे। शोर मच जाएगा--पानी डालो! रेत डालो!
'लपटों में घिरे वे वहशी पंडाल में इधर-उधर भागेंगे। दूसरे लोग उनसे बचने की लिये भागेंगे। पंडाल में आग लग जाएगी। '''न '''न ''''पंडाल तो बेचारे हाफिज नूरानी का है। उसमें आग क्यों लगेगी?
'मगर वे भागते-दौड़ते हुए आकर मुझसे लिपट गए तो'''''? अरे कैसे लिपट जाएंगे? मैं उन्हें टेढ़ी नजरों से देखूंगा ही छत पर चढ़कर।
'अगर वे जनानखाने में जा घुसे तो? वहां भी बुरी तरह भगदड़ मच जाएगी। सारी औरतें भाग-भागकर कमरों में जा छिपेंगी। अंदर से सांकल चढ़ा लेंगी।
'मगर बेगम?--बेगम कैसे भागेंगी? वह तो बिना किसी की मदद के उठ भी नहीं सकेंगी।
'या परवरदिगार! खैर करना, वरना बेगम को कबाब बनने में देर नहीं लगेगी। दो-चार बाल्टी पानी तो उनके कोहकाफ जैसे बदन पर दस-पांच बूँद जैसा साबित होगा।
'मगर तीस-चालीस बाल्टियां पानी लाएगा कौन? लोग तो जश्न में मशगूल होंगे। '''उन्हें हादसे की खबर देने के लिए मुझे ही चिल्लाना होगा--आग लग गई! हाय, बेगम आग में घिर गई! दौड़ो!
और तभी बेगम की धौल उनके सिर पर पडी। जैसे धरती पर गिरने से जागे शेखचिल्ली। देखा--हुक्का उन दोनों के बीच गिर पडा है। घोड़ा-गाडी में धुंआ भरा है और धोबी से उधार मांगे कपड़ों में चिंगारियां उठ रही हैं।
22 जून 2011
शेखचिल्ली - शाही हुक्का
Posted by Udit bhargava at 6/22/2011 06:39:00 pm 0 comments
शेखचिल्ली - तेंदुए का शिकार
एक बार कार्यक्रम बना, नवाब साहब कालेसर के जंगलों में शिकार खेलने जाएंगे।
कालेसर के जंगल खूंखार जानवरों के लिये सारे भारत में मशहूर थे। ऐसे जंगलों में अकेले शिकारी कुत्तों के दम पर शिकार खेलना निरी बेवकूफी थी। अतः वजीर ने बड़े पैमाने पर इंतजाम किए। पानीपत से इस काम के लिये विशेष रूप से सधाए किए। पानीपत से इस काम के लिये विशेष रूप से सधाए गए हाथी मंगाए गए। पूरी मार करने वाली बन्दूदें मुहैया की गईं। नवाब साहब की रवानगी से एक हफ्ता पहले ही शिकार में माहिर चुनिंगा लोगों की एक टोली कालेसर रवाना कर डी गई कि वे सही जगह का चुनाव करके मचान बांधें, ठहरने का बंदोबस्त करें और अगर जरूरत समझें, तो हांका लगाने वालों को भी तैयार रखें। इस तरह हर कोशिश की गई कि नवाब साहब कम-से-कम वक्त में ज्यादा-से-ज्यादा शिकार मार सकें।
अब सवाल उठा कि नवाब साहब के शिकार पर कौन-कौन जाएगा? जाहिर था कि शेखचिल्ली में किसी की दिलचस्पी न थी। हो भी कैसे सकती थी? एक तो माशाअल्ला खुदा ने उनको दिमाग ही सरकसी अता फरमाया था कि पता नहीं, किस पल कौन-सी कलाबाजी खा जाए! ऊपर से बनाया भी उन्हें शायद बहुत जल्दबाजी में था। हड्डियों पर गोष्ट चढ़ाना तो अल्लाह मियाँ जैसे भूल ही गए थे।
मगर शेखचिल्ली इसी बात पर अड़े थे कि मैं शिकार पर जरूर जाऊंगा। राजी से ले जाना हो, तो ठीक; वरना गैर-राजी पीछा करता-करता मौके पर पहुँच जाऊंगा।
नवाब ने सुना, तो शेख्चिल्ल्ली की ओर ज़रा गुस्से से देखा। बोले-"तुम जरूरत से ज्यादा बदतमीज होते जा रहे हो। एक चूहे को तो मार नहीं सकते, शिकार क्या ख़ाक करोगे?"
"मौक़ा मिलेगा, तभी तो कर पाऊंगा हुजूर!"--शेखचिल्ली ने तपाक उत्तर दिया--"चूहे जैसे दो अंगुल की शै पर क्या हथियार उठाना? मर्द का हथियार तो अपने से दो अंगुल बड़ी शै पर उतना चाहिए।"
नवाब साहब ने उनका जवाब सुनकर उन्हें अपने शिकारी लश्कर में शामिल कर दिया। काफिला पूरी तैयारी के साथ कालेसर के बियाबान जंगलों में जा पहुंचा। वहां पहले से ही सारा इंतजाम था। तय हुआ कि रात को तेंदुए का शिकार किया जाए।
दिन छिपने से पहले ही सारे लोग पानी, खाना और बंदूकें ले मचानों पर जा बैठे। पेड़ 'सहारा' बाँध दिया गया।
चांदनी रात थी। मचानों पर बैठे सब लोगों की निगाहें सामने बंधे चारे के आसपास लगी थीं। शेखचिल्ली और शेख फारूख एक मचान पर थे। हालांकि वजीर चाहता था कि शेखचिल्ली को अकेला ही एक मचान पर बैठा दिया जाए, ताकि रोज-रोज की झक-झक ख़त्म हो। मगर नवाब नहीं चाहते थे कि शेखचिल्ली को कुछ हो, या वह अपनी हवाई झोंक में कुछ ऐसा-वैसा कर बैठे कि शिकार हाथ से निकल जाए। इसलिए उनकी तजवीज पर शेख फारूख को पलीते की तरह उनकी दम से बाँध दिया गया था। न पलीते में आग लगेगी, न बन्दूक चलेगा।
तेंदुए का इंतज़ार करते-करते तीन घंटे बीत गए। शेखचिल्ली का धीरज छूटने लगा। वह शेख फारूख से फुसफुसाकर बोले--"अजीब अहमक है यह तेंदुआ भी! इतना बढ़िया शिकार पेड़ से बंधा है और कमबख्त गायब है!"
"शिकार में ऐसा ही होता है"--"शेख फारूख ने शेखचिल्ली को चुप रहने का इशारा करते हुए बेहद धीमी आवाज में कहा।
"ख़ाक ऐसा होता है."--शेखचिल्ली फुसफुसाकर बोले--"मेरा तो जी चाहता है, बन्दूक लेकर नीचे कूद पडून, और वह नामुराद जहाँ भी है, वहीं हलाल कर दूं।"
शेख फारूख ने उन्हने फिर चुप रहने को कहा। शेखचिल्ली मन मसोसकर एक तरफ बैठ गए। सोचने लगे--'कमबख्त सब डरपोक हैं। एक अदद तेंदुए के पीछे बारह आदमी पड़े हैं। ऊपर के सारे-के-सारे पेड़ों पर छिपे बैठे हैं। यह कौन-सी बहादुरी है, जिसकी देंगे वजीर हांक रहा था? बहादुर हैं तो नीचे उतारकर करें तेंदुए से दो-दो हाथ! वह जानवर ही तो है! हैजा तो नहीं कि हकीम साहेब भी कन्नी काट जाएं!
'कमबख्त मेरी बहादुरी पर शक करने चले थे। अरे, तेंदुआ कल का आता, अभी आ जाए। नीचे उतारकर वह थपेड दूंगा कि कमबख्त की आँखें बाहर निकल आएंगी।
'मगर सुना है, वह छलांग बड़े गजब की लगाता है। मेरे नीचे उतारते ही उसने मुझ पर छलांग लगा दी तो? '''तो क्या हुआ! बन्दूक को छतरी की तरह सिर पर सीधा तान दूंगा। ससुरा गिरेगा तो सीधा बन्दूक की नाल पर गिरेगा। पेट में धंस जाएगी नाल! हो जाएगा ठंडा!
'और छलांग का भरोसा भी क्या? कुछ अधिक ऊंचा उचल गया, तो जाकर गिरेगा सीधा मचान पर। उठाकर भाग जाएगा शेख फारूख को। सारे लोग अपने-अपने मचान पर से चिल्लाएंगे-- शेखचिल्ली, पीछा करो उस शैतान तेंदुए का! शेख फारूख को ले भागा!
'मैं बन्दूक तानकर तेंदुए के पीछे भागूंगा। तेंदुआ आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे। शेख फारूख चिल्ला रहे होंगे-- शेखचिल्ली, बचाओ! शेखचिल्ली, मुझे बचाओ!
'आखिर तेंदुआ जानवर है, कोए जिन्न तो नहीं? कमबख्त भागता-भागता कभी तो थकेगा! थककर सांस लेने के लिये कहीं तो रूकेगा!
'बस, मैं अपनी बन्दूक को उसकी ओर तानकर यूं लबलबी दबा दूंगा और ''''
"ठांय!"--- तभी तेज आवाज गूंजी। सब चौंक उठे। शेखचिल्ली ने जोर से चिल्लाकर पूछा--"क्या हुआ?"
"तेंदुआ मारा गया।" --शेख फारूख बोले--"कमाल है शेखचिल्ली! चारे पर मुंह मारने से पहले ही तुमने उसके परखच्चे उड़ा दिए।"
'सच?'--शेखचिल्ली ने चारे की ओर देखा तो यकी न आया। पर यह सच था। दूसरे लोग निशाना साध भी न पाए थे कि शेखचिल्ली की बन्दूक गरज उठी थी।
मचान से नीचे उतारकर नवाब साहेब ने सबसे पहले शेखचिल्ली की पीठ ठोंकी। फिर वजीर की ओर देखकर कहा--"शेखचिल्ली जो भी हो, है बहादुर!"
मगर शेखचिल्ली जानते थे कि असलियत क्या थी! वह चुप रहे। चुप रहने में ही भलाई जो थी।
Posted by Udit bhargava at 6/22/2011 05:45:00 pm 0 comments
21 जून 2011
शेखचिल्ली - बेगम के पैर
बात उन दिनों की है, जब महेंद्रगढ़ झज्जर के नवाब के अधीन था। उत्तर-पश्चिम भारत पर विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण हो रहे थे और रोहतक, पानीपत और रेवाड़ी, दिल्ली के रास्ते में पड़ने के कारण इन काक्रान्ताओं की निर्दयता के शिकार होते थे।
नवाब उन दिनों झज्जर के बुआवाल तालाब को ठीक कराने में लगे थे, ताकि संकट के समय रिवाय को पानी का कष्ट न हो, अचानक दुर्राने के तेज हमले की खबर आई। पता चला कि दुर्रानी के सेना रेवाड़ी के पास पहुँचने वाली है।
तुरंत नवाब ने रियासत के जांबाज सिपहसालारों और वजीरों मनसबदारों की एक बैठक बुलाई। अहम मसला था कि अगर दुर्रानी झज्जर का रूख करे, तो उसासे कैसे निबटा जाए? और अगर हमले की सूरत में रोहतक या रेवाड़ी से मदद की गुहार आए, तो क्या किया जाए?
सभी का कहना था कि रियाया को तुरंत आगाह कर दिया जाए कि हमले की सूरत में उसे अपना बचाव कैसे करना है और दुश्मन से जूझने के लिये पूरी तैयारी की जाएं। दूसरी रियासतों की भी भरपूर मदद की जाए।
उसी दिन पूरी रियासत में नवाब की ओर से डुग्गी पिटवा डी गई कि हमले की सूरत में रियासत के कमजोर और बीमार लोग, औरतें और बच्चें भागकर पास के जंगल में चिप जाएं। नौजवान, दुश्मन का मुकाबला करने में फ़ौज का साथ दें।
डुग्गी शेखचिल्ली ने भी सुनी। उनकी बेगार निहायत मोटे किस्म की थीं। उन्हें देखकर अक्सर लोग यह मान ही नहीं पाते थे कि शेखचिल्ली के घर फाके भी होते होंगे। वह एकदम हक्के-बक्के और परेशान हो उठे- 'अब कोई समझाए नवाब को कि हमला हुआ, तो इतनी मोटी बेगम भागकर इतने दूर जंगलों में कैसे जाएँगी? बीच ही में न धर ली जाएंगे!..... फिर खुदा न खास्ता, दुर्रानी की फ़ौज आदमखोर हुई, तो बेगार उनका एक दिन का नाश्ता साबित होंगी.'''''धत तेरे की! मैं भी क्या उलटा-सीधा सोचने लगा! कमबख्तों की धजियाँ न उड़ा दूंगा, अगर उन्होंने बेगार की ओर देखा''' मगर रास्ते ही में पकडे जाने पर वे उन्हें देखेंगे नहीं, तो क्या आँखें बंद कर लेंगे? अंधे भी तो नहीं होंगे वे।
'हाँ, शेख फारूख एक दिन कह तो रहे थे दुर्रानी एकदम अंधा है। मैदान में उतरता है तो अपने-पराए में फर्क नहीं कर पाता। '''''मगर दुर्रानी अंधा है, तो क्या उसके सिपाही भी अंधे होंगे?
'बड़ी मुसीबत में जान फंस गई। मेरा क्या है, मैं तो उसकी फ़ौज के गुबार से ही उड़कर कहीं का कहीं जा पहुंचूंगा। मगर सवाल तो बेगार का है। वह तो जन्नत में भी मेरे बिना सबको फटकार लगाएंगी। अल्लाह मियाँ को भी नहीं बख्शेंगी। '''उफ़, अगर कहीं से उड़ने वाला कालीन मिल जाए तो'''
'मैं भी कितना अहमक हूँ! नवाब साहब ने घोड़ा दे रखा है, फिर भी नाहक परेशान हो रहा हूँ। बेगार को घोड़े पर बैठाकर दौड़ा दूंगा। दुर्रानी की कमबख्त सारी फ़ौज हाथ मालती रह जाएगी।
'मगर घोड़ा भी तो जानवर है। पता नहीं, बेगार का बोझ सह पाएगा या नहीं? ऐसा न हो कि बीच में पिचक जाए! या खुदा, ऐसा हुआ, तो क्या होगा? घोड़ा कहीं गिरेगा, बेगम कहीं बिरंगी! उनसे तो गिरकर उठा भी नहीं जाएगा।
'फिर घोड़ा नवाब का है। क्या पता, सीधा जंगल में जाएगा या लड़ने क जोश में कमबख्त दुर्रानी की फ़ौज में ही जा घुसेगा! बेगम बेचारी तो जोर-जोर से फटकार लगाने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकतीं। माना कि उनके अब्बा हजूर एक जांबाज सिपाही थे, तलवार ऐसी चलाते थे कि दुश्मन को छठी का दूध याद आ जाता था, मगर धुल पड़े उनके दकियानूसी ख्यालात पर! बेगार को जबान चलाना तो सिखा दिया, तलवार चलानी नहीं सिखाई। सिखा देते, तो उस समय काम न आती जब घोड़ा उन्हें लिये दुर्रानी की फ़ौज में जा घुसता!
'मगर '''यह माना कि घोड़ा दुर्रानी के फ़ौज में घुस जाएगा, मगर बेगार क पास तलवार कहाँ से आएगी? अल्लाह मियाँ आसमान से तो टपका नहीं देंगे कि लो मेरे बन्दे शेखचिल्ली की बेगा, तलवार लो और काट डालो दुर्रानी की गर्दन!
'अल्लाह मियाँ इतने मेहरबान होंगे, तो बेगम दुर्रानी की गर्दन जरूर काट डालेगी। कितना मजा आएगा उस दिन! दुर्रानी की फ़ौज में दहशत छा जाएगी। उसके सारे सिपाही मैदान छोड़कर भाग जाएंगे। नवाब उन्हें हैरानी से भागता देखेंगे।
पूछेंगे--यह अनहोनी कैसे हुई? किस आसमानी ताकत ने यह सब किया?
तभी भेदिया आकर नवाब को बताएगा-- हुजूर, एक मोटी औरत ने तलवार से दुर्रानी की गर्दन उड़ा दी।
'नवाब और हैरान होंगे। तपाक से कहेंगे-- वह औरत है या फरिश्तों की मलिका? उसे पूरी इज्जत के साथ दरबार में पेश करो!
'पेश करो''' नहीं-नहीं, नवाब कहेगा कि हम खुद उसकी कदमबोसी करेंगे।
'फिर वह घोड़े से उतारकर नागे पैर बेगम की तलाश में निकलेगा, वैसे ही जैसे शहंशाह अकबर नंगे पैर वैष्णो देवी की जियारत पर निकले थे।
'बेगम, दुर्रानी का खून से लथपथ सिर तलवार की नोक पर टाँगे मैदाने-जंग में खडी होंगी। नवाब उसकी कदमबोसी करेगा। बार-बार सजदे में झुकेगा।
'अपने सभी अमीर-उमराव को बेगम के पैरों की धुल माथे से लगाने को कहेगा। पैर चूमने को कहेगा।
'सभी बेगम के पैर चूमेंगे। नवाब मुझसे भी उनके पैर चूमने को कहेगा। '''भला अपनी बेगम क पैर मैं कैसे चूम सकता हूँ? मैं कहूंगा नहीं।
'नवाब जोर से चिल्लाएगा--चूमो!
'मैं फिर कहूंगा-- नहीं।
'नवाब बौखला उठेगा। सिपाहियों से कहेगा-- पकड़ लो इस मरदूद को और डाल दो इस आसमानी ताकत के पैरों पर!
'नवाब के सिपाही मुझे पकड़ लेंगे और फिर'''
और जोर से धाम की आवाज हुई तो शेखचिल्ली ने देखा-- वह चारपाई से लुढ़ककर नीचे सब्जी छीलती बेगम के पैरों में गिर पड़े हैं।
''आग लगे इस बौडमपने में!" बेगम जोर से चीखीं--"अच्छा हुआ, दरांती पर नहीं गिरे। हो जाती ख़त से गर्दन अलग!"
और शेखचिल्ली बेचारे क्या कहते! खिसियाना हो, चुपचाप छत पर चले गए। हाँ, अलबत्ता दुर्रानी के हमले का डर उन्हें और ज्यादा सताने लगा था कि कहीं सचमुच में बेगम के पैर ही चूमने न पड़ जाएं।
Posted by Udit bhargava at 6/21/2011 09:22:00 pm 0 comments
शेख्चिली की दूसरी नौकरी
पहले मालिक ने शेख्चिली को ठीक काम न करने के कारण निकाल ही दिया तो शेखचिल्ली एक सेठ के यहाँ पहुंचा और हाथ जोड़कर सेठजी से बोला-हुजूर मैं बहुत गरीब आदमी हूँ आप मुझे खिदमत के लिये नौकरी पर रख लीजिये।
सेठजी ने कहा-ठेक है, मगर तुमको मुझे एक इकरार नामा लिखकर देना होगा। अगर तुम उसके अनुसार काम न करोगे या नौकरी चोदोगे तो तुम्हारे नाक-कान का लिये जाएंगे। यदि हम तुमहें नौकरी से अलग करने को कहेंगे तो तुम हमारे नाक-कान काट देना।
सब काम इत्यादि लिखकर एक इकरार नामा तैयार किया गया तो दोनों उस पर अपने-अपने हस्ताक्षर करके सो रहे।
सुबह उठते ही शेखचिल्ली ने सोचा कि रोज सर और दाढी का काम बड़ा बे मौक़ा है इसलिए उनकी सफाई ही करवा देनी चाहिए। ऐसा सोचकर उसने पानी में छूना पीसकर डाल दिया।
उस पानी में जब सेठ जी ने दाढी को और उनकी स्त्री ने बालों को धोया तो सब गिर गए। सेठ जी ने खफा होकर कहा-यह क्या?
शेख्चिल्ले बोला-इकरार नामें के खिलाफ तो मैंने कुछ नहीं किया।
सेठजी की किताबों का बैग भी शेखचिल्ली रोज दफ्तर ले जाया करता था। एक दिन शेखचिल्ली ने वैसा ही दूसरा बैग बनाकर उसमें ईटें भर दीन और दूसरे दिन ले जाकर दफ्तर में रख दिया। जब सेठ जी ने बैग खोला तो हक्के-बक्के रह गए और सबको हंसता देखकर बड़े शर्मिन्दा हुए अब सेठ जी समझ गए कि नौकर कुछ उस्ताद मिला है।
शेखचिल्ली की अगली शर्त थी प्रतिदिन घोड़े को चराकर लाने की शर्त के अनुसार शेखचिल्ली घोड़े को लेकर चराने गए तो घोड़े को छोड़कर और चादर तानकर सो रहे। रात होने पर घोड़े लेकर वापिस आए तो रास्ते में सौदागर बोला-क्यों भाई घोड़ा बेचोगे?
शेखचिल्ली ने उत्तर दिया- हाँ साहब बेचेंगे। मगर 50 रू लेंगे। सौदागर ने खा-नहीं।
तब शेखचिल्ली बोले 40 ही दे देना पर घोड़े की थोड़ी पूँछ काट लेने दो।
शेखचिल्ली सौदागर से रूपया और थोड़ा सा पूँछ का टुकडा लेकर चल दिया और जाते ही चिल्लाने लगा- सेठ जी! सेठजी!! घोड़े को चूहे अपने बिल में घटित कर ले गए। सेठ जी आए तो उन्हें पूँछ दिखाकर कहने लगा- देखिये घोड़े को खींचने पर उसकी पूँछ टूट कर रह गई।
सेठ जी उसे नौकरी से अलग होने को कहते तो नाक-कान कटवाने पड़ते थे अतः चुप होकर रह गए।
शर्त में यह भी लिखा था कि शेखचिल्ली घर में जलाने को लकड़ी भी लाया करेगा। जब शेखचिल्ली लकड़ी लेकर आया तो उसने आते ही घर में रख कर आग लगा डी।
सेठजी उस समय मन्दिर गे हुए थे। आने पर उन्होंने शेखचिल्ली से कहा- तुमने हमारे घर में आग क्यों लगाई? अब हम तुमको नौकर नहीं रखेंगे।
शेखचिल्ली ने इकरार नामे की बात कह दी।
सेठजी ने तंग आकर अपनी पत्नी से कहा- अब तो इससे नाक-कान बचाना ही कठिन है। क्या किया जाए।
पत्नी ने कहा मैं आपके साथ पीहर चली जाती हूँ यह आप ही पीछे से भाग जाएगा।
शेखचिल्ली ने यह सब बात सुन ली और रात को ही सेठजी के ले जाने वाले बक्से में जा बैठा।
सुबह होने से पहले ही सेठजी और उसकी पत्नी बक्सा लेकर चल दिए। जब कुछ दूर चले गए तो सेठजी बोले कमबख्त से पीछा तो छूता अब वह नहीं आ सकेगा। ऐसे कहते हुए सेठजी व उनकी पत्नी चले जाते थे तो बक्से में बैठे शेखचिल्ली को पेशाब आ गया तो उसने संदूक में ही कर दिया। जब पेशाब बहकर सेठजी के मुंह पर आया तो सेठजी ने समझा की हलुवा बनाकर हमने संदूक में रखा था उसका घी बह रहा है।
जब सेठजी ने संदूक उतार कर जमीन पर रखा तो झट संदूक में से शेखचिल्ली निकल आया और बोला-हुजूर के क़दमों को तब तक नहीं छोड़ सकता जब तक नाक-कान न काट लूण।
सेठजी ने कहा- क्यों? यह लो संदूक इसे सिर पर रख के ले चलो। परन्तु शेखचिल्ली ने इनकार कर दिया।
लाचार सेठजी अपने ही सिर पर संदूक रखकर चले। जब ससुराल एक मील रह गई तो उन्होंने शेखचिल्ली से कहा-जाओ ससुराल कह दो सेठ जी आए है वह फलां जगह पर बैठे हैं उन्हें ले आओ।
शेखचिल्ली ने ससुराल जाकर कहा-सेठ जी बीमारी की हालत में हैं कठिनता से आए हैं। उन्हें लिवा लाएं।
रात को जब खाने का वक्त आया तो सेठ जी के आगे डाल रखी और शेखचिल्ली को आचे-२ पकवान खाने को मिले।
रात को सेठजी को पाखाना लगा तो शेख जी बोले बाहर कहाँ जाएंगे यहीं इसी हंडिया में कर दीजिये। सेठ जी ने वैसा ही किया। सुबह होने पर बोले-जाओ हंडिया फेंक आओ। परन्तु शेखचिल्ली ने मना कर दिया।
लाचार सेठ जी स्वयं हंडिया कपडे में लपेट कर फेंकने चले। चौखट पर ठोकर लगी तो हंडिया छूट कर नीचे गिर गई। सबके बदन पर पाखाने के छींटे पर और थू-थू करते भागे।
Posted by Udit bhargava at 6/21/2011 08:52:00 pm 0 comments
20 जून 2011
शेखचिल्ली की चल गई
एक दिन शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” उन दिनों शहर में शिया-सुन्नियों में तनाव था और झगड़े की आशंका थी।
उसे ‘चल गई, चल गई’ चिल्लाते हुए भागते देखकर लोगों ने समझा कि लड़ाई हो गई है। लोग अपनी-अपनी दूकानें बंद कर भागने लगे। थोड़ी ही देर में बाजार बंद हो गया।
कुछ समझदार लोगों ने शेखचिल्ली के साथ भागते हुए पूछा, “अरे यह तो बताओ, कहां पर चली है? कुछ जानें भी गई हैं क्या?”
शेखचिल्ली थोड़ा ठहरा और हैरान होकर पूछा, “क्या मतलब?”
“भाई, तुम्हीं सबसे पहले इस खबर को लेकर आए हो। यह बताओ लड़ाई किस मुहल्ले में चल रही है।”
“कैसी लड़ाई?” शेखचिल्ली ने पूछा।
“अरे तुम्हीं तो चिल्ला रहे थे कि चल गई चल गई।”
“हां-हां”, शेखचिल्ली ने कहा “वो तो मैं इसलिए चिल्ला रहा था कि बहुत समय से जेब में पड़ी एक खोटी दुअन्नी, आज एक लाला की दुकान पर चल गई है।”
Posted by Udit bhargava at 6/20/2011 09:48:00 pm 1 comments
शेखचिल्ली - सड़क यहीं रहती है
परन्तु उसने पूछा था कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है। शेखचिल्ली को मजाक सूझा। उसने कहा, ‘क्या आप यह पूछ रहे हैं कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘हाँ-हाँ, बिल्कुल!’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया।
इससे पहले कि कोई लड़का बोले, शेखचिल्ली बोल पड़ा, ‘इन तीनों में से कोई भी रास्ता नहीं जाता।’ ‘तो कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘कोई नहीं।’‘क्या कहते हो बेटे?’ शेख साहब का यही गाँव है न? वह इसी गाँव में रहते हैं न?’ ‘हाँ, रहते तो इसी गाँव में हैं।’ ‘मैं यही तो पूछ रहा हूँ कि कौन-सा रास्ता उनके घर तक जाएगा।’
‘साहब, घर तक तो आप जाएँगे।’ शेखचिल्ली ने उत्तर दिया, ‘यह सड़क और रास्ते यहीं रहते हैं और यहीं पड़े रहेंगे। ये कहीं नहीं जाते। ये बेचारे तो चल ही नहीं सकते। इसीलिए मैंने कहा था कि ये रास्ते, ये सड़कें कहीं नहीं जाती। यहीं पर रहती हैं। मैं शेख साहब का बेटा चिल्ली हूँ। मैं वह रास्ता बताता हूँ, जिस पर चलकर आप घर तक पहुँच जाएँगे।’
‘अरे बेटा चिल्ली!’, वह आदमी प्रसन्न होकर बोला, ‘तू तो वाकई बड़ा समझदार और बुद्धिमान हो गया है। तू छोटा-सा था जब मैं गाँव आया था। मैंने गोद में खिलाया है तुझे। चल बेटा, घर चल मेरे साथ। तेरे अब्बा शेख साहब मेरे लंगोटिया यार हैं। और मैं तेरे रिश्ते की बात करने आया हूँ। मेरी बेटी तेरे लायक़ है। तुम दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी। अब तो मैं तुम दोनों की सगाई करके ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली उस सज्जन के साथ हो लिया और अपने घर ले गया। आगे चलकर वह सज्जन शेखचिल्ली के ससुर बन गए।
Posted by Udit bhargava at 6/20/2011 09:46:00 pm 0 comments
शेखचिल्ली का नुकसान
‘मेरी तो समझ में नहीं आता, अम्मी कि मैं क्या काम करूँ? मैं तो किसी तरह की दस्तकारी भी नहीं जानता।’ ‘बेटे, तुम्हारे अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं। तुम्हें कोई-न-कोई काम-धंधा जरूर करना चाहिए।’ ‘तुम ऐसा कहती हो तो ठीक है। मैं काम की तलाश में जाता हूँ।’ ‘जाओ।’ अम्मी ने कहा।
‘जा रहा हूँ। पर मुझे बढ़िया- सा खाना खिलाओ। मैं खा-पीकर ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली बोला।
‘अभी बनाए देती हूँ।’ अम्मी ने उत्तर दिया। शेखचिल्ली की माँ ने उसके लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनाए और उन्हें खिला-पिलाकर उसे नौकरी की तलाश में भेज दिया। शेखचिल्ली मस्ती में झूमता हुआ घर से निकल पड़ा। उसके दिमाग में नौकरी या मजदूरी के सिवा कोई बात नहीं थी।
वह घर से बहुत दूर निकल गया। एक जगह रास्ते में उसे एक सेठ मिला। वह घी का हंडा सिर पर लिए जा रहा था। बोझ के कारण सेठ के कदम लड़खड़ा रहे थे। सेठ ने उसे देखते ही कहा, ‘ए भाई! मजदूरी करोगे?’ ‘बिलकुल करूँगा। बंदा तो मजदूरी की तलाश में है ही।’ ‘तो मेरा यह हंडा ले चलो। इसमें घी है। घी बिखर न जाए! तुम इसे मेरे घर तक पहुँचा दोगे तो मैं तुम्हें एक अधन्ना दूँगा।’
‘सिर्फ एक अधन्ना!’ चिल्ली ने पूछा। ‘हाँ,’ सेठ ने उत्तर दिया। ‘लाओ सेठजी, मैं ही लिए चलता हूँ। पहली बार मजदूरी कर रहा हूँ, दो पैसे कम ही सही।’ शेखचिल्ली ने कहा। और उसने सेठ का घी से भरा हुआ वह बड़ा बर्तन अपने सिर पर रख लिया। सिर पर घी का बर्तन रखकर शेखचिल्ली उस सेठ के साथ चल दिया।
चलते-चलते शेखचिल्ली सोचने लगा, यह सेठ मुझे दो पैसे देगा। दो पैसे यानी आधा आना। आधा आना यानी कि दो पैसे।
उनमें एक मुर्गी और एक मुर्गे का चूज़ा खरीदा जा सकता है। वे चूज़े बड़े होंगे। एक बड़ी मुर्गी और मुर्गा। मुर्गी अंडे देगी। वह रोज अंडे देगी। खूब चूज़े बनेंगे। कुछ दिनों में बहुत-सी मुर्गियाँ हो जाएँगी। ढेरों मुर्गियाँ हो जाएँगी तो वे और अंडे दिया करेंगी। अंडे बेचने से मुझे बहुत आमदनी होगी।
फिर तो पैसों की कमी ही नहीं रहेगी। अपने लिए एक शानदार घर बनाऊँगा। बहुत-सी जमीन खरीदूँगा। भैंसे खरीदकर डेरी बनाऊँगा। दूध बेचूँगा। दूध और अंडों का थोक व्यापारी बन जाऊँगा तो पूरे इलाके में मेरी धाक जम जाएगी। सब लोग मेरा माल पसंद करेंगे और खरीदेंगे। व्यापार चल निकलेगा।
Posted by Udit bhargava at 6/20/2011 09:43:00 pm 0 comments




एक टिप्पणी भेजें