25 मई 2011

शहरों में अपनी सुरक्षा खुद करती हैं युवतियां

स्मिता जब अपना छोटा सा शहर छोड़कर दिल्ली जैसे बड़े महानगर में आई तो काफी परेशान हो उठी। नए-नए चेहरे, कोई जान-पहचान नहीं, कहाँ रहें, क्या खाएं, किससे बात करें? किससे दूरी रखें? ये सारी बातें उसके कंरियर में रूकावट डालने लगीं। रोमांच भरी काँलेज लाइफ और नौकरी के बेहतर विकल्प के कारण छोटे शहरों की लड़कियों का रूझान बड़े शहरों की तरफ से तेजी से हो रहा है। ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल उठाता है उनकी सुरक्षा का। आए दिन लड़कियों से छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। कई लडकियां परुषों की बुरी नज़रों का सामना हर दिन करती हैं। सड़कों पर, बस में, ट्रेन में या फिर मेट्रो में। ऐसे में किसी पर भरोसा करना उनके लिये मुश्किल होता है। पिछले दिनों बिहार से दिल्ली आई एक युवती के पड़ोस के युवक ने दोस्तों के साथ मिलकर उसकी अस्मत तार-तार कर दी।

हमेशा सुरक्षित जगह रहें
ज्यादातर कालेज युवतियों के लिये रहने के लिये सुरक्षित जगह तलाश करना बेहद जोखिम भरा होता है। हाँस्टल में लड़कियों को छोटा कमरा दे दिया जात है जिसके बदले उनसे अच्छी खासी रकम वसूली जाती है। इस कारण शहर से आने वाली युवतियों के लिये हमेशा आर्थिक समस्या बनी रहती है। पेइंग गेस्ट या कोई रहने की जगह तलाशना अक्सर बड़े शहरों में युवतियों के लिये चुनौतीपूर्ण रहता है। ज्यादा आप एजेंटों पर भरोसा करते हैं। क्योंकि उनके बगैर घर पाना बेहद ही मुश्किल होता हैं। कोशिश करें आप हमेशा एजेंट के बहकावे में न आएं। किराए का फ़्लैट लेने से बेहतर होगा आप अपने लिए हाँस्टल तलाशें, जहाँ लडकियां रहती हों।

किसी पर भी भरोसा न करें।
अक्सर देखा जाता है कि युवतियां जल्द ही किसी अजनबी या कालेज के साथ पढने वाले छात्र पर आसानी से भरोसा कर लेती हैं। नतीजा यह होता है कि वह आर्थिक, मानसिक और शारीरिक हर तरह से शोषित की जाती हैं। आए दिन छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी घटना इसी कारण होती हैं। कोशिश करें कि जब आप बाहर जा रहें हों तो वहां आपकी जान-पहचान का कोई होना चाहिए। वह आपका 'लोकक गार्जियन' हो सकता है।

सुनसान जगह अकेली न जाएं
छोटे शहरों की युवतियां बड़े शहरों में जाती हैं तो उन्हें वहां की जगह के बारे में कुछ पता नहीं होता। युवतियां अनजाने में सुनसान जगहों पर अकेले चली जाती हैं और हादसों का शिकार हो जाती हैं। अकेले जाने से अच्छा है आप अपनी सहेली के साथ जाएं या समूह में जाएं। इस तरह आप अप्रिय घटना से बच सकती हैं। हालांकि ऐसा जरूरी नहीं। पिछले दिनों दिल्ली के अलीपुर इलाके में मिनी स्टेडियम में प्रैक्टिस के दौरान कुछ युवकों ने किकबाक्सिंग महिला खिलाड़ियों से छेड़छाड़ की।

बुरी नजरों पर रखें नजर
ज्यादातर युवतियां बड़े शहरों की चकाचौंध देखकर अक्सर धोका खा जाती हैं। बड़े शहरों में आकर वह हर तरफ से तंग होती हैं। बाईस साल क़ी दिव्या जब नैनीताल से दिल्ली आई तो उसे यहाँ कहीं जाने में बहुत दिक्कत होती। जब भी वह बस में सफ़र करती तो लोग उसे बुरी नजर से देखते। आँटों वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही था। वह हमेशा ज्यादा पैसे की मांग करते जिससे दिव्या को खासी परेशानी होती। इन दिक्कतों से बचने के लिये इमरजेंसी नंबर अपने मोबाइल में फीड करके रखें। विश्वसनीय दोस्त, सहेली और लोकर गार्जियन के संपर्क में रहें।
         सुरभि ने जब मेरठ छोड़ा तो उसे दिल्ली जैसे बड़े शहर में कोई दिक्कत नहीं हुई। अपने शहर में उसने पढाई पूरी की और दिल्ली आते ही काम करना शुरू कर दिया। उसने कुछ अच्छे दोस्त भी बना लिये। सुरभि का माना है कि आपकी सुरक्षा आपके हाथ में है। इसके लिये जरूरी है कि आप हाँस्टल या घर से निकलते ही मोबाइल आन रखें। हमेशा सतर्क रहें। किसी भी बस में अकेले सफर न करें। ऑटो लें तो उसका नंबर नोट कर लें। जरूरत पड़ने पर पुलिस को काँल कर सकती हैं। पार्क में या सुनसान जगह साथी के साथ भी न बैठें। अनजान जगह अकेले जाने से बचें।

क्यों जरूरी है तीर्थ यात्रा?

यह सच है कि तीर्थ का संबंध आध्यात्मिक एवं पावन स्थल से है फिर वह किसी मन्दिर, नदी, घाट आदि किसी भी रूप में क्यों न हो, किसी भी धर्म, जाती एवं देश का क्यों न हो। लोग उन स्थानों पर जाकर स्वयं को धन्य करते हैं, स्नान करते हैं या अपने इष्ट के स्थल के दर्शन करते हैं। ऐसे स्थालों पर लोग दान-पुण्य भी करते हैं। इन सब के पीछे उनकी एक ही धारणा होती है और वह है पापों से मुक्ति, जन्मों के बंधन से छुटकारा या फिर अपने इस जीवन को धन्य बनाना। परन्तु इन कारणों के अलावा भी अनेक कारण हैं जिसके लिये तीर्थ यात्रा जरूरी ही नहीं हितकारी भी है।

ऊर्जा का केंद्र
अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि भगवान तो सब में सब जगह व्याप्त है शरीर में भी, घर में भी और मन्दिर में भी। फिर तीर्थ क्यों जाएं? जिस तरह घर के हर कमरे का अपना अलग महत्वा है उसी तरह धरती पर हर स्थल का भी अपना महत्व है। क्या आपने कभी सोचा है कि हम रसोई में क्यों नहीं नहाते? या स्नानघर में खाना क्यों नहीं खाते? और जब भगवान् सब जगह सब में व्याप्त है तो फिर मन्दिर में क्यों जाते हैं? क्योंकि जहाँ हम अपना नित्य कर्म करते हैं वहां उसी तरह के भाव, सुगंध, तरंग एवं ऊर्जा आदि प्रवाहित होने लगती है। जो हमने रूपांतरित करने में हमारी मदद करती है। इसीलिये जो ऊर्जा तीर्थ स्थलों पर बहती है वह अन्य स्थानों से अधिक प्रभावशाली एवं पवित्र होती है। यही कारण है कि ऐसे स्थलों पर हजार भक्तों एवं श्रद्धालुओं के मन स्वतः ही मंत्र मुग्ध हो जाते हैं। वहां का नजारा, भजन-कीर्तन में डूबे लोग शहरी दुनिया से दूर मन में अध्यात्मिक शक्ति का संचार करते हैं जिससे मन हल्का एवं तनाव मुक्त होने लगता है।

स्वास्थ्यवर्धक
तीर्थ यात्रा स्वास्थ्य की दृष्टि से भेए हितकारी होती है क्योंकि जहाँ पर भी तीर्थ है वहां का वातावरण एकदम स्वच्छ एवं सुरमय होता है। वहां की वनस्पति आँखों को राहत एवं ठंडक देती है। लगातार चलते एवं सीढियां चढ़ने-उतरने से तथा भजन-कीर्तन में तालियों के साथ गाने से हथेली एवं तलवों पर दवाव पड़ता है जिसे एक्यूप्रेशर कहा jaaटा है जिससे कई रोग दूर होते हैं. saatvik भोजन evm fala

24 मई 2011

अहम को न बनाएं अहम


निरूद्ध और दीक्षा एक ही आँफिस में काम करते हैं। दोनों की शादी को साल भर भी नहीं हुआ कि आए दिन दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ाई होती रहती है, फिर चाहे वे आँफिस हो या घर पर। एक दिन तो हद ही हो गई जब दीक्षा ने अनिरूद्ध को अपने इंकरीमेंट के बारे में बताया तो अनिरूद्ध खुश होने के बजाए नाराज होने लगा। गुस्से में उसने दीक्षा से कहा, 'हाँ-हाँ तुम्हारी तो सैलरी बढनी ही थी, तुम सबकी चहेती जो हो। हर कोई तुम्हें इतना प्यार जो करता है, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ तुम्हारे आगे।'

अनिरूद्ध की बात सुनकर दीक्षा सकते में आ गई। उसने कहा, 'अनिरूद्ध तुम्हें क्या हो गया है? मैं और आप अलग तो नहीं हैं न, अरे आपको तो खुश होना चाहिए और आप....।'
'बस, अपनी फालतू की बातों से मेरा दिमाग मत खाऊ। तुम्हें क्या लगता है कि मैं अंधा हूँ, मुझे दिखाई नहीं देता कि तुम आँफिस में कैसे रहती हो। हर किसी से जब हंसकर बात करोगी तो सब तो तुम्हें पूछेंगे ही। अनिरूद्ध ने फिर गुस्से में कहा। 'अनिरूद्ध मुझे नहीं समझ में आता कि आपको मुझसे अब क्या परेशानी हो गई। पहले तो ऐसा कुछ नहीं था, तब तो मेरी सारी खुशियाँ आपकी थी, पर अब...। दीक्षा की बात को बीच में काटते हुए अनिरूद्ध बोला, पहले क्या था वे भूल जाओ, अब क्या है वो देखो। तुम चाहती हो कि मैं हमेशा तुमसे नीचे रहूँ, तभी तो आँफिस में भी रौब दिखाती हो, अब तो और ज्यादा दिखाओगी, क्योंकि अब प्रमोशन के साथ सैलरी भी बढी है।' बस अनिरूद्ध बहुत हो गया, अब शांत हो जाओ। मैं कुछ नहीं बोल रही हूँ और तुम हो कि अनापशनाप बोलते चले जा रही हो।' दीक्षा ने गुस्से में कहा। 'हाँ अब तो मेरी बात तुम्हें बेकार लगेगी ही।' अनिरूद्ध बोला। 'प्लीज शांत हो जाओ अनिरूद्ध, मैं बात को बढ़ाना नहीं चाहती। प्लीज चुप रहो।' दीक्षा ने कहा। 'दीक्षा एक बात कान खोलकर सुन लो, अगर तुम्हें रहना है तो मेरे हिसाब से रहो नहीं तो अभे और इसी वक्त घर छोड़कर चली जाओ।' अनिरूद्ध की यह बात सुनकर दीक्षा के पैरो तले जमीन सरक गई, उसने रोते हुए अनिरूद्ध से कहा, 'अनिरूद्ध ये आप क्या कह रहे हो, इतनी सी बात को इतना बड़ा क्यों बना रहे हो। मैं कहीं नहीं जाऊंगी। दीक्षा का इतना बोलना था कि अनिरूद्ध ने एक थप्पड़ दीक्षा के गाल पर मारा और बोला, 'ये मेरा घर है, सो प्लीज यू कैन गो।' इतना कहकर अनिरूद्ध दूसरे कमरे में चला गया और दीक्षा रोते-रोते बेडरूम में चली गई।

शादी के बाद हर पति-पत्नी के बीच छोटी-मोती नोंक-झोंक होती रहती है और यह जरूरी भी होता है क्योंकि प्यार में जब तक तकरार नहीं होती तो प्यार कैसे बढेगा। पर जब पति-पत्नी के बीच प्यार में इगो यानी अहम् आ जाता है तो हल्की-फुलकी लड़ाई भी बड़ा रूप ले लेती है। क्योंकि यह एक ऐसी भावना है, जो अपनी संतुष्टि के लिये दूसरों को नीचा दिखाने से नहीं चूकती। काउंसलर प्रांजलि मल्होत्रा कहती है, 'तेजी से बदलते समय के साथ जीवन के हर क्षेत्र में स्थापित मूल्यों के अर्थ बदल रहे हैं। कल तक महिलाओं के लिये घर की चारदीवारी से बाहर निकलना मुश्किल था, पर आज की स्त्रियाँ पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। यही उच्चता या श्रेष्ठता की भावना स्त्रियों में इगो उत्पन्न कर देती है, जिसको पुरूष प्रधान समाज स्वीकार नहीं कर पाता। वहीं मैरिज काउंसलर रिंकू कहती है, 'आज फेमिनिज्म का ज़माना है। महिलाएं पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं, जिसका असर वैवाहिक जीवन में पड़ रहा है। आज के जमाने में भी घर के सारे कार्यों के लिये पत्नी को जवाबदेह माना जाता है और यदि कोई गलती होती है तो पत्नी को ही दोषी माना जाता है। पर यदि दोनों स्वरूपों के यथार्थ को समझा जाए तो पति-पत्नी के बीच अहम् का अवसर ही नहीं आएगा। आजकल स्थिति बहुत प्रतिकूल हो चली है। पति-पत्नी आज समझौते के लिये पहल करने से पहले इगो को पहले रखते हैं, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि रिश्ता मजबूत बनने से पहले ही टूट जाता है।'

क्या करें

अगर आप चाहते हैं कि दाम्पत्य जीवन में खुशहाली बनी रहे तो बहुत जरूरी है कि निम्न बातों का ध्यान रखें -
* अगर आपको लगता है आपके पति में कोई कमी है तो उसकी अक्षमताओं व कमजोरियों को उसके सामने बार-बार न कहें। पति जैसा भी हो पहले उसे समझें व स्वीकार करें।
* अगर आप दोनों के परिवार के किसी अन्य सदस्य को अक्षमता व कमजोरी का ज्ञान आप दोनों को है तो उसका जिक्र बाहर वालों के सामने न करें और न ही उसका मजाक उडाएं।
* किसी भी बात को प्रतिष्ठित का प्रश्न न बनाएं। यदि पति/पत्नी दोनों में कोई भी हर बात को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने लगता है और इगो की भावना अपना लेते हैं तो परिवार में उसका महत्व ख़त्म होने लगता है।
* यदि परिवार के किसी सदस्य की कोई बात बुरी लगती है या जल्दी क्रोध आ जाता है तो आप दिल में उठने वाली भावना व विचारों को तुरंत प्रकट न करें। कुछ देर सोच-समझकर ही बात को कहें।
* पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं, इसलिए एक-दूसरे की सफलता को अलग दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।
* अगर दोनों के बीच लड़ाई हो गई है तो पहल करने की कोशिश करें। ये बात दिल से निकाल फेंकें कि हम क्यों पहले पहल करें।
* भूल से अगर कोई गलती हो गई है तो उस गलती को स्वीकारें न की गुस्सा होकर गलती को छुपाने की कोशिश करें।
* किसी भी बात को लंबा खींचना के लिये बहस न करें, बल्कि कोशिश करें कि बहस से बचें।
* एक दूसरे पर आरोप लगाने से पहले परेशानियों को समझें, उसके बाद ही कोई बात कहें।
* यदि किसी बात पर आपसी मतभेद हो गया है और दोनों में कोई भी बदलने को तैयार नहीं है तो इसे अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा न बनाएं।
* अपनी सफलता का श्रेय अपनी पत्नी को देना कभी न भूलें, क्योंकि वह आपकी जीवन संगिनी है।
* कितनी भी नाराजगी क्यों न हो कभी भी बातचीत बंद न करें, बल्कि इस सिलसिले को बनाए रखें।
* हमेशा ध्यान रखें कि इगो प्यार का दुश्मन है, इससे मसले सुलझते नहीं और भी उलझ जाते हैं। अतः जीवन में मधुरता व सहनशीलता के गुण अपनाएं।

15 मई 2011

समाज सुधारक थे श्रीमद शंकरदेव

असम के महान संत श्रीमद्‌ शंकरदेव का जन्म नौगांव जिले के अली पुखरी में १४४९ में हुआ था। उनका जीवन अनेक अनूठी घटनाओं से पूर्ण था। अपने दूरदर्शी प्रयास से उन्होंने अनेक जाति-वर्गों में विभाजित पूर्वोत्तर में भक्ति रस की जो धारा प्रवाहित की और जनसाधारण को कल्याण की राह दिखाई, वह अतुलनीय है।

शंकरदेव के पूर्वज चंडीवर भूइयां पहले बंगाल आकर बसे थे और वहां से असम आ गए थे। उनके वशंजों ने मध्य असम के विभिन्न भागों में भूइयां-राज्यों की स्थापना की थी। शंकरदेव के पिता शिरोमणि भूइयां कुसुंबर अली पुखरी में आकर बस गए थे।

शंकरदेव की माता का नाम सत्यसंधा था। बचपन में ही शंकर को माता-पिता की स्नेह-छाया से वंचित होना पड़ा।

वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।
शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।
शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।

"शंकरदेव की प्रमुख कृतियां विशुद्ध असमिया भाषा में -काव्यः हरिशचंद्र उपाख्यान एवं रुक्मिणी हरण काव्य -भक्ति पद : कीर्तन घोष, भक्ति प्रदीप, गुणमाला ब्रजावली भाषा में - प्रगीत पद- बरगीत - टीकाः शंकरदेव ने भक्ति तत्व संबंधी संस्कृत ग्रंथ भक्ति रत्नावली की टीका भी लिखी थी। अनूदित कृतियां शंकरदेव ने उत्तर कांड रामायण तथा श्रीमद्‌ भागवत के कई स्कंधों का असमिया भाषा में अनुवाद भी किया।" उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया। बारह वर्ष की आयु में शंकर महेंद्र कंदली की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन करने लगे। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के माध्यम से उनके मन में तत्व-ज्ञान की ज्योति जल उठी। अल्प समय में ही अतुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर वे घर लौटे, परंतु उनका मन भक्ति में रम गया था।

आम लोगों की दशा पर उन्होंने ध्यान दिया और अनुभव किया कि भक्ति की राह पर चलकर ही उनको उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। परिवार के सदस्यों के आग्रह पर उन्होंने सूर्यावती से विवाह किया। सांसारिक कर्मों से उदासीन होकर वे चिंतन-लेखन में जुट गए। इन्हीं दिनों उन्होंने चिह्न यात्रा नाटक की रचना की और उसका मंचन किया। फिर वे अपने साथियों के साथ बारह वर्षों तक भ्रमण करते रहे। इस दौरान जहां उन्होंने तीर्थ स्थानों की यात्रा की, वहीं कई संतों के संपर्क में भी आए। उन्हें श्रीमद्‌भागवत पर आधारित कृष्ण भक्ति का प्रचार करने की प्रेरणा मिली।
 

वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।

शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।

शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।

राधा कृष्ण के सच्चे उपासक थे नींबार्क

सनातन संस्कृति की आत्मा श्रीकृष्ण को उपास्य के रूप में स्थापित करने वाले निंबार्काचार्य वैष्णवाचार्यों में प्राचीनतम माने जाते हैं। राधा-कृष्ण की युगलोपासना को प्रतिष्ठापित करने वाले निंबार्काचार्य का प्रादुर्भाव कार्तिक पूर्णिमा (१ दिसंबर) को हुआ था। भक्तों की मान्यतानुसार आचार्य निंबार्क का आविर्भाव-काल द्वापरांत में कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ और परीक्षित पुत्र जनमेजय के समकालीन बताया जाता है।

इनके पिता अरुण ऋषि की, श्रीमद्‌भागवत में परीक्षित की भागवतकथा श्रवण के प्रसंग सहित अनेक स्थानों पर उपस्थिति को विशेष रूप से बतलाया गया है। हालांकि आधुनिक शोधकर्ता निंबार्क के काल को विक्रम की ५वीं सदी से १२वीं सदी के बीच सिद्ध करते हैं। संप्रदाय की मान्यतानुसार इन्हें भगवान के प्रमुख आयुध सुदर्शन का अवतार माना जाता है।

इनका जन्म वैदुर्यपत्तन (दक्षिण काशी) के अरुणाश्रण में हुआ था। इनके पिता अरुण मुनि और इनकी माता का नाम जयंती था। जन्म के समय इनका नाम नियमानंद रखा गया और बाल्यकाल में ही ये ब्रज में आकर बस गए। मान्यतानुसार अपने गुरु नारद की आज्ञा से नियमानंद ने गोवर्धन की तलहटी को अपनी साधना-स्थली बनाया।

बचपन से ही यह बालक बड़ा चमत्कारी था। एक बार गोवर्धन स्थित इनके आश्रम में एक दिवाभोजी यति (केवल दिन में भोजन करने वाला संन्यासी) आया। स्वाभाविक रूप से शास्त्र-चर्चा हुई पर इसमें काफी समय व्यतीत हो गया और सूर्यास्त हो गया। यति बिना भोजन किए जाने लगा। तब बालक नियमानंद ने नीम के वृक्ष की ओर संकेत करते हुए कहा कि अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है, आप भोजन करके ही जाएं। लेकिन यति जैसे ही भोजन करके उठा तो देखा कि रात्रि के दो पहर बीत चुके थे। तभी से इस बालक का नाम 'निंबार्क', यानी निंब (नीम का पेड़) पर अर्क (सूर्य) के दर्शन कराने वाला, हो गया।

निंबार्काचार्य ने ब्रह्‌मसूत्र, उपनिषद और गीता पर अपनी टीका लिखकर अपना समग्र दर्शन प्रस्तुत किया। इनकी यह टीका वेदांत पारिजात सौरभ (दसश्लोकी) के नाम से प्रसिद्ध है। इनका मत 'द्वैताद्वैत' या 'भेदाभेद' के नाम से जाना जाता है। आचार्य निंबार्क के अनुसार जीव, जगत और ब्रह्‌म में वास्तविक रूप से भेदाभेद संबंध है। निंबार्क इन तीनों के अस्तित्व को उनके स्वभाव, गुण और अभिव्यक्ति के कारण भिन्न (प्रथक) मानते हैं तो तात्विक रूप से एक होने के कारण तीनों को अभिन्न मानते हैं। निंबार्क के अनुसार उपास्य राधाकृष्ण ही पूर्ण ब्रह्‌म हैं।

डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी सुविख्यात पुस्तक 'भारतीय दर्शन' में निंबार्क और उनके वेदांत दर्शन की चर्चा करते हुए लिखा है कि निंबार्क की दृष्टि में भक्ति का तात्पर्य उपासना न होकर प्रेम अनुराग है। प्रभु सदा अपने अनुरक्त भक्त के हित साधन के लिए प्रस्तुत रहते हैं। भक्तियुक्त कर्म ही ब्रह्‌मज्ञान प्राप्ति का साधन है। सलेमाबाद (जिला अजमेर) के राधामाधव मंदिर, वृंदावन के निंबार्क-कोट, नीमगांव (गोवर्धन) सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में निंबार्क जयंती विशेष समारोह पूर्वक मनाई जाती है।

मानवता के लिए शहीद हुए थे पांचवे पातशाह

सखत्व अथवा सिक्खी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब, स्वर्ण मंदिर और हरमंदिर साहिब का आधार-महत्व जगजाहिर है। सिख पंथ का समूचा अक्स ही इनके बगैर अधूरा है। बल्कि ये तो सिक्खी की शिनाख्त हैं। और, यह महान व पवित्र देन बख्शी थी पंथ के पांचवें पातशाह साहिब गुरु श्री अर्जुन देव जी ने। उन्हीं की शहादत ने सिखों को बलिदानी कौम का रुतबा दिलाया था और शीश तली पर रखकर हक-सच के पक्ष में आवाज बुलंद करने की सूरमाई रिवायत भी पांचवें पातशाह की दी हुई सौगात है।

उनसे आरंभ हुआ कुर्बानियों का महान सिलसिला दूर तक गया...।

गुरु नानक देव, गुरु अगंद देव, गुरु अमरदास और गुरु रामदास के बाद पंथ की रहनुमाई करने वाले गुरु अर्जुन देव का जन्म १५ अप्रैल १५६३ को गोइंदवाल में हुआ था। गुरु की नगरी अमृतसर के जन्मदाता, चौथे पातशाह गुरु रामदास उनके पिता और मां भानी जी माता थीं। धार्मिक-ऐतिहासिक वृतांत-प्रसंगों के मुताबिक गुरु अर्जुन देव सब भाइयों से छोटे थे लेकिन सद्‌गुणों में सर्वोपरि थे। इसी वजह से गुरु रामदास जी उन्हें तरजीह देते थे। बेहद रूहानी माहौल में उनका लालन-पालन हुआ। हालांकि उस दौर में बहुतेरे सिख अनुयायी मानते थे कि पृथ्वी चंद चौथे पातशाह के अग्रज पुत्र हैं सो गुरु-गद्दी उन्हीं को मिलेगी। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि पृथ्वी चंद ने बाकायदा गुरु-गद्दी पर अपनी दावेदारी भी जताई थी, लेकिन गुरु रामदास जी ने योग्यता के पैमाने पर सबको बखूबी परख कर गुरु अर्जुन देव जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और सिख पंथ की अगुवाई सौंपी। इस जिम्मेदारी का निर्वाह उन्होंने जबरदस्त शिद्दत के साथ किया।

उस दौर में 'सिख' एक नवोदित कौम थी। एक ऐसी अकाल-पंथिक लहर, जिसका तब के प्रचलित तमाम धर्मों-मजहबों पर गहरा व मुफीद असर पड़ रहा था। उस पंथिक लहर को गुरु अर्जुन देव जी ने शिखर पर पहुंचाया और दुनिया के कोने-कोने में उनके प्रचार ने लोगों पर जादुई असर किया। वह प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी की एकत्व अथवा सबका मालिक एक अकाल पुरख' की अवधारणा को आधार बनाकर चले। उनके संतई करिश्मे ने एक अलहदा दुनिया का निर्माण किया। बड़ी तादाद में हिंदुओं-मुसलमानों ने सिक्खी को अपनाया। गद्दीनशीन होते ही गुरु अर्जुन देव जी ने पंथ के विकास और उसे नया रूप देने की कोशिशें शुरू कीं। उन्होंने श्रृंखलाबद्ध सत्संगों-कीर्तनों का अटूट सिलसिला शुरू किया। जोड़ मेलों की रिवायत को शिद्दत भी उन्हीं की हिदायतों के बाद हासिल हुई। बड़ी तादाद में और दूर-दूर से अनुयायी जोड़ मेलों में शिरकत के लिए आते और निहाल होकर लौटते। उन जोड़ मेलों का एक बड़ा मकसद 'सांझ' की अवधारणा को पुख्ता करना और इनसान को खुद की बेहतरी के लिए सादा-सच्चा जीवन बीताने का प्रशिक्षण देना भी रहता था। सांझे लंगरों की परंपरा ने सामाजिक सद्‌भाव की दिशा में क्रांतिकारी और बेहद सार्थक भूमिका निभाई।

सत्संग और गुरबाणी-कीर्तन को सिक्खी में अहम महत्व पहले दिन से ही हासिल है। गुरु अर्जुन देव जी ने इन्हें और ज्यादा कारगर बनाने में अपना शानदार योगदान दिया। वह गुरु नानक देव, गुरु अगंद देव, गुरु अमर दास और गुरु रामदास की बाणी को आधार बनाकर, अपना पवित्र संदेश संगतों को देते थे। अपने पूर्ववर्ती चारों गुरुओं की महान मौखिक-लिखित रचनाओं को तलाश कर, संकलित करना और उनका प्रारूप तैयार करना एक बेमिसाल और (तब) निहायत असंभव-सा लगने वाला कर्म था, लेकिन गुरु अर्जुन देव जी ने अपने तईं यह किया।


श्री गुरुग्रंथ साहिब सिक्खी की अनमोल विरासत है और इस विरासत की प्राप्ति का सेहरा पांचवें पातशाह के पावन सिर पर है। ज्यों-ज्यों पंथ की मान्यता दुनिया भर में बढ़ती गई, त्यों-त्यों इसके विकास के लिए नए से नए कदम भी उठाए गए। गुरु अर्जुन देव जी ने महसूस किया कि पंथ के अनुयायियों को अब एक सांझे केंद्रीय मंदिर और सांझे धार्मिक ग्रंथ की जबरदस्त दरकार है।

इसलिए उन्होंने पहले पहल सबसे उल्लेखनीय और जरूरी काम हरिमंदिर साहिब के निर्माण का किया। दुनिया में, तब से पहले और बाद, ऐसा कहीं कोई दूसरा उदाहरण उपलब्ध नहीं है कि किसी धार्मिक स्थल के चार दरवाजे इस मंतव्य के साथ बनाए (या खोले) जाएंह्नकि इनमें हर धर्म, पंथ, महजब, जात-पांत का व्यक्ति बगैर किसी हिचकिचाहट अथवा शंका के प्रवेश कर सके। पांचवें पातशाह ने यह किया। यह भी एक दुर्लभ मिसाल है कि चारों दरवाजों की नींव, चार अलग-अलग धर्मों-मजहबों से बावस्ता व्यक्तियों ने रखी। जबकि हरमंदिर साहिब का शिलान्यास गुरु अर्जुन देव जी ने अपने समकालीन महान सूफी संत हजरत मियां मीर के हाथों करवाया। तब भी समाज के एक बड़े हिस्से में संकीर्णता हावी थी, लेकिन गुरु जी की इस हिम्मती पहलकदमी के आगे लगभग हर किसी ने अपना सिर झुका दिया था। इसलिए भी कि तब, धार्मिक सहिष्णुता की बहाली के लिए उठाया यह सबसे बड़ा कदम था। उसका असर बाकायदा आज भी कायम है और यकीनन रहती दुनिया तक रहेगा। इस कथन में अतिशयोक्ति नहीं कि हरमंदिर साहिब आज भी उस गरिमा की बखूबी हिफाजत कर रहा है। गुरु घर के चारों दरवाजे हर धर्म, मजहब, जाति और वर्ग के लोगों के लिए सदैव खुले रहते हैं।


श्री गुरुग्रंथ साहिब की रचना भी गुरु अर्जुन देव जी की अनुयायियों को दी गई एक अनमोल और अति महान सौगात है। यह इन अर्थों में भी मौलिक-महानता लिए हुए है कि इसमें महज सिख गुरुओं की पवित्र बाणी ही समाहित नहीं है, उस दौर के कई सूफी-संतों और भक्तों की बाणी भी इसमें समाहित है। और, वे सूफी-संत व भक्त विभिन्न धर्मों-मजहबों में यकीन रखते थे। समग्र-चिंतन वाले विचारों को तरजीह दी गई।


पांचवें पातशाह ने शहादत को भी नए आयाम दिए। तत्कालीन मुगल शहनशाह जहांगीर गुरु जी की विचारधारा और सद्‌कर्मों से घोर असहमति रखता था। वह चाहता था कि गुरु अर्जुन देव अपना रूहानी अभियान त्याग कर, उसकी पनाह में आ जाएं और उसकी राह अख्तियार कर लें। ऐसा कैसे संभव था? गुरु जी ने उसकी असहमतियों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की और अपने मार्ग पर पहले की मानिंद चलते रहे। अंततः शहनशाह जहांगीर की असहमति के तेवर हिंसक गुस्से में तब्दील हो गए।

मई, १६०५ के आखिरी हफ्ते के एक दिन गुरु अर्जुन देव जी को बाकायदा गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें लाहौर के यातना-शिविर में डाल कर मजबूर किया गया कि वह मुगल सम्राट की सत्ता कबूल करें और अपना रास्ता छोड़ दें। भयावह-अमानवीय यातनाएं खुशी-खुशी पांचवें पातशाह ने बर्दाश्त कीं लेकिन झुकने से साफ इनकार कर दिया। जालिमों ने उन्हें तपते तवे पर बिठाया और जिस्म पर सुलगती रेत तक डाली, लेकिन गुरु जी अपने आदर्शों से नहीं हिले। आखिरकार उन्होंने अपनी जान देकर शहादत का जाम पी लिया।

उनका शहादत दिवस आए साल निराले तरीके से मनाया जाता है। इसलिए भी कि उन्होंने समूची मानवता के लिए खुद को कुर्बान कर दिया और आह तक नहीं भरी। इस दिन दुनिया भर के सिख अनुयायी शहादत दिवस तो मनाते हैं, लेकिन शोक दिवस नहीं।

कर्म योगी संत थे मलूक दास जी महाराज

प्रख्यात संत, जगतगुरु मलूकदास महाराज का भक्तिकालीन निर्गुणवादी भक्त कवियों में प्रमुख स्थान है। वे रामानंदी संप्रदाय के ख्ख् वें आचार्य थे। उनमें जन्मसिद्‌ध चकत्कारिता व विलक्षण साधुता थी। उनके अंदर विश्व कल्याण की भावना कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं के द्‌वारा देशभर में सत्यम, शिवम, सुंदरम की अलग जगाई।

आजीवन संपूर्ण सृष्टि को भगवत स्वरूप मानकर संत प्रवर उसकी तन-मन से सेवा में वे जुटे रहे।

संत प्रवर मलूकदास जी महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले केग्राम कड़ा माणिकपुर में संवत क्म्फ्क् की वैशाख कृष्ण पंचमी (गुरुवार) को हुआ था। उन्होंने जो भी शिक्षा प्राप्त की, वह स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण के द्‌वारा प्राप्त की। उनमें बाल्यावस्था में ही कविता लिखने का गुण विकसित हो चुका था।

महाराजश्री को उनके पिता ने जीविकोपार्जन हेतु कंबल के व्यवसाय में लगाया, परंतु उसमें उनका मन नहीं रमा। वह संतों और निर्धनों को कंबल मुफ्त में ही दे दिया करते थे। उनके पास जो भी याचक आता था, उसे वे निराश वापस नहीं करते थे। वह अभ्यागतों की यथाशक्ति अन्न-वस्त्र से सेवा किया करते थे। वे जब संतों की सेवा करते थे, तो उनके प्रताप से पहले से ही मौजूद वस्तुएं शतगुणित हो जाती थीं। वह एक टिक्कर में से ही लाखों व्यक्तियों को प्रसाद दे दिया करते थे। उनके भंडार में कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होती थी। उन्होंने अनगिनत निर्धन कन्याओं के हाथ पीले करवाए। अनेक विधवाओं का पालन-पोषण किया। गांव में जब प्लेग फैला, तो प्लेग पीड़ितों की अहर्निश सेवा की। वह अपने आश्रम में कोढ़ी व्यक्तियों को भी प्रश्रय देकर उनके घावों की मरहम-पट्‌टी कर दिया करते थे। उन्होंने व्यापक जनहित में निजी खर्च से सड़कों का निर्माण कार्य तक कराया। वस्तुतः वह निष्काम भाव से परमार्थ में लगे रहे।

बाबा मलूकदास मूर्ति पूजा और आडंबरों के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि दूसरे व्यक्तियों की पीड़ा को जानना और उसे दूर करना ही सच्ची सेवा, सच्चा धर्म है। यही सच्चे संत व पीर की पहचान है। वह मोक्ष प्राप्ति का साधन भी दया भाव को ही मानते थे। वह कहा करते थे कि सेवा भाव के द्‌वारा नर और नारायण दोनों ही प्राप्त हो जाते हैं।

महाराजश्री कर्मयोगी संत थे। वह जाति-पांति के घोर विरोधी थे। उनकी वाणी अत्यंत सिद्‌ध थी। वे त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने समूचे देश में भ्रमण करते हुए वैष्णवता और रसोपासना का प्रचार-प्रसार किया। हिन्दू व मुसलिम दोनों ही उनके शिष्य थे। आचार्य मलूकदास के पास सत्संग हेतु लोगों का तांता लगा रहता था। संत तुलसीदास तक ने कई दिनों तक उनका आतिथ्य स्वीकार किया था। मुगल शासक औरंगजेब भी उनके सत्संग से अत्यंत प्रभावित था। उसने उनके आदेश पर गैर-मुसलिमों पर स्वयं लगा निर्धारित जाजिया कर वापस ले लिया था। किंवदंती है कि भगवान राम ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए थे।

संत शिरोमणि मलूकदास महाराज अपनी इच्छा से संवत क्स्त्रफ्ऽ में अपने जन्म के ही माह, तिथि, समय व वार को क्०त्त् वर्ष की आयु में भगवत धाम को गमन कर गए। बताया जाता है कि मलूकदास महाराज का पंच भौतिक शरीर उनके देहत्याग के उपरांत जगन्नाथपुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के समक्ष सच्चिदानंद स्वरूप में प्रकट हो गया था और उन्होंने उनसे उनकी सन्निधि में रहने की इच्छा प्रकट की थी। इस प्रार्थना को जगन्नाथ प्रभु ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। तब से आजतक जगन्नाथ प्रभु के गर्भ गृह केपनाले के पास मलूकदास महाराज का स्थान विमान है और उनके नाम का रोट अभी भी वहां आनेवाले भक्तों को प्रसादस्वरूप दिया जाता है। वृंदावन में वंशीवट क्षेत्र स्थित मलूक पीठ में संत प्रवर मलूकदास जी महाराज की जाग्रत समाधि है।