07 मार्च 2011

तनाव को पराजित करें

परिक्षा का नाम सुनकर अच्छे-अच्छों के होश उड़ जाते हैं। शायद यही कारण है की इससे लोगों में तनाव पैदा हो जाता है। इस समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित स्टूडेंट्स होते हैं। अक्सर देखा गया है की परिक्षा के समय छात्र-छात्राएं अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। कई स्टूडेंट्स तो बीमार तक पद जाते हैं। दुनियाभर के साइकोलाँजिस्टों के अनुसार परिक्षा के समय 80 प्रतिशत छात्र-छात्राओं का जीवन असामान्य हो जाता है। जरूरत है थोड़े से उपायों की।

विशवास : आपको मौक़ा तभी मिलता है जब आप उसके काबिल हैं। अपनी पूरी मेहनत और परिश्रम लगा दें। साथ ही अपने पर विशवास रखें की आप कर सकतें हैं। परीक्षा के समय ऐसी ही सोच की जरूरत होती है।

परेशानियां : अगर पढाई के समय आपको कुछ समझ नहीं आ रहा है, तो उसे लेकर परशान न हों। आप अगर उसे और पढने की कोशिश करें तो उलझ भी सकते हैं, इसलिए टीचर की राय से पढ़ें।

घबराइए नहीं : परीक्षा हर साल होती है तो इसे देने में घबराहट कैसी? जीवन में आप ऐसे कई कार्य करेंगे की बाद में इन परीक्षाओं को मामूली कहेंगे। पढाई को रोज के जिन्दगी का हिसासा बनाइये इससे परीक्षा के दौरान पढने में आपको न परेशानी होगी और न स्ट्रेस।

पढ़ने के तरीके : कभी-कभी ऐसा होता है आप पढ़ते जा रहे हैं और ना तो कुछ समझ आ रहा है और उस समय ना ही कुछ याद हो रहा है, क्योंकि आपका दिमाग कहीं और ही है। पढ़ते-पढ़ते हम खो जाते हैं। हमारा एकाग्रता भंग हो जाती है और पता नहीं कौन सी उलझन या सोच में डूब जाते हैं जो हमारे पढाई से कोसो दूर है। इस सबसे बचने के लिए पढने के नए तरीके सोचिये कभी लिख कर पढ़िए तो कभी चलते-चलते पढ़ें। जब भी मौक़ा मिले कागज़ निकाला और याद करने लगे। तार्किक, फार्मूले याद नहीं होते। उन्हें अपने जीवन से जोडिये और फिर तुरंत आपको सब याद हो जाएगा।

सहयोग : मम्मी-पापा आपको इस समय सबसे ज्यादा सहयोग दे सकते हैं, क्योंकि यह इस दौर से निकल चुके हैं। अपने दोस्त, टीचर का थोडा सहयोग भी आपको घबराहट से बाहर निकाल सकता है, इसलिए इन्ससे बात करने से हिचकिचाइए मत।

एक्जाम स्ट्रेस : परिक्षा के समय छात्र-छात्राओं का जीवन असामान्य हो जाता है। साथ ही व्यवहार में भी काफी परिवर्तन देखने को मिलता है। नींद न आना, भूख कम हो जाना परिक्षा के दिनों में आम बात होती है, लेकिन इस समस्या से निदान भी पाया जा सकता है।  

06 मार्च 2011

स्त्रियों में सेक्स संबंधी उदासीनता

महिलाओं से जुड़ा एक बेहतर पॉपुलर सवाल है, "आखिर एक औरत के मन में है क्या?" अमेरिका में चिकित्सकों और शोधकर्ताओं की एक पूरी टीम इस सवाल का जवाब पाने में जुट गई और इस तलाश में कई अहम जानकारियां सामने आईं। दरअसल इस सवाल में अक्सर पूछा जाने वाला एक और अहम सवाल छिपा होता है जो निश्चित तौर पर एक स्त्री के सेक्स संबंधी दिलचस्पियों की पड़ताल करता है। यह सवाल दरअसल स्त्री की उम्र और सेक्स के रिश्ते से जुड़ा हुआ है। कई लोग मानते हैं कि एक स्त्री की उम्र उसकी सेक्स संबंधी दिलचस्पियों पर काफी असर डालती है। यह माना जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ एक स्त्री काम क्रीड़ाओं में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं लेती।

लाइफ पार्टनर भी जिम्मेदार
हालांकि हाल में हुए कई शोध से यह बात साफ हो गई है कि मध्यम आयु वर्ग की महिलाओं मे संभोग के प्रति दिलचस्पी होना अथवा न होना सिर्फ बढ़ती उम्र पर निर्भर नहीं करता। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसका और उसके लाइफ पार्टनर का स्वास्थ्य कैसा है और सेक्स संबंधी गतिविधियों में वे कितनी दिलचस्पी लेते हैं। आम धारणा के विपरीत शोध में यह पाया गया है कि मध्यम आयु में भी औरतें न सिर्फ सेक्सुअली काफी सक्रिय होती हैं बल्कि कई मामलों में उनकी दिलचस्पी बढ़ती भी पाई गई है।

शोध के दौरान जब यह जानकारी हासिल करने की कोशिश की गई कि जो महिलाएं सेक्स में सक्रिय नहीं हैं उसके पीछे क्या वजह है, तो पता चला कि कई भावनात्मक कारणों से उनकी सेक्स और अपने पार्टनर में दिलचस्पी खत्म हो चुकी है। उम्र बीतने के साथ औरतों में सेक्स के प्रति रूचि खत्म होने का बड़ा कारण उनके पार्टनर का व्यवहार होता है। पार्टनर में सेक्स के प्रति दिलचस्पी घटना या किसी प्रकार की अक्षमता का सीधा असर स्त्रियों की यौन सक्रियता पर पड़ता है। ऐसी भी स्त्रियां हैं जिनकी सेक्स में दिलचस्पी खत्म होने की अन्य वजहें भी रही हैं, मगर उनकी संख्या कम है।

उल्लेखनीय है कि यह शोध जर्नल ऑफ अमेरिकन जराचिकित्सा सोसाइटी की ओर से किया गया था। इसमें मध्यम आयु वर्ग की सेक्स संबंधी हर तरह की दिलचस्पियों को शामिल किया गया था, जिसमें हस्तमैथुन भी शामिल था। शोध के दौरान स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग सेक्सुअल एक्टीविटीज में उम्र बढ़ने के साथ ज्यादा सक्रिय होता पाया गया। शोध से यह स्पष्ट नतीजे सामने आए कि किसी भी स्त्री कि सेक्स संबंधी सक्रियता का उसकी उम्र के साथ कोई सीधा रिश्ता नहीं है। बल्कि वह उम्र बढ़ने के साथ सेक्स का ज्यादा आनंद उठा सकती है। शोध कार्य में लगे डाक्टरों की टीम की कुछ सिफारिशों में यह भी शामिल था कि किसी भी स्त्री के सेक्स हेल्थ को उसके पूरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता।

कुछ सुझाव
यह पूरा अध्य्यन जर्नल ऑफ अमेरिकन जराचिकित्सा सोसायटी में प्रकाशित हुआ था। इस आधार पर मनोवैज्ञानिकों तथा सेक्स सलाहकारों ने कुछ सुझाव भी रखे हैं।

ध्यान दें आपकी पार्टनर किसी दवा के साइड इफेक्ट की वजह से भी सेक्स में दिलचस्पी खो सकती है। यदि ऐसा है तो डाक्टर की सलाह लें।

कई बार स्त्रियां मानसिक दबाव के चलते भी सेक्स में रुचि नहीं लेती हैं। बच्चों में ज्यादा व्यस्त हो जाने तथा सामाजिक मान्यताओं के चलते उन्हें लगता है सेक्स बहुत दिलचस्पी लेना उचित नहीं। इसके लिए जरूरी है के कपल थोड़ा समय अपने लिए भी निकालें।

कई बार खान-पान संबंधी आदतों का भी सेक्स लाइफ पर असर पड़ता है। कुछ खाने के आइटम व्यक्ति में उत्तेजना को कायम रखते हैं और उनका मूड बनाने में मदद करते हैं। बढ़ती उम्र में खान-पान पर ध्यान देकर सेक्स लाइफ को बेहतर बनाया जा सकता है।

कई बार ऐसा होता है कि बच्चों के बाद महिलाएं अपने शरीर को लेकर असहज हो जाती हैं और हीन भावना का शिकार हो बैठती हैं। इसके चलते भी वे सेक्स से जी चुराने लगती हैं। इसका सबसे बेहतर इलाज है नियमित व्यायाम। इससे न सिर्फ शरीर को खूबसूरत बनाया जा सकता है बल्कि यह मूड बनाने में भी मददगार है।

बढ़ती उम्र में घर-परिवार और बढ़ती कामकाजी जिम्मेदारियों के कारण वे थकने लगती हैं और सेक्स के लिए उनमें पर्याप्त एनर्जी नहीं बचती। इसके लिए जरूरी है कि भागदौड़ के बीच थोड़ा वक्त अपने लिए भी निकाला जाए। किसी भी कपल को चाहिए कि वे खुद के आराम और मनोरंजन के लिए वक्त निकालें।

23 फ़रवरी 2011

संकष्ट चतुर्थी व्रत

यह व्रत आषाढ चतुर्थी को करते हैं। प्रात: स्नानादि दैनिक कार्य करने के बाद दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर मम वर्तमानागामिसकल संकट निरसन पूर्वकसकलाभीष्टसिद्धयेसंकष्टचतुर्थीव्रतमहंकरिष्ये संकल्प करके दिनभर मौन रहकर अपना कार्य करें सायंकाल पुन: स्नान करके
तीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै, भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै,
 सत्यायैचदिक्षुविदिक्षु, मध्येविघ्ननाशिन्यैसर्वशक्तिकमलासनायैनम:
श्लोक से पीठ पूजा करने के बाद वेदी के बीच में स्वर्णादिधातु से निर्मित गणेशजी का-
गणेशाय नम: से आह्वान,विघ्ननाशिने नम: से आसन, लम्बोदराय नम: से पाद्य, चन्द्रार्धधारिणे नम: से अ‌र्घ्य, विश्वप्रियायनम: से आचमन, ब्रह्मचारिणे नम: से स्नान, कुमारगुरवे नम: से वस्त्र, शिवात्मजाय नम: से यज्ञोपवीत, रुद्रपुत्राय नम: से गन्ध, विघ्नहत्र्रे नम: से अक्षत, परशुधारिणे नम: से पुष्प, भवानीप्रीतिकत्र्रे नम: से धूप, गजकर्णाय नम: से दीपक, अघनाशिने नम: से नैवेद्य (आचमन), सिद्धिदाय नम: से ताम्बुल,सर्वभोगदायिने नम: से दक्षिणा अर्पण करके षोडशोपचारपूजनकरें। कर्पूर अथवा घी की बत्ती जलाकर नीराजन करें। दूर्वाकेअङ्कुरलेकर ॐगणाधिपायनम:, उमपपुत्रायनम:, अघनाशायनम:, विनायकायनम:,
ईशपुत्रायनम:, सर्वसिद्धिप्रदायककुमारगुरवेतुभ्यंपूजयामिप्रयत्नत:॥
स्तुति से दूर्वा अर्पण कर-यज्ञेन यज्ञ से मन्त्र-पुष्पांजलि अर्पण करें।
संसारपीडाव्यथितं हि मां सदा संकष्टभूतंसुमुख प्रसीद।
त्वंत्राहि मां मोचयकष्टसंघान्नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
इस श्लोक से नमस्कार करके
श्रीविप्राय नमस्तुभ्यंसाक्षाद्देवस्वरूपिणे।
गणेशप्रीतयेतुभ्यंमोदकान्वैददाम्यहम्॥
इससे मोदक, सुपारी, मूंग और दक्षिणा रखकर वायन(बायना) दें। चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा का गन्ध-पुष्पादि से विधिवत् पूजन करके
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यंनमस्तेज्योतिषांपते।
नमस्तेरोहिणीकान्तगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥
इससे गणेशजीको तीन अ‌र्घ्यप्रदान करें।
तिथीनामुत्तमे देवि गणेशप्रियवल्लभे।
गृहाणाघ्र्यमयादत्तंसर्वसिद्धिप्रदायिके॥
इससे पुन:अ‌र्घ्यदें।
आयातस्त्वमुमापुत्र ममानुग्रहकाम्यया।
पूजितोऽसिमयाभक्त्यागच्छ स्थानंस्वकंप्रभो॥
इससे विसर्जन कर ब्राह्मणों को भोजन करायें और स्वयं नमक वर्जित भोजन करें।

Part 2 


व्यासजीने कहा है कि अधिक मास में चतुर्थी को गणेश्वरके नाम से पूजा करनी चाहिए। पूजन की विधि षोडशोपचारहै। सर्व प्रथम पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। लाल कनेर का फूल चढ़ा कर लड्डू आदि का भोग लगावें। लाल चन्दन, रोली, अक्षत और दूब को एक-एक नाम से अलग-अलग चढ़ायें।
तत्पश्चात् विश्वप्रियाय नम: से वस्त्र, पुष्टिदाय नम: से चन्दन,
विनायकाय नम: से पुष्प,
उमासुताय नम: से धूप,
रूद्रप्रियाय नम: से दीप,
विघ्ननाशिने नम: से नैवेद्य अर्पित करें।
फलदात्रे नम: से ताम्बूल,
सङ्कष्टनाशिने नम: से फल चढ़ावें।
इसके बाद विघ्नविनायकगणेश जी की प्रार्थना करें।
संसारपीडाव्यथितंभर्यातंक्लेशान्वितंमां सुमुख! प्रसीद।
त्रायस्वमां दु:खदारिद्यनाशन!नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
हे सुन्दर मुखवालेगणेशजी!मैं भव-बाधा से ग्रस्त, भय से पीडि़त और क्लेशों से सन्तप्त हूं, आप मेरे पर प्रसन्न होइए। हे दु:ख-दारिद्रय के नाशक गणनायकजी! आप मेरी रक्षा करें। हे विघ्नों के विनाशक! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। फिर निम्नांकित मंत्र से पुष्पांजलि देकर चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेवें।
पुष्पांजल्यामिमंमन्त्रंचन्द्रायाऽघ्र्यप्रदापयेत्।
क्षीरम्भोधि-समुद्भूत!नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
हे क्षीरसागरसम्भव!हे द्विजराज,हे षोडश कलाओं के अधिपति। शंख से सफेद फूल, चन्दन, जल, अक्षत और दक्षिणा लेकर, हे रोहिणी के सहित चन्द्रमा! आप मेरे अ‌र्घ्यको स्वीकार करें, मैं आपको प्रणाम करता हूं। तदनन्तर ब्राह्मण को भोजन करावें। लड्डू और दक्षिणा दें। देवता और ब्राह्मण से बचे अन्न द्वारा स्वयं आहार ग्रहण करें। रात्रि में भूमि पर शयन करें, लालच विहीन होकर क्रोध से दूर रहें। हर महीने गणेश जी की प्रसन्नता के निमित्त व्रत करें। इसके प्रभाव से विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन प्राप्ति एवं कुमारी कन्या को सुशील वर की प्राप्ति होती है और वह सौभाग्यवती रहकर दीर्घकाल तक पति का सुखभोग करती है। विधवा द्वारा व्रत करने पर अगले जन्म में वह सधवा होती हैं एवं ऐश्वर्य-शालिनी बन कर पुत्र-पौत्रादि का सुख भोगती हुई अंत में मोक्ष पाती है। पुत्रेच्छुको पुत्र लाभ होता एवं रोगी का रोग निवारण होता है। भयभीत व्यक्ति भय रहित होता एवं बंधन में पड़ा हुआ बंधन मुक्त हो जाता है।

अनुष्ठान-अंगार की चतुर्थी व्रत

भगवान गणेश चतुर्थी तिथि के दिन प्रकट हुए थे। अतएव यह तिथि मंगलमूर्ती  गणपति को सर्वाधिक प्रिय है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में श्रीगणेश को चतुर्थी का स्वामी (अधिपति) बताया गया है। गणेशभक्त बडी श्रद्धा के साथ चतुर्थी के दिन व्रत रखते हैं। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेकर, गणेश-पूजन करने के बाद फलाहार ग्रहण किया जाता है। कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसके व्रत से सभी संकट-विघ्न दूर होते हैं। मंगलवार के दिन चतुर्थी का संयोग गणेश जी की उपासना में अत्यन्त शुभ एवं सिद्धिदायक होता है। मंगलवार की चतुर्थी अंगारकी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। धर्मग्रन्थों में यह लिखा है कि अंगारकी चतुर्थी का इतना अधिक माहात्म्य है कि इस दिन विधिवत् व्रत करने से मंगलमूर्ती  श्रीगणेश तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। अंगार की चतुर्थी का व्रत विधिवत् करने से सालभरकी चतुर्थियों के व्रत का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में अंगार की चतुर्थी की कथा विस्तार से वर्णित है। पृथ्वीनन्दन मंगल अपनी तेजस्विता एवं रक्तवर्ण के कारण अंगारक भी कहे जाते हैं, जिसका मतलब है अंगारे के समान लाल। मंगल ने कठोर तप करके आदिदेव गजानन को जब संतुष्ट कर दिया, तब उन्होंने मंगल को यह वरदान किया कि मंगलवार के दिन चतुर्थी तिथि अंगारकी चतुर्थी के नाम प्रख्यात होगी। इस दिन सविधि व्रत करने वाले को एक वर्ष पर्यन्त चतुर्थी-व्रत करने का फल प्राप्त होगा। अंगार की चतुर्थी के प्रताप से व्रती के किसी भी कार्य में कभी विघ्न नहीं होगा। उसे संसार के सारे सुख प्राप्त होंगे तथा मंगलमूर्ती  गणेश उस पर सदैव कृपा करेंगे।

अनन्त चतुर्दशी व्रत

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता है। कहा जाता है कि जब पाण्डव जुए में अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्त सूत्र धारण किया। अनन्त चतुर्दशी-व्र तके प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए।

व्रत-विधान-व्रत कर्ता प्रात:स्नान करके व्रत का संकल्प करें। शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है, तथापि ऐसा संभव न हो सकने की स्थिति में घर में पूजा गृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्या पर लेटे भगवान विष्णु की मूíत अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों(गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र(डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंत सूत्र की षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजनोपरांत अनन्त सूत्र को मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें-
अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

अनंत सूत्र बांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें। कथा का सार-संक्षेप यह है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्य मुनि से किया। कौण्डिन्य मुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्त सूत्र बांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्त सूत्र पर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्यऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुज अनन्त देव का दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्त सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है।मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्य मुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

अनुष्ठान-अहोई अष्टमी व्रत

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएं अहोईअष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा दीवाल पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे दीवाल पर टांग दिया जाता है।

होई के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं।

उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में अहोईमाता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की होई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोईमाता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोईअष्टमी की दो लोक कथाएं प्रचलित हैं।

उसमें से एक कथा में साहूकार की पुत्री के द्वारा घर को लीपने के लिए मिट्टी लाते समय मिट्टी खोदने हेतु खुरपा(कुदाल) चलाने से साही के बच्चों के मरने से संबंधित है। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि हमें कोई भी काम अत्यंत सावधानी से करना चाहिए अन्यथा हमारी जरा सी गलती से किसी का ऐसा बडा नुकसान हो सकता है, जिसकी हम भरपाई न कर सकें और तब हमें उसका कठोर प्रायश्चित करना पडेगा। इस कथा से अहिंसा की प्रेरणा भी मिलती है। अहोईअष्टमी की दूसरी कथा मथुरा जिले में स्थित राधाकुण्डमें स्नान करने से संतान-सुख की प्राप्ति के संदर्भ में है। अहोईअष्टमी के दिन पेठे का दान करें।

जिन स्थानों में अहोईअष्टमी की रात्रि में तारे को अ‌र्घ्यदेने की प्रथा है, वहां भी गुरुवार को ही व्रत रखा जाए क्योंकि इसी दिन तारों का दर्शन अष्टमी की अवधि में होगा। ब्रजमण्डलमें उदयातिथि की विशेष मान्यता होने तथा सप्तमी से विद्धाअष्टमी को ग्रहण न किए जाने के कारण यहां राधाकुण्डमें स्नान का पर्व 2नवंबर को माना जाएगा। ब्रज में व्रत-पर्व की तारीख का निर्णय वैष्णव सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है।

अनुष्ठान:-अचला सप्तमी

माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, अरोग्य सप्तमी आदि नामों से प्रसिद्ध है। इसी कारण पुराणों में इस तिथि के व्रत की विभिन्न नामों से अलग-अलग विधियां निर्दिष्ट हैं। भविष्यपुराणमें अचला सप्तमी के व्रत का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। इस व्रत का विधान भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। षष्ठी के दिन एक समय भोजन करें। सप्तमी को प्रात:काल किसी नदी या सरोवर में स्नान करें। स्नान हेतु अरुणोदय वेला को सर्वाधिक प्रभावकारी कहा गया है। किसी पात्र में तिल का तेल डालकर दीपक प्रज्वलित करें। दीपक को सिर पर रखकर भगवान सूर्य और सप्तमी तिथि का इस प्रकार ध्यान करें-
नमस्तेरुद्ररूपायरसानाम्पतयेनम:। 
वरुणायनमस्तेऽस्तुहरिवासनमोऽस्तुते॥
यावज्जन्मकृतंपाप मयाजन्मसुसप्तसु।
तन्मेरोगंचशोकंचमाकरीहन्तुसप्तमी॥
जननी सर्वभूतानांसप्तमी सप्तसप्तिके।
सर्वव्याधिहरेदेवि नमस्तेरविमण्डले॥

तत्पश्चात् दीपक को जल के ऊपर तैरा दें। फिर स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करें। इसके बाद चंदन से अष्टदल कमल बनायें। कमल के मध्य में शिव-पार्वती की स्थापना कर प्रणव-मंत्र से पूजा करें। कमल के आठ दलों में पूर्व से प्रारंभ करके भानु, रवि, विवस्वान्,भास्कर, सविता, अर्क, सहस्त्रकिरणतथा सर्वात्मा का पूजन करें। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदि उपचारों से विधिपूर्वक सूर्यदेव की पूजा करने के उपरान्त- स्वस्थानं गम्यताम्-यह कहकर विसर्जितकर दें। अन्त में ताम्र अथवा मिट्टी के पात्र में गुड और घी सहित तिलचूर्णतथा कान का आभूषण रखकर वह पात्र दुख-दुर्भाग्य के नाश की कामना से किसी आचार्य को दान दे दें। सूर्यनारायण से प्रार्थना करें सपुत्रपशुभृत्याय मेऽर्कोऽयंप्रीयताम्।

गुरु को वस्त्र, तिल आदि दक्षिणा में देकर अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर व्रत को समाप्त करें। जो पुरुष उपर्युक्त विधि से अचला सप्तमी को स्नान करता है, उसे सम्पूर्ण माघ-स्नान का फल प्राप्त करता है। इस व्रत में एक समय नमकरहित(अलोना) खाना अथवा फलाहार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अचलासप्तमीका व्रत करने पर सालभरके रविवारोंके व्रत का पुण्यफलप्राप्त हो जाता है।