11 फ़रवरी 2011

आनंद कहाँ ?

आनंद क्या है? अर्थात आनंद को किस तरह परिभाषित किया जा सकता है? क्या आनंद भी श्री कृष्ण के विराट रूप की तरह है? मूल प्रश्न है कि आनंद क्या है. क्या सुख की चरमावस्था ही आनंद कहलाती है? लेकिन वह सुख क्या है? क्या दुःख का अभाव ही सुख है? जिस तरह आनंद को विभिन्न स्तरों पर अनुभव किया जा सकता है, दुःख को भी उसी तरह विभिन्न स्तरों पर अनुभव किया जा सकता है. पर दुःख क्या है?

क्या मन के अनुकूल कोई बात न हो तो वह दुःख है? क्या प्रतिकूल अनुभव ही सुख का जनक है? दुःख? बुद्ध के चार आर्य सत्यों का मूल. बुद्ध दुःख से मुक्ति का उपाय भी बताते हैं. उनके अनुसार अष्टांग मार्ग पर चलकर दुःख से मुक्ति पाई जा सकती है. अष्टांग मार्ग अर्थात माध्यम मार्ग. मध्यम मार्ग अर्थात अति से दूर, बीच का रास्ता सम्यक द्रष्टि. तो क्या दुःख की निवृत्ति कर आनंदित रहा जा सकता है? पंचम जगद गुरू कृपालु महाराज की घोषणा है- ईश्वर ही आनंद है या आनंद ही ईश्वर है. उनके अनुसार श्रीकृष्ण की अहेतुक उपासना कर यह आनंद प्राप्त किया जा सकता है. आहेतुक उपासना अर्थात कामना रहित उपासना. सम्पूर्ण, बिना किसी प्रतिदान की लालसा के.

इसे ही परमानंद कहा जाता है. जगद गुरू कृपालु महाराज कहते हैं, जीव जन्म जन्मांतर से इसी आनंद को पाने के लिये व्यग्र है. लेकिन जीव हर जन्म से कुछ न कुछ आनंद पाता ही है - अपने-अपने ढंग से. आध्यात्मिक जगत में इसी आनंद को लेकर गहन चिंतन किया गया है. आनंद के दो वर्ग बनाए गए हैं. - मायाजन्य आनंद और ईश्वर का रूप. ब्रह्मानंद कहें या ईश्वरानं दोनों, एक ही है. शंकराचार्य ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या मानते हैं, पर जगत क्या सचमुच मिथ्या है? पक्ष-विपक्ष में बुद्धि को भ्रमित कर देने वाले तर्कों और मत-मतांतरों का यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें अभिमन्यु की तरह प्रवेश तो सहज है. पर निकलना असंभव या दुष्कर.

फिर वही जिज्ञासा कि आनंद क्या है? एक सोच उभरती है - आनंद परिभाषा का नहीं, अनुभव का क्षेत्र है. गूंगे के गुड की तरह. गूंगा गुड के स्वाद का अनुभव तो कर सकता है, पर उस अनुभव को व्यक्त नहीं कर सकता. हम सब अपने जीवन में शायद प्रतिदिन किसी न किसी क्षण आनंद का अनुभव करते हैं - सुख तो पाते ही हैं, अपनी-अपनी रूची, अपनी अपनी हैसियत और अपने-अपने संस्कारों के अनुसार.

ऐसा लगता है कि जिस तरह कस्तूरी मृग की नाभि में होती है, उसी तरह शान्ति और आनंद हमारी नाभि में है. इस स्तर पर हम सब कस्तूरी मृग ही हैं. आनंद का सृजन भी हम ही करते हैं, अनुभव भी हम ही करते हैं. इस तरह आनंद के जनक और उसके उपभोक्ता दोनों हम स्वयं हैं.

दरअसल आनंद एक मन स्थिति का नाम है. दुःख और सुख दोनों हमारी मन स्थिति के रूप हैं. लेकिन विंड बना यह है कि हमारी मनस्थिति के स्वामी हम स्वयं नहीं हैं, उस पर हमारे आसपास के वातावरण का, मिलने-जुलने वाले लोगों का भी अच्छा-खासा असर पड़ता है.

हमारे आपास के वातावरण के कुप्रभावों से बचाव और आनंद की प्राप्ति का एक रास्ता है, और वह है सहज रहना, पर जीवन में सहजता लाना किसी तपस्या से कम नहीं.

यदि हम अपने में सहज जीवन जीने की आदत डाल लें, तो आनंद की प्राप्ति सहज हो जाएगी. सहजता एक कुंजी है, सनान्तन आनद ही.

टोने-टोटके - कुछ उपाय - 7 (Tonae-Totke - Some Tips - 7 )

छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं। पर उनकी विधिवत जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस लोकप्रिय स्तंभ में उपयोगी टोटकों की विधिवत जानकारी दी जा रही है।


मनोकामना की पूर्ती हेतु
  • होली के दिन से शुरू करके प्रतिदिन हनुमान जी को पांच पुष्प चढाएं, मनोकामना शीघ्र पूर्ण होगी।
  • होली की प्रातः बेलपत्र पर सफ़ेद चन्दन की बिंदी लगाकर अपनी मनोकामना बोलते हुए शिवलिंग पर सच्चे मन से अर्पित करें। बाद में सोमवार को किसी मन्दिर में भोलेनाथ को पंचमेवा की खीर अवश्य चढाएं, मनोकामना पूरी होगी।

रोजगार प्राप्ति हेतु
  • होली की रात्री बारह बजे से पूर्व एक दाग रहित बड़ा नीबू लेकर चौराहे पर जाएं और उसकी चार फांक चारों कोनों में फेंक दें। फिर वापिस घर जाएं किन्तु ध्यान रहे, वापिस जाते समय पीछे मुड़कर न देखें। उपाय श्रद्धापूर्वक करें, शीघ्र ही बुरे दिन दूर होंगे व रोजगार प्राप्त होगा।

स्वास्थ्य लाभ हेतु 
  • मृत्यु तुल्य कष्ट से ग्रस्त रोगी को छुटकारा दिलाने के लिये जौ के आटे में तिल एवं सरसों का तेल मिला कर मोटी रोटी बनाएं और उसे रोगी के ऊपर से सात बार उतारकर भैंस को खिला दें। यह क्रिया करते समय ईश्वर से रोगी को शीघ्र स्वस्थ करने की प्रार्थना करते रहें।

व्यापार लाभ के लिये 
  • होली के दिन गुलाल के एक खुले पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक सिक्का रखकर उसे नए लाल कपडे में लाल मौली से बांधकर तिजोरी में रखें, व्यवसाय में लाभ होगा।
  • होली के अवसर पर एक एकाक्षी नारियल की पूजा करके लाल कपडे में लपेट कर दुकान में या व्यापार पर स्थापित करें। साथ ही स्फटिक का शुद्ध श्रीयंत्र रखें. उपाय निष्ठापूर्वक करें, लाभ में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होगी।

धनहानी से बचाव के लिये 
  • होली के दिन मुख्य द्वार पर गुलाल छिडकें और उस पर द्विमुखी दीपक जलाएं। दीपक जलाते समय धनहानि से बचाव की कामना करें। जब दीपक बुझ जाए तो उसे होली की अग्नि में डाल दें। यह क्रिया श्रद्धापूर्वक करें, धन हानि से बचाव होगा।

दुर्घटना से बचाव के लिये
  • होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।
  • होली के दिन प्रातः उठते ही किसी ऐसे व्यक्ति से कोई वास्तु न लें, जिससे आप द्वेष रखते हों। सिर ढक कर रखें। किसी को भी अपना पहना वस्त्र या रूमाल नहीं दें। इसके अतिरिक्त इस दिन शत्रु या विरोधी से पान, इलायची, लौंग आदि न लें। ये सारे उपाय सावधानी पूर्वक करें, दुर्घटना से बचाव होगा।

आत्मरक्षा हेतु 
  • किसी को कष्ट न पहुंचाएं, किसी का बुरा न करें और न सोचें। आपकी रक्षा होगी।
  • घर के प्रत्येक सदस्य को होलिका दहन में घी में भिगोई हुई दो लौंग, एक बताशा और एक पान का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। होली की ग्यारह परिक्रमा करते हुए होली में सूखे नारियल की आहुति देनी चाहिए।. इससे सुख-सम्रद्धि बढ़ती है, कष्ट दूर होते हैं।

अनबन दूर करने के लिये 
  • होली के दिन 5-5 रत्ती के 5 मोतियों का ब्रेसलेट पहनें। इसके अतिरिक्त हर पूर्णिमा को चांदी के पात्र में कच्चा दूध डालकर चन्द्रमा को अर्ध्य दें, पति-पत्नी की आपसी संबंधों में मधुरता आयेगी।

मतभेद दूर करने के लिये 
  • पुत्र की पिता से न बनती हो तो अमावस्या, चतुर्दर्शीय या ग्रहण के दिन पुत्र पिता के जूतों से पुराने मोज़े निकाल कर उनमें नए मोज़े रख दे, दोनों के बीच चल रहा वैमनस्य दूर हो जाएगा।

रिश्तों की बीमारियाँ रिश्तों के टानिक



"आज जहाँ एक ओर दुनिया सिमट रही है, वहीं दूसरी ओर रिश्ते और परिवार टूट रहे हैं. एक-दूसरे के प्रति हमारी संवेदनाएं कम होती जा रही हैं. हमारी व्यवस्तएं, हमारे अवसादों की छाया हमारे रिश्तों पर दिखने लगी है. नतीजतन रिश्ते अपना औचित्य, अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं. इन सबके बीच हम यह भू जाते हैं कि स्वास्थ्य रिश्ते एक परिपक्व समाज की दरकार हैं, इसलिए सबसे जरूरी यह है कि हम यह जाने कि हमारे रिश्ते किन बीमारियों से जूझ रहे हैं यानी वे कौन-सी भावनात्मक बीमारियाँ हैं, जो रिश्तों को खोखला कर रही हैं. साथ ही रिश्तों से जुड़े उन पहलुओं के बारे में भी जानें, जो रिश्तों की इन बीमारियों को दूर करने में टानिक का काम करती हैं."


रिश्तों की बीमारियाँ
शक और अविश्वास - जी हाँ, रिश्ते की सबसे बड़ी व भयंकर बीमारी है शक, किसी भी रिश्ते में खासकर पति-पत्नी के रिश्ते में अगर शक पनपने लगे, तो समझ लीजिये कि आपके रिश्ते को आई.सी.यू. की जरूरत है. शक या संशय के साथ किसी भी रिश्ते को ज्यादा दिनों तक नहीं निभाया जा सकता. आप जिस व्यक्ति या रिश्ते पर शक कर रहे हैं, उससे आप कभी प्रेम या जुड़ाव नहीं कर पायेंगे.

यदि आप किसी रिश्ते से बंधे हैं, तो आपको चाहिए कि उसे पूरे दिल से स्वीकार करें. यदि आपको किसी पर अविश्वास है, तो इसका मतलब है कि आपके रिश्ते में खटास है और उस रिश्ते को आपने पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है. अविश्वास किसी भी रिश्ते के लिये घातक है. फिर चाहे बात माँ बेटी की हो, सास-बहू की या फिर ननद-भाभी की.

द्वेष या जलन- किसी से द्वेष या जलन की भावना जहाँ एक ओर आपको आपके प्रियजनों से दूर करती है, वहीं दूसरी ओर आपके व्यक्तित्व को भी खराब करती है. किसी से द्वेष या जलन की भावना बीमारी होने से ज्यादा बुरी है. यह आदत आपके किसी एक रिश्ते को नहीं, बल्कि सारे रिशों को बीमार कर सकती है. आप किसी एक से जलना शुरू करेंगे और फिर धीरे-धीरे आप हर किसी से जलने लगेंगे.

बेवफाई- किसी भी रिश्ते में बेवफाई या बेईमानी उस रिश्ते की जड़ों को ही खोखला कर देती है. किसी के विश्वास और प्रेम को ठेस पहुंचाकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता.

क्रोध- क्रोध रिश्तों की उम्र को कम करता है. क्रोध से रिश्तों में दूरियां आती हैं. क्रोधित व्यक्ति अक्सर गुस्से में रिश्तों की मान-मर्यादाओं को भूल जाता है.

अभिमान या ईगो- हमेशा याद रखें कि आत्मसम्मान और ईगो दो अलग-अलग चीजें हैं, इसलिए रिश्ते निभाने में किसी भी जिम्मेदारी को ईगो या झूठी प्रतिष्ठा से न जोड़ें, जैसे- "हमेशा मैं ही क्यों फोन करूं, वह क्यों नहीं फोन करता या करती."
"हमेशा मैं ही क्यों माफी मांगू." आदि.

उपेक्षाएं- रिश्तों में उपेक्षाओं का होना स्वाभाविक है और रिश्ते को ज़िंदा रखने के लिये कुछ हद तक ये जरूरी भी है. लेकिन उपेक्षाएं जब हद से ज्यादा बढ़ जाएं तो यह किसी बीमारी से कम नहीं. उपेक्षाओं का बोझ बढ़ने से रिश्ते दम तोड़ देते हैं.

रिश्तों के टानिक
प्रेम-जिस रिश्ते में निस्वार्थ व निश्चल प्रेम है, उस रिश्ते को किसी और टंकी की जरूरत ही नहीं. जिस रिश्ते में प्रेम है, उस रिश्ते की उम्र अपने आप बढ़ जाती है. प्रेम हर रिश्ते को खुशनुमा व तरोताजा बनाए रखता है.

समय- रिश्तों को समय देना बहुत जरोर्री है. आप अपने रिश्तों को कितना समय देते हैं, उससे यह तय होता है कि वह रिश्ता आपके लिये कितना मायने रखता है. एक-दूसरे के साथ, परिवार के साथ समय बिताने से रिश्तों में प्रेम व विश्वास बढ़ता है.

विश्वास- एक समृद्ध रिश्ते के लिये आपसी विश्वास होना बेहद जरूरी है. विश्वास दोनों तरफ से होना चाहिए. रिश्तों में विश्वास होने का मातब है कि आपका कोई भी रिश्ता फल-फू रहा है.

संयम- रिश्तों को कभी-कभी विषम परिस्थितियों से भी गुजरना पड़ता है, ऐसे में संयम बरतें. यदि कोई एक अपना विवेक खोता भी है, तो दूसरा अपना संयम बनाए रखे, ताकि आपके रिश्ते में दरार न पड़े.

समझदारी- किसी भी रिश्ते को निभाने के लिये परिपक्व विचारों की आवश्यकता होती है. एक-दूसरे की भावनाओं और परिस्थितियों को समझने की कोशिश करें. हर साझेदारी को पूरी समझदारी से निभाएं. इस तरह रिश्ते की हर छोटी-मोटी समस्या को आप समझदारी से सुलझा सकते हैं.

स्पेस- कुछ समय पहले तक शायद इस टानिक की जरूरत रिश्तों को नहीं थी, पर आज के बदलते परिवेश में इसकी जरूरत हर रिश्ते में हैं. हर रिश्ते में एक-दूसरे के स्पेस का हमें आदर करना चाहिए. एक-दूसरे के मामलों में ज्यादा हस्तक्षेप न करें. आज हर किसी को खुद के लिये कुछ स्पेस की जरूरत है और इसमें कुछ गलत नहीं है. आप अपने रिश्ते को जितनी स्पेस देंगे, उतनी ही उनमें घुटन कम होगी.

इन सबसे ज्यादा जरूरी है कि आप में किसी रिश्ते को निभाने की दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए, ताकि आप उन रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाने का प्रत्यन कर सकें. आप जिनके साथ रिश्ता बाँट रहे हैं, उनका आदर, उनकी भावनाओं का आदर, उनके व्यक्तित्व का आदर करें. किसी भी रिश्ते को टूटने न दें, क्योंकि हर रिश्ता अनमोल है.

06 फ़रवरी 2011

आंकड़ों की सच्चाई जानिये

Corporate World में Statistics का उपयोग अत्याधिक है. Smart Manager अपने सुन्दर  Laptop के साथ मीटिंगों में आते हैं और उनकी Screen पर Statistical Charts के माध्यम से अपने डिपार्टमेंट के रिजल्ट्स समझाते हैं.

इसी तरह के प्रत्येक सरकार भी Statistical आंकड़ों के मकडजाल के माध्यम से अपनी Performance जनता के सामने पेश करती है.

हमें बहुत सावधानीपूर्वक इन आकड़ों को स्वीकार करना चाहिए. यदि आप कुछ Simple Tips का इस्तेमाल करें, तो आंकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई एकदम से उजागर हो जायेगी. उदहारण के लिये एक कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर ने अपने मैनेजिंग डायरेक्टर को सूचित किया कि वर्तमान वर्ष में उनकी कंपनी के उत्पादों की बिक्री पिछले वर्ष के मुकाबले 20 प्रतिशत से बढी है. यह सब कुछ उसका एवं उसकी टीम के कठिन श्रम का नतीजा है. लिहाजा कंपनी को इस परिणाम को लेकर Celebrate करना चाहिए.

यदि आप Corporate World के सधे हुए खिलाड़ी हैं, तो उपरोक्त आंकड़ों को ध्यान से Analyse करें. अपने मैनेजर को शाबाशी देने से पहले यह पूछे कि सम्पूर्ण Industry की Growth क्या है. यानी के अपनी कंपनी और बाजार में मौजूद इसी तरह के उत्पाद बनने वाली कम्पनीयों की बिक्री को जोड़ लिया जाए. तो पिछले वर्ष के मुकाबले इस सम्पूर्ण Industry की Sales में कितनी वृद्धी हुई है. यदि यह वृद्धी 75 प्रतिशत है, तो आपकी कंपनी के लिये यह चिंता का विषय है कि आपकी कंपनी की प्रतिशत वृद्धी मात्रा 20 प्रतिशत क्यों है. इसका दूसरा सीधा सा मतलब यह भी निकलता है कि आपकी प्रतिद्वंदी कंपनी की बिक्री आपके मुकाबले अधिक तेजी से बढी है. जिसके परिणामस्वरूप आपकी कंपनी का मार्केट शेयर काफी कम हो गया है.

ऐसी स्थिति में तो आपकी कंपनी को Celebrate न करके, मैनेजर को Punish करना चाहिए.

इसी तरह से यदि आपको सूचना मिले कि पिछले वर्ष के मुकाबले आपकी कंपनी की Sales कम हो गई है, तो आपको फ़ौरन यह देखना चाहिए कि सम्पूर्ण Industry की Sales कितनी कम हुई है. यदि Industry की Sales अधिक गति या प्रतिशत से कम हुई है, तो आपको मैनेजर को शाबासी देनी चाहिए कि उसके प्रयासों से कंपनी की बिक्री में कम गिरावट आई है.

याद रहे......                                                                                                                        
जब सबको फायदा हो रहा है, तो मेरा फायदा सबसे अधिक होना चाहिए. और यदि सबको नुकसान हो रहा है, तो मेरा नुकसान सबसे कम होना चाहिए.

05 फ़रवरी 2011

बच्चे के रूझान के मुताबिक़ हो शिक्षा


हरियाणा के पानीपत जिले में स्थित कुराना जैसे छोटे गाँव से निकलकर IIT में शिक्षा हासिल करना अशोक कुमार के लिये  सपने के सच होने जैसा था. हालांकि जब कुमार को यह महसूस हुआ कि उनकी दिलचस्पी लोगों की सेवा करने में है, तो उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (I.P.S) से जुड़ने का फैसला किया. फिलहाल वह दिल्ली में सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स (C.R.P.F) में प्रतिनियुक्ति पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

कुमार की किताब 'Human in Khaki', जिसमें उन्होंने एक IPS  के कंरियर से जुड़े वृतांत और घटनाओं का वर्णन किया है, का हाल ही में दिल्ली में विमोचन हुआ है. इस किताब में आज के भारत के समक्ष मौजूद तमाम समकालीन मुद्दों मसलन आतंकी हमले, महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और बदलते Value System इत्यादि का जिक्र किया गया है. कुमार ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्कूल में पूरी की और IIT दिल्ली से Mechanical Engineering में B.Tec और Tharmal Engineering में M.Tec Degree हासिल की. उन्हें 1986-87 में IIT, दिल्ली में Writer of the Year के खिताब से भी नवाजा गया.

कंरियर में बदलाव से जुडी मुश्किलों के बारे में बात करते हुए कुमार कहते हिं, 'हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी है कि हमें अपने कंरियर संबंधी निर्णय तब लेने पड़ते हैं, जब हम स्कूल में होते हैं और बारहवीं कक्षा वह स्तर नहीं होता जब हम आत्मावलोकन करते हुए यह तय कर सकें कि अपने जीवन में क्या करना चाहते हैं. हमारे निर्णय ज्यादातर दूसरों से प्रेरित होते हैं. कोई जाँब करते समय ही हम उसकी खूबियों या खामियों के बारे में समझ पाते हैं. तब ही हम यह तय कर पाते हैं कि बाकी जीवन भी इसे करते रहना चाहते हैं या नहीं.' उनका आगे कहना था, 'पुलिस में नौकरी करते हुए कई जगहों पर अलग-अलग तरह से सेवाएं देने के बाद अब मुझ लगता है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद मैं आम आदमी के जीवन में कुछ बदलाव लाने में कामयाब रहा. हमेशा से यही मेरा लक्ष्य रहा है.'

कुमार के मुताबिक़ IIT जैसे संस्थान व्यक्ति को जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रभावी, सक्षम और उत्कृष्ठ बनाना सिखाते हैं. कुमार आगे कहते हैं, 'इससे मुझे अपनी पुलिस सेवा में मदद मिली. मेरी ताकत इस बात में निहित है कि मैं कितनी कुशलता से गरीब, जरूरतमंद और उत्पीडित लोगों की मदद कर सकता हूं.’

कुमार ने कंरियर में Engineering की राह न चुनकर पुलिस सेवा को चुना. लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी दिलचस्पी वाले काम से जुड पाते हैं? पुलिस भी अपने बीच IIT से निकले शख्स को पाकर खुश हो सकती है, लेकिन ऐसे कितने कार्यक्षेत्र हैं, जिनमें उन लोगों को जगह मिलेगी, जो उसके कार्यक्षेत्र हैं, जिनमें उन लोगों को जगह मिलेगी, जो उसके विशेषज्ञ नहीं हैं? हमारा शिक्षा तन्त्र हर काम को अनुभव करने की इजाजत नहीं देता, ताकि हम समझ सकें कि आगे चलकर कौन सा काम करना चाहते हैं.

फंडा यह है कि...                                                                                                                          
हमारे अभिभावकों व शिक्षकों को यह जानना चाहिए कि बच्चे की दिलचस्पी किस क्षेत्र में है. बच्चे की रुचि को समझकर उसे उसी दिशा में शिक्षित करे ताकि उसका जीवन सार्थक हो सके.

ग्राहक और बाजार के बारे में रहे पूरी जानकारी


ग्राहक एक बार किसी कंपनी से मुंह फेर लें, तो फिर दुबारा उसकी ओर नहीं लौटता. इन ग्राहकों को आपसे दूर ले जाने का काम कोई और नहीं आपके प्रतिस्पर्धी ही करते हैं. यह कहना है Rodenberg Tilmain and Associates के Managing Partner Joseph Rodenberg का. उनका मानना है कि संतुष्टि का भाव ही सफलता का सबसे बड़ा शत्रु है.

किसी भी कंपनी के सबसे अहम निर्णय बोर्डरूम के अंदर नहीं, बल्कि बाहर लिये जाते हैं. इन निर्णयों को लेने वाले कोई दूसरे नहीं, कंपनी के ग्राहक ही होते हैं. ये निर्णय इस सन्दर्भ में होते हैं कि कंपनी के उत्पाद खरीदे जाएं या नहीं. उनके कंपनी दैनिक, साप्ताहिक या मासिक आधार पर एक्सेल चार्ट पर निगाह दौडाते हुए यह जानने की कोशिश करती हैं कि बिक्री में किस तरह का उतार-चढ़ाव आया. यदि उनकी बिक्री बढ़ती है तो वे जश्न मनाती हैं और अगर इसमें गिरावट आती है तो अपनी सेल्स टीम को बुलाकर फटकारती हैं या पुराने सेल्सकर्मियों को हटाकर नए लोग ले आती है. इस पूरी प्रक्रिया में बड़ी संख्या में कंपनियों के भीतर Competitive Intelligence (प्रतिस्पर्धी जानकारी) पर आधारित प्रबंधन व नीति-निर्धारण पीछे छूट जाता है.

इस प्रतिस्पर्धी  माहौल को देखते हुए किसी भी बाजार में कंपनी के लिये ऐसी जानकारियों की जरूरत होती है, जिस पर आगे काम किया जा सके. इसके लिये विशुद्ध तथ्यों पर आधारित Competitive Intelligence (सीआई) बहुत अहम है. Strategic and Technical Intelligence यह जानना है कि बाजार आपको 'क्यों' और 'कैसे' प्रभावित करता है. बाजार के आंकड़े और जानकारिया सबके लिये उपलब्ध हैं, लेकिन इनमें से 80 फीसदी आंकड़े बेतरतीब होते हैं. उपलब्ध आंकड़े कंपनी के लिये प्रासंगिक हो भी सकते हैं और नहीं भी. यदि इन आंकड़ों पर काम न किया जाते तो ये बेतरतीब पड़े-पड़े बेकार हो जाते हैं. Competitive Intelligence आंकड़ों को उपयोगी जानकारी में बदलने की कला है. इसके लिये उन आकड़ों का विशलेक्षण करना होता है जो कंपनी के लिये प्रासंगिक हैं. अपनी बाजार संबंधी नीति तैयार करने के लिये ऐसी जानकारी जुटानी पड़ती है, जिस पर आगे काम किया जा सके.

किसी भी कंपनी को अपने ग्राहक, बाजार की हलचल, तकनीक व रूझान में बदलाव, अपने प्रतिस्पर्धियों, उनकी रणनीति, उनके लक्ष्य, ग्राहकों के Feedback इत्यादि के बारे में लगातार जानकारी जुटाने की जरूरत है.

 रोड़ेनबर्ग कहते हैं, 'Competitive Intelligence पर आधारित मेरी मास्टर क्लास से जुड़ने वाले ज्यादातर लोग Strategic Intelligence based Management and Marketing की जरूरत को समझते हैं, लेकिन वे लगातार पूछते रहते हैं कि उन्हें इससे सम्बंधित जानकारी कहाँ से मिल सकती है?' प्रबंधन द्वारा रणनीतिक मामलों पर चर्चा के लिये सालाना बैठक बुलाने की Competitive Intelligence कोई साल में एक बार होने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह तो अपने ग्राहकों और प्रतिस्पर्धियों के बारे में जानकारी पाने और उसे लगातार अपडेट करते रहने की सतत प्रक्रिया है. यह अनुशासित ढंग से सोचने और काम करने की प्रक्रिया है. Competitive Intelligence कंपनी को अग्रगामी रूप से सक्रीय होने और बाजार के बदलावों के प्रति प्रतिक्रियाशील न होने में मदद करती है.

फंडा यह है कि...                                                                                                               
यदि आप अपने ग्राहकों के बारे में नहीं जानते और यह नहीं समझते कि वे आपके उत्पाद को क्यों पसंद या नापसंद करते हैं, तो प्रतिस्पर्धी बाजार में अंदर ही अंदर चल रहे बदलावों के बारे में सटीक जानकारी नहीं जुटा पायेंगे. 

04 फ़रवरी 2011

परदेश में बसो तो ध्यान रखो...

अपने देश को छोड़कर दूसरे देशों में रहने की तमन्ना भारतीयों में अथाह है. जोड़-तोड़ लगाकर और जोश में भारतीय चले तो जाते हैं, लेकिन वहां के समाज में घुलने-मिलने में प्रारम्भिक वर्षों में उन्हें बहुत कठिनाई होती है. उन्हें दूसरे देश के निवासियों का रिजेक्शन झेलना पड़ता है और चरम परिस्थितियों में कई भारतीय एडजस्ट नहीं होने के कारण मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर आत्महत्या तक को मजबूर हो जाते हैं. जिसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि बातें बहुत छोटी-छोटी सी होती है.

अमरीकी किसी के भी बहुत जल्दी दोस्त बन जाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपके कठिन परिस्थितियों में वे आपके वित्तीय एवं व्यक्तिगत दायित्वों की पूर्ती में सहायक होंगे. भारत में इसके विपरीत किसी भी दोस्ती में दोनों ही चीजों की आवश्यकता है.

जापान के समाज में निवासी बनने से पहले यह जान लो कि किसी भी जापानी द्वारा की गई सहायता [चाहे कितनी भी छोटी हो या बड़ी हो] को भविष्य में आपके द्वारा लौटाना आवश्यक है. अक्सर जापानी यह आशा करते हैं कि कुछ हजार डाँलर आपको डाक्टर, वकील, अध्यापक को प्रति वर्ष उनकी फीस के अलावा देने हैं, क्योंकि वे आपके परिवार का ध्यान रखते हैं. वहां यह भी पारंपरिक है कि जैसे ही आपका बच्चा प्राइमरी स्कूल की क्लास उत्तीर्ण करे, तो एक-दो लाख रूपये आप स्कूल के अधिकारियों को थेंक यू मनी के रूप में दे. इसी तरह से यदि आप कहीं बैठकर गप-शाप कर रहे हैं, तो किसी भी उम्र का अमरीकन यह आशा करेगा कि आप उसके प्रथम नाम से उसे पुकारें. यहीं जर्मनी, फ्रांस आदि के नागरिक इसको ठीक नहीं मानते हैं. चीन में यदि कोई अपना नाम बताता है तो पहले वह अपना फेमिली नेम बताता है और फिर अपना नाम. वे भी इस बात से हिचकिचाते हैं कि कोई भी उन्हें बिना प्रगाढ़ संबंध बने, प्रथम नाम से पुकारें. यदि हम उपहार की बात करें, तो अमरीका में कपड़ों का उपहार देना ठीक नहीं माना जाता है क्योंकि कपड़ों के बारे में निर्णय बहुत पर्सनल डिसीजन माने जाते हैं. इसी तरह से कपड़ों के उपहार रसिया में रिश्वत मानी जाती है. रूमालों के उपहार थाईलैंड, इटली, वेनेजुएला, ब्राजील देशों में ठीक नहीं माने जाते क्योंकि वहां इसको ट्रेजडी का प्रतीक माना जाता है. इसी तरह से चीन और जापान में कभी भी 'चार' वस्तुएँ एक साथ उपहार में नहीं देनी चाहिए. इसे अशुभ माना जाता है. इसी तरह ताइवान एवं चीन में घड़ी एक उपहार की तरह नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि यह मृत्यु का घोतक है.  

फंडा यह है कि...                                                                                                                                           
सारांश यही है कि जब किसी भी देश में रहने जाएं, तो उसकी संस्कृति का अध्ययन करें और उसका अपने व्यवहार में ध्यान रखें.